Hindi Story. घनश्याम जैसा खूबसूरत, आकर्षक, ताकतवर और चौड़ी छाती वाला नौजवान अठगहे में न था. जब वह गांव की गलियों में निकलता तो पूरा गांव सजता. खेतों की पगडंडियों पर चलता तो खेत उस की खूबसूरती के दीवाने हो उठते. वाणी में ओज और शरीर में जोश उस की पहचान बन चुके थे. फिर भला गांव की छोरियां उस की दीवानी क्यों न हों? लेकिन वह ठहरा चरित्रवान नौजवान और लंगोट का एकदम पक्का. इस से उस का सम्मान उगते हुए सूरज की तरह बढ़ता जा रहा था.
घनश्याम की उम्र जैसे ही शादी के लायक हुई, उस के लिए रिश्ते पर रिश्ते आने लगे. उस के पिता चौधरी बसंत सिंह भी अठगहे के सम्मानित जमींदार थे. उन्हें अपने एकलौते बेटे के लिए एक सुंदर, सुशील कन्या चाहिए थी. दहेज का लालच उन के अंदर रंचमात्र भी नहीं था, लेकिन उन के अंदर एक ही कसक थी जैसा उन का बेटा सुंदर और आकर्षक है, ऐसी ही उन की पुत्रवधू भी हो.
घनश्याम ने बहुत ज्यादा पढ़ाई नहीं की थी. जैसेतैसे बीए करने के बाद वह खेतीबारी के काम में रम गया था. खेती बढि़या थी. गन्ने की फसल बंपर होती थी और नकद पैसा शुगर मिल वाले बैंक खाते में भेजते थे, इसलिए जटपुर गांव वालों का रहनसहन शहर वालों जैसा ही था.
चौधरी बसंत सिंह के घर में किसी चीज की कमी न थी. कार, कूलर, एयर कंडीशनर, वाशिंग मशीन, फ्रिज आदि सब सुखसुविधाएं घर में मौजूद थीं. दोमंजिला पक्का शानदार मकान शहर के बंगलों और विलाओं का मात देता था. बाहर की तरफ एक बड़ा सा पोर्च और शानदार गार्डन घर की खूबसूरती में चार चांद लगाते थे. ताड़ के खूबसूरत पेड़ और सजावटी पौधे घर को अलग ही रंगत देते थे.
आखिरकार घनश्याम का रिश्ता सुंदरपुर के चौधरी दौलतराम की बेटी पूर्वी से तय हो गया. वह भी खूबसूरती में किसी से कम न थी. गाल पर एक काला तिल जैसे कुदरत ने उसे दूसरों की काली नजर से बचाने के लिए दिया हो. लेकिन पढ़ाईलिखाई वह भी ज्यादा न कर सकी.
पूर्वी ने इंटर तक पढ़ाई की और संगीत के लिए शौक पैदा कर लिया. लेकिन उस का यह शौक पढ़ाई रुकने के कारण अपने अंजाम तक न पहुंच सका.
खूबसूरती के अपने दोष भी होते हैं. दौलतराम अपनी बेटी की खूबसूरती से मन ही मन घबराते थे, इसलिए उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए पूर्वी को शहर नहीं भेजा और उसे बीए का प्राइवेट फार्म भरवा कर उस के लिए अच्छा वर तलाशने लगे.
उन्हें पूर्वी के लिए लड़का तलाशने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. घनश्याम पर जा कर उन की तलाश खत्म हो गई. दोनों परिवारों का रहनसहन टक्कर का था, इसलिए घनश्याम और पूर्वी का रिश्ता तय होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. बस थोड़ी सी अड़चन दौलतराम के आर्यसमाजी व्यवस्था पर अडिग होने पर आ रही थी. वे चाहते थे कि शादी की रस्म आर्यसमाजी रीतिरिवाज से हो. चौधरी बसंत सिंह यह नहीं चाहते थे, लेकिन जब रिश्तेदारों ने कई जाट लड़केलड़कियों के ब्याह आर्यसमाजी तरीकों से होने के उदाहरण सामने रखे तो वे भी मान गए. धार्मिक कर्मकांडों में तो वे भी ज्यादा विश्वास नहीं करते थे.
फिर तो दोनों की बड़ी धूमधाम से शादी हो गई. घनश्याम और पूर्वी जल्दी ही एकदूसरे के लिए ऐसे ही हो गए जैसे दो जिस्म एक जान.
