Hindi Short Story. मैं काफी देर से बस का इंतजार कर रहा था, मगर बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी.

‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’ एक दिलफेंक नौजवान ने मुझ से पूछा.  ‘‘जनकपुरी.’’

‘‘ऐसा लग रहा है कि आप बसों को देख कर घबरा रहे हैं.’’

‘‘हां, ऐसा ही है. हमारे शहर में ऐसी भीड़ नहीं होती और फिर भलमनसाहत भी तो कोई चीज है. यहां बेचारी औरतें भी…’’ मैं ने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया.

‘‘अरे भाई…’’ वह नौजवान बेहूदगी पर उतर आया, ‘‘इन बसों में खड़े होने का मजा ही कुछ और है. अगर किसी औरत के बगल में खड़े होने का मौका मिल जाए, तो उस के बदन के उभार और गोलाइयां नाप सकते हैं.’’

‘‘हमारे यहां औरतों की बहुत इज्जत होती है. किसी मर्द में इतनी हिम्मत कहां कि वह सीट पर बैठा रहे और पास में कोई औरत खड़ी रहे,’’ मैं ने कहा. ‘‘अजी साहब, 2-4 दिन और रह लो, फिर देखना किस रंग में रंग जाओगे.’’

‘‘वह तो ठीक है, मगर ये औरतें ऐसी बेहूदगी सह कैसे लेती हैं?’’ ‘‘अरे भाई, मर्द तो मर्द, औरतें भी कुछ कम नहीं होतीं. कई औरतें तो मनबहलाव के लिए भीड़ में खड़ी हो जाती हैं और जानबूझ कर अपने कूल्हे मर्दों के रास्ते में ऐसे अटका देती हैं, ताकि उन से छूते रहें. या फिर ‘लो कट’ ब्लाउज में से उभरती हुई अपनी छातियों को ऐसे दिखाती हैं कि देखने वाला खुद पर काबू नहीं रख सकता.’’

‘‘आप सच कहते हैं. पूरे माहौल में ऐसा बदलाव आ चुका है कि अब इन चीजों पर काबू करना नामुमकिन है,’’ अभी यह वाक्य मेरे होंठों पर ही था कि जनकपुरी की बस मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई और मैं बस में चढ़ गया.

कुछ ही देर बाद मेरे सीधे हाथ में सिहरन सी महसूस हुई और फिर किसी नरम और मुलायम बांह की छुअन से पूरे जिस्म में ?ार?ारी सी पैदा हो गई.

मैं ने कनखियों से अपने दाहिनी ओर नजर दौड़ाई. वहां एक खूबसूरत हिरनी सी अल्हड़ देहाती लड़की मुसकरा रही थी. उस का मांसल बदन पनीर का ढेला सा लग रहा था. रंगबिरंगे फूलों वाले कपड़े उस के शरीर की खूबसूरती बढ़ा रहे थे. उस के उभार देखते ही बनते थे.

गरदन में चांदी की हंसुली, कानों में लटकते बुंदे और हाथों में रंगबिरंगी चूडि़यां उस को और भी मनमोहक बना रही थीं. हलके से कंपन से उस की पाजेब ऐसे बज उठती, जैसे किसी ने जलतरंग छेड़ दिया हो.

अगले दरवाजे से एक मुसाफिर उतरता और पिछले दरवाजे से 2-4 चढ़ जाते. पर मैं इन सब से दूर किसी और ही दुनिया में खोया हुआ था. समय कैसे निकल गया, मुझे  महसूस तक न हुआ.

अगर मुझे  कुछ याद था, तो वह था मेरे साथ चिपकी उस अल्हड़ लड़की का खड़ा होना.

मैं मन ही मन यह सोच रहा था कि जिस लड़की की छुअन से ही सारी देह तप जाए, उस लड़की से मिलन करना कितनी अच्छी बात होगी. मेरी आंखों में मदहोशी सी छाने लगी. मुझे  कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था.

आखिरकार वही हुआ, जो हर सफर के खत्म होने पर होता है. बस आखिरी स्टाप पर आ कर रुक गई.

