Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

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