Short Story in Hindi. ‘‘अरे, तु झे ढूंढ़तेढूंढ़ते तो मैं परेशान हो गया. जल्दी चल, तेरा कलूटा अब नहीं रहा.’’
रमिया के तेज रफ्तार से बरतन मांजते हुए हाथों की लय बीच में ही टूट गई. वह खबर पहुंचाने वाले आदमी का चेहरा अजीब नजरों से घूरने लगी.
‘‘अब चल भी, मुझे ही घूरती रहेगी क्या?’’ उस आदमी ने रमिया को िझड़की दी और बाहर निकल गया.
लेकिन रमिया के हाथ आधे गंदे पड़े हुए बरतनों पर घूमने लगे. पारुल ने उस को मना किया और घर जाने को कहा, लेकिन रमिया ने तो जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह अपने काम में लगी रही.
पारुल से अब बरदाश्त नहीं हो रहा था. उस के भीतर कुछ उबलने लगा. वह गुस्से में भर कर बोली, ‘‘तु झे कोई दुख नहीं रमिया? तेरा आदमी मर गया. इतनी बड़ी बात हो गई और तू बरतन नहीं छोड़ रही है. लानत है तुझ जैसी औरत पर.’’
रमिया जवाब में चीखचीख कर कहना चाह रही थी, ‘सुखदुख तो तुम बड़े लोगों का होता है बहूजी. हम छोटे लोगों का क्या है, हम तो निरे जानवर हैं,’ लेकिन उस के मुंह से सिर्फ सिसकियां निकलीं. उस की आंखें तो जैसे पत्थर की हो गईं. आंसू का एक भी कतरा नहीं गिरा.
पारुल के लफ्ज रमिया को बुरी तरह चुभे. खैर, काम खत्म कर के वह चुपचाप अपने घर की ओर चल दी.
घर पर पहले से ही पूरी बिरादरी जमा थी. रमिया को देखते ही भीड़ में एक हलचल सी पैदा हो गई. सब लोग आपस में न जाने क्या खुसुरफुसुर कर रहे थे.
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