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जागरूकता : पूजापाठी नहीं कामकाजी बनें

आमतौर पर लोगों को बचपन से एक ही बात सिखाई जाती है कि मंदिर जाओ, जोत जला कर धूपबत्ती करो और फिर भगवान से जो भी मांगो वह मिल जाएगा. सवाल उठता है कि अपने मतलब के लिए मंदिर जा कर फलफूल और प्रसाद चढ़ा कर भगवान से इस तरह मांगने वालों को हम क्या कहेंगे? रिश्वत के नाम पर कुछ फलफूल, अगरबत्ती, मिठाई और सिक्के दे कर क्या आप भगवान से अपनी बात मनवा लेंगे? कभी नहीं.

रिश्वत देना तो वैसे भी अपराध होता है. फिर यहां इसे अपराध क्यों न माना जाए? बिना किसी मतलब के कौन है जो मंदिरों के चक्कर लगाता है? यह तो एक तरह का कारोबार बन गया है. कुछ हासिल करना है तो पूजा करने पहुंच जाओ या घर में ही आंख बंद कर के भगवान की मूर्ति के आगे अपनी बात दोहराते रहो.

हमें बचपन से कर्म यानी काम करने की सीख क्यों नहीं दी जाती है? अपनी मेहनत, लगन और काबिलीयत से मनचाही चीज हासिल करने की सलाह क्यों नहीं दी जाती है? कर्म की अहमियत क्यों नहीं समझाई जाती है? कामकाजी बनने से बढ़ कर कामयाबी के लिए और क्या चाहिए? बचपन से बच्चों को कर्मप्रधान बनने के बारे में सिखाया क्यों नहीं जाता है?

कितने ही लोग दिनरात मंदिर में पूजापाठ में लगे रहते हैं. कभी सावन, कभी नरक चतुर्दशी, कभी पूर्णमासी, कभी नवरात्र, कभी मंगलवार, कभी शनिवार और इसी तरह कितने ही खास दिन आते रहते हैं यानी पूजा के लिए जरूरी दिनों की कोई कमी नहीं है. इन सब के पीछे चाहे काम का कुछ भी नुकसान क्यों न हो जाए, सब चलता है.

किराने की दुकान चलाने वाले 50 साल के आनंद दास बताते हैं, “मेरे एक दोस्त हैं जिन से कामकाज के लिए बात करने को मिलने के लिए बोलो तो कहेंगे कि अभी नहाधो कर मंदिर जाना है, वहां एक घंटे का समय पूजापाठ में लगेगा और फिर पंडित से मिल कर व्रतउपवास और कर्मकांड से जुड़ी कुछ जरूरी बात करनी है, कुछ दानदक्षिणा भी देनी है. वहां से निबट कर घर जाऊंगा और फिर नाश्ता करूंगा. इन सब में 2-3 घंटे तो लग ही जाएंगे.

“अपने दोस्त की ये बातें सुन कर मैं यही सोचता हूं कि इस इनसान के पास काम करने का समय कहां रह जाता होगा?”

काम से होता है सब हासिल

सच है कि इनसान जिंदगीभर तरक्की खोजता रहता है, पर शायद उसे यह नहीं मालूम कि आप अगर कर्मशील बनेंगे तो सब हासिल किया जा सकता है. इनसान को जिंदगी में अच्छा ज्ञान हासिल करना चाहिए, ताकि उस के बल पर वह हुनरमंद बन सके और अपनी गुजरबसर अच्छे तरीके से कर पाए. कामधंधे की तालीम ले कर, अपने हुनर में पक्का हो कर अगर इनसान मन लगा कर काम करेगा तो उसे मनचाहा फायदा जरूर मिलेगा.

हमारे काम या व्यापार को बढ़ाने के लिए दिमाग में अचानक आने वाले विचार को तुरंत अपने व्यवसाय पर लागू कर दें और फिर देखें कमाल. पैसों की बरसात होगी.

इस तरह से इनसान अपने ज्ञान और अपनी मेहनत के बल पर धन खूब कमा सकता है और मन की मुरादें पूरी कर सकता है. इस के उलट 3-4 घंटे मंत्रजाप, भजनकीर्तन, दिनरात धूपबत्ती कर के या पंडितों और बाबाओं के बताए उपाय आजमा कर वह कभी भी तरक्की के रास्ते पर आगे नहीं पहुंचता है.

