सर्दियों की हलकी धूप उस छोटे से कसबे की गलियों में बिखरी हुई थी. सुबह के 8 बजे थे. सड़क किनारे चाय की टपरी पर भाप उड़ाती चाय की चुसकियों के साथ अखबार की हैडलाइंस पर एक गहरी चर्चा चल रही थी.

उसी कसबे में एक 2 कमरों के छोटे से घर में रहने वाली 19 साल की नेहा स्कूल की यूनिफौर्म पहन कर आईने के सामने खड़ी थी. एक हाथ से अपने बाल संवार रही थी और दूसरी ओर उस की नजर बारबार मेज पर करीने से रखी किताबों पर दौड़ रही थी.

चूंकि आज उसे इम्तिहान देने जाना था, बाहर आंगन में उस के पिता साइकिल तैयार कर रहे थे ताकि समय पर उसे इम्तिहान सैंटर पहुंचा सकें, जबकि रसोई में उस की मां टिफिन बनाते हुए आवाज लगा रही थीं, ‘‘नेहा, बेटा नाश्ता कर लो, नाश्ता तैयार है.’’

नेहा बिना कुछ बोले अपनी तैयारी में जुटी रही. आखिर वह उस परिवार का एकमात्र उम्मीद थी और उस पर उस के पिता को हद से ज्यादा भरोसा था. उस के पिता अनंत एक सरकारी दफ्तर में चपरासी थे. महीने की सीमित तनख्वाह से किसी तरह घर चलता था.

कई बार महीने के आखिरी दिनों में मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटी की पढ़ाई पर आंच नहीं आने दी. उन का एक ही सपना था कि उन की बेटी पढ़लिख कर अफसर बने और वह जिंदगी जी सके जो वे खुद कभी नहीं जी पाए.

नेहा पढ़ाई में बहुत तेज थी. स्कूल में हमेशा फर्स्ट आती थी. महल्ले के लोग अकसर उस की मिसाल दिया करते थे. उस के पिता जब भी किसी से मिलते तो गर्व से कहते कि ‘मु झे नेहा को अफसर बनाना है’ और यह कहते ही उन की आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी.

नेहा भी अपने मातापिता के संघर्ष में डट कर उन के साथ खड़ी रहती. उस ने कभी किसी चीज की जिद नहीं की. न ही महंगे कपड़े और न ही आईफोन की जरूरत महसूस की थी उस ने. उस के लिए उस के मांबाप ही उस की पूरी दुनिया थे.

जब 12वीं में अच्छे अंक आए तो शहर के सब से अच्छे कालेज में नेहा का दाखिला हो गया. कसबे से रोज बस पकड़ कर वह शहर जाती थी. पहले दिन जब उस ने कालेज की बड़ी इमारत, हरेभरे मैदान और सैकड़ों छात्रों की भीड़ देखी तो उस की आंखें खुशी से भर गईं. उसे लगा जैसे उस के सपनों को पंख मिल गए हों. उस ने मन ही मन तय किया कि वह यहां भी अपनी मेहनत से पहचान बनाएगी.

लेकिन शायद जिंदगी ने नेहा के लिए कुछ और ही लिख रखा था. कालेज के पहले ही हफ्ते नेहा की मुलाकात आदित्य से हुई. लंबा कद. आत्मविश्वास से भरी मुसकान. बात करने का ऐसा अंदाज कि सामने वाला सहज हो जाए. एक अजब का आकर्षण था उस में. पढ़ाई में भी अच्छा था और कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी आगे रहता था.

उन दोनों की पहली मुलाकात लाइब्रेरी में हुई थी. जब अचानक से नेहा के हाथ से कुछ किताबें गिर गईं तो वहीं पास ही बुक शैल्फ में अपने लिए किताब ढूंढ़ रहे आदित्य ने किताबें उठा कर उसे दी थीं.

‘‘शायद ये आप की हैं.’’ ‘‘जी… धन्यवाद.’’

‘‘फर्स्ट ईयर?’’ ‘‘जी, हां.’’

‘‘वैलकम टू आवर कालेज.’’  ‘‘थैंक्स.’’

बस इतना सा परिचय था. पर नेहा को आदित्य का बरताव अच्छा लगा.

कुछ दिनों बाद कैंटीन में फिर मुलाकात हुई.

‘‘आप हमेशा अकेली बैठती हैं.’’   ‘‘मेरे यहां ज्यादा दोस्त नहीं बने अभी तक.’’

‘‘तो आज से मैं आप का दोस्त. आई हौप यू डौन्ट माइंड.’’

नेहा मुसकरा दी.

धीरेधीरे दोनों की बातचीत बढ़ने लगी. पहले क्लास के नोट्स. फिर लाइब्रेरी. फिर कैंटीन की चाय. फिर कालेज खत्म होने के बाद बसस्टैंड तक साथ चलना. आदित्य हर छोटी बात का ध्यान रखता.

कभी उस के लिए समोसा खरीद लाता. कभी कहता कि ज्यादा पढ़ाई मत किया करो, आंखों पर असर पड़ेगा. कभी उस की तारीफ करते हुए कहता कि बिना किसी मेकअप के भी वह बहुत सुंदर लगती है.

नेहा की जिंदगी में पहली बार कोई ऐसा आया था जो उसे इतने अपनापन से देखता था. उसे लगता था जैसे दुनिया में उस से ज्यादा उस की परवाह कोई नहीं करता.

वह हर रात आदित्य के साथ चैटिंग में डूबी रहती और हर सुबह उस के ‘गुड मौर्निंग’ के इंतजार से उस का दिन शुरू होता. दोनों घंटों फोन पर बातें करते. कभी भविष्य की. कभी सपनों की. कभी उस घर की जहां वे साथ रहेंगे.

आदित्य अकसर कहता, ‘‘एक दिन मैं तुम्हें इतनी खुशियां दूंगा कि तुम अपने सारे दुख भूल जाओगी.’’