मैं सपनों की दुनिया से जब लौटा, तो देखा कि वह लड़की बस से नीचे उतर रही थी और मुड़मुड़ कर देख रही थी. लंबेलंबे डग भरता हुआ मैं भी उस के पीछे हो लिया और उस के पास पहुंच कर हिचकिचाते हुए धीरे से कहने लगा, ‘‘चलना है…’’

यह वाक्य कह कर मैं चुपचाप आगे बढ़ गया और उस के बोलने का इंतजार करता रहा. वह मेरे पीछेपीछे चली आई और बिना कुछ कहे थोड़ी दूर जा कर खड़ी हो गई.

मैं ने उस के मासूम चेहरे पर नजर दौड़ाई. वह पहले की ही तरह मुसकरा रही थी. मैं ने सिर से पैर तक उस को देखा. मुझे  यों लगा कि जैसे वह पूरी तरह बदल गई हो.

मुझे  उस लड़की में बनावटीपन नजर आ रहा था. कानों की बालियां, गरदन की हंसुली और पांव की पाजेब चांदी की नहीं, बल्कि किसी सस्ती सफेद धातु की बनी हुई थीं.

2 चोटियों में गुंथे उस के बालों से बासी कड़वे तेल की भभक आ रही थी. फूलपत्तियों वाली चोली और लहंगे का कपड़ा किसी हाट से खरीदा हुआ सस्ता और मामूली छींट का लग रहा था. हाथों में प्लास्टिक के कंगन थे, जिन के बीच रंगबिरंगी चूडि़यां अटकी हुई थीं.

जैसे ही मेरी नजर उस के पैरों पर पड़ी, तो मैं हक्काबक्का सा रह गया. वहां जूते या चप्पल का नामोनिशान भी न था. वह नंगे पैर मेरे सामने खड़ी मेरे इशारे का इंतजार कर रही थी.

लड़की के इस रूप ने मुझे चौंका दिया. मैं जिंदगी के उस दोराहे पर खड़ा था, जहां एक ओर मेरी सैक्स की इच्छा थी और दूसरी ओर मेरी इज्जत. उन में से एक का चुनाव करना मुश्किल हो रहा था.

हैरानी की बात तो यह थी कि लड़की का हुलिया पूरी तरह वैसा ही था, जैसा बस में था. कुछ भी तो नहीं बदला था. इस के बावजूद वह बिलकुल अलग सी कोई दूसरी लड़की लग रही थी.

यह वही रंगरूप था, जिस ने कुछ समय पहले मेरी देह को जलती भट्ठी बना दिया था और अब हम दोनों के बीच एक बहुत बड़ी दीवार बन कर उभरा था. वह फिर भी टकटकी बांधे मुझे  उम्मीद भरी नजर से देख रही थी.

मैं दिल्ली में कल तक खुद को अजनबी सा महसूस कर रहा था, पर आज उसी दिल्ली में हर कोई मुझे  जानापहचाना सा लगा. ऐसी हालत में मैं उस नंगे पैर लड़की के साथ रास्ते पर कैसे चल सकता था?

मैं ने उस लड़की को चलता करने की ठान ली. हां, कुछ इनसानियत अभी भी बाकी थी. चूंकि मैं ने उस लड़की को साथ चलने को कहा था और वह मुझ  से उम्मीद भी लगाए बैठी थी, अब उस को मना करना गलत था.

मैं ने उस की हथेली पर 5 सौ रुपए का नोट रख दिया और कहा, ‘‘माफ करना, मेरे पास कोई ऐसी जगह तो है नहीं, जहां मैं तुम्हें ले जा सकूं. इस पोशाक में मैं तुम्हें होटल भी नहीं ले जा सकता. लोग हम पर शक करेंगे.’’

थोड़ी देर वह लड़की मुझे  घूरती रही. देखते ही देखते उस के चेहरे की सारी रौनक उड़ गई. उस ने अपना हाथ छिटक कर 5 सौ रुपए का वह नोट सड़क पर फेंक दिया और चुपचाप बिना कुछ कहे तेजी से चलते हुए अंधेरे में कहीं गुम हो गई.  Hindi Short Story

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