आईना : बूढ़ी सोच तो विकास कैसे?

केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री और उन का मंत्रिमंडल भी बूढ़ों से भरा हुआ है. देश और राज्यों का नेतृत्व जब इन उम्र के नेताओं के हाथों में है तो नए विचार, नया विकास कहां से आएगा?

यह वह पीढ़ी है, जो राम का नाम जपने, मंत्र पढ़ने, हवनयज्ञ कराने, ब्राह्मणों को दानदक्षिणा देने, गौसेवा करने, स्वर्गनरक में विश्वास जैसे धार्मिक पाखंडों के जरीए समस्याओं के समाधान पर भरोसा करती आई है. अफसोस यह है कि इस पीढ़ी ने नई पीढ़ी को भी उसी अंधविश्वासी ढांचे में ढाल दिया है.

देश और राज्यों की तरक्की के लिए यह नेतृत्व अपने राज्यों में तीर्थयात्राएं, हवनयज्ञ, मंदिर दर्शन, धर्मस्थलों का निर्माण, दानदक्षिणा जैसे धार्मिक कर्मकांडों में उल झा रहा है और नौजवान इस में कांवडि़यों और यात्रियों की सेवा धर्म की खातिर करने में लगे रहते हैं. कई भाजपाई राज्यों में तो धार्मिक मंत्री तक बनाए गए हैं.

भारत एक युवा समाज है. सवा अरब की आबादी में 60 फीसदी से ज्यादा युवा हैं. दूसरे देशों के बजाय भारत में इन की आबादी सब से ज्यादा है. इस लिहाज से युवा भारत होते हुए देश में एक भी युवा विधानसभा नहीं है.

राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट जैसे युवा कहलाने वाले नेता भी पैतृक विरासत से राजनीति में आए हुए हैं.

राजनीति में आज ऐसे युवा नेता नहीं हैं, जो युवाओं में क्रांति का संचार कर सकें, इसलिए वोटरों को पुराने, बूढ़े और युवा नेताओं में कोई फर्क नजर नहीं आता.

मगर विचार युवा नहीं

कहने को हर राजनीतिक दल की अपनीअपनी युवा विंग हैं. भारतीय युवा कांग्रेस, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्टूडैंट फैडरेशन औफ इंडिया जैसी राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर युवा राजनीति की शाखाएं सक्रिय हैं.

सवाल यह है कि क्या राजनीतिक नजरिए से हमारे युवा नेताओं के विचार मौजूदा नेताओं से अलग हैं? जवाब है, नहीं. हमारे युवा नेताओं के विचार किसी भी तरह से नए, क्रांतिकारी और बदलाव के वाहक नहीं हैं. युवाओं से बदलाव क्रांति की राजनीति की उम्मीद है, पर वे उस पर खड़े उतरते दिखाई नहीं देते.

युवा राजनीति से उदासीन हैं और वे दूसरे क्षेत्रों में अपना भविष्य ज्यादा चमकीला सम झते हैं.

युवा नेता राजनीति में किसी भी लिहाज से अलग नहीं हैं. वे पुरानी पीढ़ी के नेताओं से अलग विचार नहीं रखते. वे न तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते सुनाई पड़ते हैं, न नशाखोरी और न ही सामाजिक बुराइयों के खिलाफ.. ऐसे युवा नेता नहीं आ रहे जो खुल कर धर्म, जातिवादी राजनीति का विरोध कर सड़कों पर उतरते हों. जो युवा राजनीति में आ रहे हैं या मौजूद हैं, वे ज्यादातर पारिवारिक राजनीतिक विरासत को जारी रखने और शासन व सत्ता का सुख भोगने के लिए हैं.

यही वजह है कि देश के युवा अपने राजनीतिक नेतृत्व की कमी में पुराने विचारों से हांके जा रहे हैं.

वे मंदिर निर्माण, रथयात्राओं के पीछे, गौरक्षा की गुहार लगाते हुए हिंसा पर उतारू दिखाई दे रहे हैं. वे सड़ीगली हिंदुत्ववादी संस्कृति के पहरेदार बने हुए हैं.

धार्मिक युवाओं का महत्त्व

भारतीय राजनीति लकीर की फकीर बनी रहना चाहती है. यह यों ही नहीं है. भाजपा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं चाहता कि ऐसे नए युवा आगे आएं, जो जाति, धर्म की प्राचीन व्यवस्था को नकारें और पुराणों के मिथकों की जगह विज्ञान की सचाई को वरीयता दें.

