Hindi Story:राकेश खाकी वरदी को बड़े ध्यान से पहन रहा था. यही वह समय है, जब उसे वरदी में एक भी सिलवट पसंद नहीं. ड्यूटी खत्म होतेहोते न जाने कितनी सिलवटें और गर्द इस में जम जाती हैं, पर तब उसे इस की परवाह नहीं होती. जब वरदी बदन से उतरती है, तब शरीर अखरोट की गिरी सा बाहर निकल आता है… नरम और कागजी सा.
दूसरा धुला जोड़ा अलमारी में हैंगर से लटका था, अगली सुबह के लिए. पहनते वक्त साफधुली और प्रैस की हुई वरदी से जो लगाव होता है, उसे दिन ढलने तक कायम रखने में बड़ी मुश्किल होती है.
पुलिस इंस्पैक्टर होने के नाते दिनभर ?ागड़ेफसाद सुनना, चोरगिरहकटों के पीछे लगना, हत्या, बलात्कार और लूटपाट की तहकीकात करना और थक कर घर लौटना… रोज यही होता है.
राकेश चमचमाती लाल बैल्ट पैंट की लुप्पी में खोंसने लगा था, तभी उस की बेटी विभा की आवाज कानों में पड़ी, ‘‘पापा, आज हमारे कालेज का सालाना जलसा है. मु?ो शाम 7 बजे तक कालेज पहुंचना है.
मम्मी को साथ ले जाऊं?’’ ‘‘मम्मी… क्यों?’’ उस ने पूछा.
‘‘7 बजे अंधेरा हो जाता है पापा, मु?ो डर लगता है,’’ विभा बोली.
‘‘हां, आजकल देश में कई घटनाएं घट चुकी हैं. अकेले निकलना ठीक नहीं,’’ राकेश ने गरदन हिला कर सहमति जताई. उस का चेहरा गंभीर हो गया, जिस में घबराहट के भाव थे. अमूमन ऐसा नहीं होता था. जब वह थाने में होता, उस वक्त घबराहट और चिंता उस के रोब और रुतबे के नीचे
पड़ी रहती. ‘‘क्यों टैंशन करते हो पापा, मम्मी साथ जाएंगी न,’’ विभा फिर बोली.
‘‘मम्मी बौडीगार्ड हैं क्या? एक कौकरोच देख कर उन की चीख निकल जाती है,’’ कह कर राकेश मुसकराया, फिर बोला, ‘‘थाने से किसी को भेज दूंगा… मम्मी के साथ ही जाना.’’
यहां दूसरे की बेटी का सवाल होता, तो राकेश कहता, ‘डरती हो, इतनी भी हिम्मत नहीं, क्या करोगी जिंदगी में.’ एक अपराधबोध आ कर राकेश के मन को बींध गया. एक पुलिस अफसर हो कर भी वह आम आदमी से अलग तो नहीं है.
वरदी ही उस के स्वभाव को बदलती है. वरदी और सर्विस रिवाल्वर जब घर की अलमारी के भीतर दाखिल हो जाते हैं, तब वह एक आम आदमी होता है. राकेश 2 बेटियों का पिता है. उस के भीतर भी कहीं न कहीं असुरक्षा और अपनेपन का भाव है. वह हर जगह बच्चों के आगेपीछे साए की तरह नहीं घूम सकता. बड़ा आदमी भी अपने बच्चे के लिए सिक्योरिटी रखता है, फिर भी कहता फिरता है, ‘जमाना खराब है, मु?ो भी लड़कियों की फिक्र रहती है.’ खाल चाहे कितनी भी मोटी क्यों न हो, अंदर से नरम ही होती है. विचारों ने साथ छोड़ा कि राकेश का दाहिना हाथ अनचाहे ही सर्विस रिवाल्वर की ओर चला गया, फिर उस ने पिछली जेब को टटोला. कंधे के बैज को दुरुस्त किया.
