Hindi Story: उसका असली नाम तो शायद उस को भी याद नहीं होगा, लेकिन नैशनल हाईवे 48 पर बने ‘शेर ए पंजाब’ ढाबे पर वह सिर्फ ‘छोटू’ था. कद उस का छोटा था, लेकिन फुरती ऐसी कि लोग उसे ‘तूफानी’ भी कहते थे. ढाबे का मालिक मलखान सिंह, चिल्लाया, ‘‘ओए छोटू, टेबल नंबर 4 पर 2 कड़क चाय और मक्खन मार कर परांठा दे आ.’’ छोटू एक हाथ में 4 गिलास और दूसरे हाथ में तश्तरी संभाले दौड़ पड़ा. उस के चेहरे पर हमेशा एक टेढ़ी मुसकान रहती, मानो वह दुनिया को बता रहा हो कि भले ही उस की उम्र खेलनेखाने की है, पर उसे गृहस्थी का बोझ उठाने का सलीका पता है.
सुबह के 4 बजे थे. पूरा ढाबा सो रहा था, सिवा छोटू के. वह अपने फटे हुए स्वेटर के छेद से छनती ठंडी हवा को नजरअंदाज करते हुए कोयले की भट्ठी सुलगा रहा था. गीली लकडि़यों और नम कोयले से लड़ते हुए जब धुआं उस की आंखों में भर गया, तो वह मुसकरा कर बोला, ‘‘आज आग भी नखरे कर रही है.’’
उस ढाबे की दीवारों ने बहुतकुछ देखा था, टूटे सपने, अधूरी मंजिलें, थके चेहरे और कभीकभी अनकहे आंसू. लेकिन उन सब के बीच अगर कोई चीज सब से ज्यादा परमानैंट थी, तो वह थी छोटू की मौजूदगी. जैसे ढाबा नहीं, छोटू ही हाईवे पर टिका कोई मील का पत्थर हो.
छोटू की चपलता के चर्चे दूरदूर तक थे. पंजाब से आने वाला संतोख सिंह हो या दक्षिण से आने वाला सुब्रमण्यम... हर कोई ‘छोटू की चाय’ का दीवाना था. वह केवल चाय नहीं देता था, बल्कि थके हुए ड्राइवरों को दो पल का ऐसा सुकून देता था, जो उन्हें घर की याद से दूर और मंजिल के करीब ले जाता था.
‘घर कितने दिन बाद जा रहे हो पाजी?’ ‘अम्मां ठीक हैं?’ ‘इस बार बेटी से बात हो गई अंकल?’ छोटू के
ये सवाल चाय के साथ ऐसे घुलते कि जवाब देतेदेते आंखें भीग जातीं. छोटू के लिए पढ़ाई का मतलब किताबों से कहीं ज्यादा ‘हिसाबकिताब’ था. वह स्कूल तो नहीं गया, लेकिन उसे यह बखूबी पता था कि 5,000 में से 2,000 रुपए मां की दवाओं के हैं, 1,500 छोटी बहन राधा की स्कूल ड्रैस और किताबों के और बाकी बचे पैसों में घर का चूल्हा जलना है.
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