पौराणिक कथाओं को विज्ञान के आविष्कारों से जोड़ बताने वाले त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव कुमार और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस युवा राजनीति की संघीभाजपाई मिसाल हैं.

उधर, कांग्रेस भी इस मामले में भाजपा की ही बहन है. वह भी पार्टी में संस्कारी ब्राह्मणवादी युवाओं को ही आगे लाती है. दोनों ही पार्टियों में युवा चाहे किसी भी जाति के हों, तिलक लगाए, बातबात में धर्म, ईश्वर और अवतारों के किस्से जबान पर रखे हुए हिंदू संस्कृति, संस्कारों का जप करते हैं.

राजनीति में परिवर्तनकारी विचारों के अगुआ कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी, चंद्रशेखर रावण जैसे युवा नेताओं को पीछे धकेलने में कांग्रेस और भाजपा पूरी ताकत से मिल कर जुटी नजर आती हैं.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि युवाओं को शिक्षादीक्षा धर्म के बुजुर्ग नेता ही दे रहे हैं. यही वजह है कि राजनीति में पुराने नेताओं का दबदबा कायम है.

‘अग्निपथ’ योजना से सरकार ने उन युवाओं को भी निराश कर दिया है, जो सेना में आगे बढ़ कर कुछ करना चाहते थे. सरकारी नौकरियों में भी युवा अपना दमखम नहीं दिखा सकते हैं, क्योंकि नौकरियां हैं ही नहीं. अब तो युवा सिर्फ पकौड़े बेचेंगे.

नोटबंदी, GST और 370 हटानाः दिखने में अच्छे, असल में बेहद नुकसानदेह

शुरू में तो गरीबों को लगा कि जो मंच पर कहा गया है वही सच है कि अमीर लोगों के घरों से कमरे भरभर कर नोट निकलेंगे, काले धन का सफाया हो जाएगा, अमीरों का पैसा सरकारी खजाने से हो कर गरीबों तक आ जाएगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और गरीबों को न सिर्फ लाइनों में खड़ा होना पड़ा, अपनी दिहाडि़यों का नुकसान करना पड़ा और उसी वजह से आज सारे उद्योगधंधे बंद होने के कगार पर आ गए हैं.

चतुर नेता वही होता है जो अपनी एक गलती को छिपाने के लिए दूसरी बड़ी गलती करे और फिर तीसरी. हर गलती का सुहावना रूप भी हो जो दिखे, नीचे चाहे भयंकर सड़न और बदबू हो. जीएसटी भी ऐसा ही था, नए टैक्स भी ऐसे ही थे और कश्मीर में की गई आधीअधूरी कार्यवाही भी ऐसी रही.

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तीनों एक से बढ़ कर एक. दिखने में अच्छे, पर असल में बेहद नुकसानदेय.

नोटबंदी के बाद नोटों की कुल गिनती बाजार में कम होने के बजाय बढ़ गई है. 3 साल बाद भी भारतीय रिजर्व बैंक से छपे नोटों की गिनती बढ़ रही है जबकि सरकार हर भुगतान औनलाइन करने को कह रही है. लोग अब अपना पैसा नकदी में रखने लगे हैं. उन्हें तो अब बैंकों पर भी भरोसा नहीं है. जिस काले धन को निकालने के कसीदे पढ़े गए थे और भगवा सोशल मीडिया ने झूठे, बनावटी किस्से और वीडियो रातदिन डाले थे, वे सब अब दीवाली के फुस पटाखे साबित हुए हैं.

अब पैसा धन्ना सेठ नहीं रख रहे, क्योंकि 2000 रुपए के नोटों को नहीं रखा जा रहा है. यह आम आदमी रख रहा है, गरीब रख रहा है, 2000 रुपए के नोट जो पहले 38 फीसदी थे अब घट कर 31 फीसदी रह गए हैं. साफ है कि लोग 500 और 100-200 रुपए के नोट रख रहे हैं. ये गरीब हैं. ये जोखिम ले रहे हैं कि उन के नोट चोरी हो जाएं, गल जाएं, जल जाएं, पर ये बैंक अकाउंट में नहीं रख रहे.