एक रुतबे का एहसास होते ही पुलिसिया रोब राकेश के चेहरे पर टिक गया. थोड़ी ही देर बाद बूटों की आवाज भी उस के साथ कहीं गुम हो गई. राकेश थाने पहुंच चुका था. फिर वही रोजनामचा. किसी की कार चोरी हो गई, तो किसी की सोने की चेन. सुलहसफाई, मारपीट और फिर एफआईआर. दोपहर हो गई थी, दिमाग थक रहा था. तभी एक औरत आई. कोई 30-32 साल की उम्र रही होगी. राकेश ने सिर उठाया. होंठों पर ताजा लिपस्टिक, आंखों में काजल की तीखी धार, बालों में खोंसा लाल गुलाब और साधारण
सा चेहरा. राकेश की पारखी नजर में वह एक दोयम दर्जे की औरत लगी. उस का काम ही कुछ ऐसा है, शक को पुख्ता करने की कोशिश करना… वह करता भी रहा.
उस औरत ने करीब आते ही अपना परिचय दिया, ‘‘मैं दया बस्ती में रहती हूं साहब… मेरा नाम गुलाबी है.’’
‘‘आगे बोल,’’ राकेश ने कड़क आवाज में कहा और फिर मेज पर खुली फाइल को देखने लगा.
‘‘साहब, मेरी मौसी का घर पास
में ही है. मैं तकरीबन हर रोज वहां आतीजाती हूं, इधर से…’’
‘‘अच्छा तो…’’
‘‘आतेजाते सामने नुक्कड़ की दुकान वाला मु?ो देख कर गंदी जबान बोलता है साहब,’’ गुलाबी ने ?ि?ाक भरी आवाज में कहा.
राकेश ने नजर उठाई, फिर गुलाबी को घूर कर देखा, ‘‘नाम क्या है उस आदमी का?’’
‘‘राम सिंह…’’
‘‘कब बोला वह?’’
‘‘वह तो रोज बोलता है साहब.’’
‘‘तो अब शिकायत करने आई है, क्यों…? वैसे, तू करती क्या है?’’ उस ने लहजा सख्त किया.
गुलाबी सकपका गई. वह अब अच्छी तरह सम?ा गई कि उस ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी दे मारी है.
इस के बावजूद गुलाबी ने हिम्मत जुटाई और फिर मोटेमोटे आंसू गिराते हुए धीमी आवाज में बोली, ‘‘मैं गलत काम नहीं करती साहब, पर आज उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला कि मेरे साथ चल.’’
राकेश ने थोड़ी नरमी से कहा, ‘‘मैं ने कब बोला कि तू गलत काम करती है. तू कहती है, तो उसे भी देख लेते हैं… क्या नाम बताया था उस का?’’
‘‘राम सिंह,’’ गुलाबी
ने कहा.
‘‘तु?ो कैसे पता कि उस का नाम राम सिंह है?’’
गुलाबी को बताते न बना. राकेश गुलाबी को
ताड़ गया कि कहीं दाल
में कुछ काला है, फिर भी उस ने सिपाहियों को भेज कर राम सिंह को थाने में बुलवा लिया.
राम सिंह बेहद घबराया हुआ था. राकेश अपनी कुरसी को छोड़ कर उठ खड़ा हुआ. सामने कोई
बड़ा अफसर नहीं, बल्कि मुलजिम मुखातिब था.
उस ने डंडा मेज पर फटकारा और गुलाबी से घूर कर पूछा, ‘‘यही है वह राम सिंह, जो तु?ो छेड़ता है?’’
‘‘जी हां..’’
‘‘क्यों बे… यह सही कह रही है?’’ राकेश ने डंडे से राम सिंह की ठोड़ी
ऊपर उठाई.
‘‘नहीं साहब… यह ?ाठ बोलती
है, मैं ने कुछ नहीं किया,’’ राम सिंह गिड़गिड़ाया.
‘‘यह तो बोलती है कि तू इसे छेड़ता है? देख, अब कानून इतना सख्त है
कि इस की शिकायत पर तू एक बार अंदर गया, तो तेरी जमानत भी नहीं होगी, सम?ा?’’
राम सिंह का डर के मारे गले का थूक सूख गया. उस ने मुड़ कर एक नफरत भरी नजर से उस औरत को
देखा. जी किया कि अभी इस का जिस्म चिंदीचिंदी कर दे, लेकिन उसे अपने ही जिस्म की सलामती पर विश्वास नहीं रहा.
राम सिंह घबराया, फिर हिम्मत जुटाने लगा. कुछ देर बाद राम सिंह राकेश के करीब आ कर फुसफुसाया, ‘‘साहब, यह चालू लगती है… मु?ो फंसाना चाहती है.’’