मेहनत है असली दौलत

जो इनसान अपने घर से कमाई करने के लिए निकलेगा उस का धूप से तो वास्ता पड़ेगा, मगर जब वह मेहनत कर और धूलमिट्टी फांक कर घर आएगा तो भले ही उस का रंग सांवला हो जाए, मगर शरीर मजबूत और कारोबार में कामयाबी जरूर मिलेगी.

अकसर लोग ज्योतिषी से अपना भविष्य पूछने जाते हैं. वह बताता है कि आप के ग्रहनक्षत्र ठीक नहीं हैं और इन को साधारण उपायों द्वारा ठीक किया जा सकता है. ग्रहनक्षत्र ठीक होते ही आप का शरीर अच्छा काम करेगा, आप की योजनाएं सही रूप में कामयाब होंगी और आप खूब धन कमा सकेंगे. आप की इज्जत बढ़ेगी, आप का परिवार सुखी रहेगा और घर में खुशहाली आएगी.

याद रखिए कि ग्रहनक्षत्र खराब नहीं होते. यह तो ज्योतिषियों का धन ऐंठने का तरीका है. आप उन के बहकावे में आ कर उपाय करवाते हैं और अपने पास मौजूद रकम भी गंवा बैठते हैं. इस के उलट अपनी मेहनत पर यकीन रखिए और फिर देखिए नतीजा. कोई राहुकेतु आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा.

कर्म ही पूजा है

एक सैनिक जो महीनों तक सीमा की रक्षा करता है, वह किसी मंदिरमसजिद के चक्कर नहीं लगाता. उस का काम ही उसे इज्जत के काबिल बनाता है. इसी तरह किसी डाक्टर को कोई जरुरी सर्जरी करनी है, मगर वह उसे छोड़ कर यह कहे कि उस की पूजा का समय हो गया है या मंदिर जाए बिना वह सर्जरी नहीं करेगा, तो ऐसे डाक्टर को हम क्या कहेंगे?

याद रखें कि एक इनसान जो अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ करता है, उसे किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है. नौकरी वाले दफ्तर जाते हैं, किसान और मजदूर खेतों में जाते हैं, सिपाही लड़ाई के मैदान में जाते हैं, डाक्टर अस्पताल जाते हैं और वकील कोर्ट जाते हैं.

हर कोई अपनेअपने क्षेत्र में काम करता है. काम, जैसा कि हम सभी जानते हैं, वह है जो हमें अपनी रोजीरोटी चलाने के लिए, अपने चहेतों की जरूरतों को पूरा करने के लिए करना जरूरी होता है.

जिंदगी की सच्ची सीख यह है कि हम क्या करते हैं और कितने बेहतर तरीके से करते हैं, लेकिन यह नहीं कि हम भगवान की पूजा करने में कितना समय देते हैं.

चंपारण में रहने वाले निकुंज कहते हैं, “हमारे गांव में 2 दोस्त रहते थे. एक गरीब मगर मेहनती लोहार था, जबकि दूसरा मंदिर का एक आलसी पुजारी था. उसे काम किए बिना खाने की आदत थी.

“पुजारी अकसर उस लोहार से मजाक में कहता था कि चाहे वह जितनी मेहनत कर ले भगवान सुख उसे ही देंगे, क्योंकि वह नियमित रूप से पूजा करता है.

“लोहार अपने रोजमर्रा के काम में इतना मस्त रहता था कि उसे कभी भी मंदिर जाने का समय नहीं मिल पाता था. इन दोनों की मुलाकात कभी किसी त्योहार के समय हो जाती थी. समय बीतने के साथ और सालों की कड़ी मेहनत के बाद लोहार गांव का सब से अमीर आदमी बन चुका था, जबकि पुजारी वैसे ही मांग कर या दान के रुपयों से गुजारा कर रहा था. वह बीमार भी रहने लगा था.

“इधर लोहार ने गांव में एक स्कूल खोला और इस के लिए एक छोटा सा समारोह रखा. वहां वह अपने पुराने दोस्त यानी उस पुजारी से मिला. जब लोहार से उस की कामयाबी के राज के बारे में पूछा गया तो उस ने सिर्फ चार शब्द कहे कि कर्म ही पूजा है.

