Emotional Family Story : त्रिशंकु

Emotional Family Story. नवीन को बाजार में बेकार घूमने का शौक कभी नहीं रहा, वह तो सामान खरीदने के लिए उसे मजबूरी में बाजारों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. घर की छोटीछोटी वस्तुएं कब खत्म होतीं और कब आतीं, उसे न तो कभी इस बात से सरोकार रहा, न ही दिलचस्पी. उसे तो हर चीज व्यवस्थित ढंग से समयानुसार मिलती रही थी.

हर महीने घर में वेतन दे कर वह हर तरह के कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता था. शुरूशुरू में वह ज्यादा तटस्थ था लेकिन बाद में उम्र बढ़ने के साथ जब थोड़ी गंभीरता आई तो अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझने लगा था.

बाजार से खरीदारी करना उसे कभी पसंद नहीं आया था. लेकिन विडंबना यह थी कि महज वक्त काटने के लिए अब वह रास्तों की धूल फांकता रहता. साइन बोर्ड पढ़ता, दुकानों के भीतर ऐसी दृष्टि से ताकता, मानो सचमुच ही कुछ खरीदना चाहता हो.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

दफ्तर से लौट कर घर जाने को उस का मन ही नहीं होता था. खाली घर काटने को दौड़ता. उदास मन और थके कदमों से उस ने दरवाजे का ताला खोला तो अंधेरे ने स्वागत किया. स्वयं बत्ती जलाते हुए उसे झुंझलाहट हुई. कभी अकेलेपन की त्रासदी यों भोगी नहीं थी. पहले मांबाप के साथ रहता था, फिर नौकरी के कारण दिल्ली आना पड़ा और यहीं विवाह हो गया था.

पिछले 8 वर्षों से रुचि ही घर के हर कोने में फुदकती दिखाई देती थी. फिर अचानक सबकुछ उलटपुलट हो गया. रुचि और उस के संबंधों में तनाव पनपने लगा. अर्थहीन बातों को ले कर झगड़े हो जाते और फिर सहज होने में जितना समय बीतता, उस दौरान रिश्ते में एक गांठ पड़ जाती. फिर होने यह लगा कि गांठें खुलने के बजाय और भी मजबूत सी होती गईं.

सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए नवीन ने फ्रिज खोला और बोतल सीधे मुंह से लगा कर पानी पी लिया. उस ने सोचा, अगर रुचि होती तो फौरन चिल्लाती, ‘क्या कर रहे हो, नवीन, शर्म आनी चाहिए तुम्हें, हमेशा बोतल जूठी कर देते हो.’

तब वह मुसकरा उठता था, ‘मेरा जूठा पीओगी तो धन्य हो जाओगी.’ ‘बेकार की बकवास मत किया करो, नाहक ही अपने मुंह की सारी गंदगी बोतलों में भर देते हो.’

यह सुन कर वह चिढ़ जाता और एकएक कर पानी की सारी बोतलें निकाल जूठी कर देता. तब रुचि सारी बोतलें निकाल उन्हें दोबारा साफ कर, फिर भर कर फ्रिज में रखती.

जब बच्चे भी उस की नकल कर ऐसा करने लगे तो रुचि ने अपना अलग घड़ा रख लिया और फ्रिज का पानी पीना ही छोड़ दिया. कुढ़ते हुए वह कहती, ‘बच्चों को भी अपनी गंदी आदतें सिखा दो, ताकि बड़े हो कर वे गंवार कहलाएं. न जाने लोग पढ़लिख कर भी ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं?’

बच्चों का खयाल आते ही उस के मन के किसी कोने में हूक उठी, उन के बिना जीना भी कितना व्यर्थ लगता है.

रुचि जब जाने लगी थी तो उस ने कितनी जिद की थी, अनुनय की थी कि वह बच्चों को साथ न ले जाए. तब उस ने व्यंग्यपूर्वक मुंह बनाते हुए कहा था, ‘ताकि वे भी तुम्हारी तरह लापरवाह और अव्यवस्थित बन जाएं. नहीं नवीन, मैं अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती. मैं उन्हें एक सभ्य व व्यवस्थित इंसान बनाना चाहती हूं. फिर तुम्हारे जैसा मस्तमौला आदमी उन की देखभाल करने में तो पूर्ण अक्षम है. बिस्तर की चादर तक तो तुम ढंग से बिछा नहीं सकते, फिर बच्चों को कैसे संभालोगे?’

नवीन सोचने लगा, न सही सलीका, पर वह अपने बच्चों से प्यार तो भरपूर करता है. क्या जीवन जीने के लिए व्यवस्थित होना जरूरी है?

रुचि हर चीज को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने की आदी थी.

विवाह के 2 वर्षों बाद जब स्नेहा पैदा हुई थी तो वह पागल सा हो गया था. हर समय गोदी में लिए उसे झुलाता रहता था. तब रुचि गुस्सा करती, ‘क्यों इस की आदत बिगाड़ रही हो, गोदी में रहने से इस का विकास कैसे होगा?’

रुचि के सामने नवीन की यही कोशिश रहती कि स्नेहा के सारे काम तरतीब से हों पर जैसे ही वह इधरउधर होती, वह खिलंदड़ा बन स्नेहा को गुदगुदाने लगता. कभी घोड़ा बन जाता तो कभी उसे हवा में उछाल देता.

वह सोचने लगता कि स्नेहा तो अब 6 साल की हो गई है और कन्नू 3 साल का. इस साल तो वह कन्नू का जन्मदिन भी नहीं मना सका, रुचि ने ही अपने मायके में मनाया था. अपने दिल के हाथों बेबस हो कर वह उपहार ले कर वहां गया था पर दरवाजे पर खड़े उस के पहलवान से दिखने वाले भाई ने आंखें तरेरते हुए उसे बाहर से ही खदेड़ दिया था. उस का लाया उपहार फेंक कर पान चबाते हुए कहा था, ‘शर्म नहीं आती यहां आते हुए. एक तरफ तो अदालत में तलाक का मुकदमा चल रहा है और दूसरी ओर यहां चले आते हो.’

‘मैं अपने बच्चों से मिलना चाहता हूं,’ हिम्मत जुटा कर उस ने कहा था.

‘खबरदार, बच्चों का नाम भी लिया तो. दे क्या सकता है तू बच्चों को,’ उस के ससुर ने ताना मारा था, ‘वे मेरे नाती हैं, राजसी ढंग से रहने के अधिकारी हैं. मेरी बेटी को तो तू ने नौकरानी की तरह रखा पर बच्चे तेरे गुलाम नहीं बनेंगे. मुझे पता होता कि तेरे जैसा व्यक्ति, जो इंजीनियर कहलाता है, इतना असभ्य होगा, तो कभी भी अपनी पढ़ीलिखी, सुसंस्कृत लड़की को तेरे साथ न ब्याहता, वही पढ़ेलिखे के चक्कर में जिद कर बैठी, नहीं तो क्या रईसों की कमी थी. जा, चला जा यहां से, वरना धक्के दे कर निकलवा दूंगा.’

वह अपमान का घूंट पी कर बच्चों की तड़प मन में लिए लौट आया था. वैसे भी झगड़ा किस आधार पर करता, जब रुचि ने ही उस का साथ छोड़ दिया था. वैसे उस के साथ रहते हुए रुचि ने कभी यह नहीं जतलाया था कि वह अमीर बाप की बेटी है, न ही वह कभी अपने मायके जा कर हाथ पसारती थी.

रुचि पैसे का अभाव तो सह जाती थी, लेकिन जब जिंदगी को मस्त ढंग से जीने का सवाल आता तो वह एकदम उखड़ जाती और सिद्धांतों का पक्ष लेती. उस वक्त नवीन का हर समीकरण, हर दलील उसे बेमानी व अर्थहीन लगती. रुचि ने जब अपने लिए घड़ा रखा तो नवीन को महसूस हुआ था कि वह चाहती तो अपने पिता से कह कर अलग से फ्रिज मंगा सकती थी पर उस ने पति का मान रखते हुए कभी इस बारे में सोचा भी नहीं.

नवीन ने रुचि की व्यवस्थित ढंग से जीने की आदत के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश की पर हर बार वह हार जाता. बचपन से ही मां, बाबूजी ने उसे अपने ऊपर इतना निर्भर बना कर रखा था कि वह अपनी तरह से जीना सीख ही न पाया. मां तो उसे अपनेआप पानी भी ले कर नहीं पीने देती थीं. 8 वर्षों के वैवाहिक जीवन में वह उन संस्कारों से छुटकारा नहीं पा सका था.

वैसे भी नवीन, रुचि को कभी संजीदगी से नहीं लेता था, यहां तक कि हमेशा उस का मजाक ही उड़ाया करता था, ‘देखो, कुढ़कुढ़ कर बालों में सफेदी झांकने लगी है.’

तब वह बेहद चिढ़ जाती और बेवजह नौकर को डांटने लगती कि सफाई ठीक से क्यों नहीं की. घर तब शीशे की तरह चमकता था, नौकर तो उस की मां ने जबरदस्ती कन्नू के जन्म के समय भेज दिया था.

सुबह की थोड़ी सब्जी पड़ी थी, जिसे नवीन ने अपने अधकचरे ज्ञान से तैयार किया था, उसी को डबलरोटी के साथ खा कर उस ने रात के खाने की रस्म पूरी कर ली. फिर औफिस की फाइल ले कर मेज पर बैठ गया. बहुत मन लगाने के बावजूद वह काम में उलझ न सका. फिर दराज खोल कर बच्चों की तसवीरें निकाल लीं और सोच में डूब गया, ‘कितने प्यारे बच्चे हैं, दोनों मुझ पर जान छिड़कते हैं.’

एक दिन स्नेहा से मिलने वह उस के स्कूल गया था. वह तो रोतेरोते उस से चिपट ही गई थी, ‘पिताजी, हमें भी अपने साथ ले चलिए, नानाजी के घर में तो न खेल सकते हैं, न शोर मचा सकते हैं. मां कहती हैं, अच्छे बच्चे सिर्फ पढ़ते हैं. कन्नू भी आप को बहुत याद करता है.’

अपनी मजबूरी पर उस की पलकें नम हो आई थीं. इस से पहले कि वह जीभर कर उसे प्यार कर पाता, ड्राइवर बीच में आ गया था, ‘बेबी, आप को मेम साहब ने किसी से मिलने को मना किया है. चलो, देर हो गई तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी.’

उस के बाद तलाक के कागज नवीन के घर पहुंच गए थे, लेकिन उस ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था. मुकदमा उन्होंने ही दायर किया था पर तलाक का आधार क्या बनाते? वे लोग तो सौ झूठे इलजाम लगा सकते थे, पर रुचि ने ऐसा करने से मना कर दिया, ‘अगर गलत आरोपों का ही सहारा लेना है तो फिर मैं सिद्धांतों की लड़ाई कैसे लड़ूंगी?’

तब नवीन को एहसास हुआ था कि रुचि उस से नहीं, बल्कि उस की आदतों से चिढ़ती है. जिस दिन सुनवाई होनी थी, वह अदालत गया ही नहीं था, इसलिए एकतरफा फैसले की कोई कीमत नहीं थी. इतना जरूर है कि उन लोगों ने बच्चों को अपने पास रखने की कानूनी रूप से इजाजत जरूर ले ली थी. तलाक न होने पर भी वे दोनों अलगअलग रह रहे थे और जुड़ने की संभावनाएं न के बराबर थीं.

नवीन बिस्तर पर लेटा करवटें बदलता रहा. युवा पुरुष के लिए अकेले रात काटना बहुत कठिन प्रतीत होता है. शरीर की इच्छाएं उसे कभीकभी उद्वेलित कर देतीं तो वह स्वयं को पागल सा महसूस करता. उसे मानसिक तनाव घेर लेता और मजबूरन उसे नींद की गोली लेनी पड़ती.

उस ने औफिस का काफी काम भी अपने ऊपर ले लिया था, ताकि रुचि और बच्चे उस के जेहन से निकल जाएं. दफ्तर वाले उस के काम की तारीफ में कहते हैं, ‘नवीन साहब, आप का काम बहुत व्यवस्थित होता है, मजाल है कि एक फाइल या एक कागज, इधरउधर हो जाए.’

वह अकसर सोचता, घर पहुंचते ही उसे क्या हो जाया करता था, क्यों बदल जाता था उस का व्यक्तित्व और वह एक ढीलाढाला, अलमस्त व्यक्ति बन जाता था?

मेजकुरसी के बजाय जब वह फर्श पर चटाई बिछा कर खाने की फरमाइश करता तो रुचि भड़क उठती, ‘लोग सच कहते हैं कि पृष्ठभूमि का सही होना बहुत जरूरी है, वरना कोई चाहे कितना पढ़ ले, गांव में रहने वाला रहेगा गंवार ही. तुम्हारे परिवार वाले शिक्षित होते तो संभ्रांत परिवार की झलक व आदतें खुद ही ही तुम्हारे अंदर प्रकट हो जातीं पर तुम ठहरे गंवार, फूहड़. अपने लिए न सही, बच्चों के लिए तो यह फूहड़पन छोड़ दो. अगर नहीं सुधर सकते तो अपने गांव लौट जाओ.’

उस ने रुचि को बहुत बार समझाने की कोशिश की कि ग्वालियर एक शहर है न कि गांव. फिर कुरसी पर बैठ कर खाने से क्या कोई सभ्य कहलाता है.

‘देखो, बेकार के फलसफे झाड़ कर जीना मुश्किल मत बनाओ.’ ‘अरे, एक बार जमीन पर बैठ कर खा कर देखो तो सही, कुरसीमेज सब भूल जाओगी.’

नवीन ने चम्मच छोड़ हाथ से ही चावल खाने शुरू कर दिए थे.

