West Bengal Politics. पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को 27 फीसदी से घटा कर महज 7 फीसदी कर दिया गया है. यह फैसला सामाजिक न्याय के खिलाफ एक बड़ा हमला है. पिछड़े वर्गों के लिए लड़ाई लड़ने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि यह फैसला गरीबों, दलितों और पिछड़ों की तरक्की को रोकने की साजिश है. राज्य सरकार का कहना है कि यह बदलाव अदालत के निर्देशों और पुरानी ओबीसी सूची के मुताबिक किया गया है, लेकिन इस फैसले ने सामाजिक न्याय को ले कर गंभीर बहस छेड़ दी है.
आरक्षण कोई दान नहीं है. ऐसे में अगर ओबीसी आरक्षण का दायरा अचानक बहुत छोटा कर दिया जाए तो इस का सब से बड़ा असर उन्हीं गरीब और पिछड़े परिवारों पर पड़ेगा जो सरकारी नौकरियों और पढ़ाईलिखाई में आरक्षण के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे.
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इस मुद्दे को केवल हिंदू बनाम मुसलमान बना कर देखना भी सही नहीं होगा. सरकार ने केवल 66 पुरानी ओबीसी जातियों को मान्यता देते हुए 7 फीसदी आरक्षण लागू किया. इस का मतलब यह है कि जिन हिंदू या मुसलिम जातियों को पहले ओबीसी का फायदा मिल रहा था, वे अब उस से बाहर हो जाएंगी, इसलिए इस फैसले का असर केवल मुसलिम तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी पिछड़े वर्गों पर पड़ेगा जो पहले इस व्यवस्था का हिस्सा थे.
यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम बंगाल के मुसलिम मूल रूप से पिछड़े और दलित थे जो सदियों पहले ब्राह्मणवादी समाज के कहर से निकलने के लिए इसलाम की शरण में चले गए थे.
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