“लोहार की बात सुन कर पहली दफा पुजारी को अपनी गलती का अहसास हुआ. उस की नजरों में लोहार का कद बहुत ऊंचा हो चुका था और अब उसे जिंदगी की हकीकत समझ में आ गई थी.

ज्यादा पूजापाठ समय की बरबादी

दरअसल, हम खुद को ही इस बात से भरम में रखते हैं कि हमारी असली समस्या क्या है. हम नहीं जानते हैं कि हमारी परेशानी क्या है और उस परेशानी का हल क्या है. हम इस के बजाय मंदिरमसजिद के चक्कर लगाते हैं और पाते हैं कि वे चीजें काम नहीं आ रही हैं और कोई नतीजा नहीं निकल रहा है.

उदाहरण के लिए किसी को लोगों से बातचीत करने में शर्म आती है या वह इंगलिश नहीं बोल पाता, उसे डर या झिझक होती है और ऐसे में वह सुबहशाम पूजापाठ करे तो क्या उस की इस समस्या का हल हो जाएगा? नहीं, बल्कि उस की समस्या तो तभी हल होगी न जब वह लोगों से बातचीत करने की हिम्मत करेगा, किसी इंगलिश स्पीकिंग कोर्स में दाखिला लेगा और बोलने का अभ्यास करेगा.

इस के उलट अगर वह दिन का बहुत सारा समय पूजापाठ या भजनकीर्तन में लगाएगा, मंदिर की भीड़ में एक लोटा जल ले कर घंटों लाइन में लगा रहेगा या व्रतउपवास करेगा, तो कोई फायदा नहीं मिलेगा.

जाहिर है कि सुबहशाम पूजा करने के बाद भी ज्यादातर लोगों की जिंदगी और मन में कुछ खास बदलाव नहीं आता, इसलिए पूजापाठ के बजाय मेहनत करें.

इस स्कूल में लगती है ‘डीएम अंकल’ की पाठशाला

पटना के बांकीपुर स्कूल की लड़कियां सुबह से जोश में थीं और बारबार उन की निगाहें दरवाजे की ओर उठ जाती थीं. दोपहर के सवा एक बजे एक शख्स क्लासरूम में दाखिल हुए, जो किसी भी तरह से स्कूल के मास्टर नहीं लग रहे थे. दरअसल, वे शख्स थे पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल. उन्होंने एक छात्रा खुशबू कुमारी की कौपी उठा कर पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछा, तो उस ने कहा कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है. डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने जब इस बारे में स्कूल प्रशासन से पूछा, तो पता चला कि वहां पर भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, भूगोल, हिंदी, उर्दू, टाइपिंग और संगीत के टीचर ही नहीं हैं. जब उन्होंने छात्राओं से पूछा कि वे कोचिंग क्यों जाती हैं, तो मासूम बच्चियों ने यह कह कर एक झटके में ऐजूकेशन सिस्टम की कलई खोल दी कि स्कूल में तो पढ़ाई होती ही नहीं है. सभी छात्राओं का यही दर्द था कि अगर वे कोचिंग नहीं करेंगी, तो कोर्स पूरा नहीं होगा.

बिहार की शिक्षा व्यवस्था से रूबरू होने के लिए पटना के कलक्टर संजय कुमार अग्रवाल 27 जनवरी, 2017 को एक सरकारी स्कूल में छात्राओं को पढ़ाने पहुंचे. उन्होंने पटना के तमाम सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए अफसरों की एक टीम बनाई है.

शिक्षा विभाग के सूत्र बताते हैं कि अफसर अपना काम तो ठीक से करते नहीं हैं, ऐक्स्ट्रा काम वे क्या खाक करेंगे. मास्टरों का काम अफसरों से करा कर एजूकेशन सिस्टम को ठीक करने की बात सोचना खुली आंखों से सपना देखने की ही तरह है. सरकारी स्कूलों की बदहाली के लिए अफसरशाही ही जिम्मेदार है.

कुछ भी हो, सरकारी स्कूलों को दुरुस्त करने के लिए पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने अनोखी पहल की है. उन्होंने 2 सौ अफसरों की एक टीम तैयार की है, जो हर हफ्ते स्कूलों में जा कर एक घंटे तक बच्चों के बीच गुजारेंगे और स्कूल की कमियों को दूर करने की कोशिश करेंगे. हर दिन अफसरों को सामान्य काम में रुकावट नहीं आए, इस के लिए रोस्टर तैयार किया गया है.