‘बस, बहुत हो गया, नवीन, मैं हार गई हूं. 8 वर्षों में तुम्हें सुधार नहीं पाई और अब उम्मीद भी खत्म हो गई है. बाहर जाओ तो लोग मेरी खिल्ली उड़ाते हैं, मेरे रिश्तेदार मुझ पर हंसते हैं. तुम से तो कहीं अच्छे मेरी बहनों के पति हैं, जो कम पढ़ेलिखे ही सही, पर शिष्टाचार के सारे नियमों को जानते हैं. तुम्हारी तरह बेवकूफों की तरह बच्चों के लिए न तो घोड़े बनते हैं, न ही बर्फ की क्यूब निकाल कर बच्चों के साथ खेलते हैं. लानत है, तुम्हारी पढ़ाई पर.’

नवीन कभी समझ नहीं पाया था कि रुचि हमेशा इन छोटीछोटी खुशियों को फूहड़पन का दरजा क्यों देती है? वैसे, उस की बहनों के पतियों को भी वह बखूबी जानता था, जो अपनी टूटीफूटी, बनावटी अंगरेजी के साथ हंसी के पात्र बनते थे, पर उन की रईसी का आवरण इतना चमकदार था कि लोग सामने उन की तारीफों के पुल बांधते रहते थे.

शादी से पहले उन दोनों के बीच 1 साल तक रोमांस चला था. उस अंतराल में रुचि को नवीन की किसी भी हरकत से न तो चिढ़ होती थी, न ही फूहड़पन की झलक दिखाई देती थी, बल्कि उस की बातबात में चुटकुले छोड़ने की आदत की वह प्रशंसिका ही थी. यहां तक कि उस के बेतरतीब बालों पर वह रश्क करती थी. उस समय तो रास्ते में खड़े हो कर गोलगप्पे खाने का उस ने कभी विरोध नहीं किया था.

नींद की गोली के प्रभाव से वह तनावमुक्त अवश्य हो गया था, पर सो न सका था. चिडि़यों की चहचहाहट से उसे अनुभव हुआ कि सवेरा हो गया है और उस ने सोचतेसोचते रात बिता दी है.

चाय का प्याला ले कर अखबार पढ़ने बैठा, पर सोच के दायरे उस की तंद्रा को भटकाने लगे. प्लेट में चाय डालने की उसे इच्छा ही नहीं हुई, इसलिए प्याले से ही चाय पीने लगा.

शादी के बाद भी सबकुछ ठीक था. उन के बीच न तो तनाव था, न ही सामंजस्य का अभाव. दोनों को ही ऐसा नहीं लगा था कि विपरीत आदतें उन के प्यार को कम कर रही हैं. नवीन भूल से कभी कोई कागज फाड़ कर कचरे के डब्बे में फेंकने के बजाय जमीन पर डाल देता तो रुचि झुंझलाती जरूर थी पर बिना कुछ कहे स्वयं उसे डब्बे में डाल देती थी. तब उस ने भी इन हरकतों को सामान्य समझ कर गंभीरता से नहीं लिया था.

अपने सीमित दायरे में वे दोनों खुश थे. स्नेहा के होने से पहले तक सब ठीक था. रुचि आम अमीर लड़कियों से बिलकुल भिन्न थी, इसलिए स्वयं घर का काम करने से उसे कभी दिक्कत नहीं हुई.

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

Sarita

हां, स्नेहा के होने के बाद काम अवश्य बढ़ गया था पर झगड़े नहीं होते थे. लेकिन इतना अवश्य हुआ था कि स्नेहा के जन्म के बाद से उन के घर में रुचि की मां, बहनों का आना बढ़ गया था. उन लोगों की मीनमेख निकालने की आदत जरूरत से ज्यादा ही थी. तभी से रुचि में परिवर्तन आने लगा था और पति की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. यहां तक कि वह उस के कपड़ों के चयन में भी खामियां निकालने लगी थी.

उन का विवाह रुचि की जिद से हुआ था, घर वालों की रजामंदी से नहीं. यही कारण था कि वे हर पल जहर घोलने में लगे रहते थे और उन्हें दूर करने, उन के रिश्ते में कड़वाहट घोलने में सफल हो भी गए थे.

काम करने वाली महरी दरवाजे पर आ खड़ी हुई तो वह उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा कि उस से ही कितनी बार कहा है कि जरा रोटी, सब्जी बना दिया करे. लेकिन उस के अपने नखरे हैं. ‘बाबूजी, अकेले आदमी के यहां तो मैं काम ही नहीं करती, वह तो बीबीजी के वक्त से हूं, इसलिए आ जाती हूं.’

नौकर को एक बार रुचि की मां ले गई थी, फिर वापस भेजा नहीं. तभी रुचि ने यह महरी रखी थी नवीन के बाबूजी को गुजरे 7 साल हो गए थे. मां वहीं ग्वालियर में बड़े भाई के पास रहती थीं. भाभी एक सामान्य घर से आई थीं, इसलिए कभी तकरार का प्रश्न ही न उठा. उस के पास भी मां मिलने कई बार आईं, पर रुचि का सलीका उन के सरल जीवन के आड़े आने लगा. वे हर बार महीने की सोच कर हफ्ते में ही लौट जातीं. वह तो यह अच्छा था कि भाभी ने उन्हें कभी बोझ न समझा, वरना ऐसी स्थिति में कोई भी अपमान करने से नहीं चूकता.

वैसे, रुचि का मकसद उन का अपमान करना कतई नहीं होता था, लेकिन सभ्य व्यवहार की तख्ती अनजाने में ही उन पर यह न करो, वह न करो के आदेश थोपती तो मां हड़बड़ा जातीं. इतनी उम्र कटने के बाद उन का बदलना सहज न था. वैसे भी उन्होंने एक मस्त जिंदगी गुजारी थी, जिस में बच्चों को प्यार से पालापोसा था, हाथ में हर समय आदेश का डंडा ले कर नहीं.

रुचि के जाने के बाद उस ने मां से कहा था कि वे अब उसी के पास आ कर रहें, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया था, ‘बेटा, तेरे घर में कदम रखते डर लगता है, कोई कुरसी भी खिसक जाए तो…न बाबा. वैसे भी यहां बच्चों के बीच अस्तव्यस्त रहते ज्यादा आनंद आता है. मैं वहां आ कर क्या करूंगी, इन बूढ़ी हड्डियों से काम तो होता नहीं, नाहक ही तुझ पर बोझ बन जाऊंगी.’

रुचि के जाने के बाद नवीन ने उस के मायके फोन किया था कि वह अपनी आदतें बदलने की कोशिश करेगा, बस एक बार मौका दे और लौट आए. पर तभी उस के पिता की गर्जना सुनाई दी थी और फोन कट गया था. उस के बाद कभी रुचि ने फोन नहीं उठाया था, शायद उसे ऐसी ही ताकीद थी. वह तो बच्चों की खातिर नए सिरे से शुरुआत करने को तैयार था पर रुचि से मिलने का मौका ही नहीं मिला था.

शाम को दफ्तर से लौटते वक्त बाजार की ओर चला गया. अचानक साडि़यों की दुकान पर रुचि नजर आई. लपक कर एक उम्मीद लिए अंदर घुसा, ‘हैलो रुचि, देखो, मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं. मेरी बात सुनो.’

पर रुचि ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम अपनी मनमानी करते रहे हो, अब भी करो. मैं वापस नहीं आऊंगी. और कभी मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’

‘ठीक है,’ नवीन को भी गुस्सा आ गया था, ‘मैं बच्चों से मिलना चाहता हूं, उन पर मेरा भी अधिकार है.’

‘कोई अधिकार नहीं है,’ तभी न जाने किस कोने से उस की मां निकल कर आ गई थी, ‘वे कानूनी रूप से हमारे हैं. अब रुचि का पीछा छोड़ दो. अपनी इच्छा से एक जाहिल, गंवार से शादी कर वह पहले ही बहुत पछता रही है.’

‘मैं रुचि से अकेले में बात करना चाहता हूं,’ उस ने हिम्मत जुटा कर कहा. ‘पर मैं बात नहीं करना चाहती. अब सबकुछ खत्म हो चुका है.’

उस ने आखिरी कोशिश की थी, पर वह भी नाकामयाब रही. उस के बाद कभी उस के घर, बाहर, कभी बाजार में भी खूब चक्कर काटे पर रुचि हर बार कतरा कर निकल गई.

नवीन अकसर सोचता, ‘छोटीछोटी अर्थहीन बातें कैसे घर बरबाद कर देती हैं. रुचि इतनी कठोर क्यों हो गई है कि सुलह तक नहीं करना चाहती. क्यों भूल गई है कि बच्चों को तो बाप का प्यार भी चाहिए. गलती किसी की भी नहीं है, केवल बेसिरपैर के मुद्दे खड़े हो गए हैं.

‘तलाक नहीं हुआ, इसलिए मैं दोबारा शादी भी नहीं कर सकता. बच्चों की तड़प मुझे सताती रहेगी. रुचि को भी अकेले ही जीवन काटना होगा. लेकिन उसे एक संतोष तो है कि बच्चे उस के पास हैं. दोनों की ही स्थिति त्रिशंकु की है, न वापस बीते वर्षों को लौटा सकते हैं न ही दोबारा कोशिश करना चाहते हैं. हाथ में आया पछतावा और अकेलेपन की त्रासदी. आखिर दोषी कौन है, कौन तय करे कि गलती किस की है, इस का भी कोई तराजू नहीं है, जो पलड़ों पर बाट रख कर पलपल का हिसाब कर रेशेरेशे को तौले.

वैसे भी एकदूसरे पर लांछन लगा कर अलग होने से तो अच्छा है हालात के आगे झुक जाएं. रुचि सही कहती थी, ‘जब लगे कि अब साथसाथ नहीं रह सकते तो असभ्य लोगों की तरह गालीगलौज करने के बजाय एकदूसरे से दूर हो जाएं तो अशिक्षित तो नहीं कहलाएंगे.’

रुचि को एक बरस हो गया था और वह पछतावे को लिए त्रिशंकु की भांति अपना एकएक दिन काट रहा था. शायद अभी भी उस निपट गंवार, फूहड़ और बेतरतीब इंसान के मन में रुचि के वापस आने की उम्मीद बनी हुई थी.

वह सोचने लगा कि रुचि भी तो त्रिशंकु ही बन गई है. बच्चे तक उस के खोखले सिद्धांतों व सनक से चिढ़ने लगे हैं. असल में दोषी कोई नहीं है, बस, अलगअलग परिवेशों से जुड़े व्यक्ति अगर मिलते भी हैं तो सिर्फ सामंजस्य के धरातल पर, वरना टकराव अनिवार्य ही है.

क्या एक दिन रुचि जब अपने एकांतवास से ऊब जाएगी, तब लौट आएगी? उम्मीद ही तो वह लौ है जो अंत तक मनुष्य की जीते रहने की आस बंधाती है, वरना सबकुछ बिखर नहीं जाता. प्यार का बंधन इतना कमजोर नहीं जो आवरणों से टूट जाए, जबकि भीतरी परतें इतनी सशक्त हों कि हमेशा जुड़ने को लालायित रहती हों. कभी न कभी तो उन का एकांतवास अवश्य ही खत्म होगा. Emotional Family Story

Family Story : दुनिया बदल गई

Family Story. कोरोना ने भुवन रावत और उन के परिवार को चंड़ीगढ़ से दोबारा उन के पहाड़ी गांव में पहुंचा दिया. वहां भुवन ने दूध का धंधा किया जिस में उन के दोस्त भोला ने काफी मदद की. इस बीच भोला और उर्मिला नजदीक आ गए. आगे क्या हुआ?

औरत हमेशा आदमी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की कोशिश करती है. कितनी भी मुसीबतें आ जाएं वह उस की हिम्मत बनाए रहती है. वह अपने आदमी को हारते हुए देखना नहीं चाहती.

वह औरत हिम्मत, साहस और संघर्ष का प्रतीक है. वह अपने परिवार रूपी घोंसले को कभी भी टूटते हुए देखना नहीं चाहती. इस के लिए कुदरत ने उसे कला कौशल प्रदान किए हैं और इन्हीं कलाओं से वह अपने नीड़ को संवार कर रखती है.

फिर भी कुछ अलग कहानी बन ही जाती है, इसीलिए शायद कहते हैं कि कुदरत के खेल निराले होते हैं, इनसान की सोच से भी परे. शायद यही कुदरत का वह रहस्यमयी चेहरा है, जिसे इनसान सदियों से पढ़ने की कोशिश में लगा है.

पौड़ी गढ़वाल में एक छोटा सा कसबा है बैजरो. पहाड़ों के बीच और एक छोटी नदी के दोनों किनारों पर बसा सुंदर सा कसबा. उसी कसबे के थे भुवन रावत और उन की पत्नी थी उर्मिला रावत. अब भुवन रावत चंडीगढ़ में अपने परिवार के साथ रहते थे.

चंडीगढ़ में रहते उन्हें लगभग 10 साल हो गए थे. वहां एक जानीमानी कंपनी में वे जूनियर इंजीनियर थे. उन की पत्नी उर्मिला ने भी एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करनी शुरू कर दी थी. वह जूनियर स्कूल के बच्चों को पढ़ाती थी. दोनों पतिपपत्नी अभी 38 और 35 साल के थे और उन के 3 बच्चे थे.

भुवन रावत का परिवार साल में 1-2 बार बैजरो हो आता था, जहां भुवन के बुजुर्ग मातापिता और सगेसंबंधी रहते थे.

चंडीगढ़ में भुवन रावत का परिवार आराम से किराए के फ्लैट में रह रहा था. उन की जिंदगी में कोई खास परेशानी नहीं थी. वर हर महीने अपने बुजुर्ग मातापिता को खर्चा भी भेज देते थे, लेकिन मुसीबतें कभी भी बता कर नहीं आतीं.