नेहा हंस देती, ‘‘सच?’’ ‘‘अपनी जान से भी ज्यादा चाहता हूं तुम्हें.’’

‘‘हमेशा साथ रहोगे न?’’ ‘‘मरते दम तक.’’

इन शब्दों ने धीरेधीरे नेहा के मन में ऐसा भरोसा पैदा कर दिया कि अब आदित्य उस के लिए सांस लेने से भी ज्यादा जरूरी हो गया था.

अब नेहा घर लौटते ही कमरे में चली जाती. मां कुछ पूछती तो कह देती कि पढ़ाई करनी है, जबकि घंटों फोन पर बातें चलती रहतीं.

एक सुबह नेहा के पिताजी ने उसे पास बैठा कर बड़े प्यार से सम झाते हुए कहा, ‘‘बेटा, इस बार पहले से मेहनत ज्यादा करना. कालेज की पढ़ाई आसान नहीं होती.’’

नेहा ने बिना उन की तरफ देखे जवाब दिया, ‘‘मु झे पता है पापा,’’ और वहां से उठ कर चली गई.

नेहा के मातापिता ने नोटिस किया था कि वह अब पहले जैसी विनम्र नहीं रही थी. वह छोटीछोटी बातों पर चिड़चिड़ाने लगी थी.

मां ने एक दिन प्यार से नेहा को खाने की टेबल पर बुलाते हुए कहा, ‘‘बेटा, खाना ठंडा हो रहा है.’’

नेहा अचानक से  झुं झला कर बोली, ‘‘मां, हर वक्त ऐसे परेशान मत किया करो.’’

मां कुछ पल के लिए नेहा को देखती रह गईं. यही बेटी कभी उन की रसोई में बैठ कर रोटियां सेंका करती थी और आज खाना खाने को कहने पर झुं झला रही है.

पहले सैमेस्टर का नतीजा आया. नेहा के नंबर उम्मीद से बहुत कम थे. पिता ने रिपोर्टकार्ड हाथ में ले कर सिर्फ इतना कहा, ‘‘कोई बात नहीं. अगली बार मेहनत कर लेना.’’

लेकिन नेहा ने अपने पिता की बात सुनने के बजाय  झुं झला कर कहा, ‘‘आप हर समय पढ़ाईपढ़ाई मत किया कीजिए.’’

पिता रामस्वरूप चुप हो गए. पहली बार बेटी ने उन से इस लहजे में बात की थी. उन्हें लगा जैसे उन की परवरिश कहीं रास्ता भटक रही है.

उधर आदित्य ने नेहा सम झाने के बजाय और करीब खींच लिया, ‘‘मार्क्स से जिंदगी नहीं चलती नेहा. जिंदगी प्यार से चलती है.’’

नेहा ने आदित्य की आंखों में देखा. उसे सचमुच लगा कि शायद वही सही कह रहा है. और यहीं से उस की जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जहां से लौटना आसान नहीं था.

उन दिनों वसंत का मौसम था. शहर की सड़कों के किनारे लगे गुलमोहर के पेड़ों पर नई पत्तियां निकल आई थीं. कालेज का हर कोना जैसे युवाओं की हंसी और सपनों से भर गया था. कैंटीन में बैठ कर घंटों बातें करना. लाइब्रेरी में एक ही मेज पर आमनेसामने बैठ कर पढ़ने का बहाना करना. क्लास खत्म होने के बाद बसस्टैंड तक साथसाथ पैदल चलना.

यह सब अब नेहा और आदित्य की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था. नेहा को अब यह एहसास भी नहीं होता था कि कब उस के चेहरे की मुसकान आदित्य के आने से जुड़ गई और कब उस की हर सुबह और हर रात उसी के नाम हो गई.

उसे लगता था कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, एक इनसान कभी नहीं बदलेगा और वह इनसान आदित्य था. उस ने अपने भविष्य की हर तसवीर में आदित्य को शामिल कर लिया था. उसे लगता था कि मेहनत कर के नौकरी तो कभी भी मिल जाएगी, लेकिन इतना सच्चा प्यार दोबारा शायद कभी नहीं मिलेगा.

आदित्य भी अपने बरताव से नेहा के इस विश्वास को हर दिन और मजबूत करता था. वह कभी उस की पसंद का चौकलेट ले कर आ जाता, कभी बिना बताए बसस्टैंड पर उस का इंतजार करता. कभी उस की तबीयत थोड़ी भी खराब होती तो दवा ले कर पहुंच जाता. वह अकसर उस की आंखों में देखते हुए कहता, ‘‘नेहा, अगर पूरी दुनिया भी हमारे खिलाफ हो गई, तब भी मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा.’’

नेहा ने मुसकरा कर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मु झे किसी दुनिया से डर नहीं, जब तक तुम मेरे साथ हो.’’

आदित्य ने हलके से मुसकरा कर कहा, ‘‘एक दिन मैं तुम्हें दुलहन बना कर अपने घर ले जाऊंगा.’’

यह सुनते ही नेहा शरमा गई. वह घर लौटते समय पूरे रास्ते उन्हीं बातों को याद कर के मुसकराती रही. उस के सपनों में अब किताबों की जगह एक छोटा सा घर था. खिड़की पर रखे फूल थे. रसोई में चाय बनाती हुई वह खुद थी और दरवाजे से मुसकराते हुए अंदर आता आदित्य था. उसे लगता था कि उस की मंजिल अब बदल चुकी है.

धीरेधीरे नेहा का पढ़ाई से मन उठने लगा. किताब खोलती तो शब्दों की जगह आदित्य का चेहरा दिखाई देता. क्लास में लैक्चरर पढ़ा रहे होते और वह मोबाइल में आए उस के मैसेज पढ़ कर मुसकराती रहती. पहले जो लड़की हर विषय के नोट्स सब से पहले बनाती थी, अब वही अकसर अधूरे नोट्स ले कर घर लौटती.