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जीएसटी का भी यही हुआ है. ‘एक देश एक टैक्स’ के नाम पर लोगों को जी भर के बहलाया गया. पूजापाठी जनता जो सोचती है कि उस के सारे दुखों को दूर करने का मंत्र मंदिर या उस के पंडों के पास है, इस पर खूब खुश हुई. अब एकएक कर के सख्त जीएसटी कानून में ढीलें देनी पड़ रही हैं.

इस साल निर्मला सीतारमन ने अमीरों पर 7 फीसदी का टैक्स बढ़ाया था. 3 महीने में उन की हेकड़ी निकल गई और टैक्स वापस ही नहीं लिया गया कुछ छूट और दे दी गई.

‘एक देश एक संविधान एक कानून’ के नाम पर कश्मीर के बारे में अनुच्छेद 370 और 35ए को संविधान से लगभग हटाया गया, पर क्या हुआ? न कश्मीरी लड़कियां देश के बाकी हिस्से के तैयार बैठे भगवाई सोशल मीडिया रणबांकुरों को मिलीं, न ही कश्मीर में जमीन के प्लाट. उलटे देश अरबों रुपए खर्च कर के एक विशाल जेल चला रहा है जहां खाना भी कैदियों को नहीं दिया जा रहा. जो किया गया और जैसे किया गया, उस से साफ है कि 2 पीढ़ी तक तो कश्मीरी भारत को अपना नहीं समझेगा, दूसरे दर्जे का नागरिक बन कर रहना पड़ेगा. आखिर इसी देश का हिंदू सवर्ण भी तो 2000 साल गुलाम बन कर रहा है, कभी शकों का, कभी हूणों का, कभी लोधियों का, कभी मुगलों का और आखिर में अंगरेजों का.

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आज भी देश का पिछड़ा और दलित वर्ग दूसरे दर्जे का नागरिक है. इन में अब कश्मीरी भी शामिल हो गए हैं.

आतंकवादी सीमा के बाहर से नहीं आ रहे. वे छत्तीसगढ़ के जंगलों में भी नहीं हैं. वे नक्सलबाड़ी में भी नहीं हैं और न ही दिल्ली की जानीमानी संस्था जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हैं. वे हमारे देश के सैकड़ों थानों में हैं, पुलिस की वरदी में. उत्तर प्रदेश के पिलखुआ के इलाके के एक थाने में एक सिक्योरिटी गार्ड की घंटों की पिटाई के बाद हुई मौत का समाचार तो यही कहता है कि घरघर, महल्लेमहल्ले में यदि किसी आतंकवादी से डर लगना चाहिए तो वह खाकी वरदी में आने वाले से लगना चाहिए.

इस गार्ड प्रदीप तोमर को पुलिस चौकी में बुलाया गया था पूछताछ के लिए. प्रदीप तोमर अपने 10 साल के बेटे को साथ ले गया था. बेटे को बाहर बैठा कर अंदर चौकी में 8-10 पुलिस वालों ने घंटों उसे मारापीटा और उस पर पेचकशों से हमला किया. दर्द से कराहते प्रदीप तोमर को पानी तक नहीं दिया गया और तब तक मारा गया जब तक वह मर नहीं गया. उस की लाश पर पिटाई और पेचकशों के निशान मौजूद थे.

इन आतंकवादियों को पूरे शासन के सिस्टम का बचाव मिलता है. कोई किसी को 4 थप्पड़ मार दो तो पुलिस वाले पिटने वाले और पीटने वाले दोनों के लिए 10 दिन की रिमांड ले लेते हैं, पर यहां एक आदमी को वहशियाना तरीके से मारने के बाद सिर्फ सस्पैंड किया गया है. 10-20 दिन में जब लोग इस मामले को भूल जाएंगे, ये पुलिसकर्मी नए शिकार की तलाश में लग जाएंगे पूरी वरदी में.

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हिंदी फिल्म ‘दृश्यम’ में इसी तरह की एक महिला आईजी और उस के पुलिसकर्मियों की क्रूरता को अच्छीखासी तरह दिखाया गया था और फिल्म बनाने वाले ने सिर्फ नौकरी से निकलने की सजा दिखाई थी. जेल में पुलिस वाले जाएं, यह तो हम क्या, दुनिया के किसी देश में नहीं दिखाया जा सकता. यही तो पुलिस वालों को आतंकवादी बनाता है.