डीएम, एसडीएम, एडीएम, डीएसपी, बीडीओ, सीओ, थानेदार, सीडीपीओ और शिक्षा विभाग के तमाम बड़े अफसरों को सरकारी स्कूलों में हो रही पढ़ाई की क्वालिटी को सुधारने की मुहिम में लगाया गया है.

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने बताया कि आमतौर पर जब कोई अफसर किसी स्कूल का दौरा करता है, तो उस के पहुंचने से पहले ही स्कूल प्रशासन वहां की तमाम व्यवस्था आननफानन दुरुस्त कर लेता है. अफसर के लौटने के बाद स्कूल की हालत फिर से बदतर हो जाती है. अब अफसर जब रोज स्कूल जाएंगे, तो वहां की हालत हमेशा दुरुस्त रहेगी. अफसर भी स्कूल की कमियों को दूर करने का काम करेंगे.

अफसर जिस किसी स्कूल में जाएंगे, वहां केवल बच्चों को किताबी या नैतिक बातें ही नहीं पढ़ाएंगे, बल्कि वहां की कमियों को भी देखेंगे और उन्हें दूर करने के उपाय करेंगे. हर अफसर स्कूल

के रजिस्टर पर अपनी हाजिरी भी लगाएगा. अफसरों के इस काम की मौनीटरिंग भी होगी.

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल की पहल तो अच्छी है, पर वे अब अफसरों की मौनीटरिंग के ठोस इंतजाम करने की बात कर रहे हैं, तो मास्टरों की मौनीटरिंग के ठोस इंतजाम क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

फीफा वर्ल्ड कप 2022 :धर्म के जाल में उलझा खूबसूरत खेल

इस बार का फीफा वर्ल्ड कप कतर देश में हुआ था और वहां की मेजबानी की हर जगह तारीफ भी हुई. हो भी क्यों न, यह फुटबाल वर्ल्ड कप अब तक का सब से महंगा खेल आयोजन जो था.

याद रहे कि कतर को साल 2010 में फुटबाल वर्ल्ड कप की मेजबानी मिली थी और तब से इस देश ने इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था. इस के लिए 6 नए स्टेडियम बनाए थे, जबकि 2 पुराने स्टेडियमों का कायाकल्प किया गया था. इस के अलावा दूसरे कामों पर भी जम कर पैसा खर्च किया गया था.

एक अंदाज के मुताबिक, कतर ने इस आयोजन पर कुल 222 अरब डौलर की भारीभरकम रकम खर्च की थी. इस से पहले का फुटबाल वर्ल्ड कप साल 2018 में रूस में कराया गया था, जिस पर कुल 11.6 अरब डौलर खर्च हुए थे.

कतर में हुए वर्ल्ड कप में दुनियाभर से आई 32 देशों की टीमें शामिल थीं और सभी चाहती थीं कि वे अपना बैस्ट खेल दिखाएं. जापान और मोरक्को ने तो सब को चौंकाया भी. जापान ने जरमनी को हराया था, तो मोरक्को कई दिग्गज टीमों को हराते हुए सैमीफाइनल मुकाबले तक जा पहुंची थी, जहां वह फ्रांस से हार गई थी. सऊदी अरब ने भी अर्जेंटीना पर जीत हासिल कर के बड़ा उलटफेर किया था.

पर इतने सारे रोमांच व खिलाडि़यों की कड़ी मेहनत के बावजूद फुटबाल वर्ल्ड कप के साथसाथ सोशल मीडिया पर एक अलग ही खेल चल रहा था, जिस पर धर्म का जाल कसा हुआ था. फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन कराने को ले कर मिस्र के एक मौलाना यूनुस माखियान कतर पर ही बरस पड़े थे. उन्होंने अपने बयान में फुटबाल को समय की बरबादी बताते हुए लियोनेल मैसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे खिलाडि़यों को इसलाम का दुश्मन (काफिर) कह दिया था. उन की राय थी कि फुटबाल पर खर्च करने के बजाय परमाणु बम बनाने में पैसा खर्च करना चाहिए था.