डेढ़ साल के बाद पूर्वी ने एक सुंदरसलोने बच्चे को जन्म दिया. सब उस बच्चे को प्यार से कन्हैया कहने लगे. घर में किलकारियां गूंजीं तो खुशियां भी बढ़ गईं. एक बच्चे की मां बनने के बाद पूर्वी अब बच्चे को ले कर कभी गार्डन में तो कभी पोर्च में आ बैठती थी. इस के लिए उसे मनाही तो कभी नहीं थी लेकिन वही जानबू?ा कर खुद के बहू होने का लिहाज करती थी, इसलिए पोर्च और गार्डन में कभीकभार ही आती थी. घर की गौशाला चंद कदमों पर थी, लेकिन वहां तो उस का आनाजाना न के बराबर ही था.
गौशाला भी पक्की ईंटों की बनी थी. गौशाला का एक कमरा अमेरिकन गाय के लिए था, जिस में कूलर लगा था. दूसरे कमरे में एक देशी नस्ल की गाय और भैंस बंधी थी, लेकिन पंखे उन के लिए भी लगे थे. एक कमरे में चारा रखा जाता था. चारा काटने की मशीन भी बिजली से चलती थी.
गौशाला संभालने की जिम्मेदारी पंचम नौकर पर थी, जो अपनी उम्र के ढलान पर था, लेकिन अपनी वफादारी और कर्मठता के बलबूते अपनी नौकरी बचाए हुए था.
चौधरी बसंत सिंह अपने परिवार के सदस्यों की तरह उस का भी बहुत ख्याल रखते थे.
अब पूर्वी का भी इस गौशाला में आनाजाना सामान्य सा हो चला था. वह सासू मां के बीमार हो जाने या फिर उन के कहीं जाने पर सुबह शामगाय भैंस का दूध दूहने गौशाला में चली जाती थी. इस तरह धीरेधीरे उस की घर की जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं.
गरमियों का मौसम था. एक दिन पूर्वी को दोपहर के समय मवेशियों को पानी पिलाने के लिए गौशाला में जाना पड़ा, तभी उस के कानों में गौशाला से सटी पड़ोसी की गौशाला से मधुर संगीत की आवाज सुनाई पड़ी. संगीत इतना मधुर था कि उसे सुन कर पूर्वी के पांव ठिठक गए. वह पहले से ही संगीत की शौकीन थी, इसलिए कुछ देर के लिए उसी संगीत में खो गई.
उस संगीत का असर उस पर काफी समय तक बना रहा. शाम को पूर्वी ने अपनी सासू मां से पूछा, ‘‘अम्मांजी, आज दोपहर जब मैं गौशाला में मवेशियों को पानी पिलाने गई थी, तो पास की गौशाला से संगीत की बड़ी मधुर आवाज आ रही थी. गांव में कोई संगीतकार आया हुआ है क्या?’’
‘‘नहीं बहू, कोई संगीतकार नहीं आया हुआ है. वह तोताराम चौधरी का बेटा धीरज है, जो गानाबजाना करता रहता है. वही ऊतमरा संगीत का शौकीन है. गांव के सारे लोग उसे ‘भांड’ कहते हैं. उस का असली नाम तो हम जैसे पुराने लोग ही जानते हैं. पूरे का पूरा ‘भांड’ है ऊतमरा.’’
‘‘अम्मांजी, आप उसे बारबार ऊतमरा क्यों कह रही हो? संगीतकार तो वह अच्छा लगता है. कितनी मधुर धुन निकालता है.’’
‘‘अरी बहू, तू न सम?ोगी. इसी संगीत के चक्कर में तो वह पूरा बरबाद है. भांडों के जैसा भेष धरता है. लंबेलंबे लौंडियों जैसे बाल और ऊतमरा कभीकभी तो उन की चोटी ही बना लेता है. भला मर्दों के ये काम हैं क्या? जाने कितने तो इसे शिखंडी, हिजड़ा और भी न जाने क्या क्या कहते हैं. उस के इसी ऐब के कारण उसे कोई अपनी लड़की देने को भी तैयार नहीं. बैठाबैठा 36 साल को हो गया है.’’