आतंकवादियों और पुलिस वालों के आतंक के पीछे सोच एक ही है. आतंकवादी भी तो यही कहते हैं कि वे जुल्म ढहाने वाली सरकार के खिलाफ काम कर रहे हैं. वे लुटेरे नहीं, डाकू नहीं, जनता को बचाने के लिए हत्याएं कर रहे हैं. पुलिस वाले भी यही कहते हैं कि वे जनता को बचाने के लिए चोरउचक्कों से जबरदस्ती उगलवाते हैं और कभीकभी कस्टोडियल डैथ हो जाए तो क्या हो गया?

जैसे आजकल नाथूराम गोडसे को पूजा जाने लगा है, वैसे ही आतंकवादियों को हो सकता है कभी पूजा जाने लगे. पुलिस वालों को तो वहशीपन के बावजूद इज्जत और पैसा दोनों एकदम मिल जाते हैं न.

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घूस की मार से देश बीमार

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के गोहपारु थाने के असिस्टैंट सब इंस्पैक्टर एम एल शुक्ला को 7 मई को लोकायुक्त पुलिस, रीवा ने 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा. मारपीट के एक मामले को रफादफा करने के लिए आरोपी से यह घूस ली जा रही थी.

शाजापुर जिले के आगर मालवा के ब्लौक मैडिकल औफिसर डा. आर एल मालवीय को 9 मई को 250 रुपए की घूस लेते वक्त लोकायुक्त पुलिस उज्जैन द्वारा गिरफ्तार किया गया. सेमली गांव निवासी सरकारी तौर पर घोषित एक गरीब आदमी अनवर खां की 10 वर्षीय बेटी फरजाना के कान में चांदी का घुंघरू फंस गया था, अस्पताल में इलाज के लिए ले जाने पर उक्त डाक्टर ने 450 रुपए मांगे थे.

9 मई को ही शाजापुर के गांव अकोदिया के पटवारी संतोष सोलंकी को उज्जैन लोकायुक्त ने एक किसान से 3 हजार रुपए की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा. घूस नामांतरण के लिए ली गई थी. सौदा कुल 8 हजार रुपए में तय हुआ था जिस में से 5 हजार रुपए पीडि़त किसान पूर्व में उक्त पटवारी को दे चुका था.उज्जैन जनपद पंचायत के सहायक मंत्री कमल सिंह सिसौदिया को 20 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों लोकायुक्त द्वारा पकड़ा गया. नयागांव के सरपंच नरेंद्र सिंह से यह रिश्वत एक सरकारी इमारत बनवाने की इजाजत के लिए ली गई थी. कुल सौदा 1 लाख रुपए में तय हुआ था.

भोपाल में 8 मई को स्कूली शिक्षा विभाग के एक ब्लौक एकेडमिक  कोऔर्डिनेटर विक्रम सिंह प्रजापति को लोकायुक्त ने 4 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों गिरफ्तार किया. यह घूस एक स्कूल को मान्यता देने के एवज में मांगी गई थी. भोपाल के टीटी नगर इलाके में बीआरसी यानी विकास खंड स्रोत समन्वय कार्यालय है. यह विभाग स्कूलों का निरीक्षण तयशुदा मानदंडों पर करता है. कुछ दिन पहले वी एस प्रजापति ने निजामुद्दीन कालोनी स्थित स्कौलर स्कूल का निरीक्षण किया था और मान्यता देने के लिए 4 हजार रुपए एस ए अहमद नाम के शिक्षक से मांगे थे.

8 मई को मंदसौर जिले के पीपल्या मंडी शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य जे के डोसी को लोकायुक्त दल द्वारा 4 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों गिरफ्तार किया गया. यह रिश्वत राकेश काबरा, कमलेश पाटीदार और संजय पंवार नाम के अनुबंधित शिक्षकों से पिछले डेढ़ महीने की पगार निकालने के बाबत ली गई थी.

3 दिन में रिश्वत के ये 7 बड़े मामले केवल मध्य प्रदेश के हैं. राज्य में औसतन हर दिन 2 मुलाजिम घूस लेते रंगेहाथों पकड़े जाते हैं. पकड़े गए 90 फीसदी मुलाजिम छोटे पद वाले होते हैं. 10 फीसदी ही बड़े यानी मगरमच्छ होते हैं जिन से करोड़ोंअरबों की नामीबेनामी संपत्ति और नकदी जब्त होती है. साल 2013 में 15 मई तक 300 से भी ज्यादा सरकारी कर्मचारी घूस लेते पकड़े गए.

