Short Story. ‘‘यह हवा की चाल कितनी सुंदर है न राकेश...’’ रेखा ने कानों के पीछे बालों को करते हुए कहा. ऐसी हरकत करते ही मानो उस के लटकते झुमकों ने गालों को चूम लिया. राकेश रेखा के हाथ पर अपना हाथ रख कर बोला, ‘‘तुम पर ये ?ामके कितने सुंदर लगते हैं.’’
‘‘बिलकुल लगेंगे, क्योंकि तुम ने जो दिए थे. याद है न जब हम घूमने गए थे, तुम ने अपनी पसंद से मु?ो ये ला कर दिए थे. तब मैं जान पाई कि तुम्हें लड़कियों की पसंद का कितना अंदाजा है...’’ रेखा ने मजे लेते हुए कहा.
राकेश ने हिचकिचाहट से कहा, ‘‘अच्छा एक बात पूछ लूं? तुम अब भी मु?ा से प्यार करती हो न?’’
‘‘चुप हो जाओ राकेश. इस सवाल का जवाब मैं खुद तलाश रही हूं और इस का जवाब मैं उम्रभर तलाशती रहूंगी. न मैं अब उन दिनों को भुला सकती हूं और न याद करना चाहती हूं.
‘‘मैं ऐसी जिंदगी में उल?ा हूं कि मेरे लिए प्रेम, विश्वास जैसे शब्द का मतलब कुछ नहीं. मेरी जिंदगी बस एक सुनसान रास्ते की तरह है, जिस की कोई मंजिल नहीं. मगर मैं रुक भी नहीं सकती, बस चलते रहना है मु?ो,’’ इतना कह कर रेखा उठ खड़ी हुई.
राकेश भी उठ गया. रेखा ने कहा, ‘‘सुनो, मु?ो घर तक छोड़ दोगे? अकेले जाने से डर लगता है. अब कहीं भटक न जाऊं.’’
राकेश बोला, ‘‘क्यों नहीं... चलो.’’
रेखा एक पढ़ीलिखी खूबसूरत कामकाजी औरत थी, जिस के पिता राम नारायण एक अंगरेजी के प्रोफैसर थे और रेखा शुरू से परंपराओं को तोड़ने और नई इबारत लिखने की जिद में रहती थी, इसीलिए उस ने अंगरेजी छोड़ कर हिंदी साहित्य से स्नातक किया और फिर एक स्कूल में पढ़ाया. फिर कुछ ही महीनों बाद उस का चयन माध्यमिक स्तर के एक विद्यालय में हुआ.
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