भारत के केरल में नौजवान फुटबाल के दीवाने हैं. लेकिन वहीं के समस्त केरल जाम अय्यातुल उलमा के तहत कुतुबा समिति के महासचिव नासर फैजी कूडाथायी ने अर्जेंटीना के लियोनेल मैसी, पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और नेमार जूनियर जैसे पसंदीदा फुटबाल सितारों के बड़े कटआउट लगाने को गलत बताया और कहा कि उन्हें इस में बहुत ज्यादा पैसा खर्च करने वाले फुटबाल प्रशंसकों की चिंता है. केरल में पुर्तगाल के झंडे लहराना भी गलत है, क्योंकि उस ने कई देशों पर जबरन राज किया था.

इस के अलावा इस वर्ल्ड कप में मोरक्को की सनसनीखेज जीतों को धर्म और इसलाम से जोड़ा जाने लगा था. सोशल मीडिया पर ऐसा माहौल बनाया जा रहा था मानो मोरक्को देश की शानदार टीम फुटबाल नहीं खेल रही थी, बल्कि धर्म का प्रचार कर रही थी. उस की हर जीत पर अल्लाह का रहम था और वह फुटबाल के मैदान पर नहीं, बल्कि किसी जंग के मैदान पर उतरी थी, जो पूरी दुनिया में इसलाम की जयजयकार करवाने को बेताब थी.

इस धार्मिक एंगल को ऐसे समझते हैं. इस टूर्नामैंट में मोरक्को ने जैसे क्रिस्टियानो रोनाल्डो की टीम पुर्तगाल को हराया, तो इस के बाद इंटरनैट पर मोरक्को की जीत के चर्चे तो हुए ही, इसे ‘इसलाम की जीत’ बताया जाने लगा, जबकि खेल एक ऐसी चीज है जो देशों, धर्मों और समुदायों के बीच की सीमा को मिटा देता है.

पर मोरक्को के सैमीफाइनल मुकाबले में पहुंचने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके इमरान खान ने लिखा, ‘पुर्तगाल पर जीत हासिल कर फुटबाल वर्ल्ड कप के सैमीफाइनल में पहुंचने के लिए मोरक्को को मुबारकबाद. यह पहली बार है, जब एक अरब, अफ्रीकी और मुसलिम टीम फीफा वर्ल्ड कप के सैमीफाइनल में पहुंची है. सैमीफाइनल और आगे की कामयाबी के लिए उन्हें शुभकामनाएं.’

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि मोरक्को मुसलिम बहुल अफ्रीकी देश है, पर जिस तरह से इमरान खान ने इसे सियासी और धार्मिक रंग दिया, वह मामला गड़बड़ कर गया. और भी लोगों द्वारा इसे ‘देश की जीत’ से बढ़ कर ‘इसलाम की जीत’ कह कर मामला गरमाया गया. मिशिगन की वेन स्टेट यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ाने वाले प्रोफैसर खालिद बिदुन ने कहा कि मोरक्को के खिलाडि़यों ने हर गोल और जीत के बाद इबादत में सिर झुकाया. यह दुनियाभर के 2 बिलियन मुसलमानों की जीत है.

जरमनी के फुटबाल खिलाड़ी रह चुके मेसुत ओजिल ने ट्वीट किया, ‘यह अफ्रीकी महाद्वीप और मुसलिम जगत के लिए बड़ी उपलब्धि है.’

एक यूजर ने लिखा कि मोरक्को की जीत से ‘फिलिस्तीन को गर्व है’. अब मोरक्को की जीत फिलिस्तीन के लिए गर्व की बात कैसे हो सकती है? क्या इस गर्व को इसलाम नाम की कड़ी जोड़ती है?

दरअसल, ‘अल जजीरा’ की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलिस्तीन में भी मोरक्को की जीत का जश्न मनाया जा रहा था. यह जश्न सिर्फ घरों में बैठ कर तालियां बजाने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोग सड़कों पर निकल रहे थे और ड्रम बजा कर, नारे लगा कर मोरक्को के लिए अपना समर्थन जाहिर कर रहे थे.

