Jharkhand Bauxite Mining. इस खनन का असर यह हुआ कि जो जंगली जानवर कभीकभार गांव में आते थे, वे तकरीबन हर रोज आने लगे. खनन के एक साल के भीतर रोजा नदी का पानी पीने लायक नहीं रह गया. जंगल के कई जानवर नदी के इस पानी को पी कर मर भी गए. इस विनाश की वजह क्या थी?
झारखंड के खूंटी जिले के कमडरा ब्लौक के बेहद घने जंगल के बीच बसे गांव रहला के आखिरी छोर पर बने 2 कमरे के कच्चे मकान में 15 साल की रजुली अपनी कैंसर पीडि़त मां शनिचरी और 2 छोटी बहनों के साथ रहती थी. उस के पिता हरदयाल मुंडा दमे से पीडि़त होने के बावजूद रांची में मजदूरी करते थे और कभीकभार गांव आते थे.
रजुली की दोनों बहनें गांव के छप्परनुमा प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थीं, जिसे इलाके के एक समाजसेवी शेषनाथ चलाते थे. यह स्कूल कभीकभी बच्चों को नाश्ते के साथ पैंटशर्ट और कच्छेबनियान भी देता था, जिसे इलाके के बड़े बौक्साइट ठेकेदारों द्वारा स्कूल बच्चों को दान किया जाता था.
पढ़ाई के साथ रजुली की दोनों बहनें घर के कामकाज में उस की मदद करती थीं और जंगल से महुआ, खोई, लकड़ी और दूसरे वन उपज जमा करने जंगल में उस के साथ जाती थीं.
दरअसल, रहला गांव में कैंसर की यह बीमारी किसी एक को नहीं, बल्कि कई लोगों को हुई थी. गांव के कुछ परिवारों के बच्चों के पैर भी टेढ़े हो गए थे. कुछ के शरीर पर बेहद भद्दे चकत्ते निकल आए थे. डाक्टरों का कहना था कि ऐसा गांव में पीने के पानी के स्त्रोतों में आर्सैनिक और कच्चे लोहे के घुलने से उपजे प्रदूषण से हुआ है.
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