इम्तिहान नजदीक आए, लेकिन उस के भीतर पहले जैसी बेचैनी नहीं थी. उसे यकीन था कि जिंदगी का सब से बड़ा इम्तिहान तो वह पास कर चुकी है. उसे प्यार मिल चुका है.

घर में भी बदलाव साफ दिखाई देने लगा था. मां कई बार नेहा के कमरे में जातीं तो उसे फोन पर धीमी आवाज में बातें करते हुए पातीं. जैसे ही मां अंदर आतीं, वह जल्दी से फोन काट देती.

‘‘किस से बात कर रही थी?’’  ‘‘कालेज की दोस्त थी.’’

‘‘इतनी देर तक.’’ ‘‘मां, हर बात बताना जरूरी है क्या.’’

मां चुप हो गईं. उन्हें पहली बार अपनी बेटी उन से दूर जाती हुई महसूस होने लगी.

एक शाम पिता ने नेहा को अपने पास बैठाया, ‘‘नेहा.’’ ‘‘जी…’’

‘‘तुम पहले जैसी नहीं रही हो.’’ ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कमजोर हो रही है. घर में भी तुम पहले जैसा बरताव नहीं करती. अगर कोई परेशानी है तो मु झे बताओ.’’  नेहा ने नजरें फेर लीं.

‘‘आप लोग बेवजह मेरी चिंता करते हैं.’’ ‘‘बेटा, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं.’’

‘‘बस पापा. मु झे हर बात पर सम झाइए मत.’’

वे कुछ क्षण उसे देखते रहे. फिर धीरे से उठ कर बाहर चले गए. उस रात उन्होंने खाना भी ठीक से नहीं खाया. पत्नी ने पूछा भी कि क्या हुआ है, लेकिन उन्होंने केवल इतना कहा, ‘‘हमारी बेटी बड़ी हो गई है.’’

नेहा ने पहली बार अपने पिता की बु झी हुई आंखें नहीं देखीं.

उधर आदित्य नेहा को अब कालेज से बाहर भी मिलने के लिए कहने लगा. कभी शहर के पार्क. कभी नदी किनारा. कभी कोई शांत कैफे. नेहा बिना किसी  िझ झक के जाने लगी. घर पर वह एक्स्ट्रा क्लास या प्रोजैक्ट का बहाना बना देती. उस के  झूठ अब उसे  झूठ नहीं लगते थे. उसे लगता था कि वह अपने भविष्य के लिए ही तो यह सब कर रही है.

एक दिन आदित्य ने नेहा के हाथ थाम कर कहा, ‘‘नेहा, मेरा एक दोस्त बाहर गया हुआ है. उस का कमरा खाली पड़ा है, चलो न वहीं आराम से बैठ कर बातें करेंगे. यहां हर जगह भीड़ रहती है.’’

नेहा कुछ पल चुप रही. फिर बनावटी डर चेहरे पर लाते हुए कहा, ‘‘अगर इस तरह मिलते हुए किसी ने हमें देख लिया तो?’’

‘‘तुम मु झ पर भरोसा तो करती हो न?’’  ‘‘दुनिया में सब से ज्यादा.’’

‘‘फिर डर कैसा.’’   नेहा आदित्य के साथ चली गई.

उस दिन दोनों ने बातें करतेकरते सारी हदें पार कर दी. जब होश आया तो दोनों भविष्य के सपनों में खो गए. नौकरी, शादी. बच्चों के नाम. किस शहर में रहेंगे. किस तरह का घर होगा. सबकुछ तय कर लिया था दोनों ने और कई बार सारी हदें पार की थीं दोनों ने.

कमरा छोड़ने से पहले आदित्य ने नेहा की हथेली अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘अब तुम सिर्फ मेरी हो.’’

नेहा ने बिना एक पल सोचे आदित्य के सीने से लग कर कहा, ‘‘और तुम सिर्फ मेरे.’’

समय के साथ दोनों की निकटता बढ़ती गई. भरोसा इतना गहरा हो गया कि नेहा ने अपने जीवन का हर फैसला आदित्य के भरोसे छोड़ दिया. उसे लगा कि 2 लोगों के बीच जब मन का रिश्ता इतना मजबूत हो जाए तो बाकी सारी दूरियां अपनेआप मिट जाती हैं. उस ने कभी यह नहीं सोचा कि भरोसा जितना बड़ा होता है, उस के टूटने की आवाज भी उतनी ही भयानक होती है.

दिन बीतते गए. दूसरे सैमेस्टर का नतीजा पहले से भी खराब आया. इस बार कालेज के कई लैक्चरर ने नेहा को बुला कर सम झाया.

‘‘नेहा, तुम बहुत प्रतिभाशाली छात्रा थीं. आखिर हुआ क्या है?’’

नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया. उसे अब अंकों की चिंता नहीं थी. उसे लगता था कि कुछ साल बाद जब वह आदित्य की पत्नी बन जाएगी तो यह सब पीछे छूट जाएगा. लेकिन जिंदगी उतनी आसान नहीं थी जितनी उस ने अपने सपनों में देखी थी.

तकरीबन 2 महीने बीत गए. एक दिन सुबह उठते ही उसे तेज घबराहट हुई. कई दिनों से उस की तबीयत ठीक नहीं थी. उसे कमजोरी रहने लगी थी. पहले उसने इसे सामान्य सम झ कर नजरअंदाज किया. लेकिन जब लगातार कुछ बदलाव महसूस हुए तो उसके मन में अनजाना डर पैदा होने लगा. कांपते हाथों से उसने एक जांच करवाई.