ऐसे ही दबे पांव कोरोना आया. बड़ेबड़े ज्योतिष, भविष्यवक्ता और वैज्ञानिक भी इस के बारे में सटीक भविष्यवाणी और आकलन न कर सके. भ्रामक जानकारियां आती रहीं और कोरोना किसी भयंकर आदमखोर की तरह इनसानों को निगलने लगा. लकड़बग्घों के मजबूत जबड़ों की तरह नौकरियों और कामधंधों को चबाने लगा. सब तरफ आफत की मार.

आखिरकार एक दिन भुवन रावत की कंपनी वालों ने भी उन से इस्तीफा लिखवा लिया. उर्मिला को तो स्कूल वालों ने बिना किसी औपचारिकता के ही घर बैठा दिया.

देशदुनिया में कहीं भी कुछ हो सब से पहले गाज स्कूलों पर ही गिरती है. स्कूल बंद, स्कूल बंद और स्कूल बंद. शिक्षा को सरकारों ने तमाशा बना कर रख दिया है.

भुवन और उर्मिला की नौकरी गई तो फ्लैट का किराया भरना भी मुश्किल लगने लगा. जमापूंजी तिनकों की तरह उड़ने लगी. लोकडाउन की अनिश्चितता ने भुवन जैसे लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा.

भुवन ने कुछ कंपनियों में अपना बायोडाटा भेजा था, लेकिन उन्हें जल्दी ही मालूम हो गया कि कहीं से कोई जवाब आने वाला नहीं.

कंपनियां धड़ाधड़ कर्मचारियों की छंटनी कर रही थीं. बचेखुचे कर्मचारियों से कमरतोड़ ‘वर्क फ्रोम होम’ करवाया जा रहा था. फिर ऐसे समय में उन्हें कौन नौकरी देता?

आखिरकार भुवन ने भी परिवार सहित अपना बोरिया बिस्तर बांधा और मौका देख कर बैजरो जाने की राह पकड़ी. जैसेतैसे वे सब बैजरो पहुंचे, लेकिन इस बार वहां आने में बड़ा फर्क था. जब आप के पास नौकरी होती है तो आप का रुतबा और सम्मान होता है, समाज आप पर गर्व करता है, लेकिन जैसे ही आप की नौकरी जाती है, समाज की नजर भी बदल जाती है. आप दीनहीन से हो जाते हैं.

यही भुवन के साथ हुआ. हर कोई उन से नौकरी खोने के बारे में पूछता और फिर पीठ पीछे उन का मजाक उड़ाया जाता, लेकिन भुवन को तो सब से अधिक चिंता रोजीरोटी के जुगाड़ की थी. पेट भरा हो तो फिर आदमी कुछ और सोच सकता है.

पहाड़ की खेती अब भुवन के बस की बात नहीं थी. कई सालों से उन के खेत बंजर पड़े थे. उन को खेती लायक बनाने में ही बड़ी लागत आने वाली थी. फिर बीज, खाद आदि का खर्चा और उस के बाद बारिश होने का इंतजार. पहाड़ों में सिंचाई के लिए नलकूप तो होते नहीं कि स्विच औन किया और सिंचाई शुरू. वहां की खेती तो आज भी बारिश भरोसे ही है. बारिश न हो तो फसल ही सूख जाए. बारिश समय पर हो जाए तो फसल आने का लंबा इंतजार.

भुवन ने रोजीरोटी कमाने के दूसरे औप्शन भी सोचे, लेकिन उन्हें कुछ भी सही नहीं लगा. तनाव और चिंता की लकीरें उन के चेहरे पर साफ नजर आ रहीं थीं. तब एक रात सोते समय उन की पत्नी उर्मिला ने उन से पूछा, ‘‘क्यों जी, आप इतने परेशान क्यों हैं?’’

‘‘उर्मिला, परेशान न होऊं तो क्या होऊं? अब पैसा ही नहीं बचा. सब तो लोकडाउन में चंडीगढ़ में ही स्वाह हो गया. यह भी भरोसा नहीं कि यह लोकडाउन कब खत्म होगा? हम चंडीगढ़ पहले ही छोड़ देते तो अच्छा होता. कुछ पैसे तो हमारे हाथ में होते.’’

‘‘लेकिन इस में आप की क्या गलती? किसे पता था कि लोकडाउन खत्म ही नहीं होगा. रेलों तक का तो चक्का जाम हो गया.’’

‘‘हां, वह तो है उर्मिला. गलती तो किसी की नहीं. सरकार भी उलझन में है कि लोकडाउन खत्म करे कि नहीं. जो भी हो खानेकमाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा. मैं तो चाय की दुकान ही खोल लेता लेकिन यहां तो पर्यटक ही नहीं आते. गिनेचुने औफिस हैं, वे भी बंद ही चल रहे हैं.’’

उर्मिला जानती थी कि समस्या अनिश्चित और विकराल है और भुवन परेशान हैं. उस ने भुवन को अपने आगोश में लेते हुए और उस के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘तुम ज्यादा चिंता मत करो जी, सब ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद दोनों प्यार की दुनिया में समा गए. उर्मिला जानती थी कि दुख को हरने की सब से अच्छी दवा सैक्स ही है. इस के बाद भुवन तो गहरी नींद सो गया लेकिन उर्मिला परिवार को संबल देने के बारे में सोचने लगी और उसे तब तक नींद नहीं आई जब तक कि वह एक फैसले पर नहीं पहुंच गई.

सुबह को उठ कर उर्मिला ने अपने मायके थैलीसैंण फोन लगाया और अपने पिता से पूछा, ‘‘बाबूजी, आप की दूध, दही और पनीर की दुकान है. कुछ टिप्स बताओ, हम भी लोकडाउन खत्म होने तक यही काम करने की सोच रहे हैं.’’

फिर उर्मिला के पिता ने उसे सारी बातें अच्छे से समझा दीं. उर्मिला ने अपनी योजना भुवन से सांझा की. वे खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह उर्मिला, यह काम तो बहुत सही रहेगा. इस में ज्यादा पैसा भी नहीं लगाना पड़ेगा और अलग से दुकान भी नहीं खोलनी पड़ेगी. बाहर वाले कमरे में जो गली की ओर खुलता है, वहीं से यह काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘हां, लेकिन आप को एक काम करना होगा.’’ ‘‘वह क्या? बोलो?’’ ‘‘तुम को किसी दूध वाले को तलाशना होगा जो सही दाम में दूध दे दे और पैसों के लिए एकदम से तकादा न करे.’’

‘‘तुम इस की चिंता मत करो उर्मिला. मैं 2-3 ऐसे दूध वालों को जानता हूं जो सही रेट में अच्छा दूध दे देंगे और पैसों के लिए एकदम से तकादा भी नहीं करेंगे.’’

भुवन का बचपन का दोस्त था भोला जो अब दूध का काम करता था. भुवन की बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘भुवन यार, तू चिंता मत कर. तू तो अपने बचपन का साथी है. मैं तुझे दूध भी अच्छा ला कर दूंगा और अपनी जानपहचान वालों को बता कर तेरा दही और पनीर का काम भी चलवा दूंगा. हिसाबकिताब तू सप्ताह भर बाद कर दिया करना. हमारी बचपन की दोस्ती किस दिन काम आएगी…’’

अगले दिन से ही भोला ने भुवन के घर दूध देना शुरू कर दिया. उर्मिला उस दूध से दही जमाती और पनीर तैयार करती. क्वालिटी का पूरा ध्यान रखती. धीरेधीरे यह काम चल निकला. कौन सा घर था जहां दही और पनीर की जरूरत नहीं थी… यह काम चूंकि घर और गली में हो रहा था, तो पुलिस की नजर भी नहीं पड़ती थी.

धीरेधीरे भुवन पहाड़ी रास्तों से आसपास के गांवों में दूधपनीर की सप्लाई का काम करने लगे. आसपास के गांव से वे और्डर ले आते, फिर उसी हिसाब से दूधपनीर तैयार किया जाता. इस से भोला को भी अच्छा मुनाफा होने लगा.

जब से भुवन दहीपनीर के सप्लाई के काम में बिजी हो गए थे, तब से हिसाबकिताब का जिम्मा उर्मिला ने संभाल लिया था. इस से भोला और उर्मिला सीधे एकदूसरे के संपर्क में आ गए थे. कब दोनों की आंखें चार हुईं कुछ पता ही नहीं चला.

भुवन को इस का अहसास तो हुआ लेकिन उन्होंने इसे अपना केवल वहम समझ  कर टाल दिया. उन्होंने खुद को आधुनिक और शिक्षित आदमी मान कर शक करने को केवल गंवारपन समझा. उन्होंने सोचा कि उर्मिला दहीपनीर का यह काम करेगी तो भोला से दूध लेने, दूध का और्डर देने और हिसाबकिताब करने के लिए उस से बोलना तो पड़ेगा ही.

लेकिन भुवन यह भूल गए कि आग और घी को पास पास रखेंगे तो आग एक न एक दिन तो भड़केगी ही. उर्मिला में अभी जवानी की लहर थी. उन्माद का उछाल था. भोला उर्मिला को ‘भाभी’ कहता था और वह उसे ‘देवरजी’ कह कर पुकारती थी, इसलिए देवरभाभी की ठिठोली को मंजूरी भी मिल जाती थी.

हलकीफुलकी मजाकमस्ती तो भुवन के सामने भी हो जाती थी और उस समय भुवन कुढ़ कर रह जाता था, लेकिन भोला और उर्मिला के बीच जो चल रहा था उसे तो बस उन दोनों के दिल ही जानते थे.

फिर एक दिन… भुवन किसी काम से रामनगर गए हुए थे. रामनगर जाने का सीधा सा मतलब ही यह था कि बिलकुल सुबह निकलना और फिर देर शाम या अगले दिन वापस आना.

भोला जब दूध देने आया तो उसे भुवन दिखाई नहीं दिया. ‘‘भाभी, आज भुवन कहीं नहीं दिखाई दे रहा.’’ ‘‘वे रामनगर गए हैं देवरजी.’’ ‘‘बच्चे भी दिखाई नहीं दे रहे.’’ ‘‘अरे देवरजी, कल थैलीसैंण से उन का मामा आया था. बच्चे नानी के घर जाने की जिद करने लगे तो उन का मामा उन्हें कुछ दिन के लिए अपने साथ ले गया.’’

शिकारी का मुआयना पूरा हो चुका था. भोला ने कहा, ‘‘तो फिर अकेली हो?’’ ‘‘अकेली कहां हूं देवरजी, तुम हो तो,’’ उर्मिला ने मुसकराते हुए मस्ती भरी हुई आंखों से कहा.

भोला एकदम से कुछ नहीं कह सका. उस ने मुसकरा कर एक नजर उर्मिला पर डाली, फिर नजरें झुका लीं. उर्मिला समझ गई कि भोला कहने में हिचकिचा रहा है. तब वह बोली, ‘‘देवरजी, उन से कोई काम था क्या?’’

भोला ने बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘हां भाभी, आज कुछ पैसों की जरूरत थी.’’ ‘‘तो खुल कर कहो न कि कुछ पैसे चाहिए. इतना हिचकिचा क्यों रहे हो, पैसे ही तो मांग रहे हो कुछ और थोड़े ही मांग रहे हो.’’

‘‘हां भाभी, मिल जाती… मतलब पैसे मिल जाते तो…’’ उर्मिला यह सुन कर मुसकरा पड़ी और भोला की चाहत को समझ  गई. उस ने कहा, ‘‘आओ देवरजी, पैसे ले लो.’’ ‘‘कहां?’’ भोला ने पूछा.

‘‘अरे देवरजी, पैसे यहां खुले में थोड़े ही रखें हैं. वे तो अंदर कोठरी में हैं. लेने हैं तो आ जाओ,’’ उर्मिला ने कोठरी की ओर जाते हुए कहा.

भोला उर्मिला के पीछेपीछे कोठरी में पहुंच गया. कोठरी में अंधेरा था. उर्मिला ने उस के ठीक सामने खड़े हो कर नशीले अंदाज में पूछा, ‘‘कितने चाहिए, देवरजी?’’ ‘‘जितने तुम दे सको,’’ भोला ने मस्ती के मूड में कहा.

‘‘फिर चाबी से ताला खोलो और गिनगिन कर ले लो,’’ उर्मिला ने अपना सिर भोला की छाती पर रखते हुए कहा.

भुवन को जल्दी ही पता चल गया कि उन के घर में बहुतकुछ पक रहा है. भोला और उर्मिला सभी सीमाएं लांघ चुके हैं. भुवन को एक बार को इस बात का पछतावा हुआ कि उन्होंने समय पर दखलअंदाजी न कर के बड़ी गलती कर दी, लेकिन उन्होंने बेवफाई की आग में जलने से बेहतर दूसरा रास्ता अपनाया. जो बेवफाई और धोखे का दर्द उन्हें मिला है, वैसा ही दर्द और धोखे का मजा वे उन्हें भी चखाना चाहते थे. लेकिन कैसे?

भुवन जानते थे कि भोला की शादी माला से हुई है और माला तो उन की बचपन की साथी थी. वह मासों गांव की रहने वाली थी और मासों भुवन का ननिहाल था. वहां उन्होंने बचपन के बहुत दिन गुजारे थे. बचपन में वे माला के साथ खूब खेलेकूदे थे. वे बचपन के अपने प्यार को अभी तक नहीं भूले थे और बचपन का वह प्यार अचानक से हिलोरें मारने लगा था.

बिना देरी किए भुवन ने कुछ ही दिनों में भोला के घर तक पहुंच बना ली. एक दिन जब भोला दूध बांटने के लिए निकला हुआ था तो भुवन किसी बहाने से उस के घर पहुंच गए. आज माला से उन की अकेले में शादी के बाद पहली मुलाकात थी. माला ने उन की खूब आवभगत की और उसे बिना चाय पिलाए न जाने दिया.