पूर्वी को यह अनुमान नहीं था कि धीरज 36 साल का है और कुंआरा भी है. वह तो अभी तक उसे कम उम्र का कोई लड़का समझ रही थी. उस ने पूछा, ‘‘अम्मांजी, संगीत का शौक रखना तो कोई बुरी बात नहीं. फिर ऐसा क्यों कि कोई उसे अपनी लड़की नहीं देना चाहता?’’
‘‘बहू, संगीत का शौक रखना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन अपनी जातबिरादरी में तू ने कोई संगीतकार पैदा होते हुए देखा है क्या? भला जाटों का संगीत से क्या लेनादेना? जाट तो हल चलाना जानता है या फिर लठ चलाना, इसलिए जाटों के लड़के या तो फौज और पुलिस में भरती होते हैं या फिर अपनी खेतीबारी में रम जाते हैं.
‘‘राजनीति और किसान यूनियन जाटों की रगरग में बसी है. इन के बिना तो जैसे जाटों का जीवन ही बेकार है. भला नाचनागाना जाटों का काम है क्या?’’
‘‘तो फिर अम्मांजी, धीरजजी को संगीत का शौक कैसे लग गया? संगीत की धुनी उन पर कैसे सवार हो गई?’’
अपनी बहू के मुंह से भांड के लिए ‘धीरजजी’ शब्द सुन कर सासू मां बड़ी जोर से हंसीं, फिर बोलीं, ‘‘बहू, गांव में पहली बार किसी के मुंह से मतलब तेरे मुंह से उस भांड के लिए इतनी इज्जत से ‘धीरजजी’ कहते हुए सुन रही हूं, नहीं तो उस भांड को तो कोई धीरज भी नहीं कहता. सब उसे बड़ी हिकारत से देखते हैं.
‘‘एक बार गांव में एक बच्चे के दशोटन में एक नाटक मंडली और संगीत मंडली आई थी. न जाने उन्होंने इस भांड पर क्या जादू किया कि यह उन के साथ हो लिया. इस के बाप तोताराम ने सोचा कि चलो कुछ दिन बाद यह वापस आ जायेगा, यही सोच कर उस की जिद मान कर उन के साथ जाने दिया.’’
‘‘फिर क्या हुआ अम्मांजी?’’
‘‘लेकिन यह भांड तो उस नाटक मंडली को छोड़ कर वापस आने को तैयार ही नहीं था. तब तोताराम गांव के चौधरियों को ले कर गए और इस भांड को वहां से वापस ले कर आए. नाटक मंडली को चेतावनी भी दे कर आए कि धीरज को वापस अपनी मंडली में मत ले लेना.
‘‘उस नाटक मंडली ने चौधरियों से माफी मांगी और वादा किया कि वे धीरज को अपनी मंडली के आसपास भी नहीं फटकने देंगे.’’ ‘‘फिर?’’ पूर्वी ने पूछा.
‘‘फिर क्या… इस धीरज भांड को इस के बाप ने संगीत गानेबजाने पर बड़ा कूटा. लेकिन इस ने भी साफसाफ कह दिया कि अगर वे उसे जिंदा देखना चाहते हैं तो उस से उस का संगीत न छीनें. वह संगीत के बिना जिंदा नहीं रह सकता.
‘‘तोताराम मरते क्या न करते, बेटे को जिंदा रखने के लिए उन्होंने उसे यह छूट दे दी. उन्होंने सब्र कर लिया कि चलो उन के बाकी 2 बेटों में संगीत के ये वाहियात कीटाणु नहीं हैं.
‘‘बस, तब से यह भांड न जाने क्याक्या बजातागाता फिरता है. हारमोनियम, ढपली, ढोलक, बांसुरी और भी न जाने क्याक्या. तोताराम ने घेर (गौशाला) में ही वाद्य यंत्रों को रखने के लिए एक कमरा दे रखा है. वहीं यह अपनी संगीत साधना में लीन रहता है.’’
पूर्वी बड़े ध्यान से अपनी सासू मां से धीरज की संगीत साधक होने की गाथा सुन रही थी. उसे धीरज में एक अनोखा सा, प्यारा सा संगीत प्रेमी उभरता नजर आ रहा था. उसे लगा जैसे संगीत की स्वर लहरियां उसे पुकार रही हैं.