रिपोर्ट नेहा के हाथ में थी. उस की आंखें एक ही लाइन पर टिक गईं. वह मां बनने वाली थी. रिपोर्ट उस के हाथ से फर्श पर गिर गई. कुछ क्षणों तक उसे लगा जैसे उस के आसपास की सारी आवाजें खत्म हो गई हों. कमरे की दीवारें घूमती हुई महसूस होने लगीं. उस के सामने अपने पिता का चेहरा घूम गया. मां की मुसकान याद आ गई. वह छोटी सी नेहा, जो कभी अपने पिता का हाथ पकड़ कर स्कूल जाया करती थी, जैसे अचानक कहीं बहुत पीछे छूट गई.

नेहा ने कांपते हाथों से आदित्य को फोन लगाया, ‘‘मु झे तुम से अभी मिलना है.’’

आदित्य नेहा की आवाज सुन कर घबरा गया, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें?’’ ‘‘बहुत जरूरी बात है.’’

‘‘ठीक है. एक घंटे बाद वहीं मिलो जहां हम पहली बार साथ बैठे थे.’’ फोन कट गया.

नेहा बैंच पर बैठी आदित्य का इंतजार करती रही. उस की आंखों में डर था, लेकिन उस डर से कहीं ज्यादा भरोसा था. उसे पूरा यकीन था कि आदित्य उस का हाथ थाम कर कहेगा, ‘‘डरने की जरूरत नहीं. अब हम शादी कर लेते हैं.’’

नेहा को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि उस की जिंदगी का सब से मुश्किल दौर अब शुरू होने वाला है.

नेहा उस पुराने पार्क की लोहे की बैंच पर बैठी थी, जहां कभी दोनों ने साथ बैठ कर अपने भविष्य का पहला सपना बुना था. उसी जगह आज उस की उंगलियां कांप रही थीं. बारबार वह अपने हाथों में पकड़ी रिपोर्ट को देखती और फिर सामने सड़क पर नजरें टिक जातीं.

हर गुजरती बाइक पर उसे लगता कि शायद आदित्य आ गया. तकरीबन आधे घंटे बाद वह तेज कदमों से उस के सामने आ कर खड़ा हुआ. उस के चेहरे पर वही मुसकान थी, लेकिन नेहा की आंखों में मुसकान की जगह घबराहट थी.

‘‘क्या हुआ नेहा, तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’ नेहा ने बिना कुछ कहे रिपोर्ट आदित्य की ओर बढ़ा दी.

आदित्य ने रिपोर्ट पढ़ी. उस के चेहरे की मुसकान धीरेधीरे गायब हो गई.

कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी पसरी रही.

नेहा ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘अब हमें शादी कर लेनी चाहिए.’’

आदित्य ने गहरी सांस ली, ‘‘इतनी जल्दी फैसला मत करो.’’  ‘‘जल्दी.’’

‘‘हां. मु झे सोचने के लिए थोड़ा समय चाहिए.’’  ‘‘सोचना क्या है आदित्य. तुम ने ही तो कहा था कि मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी.’’

आदित्य ने नेहा का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मैं तुम्हें छोड़ नहीं रहा हूं. बस थोड़ा समय दो.’’

आदित्य की यही बात नेहा के टूटते हुए मन के लिए सहारा बन गई. उस ने राहत की सांस ली. उसे लगा कि शायद सचमुच कुछ समय की बात होगी.

उस दिन के बाद भी आदित्य नेहा से पहले की तरह मिलता रहा. वह उसे हंसाने की कोशिश करता. कभी आइसक्रीम खिलाता. कभी कहता कि सब ठीक हो जाएगा. कभी उस के सिर पर हाथ फेर कर कहता, ‘‘मैं हूं न.’’ नेहा फिर यकीन कर लेती.

लेकिन धीरेधीरे सबकुछ बदलने लगा. पहले जहां आदित्य दिन में 10 बार फोन करता था, अब कईकई घंटे उस का फोन नहीं आता था. मैसेज का जवाब देर से मिलने लगा. मिलने के बहाने कम होने लगे. जब भी नेहा शादी की बात छेड़ती, वह कोई नया कारण बता देता.

‘‘अभी मेरे घर में माहौल ठीक नहीं है.’’

‘‘पापा की तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘मेरी नौकरी का मामला अटका हुआ है. थोड़ा इंतजार कर लो.’’

नेहा हर बार चुप हो जाती. वह खुद को सम झाती कि हर रिश्ते में मुश्किल समय आता है. प्यार का मतलब साथ निभाना होता है. लेकिन उस के भीतर पल रहा डर हर दिन थोड़ा और बड़ा हो रहा था.

अब नेहा के शरीर में भी बदलाव दिखाई देने लगे थे. वह ढीले कपड़े पहनने लगी. कालेज जाना तकरीबन बंद हो गया. घर में उस ने बीमारी का बहाना बना दिया. मां दिनरात उस की सेवा करतीं और सोचतीं कि शायद पढ़ाई का तनाव है. पिता डाक्टर के पास चलने की बात कहते तो वह मना कर देती.

एक रात मां नेहा के सिरहाने बैठी थीं, ‘‘बेटा…’’ ‘‘हां, मां,’’ नेहा बोली.

‘‘तुम हम से कुछ छिपा तो नहीं रही हो न?’’

नेहा की आंखें भर आईं. एक पल के लिए उस का मन हुआ कि वह मां के गले लग कर सबकुछ बता दे. लेकिन अगले ही पल आदित्य का चेहरा सामने आ गया. उस ने सोचा, ‘बस कुछ दिनों की बात है. शादी हो जाएगी. फिर सब ठीक हो जाएगा.’

नेहा ने जबरन मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं, मां.’’

मां ने नेहा के सिर पर हाथ फेरा और कमरे से बाहर चली गईं.

दरवाजा बंद होते ही नेहा फूटफूट कर रो पड़ी. अगले दिन उस ने आदित्य को मिलने के लिए बुलाया. इस बार उस के चेहरे पर बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी.

‘‘आदित्य, अब और इंतजार नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं.’’   ‘‘कब तक?’’

‘‘थोड़ा समय लगेगा.’’   ‘‘मेरे पास समय नहीं है.’’

