Editorial. माओवादी और नक्सलवादी बगावतें पिछले 50 सालों में ज्यादातर पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अमीर समाज की लूट के शिकारोंकी वजह से पैदा हुई थीं. कांग्रेस सरकारों ने इन्हें थोड़ी ढील भी दी थी क्योंकि शायद वे जमींदारों, जंगलों में घुस रहे लकड़ी और खानों के ठेकेदारों और अमीरों, कारखाने बनाने के लिए बेचैन कारखानों वालों को समझ रहे थे.
भारतीय जनता पार्टी के लिए सताए गए लोग शूद्रों से भी नीचे चांडाल, भ्रष्ट, यवन, दैत्य, दानव, रावणों के वशंज थे. उन का संहार जैसे भी करना उन का परम धार्मिक पुण्य का काम था. कांग्रेस सरकारों में भी इन बगावत करने वालों को बदनाम किया गया कि ये सत्ता का तख्ता पलटना चाहते हैं जबकि वे सिर्फ अपनी जमीन, जंगल, पहाड़, नदियों को बचाना चाहते थे, अब भाजपा हर दूसरे को नक्सली कह कर गाली देती है.
नरेंद्र मोदी बौखला कर 15 अगस्त को लालकिले पर चढ़ कर फिर बगावत जैसा कोई काम करने वालों को दिमागी नक्सल कहने लगे हैं. यह उसी तरह का श्राप देने की कोशिश है जैसी हर पौराणिक कहानी के ठीक बीच में होती है. ज्यादातर कहानियां तो हैं ही श्रापों के कारण. दशरथ व ब्राह्मण श्रवण कुमार के मातापिता ने ब्रह्महत्या के पाप के कारण पुत्र के जाने के मरने का श्राप दिया था. लालकिले पर चढ़ कर टीवी के माध्यम से नरेंद्र मोदी ने जेनजी और जेनएल्फा को श्राप दिया है कि ये दिमागी नक्सल भी नक्सलियों व माओवादियों की तरह दुख झेलेंगे.
कट्टर हिंदू समाज किसी तरह से सत्ता की चाबी या सत्ता को देने की चुनौती का हक आम नागरिक को नहीं देना चाहता जो सवर्ण जाति में पैदा न हुआ हो. अब दिमागी नक्सल पैदा हो गए हैं जो सोशल मीडिया की तोपें ले कर सरकार से दोदो हाथकरने को तैयार हैं. अभी वे भारी पड़ रहे हैं क्योंकि सरकार को जनता को काबू में करने के लिए सोशल मीडिया को खुला रखना है.
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