Superstition. आसान भाषा में समझें तो कांवड़ यात्रा का मतलब है एक संकल्प को मान कर किसी धार्मिक नगरी से गंगाजल कांवड़ में भर कर लाना और अपने घर के आसपास के मंदिर में उस जल से भोलेनाथ का अभिषेक करना.
चूंकि इस यात्रा में लिया गया संकल्प आप की इच्छाशक्ति का एक मजबूत हिस्सा होता है, तो जो भी इनसान इस यात्रा पर जाता है और इसे पूरी करता है, उसे ‘भोले का सेवक’ होने का समाजिक तमगा हासिल हो जाता है.
लेकिन यही कांवड़ यात्रा का एकलौता सच है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. चूंकि धर्म और सियासत का गठजोड़ भारत जैसे देश में बहुत ज्यादा मजबूत है तो इसी धर्म और उस को मानने वाले लोगों को राजनीति से जुड़े लोग अपना वोट बैंक बनाने की पुरजोर कोशिश करते हैं.
जिस तरह से पिछले एक दशक में कांवड़ यात्रा को महामंडित किया गया है, तो कहीं न कहीं यह महसूस होता है कि यह सब आस्था तो नहीं है, बल्कि सरकारों की ऐसी सोचीसम झी चाल लगती है, जिस में बहुजन समाज के लोगों को ‘भोले का सेवक’ होने का लालच दे कर उन्हें उन की मूल समस्याओं से भटकाया जा सके.
कर्ज ले कर कांवड़ ढोना
अगर हमारे देश के 80 करोड़ लोग मुफ्त सरकारी राशन पर पल रहे हैं, तो इस समाज के नौजवान कांवड़ यात्रा का खर्च कहां से उठा रहे हैं? यहां पर होड़ काम करती है. जैसे ही पता चला कि गांव के 15-20 लोग समूह बना कर कांवड़ यात्रा पर जा रहे हैं, तो अन्य लोगों में यह कीड़ा कुलबुलाने लगता है कि इस बार तो हम भी यह भगीरथ काज कर ही डालें.
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