आदित्य चुप रहा. नेहा ने उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘चलो, अभी मेरे घर चलते हैं. मैं सब सच बता दूंगी.’’

आदित्य जैसे चौंक गया, ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या.’’

‘‘तो फिर अपने घर चलो.’’  ‘‘वह भी मुमकिन नहीं है.’’

‘‘क्यों?’’  ‘‘क्योंकि वे…’’ आदित्य रुक गया.

‘‘क्योंकि क्या?’’  आदित्य ने नजरें  झुका लीं, ‘‘मेरे घर वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं हैं.’’

नेहा कुछ क्षण तक उसे देखती रह गई. उसे लगा जैसे उस ने ठीक से सुना नहीं, ‘‘क्या कहा तुम ने?’’

‘‘पापा कभी नहीं मानेंगे.’’ ‘‘लेकिन तुम ने कहा था कि तुम दुनिया से लड़ जाओगे.’’

‘‘मैं ने कोशिश की.’’ ‘‘कब?’’

आदित्य के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था.

नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे, ‘‘तुम मेरे साथ मजाक कर रहे हो न?’’ ‘‘नहीं.’’

‘‘तुम ने कहा था कि मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी.’’   ‘‘मैं चाहता था.’’

‘‘चाहता था…’’ नेहा के मुंह से ये शब्द निकले और जैसे उस की पूरी दुनिया बिखर गई.

नेहा अचानक उस के पैरों के पास बैठ गई. उस ने दोनों हाथ जोड़ दिए, ‘‘आदित्य, ऐसा मत करो. मैं कहीं की नहीं रहूंगी.’’

आदित्य घबरा गया, ‘‘उठो नेहा. लोग देख रहे हैं.’’

‘‘मु झे किसी की परवाह नहीं है,’’ नेहा ने आदित्य के पैर पकड़ लिए, ‘‘मु झे छोड़ कर मत जाओ. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी.’’

पास से गुजरते लोग रुक कर देखने लगे.

नेहा रोते हुए बोलती जा रही थी, ‘‘अगर तुम्हारे घर वाले नहीं मानते तो हम कहीं दूर चलेंगे. शादी कर लेंगे. मैं किसी चीज की मांग नहीं करूंगी. छोटे से कमरे में रह लेंगे. मैं नौकरी कर लूंगी. बस, मु झे अकेला मत छोड़ो.’’

आदित्य का चेहरा तनाव से भर गया. कुछ देर तक वह चुप खड़ा रहा. फिर धीरे से बोला, ‘‘मु झे सोचने दो.’’

नेहा ने आदित्य के आंसू भरे चेहरे की ओर देखा, ‘‘सच…’’ ‘‘हां, एकदम सच.’’

‘‘तुम मु झे छोड़ोगे नहीं?’’ आदित्य ने धीमे से कहा, ‘‘नहीं.’’

बस, यही एक शब्द फिर नेहा के लिए उम्मीद बन गया.

अगले कुछ दिनों तक आदित्य फिर सामान्य बरताव करता रहा. उस ने नेहा को यकीन दिलाया कि उस ने एक रास्ता सोच लिया है.

एक शाम आदित्य ने कहा, ‘‘हम यहां नहीं रह सकते. सब को पता चल जाएगा.’’

‘‘फिर?’’ ‘‘हम बड़े शहर चलते हैं.’’

‘‘कहां?’’ ‘‘वहां मेरे एक परिचित हैं. पहले हम शादी करेंगे. फिर नौकरी ढूंढ़ लेंगे. जब सब शांत हो जाएगा, तब घर वालों को भी मना लेंगे.’’

नेहा की बु झी हुई आंखों में फिर रोशनी लौट आई, ‘‘सच में सब ठीक हो जाएगा?’’

आदित्य मुसकराया, ‘‘मैं ने तुम से वादा किया है.’’

उस रात नेहा ने पहली बार चैन की सांस ली. उस ने अपने छोटे से बैग में 2 जोड़ी कपड़े रखे. मांपिता की एक पुरानी तसवीर अपने पर्स में रखी और बिना किसी को बताए, अगली सुबह वह आदित्य के साथ बस में बैठ गई. खिड़की के बाहर सड़कें पीछे छूटती जा रही थीं.

नेहा को लग रहा था कि वह अपनी जिंदगी की सब से बड़ी मंजिल की ओर जा रही है. उसे यह बिलकुल नहीं मालूम था कि वह जिस सफर पर निकली है, उस की मंजिल कोई नया घर नहीं, बल्कि ऐसा अंधेरा है जहां से लौटने के बाद इनसान पहले जैसा कभी नहीं रह पाता.

बड़ा शहर नेहा ने केवल फिल्मों और तसवीरों में देखा था. ऊंचीऊंची इमारतें. रात में भी दिन जैसा उजाला. सड़कों पर बिना रुके दौड़ती गाडि़यां. हर चेहरे पर जल्दी और हर कदम में बेचैनी. बस से उतरते समय उस ने आदित्य का हाथ कस कर पकड़ लिया. उसे डर भी लग रहा था और भरोसा भी था. डर इस अनजान शहर का था, और भरोसा उस हाथ का जिसे उस ने अपनी पूरी जिंदगी सम झ लिया था.

आदित्य नेहा को एक तंग सी गली में बने पुराने मकान तक ले गया. ऊपर दूसरी मंजिल पर एक छोटा सा कमरा था. कमरे में एक लोहे का बिस्तर, एक पुरानी अलमारी, एक प्लास्टिक की मेज और कोने में रखा गैस का छोटा चूल्हा. नेहा ने कमरे को देखा और मुसकरा दी, ‘‘यहीं रहेंगे हम?’’

आदित्य ने भी मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, कुछ दिन. फिर सब ठीक हो जाएगा.’’