राकेश के चेहरे की सख्ती पलभर में हट गई, वह ठठा कर हंस दिया, ‘‘सलमान खान सम?ाता है अपनेआप को, चेहरा देखा है कभी आईने में.’’
‘‘सच कह रहा हूं साहब… मेरा यकीन मानिए. इसी ने मु?ा पर डोरे डाले थे. मैं ही बेवकूफ था, जो इस के ?ांसे में आ गया. यह पहले ही मेरे 5 हजार रुपए हजम कर चुकी है, अब देने में तकरार करती है,’’ राम सिंह थोड़ा घबरा कर बोला.
राकेश वापस आ कर अपनी कुरसी पर बैठ गया और गुलाबी की तरफ डंडा हिलाते हुए पूछा, ‘‘तू ने इस से पैसे लिए थे? सच बता, वरना मैं सख्ती कर के उगलवाना भी जानता हूं.’’
गुलाबी की आंखों में खौफ के बादल तैरते जा रहे थे. ठीक सामने जेल का लौकअप आंखों में घूमने लगा था. वह जल्दी ही टूट गई.
‘‘हां, लिए थे साहब, लेकिन इस ने कीमत वसूल कर ली. अब मेरा इस से कोई लेनदेन नहीं है.’’
‘‘फिर किस बात की शिकायत ले कर आई है… अंदर कर दूं दोनों को,’’ राकेश ने दोनों की ओर तीखी नजर डालते हुए कहा.
‘इस बार माफ कर दो साहब, आइंदा गलती नहीं होगी,’ दोनों के मुंह से एकसाथ निकला.
राकेश सोचने लगा था. एक औरत जात इज्जतआबरू के लिए समाज के वहशी दरिंदों से डर खाती है. अंधेरे में बेखौफ नहीं निकल सकती. दूसरी वे हैं, जो अपने जिस्मानी संबंधों को सामाजिक लैवल पर उजागर कर देती हैं. एक अपनी हद पहचानती है, तो दूसरी हद के बाहर बेखौफ जीती है. उस के लिए दिनरात का फर्क नहीं रहता.
सोने के लालच में कर दी हत्या
पश्चिमी दिल्ली के द्वारका इलाके में एक शख्स ने सोने की अंगूठियों, ब्रेसलेट और पैसों के लालच में अपनी लिवइन पार्टनर और साथियों के साथ मिल कर एक दोस्त की ही हत्या कर दी. मृतक की पहचान राधिका अपार्टमैंट्स, सैक्टर-14, द्वारका के रहने वाले 48 साल के अनुरूप गुप्ता के रूप में हुई, जो छत्तीसगढ़ सदन, सैक्टर-13, द्वारका में कैंटीन चलाता था और सोना पहनने का शौकीन था. पुलिस ने इस सिलसिले में आरोपी हैप्पी को हिरासत में ले कर पूछताछ की, तो पता चला कि हैप्पी ने सोने के लालच में अनुरूप से दोस्ती बढ़ाई और उसे आएदिन अपने यहां पार्टी पर बुलाने लगा. इसी दौरान 18 फरवरी को हैप्पी ने अनुरूप को पार्टी के बहाने अपने किराए के फ्लैट पर बुलाया, जहां पहले से भूपेंद्र, बलराम और नीरज मौजूद थे. अनुरूप ने उस समय गहने नहीं पहन रखे थे.
इस बात से बौखलाए उन लोगों ने अनुरूप को पकड़ लिया और गहने कहां रखे हैं जानने के लिए बांध कर उस की पिटाई की. पता चला कि गहने अनुरूप ने कार में ही छोड़ दिए थे. इस के बाद वे लोग उस की कार की चाबियां ले कर छत्तीसगढ़ सदन गए और गहने निकाल लिए. इस के बाद आरोपितों ने चाकू मार कर अनुरूप की हत्या कर दी. हत्या के बाद सुबूत मिटाने के लिए हैप्पी ने बाजार से एक बड़ा चाकू खरीदा. अनुरूप की लाश को कई टुकड़ों में काट कर प्लास्टिक के 3 बैगों में भर दिया और अनुरूप की ही कार वृंदावन, उत्तर प्रदेश ले जा कर यमुना नदी में फेंक दिया.




