Hindi Story: मैं ने उसे बचपन में देखा था. तभी से उस की तसवीर मेरे जेहन में छप गई थी. फिर लगा कि इस खूबसूरत लड़की से दोबारा मुलाकात होगी भी या नहीं. इस बीच मेरी शादी पक्की हो गई, पर मैं उसे भूल नहीं पाया था…
कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो जिंदगी को एक कसक दे जाती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी को एक मिठास, जिंदगी को एक खूबसूरत, सुखद, सुनहरे रंग से रंग देती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी के लिए एक सुखद अहसास बन कर रह जाती हैं. कुछ मुलाकातें कभी नहीं भूलने के लिए होती हैं, जैसे उस की और मेरी मुलाकात जिंदगी में एक अजीब सी हलचल, एक चमक तो लाई थी, जिसे हम चाह कर भी यादों से नहीं दूर कर सके, फिर भी किसी से कह नहीं सकते थे, ऐसे भी हालात बन कर रह गए थे. अचानक हमारी मुलाकात फिर से दोबारा होगी, यह सोचा भी नहीं था हम ने. हो सकता है, उस के ‘मन में मिलन दोबारा हो’, ऐसा कुछ रहा हो.
चिलचिलाती, आग उगलती जेठ महीने की दोपहरी हमारे किशोरावस्था से ले कर जवानी की ओर जाते रास्ते के समय हुआ करती थी. गांव में तब बिजली नहीं हुआ करती थी. तब बूढ़े बरगद की छाया में ठंडापन रहा करता था. बड़ेबुजुर्ग कोई चौपड़, कोई ताश खेलते हुए दोपहर वहीं बिताया करते थे.
उस बूढ़े बरगद के बगल में ही हमारा आम का बगीचा था, जो अभी भी है. जेठ महीने की तपिश आग उगलती है यह तो आप सभी जानते हैं. जवानी बड़ी अलबेली होती है, आप यह भी जानते हैं, क्योंकि इस मंजर से सभी गुजरते हैं. किशोरावस्था से जवानी की ओर बढ़ते कदम कब लड़खड़ा जाएं, कोई नहीं जानता. इस उम्र में जो संभल गया, वह पूरे जीवन संभल कर सुखमय जीवन बिताता है और जो लड़खड़ा गया, गिर गया, वह फिर संभल नहीं पाता, अपनी पूरी जिंदगी नरक जैसी बना डालता है.
हमारे ऊपर उन बुजुर्गों का साया था, जिसे मातापिता, दादीदादा कहते हैं. गांव के बड़ेबुजुर्गों का उपदेश भी हम उस बूढ़े बरगद के नीचे ध्यान से सुना करते थे. हम हमेशा पिता से डर कर कभी रास्ते से भटके नहीं थे. तब साइकिल या पैदल चल कर नातेरिश्तेदारों के यहां लोग आयाजाया करते थे. आम, जो आगे पकना शुरू करते थे, वे आधे जेठ से अपने रंग बदलने शुरू कर दिया करते थे. हम अपने हमजोली के साथ सुबहशाम बगीचे में, दोपहर बुजुर्गों के संरक्षण में बूढ़े बरगद के नीचे ही रहते थे. हम एक अनुशासन में रहते थे. वैसे भी स्कूल में जेठ के महीने में एक महीने की छुट्टी रहती थी. स्कूल में मास्टर पिता से भी ज्यादा खयाल रखते थे, खासकर पढ़ने वाले बालकबालिकाओं को, जो उन को सम्मान देते थे, उन का तो वे बहुत ही ध्यान रखते थे.
एक दिन एक अधेड़ महिला, एक पुरुष के साथ आईं, साथ में उन के साथ एक किशोरी थी, जो जवानी की दहलीज पर पांव रखने ही वाली थी, ठीक हमारी ही तरह. वह हम से वही सालछह महीने छोटी रही होगी.