अब अकसर दोपहर के समय किसी न किसी बहाने से पूर्वी गौशाला में पहुंच जाती और धीरज के मधुर संगीत को सुनती और अकसर उस में खो जाती. एक अजीब सा अपनापन उसे उस संगीत में लगता. वह महसूस करती कि संगीत की स्वरलहरियां उसे लपेट रही हैं और वह एक नर्तकी बन कर उन स्वरलहरियों के साथ झूम रही है.
एक दिन घनश्याम ने पूर्वी को टोकते हुए कहा, ‘‘पूर्वी, घेर में जानवरों को पानी पिलाने में इतनी देर क्यों लगाती हो? मैं तो कहता हूं कि तुम जानवरों को पानी पिलाने वहां जाती ही क्यों हो? पंचम को आखिर हम ने और किस काम के लिए रखा हुआ है…’’
‘‘अरे, पंचम चाचा सारे दिन काम में लगे रहते हैं. वे बूढ़े हो गए हैं, थक जाते होंगे, बस यही सोच कर मैं गायभैंस को पानी पिलाने चली जाती हूं.’’
‘‘सुना है, तुम उस भांड का संगीत भी बड़े ध्यान से सुनती हो…’’
‘‘घनश्याम, आप भी इतने अच्छे संगीतकार को भांड कह कर बुलाते हो. आप तो पढ़ेलिखे हो. कम से कम आप को तो.’’
‘‘अरे, बस कर पूर्वी. सब उसे भांड कह कर ही बुलाते हैं. इस में कौन सी बुरी बात है. बुरी बात तो यह है कि वह हमारी बहादुर लड़ाका जाट कौम पर कलंक है.
‘‘हमारी कौम के लोगों ने तलवारें उठाई हैं, बंदूकें चलाई हैं, लेकिन यह गानाबजाना, न भाई, कभी नहीं. इस ने तो हमारे जटपुर गांव को ही बदनाम कर दिया है. पता है, दूसरे गांव के लोग हमारे गांव को क्या कहते हैं?’’
‘‘क्या कहते हैं?’’
‘‘भांड का गांव.’’
यह सुन कर पूर्वी खिलखिला कर हंस पड़ी, फिर बोली, ‘‘देखो घनश्याम, उस ने तो गांव को एक नई पहचान ही दे दी है.’’
‘‘चुप कर पूर्वी… यह भी कोई पहचान है. पहचान होती है अच्छे काम की. हमें तो इस में बड़ी शर्म महसूस होती है. हमारे गांव के कितने ही लड़के फौज में हैं. हमारी कौम की बहादुरी देख अंगरेजों ने ‘जाट रैजीमैंट बनाई थी न कि कोई ‘जाट संगीत मंडली’. हिम्मत और बहादुरी है हमारी कौम की सच्ची पहचान. वैसे, तुम्हें पता है एक और अजीब बात?’’
‘‘क्या अजीब बात?’’ पूर्वी ने हैरान हो कर पूछा.
‘‘भांड के संगीत प्रेमी होने पर गांव के लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि यह तोताराम का बेटा ही नहीं है. इस बात से तोताराम बड़ा परेशान था.’’
‘‘हां, गांव वाले ऐसी अफवाहें उड़ाने में बड़े माहिर होते हैं. फिर उन्होंने क्या किया?’’
‘‘क्या करते… किसी ने उन्हें डीएनए टैस्ट कराने की सलाह दी. टैस्ट में भांड उन्हीं का लड़का निकला, नहीं तो भांड की मां की कयामत ही आ जाती. लोगों ने तो तोताराम की लुगाई पर ताने मारने ही शुरू कर दिए थे. इन तानों को सुन कर वह भली औरत कितना रोती थी। आज भी वह डीएनए रिपोर्ट उन के पास सुरक्षित है.’’
‘‘यह तो लोगों की गलती है जो औरतों पर ऐसे लांछन लगाते हैं.’’
‘‘अच्छा चलो, अब सो जाओ. रात बहुत हो चुकी है,’’ यह कह कर घनश्याम ने पूर्वी को अपने आगोश में ले लिया. वे दो जिस्म एक जान हो गए.
कुछ दिन और बीते. पूर्वी को लगने लगा कि वह न चाह कर भी धीरज के संगीत की ओर खिंचती चली जा रही है. वह खुद को जितना रोकने की कोशिश करती, वह उतनी ही उस ओर खिंची चली जाती.