इस मुलाकात से भुवन समझ  गए कि माला के अंदर बचपन के प्रेम की पुरानी आग फिर सुलग उठी है. वर इस मौके को अब कैसे हाथ से जाने दें? उन्होंने सुलगती आग को भड़काने के लिए खूब हवा दी. उन की उम्मीद से पहले ही आग धधक उठी. कहते हैं कि औरत प्रेम में अंधी और आदमी पागल हो जाता है. भोला उर्मिला के प्यार में इतना बावला हो गया था कि उसे यही पता नहीं चला कि उस के घर में भुवन ने सेंधमारी कर दी है.

तब एक दिन भोला के घर में, ‘‘भुवन, तुम तो मुझे  बचपन में ही छोड़ कर चले गए थे. कभी तो मुझे  याद कर लेते.’’

‘‘माला, ऐसी बात नहीं है. बस हालात ही कुछ ऐसे बन गए थे. मैं तो हमेशा तुम्हारी यादों में तड़पता रहा. कहो तो दिल चीर कर दिखाऊं,’’ भुवन ने शातिराना पासा फेंका.

‘‘झूठे कहीं के,’’ माला ने भुवन के गाल पर चिकोटी काटते हुए कहा. फिर वह ऐसे ही खिलखिला कर हंसी जैसे ऐसी शरारत पर वह बचपन में हंसा करती थी. ‘‘झूठा मत कहो, माला, नहीं तो सच का ठप्पा ही लगा दूंगा.’’

‘‘ओहो, खुद को बड़े बहादुर बनते हो. जरा हिम्मत है तो लगा कर दिखाओ अपना सच का ठप्पा,’’ भुवन को उकसाते और मुसकराते हुए माला ने कहा.

इतना कह कर माला अपना दुपट्टा उतार कर नशीली आंखों से मुसकराते और भुवन को ललचाते हुए पलंग पर हाथ टिका कर और पैर लटका कर बैठ गई.

फिर बिना किसी देरी के भुवन ने माला के पूरे बदन को अपने प्रेम की सच्चाई के ठप्पे से तरबतर कर दिया.

जैसे कि हर मजे में सजा छिपी होती है, भुवन और भोला के संबंधों में जबरदस्त खटास पैदा हो गई. इस के बाद भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे. न ही उर्मिला भोला को छोड़ने को तैयार थी और न ही माला भुवन को.

इश्क चीज ही ऐसी होती है जिस का जितना विरोध किया जाए वह उतना ही भड़कता है. इस के सामने बड़ेबड़े परिवार तबाह हो गए, लेकिन इश्क न झुका. तूफान आता है तबाही लाता है, मगर इश्क खुद तबाही को न्योता देता है.

मामला पंचायत तक पहुंचा तो इश्क और मचला, और वफादार हुआ, और मजबूत हुआ, और बेशर्म हुआ. उर्मिला ने भोला के साथ रहने की कसम खाई तो माला किसी भी सूरत में भुवन का साथ छोड़ने को तैयार नहीं. बच्चों की उम्र देखते हुए पंचायत ने उन्हें मांओं के सुपुर्द किया. बच्चे भी ऐसा ही चाहते थे. बिना कोर्टकचहरी के सारे फैसले हो गए, लेकिन भविष्य में कोई कानूनी अड़चन न आए, इसलिए वकील कर के इन संबंधों को कानूनी मंजूरी दिलाई गई.

कुछ ही दिनों के बाद लोकडाउन हटा तो दुनिया बदल चुकी थी. भोला के साथ उर्मिला तो भुवन के साथ माला थी. भुवन को फिर से उसी कंपनी में नौकरी मिल गई. भुवन माला और उस के बच्चों को ले कर चंडीगढ़ के लिए बस में सवार हो गया.

उन को ले कर लोग आज भी चर्चा करते हैं कि लोकडाउन ने सच मैं दुनिया बदल दी. आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है तो क्या आदमी सच में हालात का गुलाम है?

Story in Hindi : जल समाधि

Story in Hindi. राममोहन पंचायत के जिला अध्यक्ष थे. उन्होंने जनता की भलाई के लिए अनेक काम करवाए थे और हमेशा ही सरकार की नई योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाने के लिए आगे रहते थे, इसलिए जनता के बीच उन की इमेज भी अच्छी थी.

60 साल की उम्र में भी खानेपीने के शौकीन राममोहन के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकराहट हमेशा ही फैली रहती थी, पर यह मुसकराहट तब न जाने कहां गायब हो जाती थी, जब उन का सामना अपने एकलौते बेटे सुशील से होता था. उसे देखते ही वे मुंह घुमा लेते थे.

इस मनमुटाव की वजह यह थी कि सुशील के 2 बेटियां ही थीं. राममोहन को अपने वंश के खत्म हो जाने का डर सता रहा था.

सुशील अपने एक दोस्त के साथ मिल कर एक एनजीओ चलाता था, जो अनाथ बच्चों को आश्रय देने और उन की पढ़ाई वगैरह का खर्च चलाती थी.

पिछली 2 बार से जब भी सुशील की बीवी रीता को बच्चा ठहरा था, तो उस ने पेट में पल रहे भ्रूण के लिंग की जांच करवाई थी. पेट में पल रहा बच्चा लड़की है, यह जानने के बाद सुशील और रीता ने पेट गिरा दिया और समय बीतने के बाद कहीं न कहीं सुशील के मन में यह बात घर कर गई थी कि उस के अंदर लड़का पैदा करने की ताकत नहीं है.

लिहाजा, अब सुशील खुश भी नहीं रह पाता था. शाम को जल्दी ही खाना खा कर चादर ओढ़ कर सो जाता, न बेटियों के साथ हंसनाखेलना और न ही रीता के साथ कोई बातचीत.

पर आज पता नहीं कैसे उस ने रीता से उस का हालचाल पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है रीता, इतनी टैंशन में क्यों रहती हो आजकल?’’

‘‘अब टैंशन मैं न लूं तो कौन ले… एक तो 2-2 लड़कियां और पिताजी को अपने वंश की चिंता… ताने तो मुझे सुनने पड़ते हैं न…’’ रीता ने कहा.

रीता अपनी बेटियों के बारे में इसलिए भी चिंतित थी कि उन दोनों का रंग सांवला था और आजकल लोग गोरे रंग की लड़कियों से ही शादी करना पसंद करते हैं.

लेकिन आज जैसे ही रीता ने टैलीविजन पर गोरा बनाने वाली क्रीम का इश्तिहार देखा, तो वह नुक्कड़ की दुकान पर क्रीम लेने चली गई.

इस दुकान पर प्रकाश नाम का एक 40 साल का दिलफेंक आदमी बैठता था. वह जाति से ब्राह्मण था और अपनी दुकान पर भी उस ने देवीदेवताओं की तसवीरें लगा रखी थीं. अपने गोरे चेहरे पर एक लंबा सा टीका लगा कर वह धार्मिक होने का दिखावा करता था. धर्म की आड़ ले कर ही तो बड़ेबड़े ओछे काम किए जाते हैं.

जैसे ही रीता दुकान पर पहुंची, तो प्रकाश की आंखें उस के गदराए बदन का ऐक्सरे करने में जुट गईं. ‘‘अरे, आइए रीताजी, आप मेरी दुकान में आईं, तो इस दुकान के भाग्य  खुल गए…’’

रीता प्रकाश की यह बात सुन कर मुसकराए बिना न रह सकी और बिना कुछ कहे उस ने गोरा होने वाली क्रीम मांग ली. ‘‘आप तो इतनी खूबसूरत हैं, आप को भला किसी क्रीम की क्या जरूरत…’’

अपनी तारीफ सुनना तो हर औरत को अच्छा लगता है. रीता के मन में भी यह सुन कर एक गुदगुदी सी हुई थी.

प्रकाश से क्रीम लेने के बाद रीता जैसे ही वापस मुड़ी, तो प्रकाश ने उसे अपनी दुकान का कार्ड देते हुए उसे बताया कि कार्ड पर उस का मोबाइल नंबर है. अगर उसे किसी भी चीज की जरूरत हो, तो वह उस प्रोडक्ट का नाम लिख कर भेज दे, तो वह ‘होम डिलीवरी’ करवा देगा, वह भी एकदम मुफ्त.

अपनी दोनों बेटियों के गालों पर रोजाना क्रीम लगाने के बाद रीता को महसूस हुआ कि उन की रंगत में कुछ सुधार तो जरूर हुआ है, इसलिए उस ने सोचा कि क्यों न एकाध क्रीम और मंगवा ले. उस ने मोबाइल से प्रकाश को क्रीम भेजने के लिए मैसेज कर दिया.

मैसेज देखने के कुछ देर बाद ही खुद प्रकाश रीता के घर पहुंच गया. साथ ही, वह रीता की बेटियों के लिए चौकलेट और बिसकुट ले जाना नहीं भूला था.

इस के बाद तो अगली सुबह से ही रीता के मोबाइल पर प्रकाश के गुड मौर्निंग वाले मैसेज आने लगे. बदले में रीता ने भी जवाब देना शुरू कर दिया था.

कुछ दिनों के बाद प्रकाश ने रीता को चुटकुले भेजने शुरू किए, तो रीता उन्हें पढ़ कर हंसती थी. धीरेधीरे वे चुटकुले नौनवैज चुटकुलों में बदल गए और रीता के मन को गुदगुदाने लगे.

धीरेधीरे प्रकाश ने एक गंदी तसवीर भी रीता को भेजी और जैसे ही रीता ने उसे देखा, तो थोड़ी ही देर बाद प्रकाश ने उसे ‘डिलीट फौर एवरीवन’ की मदद से डिलीट कर दिया और माफी मांगते हुए अगला मैसेज कर दिया कि गलती से चला गया था.

लेकिन कहीं न कहीं प्रकाश की यह गलती रीता को भी मन ही मन अच्छी तो लग ही रही थी.

एक सुबह की बात है. राममोहन अपने आंगन में आरामकुरसी पर बैठे हुए लोगों की समस्याएं सुलझा रहे थे कि तभी प्रकाश भी वहां आया और राममोहन के पैर छूने के बाद उस ने उन्हें बातोंबातों में बता दिया कि वह रीताजी के लिए कुछ ब्यूटी प्रोडक्ट्स लाया है.

सुशील उस समय घर में नहीं था, फिर भी राममोहन ने उसे अंदर जाने की इजाजत दे दी. रीता और उस की बेटियों के साथ कुछ समय बिता कर प्रकाश वापस चला गया, मगर उस दिन के बाद से वह अकसर रीता के घर आनेजाने लगा और कई बार तो वह राममोहन के सामने ही घर आया, मगर राममोहन ने न तो कभी रीता के चरित्र पर शक किया और न ही प्रकाश को आने से रोका.

आज सुशील जल्दी ही बाहर चला गया था. दोनों बेटियां पास के घर में खेलने चली गई थीं कि तभी प्रकाश बेझिझक हो कर आ गया. रीता भी उसे देख कर नहीं चौंकी. ‘‘इस बार गेहूं की फसल बिलकुल भी अच्छी नहीं हुई,’’ प्रकाश के बैठते ही रीता ने कहा.

‘‘फसल तो तब अच्छी होगी, जब बीज अच्छा होगा… खाली खेत में हल चलाने से कुछ नहीं होगा,’’ प्रकाश ने रीता को ऊपर से नीचे की ओर घूरते हुए कहा.

उन दोनों के बीच अब तक एक अलग ही रिश्ता पनप रहा था, जिसे मन ही मन में दोनों समझ रहे थे. प्रकाश ने  हाथ धोने के लिए जाते समय रीता के पास से गुजरते हुए अपनी कुहनी का दबाव उस के सीने पर बढ़ा दिया और जैसी कि प्रकाश को उम्मीद थी, रीता ने इस बात का कोई विरोध नहीं किया.

प्रकाश समझ गया था कि लोहा गरम है. उस ने रीता को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा. रीता भी किसी लता की तरह उस की बांहों में समा गई और फिर दोनों की गरम सांसें पूरे कमरे में गूंजने लगीं.

दोनों के शरीर एकदूसरे से ऐसे चिपटे हुए थे, जैसे उन्हें किसी ने एक ही कर दिया हो. उस दिन के बाद उन दोनों ने कई बार जम कर सैक्स का मजा लूटा.

ऐसा नहीं था कि यह जिस्मानी रिश्ता अनजाने में बना था, बल्कि रीता ने जानबूझ कर प्रकाश के साथ संबंध को बढ़ने दिया, ताकि वह उस के साथ हमबिस्तर हो कर एक लड़का पैदा कर सके.

यही नहीं, बातोंबातों में रीता ने यह डर भी प्रकाश पर जाहिर कर दिया था कि उसे फिर से लड़की हुई तो क्या होगा?

प्रकाश ने रीता से वादा किया था कि उस की मर्दानगी में वह दम है, जो लड़की नहीं, बल्कि लड़का ही पैदा करेगी और अगर फिर भी भ्रूण की जांच में लड़की होती है, तो वह उसे गिरवा देगा.

और ऐसा भी लगता था कि रीता के ससुर ने इन दोनों के बीच आने की कोई कोशिश नहीं की. कहीं न कहीं वे भी चाहते थे कि जो हो रहा है, होने दिया जाए. आखिरकार वे भी तो एक पोता चाहते ही थे.

कुछ समय के बाद वही हुआ, जिस का इंतजार रीता को था. वह पेट से हो गई. सुशील खुश तो हुआ, पर अगले पल ही मायूसी ने उसे घेर लिया. ‘‘इस बार भी लड़की हो गई तो…?’’ सुशील बोला. ‘‘हम पहले जांच करा लेंगे, उस के बाद ही इसे पनपने देंगे,’’ यह कहते हुए रीता के चेहरे पर चमक थी.

