दरवाजे की घंटी की मीठी आवाज ने सारे घर को गुंजा दिया था. यह घंटी अब कभीकभार ही बजती है, पर जब भी बजती है, तो सारे घर के माहौल को महका देती है.
मैं ने बड़े ही जोश से दरवाजा खोला था. दरवाजा खोलते ही एक सूटबूटधारी नौजवान पर निगाह पड़ते ही मेरी आंखों में अपनेआप सवालिया निशान उभर आया था. मुझे लगा था कि इस ने या तो गलत घर का दरवाजा खटखटा दिया है या फिर किसी का पता पूछना चाहता है, क्योंकि उसे मैं नहीं पहचानता था.
‘‘मैं सौरभ... मेरी मां सुधा और पिताजी गौरव... उन्होंने मुझ से बोला था कि मैं आप से आशीर्वाद ले कर आऊं...’’
‘‘ओह... अच्छा... कैसे हैं वे दोनों...’’ मेरे सामने अतीत के पन्ने खुलते चले गए थे. एकएक चेहरा ऐसे सामने आता जा रहा था मानो मैं अतीत के चलचित्र देख रहा हूं.
‘‘पिताजी तहसीलदार बन गए हैं... उन्होंने यह बताने को जरूर बोला था.’’
‘‘ओह... अच्छा, पर वे तो रीडर थे... मैं ने ही उन्हें नियुक्त किया था...’’ मुझे वाकई हैरानी हो रही थी.
‘‘जी, इसलिए तो उन्होंने मुझे आप को बताने के लिए बोला था... उन्होंने विभागीय परीक्षा दी थी... उस में वे पास हो गए थे और नायब तहसीलदार बना दिए गए थे... बाद में उन का प्रमोशन हो गया और अब वे तहसीलदार बन गए हैं,’’ सौरभ सबकुछ पूरे जोश के साथ बताता चला जा रहा था.
‘‘अच्छा... और सुधा का स्कूल...’’
‘‘मम्मी का स्कूल... अभी चल रहा है... तकरीबन 4 एकड़ में नई बिल्डिंग बन गई है और उस में 2,000 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं...’’
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