एक दिन तो हद ही हो गई और पूर्वी छोटी सी दीवार फांद कर धीरज के घेर में चली गई.
धीरज उस समय अपने संगीत में खो कर हारमोनियम बजा रहा था. उसे पता ही नहीं चला कि कोई उस के संगीत को मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहा है. जब उस की वह धुन पूरी हुई तो उस ने हारमोनियम बजाना बंद किया. एकसाथ दोनों की नजरें टकराईं. पूर्वी वहां से अनापशनाप भागी, लेकिन सवाल था कि कब तक?
धीरज का संगीत उसे अपनी ओर खींचता और वह उस की ओर नंगे पांव दौड़ी चली जाती.
संगीत के साधक को संगीत की पुजारिन मिल गई थी. प्रणय लीला शुरू हो चुकी थी जिसे रोकने वाला आज तक इस धरती पर कोई पैदा नहीं हुआ. शरीर को रोक भी लो तो प्रेमी मन को कौन रोके?
धीरज की सोई मर्दानगी पूर्वी के जोबन और खूबसूरती को देख कर जागने लगी. उस की मर्दानगी को जैसे खादपानी मिल गया हो. उस में अंकुर फूटने लगा. मदहोशियां छाने लगीं. संगीत की पुजारिन ने संगीत के साधक के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया. शर्म और लिहाज सब ताक पर धरे के धरे रह गए.
जिसे सब भांड, नपुंसक, शिखंडी और भी न जाने क्याक्या बोलते थे, उसे गांव की सब से खूबसूरत औरत अपना दिल और जोबन उसे दे बैठी थी.
पूरे का पूरा जटपुर गांव हैरान जैसे उस पर आकाशीय बिजली ने प्रचंड प्रहार कर दिया हो. चर्चा, चर्चा और चर्चा. अब गांव में बस यही तो बचा था.
‘‘सम?ा में नहीं आता, घनश्याम जैसे गबरू नौजवान को छोड़ वह उस भांड के पास कैसे जाने लगी?’’ एक गांव वाले ने बड़ी उल?ान में कहा.
‘‘अरे भैया, आज तक दुनिया में क्या कोई औरत के दिमाग को पढ़ पाया है कि वह क्या चाहती है? औरतों के चक्कर में तो बड़ीबड़ी रियासतें, राजे और रजवाड़े खाक में मिल गए,’’ दूसरे गांव वाले ने कहा.
तभी तीसरा बोला, ‘‘सच में घनश्याम के पास किस चीज की कमी है. वह उस भांड से न दौलत में कम न शोहरत में. शरीर में तो वह भांड उस का आधा भी नहीं, डेढ़ पसली…’’
इस पर सब के सब एक बार को जोर से हंसे, फिर मौत की तरह खामोश हो गए.
तभी दालान पर हुक्का गुड़गुड़ा रहे एक बुजुर्ग बोले, ‘‘तभी तो औरत को त्रिया चरित्तर कहा गया है.’’
जल्दी ही घनश्याम ने एक दिन अपनी आंखों से वह सब देख लिया जो उसे नहीं देखना चाहिए था. शर्मदार की इज्जत नीलाम हो जाए, तो उस के लिए मौत भली. उस दिन के बाद से घनश्याम गांव में दिखाई नहीं दिया.
गांव वालों का गुस्सा उबाल खा गया. उन्होंने बेइज्जत कर धीरज और पूर्वी को गांव से निकाल दिया. कन्हैया को उस के दादादादी ने रख लिया. पुलिस को सब पता था, उस की जेब गरम थी. वह तमाशबीन बनी खड़ी रही.
धीरज ने शहर में आ कर अपनी संगीत मंडली बना ली. पूर्वी ने अपनी आगे की पढ़ाई की और एक स्कूल में संगीत शिक्षिका बन गई. दोनों संगीत प्रेमी मजे से जिंदगी गुजारने लगे.
पूर्वी ने साबित कर दिया था कि एक औरत के प्यार को कोई नहीं समझ सकता. वह जब किसी से प्यार करती है तो जमाने को ठोकरों पर रख देती है. वह इज्जत, बरबादी, शर्म और लिहाज को तो छोड़ ही दीजिए, मौत की भी चिंता नहीं करती. यही औरत के प्यार की खूबसूरती है और किसी को यह बदसूरती लगे तो उस की ठोकर से.