उस रात दोनों ने बाहर से सस्ता खाना मंगवाया. नेहा ने पहली बार बिना किसी डर के भविष्य की बातें कीं. उस ने कहा, ‘‘जब हमारी शादी हो जाएगी न, तब मैं सब से पहले मांपापा से माफी मांगूंगी. उन्होंने मेरे लिए बहुतकुछ किया है.’’

आदित्य ने नेहा की बात सुन कर सिर हिलाया और कहा, ‘‘हां, सब ठीक हो जाएगा.’’

नेहा को आदित्य की आंखों में वही पुराना यकीन दिखाई दिया. उसे लगा कि पिछले कुछ दिनों का तनाव अब खत्म हो गया है.

अगले 2-3 दिन आदित्य उसे शहर घुमाता रहा. कभी नदी के किनारे बने पार्क में ले जाता, कभी किसी सस्ते ढाबे में खाना खिला देता. कभी कहता, ‘‘बस 2-4 दिन और. फिर मंदिर में शादी कर लेंगे.’’

नेहा हर बार मुसकरा देती. वह अपने भीतर पल रही नई जिंदगी के बारे में सोचती और उस के चेहरे पर अनजानी ममता उतर आती.

उस ने अपने मन में उस बच्चे के लिए भी सपने बुनने शुरू कर दिए थे. उसे लगता था कि बुरा समय बस अब खत्म होने ही वाला है.

लेकिन चौथे दिन सुबह सबकुछ बदल गया. आदित्य जल्दीजल्दी तैयार होने लगा.

नेहा ने पूछा, ‘‘इतनी सुबह कहां जा रहे हो?’’ ‘‘एक जरूरी काम है. दोपहर तक लौट आऊंगा.’’

‘‘मैं भी चलूं?’’ ‘‘नहीं, तुम यहीं आराम करो,’’ आदित्य ने जातेजाते नेहा के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘दरवाजा अंदर से बंद कर लेना.’’

नेहा मुसकरा कर बोली, ‘‘जरा जल्दी आना.’’

आदित्य ने पलट कर उसे देखा और बोला, ‘‘हां.’’

दरवाजा बंद हुआ. आदित्य के कदमों की आवाज सीढि़यों से नीचे उतरती चली गई.

नेहा खिड़की के पास खड़ी हो कर आदित्य सड़क पर जाते हुए देखती रही. उसे क्या पता था कि यह उस की जिंदगी में आदित्य की आखिरी  झलक थी.

दोपहर बीत गई. शाम हो गई. रात हो गई. आदित्य नहीं लौटा.

नेहा ने कई बार फोन मिलाया. हर बार एक ही आवाज आई, ‘आप जिस नंबर से संपर्क करना चाहते हैं वह अभी स्विचऔफ है.’

नेहा ने खुद को सम झाया और बोली, ‘‘शायद किसी काम में फंस गया होगा.’’

अगला दिन भी निकल गया. फिर तीसरा. फिर चौथा. फोन अब भी बंद था.

नेहा का सब्र टूटने लगा. उस ने उन सभी दोस्तों को फोन किया जिन के बारे में वह जानती थी. किसी ने फोन नहीं उठाया. जिस ने उठाया, उस ने इतना ही कहा, ‘‘मु झे नहीं पता. बहुत दिनों से नहीं दिखा. घर पर भी नहीं है.’’

अब कमरे में रखा राशन खत्म होने लगा था. आदित्य जो थोड़ेबहुत पैसे छोड़ गया था, वे भी धीरेधीरे खत्म हो गए. कई बार नेहा केवल पानी पी कर ही सो जाती.

एक हफ्ते बाद मकान मालकिन दरवाजे पर आईं, ‘‘बेटी, किराया कब दोगी?’’

नेहा ने  िझ झकते हुए कहा, ‘‘बस, 2-3 दिन और.’’  ‘‘2-3 दिन से काम नहीं चलेगा. मकान किराए पर है, कोई धर्मशाला नहीं है.’’

नेहा ने सिर  झुका लिया. उस रात उस ने फिर आदित्य को दर्जनों बार फोन लगाया. कोई जवाब नहीं मिला.

अगले दिन नेहा काम की तलाश में निकली. वह एक दुकान पर गई, ‘‘कोई काम मिल जाएगा क्या?’’

दुकानदार ने नेहा को ऊपर से नीचे तक देखा.

‘‘इस हालत में काम करोगी? जाओ, घर पर आराम करो और अपने आदमी से कहो कि थोड़ी और मेहनत करे कि तुम्हें इस हालत में काम न करना पड़े.’’

नेहा दिनभर काम की तलाश में भटकती रही, पर किसी ने काम न दिया. शाम तक उस के पैर जवाब दे चुके थे. वह खाली हाथ लौट आई.

कुछ दिनों बाद नेहा के पास खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा. भूख इनसान से उस का आत्मसम्मान भी धीरेधीरे छीन लेती है.

एक सुबह नेहा शहर के पुराने मंदिर के बाहर सीढि़यों पर बैठ गई. सामने आनेजाने वाले लोग कभी 2 रुपए रख जाते, कभी 5. कई लोग बिना देखे निकल जाते. कुछ लोग दया से देखते. कुछ नफरत से.

नेहा हर सिक्के के साथ थोड़ाथोड़ा टूटती जा रही थी. उसे अपने पिता याद आते, जो पसीना बहा कर कमाई हुई रोटी घर लाते थे. उसे अपनी मां याद आतीं, जो हमेशा कहती थीं, ‘‘मेहनत की कमाई सब से बड़ी दौलत होती है.’’

और आज उन की वही बेटी हाथ फैला कर बैठी थी.

एक शाम मंदिर की सीढि़यों पर बैठेबैठे नेहा के पेट में अचानक तेज दर्द उठा. दर्द इतना तेज था कि वह चीख पड़ी.

लोग इकट्ठा हो गए. किसी ने पानी दिया. किसी ने एंबुलैंस को फोन किया. कुछ ही देर में उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया.