ये मामले चिंतनीय इस लिहाज से भी हैं कि घूस लेने के तौरतरीके तेजी से बदल रहे हैं और न पकड़े जाने वाले मामलों की तादाद जाहिराना तौर पर लाख गुना ज्यादा होगी. वजह, सभी लोग शिकायत नहीं करते हैं.

घूस के नए तौरतरीके

तेजी से पनपती घूसखोरी के सियासी नतीजे क्या होंगे यह तो कहना अभी मुश्किल है पर आगर मालवा के ब्लौक मैडिकल औफिसर आर एस मालवीय ने तो शर्मोहया की सारी हदें पार कर दीं. अनवर खां गरीबी रेखा कार्डधारी (बीपीएल) है यानी मुश्किल से कमाखा पाता है. एक दिन बेटी के कान में चांदी का घुंघरू फंस गया. वह बेटी को ले कर सरकारी अस्पताल पहुंचा जहां डाक्टर साहब ने उस की हैसियत देखते हुए केवल 450 रुपए रिश्वत के मांगे. अनवर की जेब में उस वक्त महज

100 रुपए थे जो उस ने तुरंत ईमानदारी से दे दिए और बचे 350 रुपए बाद में देने का वादा कर लिया. बेटी की तकलीफ दूर करने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. डाक्टर साहब ने तो उस की गरीबी देखते भारी डिस्काउंट भी दे दिया था, दूसरी सहूलियत यह दी कि रिश्वत में भी उधारी कर दी. अस्पताल न हुआ बनिए की दुकान हो गई कि किराने का सामान ले जाओ, पैसे बाद में जब हों, दे देना.

2 दिन बाद दूसरी दफा वह बेटी को दिखाने गया तो घूसखोर डाक्टर साहब बकाया पैसे न मिलने पर ?ाल्ला उठे और 10 वर्षीय फरजाना को अस्पताल में ही यह कहते बैठा लिया कि बेटी छोड़ जाओ, जब पैसों का इंतजाम हो जाए तो अपनी बेटी को ले जाना. बेचारी मासूम फरजाना घंटों बंधक बनी रही या गिरवी रही. इस बात से अनवर परेशान हो गया. उसे कुछ सू?ा नहीं रहा था कि क्या करे तभी किसी ने उसे समझ कर लोकायुक्त कार्यालय का रास्ता बता दिया, तब कहीं जा कर बिटिया को वह डाक्टर के चंगुल से छुड़ा पाया.

पुराने जमाने में ऐसा होता था कि सूदखोर किसानों को भारीभरकम ब्याज पर कर्ज देते थे और उस के एवज में किसान परिवार से उस के ही खेतों में मजदूरी करा कर सारी उपज हड़प जाते थे. किसान और उस का परिवार मजदूरी करने के लिए जिंदा रहें, इतना भर खाने को देते थे. ऐसा आज भी होता है, फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब लोग घूस में औलाद को भी गिरवी रखने लगे हैं. गहने, जायदाद भी घूस में चलते हैं, यह बात भोपाल के एक वरिष्ठ तहसीलदार स्वीकारते हुए बताते हैं कि नामांतरण, खसराखतौनी की नकल, बंटवारे वगैरह जैसे जरूरी कामों में राजस्व विभाग नकदी का मुहताज नहीं, उस के होनहार मुलाजिम सोनेचांदी के गहने ले कर किसान का काम कर देते हैं. मुरगी अगर ज्यादा मोटी हो तो एकाध एकड़ जमीन की रजिस्ट्री किसी सगेसौतेले रिश्तेदार के नाम करवा कर पीडि़त की परेशानी दूर कर देते हैं.

विदिशा की एक अदालत का बाबू तो घूस की तय रकम पर ब्याज भी लेता है. मुवक्किलों के पास पैसे नहीं होते तो रेट तय कर उसी दिन से 24 फीसदी ब्याज की दर से वह घूस लेता है. अंदाजा है कि इस बाबू को मुकदमेबाजों से तकरीबन 12 लाख रुपए लेने हैं. कुछ मामलों में घूस का लेनदेन चैक और बैंक खातों के नंबरों से भी हुआ है. देने वाले को बैंक अकाउंट नंबर दिया गया और पैसे जमा होने के 8-10 दिन बाद काम किया गया. घूसखोर ने चैक किसी और के नाम से लिया.

