देवकी के घर के आंगन और पिछवाड़े में बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई थीं. मकान का प्लास्टर भी जगहजगह से उखड़ चुका था. देखने से लगता था जैसे कई महीनों से इस की किसी ने सुध नहीं ली है, पर आज अचानक उस के आंगन में रौनक सी लगी थी. कुछ लोग झाडि़यां साफ कर रहे थे, तो कुछ दीवारों के उखड़े प्लास्टर की मरम्मत में लगे थे. शाम तक रंगवार्निश लगा कर घर को चकाचक कर दिया गया. एक गरीब विधवा के घर की ऐसी कायापलट... आखिर ऐसा क्या हो गया था?
‘‘जरा, जल्दीजल्दी हाथ चलाओ भाई... और कितना टाइम लगाओगे स्टेज बनाने में?’’
‘‘अरे, यह शामियाना कैसे बांध रहे हो... जरा ढंग से बांधो...’’
‘‘कुरसियों का क्या हुआ? अभी तक नहीं आईं? और वह रैड कार्पेट?’’
‘‘कल सवेरे 8 बजे तक सारा काम पूरा हो जाना चाहिए, बेशक रातभर काम करना पड़े तो करो.’’
जल निगम का जूनियर इंजीनियर मजदूरों को डांटते हुए काम बता रहा था. यही मौका था उस के लिए अपनी अफसरी दिखाने का खासकर जब उस के बड़े अफसर भी साथ खड़े हों. दूसरे दिन ठीक सवेरे 8 बजे जल निगम के बड़े अफसर देवकी के घर पहुंच गए.
‘‘सर, रैड कार्पेट बिछवा दूं क्या? चीफ इंजीनियर साहब, कमिश्नर, डीएम और बाकी औफिसर्स की गाडि़यां नीचे रोड पर आ गई हैं,’’ जूनियर इंजीनियर ने धीरे से असिस्टैंट इंजीनियर से पूछा.
‘‘हां, बिछवा दो. और हां, नल की टोंटी बदली या नहीं? उस में बढि़या पीतल की टोंटी लगवा दो. ध्यान रहे
कि नल के स्टैंड पोस्ट का प्लास्टर उखड़े नहीं, अभी ताजा है.’’
‘‘पर साहब, बाकी जगह तो हम ने लोहे की टोंटी लगाई थी और स्टैंड पोस्ट भी नहीं बनाया था, बस यों ही लकड़ी का डंडा खड़ा कर के नल उस से बांध दिया था,’’ जूनियर इंजीनियर के बजाय काम पर लगे प्लंबर ने झिझकते हुए बताया.
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