घंटों की पीड़ा के बाद नेहा ने एक सेहतमंद बच्चे को जन्म दिया. नर्स ने बच्चे को उस की गोद में रखा. नेहा ने कांपते हाथों से उसे सीने से लगा लिया. उस की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. वह पहली बार कई दिनों बाद मुसकराई. उस ने धीरे से कहा, ‘‘अब मेरे पास तुम हो.’’

उस छोटे से बच्चे ने आंखें भी नहीं खोली थीं, लेकिन जैसे उस ने अपनी मां के टूटे हुए दिल को एक पल के लिए फिर धड़कना सिखा दिया था. लेकिन जिंदगी का सब से बेरहम दौर अभी बाकी था.

सरकारी अस्पताल में नेहा तकरीबन एक हफ्ते तक भरती रही. अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच उस ने पहली बार बिना किसी डर के अपने बेटे को भरपूर देखा. उस की छोटीछोटी उंगलियां. बंद आंखें. मासूम चेहरा. जब वह अपनी नन्ही मुट्ठी उस की उंगली पर कस कर बंद कर लेता, तो नेहा को लगता जैसे उस के टूटे हुए जीवन का एक छोटा सा टुकड़ा फिर से जुड़ गया हो.

नेहा के पास न कोई अपना था, न कोई रिश्तेदार, न कोई ऐसा जो उस के सिर पर हाथ रख कर कह देता कि सब ठीक हो जाएगा. फिर भी वह हर सुबह अपने बेटे का चेहरा देख कर जीने की हिम्मत जुटा लेती. उस ने उस का नाम आरव रखा. उसे लगता था कि अगर पूरी दुनिया ने उसे छोड़ दिया है, तो भी यह छोटा सा बच्चा उस की दुनिया बन जाएगा.

अस्पताल से छुट्टी मिलने के दिन नेहा ने अपने बेटे को पुराने कपड़े में सावधानी से लपेटा और धीमेधीमे कदमों से उस कमरे की ओर चल पड़ी, जहां से उसे पूरा यकीन था कि उस की नई जिंदगी फिर शुरू होगी.

रास्तेभर वह यही सोचती रही कि मकान मालकिन को हाथ जोड़ कर कुछ दिन और मांग लेगी. कहीं कोई छोटामोटा काम मिल जाएगा. वह मेहनत करेगी. अपने बेटे को पढ़ाएगी. उसे कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने देगी. उस के मन में पहली बार भविष्य के लिए एक छोटी सी उम्मीद जगी थी.

लेकिन उस गली में पहुंचते ही नेहा के कदम वहीं रुक गए. कमरे के बाहर उस का पुराना बैग, कुछ कपड़े, टूटा हुआ स्टील का डब्बा और 2-3 किताबें धूल में पड़ी थीं. दरवाजे पर नया ताला लगा था. अंदर से किसी और परिवार के बच्चों की आवाजें आ रही थीं.

नेहा कुछ सम झ नहीं पाई. तभी मकान मालकिन बाहर निकलीं. उन्होंने नेहा को देखा और गहरी सांस ले कर बोलीं, ‘‘बेटी, मैं कब तक इंतजार करती. 6 महीने से किराया नहीं मिला था. मु झे भी घर चलाना है. मजबूरी में कमरा किसी और को देना पड़ा.’’

नेहा की आंखें भर आईं, ‘‘मेरे सामान का क्या…’’

‘‘जो था, बाहर रख दिया. बाकी कुछ खराब हो गया.’’

नेहा कुछ पल तक दरवाजे को देखती रही. यही वह कमरा था, जहां बैठ कर उस ने अपने आने वाले जीवन के कितने सपने देखे थे. आज उसी कमरे में कोई और रह रहा था. उस के हिस्से में केवल धूल में पड़ी कुछ किताबें थीं, जिन के पन्नों पर अब भी उस का नाम लिखा था.

नेहा ने चुपचाप अपना सारा सामान समेटा. अपने बेटे को सीने से लगाया और बिना कुछ कहे वहां से चल दी. उस दिन के बाद शहर की सड़कें ही उस का घर बन गईं.

सुबह नेहा मंदिरों, चौराहों और बाजारों के बाहर बैठ जाती. कोई 2 रुपए दे देता. कोई बचा हुआ खाना रख जाता. कोई उसे देख कर मुंह फेर लेता. शाम ढलते ही वह रेलवे स्टेशन पहुंच जाती. प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर, जहां रात में भीड़ कम हो जाती थी, वहीं एक खंभे के पास वह अपने बच्चे को गोद में ले कर बैठ जाती.

Heart Touching Hindi Story

कभी कोई पुराना कंबल मिल जाता, कभी अखबार बिछा कर रात काटनी पड़ती. बरसात की रातों में छत से टपकते पानी से बचने के लिए वह अपने बच्चे को सीने से चिपका कर घंटों बैठी रहती. ठंडी हवाओं में वह खुद कांपती रहती, लेकिन अपने बेटे के ऊपर अपनी चुन्नी डाल देती.

स्टेशन पर आनेजाने वाले लोग नेहा को रोज देखते. कुछ दया से देखते. कुछ हिकारत से. कुछ लोग कहते, ‘‘देखो, यह जरूर घर से भागी होगी.’’

कोई कहता, ‘‘आजकल की लड़कियां खुद अपनी जिंदगी बरबाद करती हैं.’’

नेहा सब सुनती, लेकिन कुछ नहीं कहती. क्योंकि उसे मालूम था कि सच बताने से भी कोई उस का दर्द नहीं बांट पाएगा.

कई बार रात को जब पूरा स्टेशन शांत हो जाता, दूर कहीं इंजन की सीटी सुनाई देती और प्लेटफार्म की पीली रोशनी उस के चेहरे पर पड़ती, तब वह अपने बेटे को देख कर धीरेधीरे रोने लगती.

