Bihar Politics: नीतीश कुमार, जो पिछले 2 दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे, अब वे राज्यसभा में हैं. यह नीतीश कुमार का डिमोशन है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ है. नीतीश कुमार कभी सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म की राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां, गठबंधन और उम्र के साथसाथ उन की इमेज बदलती गई. अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में जा रही है, जहां नीतीश युग खात्मे की ओर है.
बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश युग के साथसाथ बिहार में सैकुलरिज्म और सामाजिक न्याय की राजनीति का युग भी खत्म हो जाएगा? इस के साथ ही बिहार के पिछड़ों, दलितों, मुसलिमों की चाबी पूजापाठी ऊंची ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों के हाथों में अंगरेजों के जमाने की तरह आ जाएगी.
नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से राजनीति में आए थे. वे राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और वीपी सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की वैचारिक विरासत को आगे ले जाने वाले नेता रहे हैं.
साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, जिस से ओबीसी को
27 फीसदी रिजर्वेशन का रास्ता साफ हुआ था. नीतीश कुमार सामाजिक न्याय की इस विचारधारा का हिस्सा थे और बिहार में ओबीसी रिजर्वेशन के सब से बड़े समर्थक थे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने कुर्मीकोइरी वोट बैंक को ध्यान में रख कर जौर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई. साल 1996 में समता पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया. भाजपा से नीतीश कुमार का यह शुरुआती गठबंधन सिर्फ राजनीतिक हितों के लिए था. नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया था. साल 1998 से साल 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार रेल, भूतल परिवहन और कृषि मंत्री रहे. इस दौर तक सांप्रदायिक ताकतों के साथ राजनीतिक गठबंधन के बावजूद नीतीश कुमार की इमेज सैकुलर और समाजवादी नेता की ही रही.
साल 2005 में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के लिए 50 फीसदी पंचायती राज आरक्षण लागू किया. अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग श्रेणी ईबीसी बनाई और इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं. ईबीसी को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया. साल 2023 में जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे, तब उन्होंने बिहार में पहली बार जाति पर आधारित सर्वे कराया. यह जातिगत सर्वे ओबीसी और ईबीसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ. नीतीश कुमार का यह कदम मंडल राजनीति का विस्तार ही था. कभी सैकुलरिज्म के प्रणेता थे नीतीश कुमार आज भाजपा की गोद में बैठे हैं, लेकिन एक समय था जब वे सैकुलरिज्म को अपना मूल सिद्धांत मानते थे और अपने इस सिद्धांत के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. साल 2013 का उदाहरण सामने है, जब भाजपा ने गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन एक झटके में तोड़ दिया था और इसे सिद्धांतों की लड़ाई बताया था.
भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद जद (यू) के राष्ट्रीय परिषद में दिए अपने भाषण में नीतीश कुमार ने साफ कहा था, ‘‘हम सैकुलरिज्म पर समझौता नहीं कर सकते. भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, जाति, भाषा और कल्चर के लोग साथ रहते हैं. ऐसे देश का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है, जिस के पास सैकुलर क्रेडेंशियल्स हों, समावेशी नजरिया हो और जो समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चल सके.’’
बिहार विधानसभा में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मोदी की राजनीति संविधान के मूल्यों पर हमला है. देश का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सैकुलर होना चाहिए और उसे समावेशी विकास की दृष्टि रखनी चाहिए. यह देश संविधान के तहत बना है. ‘‘सवाल यह है कि संवैधानिक दृष्टि जीतेगी या हम यह देश विभाजन और धु्रवीकरण की विचारधारा को समर्पण कर देंगे? मैं वादा करता हूं हम विभाजन की राजनीति के हाथों इस देश को बरबाद नहीं करने देंगे.’’
सैकुलरिज्म के प्रति इस ईमानदार वक्तव्य के बाद कांग्रेस के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार को ‘सैकुलर लीडर’ करार दिया था, जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें धन्यवाद भी दिया था. यह नीतीश कुमार को सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में स्थापित करने वाला दौर था. भाजपा के साथ 17 साल की रिलेशनशिप से साल 2013 के ब्रेकअप के बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ ‘महागठबंधन’ बनाया. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ सैकुलर ताकतों का प्रतीक बना. नीतीश कुमार ने तब इस सैकुलर मोरचे को ‘संविधान बचाओ’ की लड़ाई बताया. इस चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान उन्होंने भाजपा को ‘बड़ा झूठा पार्टी’ जैसे शब्दों से नवाजा और कहा कि उन का सैकुलरिज्म सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए है. नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें समाजवादी आंदोलन से जुड़ी हैं.
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