Social Issue. सैलिब्रिटीज के बीच तलाक के मामले सुर्खियों में आते हैं और यहां दोनों पक्षों के बीच बराबरी नजर आती है. रितिक रोशन और सुजैन खान का मामला हो या आमिर खान और किरण राव का तलाक हो, इन में कहीं भी कोई विक्टिम नजर नहीं आता. दोनों ने अलग रहना तय किया और तलाक ले लिया.
कितना आसान लगता है न अलग होना? लेकिन मिडिल क्लास और गरीब तबके में ऐसा नहीं होता. यहां शादी और तलाक के मामले में औरत और मर्द के बीच कोई बराबरी ही नहीं है. शादी हो, गृहस्थी चलाना हो या तलाक का मामला हो, सिर्फ औरतें ही झेलती हैं.
शादी औरतों की आजादी के खिलाफ एक मर्दवादी हथियार ही तो है. शादी के बंधन में कौन बंधता है? औरत ही न? मर्द तो आजाद ही रहता है. तलाक कहने में आसान लगता है,
लेकिन यह भी सिर्फ मर्दों के लिए ही आसान है. पहले के जमाने में मर्द जब चाहे अपनी पत्नी को छोड़ सकता था. उस पर कोई सामाजिक रुकावट नहीं थी. लेकिन औरतें ऐसा नहीं कर सकती थीं. पति नामर्द हो या बूढ़ा, औरत के लिए ‘परमेश्वर’ ही रहता था.
सब से बड़ी बात तो यह है कि
गरीब और मिडिल क्लास अपनी बच्चियों की कंडीशनिंग ही ऐसे करता है कि वे झेलने के गुर बचपन में ही सीख जाती हैं. ऐसे नहीं हंसना, ऊंची आवाज में नहीं बोलना, बिना इजाजत के कहीं नहीं जाना, सिर नीचे किए बड़ों की बातों को सुनते रहने, पति की सेवा करना यह सब बातें लड़कियों को बचपन से घुट्टी की तरह पिलाई जाती हैं.
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