‘‘बेटा, मु झे माफ कर देना. तुम्हारी कोई गलती नहीं थी. गलती मेरी थी. मैं ने उन हाथों को छोड़ दिया जिन्होंने मु झे चलना सिखाया था, और उस हाथ को पकड़ लिया जो बीच रास्ते में छोड़ कर चला गया.’’

नेहा की आंखों के सामने बारबार अपने पिता का चेहरा आ जाता. वह सुबह याद आती, जब पिता ने साइकिल से उसे कालेज छोड़ा था. मां याद आतीं, जो उस के बैग में बिना बताए उस के पसंद के परांठे रख देती थीं. उसे अपनी किताबें याद आतीं. अपना कमरा. अपनी मेज. अपनी अधूरी कौपियां.

नेहा को लगता, काश समय एक बार पीछे लौट जाए. काश उस दिन वह बसस्टैंड पर आदित्य से मिलने के बजाय घर लौट गई होती. काश उस ने अपने पिता की आंखों में छिपी चिंता पढ़ ली होती. लेकिन जिंदगी में ‘काश’ सब से बेबस शब्द होता है. वह केवल दिल में गूंजता है, समय को कभी वापस नहीं लाता.

दिन गुजरते गए. आरव अब बड़ा होने लगा था. जब वह अपनी मां का चेहरा देख कर हंसता, तो नेहा कुछ देर के लिए अपने सारे दुख भूल जाती. वह उसे सीने से लगा कर कहती, ‘‘तू बड़ा हो कर पढ़ेगा. बहुत पढ़ेगा. किसी की मीठी बातों में कभी अपना रास्ता नहीं खोएगा.’’

एक रात बहुत तेज बारिश हुई. प्लेटफार्म के उस कोने तक भी पानी आ गया. पूरी रात नेहा जागती रही. उस ने अपने बेटे को भीगने नहीं दिया. सुबह होने से कुछ पहले ठंडी हवा चलने लगी. कई दिनों की भूख, कमजोरी और लगातार जागने से उस की आंखें भारी हो गईं. उस ने अपने बेटे को सीने से लगा कर खंभे से पीठ टिकाई.

कुछ ही क्षणों के लिए नेहा की आंख लग गई. जब उस की नींद खुली तो सूरज निकल चुका था. उस ने आदतन अपने बच्चे को सीने से और कस कर लगाने के लिए हाथ बढ़ाया.

लेकिन… उस की बांहें खाली थीं. वह एकदम से उठ बैठी. उस ने घबरा कर इधरउधर देखा. पुराना कंबल वहीं पड़ा था. उस की चुन्नी भी वहीं थी. लेकिन आरव वहां नहीं था. एक पल के लिए उसे लगा कि शायद वह सपना देख रही है.

फिर वह पागलों की तरह प्लेटफार्म पर दौड़ने लगी, ‘‘मेरा बच्चा… किसी ने मेरा बच्चा देखा है?’’

उस की आवाज पूरे स्टेशन पर गूंज उठी. वह हर किसी से पूछती, ‘‘भैया, मेरा बेटा देखा क्या?’’

‘‘दीदी, मेरा बच्चा… अभी यहीं था.’’

कोई सिर हिला देता. कोई बिना रुके आगे बढ़ जाता. नेहा टिकट खिड़की तक भागी. चाय वाले के पास गई. कुलियों से पूछने लगी. चलती ट्रेनों के दरवाजों तक दौड़ी. हर डब्बे में  झांक कर रोती रही, ‘‘आरव… बेटा… एक बार आवाज देदे.’’

लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आई.

घंटों तक नेहा पूरे स्टेशन पर नंगे पांव दौड़ती रही. उस के पैरों से खून निकल आया. गला बैठ गया. आंखों के आंसू सूख गए. आखिरकार वह उसी खंभे के पास लौट आई, जहां पिछली रात उस ने अपने बेटे को सीने से लगा कर सुलाया था.

नेहा जमीन पर बैठ गई. उस ने उस छोटे से कंबल को अपनी गोद में रखा. धीरेधीरे उसे सीने से लगाने लगी, जैसे उस में अब भी उस का बच्चा सो रहा हो.

नेहा की आंखें शून्य में टिक गईं. होठ कांपे, ‘‘मैं ने सब खो दिया… पहले अपने मांपापा… फिर अपना घर… फिर अपना सम्मान… और अब… अब मेरा बच्चा भी.’’

स्टेशन पर भीड़ पहले की तरह चलती रही. ट्रेनें आती रहीं. ट्रेनें जाती रहीं. लोग अपनेअपने सफर में बिजी रहे. लेकिन उस प्लेटफार्म के एक कोने में बैठी एक मां की दुनिया हमेशा के लिए रुक चुकी थी.

कहते हैं कि उस स्टेशन पर कई महीनों तक एक बिखरे बालों वाली औरत रोज हर आने वाली ट्रेन के सामने जा कर एक ही सवाल पूछती दिखाई देती थी, ‘‘क्या आप ने मेरे आरव को देखा है?’’

उस की आवाज में ऐसी पीड़ा होती थी कि सुनने वाले कुछ पल के लिए ठहर जाते, लेकिन किसी के पास उस का जवाब नहीं होता था.

और बहुत दूर, उसी छोटे से कसबे में, एक बूढ़ा पिता हर शाम अपने घर के दरवाजे पर कुछ देर तक सड़क की ओर देखता रहता है. उस की पत्नी आज भी रोटी बनाते समय एक अतिरिक्त रोटी सेंकती है. दोनों के बीच अब बातें बहुत कम होती हैं. शायद दोनों के दिल में एक ही उम्मीद अब भी जिंदा थी कि एक दिन दरवाजे पर दस्तक होगी, उन की बेटी दौड़ कर आएगी और मां के गले लग कर रोते हुए कहेगी, ‘‘मां, मैं घर आ गई.’’

लेकिन वह दस्तक आज तक कभी नहीं हुई.

– मुकेश सिंह

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...