Tragic Love Story : इस देश की ट्रेनें समय का मोल नहीं मानतीं. ट्रेनों के शरीर लोहेलक्कड़ के बने होते हैं, उन्हें हाड़मांस के बने आदमी की हड़बड़ाहट की कोई कद्र नहीं. मौसम और मर्ज कोई भी हो, वे अपनी गति से कोई समझौता नहीं कर सकतीं.

हाजीपुर रेलवे स्टेशन से ट्रेन खुलने का समय था शाम 6 बज कर 40 मिनट. वह 7 बजे तक भी खुल जाती थी, तो लोग संतोष की सांस लेते थे. उस सवारी गाड़ी का कोई नाम नहीं था, अदद नंबर दे कर रेलवे ऐसी गाडि़यों को छोड़ देता है.

किसी को यदि पूछताछ खिड़की पर पूछना हो, तो एक ही नाम काफी था. हाजीपुर से बरौनी जाने वाली सतबजिया गाड़ी. कह नहीं सकते कि यह नाम किस ने दिया था. चाहे जिस ने भी दिया हो था मुफीद.

जैसे हरेकचोर किंतु बदसूरत पौधे से ठीक 10 बजे रक्तवर्णी फूल अपनी अलसाई हुई कोंढ़ी से निकल कर फुला जाता है, सतबजिया ट्रेन 1-2 बार हिली और फिर दौड़ पड़ी. सर्दी की रात दिन ढलते ही अपना कब्जा जमा लेती है.

सतबजिया ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर बैठे गुरुचरण को लगा जैसे हलफा उस की हड्डियों तक पैबस्त हो रही हो. उस ने खिड़की का किवाड़ जोर लगा कर खींचा. कमबख्त कमजोर आदमी दिल से चाहे जितना निस्सन हो, उस की देह की औकात छिपी हुई नहीं  रहती. सामने वाली सीट पर बैठा नौजवान उठा, उस ने जोर लगा कर खिड़की बंद कर दी.

ट्रेन में सवारियों की कमी नहीं थी, लेकिन गुरुचरण का अकेलापन उस का उदास चेहरा उतारे नहीं उतार पा रहा था। वह जिन यादों को संभालने में बारबार गश खा रहा था, वही यादें उस के माथे पर बायमत पराछुत की  तरह खेलतीकूदती रहती थीं.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
₹ 399₹ 299
 
सब्सक्राइब करें

सरस सलिल सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरस सलिल मैगजीन का सारा कंटेंट
  • 1000 से ज्यादा सेक्सुअल हेल्थ टिप्स
  • 5000 से ज्यादा अतरंगी कहानियां
  • चटपटी फिल्मी और भोजपुरी गॉसिप
 

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
₹ 480₹ 399
 
सब्सक्राइब करें

सरस सलिल सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरस सलिल मैगजीन का सारा कंटेंट
  • 1000 से ज्यादा सेक्सुअल हेल्थ टिप्स
  • 5000 से ज्यादा अतरंगी कहानियां
  • चटपटी फिल्मी और भोजपुरी गॉसिप
  • 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...