हमारे बगीचे में आ कर वे लोग सुस्ताने लगे थे. आकर्षण स्वाभाविक था, खासकर उस ओर जिस ओर एक सुंदरता का खजाना लिए, सुंदरता की मूर्ति सी, अल्हड़ रूपवती कन्या सामने हो. मैं भी कुछ कम नहीं था. गबरू जवान, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज की ओर बस दो कदम में ही पहुंचने वाला था. शायद कनखियों से निहार रही होती वह बाला भी आकर्षित थी. मानमर्यादा में बंधी, बालिका शर्मीली लगी, जिस के म?ाले बड़े दांतों से थोड़ी सी मुसकराहट से बिजली सी कौंध जाती थी.
उस के दांत मोती की तरह सफेद ऐसे लगते थे जैसे किसी कुशल कारीगर ने उसे उस के मुंह में तराश कर फिट कर दिए हों. उस के होंठों की लालिमा पके हुए कुंदरू की तरह लाल थी. वह शर्मीले स्वभाव की लगती थी. जब वह किसी बात पर शरमाती, तो उस के लाललाल गाल इतने लाल, सुरमई हो जाते थे, जैसे रति के गालों में उस के प्रेमी पति कामदेव ने केसर मल दिया हो. उस के गालों की सुंदरता ऐसी थी, जैसे फगुआ खेलते समय लाल गुलाब उस के गालों में मल दिया गया हो. उस की उठी हुई नाक से मेरी आंखें हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं भी मर्यादा में रह कर ही उसे देख कर हैरान था कि क्यों उसे देख कर मन ही नहीं भरता है. सहसा उस ने तिरछी नजरों से मु?ो देखा, हालांकि वह बड़ी चतुराई से सब की नजरें बचा कर मेरी ओर देख रही थी, फिर भी मेरी और उस की आंखें चार हो गई थीं.
अरे वाह, क्या गजब की आंखों में सागर सी गहराई थी. मेरे गोलखा आम की सी फांकें थीं उस की आंखें, गजब का आकर्षण. ऐसा तीर उस की कजरारी, बड़ीबड़ी आंखों से निकला, जो सीधे मेरे दिल के अंदर एक अमिट घाव करता चला गया था. उस के बालों में बंधी चोटी उस के उठे हुए कूल्हों को बारबार सहलाती सी लग रही थी. न कोई साज, न कोई सिंगार फिर भी गजब का आकर्षण, कुदरती खूबसूरती जो सीधे मेरे दिल में उतरती चली गई थी. उस के अभी हाल के ही उठे लगते कठोर उभार किसी को भी भटका सकते थे. मेरा मन उस से बात करने का होता था. उस के पिता मेरे पिताजी से बात कर रहे थे, पर मैं उस बातचीत को सुनने की कोशिश में नहीं था. मैं तो किसी बहाने, किसी तरह से उस से बात करने के लिए उतावला था.
तभी उस की मां ने मु?ा से कहा, ‘‘दादू, आम तो तुम्हारे फले हैं, पकते तो अभी नहीं होंगे.’’ मैं ने ?ाटपट कहा, ‘‘आइए, जरा देखते हैं. हमारे दारानगर में शायद पके मीठेमीठे आम मिल जाएं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते जाइएगा आप, अचार रखने के लिए.’’ उस की मां ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, हम लोग रामपुर से निमंत्रण कर के आए हैं, थके हुए हैं कौन लाद कर ले जाएगा. हम वैसे भी 3 दिन से ढंग से सो तक नहीं पाए हैं.’’ मैं ने ?ाट से कहा, ‘‘मांजी, आप चलिए न. आज हमारे घर में रह कर फिर कल चले जाना. अभी वैसे भी 10 किलोमीटर बाद सड़क मिलेगी आप को.’’ उस की मां ने ?ाटपट मेरे गालों पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे मेरी अम्मां फेरा करती थीं. मु?ो बहुत अच्छा लगा, अपनेपन सा महसूस हुआ.
उस की मां ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘फिर कभी आऊंगी तो जरूर चलूंगी, सालों से तुम्हारी अम्मां से नहीं मिली हूं, जब तुम छोटे से थे, तब से. बहुत दिन हुए घर से निकले हुए, इस के दादादादी परेशान होंगे.