सवाल उठता है कि अगर यह इसलाम या धर्म की जीत थी, तो सैमीफाइनल मुकाबले में फ्रांस से हारने के बाद मोरक्को के प्रशंसक उग्र क्यों हो गए थे और वे टीम की हार को क्यों पचा नहीं पाए? उन्होंने फ्रांस की राजधानी पैरिस और बैल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में क्यों उत्पात मचाया? खुद एक इसलामिक देश कतर अपने तीनों ही मैच क्यों हार गया? ईरान और सऊदी अरब भी क्यों कोई कमाल नहीं दिखा पाए?

हकीकत तो यह है कि जब लोग खेल को धर्म के चश्मे से देखने लगते हैं, तो वे खिलाडि़यों की उस लगन और मेहनत को नकार देते हैं, जिसे सालों का पसीना बहाने के बाद हासिल किया जाता है. अगर मोरक्को फुटबाल टीम की बात करें, तो इस टूर्नामैंट में उस की एकता ही सब से ज्यादा असरदार रही है.

हैरत की बात तो यह है कि 26 सदस्यीय मोरक्को टीम में से सिर्फ 12 सदस्य इस देश में पैदा हुए थे, बाकी 14 सदस्य फ्रांस, स्पेन, बैल्जियम, इटली, नीदरलैंड्स और कनाडा जैसे देशों में पैदा हुए थे.

मोरक्को को इस मुकाम तक लाने के लिए टीम के कोच वालिद रेगरागुई के रोल को भी नहीं नकारा जा सकता है, जिन्होंने चंद महीनों में ही टीम को नए रंग में रंग दिया. उन्हें साल 2022 के अगस्त महीने में टीम का कोच बनाया गया था.

इस के अलावा साल 1999 से मोरक्को पर राज कर रहे किंग मोहम्मद 6 का भी इस देश की फुटबाल टीम के विकास में खास रोल रहा है. उन्होंने इस देश में फुटबाल अकादमी बनाने के लिए पैसे से मदद की. इस का नतीजा यह हुआ कि ऐसे खिलाड़ी उभर कर सामने आए, जो मोरक्को की प्रोफैशनल लीग (बोटोला) के साथसाथ अपने देश और विदेशी लीगों में भी नाम कमा रहे हैं.

सच तो यह है कि मोरक्को की टीम ने चौथे नंबर पर रह कर भी फुटबाल की दुनिया में नाम कमाया है और यह सब खिलाडि़यों, कोच और प्रशासन की मिलीजुली और कड़ी मेहनत का नतीजा है. 18 दिसंबर, 2022 को फ्रांस और अर्जेंटीना की टीमें इसलिए फाइनल मुकाबले में आमनेसामने थीं, क्योंकि उन्होंने पूरे टूर्नामैंट में उम्दा खेल दिखाया था. इस मुकाबले का दुनियाभर के लोगों ने लाइव देख कर मजा लिया, फिर चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले थे.

दोनों में से एक टीम को जीतना था और ऐसा हुआ भी. एक बेहद रोमांचक मुकाबले में अर्जेंटीना ने फ्रांस को मात दी. फ्रांस ने 2 गोल से पिछड़ने के बाद मैच के आखिरी चंद मिनटों में जैसे 2 गोल किए, तो लगा कि पिछली बार के चैंपियन को हराना इतना आसान नहीं है. ऐक्स्ट्रा टाइम में दोनों टीमों ने 1-1 गोल और दागा, जिस से मुकाबला पैनल्टी शूटआउट में चला गया, जहां अर्जेंटीना के गोलकीपर एमिलियानो मार्टिनेज ने अपने शानदार क्षेत्ररक्षण से फ्रांस का लगातार 2 बार फीफा चैंपियन बनने का सपना तोड़ दिया.

लेकिन खेल में हारजीत तो होती रहती है, पर इसे मनोरंजन का साधन ही रहने दिया जाए तो बेहतर रहेगा. सोशल मीडिया पर खिलाडि़यों की जाति, धर्म, रंग वगैरह को बीच में ला कर जो लोगों के दिलों में नफरत की दीवार ऊंची करने के मनसूबे पल रहे हैं, उन पर रोकथाम की जरूरत है, ताकि दुनिया का सब से मशहूर खेल यों ही सब का मनोरंजन करता रहे.अर्जेंटीना को जीत की बधाई और फ्रांस को सांस रोक देने वाले इस महानतम फाइनल मुकाबले का हिस्सा बनने के लिए शुक्रिया.

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