जांच के नतीजे ने बताया कि रीता के पेट में पल रहा बच्चा एक लड़का ही है, तो यह जान कर राममोहन, सुशील और रीता सभी खुशी से झूम उठे.

ठीक समय आने पर रीता ने सुंदर चेहरे वाले गोरे लड़के को जन्म दिया… छोटे बालक को देख कर सब की आंखें फैल गई थीं, क्योंकि राममोहन के परिवार में तो सभी सांवले थे, ऐसे में एक गोरे बालक का जन्म सब को सुहा रहा था.

राममोहन तो बस इसी बात से खुश थे कि उन के वंश को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें एक पोता मिल गया था.

2 महीने बीत गए थे. रीता अपने बेटे को जी भर कर देखती और मन ही मन अपने उस फैसले पर खुश होती, जब उस ने प्रकाश के साथ संबंध कायम किए थे.

आज प्रकाश रीता के घर पहुंचा, तो राममोहन सिर्फ मुसकरा कर रह गए. रीता अपने कमरे में बैठी थी, जिस की देह चिकनी और गदराई हो गई थी… इधर कई महीनों से प्रकाश रीता के साथ हमबिस्तर भी नहीं हुआ था और आज इसी उम्मीद में वह रीता के पास आया था.

प्रकाश ने रीता को चूमना चाहा, तो रीता ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘मुझ से दूर ही रहो, अब मैं एक बेटे की मां हूं.’’ ‘‘अजी, इस में मेरी भी मेहनत लगी है,’’ प्रकाश ने रीता की पीठ सहलाते हुए कहा.

तभी उन दोनों को किसी के आने की आहट सुनाई दी, तो वे संभल कर बैठ  गए. प्रकाश ने छोटे बच्चे को गोद में ले लिया और अपने साथ लाया हुआ पाउडर का डब्बा रीता को दिखाने लगा.

समाज की नजर में भले ही रीता ने पराए मर्द के साथ सैक्स कर के गलत काम किया था, पर उस के अपने विचार से वह एकदम सही थी, क्योंकि उस के इस एक कदम ने घर के सभी लोगों को खुश कर दिया था.

रीता के ससुर को वंश आगे बढ़ाने वाला मिल गया था, बेटियों को भाई और सुशील को बेटा. इसी वजह से सुशील पहले से ज्यादा खुश रहने लगा था और अपने काम को हंसीखुशी करने लगा था.

इसी बीच प्रकाश की आवाजाही रीता के घर में अब और ज्यादा बढ़ गई थी. समय और बीता तो लोगों में बातें बनने लगीं कि हो न हो, जरूर इन दोनों में कोई लफड़ा है. और यह लड़का सुशील का नहीं, बल्कि प्रकाश का ही है. जिस घर में सभी काले और सांवले रंग के हों, वहां कोई गोरा लड़का पैदा कैसे हो सकता है?

बेटे के जन्म के बाद सुशील और उस के पिता के बीच सबकुछ ठीक होने लगा था. आज वह अपने पिता के पास आया और बोला, ‘‘क्या आप को नहीं लगता कि प्रकाश की आवाजाही कुछ ज्यादा बढ़ने लगी है? अब तो महल्ले में लोग बातें भी बनाने लगे हैं…’’

साथ ही साथ सुशील ने अपने मोबाइल को राममोहन की नजरों के सामने कर दिया. मोबाइल की स्क्रीन पर एक तसवीर थी, जिस में प्रकाश और रीता एकदूसरे के साथ ऐसे चिपक कर बैठे थे, जैसे पतिपत्नी हों.

सुशील ने बताया कि रीता के मोबाइल में यह तसवीर उस की बड़ी बेटी ने अनजाने में ही ले ली थी और आज जब रीता के नहाने जाने के बाद  सुशील उस के मोबाइल की भर चुकी मैमोरी की तसवीरें डिलीट कर के खाली कर रहा था, तभी उस की नजर इस तसवीर पर पड़ी और उस ने अपने मोबाइल में उस तसवीर को ले लिया.

राममोहन पर इन सब बातों का कोई असर नहीं हुआ और वे बोले, ‘‘ये सारी बातें मुझ से छिपी नहीं हैं. पर जैसे भी हो, आज हमारे वंश को आगे ले जाने वाला एक लड़का तो हमें प्रकाश ने ही दिया है, इसलिए जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो और अपना मुंह बंद रखो. और हां, हो सके तो अपनी आंखें भी बंद कर लो.’’

सुशील अपने पिता की बातें सुन कर सन्न रह गया. आज सुबह से ही सुशील अपने कागजपत्र इकट्ठे कर रहा था, क्योंकि उसे अनाथ बच्चों के भविष्य के लिए चंदा जमा करने के लिए मंत्रीजी से मिलने जाना था.

‘‘पूरे 2 दिन का प्रोग्राम है. बच्चों का ध्यान रखना,’’ रीता को कह कर सुशील निकल गया था.

सुशील के जाते ही रीता ने एक अलग ही आजादी का अहसास किया और नौकरानी को जल्दीजल्दी काम निबटाने की हिदायत देने लगी.

बीचबीच में प्रकाश का फोन भी आता रहा. रीता उस से पता नहीं क्या फुसफुसा कर बात करती कि किसी और को सुनाई भी नहीं देता था.

आज शाम को रीता के ससुर और उस की बेटियों ने खाना खा लिया और अपने कमरों में आराम करने लगे… राममोहन सोने जाने से पहले अपने पोते को प्यार करना नहीं भूले. आज सुशील भी नहीं था, सो रीता भी अपने बेटे को ले कर बिस्तर पर चली गई थी.

कुछ ही देर बाद रीता के मोबाइल पर प्रकाश का फोन आ गया, ‘तुम से मिलने आ रहा हूं. दरवाजा खुला रखना,’ कह कर फोन कट गया था.

रीता को प्रकाश का इस समय चोरीछिपे आना अजीब तो लगा, पर उस के जिस्म की जरूरत ने उसे प्रकाश को आने से नहीं रोका. तकरीबन आधे घंटे के बाद प्रकाश रीता के साथ उस के बिस्तर पर था.

‘‘कहीं बाबूजी ने तुम्हें देखा तो नहीं?’’ रीता फुसफुसाई.

‘‘अरे, वे हमारे बारे में सब जानते हैं, पर उन्हें तो सिर्फ अपने पोते से मतलब है, जो मैं ने उन्हें दिया है,’’ कहते हुए प्रकाश ने रीता के कपड़े हटाने शुरू कर दिए. आज बहुत दिनों के बाद प्रकाश ने रीता को इस हालत में देखा था, इसलिए उस के अंदर जोश जाग चुका था.

रीता और प्रकाश अभी नाजायज रिश्ते का मजा ले ही रहे थे कि अचानक कमरे का दरवाजा खुल गया. सामने कोई खड़ा था.

रीता ने आंखें फाड़ कर देखा कि वह कोई और नहीं, बल्कि उस का पति सुशील था, जो अपनी बीवी को गैरमर्द के साथ देख कर हैरान था.

रीता ने प्रकाश को धक्का दिया और कपड़े पहनने लगी. प्रकाश भी चौंक गया था, फिर भी वह बेशर्मी दिखाते हुए बोला, ‘‘अरे सुशील, इतनी जल्दी वापस कैसे आ गए? तुम ने तो हमारा सारा मजा ही खराब कर दिया.’’

प्रकाश बाहर जा चुका था और सुशील की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस की जबान हलक से जा चिपकी थी और आंखें पथरा रही थीं. उस ने रीता को बड़े जबरदस्त तरीके से घूरा, पर रीता पर उस के घूरने का भी कोई असर नहीं हुआ. सुशील उसी समय बिना कुछ कहे वहां से चला गया.

तकरीबन 20 दिन के बाद भी सुशील जब वापस नहीं आया, तो रीता को थोड़ी चिंता हुई. हालांकि उस की आंखों पर तो बेशर्मी का परदा पड़ा हुआ था, फिर भी उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना जरूरी समझा, पर तभी उसे एक चिट्ठी मिली, जो साधारण डाक से आई थी. उस में लिखा था :

‘तुम दूसरे आदमी के साथ लड़का पाने के लिए सोई या सिर्फ मजे के लिए, यह तो सिर्फ तुम जानती हो. मैं अगर तुम दोनों के खिलाफ कोई भी कार्यवाही करता हूं, तो उस में मेरी और मेरे खानदान की बदनामी ही होगी, इसलिए मैं खामोश हूं… और मेरी दोनों लड़कियों की जिम्मेदारी अब से मेरी एनजीओ उठाएगी. अफसोस है कि उन की मां के होते हुए भी वे दोनों अनाथालय में पलेंगी.

‘मैं तुम्हारे इस रिश्ते पर खामोश रहा और अब हमेशा के लिए खामोश ही रहूंगा. मेरे पिता ने एक पोते के लिए इस गंदे रिश्ते पर मुंह और आंखें बंद रखने को कहा था. मेरा मुंह तो पहले से ही बंद था और अब मेरी आंखें भी बंद हो रही हैं.

‘और हां, मेरी लाश तुम्हें नहीं मिल पाएगी, क्योंकि मेरा शरीर पानी की लहर के साथ कहां तक बहता चला जाएगा, यह मुझे भी नहीं पता…’

चिट्ठी पढ़ कर रीता की समझ में आ चुका था कि सुशील ने जल समाधि ले ली है. पर क्या सुशील की खुदकुशी हकीकत में खुदकुशी थी या रीता द्वारा न चाहते हुए भी की गई हत्या?

Relationship Story : पहल

Relationship Story. नितिन ने लंच शुरू किया. पत्नी ने परांठे, दही और आलूमटर की सब्जी दी हुई थी. तभी उसे कढ़ीचावल की खूशबू आई. उस ने नजर घुमा कर देखा, पास वाली मेज पर वर्माजी खाना खा रहे थे. उस का मन भी कढ़ीचावल खाने का होने लगा. उस ने सोचा कि लंच के बाद घर फोन कर देगा, लेकिन वह खाना खा भी नहीं पाया था कि बौस के पीए का फोन आ गया, ‘‘सर ने तुरंत बुलाया है.’’

नितिन जल्दीजल्दी लंच कर के बौस के केबिन में चला गया. बौस ने एक फाइल पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे देख कर रिपोर्ट बना दो. शाम को 5 बजे एमडी साहब के साथ मीटिंग है. उस में रिपोर्ट देनी है. समय कम है. सारे काम छोड़ कर पहले इसे तैयार करो.’’

नितिन रिपोर्ट तैयार करतेकरते घर फोन करना भूल गया.  रात के 8 बज गए थे. नितिन मैट्रो से उतर कर घर की ओर जा रहा था, तब उसे कढ़ीचावल की याद आई. उस ने सोचा कि सुनीता ने खाने की तैयारी कर ली होगी. दूसरा, कढ़ी बनाने के लिए दहीमट्ठा लाना होगा. घर में बेसन है भी या नहीं. उसे खाने बनाने की दोबारा से तैयारी करनी होगी. उस ने घर फोन नहीं किया.

घर जा कर नितिन ने चाय पी. उसे थकान महसूस हो रही थी. वह कमरे में जा कर लेट गया. उसे झपकी आ गई. करीब एक घंटे बाद सुनीता ने खाना खाने के लिए आवाज दी. वह उनींदा डाइनिंग टेबल पर आ कर बैठ गया.

सुनीता ने उस के सामने खाने की प्लेट रख दी. उसे हैरानी हुई कि सुनीता ने उस की पसंद की पकौड़ी वाली कढ़ी और जीरे में छौंके हुए चावल बनाए थे. उस की थकान दूर हो गई और पत्नी के लिए प्यार उमड़ पड़ा.

पति की आंखों के आमंत्रण को देख सुनीता मुसकराई और अपनी थाली लेने के लिए रसोई में चली गई.

नितिन शनिवार को औफिस से घर आते ही बोला, ‘‘सोमवार और मंगलवार की छुट्टी ली हुई है. दिलशाद गार्डन चलते हैं.’’

यह सुनते ही सुनीता का चेहरा खिल उठा. वह बोली, ‘‘परसों मम्मी का फोन आया था. उन्हें हलका बुखार है. बुला रही थीं. हम जाएंगे तो वे खुश हो जाएंगी.’’

‘‘यह बात तुम ने बताई नहीं. मिल आती,’’ नितिन ने नाराजगी जताई. ‘‘मेरे मायके जाने से आप को परेशानी होगी, इसलिए नहीं कहा,’’ कह कर सुनीता तैयार होने चली गई.

नितिन के औफिस में नया बौस आया था. वह अपने पुराने संस्थान से कुछ सहयोगियों को लाना चाहता था. दूसरा, उसे बौसगीरी भी दिखानी थी. वह काम में कमियां निकालने लगा. इस की चपेट में नितिन भी आ गया. कई लोगों को नौकरी जाने का खतरा लगने लगा.

कुछ प्रैक्टिकल और सम?ादार मुलाजिमों ने समय की नजाकत को सम?ाते हुए नए बौस का चरण वंदन शुरू कर दिया. वे औफिस आतेजाते समय बौस के केबिन में मत्था टेक देते.

नितिन को यह सब पसंद नहीं था. इस में उस का अहंकार नहीं, बल्कि स्वभाव था. वह काम से काम रखता.

एक दिन नए बौस ने नितिन को मामूली सी गलती पर नकारा कह दिया. उन्होंने कहा, ‘‘तुम किसी काम के नहीं हो. तुम्हें कुछ नहीं आता. बैठेबैठे रोटी तोड़ते हो.’’