4 दिन बाद फिर मेरे मायके में शादी है, वहां भी जाना जरूरी है. गरमी में ही शादीब्याह में घूम लेते हैं वरना सालभर घर से कहां निकलना होता है.’’ मु?ो आभास हो रहा था कि ये लोग मेरे अम्माबापू के करीबी हैं. मैं सोच ही रहा था कि उस के पिता ने कहा, ‘‘चली जाओ, बिटिया को भी दिखा दो. इसे तो पके आम बहुत पसंद हैं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते चलेंगे. देखो बेटा, अपने बाप की तरह से नहीं बांध देना, अब बो?ा लादने का माद्दा नहीं रहा.’’ मैं सोच रहा था शायद उस का नाम लेंगे जिस से नाम जानने का मौका मिलेगा, जो नहीं मिला था. तो क्या हुआ, मेरे मन की मुराद पूरी हो गई थी.
मैं उन को लिवा कर अपने दारानगर नाम वाले आम के पेड़ के पास गया. वहां कुछ अधपके, तोता के काटने से गिरे आम पड़े थे. उसे उस की मां ने आम उठा कर दिया था. उस ने हंसते हुए पूछा था, ‘‘मम्मी, इस आम को दारानगर क्यों कहते हैं?’’ मैं ने हंसते हुए उस को बताया था, क्योंकि उस के बोलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों में शहद घुला हो. कितनी मीठी, प्यारी जबान है इस की. काश, इस का साथ जीवनभर के लिए हो सकता. यह सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘असल में मेरे दादाजी दारानगर नाम की जगह पर गए थे, जहां से इस आम का फल ले कर आए थे. यहां लगा कर, इस का नाम याद के लिए दारानगर रख दिया था, इसलिए इस का नाम दारानगर पूरा गांव जानता है.’’ वह आम खाते समय बहुत ही अच्छी, सुंदर लग रही थी. मेरा मन करता था कि उस से दोस्ती करूं. कुछ बोलूं, बतियाऊं. मैं अपने संकोची स्वभाव, संस्कारवश कुछ भी नहीं कह पाया था.
मैं ने उन के लिए अच्छेअच्छे आम तोड़ दिए थे. दिल तो कहता था कि समय यहीं ठहर जाए, बस यों ही वह मेरे करीब रहे. समय से मैं क्या सभी हारे हैं, समय ही हमारे बचपन को छीन कर भाग लिया था, अब हम क्याक्या सोचने वाली उम्र में आ कर, कितनी ऊंचाई पर उड़ने की सोच रहे हैं. अगर अम्मांबापू, दादादादी, गांव के बड़ेबुजुर्ग नहीं होते, तो हम किस दिशा में होते, पता नहीं. तभी उस की अम्मां आ कर मेरे सिर पर हाथ रख कर बालों को सहलाने लगी थीं. मैं चुपचाप खड़ा था. कहना तो बहुत चाहता था, पर कह नहीं पा रहा था. तभी उस की अम्मां ने प्यार से कहा, ‘‘बेटा, अच्छे से पढ़ाईलिखाई करना, अब हम चलेंगे, नहीं तो घर पहुंचने में रात हो जाएगी.’’ बिना कुछ कहे किसी मशीन सा मैं उन के पीछेपीछे चल दिया था. मैं ने देखा, मेरे बापू उस के बापू के साथ घुलमिल कर बातें कर रहे थे.