किस्तों में घूस

घूस एकमुश्त ही लेंगे, यह जिद घूसखोरों ने कभी की छोड़ दी है. अब अधिकांश घूस किस्तों में ली जाती है जिस से देने वाले को सहूलियत रहे. उज्जैन के असिस्टैंट इंजीनियर कमल सिंह सिसोदिया ने भवन निर्माण हेतु सौदा 1 लाख रुपए में सरपंच नरेंद्र सिंह से तय किया था. मजबूरी जताए जाने पर किस्तों में घूस लेने के लिए राजी हो गए और पहली दफा में ही धरे गए. घूसखोरों की मनोवृत्ति जानने वाले भोपाल के समाजशास्त्र के एक प्रोफैसर की मानें तो यह इंजीनियर अपनी गिरफ्तारी या बदनामी पर कम बाकी 80 हजार रुपए डूबने पर ज्यादा दुखी रहा होगा. शुजालपुर का पटवारी संतोष सोलंकी इस मामले में बाजी मार गया. वह किसान से 5 हजार रुपए पहले ही सफलतापूर्वक ले चुका था.

शहडोल के एएसआई एम एल शुक्ला को भी किस्तों में घूस लेने की दयानतदारी भारी पड़ी. यह एएसआई आरोपी से 5 हजार रुपए पहले ही ले चुका था. बचे 3 हजार रुपए का लालच न छूटा तो आरोपी ने लोकायुक्त में शिकायत कर दी.

रतलाम की बिजली कंपनी का बाबू बालाराम काकड़ तो हवन करते ही हाथ जला बैठा. बिल पास करने के लिए घूस दरअसल में मांगी कार्यपालन यंत्री ए के सिंह ने थी जो इत्तेफाक से उस दिन दफ्तर में नहीं थे. लेकिन बालाराम ने अपने कमीशन के लालच में खुद 11 हजार रुपए ले लिए और पकड़ा गया. हालांकि मामला ए के सिंह के खिलाफ भी दर्ज हुआ.

कौनकौन लेता है घूस

बालाराम तो मातहत था और जानता था कि ऐसे बिल बगैर नजराने के पास नहीं होते. गाड़ी किराए पर लेते वक्त भी बिजली कंपनियों और दूसरे सरकारी दफ्तर वाले घूस लेते हैं और हर दफा बिल पास करने पर भी पैसों का वजन रखना पड़ता है. इस में बाबू का हिस्सा 20-30 फीसदी रहता है. भोपाल के एक ठेकेदार की मानें तो जरूरी नहीं है कि घूस काम करने वाला ही ले. अब तो अधिकारी लोग एहतियात बरतते हैं और बारबार जगह और नाम बदलते रहते हैं. यह ठेकेदार बताता है, ‘‘मुझे एक बार लगभग 2 लाख रुपए का बिल पास कराने के लिए एक इंजीनियर साहब को 30 हजार रुपए देने थे तो वे बोले, ‘मेरा साला आप के घर से आ कर रुपए ले जाएगा.’ मैं इंतजार करता रहा, साहब का साला नहीं आया तो मैं घबराया कि कहीं उन्होंने घूस लेने का इरादा न बदल लिया हो. वजह, मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी क्योंकि पैसा सीमेंट वाले को देना था. जब दोबारा फोन किया तो होशंगाबाद रोड के एक बंगले का पता बताते हुए बोले, ‘यहां के लैटरबौक्स में डाल आओ.’ मैं समझ गया कि साहब घबराए हुए हैं. लिहाजा, जैसा उन्होंने कहा, वैसा ही मैं ने किया.’’

कई लोग बीवीबच्चों, नजदीकी रिश्तेदारों या भरोसेमंद दोस्तों के जरिए घूस लेते हैं. आजकल नया चलन कार में पैसे रखवाने का जोर पकड़ रहा है. रिश्वत देने वाले को बता दिया जाता है कि फलां कार में पैसे रख आओ और मुड़ कर मत देखना. जाहिर है घूसखोर आसपास ही कहीं होता है, और गाड़ी पर उस की नजर रहती है. नजारा पुरानी हिंदी फिल्मों के उन दृश्यों सरीखा होता है जिन में डाकू और स्मगलर पैसे वाला ब्रीफकेस ले कर शंकरजी के पुराने मंदिर या किसी खंडहर में देने वाले को बुलाते हैं. वैसे भी घूसखोरों, चोरलुटेरों और  स्मगलर्स में कोई खास फर्क नहीं है सिवा इस के कि घूसखोर समाज का सम्मानजनक नागरिक माना जाता है.

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