नौकरी के दौरान डांटफटकार कोई नई बात नहीं थी, लेकिन बौस का यह कहना कि ‘बैठेबैठे रोटी तोड़ते हो’ नितिन को अखर रहा था. उस ने कुरसी से सिर टिका लिया. उस के सामने सुनीता का मुसकराताखिलखिलाता चेहरा घूमने लगा. उसे डर सताने लगा कि नौकरी चली गई, तो सुनीता का सामना कैसे करेगा. मकान और बाइक की किस्त कैसे जाएगी.

नितिन की मेज पर रखी कौफी ठंडी हो गई थी. औफिस असिस्टैंट सुरेश कप लेने आया. वह बोला, ‘‘आप ने कौफी नहीं पी. ठंडी हो गई. दूसरी ले आऊं?’’ ‘‘नहीं,’’ नितिन ने सिर हिला दिया.

सुरेश ने माहौल को हलका करने के लिए हंसते हुए कहा, ‘‘साहब का मूड ठीक नहीं लग रहा. हमारे कहने से एक कप कौफी पी तो लीजिए, मूड फ्रैश हो जाएगा.’’

‘‘कहा न, नहीं पीनी. एक बार में बात समझ में नहीं आती,’’ नितिन तेज आवाज में बोला. ‘‘जैसी आप की मरजी,’’ कह कर सुरेश मुंह लटका कर चला गया.

औफिस के सभी लोग नितिन की ओर देखने लगे थे. उसे अपनी   झुंझलाहट पर गुस्सा आने लगा.

नितिन सुनीता को परेशान नहीं करना चाहता था, इसलिए उसे कुछ नहीं बताया. वह गुमसुम और चिंतित रहने लगा. उस का खानेपीने और घूमने यानी किसी भी काम में मन नहीं लगता.

एक दिन सुनीता ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है… आजकल तनाव में रहते हो? औफिस में कोई दिक्कत तो नहीं?’’ नितिन ने रूखा सा जवाब दिया, ‘‘कुछ नहीं, सब ठीक है.’’

सुनीता ने खाली कप उठा लिए. वह सोचने लगी, ‘मैं कितना प्यार करती हूं. हर बात का ध्यान रखती हूं, फिर भी मुझे अपनी परेशानी नहीं बता रहे. ऐसा लगता है कि मेरा होना या न होना इन के लिए कोई माने नहीं रखता.’

सुनीता 1-2 बार प्यार से पूछती तो शायद नितिन के दिल का गुबार निकाल जाता, लेकिन उस ने तन और मन से दूरी बना ली. वह घर के कामों और बाकी समय में मोबाइल में खुद को बिजी रखती.

नितिन सोचने लगा, ‘मैं परेशान हूं, पर इसे कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसे कैसे जिंदगी कटेगी…’

नितिन रविवार को देर से उठा. सुनीता ने ब्रैड पकौड़े बनाए थे. 11 बजे नाश्ता किया. दोपहर में सुनीता ने छोलेभटूरे बना लिए. उस ने करीब 1 बजे खाने में छोलेभटूरे परोस दिए.

नितिन छोलेभटूरे देखते ही भड़क गया, ‘‘तुम्हें कुछ अक्ल भी है या नहीं. सुबह ब्रैड पकौड़े और अब छोलेभटूरे बना दिए. इतनी चिकनाई खिलाखिला कर तुम तो मार डालोगी.’’

सुनीता ने बडे़ मन से पति की पसंद के छोलेभटूरे बनाए थे. वह सम?ा नहीं पाई कि इस में क्या गलत किया. वह नाराजगी से बोली, ‘‘इस में अक्ल या बेअक्ल की क्या बता है. बड़ी मेहनत कर मन से बनाए हैं.’’

‘‘हां, मेहनत तो तुम्हीं करती हो. हम तो निकम्मे हैं,’’ नितिन तैश में बोला.

‘‘लेकिन मैं ने ऐसा कब कहा,’’ सुनीता बोली. ‘‘कहा तो नहीं, लेकिन मन में तो यही है. यहां दिनभर खपते रहो. तुम्हारी तो सिर्फ जबान चलती है.’’

‘‘तुम नौकरी करती हो तो मैं भी दिनभर घर के काम में लगी रहती हूं.’’ ‘‘तो क्या मुझ पर अहसान करती हो.’’ ‘‘अहसान तो कोई किसी पर नहीं करता. सब अपनाअपना काम करते हैं.’’

‘‘तुम्हें तो मुझ  से बहस करने का मौका मिल गया.’’ ‘‘बहस मैं ने शुरू की या आप ने… पता नहीं आप को क्या हो गया है…’’

‘‘मैं पागल हो गया हूं. तुम्हें रहना है तो रहो, नहीं तो तुम्हारी मरजी,’’ नितिन गुस्से में बोला.

अब तो सुनीता को भी गुस्सा आ गया. वह बोली, ‘‘मैं अब इस घर में एक पल भी नहीं रहना चाहती. जा रही हूं.’’

सुनीता रसोई में अपने लिए रखी छोलेभटूरे की थाली को यों ही छोड़ कर कपड़े लेने कमरे में चली गई. वह 10-15 मिनट में बैग ले कर बाहर आ गई. उस ने गेट पर जा कर नितिन की ओर देखा. उसे घूर रहे नितिन ने गुस्से में मुंह दूसरी ओर कर लिया. सुनीता जोर से दरवाजा पटक कर बाहर निकल गई.

नितिन ने बिना खाए छोलेभटूरे की थाली रसोई में रख दी. वह सोफे पर लेट गया और छत को घूरने लगा. पलकें भारी हो कर कब बंद हो गईं, उसे पता ही नहीं चला.

नितिन शाम को उठा. 6 बज चुके थे. नितिन ‘सुनीता, पानी लाना’ कहने ही वाला था कि ‘सुनीता’ कहते ही उसे याद आ गया कि वह तो घर में है ही नहीं. वह दोपहर के मामले को याद कर उदास हो गया. पानी लेने के लिए रसोई में गया तो देखा कि दोनों की थाली वहां रखी हुई थीं.

नितिन का मन हुआ कि सुनीता को फोन कर बुला ले, फिर सोचा कि उसे मेरी जरूरत होगी तो खुद ही आ जाएगी. उस ने छोलेभटूरे डब्बे में रखे और गाय को दे आया. वह खाना बाहर से ही खा कर आ गया.

सुनीता अपने मायके आ गई. मां, भाईभाभी, भतीजेभतीजी सभी बहुत खुश हो गए. बच्चे उस के चारों ओर चक्कर काटने और उछलकूद करने लगे. भाभी ने शाम को समोसेकचौड़ी मंगा लिए और रात को सुनीता की पसंद के छोलेचावल बनाए.

रात को भाभी ने खाना परोसा तो सुनीता के मन में आया कि नितिन को फोन कर पूछ ले कि उन्होंने खाना खाया है या नहीं, फिर विचार आया कि वे भी तो फोन कर सकते थे. उन्होंने नहीं किया तो वह भी क्यों करे.  सुनीता ने भरपेट खाना खाया और चादर तान कर सो गई.

नितिन औफिस से आया. वह बैडरूम में जा कर लेट गया. उस ने देखा कि घर तो वही है, जो 3 दिन पहले था… 2 कमरे, रसोई, चमचमाती दीवारें, फ्रिज, एसी सभी कुछ तो पहले जैसा है, लेकिन अपने मन की तरह उसे यहां भी खालीपन महसूस हुआ.

नितिन को बौस का ईमेल मिला था. उस की बनाई रिपोर्ट एमडी साहब को पसंद आई थी. उन्होंने ईमेल कर उस की तारीफ की थी. वह निश्चिंत हुआ कि फिलहाल नौकरी जाने का खतरा नहीं है. वह चाहता था कि अपनी इस खुशी को किसी के साथ साझा करे.

नितिन का मन हुआ कि सुनीता को फोन कर दे, फिर सोचा कि वह अपनी मरजी से गई है, वह क्यों फोन करे. अगर गुस्से में कुछ कह भी दिया था तो क्या उसे चले जाना चाहिए था? वह भले ही मु?ा से लड़ती?ागड़ती, लेकिन गई क्यों? क्या यह घर उस का नहीं है?

नितिन होटल से खाना पैक करा कर लाया था. उस का मन खाना खाने का नहीं हुआ. वह लेटालेटा नींद आने का इंतजार करने लगा.

सुनीता ने 2-3 दिन खुद को खुश दिखाने की भरसक कोशिश की, लेकिन धीरेधीरे उस के चेहरे पर उदासी का असर दिखने लिखा और यह उस की मां और भाभी से छिप न सका.

भाभी ने अकेले में सुनीता से उस की परेशानी पूछी. पहले तो सुनीता टालती रहती, लेकिन बहुत जिद करने पर उस ने बता दिया.

भाभी धीरे से बोली, ‘‘दीदी, परेशान होने की कोई बात नहीं. यह घर आप का ही है, जब तक चाहे रहो.’’ सुनीता हलकी सी मुसकराई, लेकिन कुछ नहीं बोली.

सुनीता को आए हुए एक हफ्ता हो गया था. उस का मन अब यहां बिलकुल भी नहीं लगता था. कुछ खाने का मन नहीं करता था. रात को उस की नींद बारबार उचट जाती थी.

12 बज चुके थे. सभी सोए हुए थे. सुनीता ने फोन उठा लिया. वे दोनों सगाई के बाद रोज रात को फोन पर घंटों बातें किया करते थे. किसी दिन नितिन को फोन करने में देर हो जाती तो सुनीता फोन कर देती और झगड़ती कि देर क्यों की.

आज सुनीता ने नितिन का नंबर निकाला, लेकिन डायल किए बिना फोन सिरहाने की मेज पर रख दिया. भाभी ने खीर बनाई थी. सुनीता मुंह तक चम्मच ले जाते हुए ठिठक गई. उसे याद आया कि नितिन खीर खाने से पहले एक चम्मच उसे खिलाता और कहता कि ‘तेरे खाने से खीर की मिठास बढ़ जाती है’.

भाईभाभी बच्चों के साथ सामान खरीदने के लिए बाजार गए थे. उन्होंने सुनीता से भी साथ चलने के लिए कहा था, लेकिन उस ने मना कर दिया. वह कमरे में आ कर बिस्तर पर लेट गई.

थोड़ी देर में मां सुनीता के पास आ कर बैठ गईं और प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं. सुनीता ने मां की हथेली अपने गाल के नीचे रख ली. कुछ देर बाद उस के आंसू टपकने लगे.

मां प्यार से बोलीं, ‘‘बेटी, मैं यह नहीं पूछूंगी कि क्या हुआ. मैं तुम्हें कोई सलाह भी नहीं दे रही. तुम्हें जो सही लगे, वही करो. लेकिन मेरी एक बात पर ध्यान देना. पहले तो इस दुनिया में हमें जानते ही कितने लोग हैं. जो 4-6 निकट के लोग हमें जानतेसमझते हैं, उन से हम छोटीछोटी बातों पर रिश्ते खराब कर लेते हैं. धीरेधीरे जिंदगी यों ही बीत जाती है.’’

मां थोड़ी देर बाद उठ गईं और बोलीं, ‘‘हाथमुंह धो ले. मैं चाय बना कर लाती हूं.’’ नितिन लंच करने के बाद कैंटीन की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. पार्क में माली राकेश और उस की पत्नी मीना खाना खा रहे थे. दोनों बात करतेकरते खिलखिला भी रहे थे. नितिन को याद आया कि आज सुबह औफिस खुलने के कुछ देर बाद ही दोनों उस के पास आए थे.

दरअसल, कल रात राकेश शराब पी कर घर आया था. इस का मीना ने विरोध किया तो उस ने थप्पड़ मार दिया. मीना रोटी बना रही थी. उस ने गुस्से में राकेश के कंधे पर बेलन दे मारा. इस से उस का कंधा सूज गया. दोनों रातभर लड़ते रहे. उन्होंने खाना भी नहीं खाया. दोनों इसी का फैसला कराने उस के पास आए थे.

नितिन ने दोनों को समझाया कि आपस में झगड़ा नहीं करते. प्यार से रहते हैं. एकदूसरे की इच्छाअनिच्छा का खयाल रखेंगे तो झगड़ा होगा ही नहीं. अगर झगडा़ हो भी जाए तो एकदूसरे को मना लेना चाहिए. इसे नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए.

नितिन सोचने लगा कि दूसरों को सलाह देना कितना आसान है. राकेश और मीना कम पढ़लिखे हैं. यह बात उन की समझ  में आ गई. और हम तथाकथित ज्यादा पढ़ेलिखे जराजरा सी बात को अहम का मुद्दा बना कर अपनी जिंदगी में खुद ही जहर घोल रहे हैं.

यह सब सोचतेसोचते नितिन को बेचैनी होने लगी. उस ने औफिस से छुट्टी ले ली. उस ने सोचा कि आज इस झंझट से हमेशा के लिए झूटकारा पा लेगा. उस ने घर जाने के बजाय बाइक दूसरी ओर मोड़ ली.

नितिन ने दरवाजे पर लगी घंटी बजाई. दरवाजा सुनीता ने खोला. दोनों कुछ पल एकदूसरे की आंखों में अपलक देखते रहे. नितिन ने पूछा, ‘‘कैसी हो?’’ सुनीता ने जवाब दिया, ‘‘अच्छी हूं. और आप?’’ ‘‘मैं भी मजे में हूं,’’ नितिन ने मुसकराने की कोशिश की.

सुनीता की आंखों के नीचे के कालापन और नितिन की बढ़ी बेतरतीब दाढ़ी से दोनों एकदूसरे की असलियत जान गए. अब कुछ गिलेशिकवे की गुंजाइश ही नहीं बची थी. दोनों ने नजरें झुका लीं, जैसे कोई झूठ पकड़ा गया हो.