उन के पास पहुंच कर उस चंचल, चंद्रमुखी ने अपने बापू से कहा था, ‘‘बापू, अम्मां कहती हैं अब चलें… देर करेंगे तो रात हो जाएगी.’’ कितनी प्यारी, कोयल सी मीठी बातें जो मेरे दिल में सीधे उतरती चली गई थीं. मैं चुपचाप खड़ा रहा. ऐसा लगता था, काश वह कुछ देर रुक जाती. mवे लोग मेरे बापू के पैर छू कर फिर चल दिए थे. मैं ने बिना पिता की आज्ञा के उन के पैर नहीं छुए थे, जबकि मन श्रद्धा से भरा हुआ था. वे तीनों जा रहे थे. मैं एक अचल मूर्ति बन कर खड़ा उन को जाते देख रहा था. बापू थोड़ी देर में वहां से घर की ओर चले गए थे, यह कहते हुए, ‘‘कुछ देर रुक कर चले आना, रात नहीं करना.’’ मैं उन को देखते हुए वहीं खड़ा था. बहुत दूर जाने के बाद उस लड़की ने मुड़ कर देखा था. उस के चेहरे के भाव क्या थे, दूर हो जाने की वजह से सम?ा पाना मुश्किल था. हां, उस का मुड़ कर देखना यह तो कह ही रहा था कि उसे भी कुछकुछ हुआ था.
उन के जाने के बाद ऐसा कोई दिन, ऐसी कोई रात नहीं होती थी, जो वह याद नहीं आती थी.
3 साल में मेरी पढ़ाई पूरी हो गई थी. सरकारी नौकरी बापू ने मु?ो नहीं करने दी. उन का कहना था कि एक लड़का है, हम महीने में मजदूरों को बहुत मजदूरी देते हैं. कहीं नहीं जाना यहीं हमारे पास, हमारे साथ रहना है. मेरी शादी बापू ने पक्की कर दी थी. अम्मांबापू आपस में बतियाते थे. मेरी हिम्मत कहां कि पूछ सकता. हां, खुशी मु?ो भी थी, फिर भी एक कांटा, एक टीस दिल में चुभ रही थी कि काश, वह मेरी पत्नी होती. समय आया, शादी हुई, फेरे हुए. न मैं ने उसे देखा न उस ने मु?ो देखा. हां, कन्यादान देने वाले अंकल ऐसे लग रहे थे, जैसे इन को कहीं देखा था. सुहागरात थी, सेज सजी थी, पर अब की तरह नहीं, वही साधारण नए गद्दारजाई में. वह वहां पहले से मौजूद थी. मैं अंदर गया, कच्चे मकान में लकड़ी के दरवाजे थे, लकड़ी का हटका बंद कर दिया था मैं ने.
दिल धकधक कर रहा था. मैं ने हिम्मत जुटाई, उस के विरोध के बावजूद मैं ने घूंघट हटाया.
मैं अपने सामने उसे देखते ही बल्लियों उछलने लगा था. यह तो शायद वही थी. उस ने धीरे से मुसकरा
कर धीमी, मीठी सी आवाज में कहा, ‘‘क्या हुआ?’’ मैं जैसे सोते से जाग गया, मन की मुराद पा गया था. मैं ने कहा, ‘‘तुम…’’ उस ने कहा, ‘‘हां, मैं… आप नहीं चाहते थे क्या? मेरे अम्मांबापू ने शायद आप को उसी दिन पसंद कर लिया था. उन की बात भी हो गई थी. मैं ने भी तो शादी के समय चुपके से देखा, तो…’’
‘‘तो क्या, जरा बताओ… मैं तो उसी दिन से सोचता था कि तुम ही मेरी पत्नी बनो,’’ मैं ने अपनी बांहों में उसे समेटते हुए कहा था. वह शरमा गई थी. उस ने एक अटल विश्वास के साथ अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया था. हम ठीक उसी समय से दो जिस्म एक जान हो गए थे.
हमारे सम?ा में आ गया था कि अम्मांबापू जो भी करते हैं, बहुत अच्छा करते हैं. मातापिता सदा अपने बच्चों की खुशी, बच्चों की भलाई करते हैं. अपने बच्चों के लिए ही पूरी जिंदगी लगा देते हैं. वह पहली मुलाकात, जिंदगीभर का साथ बन जाएगी मु?ो तो उम्मीद नहीं थी. अम्मांबापू ने जो सौगात दी थी, वह शब्दों में नहीं लिखी जा सकती, शब्दों में नहीं कही जा सकती. वह पहली मुलाकात हमारे जीतेजागते, चलतेफिरते, बोलतेडांटते जैसे कोई वरदान थी.