जो बात सुनने के लिए सुनीता इंतजार कर रही थी, आखिरकार नितिन ने कह दी. वह बोला, ‘‘चलो.’’ सुनीता शरारती ढंग से मुसकराई, ‘‘सोच लो, रात को छोलेभटूरे बनाऊंगी.’’

‘‘हुजूर, जो बनाएंगी, सब मंजूर,’’ नितिन ने दरबारी की तरह हलके से झुकते हुए कहा और सुनीता की कमर पर चिकोटी काट ली. तब तक सुनीता की मां दूसरे कमरे से आ गईं. सुनीता मां के गले से लिपट गई.

मां सुनीता को झीड़कते हुई बोलीं, ‘‘कैसे पगली लड़की है. दामादजी को बैठने के लिए भी नहीं कहा.’’

नितिन बोला, ‘‘अभी बैठना नहीं है. सुनीता, जल्दी चलो.’’  मां बोलीं, ‘‘बिना कुछ खाएपीए कैसे जाओगे. बेटाबहू आने वाले हैं. उन से भी मिल कर जाना.’’

जवाब सुनीता ने दिया, ‘‘भैयाभाभी से मिलने फिर आ जाएंगे. अभी हम जा रहे हैं.’’

मां कुछ बोलतीं इस से पहले ही सुनीता दूसरे कमरे में गई और बैग में जल्दीजल्दी अपने कुछ कपड़े ठूंस कर ले आई.

मां ने प्यार से बेटी का माथा चूम लिया. नितिन की आंखें अपराधी की तरह झु की थीं. वह बीचबीच में नजरें उठा कर सुनीता को देखता और मुसकरा जाता.

नितिन के बाइक स्टार्ट करते ही सुनीता फुरती से पीछे बैठ गई. उस ने सिर पति की कमर से लगा कर उसे बांहों में भर लिया. सुबह से मौसम गरम था. अब बूंदाबांदी होने लगी थी. शायद कहीं आसपास तेज बारिश भी हुई थी.

एक ठंडी हवा का झोका आया. नितिन को तन ही नहीं, मन में भी ठंडक महसूस हुई. उस ने ब्रेक छोड़ते हुए एक्सलेटर को दबाया और बाइक की रफ्तार बढ़ा दी.

लेखक : नरसिंह प्रसाद शर्मा

Family Story : पत्नी की पगार

Family Story. ‘‘अब आप इतना परेशान मत होइए, धीरेधीरे समय के साथसाथ सब अच्छा हो जाएगा… और जब मैं ने कह दिया कि आप के सामने कैसे भी हालात आ जाएं, मैं हमेशा हर कदम पर आप के साथ हूं, तो फिर आप क्यों इतना सोचविचार करने में उलझे हुए हैं?’’ यह कहते हुए प्रिया ने चाय का प्याला शिशिर के हाथ में थमा दिया.

प्रिया के होंठों से फूटने वाले ये शब्द थकेहारे और सच कहें तो हालात के चलते कहीं न कहीं हताशा के घेरे में आ चुके शिशिर को एक बड़ा संबल देने वाले थे.

‘‘…हां, लेकिन अगर मैं इतने पांव न पसारता, तो शायद आज इस मानसिक परेशानी का मुझे मुंह नहीं देखना पड़ता,’’ शिशिर ने धीरे से कहा.

दरअसल, शिशिर ने शहर में एक मकान लिया था. चूंकि मकान शहर की जानीमानी हाई क्लास कालोनी में था, सो उस की कीमत भी हाई क्लास ही थी.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

मकान खरीदते ही बैंक के कर्ज की एक अच्छीखासी मासिक किस्त शिशिर के पल्ले पड़ गई और यहीं से शुरू हो गया रोजाना के तनाव और मानसिक अशांति का एक सिलसिला.

शिशिर की पगार का एक बड़ा भाग लोन की किस्त खा जाती थी. बचेखुचे पैसों में तमाम दूसरे खर्चे होते थे, जो मुश्किल से ही निबट पाते थे.

शिशिर की पत्नी प्रिया एक बहुत ही समझदार औरत थी. शिशिर को परेशान देख कर वह सब्र से उसे समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन धीरेधीरे उसे लगने लगा कि कहीं न कहीं घर के खर्चों को पूरा करने में पैसे की कमी आड़े आ रही है.

एक दिन प्रिया ने शिशिर से कहा, ‘‘सुनिए, कुछ दिन अगर हम लोग अपने खर्चों को कंट्रोल कर लें, तो समय बीतने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा.’’

प्रिया की बात पूरी नहीं हुई थी कि शिशिर ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं ने आज तक कभी अपने खर्चों पर कंट्रोल नहीं किया, तो आज कैसे कर लूं… ‘‘सिर्फ और सिर्फ एक मकान की वजह से मुझे  इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. तुम क्या जानो, मुझ  पर क्या गुजर रही है. जाओ और जा कर अपना काम करो.’’

आज शिशिर के ये शब्द प्रिया को कहीं न कहीं चुभ गए थे, क्योंकि हकीकत तो यह थी कि प्रिया के कहने पर ही शिशिर ने शहर में वह मकान खरीदा था.

अब प्रिया ने मन ही मन ठान लिया कि वह शिशिर की पैसे से मदद कर के रहेगी. लेकिन उस ने अपनी योजना का जिक्र किसी से नहीं किया. आसपास के कई स्कूलों में उस ने इंटरव्यू दिए और आखिरकार एक स्कूल में 15,000 रुपए की मासिक पगार पर उस ने नौकरी जौइन कर ली. जब उस ने यह सूचना शिशिर को दी, तो शिशिर के होंठों पर उम्मीद से भरी मुसकराहट छा गई.

अगले ही दिन से प्रिया काफी बिजी रहने लगी थी. सुबह 4 बजे उठना, पूरे घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और उस के बाद स्कूल के लिए तैयार होना. दोपहर को 3 बजे तक वापस आना और फिर घर के कामकाज, रात में पढ़ाई करना और फिर 11 बजे सोना, यह उस का रोज का काम हो चला था.

शिशिर की परेशानी पर प्रिया ने अपना सुकून और आराम न्योछावर कर दिया था. उसे मशीन की तरह काम करते देख कर शिशिर कभीकभी अंदर से दुखी हो जाता और कहता, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दो, जो होगा वह देखा जाएगा.’’

लेकिन प्रिया भी बहुत जिद्दी स्वभाव की थी. उस ने ठान लिया था कि जब तक हालात ठीक नहीं हो जाते, तब तक वह शिशिर की मदद करती रहेगी.

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

सरिता

और एक दिन वह आया जब प्रिया ने कड़क चाय के प्याले के साथ शिशिर को एक सफेद लिफाफा थमाया. शिशिर ने लिफाफा खोल कर देखा, तो उस में 15,000 रुपए रखे हुए थे.

यह प्रिया की पहली पगार थी. आज दोनों की खुशी का कोई ठिकाना न था. सच तो यह था कि शिशिर को अपनी पगार आने से कई गुना ज्यादा खुशी और सुकून प्रिया के दिए हुए उस सफेद लिफाफे में रखे 500 के 30 नोटों को छू कर मिला था.

शिशिर ने उन पैसों को एक अलग गुल्लक में डाल दिया और उस पर लिख दिया ‘पत्नी की पगार’.

प्रिया की पहली पगार के साथ ही मानो कुछ चमत्कार सा होने लगा. शिशिर जो अब तक परेशान रहता था, धीरेधीरे सुकून की ओर बढ़ने लगा. वक्त बीतता गया और उस के साथ ही शिशिर के सिर पर से कर्ज का बोझ  भी धीरेधीरे कम होने लगा.

तकरीबन 10 साल की उतारचढ़ाव भरी जिंदगी के बाद आखिरकार शिशिर की प्रमोशन हुई और अब उस की पगार अच्छीखासी हो गई थी. कुछ ही सालों में उस ने बैंक का सारा कर्ज चुकता कर दिया. बैंक से लोन अदायगी का सर्टिफिकेट पा कर उसे ऐसा लग रहा था मानो किसी बंधन से छुटकारा मिल गया हो.

खुशी से झुमता हुआ शिशिर घर पहुंचा. आज प्रिया भी अपने स्कूल से जल्दी आ गई थी. शिशिर कुछ सोच ही रहा था कि चाय के प्याले के साथ एक सफेद लिफाफा उस की ओर बढ़ाते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि अब आप के लिए इस छोटी सी मदद का कोई मोल नहीं है, लेकिन मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती, क्योंकि मेरे लिए सब से खाद आप की खुशी और सुकून है,’’ यह कहते हुए प्रिया की आंखों में आंसू छलक आए.

शिशिर ने प्रिया को अपने पास बिठाया और आंसू पोछते हुए कहा, ‘‘शायद तुम नहीं जानतीं कि मेरे सब से मुश्किल दिनों में इसी सफेद लिफाफे ने मुझे  मेरा मानसिक सुकून लौटाया था. आज भी मैं अपनी पगार से कई गुना ज्यादा इज्जत इस सफेद लिफाफे को देता हूं, इसलिए मेरी तुम से विनती है कि भविष्य में कभी ऐसे शब्द मत बोलना.’’

प्रिया का सिर शिशिर के कंधे पर टिका था और दोनों मुसकराते हुए सामने देख रहे थे. सामने रखा गुल्लक मानो प्रिया के सफेद लिफाफे का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

इतने पुराने गुल्लक पर शिशिर के लिखे हुए शब्द आज भी उम्मीद की खुशबू बिखेरते हुए साफ चमक रहे थे और वे जादुई शब्द थे ‘पत्नी की पगार’.

लेखक :  शिशिर शुक्ला

Relationship Tips: कभी तलाक नहीं होगा, अगर हसबैंडवाइफ फौलो करेंगे यह रिलेशनशिप रूल

Relationship Tips: शादी एक खूबसूरत बंधन है, लेकिन इसे निभाना उतना ही मुश्किल भी है. पहले के जमाने में जब रिश्तों की समझ और एक दूसरे के प्रति प्यार हुआ करता था तब लोग जिंदगी भर साथ निभा लेते थे बिना किसी शिकायत के मगर आज के दौर में हालात बदल चुके हैं. तलाक जैसे शब्द आम हो गए हैं, मानो अब रिश्तों की अहमियत कम हो गई हो. इस बदलाव की एक बड़ी वजह सोशल मीडिया भी है. आजकल बहुत से लोग इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियोज में दिखाए गए ‘परफेक्ट कपल्स’ को देखकर अपनी शादीशुदा जिंदगी से कंपेयर करने लगते हैं. अगर किसी वीडियो में दिखाया गया कि एक पति रोज अपनी पत्नी के लिए खाना बनाता है या पत्नी रोज अपने पति के पैर दबाती है, तो असल जिंदगी के रिश्तों में भी वैसी ही उम्मीदें जागने लगती हैं.

दिक्कत तब होती है जब ये उम्मीदें हकीकत नहीं बन पाती. बहुत से वीडियो सिर्फ व्यूज और लाइक्स के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन लोग उन्हें सच मान बैठते हैं. जबकि हर रिश्ता अलग होता है और हर इंसान की सोच अलग होती है. आज के समय में हर कोई कमाता है फिर चाहे वे पति हो या पत्नी क्योंकि महंगाई भरे इस दौर में एक की कमाई से घर चलाना काफी मुश्किल हो चुका है. महंगाई की बात ना भी करें तो आजकल लड़कियां भी चाहती हैं कि वे किसी पर डिपेंडेंट ना रहें और खुद पैसे कमाएं.

इसी के चलते दोनों में बराबर की ईगो भी जन्म ले लेती है और ऐसे में जब घर की जिम्मेदारियों की बात आती है तो पति सोचता है कि यह तो सिर्फ पत्नी का ही काम है लेकिन ऐसी सोच रखना बिल्कुल गलत है. अगर पत्नी कमाने जा सकती है तो पति को भी घर के काम करने में शर्म नहीं आनी चाहिए. अगर आप पूरे दिन काम करके थक जाते हैं ठीक उसी तरह आपकी पत्नी भी थकती है. आप सारी जिम्मेदारियां पत्नी पर नहीं डाल सकते.

दूसरी ओर, यह समझना भी जरूरी है कि अगर एक कमा भी रही है और सेल्फ डिपेंडेंट है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह अपने पति की इज्जत करना छोड़ दे या फिर घर की जिम्मेदारियों से खुद को अलग कर ले. शादी एक ऐसा रिश्ता है जिसमें आपने एक-दूसरे का साथ देने का वादा किया है, तो फिर रिश्ते में ‘मैं’ और ‘तुम’ की जगह ‘हम’ होना चाहिए. अगर आपका पति घर के कामों में आपकी मदद करता है, तो यह उसकी समझदारी है. ऐसे में पत्नी का भी यह फर्ज़ बनता है कि वह ना सिर्फ पति के इमोशंस को समझे, बल्कि घर की बाकी जिम्मेदारियों में भी अपनी हिस्सेदारी निभाए.

रिश्ते में ईगो की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. सच्चा रिश्ता वही होता है जहां दोनों एक-दूसरे की बात सुनें, समझें और बिना किसी से तुलना किए एक दूसरे का साथ निभाएं. Relationship Tips

Social Issue: पति ने की दूसरी शादी, तो पहली पत्नी ने मचाया तांडव

Social Issue: बिहार पुलिस के एक जवान ने दूसरी शादी की, तो उस की पहली पत्नी ने जबरदस्त हंगामा किया… दरअसल, यह मामला बिहार के एक जिले से सामने आया है, जहां पुलिस जवान ने बिना अपनी पहली पत्नी को बताए और बिना तलाक दिए दूसरी शादी कर ली.

पहली पत्नी को जब इस बारे में पता चला, तो उस ने गुस्से में आ कर जम कर हंगामा किया और पुलिस जवान पर कई आरोप लगाए… महिला ने पुलिस जवान के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई.. इस के बाद मामला इलाके में चर्चा की बात बन गया और लोग इसे ले कर सोशल मीडिया पर भी कमैंट करने लगे.

जानिए पूरा मामला

भागलपुर में एक सिपाही ने पहली बीवी को छोड़ कर दूसरी औरत से शादी रचा ली, जिस को ले कर पहली बीवी ने जम कर तांडव किया.

इन दिनों देखा जा रहा है कि 2 शादी करना ट्रैंड सा हो गया है. और तो और अब इस में पुलिस के जवान भी शामिल हो गए हैं. यह मामला भी खूब तूल पकड़ रहा है. यह मामला शिवनारायणपुर के बिहार पुलिस जवान मोहम्मद वहाब अंसारी का है. वह बिना तलाक दिए ही दूसरी शादी कर के नई बीवी घर ले आया, तो हंगामा मच गया, क्योंकि जब इस की खबर पहली पत्नी अजमीरा खातून को मिली और उस ने जम कर तांडव किया.

पहली बीवी अपने परिवार वालों के साथ मोहम्मद वहाब अंसारी के घर पर पहुंची और हंगामा शुरू हो गया. इस मामले में जब आरोपी सिपाही से पूछा गया कि आप ने अपनी पहली बीवी को तलाक दिया है या नहीं, तो उस ने कहा कि नहीं मैं ने तलाक नहीं दिया है.

तब आप क्या कानून को नहीं मानते हैं, तो उस ने कहा कि यह हमारी गलती है, हम गलती स्वीकार करते हैं.

बताते चलें कि कुछ दिन पहले ही मोहम्मद वहाब अंसारी पर ऐसा आरोप है कि कुछ दिन पहले ही अजमीरा खातून को घर से बेघर कर दिया है. उन को बिहार पुलिस के जवान मोहम्मद वहाब से एक बच्चा भी है. पहली बीवी ने पति पर मारपीट का भी आरोप लगाया है. कहा कि वे दहेज की भी मांग करते हैं, जबकि जवान मोहम्मद वहाब ने पहली बीवी से लव मैरिज की थी.. और दूसरी बीवी से भी लव मैरिज की है… तो ऐसे बिहार पुलिस जवान को कब तक सजा मिलेगी, यह देखने वाली बात है.

लेकिन इस घटना ने यह सवाल उठाया कि समाज में ऐसे मामलों के प्रति सोच और संवेदनशीलता क्या होनी चाहिए, खासकर जब बात पारिवारिक और कानूनी अधिकारों की होती है? यह घटना एक गंभीर और दिलचस्प मामला है, जो समाज में बढ़ते हुए तलाक और दूसरी शादी के मामलों को ले कर कई सवाल खड़े करता है. कानूनी रूप से देखा जाए तो एक पति को बिना अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए दूसरी शादी करना भारतीय दंड संहिता और मुसलिम पर्सनल ला के तहत गलत है.

इस तरह की घटनाओं से समाज में दोहरी शादी को ले कर और भी विचार-विमर्श बढ़ेगा… खासकर पुलिस जैसे संवेदनशील विभाग में काम करने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून और नैतिकता का पालन करें, ताकि समाज में एक पौजिटिव संदेश जाए.

Valentine’s Day 2024: सैक्स से पहले छेड़छाड़ है बेहद जरूरी, अपनाएं ये तरीके

प्रिया का कहना है कि उस का पति जिस्मानी रिश्ता बनाते समय बिलकुल भी छेड़छाड़ नहीं करता और न ही प्यार भरी बातें करता है. उसे तो बस अपनी तसल्ली से मतलब होता है. जब तन की आग बुझ जाती है, तो निढाल हो कर चुपचाप सो जाता है. वह बिन पानी की मछली की तरह तड़पती ही रह जाती है.

कुछ इसी तरह राजेंद्र का कहना है, ‘‘जिस्मानी रिश्ता कायम करते वक्त मेरी पत्नी बिलकुल सुस्त पड़ जाती है. वह न तो इनकार करती है और न ही प्यार में पूरी तरह हिस्सेदार बनती है. न ही छेड़छाड़ होती है और न ही रूठनामनाना. नतीजतन, सैक्स में कोई मजा ही नहीं आता.’’

इसी तरह सरिता की भी शिकायत है कि उस का पति उस के कहने पर जिस्मानी रिश्ता तो कायम करता है, पर वह सुख नहीं दे पाता, जो चरम सीमा पर पहुंचाता हो. हालांकि वह अपनी मंजिल पर पहुंच जाता है, फिर भी सरिता को ऐसा लगता है, मानो वह अपनी मंजिल पर पहुंच कर भी नहीं पहुंची. सैक्स के दौरान वह इतनी जल्दबाजी करता है, मानो कोई ट्रेन पकड़नी हो. उसे यह भी खयाल नहीं रहता कि सोते समय और भी कई राहों से गुजरना पड़ता है. मसलन छेड़छाड़, चुंबन, सहलाना वगैरह. नतीजतन, सरिता सुख भोग कर भी प्यासी ही रह जाती है.

मनोज की हालत तो सब से अलग  है. उस का कहना है, ‘‘मेरी पत्नी इतनी शरमीली है कि जिस्मानी रिश्ता ही नहीं बनाने देती. अगर मैं उस के संग जबरदस्ती करता हूं, तो वह नाराज हो जाती है. छेड़छाड़ करता हूं, तो तुनक जाती?है, मानो मैं कोई पराया मर्द हूं. समझाने पर वह कहती है कि अभी नहीं, इस के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी हुई है.’’

इसी तरह और भी अनगिनत पतिपत्नी हैं, जो एकदूसरे की दिली चाहत को बिलकुल नहीं समझते और न ही समझने की कोशिश करते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि शादीशुदा जिंदगी कच्चे धागे की तरह होती है. इस में जरा सी खरोंच लग जाए, तो वह पलभर में टूट सकती है.

पतिपत्नी में छेड़छाड़ तो बहुत जरूरी है, इस के बिना तो जिंदगी में कोई रस ही नहीं, इसलिए यह जरूरी है कि पति की छेड़छाड़ का जवाब पत्नी पूरे जोश से दे और पत्नी की छेड़छाड़ का जवाब पति भी दोगुने मजे से दे. इस से जिंदगी में हमेशा नएपन का एहसास होता है.

अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने के दौरान या किसी दूसरे समय पर भी पति अपनी पत्नी को सहलाए और उस के जवाब में पत्नी पूरे जोश के साथ प्यार से पति के गालों को चूमते हुए अपने दांत गड़ा दे, तो उस मजे की कोई सीमा नहीं होती. पति तुरंत सैक्स सुख के सागर में डूबनेउतराने लगता है.

इसी तरह पत्नी भी अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने से पहले या उस दौरान पति से छेड़छाड़ करते हुए उस के अंगों को सहला दे, तो कुदरती बात है कि पति जोश से भर उठेगा और उस के जोश की सीमा भी बढ़ जाएगी.

कभीकभी यह सवाल भी उठता है कि क्या जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए कायम किया जाता है? क्या दिमागी सुकून से उस का कोई लेनादेना नहीं होता? क्या जिस्मानी रिश्ते के दौरान छेड़छाड़ करना जरूरी है? क्या छेड़छाड़ सैक्स सुख में बढ़ोतरी करती है? क्या छेड़छाड़ से पतिपत्नी को सच्चा सुख मिलता है?

इसी तरह और भी कई सवाल हैं, जो पतिपत्नी को बेचैन किए रहते हैं. जवाब यह है कि जिस्मानी रिश्तों के दौरान छेड़छाड़ व कुछ रोमांटिक बातें बहुत जरूरी हैं. इस के बिना तो सैक्स सुख का मजा बिलकुल अधूरा है. जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए ही नहीं, बल्कि दिमागी सुकून के लिए भी किया जाता है.

कुछ पति ऐसे होते हैं, जो पत्नी की मरजी की बिलकुल भी परवाह नहीं करते, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. पत्नी की चाहत का भी पूरा खयाल रखना चाहिए, नहीं तो आप की पत्नी जिंदगीभर तड़पती ही रह जाएगी.

कुछ औरतें बिलकुल ही सुस्त होती हैं. वे पति को अपना जिस्म सौंप कर फर्ज अदायगी कर लेती हैं. उन्हें यह भी एहसास नहीं होता कि इस तरह वे अपने पति को अपने से दूर कर रही हैं.

कुछ पति जिस्मानी रिश्ता तो कायम करते हैं और जल्दबाजी में अपनी मंजिल पर पहुंच भी जाते हैं, परंतु उन्हें इतना भी पता नहीं होता कि इस के पहले भी और कई काम होते हैं, जो उन के मजे को कई गुना बढ़ा सकते हैं.

कुछ औरतें शरमीली होती हैं. वे जिस्मानी रिश्तों से दूर तो होती ही हैं, छेड़छाड़ को भी बुरा मानती हैं.

अब आप ही बताइए कि ऐसे हालात में क्या पत्नी पति से और पति पत्नी से खुश रह सकता है?

नहीं न… तो फिर ऐसे हालात ही क्यों पैदा किए जाएं, जिन से पतिपत्नी एकदूसरे से नाखुश रहें?

इसलिए प्यार के सुनहरे पलों को छेड़छाड़, हंसीखुशी व रोमांटिक बातों में बिताइए, ताकि आने वाला कल आप के लिए और ज्यादा मजेदार बन जाए.

मैं कैसे पता करूं कि मेरी होने वाली पत्नी अच्छी है या नहीं? कृपया सुझाव दें

सवाल

हाल ही में मेरे पैरेंट्स ने मेरे लिए एक लड़की पसंद की है. वह मेरे पापा के फ्रैंड की बेटी है. लड़की मु झे भी अच्छी लगी और मैं ने शादी के लिए रजामंदी दे दी. लेकिन फिर भी मैं ने घरवालों से कह दिया है कि मैं पहले लड़की से 2-3 महीने मिलजुल कर, बातें कर के फाइनल हां बोलूंगा. मुझे बताइए किन बातों पर ध्यान देना चाहिए जिस से मैं पता लगा सकूं कि यह लड़की मेरे लिए एक अच्छी बीवी साबित होगी क्योंकि शादी को लेकर मेरे विचार सीरियस हैं. शादी मेरे लिए कोई गुड्डेगुड़ियां का खेल नहीं. मैं एक सुखी पारिवारिक जीवन बिताना चाहता हूं.

जवाब

बहुत अच्छी बात है कि आप शादी को एक अटूट बंधन मानते हैं. वाकई इस रिश्ते की नींव ही मजबूत होनी चाहिए. इसीलिए हम भी यही चाहेंगे कि 2-3 महीने में आप उस लड़की से बातचीत कर के, मेलजोल रख कर उस के व्यवहार, आचार से परिचित हो जाएं कि वह आप की उम्मीदों पर खरी उतरती भी है या नहीं.

इस बात पर जरूर ध्यान दें वह आलसी और दूसरों पर निर्भर रहने वाली तो नहीं. ऐसी लड़कियां घर नहीं संभाल पातीं और यही बात  झगड़े की वजह बनती है.

छोटीछोटी बातों को ले कर  झगड़ने या नाराज होने की आदत तो नहीं. अगर हां तो शादी के बाद ये चीजें बढ़ ही जाएंगी. अगर उस लड़की का व्यवहार सब के साथ कठोर है तो आप को दोबारा सोचने की जरूरत है. ऐसे में इस बात की चिंता होना जायज है कि वह आप के मातापिता के साथ कैसा व्यवहार करेगी.

कहीं उसे बातें छिपाने की आदत तो नहीं? क्योंकि आने वाले समय में यही बात बड़े मनमुटाव की वजह बन सकती है.

एक बात खास, यदि वह हर समय आप को बदलने के बारे में ही बातें करे या उसे आप की आदतों में बुराई नजर आए तो उस से तुरंत कन्नी काटने में ही भलाई है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

 सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

मेरी गर्लफ्रेंड कभी कभी इतनी बेवकूफी भरी हरकत कर देती है कि मुझे अपनी पसंद पर शक होने लगता है, मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 22 साल का नौजवान हूं और अपने पड़ोस की एक 17 साल की लड़की को बहुत पसंद करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं. पर वह लड़की अभी नाबालिग है, इसलिए मैं बंध गया हूं. इतना ही नहीं, उस लड़की में बचपना भी बहुत है. वह कभीकभार इतनी बेवकूफी भरी हरकत कर देती है कि मुझे अपनी पसंद पर खुद ही शक होने लगता है.

हाल ही में उस लड़की ने भरे बाजार मुझे चूम लिया था और वहां से भाग गई थी. क्या मुझे उस लड़की से शादी करनी चाहिए?

ये भी पढ़ें- मेरी पत्नी के घरवालों ने मुझ पर नाबालिग लड़की को अगवा करने का केस दर्ज करा दिया है, मैं क्या करूं?

जवाब

जाहिर है कि वह लड़की नाबालिग होने के साथसाथ चुलबुली, नादान और अल्हड़ भी है, पर हिम्मत तो उस में गजब की है, जो भरे बाजार वह आप को चूम भी लेती है.

शादी को ले कर अभी जल्दबाजी न करें, क्योंकि मुमकिन यह भी है कि वह लड़की वाकई बेवकूफ हो, जो आगे चल कर आप के लिए अच्छीखासी मुसीबत बन सकती है. उसे दुनियादारी के बारे में समझाएं. अभी कम उम्र के चलते उस का बचपना गया नहीं है. उस के बालिग और समझदार होने तक इंतजार करें.

ये भी पढ़ें- मुझे शक है कि मेरे पति का दूसरी औरत के साथ अफेयर चल रहा है, मैं क्या करूं?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem
अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें