Social Story In Hindi: होंठ लाल काली आंखें

Social Story In Hindi: सागर अपने दोस्तों के साथ घुमक्कड़ी पर निकला. हाईवे पर कुछ जवान लड़कियां भड़कीले कपड़ों में खड़ी थीं. एक ढाबे वाले ने बताया कि बांछड़ा समाज की ये लड़कियां सड़क किनारे अपने डेरों में देह धंधा करती हैं. सागर एक डेरे में गया. वहां धंधा करने वाली एक लड़की ने उसे एक कड़वे सच से रूबरू कराया.

तकरीबन 3 साल पहले की बात है. अपने दोस्तों नागेंद्र, बृजेंद्र और अरविंद के साथ 10 दिन की घुमक्कड़ी के दौरान मेरा एक ऐसे सच से सामना हुआ, जिसे देखसुन कर मेरी रूह तक कांप गई.

उस दिन शाम का समय था. रतलाम से मंदसौरनीमच की ओर हमारा अभी 7 किलोमीटर तक का सफर ही तय हुआ था कि सड़क किनारे खड़ी जवान लड़़कियों को देख कर हमें हैरानी हुई. कार की रफ्तार धीमी कर मीलों दूर तक हम यह नजारा देख रहे थे.

कुछ देर के बाद हम ने एक ढाबे पर रुकने की सोची. कार से उतर कर ढाबे पर पड़ी खाट पर हम चारों दोस्त बैठ गए. हमारे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे.

तभी ढाबे का एक वेटर हाजिर हो गया.

अरविंद ने खाने का और्डर करते हुए उस वेटर से पूछा, ‘‘हाईवे पर ये जवान लड़कियां क्यों खड़ी रहती हैं?’’

यह सवाल सुनते ही उस वेटर ने अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘साहब, आप को चाहिए क्या? रातभर के लिए लड़की मिल जाएगी. मालिक से बात कर लीजिएगा.’’

उस वेटर का जवाब सुन कर हम लोग सकपका से गए. इस के बाद हम लोगों ने काउंटर पर जा कर ढाबे के मालिक जगदीश मीणा से उन लड़कियों के बारे में पूछा, तो उस ने बताया, ‘‘साहब, ये लड़कियां यहां के बांछड़ा समुदाय की हैं, जो अपने जिस्म का सौदा करने के लिए रोजाना ही सड़़कों पर उतर आती हैं.’’

‘‘इन्हें किसी का डर नहीं लगता, जो इस तरह खुलेआम सड़कों पर ग्राहक ढूंढ़ती हैं?’’ नागेंद्र ने पूछा.

‘‘ऐसा नहीं है कि ये लड़कियां चोरीछिपे किसी मजबूरी में इस तरह का धंधा करती हैं. इन जवान लड़कियों के मांबाप बड़े शौक से इन से यह घिनौना काम करवाते हैं. कई बार तो मांबाप ही इन लड़कियों के लिए ग्राहक ढूंढ़ कर लाते हैं.’’

जगदीश मीणा से सड़कों पर खड़ी लड़कियों के बारे में यह सच जान कर हम हैरान रह गए. खाने के समय भी हम लोगों की चर्चा में यही लड़कियां रहीं.

मध्य प्रदेश में मंदसौर से नीमच की ओर जाने वाले नैशनल हाईवे पर सफर के दौरान सड़कों पर भड़कीले कपड़ों में सजीधजी लड़कियों को देख कर गाडि़यों की रफ्तार अपनेआप ही धीमी हो जाती है.

होंठों पर लाल रंग की चटक लिपस्टिक और काजल भरी आंखों से इशारा करती लड़कियां ट्रक और कार चलाने वालों का ध्यान अपनी ओर अनायास ही खींच लेती हैं.

अपनी अदाओं से लोगों को लुभाती ये जवान लड़कियां अपने जिस्म का सौदा करती हैं. जिस्मफरोशी के इस बाजार में रोजाना न जाने कितनी ही लड़कियां चंद सौ रुपयों के लिए अपनी बोली लगाती हैं.

जिन लोगों ने महूनीमच नैशनल हाईवे का सफर किया है, उन्होंने कभी न कभी बांछड़ा समाज की इन लड़कियों को जरूर देखा होगा. भले ही किसी की गाड़ी न रुकी हो, लेकिन सड़क किनारे खड़ी 16-17 साल की उन लड़कियों को जरूर देखा गया होगा जो होंठों पर लिपस्टिक पोते, आंखों में काजल मले, खुले बालों के साथ, कमर मटकाती खुद के बिकने का इंतजार करती हैं.

रतलाम में मंदसौर, नीमच की ओर जाने वाले महूनीमच नैशनल हाईवे पर जावरा से तकरीबन 7 किलोमीटर दूर गांव बगाखेड़ा से बांछड़ा समुदाय के डेरों की शुरुआत होती है.

यहां से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर हाईवे पर ही परवलिया डेरा है. इस डेरे में बांछड़ा समुदाय के तकरीबन 50 परिवार रहते हैं.

महूनीमच नैशनल हाईवे पर डेरों की यह हालत नीमच जिले के नयागांव तक है. रतलाम जिले के दूरदराज के गांव भी इन के डेरों से आबाद हैं.

यह समुदाय हमेशा ग्रुप में रहता है, जिन्हें डेरा कहते हैं. बांछड़ा समुदाय के ज्यादातर लोग झोंपड़ीनुमा कच्चे मकानों में रहते हैं. इन की बस्ती को आम बोलचाल की भाषा में डेरा कहते हैं.

इन लोगों के बारे में यह भी कहा जाता है कि मेवाड़ की गद्दी से उतारे गए राजा राजस्थान के जंगलों में छिप कर अपने अलगअलग ठिकानों से मुगलों से लोहा लेते रहे थे. यह भी माना जाता है कि उन के कुछ सिपाही नरसिंहगढ़ में छिप गए थे और फिर वहां से मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में चले गए.

जब सेना बिखर गई तो उन लोगों के पास रोजीरोटी चलाने का कोई जरीया नहीं बचा. गुजारे के लिए मर्द डकैती डालने लगे, तो औरतों ने देह धंधे को अपना पेशा बना लिया. ऐसा कई पीढि़यों तक चलता रहा और आखिर में यह मजबूरी एक परंपरा बन गई.

शाम हो चली थी. अभी हम लोग सड़क से उतर कर एक डेरे की तरफ बढ़ रहे थे. टिमटिमाते बल्बों की रोशनी में अपने डेरे के सामने खड़ी उन लड़कियों को देख ही रहे थे. हर उम्र के मर्दों की मौजूदगी वहां दिखाई दे रही थी. किसी के कदम नशे में डगमगाते थे, तो कोई तयशुदा चाल में अंधेरे में खुलते दरवाजों की ओर बढ़ता था. हर दरवाजे पर सजी औरतें इशारों से ग्राहकों को बुला रही थीं और हम लोग थोड़ा सहमे हुए से थे.

तभी किसी नन्ही उंगली की हलकी सी पकड़ ने मेरी सोच की डोरी को झकझोर दिया.

‘‘अंकल, मेरी दीदी आप को बुला रही है,’’ 6-7 साल की मासूम सी एक बच्ची बोली. उस की आंखों में विजयी मुस्कान थी, चेहरा दमक रहा था.

‘‘कहां है तुम्हारी दीदी?’’

‘‘वह घर के अंदर, आप मेरे साथ चलो न.’’

उस लड़की के चेहरे में छिपी मासूमियत ने मुझे झकझोर दिया. क्या वह अपनी बहन के लिए ग्राहक ढूंढ़ रही है? यह खयाल आते ही मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई.

‘‘चलो न अंकल फिर मुझे खाना भी खाना है,’’ कह कर उस लड़की ने मेरा हाथ थाम लिया.

पहले तो मैं अकेले जाने से झिझका, मगर अपने अखबार के लिए एक खास रिपोर्ट बनाने के लिहाज से मेरे कदम अपनेआप उस लड़की के साथ चल पड़े.

मेरे दोस्त मुझे जाते हुए देख रहे थे. अरविंद बोला, ‘‘चले जाओ सागर, हम लोग यहीं हैं.’’

वह बच्ची फुरती में आगेआगे भागती, गलियों से होते हुए एक दरवाजे तक मुझे ले गई. उस ने दरवाजे पर हलकी सी दस्तक दी और मुझे देख कर मुसकराई.

दरवाजा खुला. एक अधेड़ सा आदमी बाहर निकला. बच्ची मुझे भीतर तक ले गई और कमरे के एक ओर इशारा कर के बोली, ‘‘यह मेरी दीदी है.’’

सामने एक पलंग पर बैठी औरत की तरफ मैं ने अपनी नजरें दौड़ाईं. वह औरत 28-30 साल की रही होगी. चेहरा खूबसूरत नहीं, मगर थका हुआ भी नहीं, बल्कि ऐसा, जिस में वक्त ठहर गया हो.

‘‘बैठिए,’’ कहते हुए वह औरत मुसकराई, मगर मुसकराहट से ज्यादा उस की आंखों में कई सवाल थे.

‘‘पानी या चाय कुछ लेंगे आप?’’ उस औरत ने पूछा.

‘‘जी नहीं, शुक्रिया.’’

‘‘ठीक है, पहले पैसे दीजिए.’’

मैं ने 500 रुपए का एक नोट उस के सामने कर दिया. उस ने नोट उठाया, माथे से लगाया और सामने टंगे एक पर्स में डाल दिया.

‘‘कहां तक पढ़ी हैं आप? आप को यह घिनौना काम अच्छा लगता है क्या?’’ मेरे इन सवालों पर वह औरत कुछ सकपकाई, मगर दूसरे ही पल आंखों में शरारत लिए बोली, ‘‘मैं तो खूब पढ़ना चाहती थी साहब, मगर मांबाप ने परंपरा की दुहाई दी. फिर भी नहीं मानी तो कहा गया कि तुम्हारी नानी और मां ने भी यही काम किया है.

‘‘आखिर में दो जून की रोटी का वास्ता दिया गया, तो मेरी आंखों के सामने अपने छोटेछोटे भाईबहनों के चेहरे घूमने लगे और घुटने टेकते हुए मैं ने समझौता कर लिया.

‘‘साहब, बांछड़ा समुदाय की लड़कियों को परंपरा का हवाला दे कर छोटी उम्र में ही देह धंधे के दलदल में धकेल दिया जाता है.’’

‘‘यह नन्ही गुडि़या आप की बहन है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्यों वक्त बरबाद कर रहे हैं साहब. जिस काम के लिए आए हैं, उसी से मतलब रखिए,’’ उस औरत ने अपनी बांहें मेरी गरदन पर डालते हुए कहा.

मैं ने कहा, ‘‘देखिए, मैं उस नीयत से नहीं आया. मैं एक पत्रकार हूं और तुम लोगों के इस घिनौने पेशे के खिलाफ पत्रिका में लिखना चाहता हूं. मैं आप से कुछ कहना और पूछना चाहता हूं.’’

‘‘तो कहिए मगर. वक्त की कीमत है. आप घंटे के पैसे रख लीजिए, मेरी बात सुन लीजिए.’’

मैं ने फिर एक 200 का नोट उस की तरफ बढ़ा दिया. उस ने थोड़ी देर मुझे देखा और नोट रखते हुए बोली, ‘‘हां, बताइए?’’

‘‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि इस बच्ची का जन्म शाप बन कर रह गया है?’’ मेरे इस सवाल पर उस औरत की हंसी बाहर निकल आई. अपनेआप को संभालते हुए उस ने जो बताया, उस ने मेरी रूह को झकझोर कर रख दिया.

‘‘साहब, देश का पढ़ालिखा तबका भले ही बेटी को मां के पेट में ही मारने पर उतारू है, मगर हमारे यहां तो बेटी पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है. मगर इस जश्न के पीछे छिपा है एक शर्मनाक सच.

एक बेटी यानी कम से कम 2 पुश्तों की आमदनी का जरीया. बांछड़ा समाज में, जो बेटियों की देह पर जिंदा है, देह धंधा बुरा नहीं है, बल्कि वह लघु उद्योग बन गया है.’’

मैं ने एक सांस में कह दिया, ‘‘आप यह काम छोड़ क्यों नहीं देतीं और शादी कर लीजिए. एक नई जिंदगी
शुरू कीजिए.’’

वह औरत इस तरह हंसी जैसे मैं ने कोई बचकाना सवाल कर दिया हो. वह बोली, ‘‘शादी? हम तो हर रोज शादी करते हैं साहब… कभी घंटेभर की, कभी पूरी रात की. शादी हमारे लिए एक सौदा है, सौगात नहीं.’’

‘‘आप के मातापिता को पता है कि आप यह धंधा करती हैं?’’

मेरा सवाल पूरा होने से पहले ही उस ने जवाब दिया, ‘‘अभी जो इस डेरे से दरवाजा खोल कर बाहर जाने वाला आदमी आप ने देखा… वही मेरा बाप है.’’

यह सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई.

‘‘और वह छोटी सी गुडि़या?’’

‘‘वह मेरी बेटी है.’’

‘‘बेटी? लेकिन वह आप को दीदी क्यों बुलाती है?’’

‘‘मैं ने उसे मां कहना कभी सिखाया ही नहीं, क्योंकि अगर वह जा कर बोलेगी कि मेरी ‘मां’ बुला रही है, तो कौन मेरे पास आएगा?’’

अब मैं बुत बन गया था. उस का जवाब मेरे जेहन में गूंज गया.

वह औरत बोली, ‘‘यहां लड़कियां सिर्फ अपनी होती हैं. उन के बाप कौन हैं, यह भी हम नहीं जानते. बेटियां हमारी जगह लेती हैं और बेटे दलाल बनते हैं. यही उसूल है इस बांछड़ा डेरे का.’’

तभी बाहर से फिर वही आवाज आई, ‘‘दीदी, टाइम हो गया.’’

मुझे लगा जैसे मेरी धड़कन वहीं अटक गई.

‘‘इस बच्ची का नाम क्या है?’’

‘‘मुसकान.’’

‘‘इस का क्या सोचा है?’’

‘‘बांछड़ा समुदाय में प्रथा के मुताबिक घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है. वह मेरी तरह ही यही करेगी और मेरा सहारा बनेगी. आप यों ही वक्त बरबाद कर रहे हो.’’

अब मैं खड़ा हो गया और बाहर निकल आया. मुसकान बाहर खड़ी थी. वह मुसकराते हुए मुझ से बोली, ‘‘मेरी बख्शीश?’’

आंखों में आई नमी को पोंछते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए?’’

‘‘बस 50 रुपए,’’ उस लड़की ने मासूमियत से हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा.

मैं ने चुपचाप उस लड़की की हथेली पर 50 रुपए रख दिए. वह फुदकती हुई, चिडि़या की तरह उन्हीं गलियों में गुम हो गई. Social Story In Hindi

Story In Hindi: हत्यारा मांझा

Story In Hindi: हमारे छोटे से कसबे में करीम चाचा जैसा पतंगबाज कोई नहीं था, लेकिन अब वे काफी उम्रदराज हो चुके थे. उन्होंने पतंग उड़ाना बंद कर दिया था. अब वे अपनी किराना की दुकान चलाते थे और पतंगों को उड़ते देख कर बहुत खुश होते थे.

करीम चाचा के बेटे का नाम सलीम था, जो शादीशुदा थे और एक 8 साल के बेटे फजल के बाप भी. फजल को पतंगें उड़ती देखने का बड़ा शौक था. सलीम पेंच लड़ाते, पर सामने वाले की पतंग नहीं काट पाते.

एक दिन सलीम ने अपने अब्बा से पूछा, ‘‘मेरी पतंग क्यों कट जाती है?’’

‘‘पतंग उड़ाना भी एक कला है सलीम,’’ करीम चाचा ने बताया.

‘‘आप तो अपने समय के माने हुए पतंगबाज रहे हैं, फिर मुझे यह हुनर क्यों नहीं आया?’’ सलीम बोले.

‘‘हां, रहा हूं,’’ करीम चाचा ने फख्र से कहा.

‘‘हमें भी बताइए पेंच लड़ाने की कला,’’ सलीम ने कहा.

तभी महल्ले के कुछ और लड़के भी वहां आ गए. उन में से एक लड़के राकेश ने कहा, ‘‘चाचा, हमें भी बताइए. ज्ञान पर सब का हक होता है. द्रोणाचार्य ने अपने बेटे और शिष्यों में कभी फर्क नहीं किया. उन के बेटे अश्वत्थामा से ज्यादा काबिल उन का शिष्य अर्जुन था.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं…’’ करीम चाचा ने फख्र से कहा, ‘‘लेकिन यह सीखने वाले की लगन पर होता है.’’

‘‘चलिए, हमें बताइए. आप हम लोगों के भी गुरु हुए,’’ राकेश ने कहा.

करीम चाचा ने पतंग में कन्नी बांधने के तरीके से ले कर पतंग छोड़ने, उड़ाने और पेंच लड़ाने के एक से एक तरीके बताए, जिन्हें सुन कर सब दंग रह गए और यह मान गए कि वाकई पतंग उड़ाना और दूसरे की पतंग काटना एक कला है. जैसे तलवारबाजी, तीरंदाजी, वैसे ही पतंगबाजी.

आजकल देशभर में चीनी मांझे की चर्चा जोरों पर है. वैसे तो भारत और चीन के बीच कोई भाईचारा नहीं है खासकर लड़ाई के बाद. लेकिन वर्ल्ड ट्रेड और्गैनाइजेशन की संधि के तहत भारतीय सरकार सीधेतौर पर चीनी सामान का बहिष्कार नहीं कर सकती. उस पर कोई अंकुश नहीं लगा सकती.

चीन में तो हर चीज बनने लगी है, जिस का इस्तेमाल भारत कर रहा है. लोग जम कर खरीदते हैं, क्योंकि चीन का बना माल सस्ता होता है, पर टिकाऊ तो बिलकुल नहीं.

इस का नतीजा यह हो रहा है कि होली दीवाली से ले कर तकरीबन हर बड़े त्योहार पर चीन की बनी चीजें बिकने लगी हैं और स्वदेशी चीजों को कोई कौडि़यों के भाव पर भी नहीं खरीद रहा है.

टैक्नोलौजी के मामले में चीन ने कमाल कर रखा है. आज बाजारों में बिकने वाले सस्ते, आकर्षक, शानदार मोबाइल फोन सब चीन की ही देन हैं. कुछ देशभक्त स्वदेशी चीजों को बढ़ावा देने के लिए जब चीनी सामान का विरोध करते हैं, लोगों से चीनी सामान खरीदने के बहिष्कार की बात कहते हैं, तो उधर से चीन के अखबार गरजते हुए बयान देते हैं कि भारत के लोग बुजदिल और कामचोर हैं. उन की देशभक्ति का नशा जल्दी उतर जाता है और फिर वे हम से ही सामान खरीदते हैं.

इसी बीच करीम चाचा ने सलीम से कहा, ‘‘चीनी सामान की कोई गारंटी नहीं होती. ये कारोबारी हैं. इन्हें अपने फायदे से मतलब है. इन की बनाई चीजें खरीदना ठीक नहीं है. हमारे यहां के पटाके और चीन से आए पटाकों में बहुत फर्क है. उन के पटाकों से प्रदूषण और तरहतरह की बीमारियां फैलती हैं.’’

इस पर सलीम ने कहा, ‘‘चीनी हो या देशी, होता तो दोनों के पटाकों में बारूद ही न. अब्बू, आप भी कहां अखबार की खबरों पर ध्यान देते हैं… अगर चीन का सामान खरीदने से कोई हमें देशद्रोही कहता है, तो कहता रहे. सभी खरीदते हैं. ज्यादा ही दर्द है तो सरकार पाबंदी लगा दे, इसे गैरकानूनी बता दे. तब ये सामान अपनेआप बिकना बंद हो जाएंगे. फिर हम ही क्यों सोचें? क्या हिंदू नहीं खरीदते हैं? वे तो सब से ज्यादा खरीदते हैं. दीवाली उन का त्योहार है. वे तो देवीदेवताओं की मूर्तियों से ले कर दीए तक चीन द्वारा बनाए खरीदते हैं.’’

सलीम की बात काटते हुए करीम चाचा ने कहा, ‘‘बेटा, इस में हिंदूमुसलिम वाली बात कहां से आ गई? हम एक देश में रहते हैं. उन की गलती हमारी गलती एक ही बात है और इस का बुरा नतीजा दोनों को ही भुगतना पड़ता है.’’

सलीम ने कहा, ‘‘लेकिन अब्बू, क्याक्या बंद करवाएंगे स्वदेशी के समर्थक? सारे स्वदेशी समर्थकों के पास चीनी मोबाइल हैं. कोई दूसरा रास्ता नहीं है चीनी सामान से बचने का. एक से एक डैकोरेटिव स्टाइलिश लाइट चर्च में भी लगती है, मंदिर में भी और मसजिद में भी. लोग सस्ता और सुंदर सामान ही खरीदते हैं.

देशभक्ति का इन सब से क्या लेनादेना?’’

‘‘बेटा, ये चीनी कारोबारी हैं. इन का करोड़ोंअरबों का कारोबार है. इन से हमारे देश की कंपनियां और फैक्टरियां पिछड़ रही हैं. लोगों का रोजगार छीना जा रहा है,’’ करीम चाचा ने कहा.

‘‘हमारे यहां के लोग टैक्नोलौजी में सस्ता, सुंदर सामान बनाने में पिछड़े हैं, तो यह हमारे कारोबारियों की गलती है. इस में किसी दूसरे को कुसूरवार क्यों ठहराना?’’ सलीम बोले.

‘‘अब तो पतंग और मांझा भी चीनी आने लगा है, तो क्या तुम उसे भी खरीदोगे?’’ करीम चाचा ने कहा.

‘‘क्यों नहीं?’’ सलीम ने लापरवाही से कहा और बाहर निकल गए.

‘‘सस्ते के चक्कर में किसी दिन मुसीबत में मत फंस जाना. याद रखना, सब से ज्यादा नुकसान इस्तेमाल करने वाले का होता है,’’ करीम चाचा ने कहा.

लेकिन यह सुनने के लिए सलीम उस वक्त उन के पास नहीं थे. वे घर से बाहर निकल चुके थे.

अगस्त का महीना था. आसमान में उड़ती पतंगें, लहराती पतंगें. कटती पतंगें, गिरती पतंगें. अब पहले की तरह पतंग लूटने वाले तो नहीं थे, लेकिन पतंग उड़ाने और काटने का जुनून अब भी लोगों में था.

दोपहर से शाम तक सलीम की कई पतंगें कट चुकी थीं. हर कटती पतंग पर उन का बेटा फजल उदास हो जाता. बेटे की उदासी देख कर उन्हें शर्म आने लगी. वे बेटे के सामने खुद को हारा हुआ सा महसूस करने लगे.

सलीम ने अपने बेटे फजल को दिलासा देते हुए कहा, ‘‘चिंता मत कर. कल तुम्हें खुश कर दूंगा. जितनी कहोगे, उतनी पतंगें काट कर दिखाऊंगा.’’

सलीम यह कह कर बाजार की ओर निकले. वे अपने पिता की दुकानदारी भी संभालते थे, लेकिन पतंग उड़ाने के लिए वे समय निकाल ही लेते थे. पतंग उड़ाने के गुर अपने अब्बू से पूछ लेते थे. अब्बू तो पुराने पतंगबाज थे, सो मना नहीं करते थे.

रात में फजल ने अपने दादा करीम मियां से कहा, ‘‘दादाजी हमारी 10 पतंगें कट गईं.’’

करीम मियां ने कहा, ‘‘पतंगबाजी कला है, जो अभी तुम्हारे अब्बू को नहीं आई है. मैं होता तो 10 क्या 20 पतंगें काट देता.’’

यह सुन कर सलीम ने चिढ़ते हुए कहा, ‘‘पतंगबाजी अब कोई कला नहीं रही अब्बा. सब मांझे का कमाल है. कल देखना, मैं ऐसा मांझा लाऊंगा कि आसमान में उड़ने वाली सारी पतंगें जमीन पर नजर आएंगी.’’

सलीम की बात खत्म होने से पहले अब्बू ने यह जरूर कहा, ‘‘मांझे की ताकत से पतंग काटने में अपना क्या हुनर? हमें बाजार से सावधान रहना चाहिए.’’

लेकिन सलीम तब तक अपने कमरे में जा चुके थे.

अगली सुबह सलीम ने पतंग दुकानदार से कहा, ‘‘मुझे सब से मजबूत मांझा चाहिए.’’

दुकानदार ने धीरे से कहा, ‘‘मजबूती का तो बाप है, लेकिन पुलिस छापा मार कर जब्त कर रही है. बैन लगा दिया है प्रशासन ने.’’

‘‘यहां कौन देख रहा है. तुम चुपके से दे दो.’’

‘‘लेकिन दाम थोड़े ज्यादा लगेंगे,’’ दुकानदार ने कहा.

‘‘चलेगा, लेकिन मांझा मजबूत होना चाहिए.’’

‘‘चीनी मांझा है, जो तलवार का काम करेगा. एक नहीं सौ पतंगें काटने की हैसियत रखता है, लेकिन सावधानी से बरतना,’’ दुकानदार ने धीरे से कहा.

चीनी मांझा सुन कर सलीम को यकीन आ गया कि आज तो वे बेटे को कई पतंगें काट कर दिखाएंगे और खुश करेंगे. कल अपनी हार और बेटे के उतरे चेहरे को देख कर उन्हें बहुत मायूसी हुई थी.

शाम को 4 बजे घर की छत पर फजल ने पतंग छोड़ी. पिता ने मांझा खींचा. हलकीहलकी हवा में पतंग ऊपर की ओर उठी. सलीम ने ढील दी, फिर मांझा खींचा, फिर ढील दी, फिर मांझा खींचा. थोड़ी देर में पतंग आसमान से बातें करने लगी थी.

करीम मियां भी छत पर आ गए. उन्होंने मांझे की ओर देख कर कहा, ‘‘यह बड़ा खतरनाक है. मांझा है या हथियार.’’

‘‘अब्बू, बस आज आप कुछ मत बोलना,’’ सलीम ने कहा.

तभी सलीम की पतंग का पेंच लड़ गया. सलीम ने एक जोरदार झटका दिया और सामने वाले की पतंग कट गई.

‘‘ये काटा…’’ फजल खुशी से चहक उठा.

‘‘अभी और पतंगें कटेंगी बेटा. तुम देखते जाओ अपने बाप का कमाल,’’ सलीम बोले.

‘‘यह तुम्हारा कमाल नहीं, बल्कि इस मांझे का है. मैं कहता हूं बंद करो यह तमाशा. यह पतंगबाजी नहीं, मांझाबाजी है,’’ करीम मियां ने कहा.

‘‘क्या अब्बू, आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे आप ने कभी पतंग नहीं उड़ाई…’’

‘‘हम ने पतंगें उड़ाई हैं. मैं तुम्हें भी नहीं रोकता, लेकिन यह मांझा खतरनाक है. किसी को लग गया तो मुसीबत हो जाएगी.’’

‘‘एक दिन मैं कुछ नहीं बिगड़ता अब्बू,’’ इस के बाद सलीम ने एक और पतंग काटी.

फजल खुशी से चीख पड़ा, ‘‘वाह अब्बू, कमाल कर दिया आप ने.’’

बेटे की तारीफ से सलीम का सीना फख्र से चौड़ा हो गया. आसमान में जितनी पतंगें थीं, 1-1 कर के जमीन की धूल चाटती नजर आ रही थीं.

करीम मियां ने फिर चेतावनी दी, ‘‘ऐसी ही धूल चीन ने हमें युद्ध में चटाई है अपने आधुनिक हथियारों के दम पर. बंद करो यह अनीति से, चीनी मांझे से पतंगबाजी का खेल.’’

‘‘आज नहीं दादाजी, कल हमारी 10 पतंगें कटी थीं. हम बदला ले कर रहेंगे,’’ फजल की बात सुन कर करीम मियां ने कहा, ‘‘बेटे, दूसरे के हथियार से युद्ध जीता तो क्या जीता? इस में अपना हुनर, अपना जौहर कहां है? मैं फिर कह रहा हूं कि यह खतरनाक हो सकता है.’’

‘‘अब्बू, यह युद्ध नहीं पतंगबाजी है. हुनर किसी का हो, जीत तो अपनी है. फिर यह युद्ध नहीं महज खेल है. आप अपने पोते के चेहरे की खुशी देखिए,’’ सलीम बोले.

करीम मियां अपने पोते की खुशी को देख कर चुप हो गए. सलीम धड़ाधड़ पतंगें काट रहे थे और फजल खुशी से किलकारी मार कर हंस रहा था.

सलीम कम से कम 20 पतंगें काट चुके थे और अब थक गए थे.

फजल ने कहा, ‘‘अब्बू, अब मैं पतंग काटूंगा.’’

‘‘क्यों नहीं, लेकिन जरा संभल कर,’’ सलीम बोले.

इस के बाद सलीम ने चरखी पकड़ ली. पतंग आसमान में थी. मांझा अब फजल के हाथ में था.

सलीम ने कहा, ‘‘ढील दो और अपनी पतंग दूसरी पतंग के पास ले जाओ’’

फजल ढील देता गया.

‘‘अब खींचो,’’ सलीम ने कहा.

फजल ने मांझा खींचा. दोनों पतंगें आपस में उलझ चुकी थीं. सलीम चरखी में लिपटा मांझा ले कर पीछे
खड़े थे.

‘‘यह आखिरी पतंग है. इसे हर हाल में काटना है फजल,’’ सलीम ने कहा.

‘‘जी अब्बू, ऐसा ही होगा,’’ फजल बोला.

‘‘फजल, यही मौका है. मांझे आपस में लिपट चुके हैं. एक जोरदार झटका मारो. मांझा अपनी ओर खींचो.’’

सलीम के कहे मुताबिक फजल ने झटका दिया, लेकिन 8 साल के बच्चे के हाथ का झटका काफी नहीं था.

यह देख कर सलीम ने चरखी नीचे रखी और मांझे को अपने हाथ में ले कर पूरी ताकत से खींचा. पतंग कट चुकी थी. सलीम खुशी से चीखे. लेकिन तभी फजल कराह कर जमीन पर गिर पड़ा. सलीम ने जब मांझे को झटका दिया,

तो वह फजल के गले को चीरता निकल गया.

फजल की गरदन से खून की धार बह रही थी. उसे मौत के मुंह में जाता देख कर सलीम बेहोश हो गए और करीम मियां को तो जैसे लकवा मार गया. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: बड़े घर का कुत्ता

Funny Story In Hindi: वैसे तो हमारा महल्ला मिडिल और लोअर मिडिल क्लास फैमिलियों का तरतीबबेतरतीब जमघट है, जहां छोटीछोटी जरूरतें एकदूसरे से छीनते हम एकदूसरे से मौकेबेमौके, बहानेशहाने लड़ते रहते हैं, पर हमारे इसी महल्ले में परम पूजनीय, अति सम्माननीय समाजसेवक चिट्टा टाइकून भी रहते हैं. उन की बड़ेबड़े लोगों से दोस्ती है. उन्होंने एक कुत्ता रखा हुआ है. बीच में वे कुछ दिनों के लिए बेकुत्ता भी हो गए थे, पर अपने गेट पर उन्होंने आम आदमियों को डराने के लिए बोर्ड फिर भी लगाए रखा ‘कुत्तों से सावधान’.

लगता है कि अब आदमी से आदमी का डर जा रहा है, इसलिए बिन कुत्तों के भी सज्जनों को कुत्ते से फेक सावधान कराना पड़ता है.

छोटे घरों में तब तक शांति नहीं होती, जब तक उन में दिन में 2-4 बार तूतूमैंमैं न हो ले और बड़े घर तब तक बड़े नहीं लगते, जब तक उन में से दिन में 5-7 बार राजयोगी कुत्ते का भूंकना न सुनाई दे. बड़े घरों के कुत्ते राजयोगी होते हैं, तो छोटे घरों का आदमी खाजयोगी.

कायदे से जिन ऊंचे लोगों की फैमिली में कुत्ता नहीं होता, उन्हें ऊंचे समाज में ऊंची फैमिली होने के बाद भी साधारण फैमिली ही माना जाता है. समाज में आम आदमियों के बीच बड़ा आदमी होने की पहचान कुत्ता दिलाता है. बड़े लोगों की शान कुत्ता होता है. बड़े घरों में घर वालों से महान कुत्ता होता है. बड़े लोगों का आखिरी अरमान कुत्ता होता है. बड़े घरों की मुसकान कुत्ता होता है.

तो साहब, अब हुआ यों कि मुझे भी इंस्टाग्राम हैंडल से ही पता चला कि हमारे महल्ले के सब से बड़े लोगों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है कि उन के परिवार में सभी का लाड़ला नहीं रहा. परिवारजनों का रोरो कर हुआ बुरा हाल.

इंस्टाग्राम हैंडल पर यह दुखद समाचार पढ़ कर मेरे हाथपैर फूल गए, दिल की नसें फटने लगीं. दिमाग तो मेरे पास बरसों से नहीं है, सो उस की नसें नहीं फटीं. बदन पर रोंगटे थे, सो वे भी खड़े हो गए.

बंधुओ, छोटा आदमी तो होता ही दुखों के पहाड़ के नीचे आने को है. वह पैदा ही दुखों के पहाड़ के नीचे जीने को होता है. दुखों के पहाड़ उस की जिंदगी होते हैं, उस की बंदगी होते हैं. बड़ी से बड़ी सरकारी जेसीबी उसे दुखों के पहाड़ के नीचे से नहीं निकाल सकती.

पर बड़े आदमियों पर दुख का पहाड़ तो छोडि़ए, उस की मुट्ठीभर मिट्टी भी गिर जाए, तो उन से ज्यादा मीडिया हायतोबा मचा देता है, इसलिए दुख के पहाड़ों से मेरा विनम्र निवेदन है कि उन्हें बड़े आदमियों पर टूटने से पहले सौ बार नहीं, हजार बार सोच लेना चाहिए, ताकि कल को दुख के पहाड़ को कोई दिक्कत न हो. बड़े आदमी रोने के लिए नहीं, बल्कि रुलाने के लिए पैदा होते हैं.

मैं ने आननफानन में इंस्टाग्राम हैंडल की खबर की हकीकत की जांचपरख के लिए अपने प्रिय पड़ोसी शर्माजी को फोन लगाया.

सोशल मीडिया के जमाने में खुशी की खबर की जांच की जानी चाहिए या नहीं, पर गम की खबर की हकीकत की जांच जरूर की जानी चाहिए. शर्माजी सोएसोए भी महल्ले के पलपल की खबर पर अपनी पैनी नजर रखते हैं.

‘‘और शर्माजी, क्या हाल हैं महल्ले के? महल्ले में सब खैरियत तो है न?’’

‘नहीं यार, सब से बुरी खबर यह है कि अपने महल्ले के सब से बड़े आदमी का डियरैस्ट कुत्ता स्वर्ग सिधार गया है,’ शर्माजी ने हद से ज्यादा इमोशनल हो कर बताया. इतने इमोशनल तो वे अपनी मां के मरने पर भी नहीं हुए थे.

‘‘तो?’’ मैं ने पूछा.

‘तो क्या? मैं तो उन के घर जा रहा हूं, इसी वक्त उन के कुत्ते के स्वर्गवास की प्रार्थना सभा में शरीक होने.’

‘‘पर कुत्ते को हुआ क्या था?’’ उस वक्त मैं पिछली दफा जो हमारे महल्ले में मेरे पड़ोस के कोई मरे थे, उन की मौत की वजह को जानने को ले कर उतना उतावला नहीं हुआ था, जितना इस कुत्ते की मौत को ले कर हुआ. कोई आसपड़ोस का आम आदमी थोड़े था भाई साहब ये.

‘होना क्या यार, खास सूत्रों से पता चला कि वह कई दिनों से बीमार चल रहा था. उन्होंने उस का इलाज कहांकहां नहीं करवाया. इलाज से ले कर झाड़फूंक तक सब करवाया, पर उन के हाथ कुछ न लगा. ऐसा इलाज अगर हमारे महल्ले के कोने वाले गणेशी प्रसाद का होता, तो वह जरूर बच जाता.’

‘‘तो अब आगे का क्या प्रोग्राम है?’’

‘कुत्ते की प्रार्थना सभा में भावभीनी श्रद्धांजलि दी जाएगी.’

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘मतलब क्या… उन के पीआरओ ने सूचित किया है कि वे सिर्फ अपने बच्चों के बाप नहीं थे, एक डौग फादर भी थे. होगा वह महल्ले के लिए एक कुत्ता, पर उन के लिए परिवार का एक सदस्य था. वे उस से महल्ले वालों से भी ज्यादा प्यार करते थे. इस बात का अंदाजा

इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस कुत्ते को अपना सरनेम तक दे दिया था.’

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘उन के लिए वह केवल कुत्ता नहीं था, बल्कि निष्क्रिय परिवार के मैंबरों के बीच सब से सक्रिय मैंबर था.’

‘‘तो?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘मैं तो रोटी बीच में खानी छोड़ कर वहां पहुंच रहा हूं, सब से पहले. बड़े लोग हैं यार… नहीं जाऊंगा तो कल को बुरा नहीं, बहुत बुरा मान जाएंगे,’ शर्माजी ने कहा और फोन काट दिया.

बेशर्म कहीं के… पिछली दफा जब शर्माजी के पड़ोस में उन के खास दोस्त की मौत हुई थी, तो मेरे सौ बार कहने के बाद भी वे बुखार का बहाना बना कर श्मशान घाट जाने से कन्नी काट गए थे. Funny Story In Hindi

Love Story In Hindi: खूबसूरत को धोखा

Love Story In Hindi: पप्पू रसिया किस्म का था. वह शादीशुदा था, लेकिन पराई औरत उस की बहुत बड़ी कमजोरी थी. वह जहां भी कोई खूबसूरत औरत देखता, लार टपकाने लगता, उसे फांसने के लिए जाल फेंकने लगता. कई औरतें उस के जाल में फंस चुकी थीं. कलावती भी उन्हीं में से एक थी, जो बहुत खूबसूरत थी.

कलावती अपने पति शंकर के साथ खुशहाल जिंदगी जी रही थी. उस की शादी को 2 साल हो चुके थे. शंकर उसे बहुत चाहता था. वह एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था. इतनी पगार मिल जाती थी कि गुजारा ठीक से हो जाता था. कलावती घर में सिलाईबुनाई का काम करती थी और कुछ कमा भी लेती थी.

सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन एक दिन बड़ा अनर्थ हो गया. बरसात का मौसम था. शंकर काम पर जा रहा था. तभी रास्ते में गरजचमक के साथ बारिश होने लगी. शंकर साइकिल खड़ी कर के एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया. तभी आसमानी बिजली गिरी और वह बुरी तरह झुलस गया. उसे अस्पताल लाया गया.

सूचना मिलने पर कलावती भी रोतीबिलखती अस्पताल पहुंची. इलाज चल रहा था, लेकिन शंकर बुरी तरह जल गया था, इसलिए कुछ घंटों बाद उस की मौत हो गई.

कलावती की सारी खुशियां लुट गईं. शहर में उस का कोई सगासंबंधी नहीं था. गांव से मायके और ससुराल वाले आए. सब के सहयोग से गांव में शंकर का क्रियाकर्म हुआ.

ससुर ने तो कलावती को गांव में रहने के लिए कहा, लेकिन वह बोली, ‘‘कंपनी के मालिक ने नौकरी देने का भरोसा दिया है. जब नौकरी नहीं मिलेगी तो मैं गांव चली आऊंगी. अभी शहर जा कर मालिक से मिलती हूं.’’

‘‘ठीक है बहू. जो तुम्हें ठीक लगे, वह करो. हम सब तुम्हारे साथ हैं,’’

ससुर बोले.

कुछ दिन ससुराल और मायके में रह कर कलावती शहर चली आई.

कंपनी का मालिक अच्छा आदमी था. उस ने कलावती का खूब साथ दिया. शंकर का पूरा भुगतान कर दिया और कलावती को चायपानी पिलाने का काम दे दिया. इस से कलावती का गुजारा चलने लगा. समय निकाल कर वह सिलाईबुनाई भी कर लेती थी.

कलावती का कमरा सड़क के किनारे ही था. पप्पू उधर से ही आयाजाया करता था. वह कलावती की खूबसूरती पर फिदा था और जानपहचान बनाने की कोशिश कर रहा था.

एक दिन कलावती पैदल कंपनी से घर लौट रही थी. रास्ते में उसे पप्पू मिल गया. उस ने स्कूटर रोक कर कहा, ‘‘आइए, बैठिए. आप को घर छोड़ दूंगा. आप ने देखा होगा, मैं आप के घर से हो कर ही आताजाता हूं. आप के पति का देहांत हो गया. मुझे बहुत दुख हुआ. लेकिन चिंता न कीजिए, सब ठीक हो जाएगा. आइए, बैठिए.’’

‘‘नहीं भैया, मैं पैदल ही चली जाऊंगी. आप जाइए. आप ने इतना कह दिया, यही बहुत है,’’ कलावती बोली.

‘‘अरे, आप मुझे गलत आदमी न समझें. आप की कंपनी के पास ही मेरी लोहे की दुकान है. आप के पति मेरी दुकान में आते थे. वे बड़े भले आदमी थे. आइए, बैठिए,’’ पप्पू बोला.

पहले तो कलावती मना करती रही, लेकिन जब पप्पू ने बहुत अपनापन दिखाया, तो वह मान गई. पप्पू ने उसे घर के पास छोड़ दिया. जाते समय वह बोला, ‘‘कभी कोई जरूरत पड़े तो बताइएगा, मैं पूरी मदद करूंगा.’’

उस दिन के बाद पप्पू अकसर कलावती से मिलने लगा. वह खूब हमदर्दी दिखाया करता था. कलावती अब सहज ढंग से उस के स्कूटर पर बैठ जाया करती थी. हंसीमजाक की बातें भी होने लगी थीं.

समय बीतता गया. धीरेधीरे पप्पू और कलावती के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. कलावती उस से घुलमिल गई.

एक दिन कलावती के मकान मालिक परिवार सहित गांव चले गए थे. उन के परिवार में शादी थी. उस दिन कलावती ने पप्पू को घर में आ कर बैठने के लिए कह दिया. वह यही तो चाहता था.

कलावती ने चाय बनाई. दोनों ने चाय पी. प्यार भरी बातें होने लगीं. पप्पू बहकने लगा. कलावती भी खुद को संभाल नहीं पाई. वह भी फिसलती गई. वह उस की बांहों में समा गई.

उस रात पप्पू अपने मकसद में कामयाब हो गया. वह संतुष्ट हो कर देर रात अपने घर गया.

पप्पू ने कलावती को बताया था कि वह कुंआरा है. उस ने कलावती से शादी करने की बात कह दी थी. वह मौका देख कर कलावती के घर आता रहा. कलावती भी उसे खूब चाहने लगी थी. वह दोबारा शादी करने का सपना देख रही थी, लेकिन उसे पता नहीं था कि जिस शख्स पर उस ने भरोसा किया है, वह मक्कार है.

पप्पू का जब कलावती से जी भर गया तो वह धीरेधीरे उस से दूर होने लगा. जब मिलता और कलावती शादी के लिए कहती तो टाल देता. एक दिन तो दोनों के बीच शादी को ले कर झगड़ा हो गया. तब से पप्पू बहुत कम उस से मिलनेजुलने लगा.

बाद में कलावती को कंपनी के किसी आदमी ने बताया कि पप्पू तो शादीशुदा है और काफी बिगड़ा हुआ आदमी है. शराब पीता है, सट्टाजुआ खेलता है और औरतों की जिंदगी बरबाद करता है.

कलावती यह जान कर बहुत पछताई, बहुत रोई. अब वह पप्पू को सबक सिखाना चाहती थी. उस ने थाने में उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी.

पप्पू को जब यह पता चला तो उस ने कलावती को डरायाधमकाया, लेकिन वह डरने वाली न थी. इस से डर कर पप्पू फरारी काटने लगा. लेकिन कब तक बचता? एक दिन मुखबिर ने थानेदार को उस की सूचना दी.

पुलिस ने पप्पू को दबोच लिया. वह अकड़ा तो हवालात में बंद कर के उस की जम कर कुटाई की गई. डंडे पड़े तो उस का सारा भूत उतर गया. अगले दिन उसे कोर्ट में पेश कर जेल भिजवा दिया गया.

कलावती को बड़ा सबक मिला. वह बहुत बड़ा धोखा खा चुकी थी. दोबारा उस ने ऐसी गलती कभी नहीं की. वह चुपचाप अपना काम कर रही थी.

मालिक ने उस का पूरा साथ दिया, क्योंकि वे शंकर को बेटे जैसा मानते थे. मालकिन भी भली थीं. उन्होंने अपने घर में ही उसे एक कमरा दे दिया. वह मालकिन का घरेलू काम भी कर दिया करती थी. Love Story In Hindi

Story In Hindi: चंगाई सभा

Story In Hindi, लेखक – आर. सेलट

पूरन पाल चुपचाप अपने सरकारी क्वार्टर के पीछे वाले दरवाजे की चौखट पर बैठा गहरी चिंता में डूबा हुआ था. उस के 3 बच्चे थे, 2 लड़कियां, जो नर्स बनने वाली थीं और एक लड़का.

पूरन पाल का एकलौता लड़का 14 साल का था, जो गूंगा ही पैदा हुआ था. पूरन पाल सोचता था, लड़कियों की शादी हो जाए और लड़के का बंदोबस्त हो जाए, तो उस की नैया भी पार लग जाए.

तकरीबन 2 महीने पहले पूरन पाल को पता चला कि शहर में विदेश से एक पादरी साहब आ कर ‘चंगाई सभा’ करने वाले हैं. चर्च के पादरी ने भी सब को इस बारे में बता दिया था. शहर में भी पोस्टर लगे थे.

फैक्टरी की दीवार पर भी एक पोस्टर चिपका था. हैरी ने बताया था, ‘‘बहुत बड़े पादरी आ रहे हैं.’’

पूरन पाल सोच रहा था कि उस के पिताजी भी तो अंगरेजों के समय में चर्च में बैरा थे. पर पहले पादरी छोटेबड़े नहीं होते थे. हां, अब समय भी तो बदल गया है. अब ऐरू को देखो, वह लालू चाचा का लड़का था और लालू चाचा तो उस के पिताजी के साथ चर्च में बैरा थे. पूरन पाल के पिताजी और लालू चाचा आपस में अच्छे दोस्त थे. दोनों मिशन के अनाथ आश्रम में पले थे.

ऐरू ने पूरन पाल के सामने ही गिरजे की किताबें बेचीं. फिर पादरी बनने की ट्रेनिंग ले ली और विदेश हो आया. वह बिशप भी बन गया है.

‘चंट था ससुरा, पर हम रहे भोंदू के भोंदू,’ सोचते हुए पूरन ने सिर झटक दिया, ‘अब तो ऐरू की बात ही और है. बंगला है, 2 कारें हैं, पत्नी शहर के बड़े अंगरेजी स्कूल में प्रिंसिपल है. लोग उसे रेवरंड ऐरन कहते हैं. कभी साथ हौकी खेलता था. अब अकेले में मिलता है, तो दुआसलाम कर लेता है, नहीं तो वह भी नहीं. कलक्टर, पुलिस कप्तान के साथ उठताबैठता है, उस के बच्चे भी तो मिशन स्कूल में ही पढ़ते हैं.’

बहरहाल, ‘चंगाई सभा’ की तैयारी जोरशोर से चल रही थी. सुनने में आया था कि 4-5 लाख रुपए भेजे हैं, विदेशी पादरी ने इंतजाम के लिए. गिरजे का सचिव डगलस बता रहा था कि विदेशी पादरी बहुत पहुंचे हुए हैं. वह सब को चंगा कर देते हैं. लंगड़े दौड़ने लगते हैं, गूंगे बोलने लगते हैं और बहरे सुनने लगते हैं.

डगलस ने कहा था, ‘‘तेरे लड़के की जीभ से ‘शैतानी बंधन’ भी खुल जाएगा. बस, यकीन पक्का होना चाहिए.’’

पूरन पाल बहुत खुश था. उसे ऐसा लग रहा था, मानो सारा तामझाम उसी के लिए हो रहा है. गिरजे के मैदान में हजारों लोगों के बैठने का इंतजाम किया गया था. दर्जनों लाउडस्पीकर और सैकड़ों बल्ब लगे थे. पूरन पाल को एक रात सपना भी आया कि उस का लड़का गोलू बोल रहा है.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब ‘चंगाई सभा’ होनी थी. पूरन पाल सुबह से ही शाम होने का इंतजार करने लगा. उस दिन इतवार था, सो फैक्टरी तो जाना नहीं था. शाम होते ही वह गोलू को तैयार कर साइकिल पर बैठा कर ले गया.

पूरा मैदान रंगबिरंगी रोशनियों से नहा रहा था. माइक पर भाषण चालू था. विदेशी पादरी के आने से पहले, जिस को जितना मौका मिला, मंच पर आ कर बोल लिया. हजारों लोग बैठे थे. कुछ बाहर से भी आए थे.

हैरिसन भी आया था, चमकीली कमीज और टाई लगा कर. पूरन पाल को हंसी आ गई. हैरिसन फैक्टरी में कुली था. घर में भले खाने को न हो, पर बड़े दिन पर रम की 3-4 बोतलें जरूर लाता था. तभी लोगों में हलचल होने लगी.

3-4 कारों का काफिला मंच के सामने रुका. गोरे विदेशी पादरी स्टेज पर चढ़ गए. बिशप ऐरू भी साथ में था.

रमेश चंद्र नामक एक नेता, जो पहले ब्याज पर पैसा देता था, वह भी वहां आया हुआ था. पूरन ने सोचा कि यह यहां क्या कर रहा है? अब भोले पूरन पाल को क्या समझ कि ऐसे ‘वोट बैंक’ बारबार तो नहीं मिलते.

एकदम सन्नाटा छा गया था. आधा घंटा ‘दुआ’ हुई. फिर चंदा इकट्ठा किया गया. कुछ लोग स्टेज पर जा कर लिफाफे दे रहे थे, कुछ नीचे घुमाए जा रहे दान के डब्बे में पैसे डाल रहे थे.

जब चंदे का डब्बा पूरन पाल के सामने आया तो उस ने 10 रुपए का सिक्का पेटी में डाल दिया. नीचे
नोट थे, इसलिए सिक्के की आवाज भी नहीं आई.

पीतल की नक्काशी वाला बड़ा सुंदर डब्बा था, जिस पर बाइबिल की आयत लिखी थी, ‘जब तुम दाएं हाथ से दान करो तो तुम्हारे बाएं हाथ को भी पता न चले’.

फिर ऐलान हुआ, ‘जो लोग चंगाई चाहते हैं, सामने आ जाएं.’

पूरन पाल भी गोलू का हाथ पकड़ कर स्टेज के सामने जा पहुंचा. चंगाई शुरू हुई तो चाय वाले एलबर्ट के लंगड़े बच्चे का हाथ पकड़ कर धकियाते हुए दौड़ाया गया. अगला नंबर गोलू का था. पूरन उसे ले कर स्टेज पर पहुंचा.

विदेशी पादरी अंगरेजी में बोलता था और देशी पादरी हिंदी में उस की बात बताता था. बिशप ऐरू और नेता रमेश चंद्र अपनी बातचीत में मशगूल थे. शायद ईसाई कब्रिस्तान के पीछे पड़ी लंबीचौड़ी जमीन की बात कर रहे थे.

विदेशी पादरी ने गोलू के सिर पर हाथ रख कर ‘दुष्ट आत्माओं’ को भगाने की दुआ की. लोग हैरानी से देख रहे थे.

पादरी ने पूछा, ‘‘लड़का बचपन से गूंगा है?’’

पूरन पाल ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. फिर पादरी धीरे से कुछ बुदबुदाने लगा. थोड़ी देर बाद उस ने कहा, ‘‘बेटा, अब बोलो, ‘जीसस लवस यू’…’’

गोलू के गले से वही पुरानी घुटी सी आवाज निकली, ‘‘इसस अम ऊ.’’

विदेशी पादरी जोर से चिल्लाया, ‘‘आलेलुइया… थैंक्स द लार्ड.’’

मंच पर बैठे लोग भी चिल्लाने लगे. उन की देखादेखी नीचे बैठे और खड़े लोग भी चिल्लाने लगे.

चर्च के पादरी ने कहा, ‘‘अब शैतानी बंधन जीभ से टूट चुका है. अब यह लड़का जल्दी ही बोलने लगेगा. बस, एक हफ्ते के अभ्यास की जरूरत है.’’

कुछ लोग अब भी चिल्ला रहे थे. पादरी साहब ने पूरन पाल को धीरे से धकियाते हुए स्टेज के दूसरी तरफ से उतरने का इशारा किया.

एक घंटे बाद ‘चंगाई सभा’ खत्म हुई. इतवार को गिरजे में पादरी ने ‘चंगाई सभा’ की बातें बढ़ाचढ़ा कर बताई.

पूरन पाल के लड़के और दूसरे लोगों के ‘चंगे’ होने की बातें बताईं.

जो लोग ‘चंगाई सभा’ में नहीं आ पाए थे, उन्हें इस बात का दुख था. गिरजे के सचिव डगलस ने नया स्कूटर खरीद लिया था.

2 महीने बाद भी पूरन पाल को थोड़ी उम्मीद थी कि शायद गोलू ठीक हो जाए. किंतु उस की आवाज में सुधार नहीं हुआ था. शाम को फैक्टरी से लौटते वक्त एलबर्ट चाय वाले के लड़के को देखा, जो ‘चंगाई सभा’ में ‘चंगा’ हो गया था, वह सड़क के किनारेकिनारे पहले की तरह बैसाखी के सहारे लंगड़ाते हुए चला आ रहा था. पूरन का दिल बैठ सा गया था.

अब वह घर के पिछवाड़े बैठा बेटे के बारे में सोच रहा था. सोचता था, गोलू ठीकठाक कहीं लग जाए,
तो बुढ़ापे में सहारा हो जाए या गोलू को ही सहारा…?

गरमियों के दिनों में शाम को पीछे बैठना पूरन को बहुत सुहाता था, ठंडीठंडी हवा उसे अच्छी लगती थी.
पर सच ही है. दिल अच्छा न हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता. तभी पीछे के कमरे में लगा कलैंडर हवा में फड़फड़ाया.

पूरन पाल ने अलसाई नजरों से देखा, कलैंडर पर हल चला रहे किसान की तसवीर थी और नीचे बाइबिल की आयत याकुब 2.26 लिखी थी, ‘निदान, जैसे देह ‘आत्मा’ के बिना मरी हुई है, वैसे ही विश्वास भी कर्म के बिना मरा हुआ है’.

पूरन पाल को मानो निदान मिल गया. सुबह गोलू को तैयार कर साइकिल पर बैठा कर ले जाने लगा तो पत्नी सारा ने पूछा, ‘‘कहां…?’’

‘‘गूंगेबहरे बच्चों के सरकारी स्कूल…’’ पूरन पाल ने जवाब दिया. Story In Hindi

Long Hindi Story: सौदा – पहला भाग

Long Hindi Story, लेखक – हरे राम मिश्र

उस दिन बड़े विधवा दुलारी मनोहर लाल, जिन्हें उन की जाति के लोग ‘भैया’ और गांवमहल्ले के लोग ‘नेताजी कहते थे, की हवेली के गेट पर आंखों में आंसू भरे खड़ी थी. उस के गोरे बेदाग चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी. वह बहुत बेचैन थी. उस के चेहरे से यह साफ दिखता था कि कुछ ऐसा जरूर हुआ है, जिस के लिए वह कतई तैयार नहीं थी.

और सचमुच, यह बड़ी चिंता की ही बात थी कि दुलारी की 17 साल की एकलौती बेटी रुपाली, जिसे वह प्यार से ‘रूपा’ बुलाती थी, जो घर की बकरियों के लिए हर रोज बिना नागा घास काटने गांव के बाहर खेतों की तरफ जाती थी, कल दोपहर घर से जाने के बाद वापस नहीं लौटी थी.

दुलारी की चिंता का एक ही केंद्र था कि आखिर उस की बेटी रुपाली कहां चली गई? वह घर क्यों नहीं लौटी? क्या गलत हो गया उस के साथ? आखिर वह कहां होगी अभी? किस हालत में होगी? ऐसे सवाल उस के जेहन में लगातार उभर रहे थे, उसे बहुत ज्यादा परेशान किए हुए थे.

एकलौती बेटी रूपा के साथ किसी अनहोनी से उपजी इस घबराहट में दुलारी को बीती शाम से ही कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. ज्योंज्यों समय बढ़ता जा रहा था, उस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. आखिर एक विधवा, जिस के पति ने उसे सिर्फ इसलिए छोड़ दिया हो कि उसे पहली औलाद बेटी हो गई, अपनी एकमात्र धरोहर के पास नहीं रहने पर परेशान क्यों नहीं हो?

हालांकि, छोड़ने के कुछ ही महीने बाद पति रामलाल जहरीली शराब पीने से मर गया. इस के बाद दुलारी अपनी बेटी को ले कर मायके आ गई, क्योंकि इस विधवा को ससुराल में कोई भी रहने देने के लिए तैयार नहीं था.

आम दलित की तरह रामलाल के पास भी एक ?ाग्गी से ज्यादा कोई जायदाद नहीं थी, जो जंगल महकमे की जमीन पर कब्जा कर के बनाई गई थी. इस के बाद दुलारी फिर कभी ससुराल वापस नहीं गई. इस घटना को 17 साल हो गए थे.

दुलारी धीरे बोलने वाली 35 साल की औरत थी. वह एक ऐसी विधवा थी जो भले ही मायके में रहती थी, लेकिन गांव में भी किसी से कोई खास मतलब नहीं था. अपने मांबाप की एकलौती औलाद उन के मरने के बाद उन्ही के घर में रहने लगी. उसी झोपड़ीनुमा घर में, जहां घर में कुछ बकरियां पाली गई थीं और जिन की वह देखभाल करती थी. यही उस की धरोहर थी.

हालांकि, अब दुलारी के पास सिर्फ एक कमरे का सरकार का दिया हुआ पक्का मकान था. यह भी पाने के लिए उसे अपनी जाति के सरपंच कल्लू, कई मालाएं पहनने वाले पंचायत सैक्रेटरी त्रिभुवन, पंचायत मित्र नोखे और उस के 2 मुंहबोले समर्थकों का 4 महीने तक बिस्तर गरम करना पड़ा, क्योंकि वह मकान पाने के लिए तयशुदा 20,000 रुपए की घूस देने में नाकाम थी.

लेकिन इस सब की भनक दुलारी ने अपनी बेटी को कभी नहीं लगने दी.

बेटी के आलावा घर में पाली गईं यही 4 बकरियां उस की पूंजी थीं. मांबेटी दोनों इन्हीं 4 बकरियों से अपना गुजारा करती थीं. इन से ही सुबहशाम इन का चूल्हा जलता था.

दुलारी भले ही 35 साल की थी, लेकिन उस की सादगी भरी खूबसूरती किसी को भी उस का दीवाना बना सकती थी. गांव के दलितों में यह सोच थी कि दुलारी जरूर किसी ऊंची जाति का बीज है, क्योंकि उन की जाति में औरतें इतनी खूबसूरत हो ही नहीं सकतीं.

दुलारी के कपड़े भले ही बहुत साफ नहीं होते थे, लेकिन उन में लिपटी हुई छरहरे बदन वाली दुलारी किसी का भी मन मोह लेने के काबिल थी. गोरा बदन और गोल चेहरे पर कंटीली उभरी आंखें उसे अप्सरा जैसी बना देती थीं.

दुलारी की बेटी रुपाली, जो अभी जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी, बस एकदम दुलारी ही लगती थी.

हवेली के मालिक मनोहर लाल दुलारी की जाति के बड़े नेता थे. वे भले ही 50 साल पार हो गए थे, लेकिन खिजाब से बाल रंगते थे और चेहरे की मालिश भी किसी विदेशी लिक्विड से बिना नागा करवाते थे. हर वक्त खद्दर का काफी भड़कीला कुरता पहनते थे. चप्पल भी ब्रिटेन की बनी पहनते थे और कौम की गरीबी पर रोज आंसू बहाते थे.

इस के साथ मनोहर लाल सफेद गमछा अपने गले में लपेटे रहते थे. मूंछें भी तावदार थीं, लेकिन दाढ़ी क्लीन शेव थी. किसी राजनीतिक सवाल पर कभी कुछ खुल कर नहीं बोलते थे. हर बात में गहरा राज छिपा रहता था, जिसे सिर्फ उन के कुछ खास शागिर्द ही समझ पाते थे.

मनोहर लाल की हवेली थोड़ी बड़ी थी, जिस के एक हिस्से को उन की जाति के ही लोगों ने कभी चंदा इकट्ठा कर के इसलिए बनवाया था, ताकि इलाके में उन के विपक्ष में सियासत कर रहा ऊंची जात का ‘ठाकुर’ ऐंठ कर नहीं चल सके और उस के सामने चुनाव में मनोहर लाल को किसी हीनभावना का शिकार नहीं होना पड़े.

जवानी के दिनों में मनोहर लाल जमींदार ठाकुरों को सबक सिखाने से ले कर, ऊंची जाति की लड़कियों को केंद्रित कर के ब्राह्मणों को गालियां देते थे, गंदे और उकसावे भरे नारे लगाते थे, जिस से इलाके के पीडि़त दलित नौजवान उन की तरफ आकर्षित हों.

इसी के बलबूते वे 2 बार विधानसभा का चुनाव भी लड़ गए और इतने वोट हासिल कर लिए कि विपक्षी राजनीति में उन्हें ‘सीरियसली’ लिया जाने लगा था. कुलमिला कर वे विधानसभा में अपनी जाति का एक बड़ा चेहरा हो चुके थे.

यही नहीं, मनोहर लाल पिछली बार ही सदन पहुंचतेपहुंचते रह गए थे. क्षेत्र में उन का दबदबा था. इस चुनाव में उन के हारने के पीछे यह दलील थी कि विधानसभा के पिछड़ों ने दलित उम्मीदवार की जगह क्षत्रिय जाति के नेता को इसलिए वोट दे दिए, ताकि ये दलित लोग मजबूत न होने पाएं, वरना खेतों में काम को मजदूर ही नहीं मिलेंगे. दलित ऐक्ट में जेल अंदर जाओगे, वह अलग समस्या आएगी, इसलिए मनोहर लाल चुनाव हार गए.

हालांकि, इस हार ने मनोहर लाल को यह सीख दी कि किसी जाति से खुला विरोध वोट का नुकसान करता है, इसलिए अब वे क्षेत्र के क्षत्रियों, ब्राह्मणों, दबंग पिछड़ों के खिलाफ ज्यादा आक्रामक नहीं रहते थे और हर कदम संभल कर उठाते थे, ताकि सामाजिक दूरी को वह पाट सकें और बाकी जातियों के वोट भी पा सकें.

जब मनोहर लाल का काम कौम से मिलने वाले चंदे से नहीं चला तो वे बालू खनन में ठेकेदारी भी करने लगे. अब यह कारोबार बड़ा हो गया था. वे खुद को एक ‘इलीट क्लास दलित’ मानते थे. उन्होंने अपनी हवेली के एक हाल में सभी दलित नेताओं की मढ़ी हुई तसवीरें लगवा रखी थीं. लेकिन उस में सिर्फ इलाके के छोटे फिगर वाले दलित नेताओं के साथ मीटिंग की जाती थी. बाकी के लिए एक बैठका रिजर्व्ड था जिस में बुद्ध, कृष्ण और राम, महावीर और नानक देव के बड़े फोटो लगे हुए थे.

यहीं नहीं, मनोहर लाल खुद को पुराने समय के किसी जमींदार के वंश से जोड़ते थे. हालांकि इतिहास उन के किसी दावे की कभी तसदीक नहीं करता था. लेकिन इस बात से वे क्षेत्र के दलितों में काफी मजबूती से खुद की पैठ बना चुके थे. इस पैठ के पीछे एक ही लौजिक था कि उन के पास दलितों के सियासी नेतृत्व की ‘दैवीय’ प्रेरणा है और दलितों को भी उन्हें ही अपना नेता मानना चाहिए.

खैर, दुलारी हवेली के गेट पर 10 मिनट से खड़ी हुई आंसू बहा रहा थी. हवेली के मुख्य गेट पर बंदूकधारी सिक्योरिटी गार्ड, जो कुरसी पर बैठा हुआ ऊंघ रहा था, सहसा दुलारी को गेट पर देख कर संभला और जोर से टोका.

‘‘क्या है? कहां से आई हो? क्या काम है?’’ सिक्योरिटी गार्ड ने एकसाथ कई सवाल दागे.

घबराहट और आंसू भरी आंखों से दुलारी ने गार्ड को देखा, लेकिन कुछ खास बोल नहीं पाई.

सिक्योरिटी गार्ड ने फिर से पूछा कि कौन है और किस से मिलना है?

दुलारी ने रोते हुए कुछ बोलना शुरू किया कि उस ?ाबरीली मूंछ वाले सिक्योरिटी गार्ड ने कहा, ‘‘10 बजे आओ, अभी नेताजी सो रहे हैं.’’

दुलारी के पास तब तक के लिए समय नहीं था. वह बहुत परेशान थी. लेकिन, वह कुछ नहीं बोली, क्योंकि सिक्योरिटी गार्ड की बड़ी मूंछें देख कर ही वह सहम गई. हवेली के गेट के बाहर ही पास में रखे गए एक सीमेंट के बैंच पर बैठ गई और 10 बजने का इंतजार करने लगी.

तकरीबन 2 घंटे बाद जब सूरज कुछ चढ़ आया तो कुछ लोग हवेली के भीतर मनोहर लाल से मिलने आए. उन की चारपहिया गाड़ी सीधे गेट के अंदर खड़ी हुई. आधे घंटे बाद गाड़ी वापस निकली, फिर कुछ दूसरे मुलाकाती भी आनेजाने लगे.

हवेली पर मिलने वालों की कुछ भीड़ हुई और दुलारी ने फिर हिम्मत बटोर कर सिक्योरिटी गार्ड से कहा कि नेताजी से मिलवा दो.

सिक्योरिटी गार्ड ने भी काफी अनमने भाव से इंटरकौम पर किसी से बात की और थोड़ी देर में दुलारी के लिए अंदर जाने का बुलावा आ गया.

दुलारी हवेली के अहाते से होते हुए बरामदे में पहुंची और रोते हुए जमीन पर बैठ गई.

पास खड़े एक लड़के ने दुलारी से कुछ पूछना शुरू किया और पौकेट डायरी में सब नोट किया.

थोड़ी देर में दुलारी को मनोहर लाल के कमरे में भेजा गया, जहां वे एक महंगे सोफे पर पाजामा और बनियान पहने बैठे हुए थे.

‘‘हां, बोलो… क्या हुआ?’’ मनोहर लाल ने पूछा.

दुलारी ने रोते हुए अपनी बेटी के वापस नहीं लौटने का दर्द मनोहर लाल से बयां किया.

‘‘थाने गई? दारोगा से मिली? बताया उस को?’’ मनोहर लाल ने पूछा.

‘‘हम किसी को नहीं जानते. हम तो आप को ही जानते हैं…’’ और दुलारी फिर जोरजोर से रोने लगी.

‘‘रुको… चुप हो जाओ… देखता हूं…’’ मनोहर लाल ने समझाते हुए कहा.

मनोहर लाल ने तुरंत अपने एक शागिर्द को इशारा किया कि दारोगा को फोन करो और इन की मदद के
लिए कहो.

इस के बाद मनोहर लाल ने दुलारी से कहा कि थाने में जा कर रिपोर्ट लिखवा दो. एक फोटो लेती जाना.

रिपोर्ट लिख जाएगी. इस के बाद मनोहर लाल के उस शागिर्द ने थाने में फोन पर थानेदार से बात की.

दुलारी को यह पता ही नहीं था कि उस का थाना कौन सा है, क्योंकि उस का थाने से कोई वास्ता कभी पड़ा ही नहीं था. मनोहर लाल के शागिर्द ने दुलारी को उस के थाने के बारे में बताया और तुरंत जा कर थानेदार से मिलने को कहा.

थकीहारी दुलारी कांपते पैरों के साथ तेजी से घर लौट आई और बेटी की एक फोटो खोज कर एक पौलीथिन में लपेट कर ब्लाउज के भीतर रख लिया. घर में उस के पास चांदी की एक अंगूठी थी, जिसे उस ने पास रख लिया, ताकि इसे गिरवी रख कर कुछ पैसा उधार ले पाए. घर में कुछ पैसे थे, जल्दी से उन्हें भी उठाया और बाजार के रास्ते थाने जाने वाले टैंपो पर सवार हो गई.

दुलारी सबकुछ बहुत जल्दीजल्दी करना चाहती थी, लेकिन जैसे उस की देह में कोई ताकत ही नहीं बची थी. यह सब करते हुए दोपहर का समय हो गया.

दुलारी को पहली बार पुलिस थाने में घुसते हुए बड़ी घबराहट हो रही थी, क्योंकि उस का वास्ता इस सब से कभी पड़ा नहीं था. वह सीधीसादी औरत थी जो किसी तरह अपनी जिंदगी बसर कर रही थी. लेकिन, फिर दुलारी किसी तरह थाने के भीतर हिम्मत कर के दाखिल हुई.

अंदर घुसते ही गेट पर मिले एक सिपाही से बेटी की गुमशुदगी के बारे में जैसे ही रोते हुए बोलना शुरू किया, तो सिपाही ने थानेदार के कमरे की तरफ इशारा कर के वहां जाने को कहा.

दुलारी ने हिम्मत कर के थानेदार के कमरे के दरवाजे पर लगा परदा उठाया. कुरसी पर बैठा थानेदार फोन पर किसी ठेकेदार को तय रकम से कम भेजने के लिए गंदीगंदी गालियां दे रहा था.

खैर, थोड़ी देर के इंतजार के बाद किसी तरह से दुलारी ने हिम्मत बटोरी और रोते हुए दरवाजे से ही कहा, ‘‘साहब, बिटिया कल से घर नहीं आई है. बिटिया तो गायब हो गई साहब…’’

‘‘क्यों? कौन हो तुम? क्या नाम है?’’ थानेदार ने कड़क कर पूछा.

दुलारी सहम गई.

‘‘कहां गई बिटिया तुम्हारी? क्या नाम है? कहां से आई हो?’’ थानेदार ने कई सवाल एकसाथ कर डाले.

‘‘रूपा…’’ दुलारी ने रोते हुए बताया, साथ ही नेताजी के बारे में भी बोला कि मनोहर नेताजी.

‘‘उफ… ठीक है… फोटो लाओ,’’ थानेदार ने अंदर बुलाया.

थानेदार ने फोटो के पीछे ही नाम, पता और उम्र सब पूछ कर लिखा. फिर थाने के मुंशी को बुलाया और फोटो दे कर गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने के लिए कहा.

इस के बाद थानेदार ने दुलारी से कहा, ‘‘बाहर बैठो… अभी ये एक कागज देंगे’’

एक घंटे के बाद थाने के मुंशी किशोरी लाल ने, जो जाति से पिछड़े थे, खुद को कृष्ण भक्त बताते थे, ने दुलारी को अपने कमरे में बुलाया और लड़की की गुमशुदगी बाबत पूछताछ कर के एक रजिस्टर में नोट किया, फिर एक कागज में ब्योरा लिख कर एक सिपाही को, जो शायद उसी के गांव का था, दे दिया.

मुंशी किशोरी लाल बारबार रूपा के किसी लड़के के साथ जाने, प्रेम प्रसंग में भाग जाने के बाबत जानकारी चाहते थे. उन का कहना था कि आजकल की लड़कियां टीवी देख कर उड़ने लगती हैं और मांबाप थाने में आ कर ‘ड्रामा’ करते हैं.

मुंशी ने आगे कहा कि लड़की को खोजने में जो खर्च आएगा, उस का खर्चापानी दो. फिर उस ने दुलारी के पास जो चांदी की एक अंगूठी थी, ले कर अपनी जेब में रख लिया. इस समय दुलारी को सिर्फ बेटी चाहिए, इस के अलावा वह कुछ नहीं सोच रही थी.

थाने से बाहर निकल कर दुलारी तेज कदमों से चल कर घर पहुंची. शाम के 5 बज चुके थे. अनहोनी के डर में उस के हाथपैर अब भी बुरी तरह से कांप रहे थे, जैसे देह में खून ही नहीं हो.

घर में बंधी बकरियां कल से काफी भूखी थीं, जिन्हें दानापानी देना था. चिंता और हताशा में उस की भूखप्यास सब खत्म हो चुकी थी, लेकिन बकरियों को तो दानापानी देना ही होगा, क्योंकि उन्हें जिंदा रखना है.

किसी तरह घर पहुंच कर दुलारी ने एक लोटा पानी अपनी हलक में उतारा. इस के बाद उस ने बकरियों को दानापानी दिया और फिर गांव के नए बने सरपंच से मिलने उस के घर गई, जिसे वह एकदम पसंद नहीं करती थी, क्योंकि उस की निगाह में वह सिर्फ औरतों का भूखा ऐसा ऐयाश था, जिस ने दुलारी को ‘धंधे वाली’ के हालात में पहुंचाने की पूरी कोशिश की थी, क्योंकि उस ने कभी उस से 3,000 रुपए का उधार लिया था और नहीं दे पाने की हालत में वह उस के 2 जवान बकरे घर से ही जबरदस्ती खोल कर ले गया था.

हालांकि, सरपंच से दुलारी की मुलाकात नहीं हुई और वह फिर से घर लौट आई. काफी शाम हो चुकी थी. उस ने पतीले में थोड़ा चावल डाला और नमकप्याज के साथ पका कर किसी तरह उसे हलक से नीचे डाला. दालसब्जी कुछ नहीं था.

दुलारी की रात किसी तरह कटी. पूरी रात वह जागती रही. लेकिन, बिटिया का अभी कोई सुराग नहीं मिला था.

दूसरे दिन अलसुबह ही दुलारी फिर से मनोहर लाल के घर पहुंच गई थी. इस बार वह अपने साथ गांव के एक लड़के को ले कर गई थी. हालांकि, बदनामी के डर से उस ने रास्ते में बिटिया के गायब होने के बारे में कोई चर्चा नहीं की, लेकिन गांव में यह बात रायते की तरह फैनल चुकी थी, क्योंकि थाने से सरपंच को फोन पर मामले की जानकारी दी गई थी, ताकि लापता रूपा को खोजने में मदद मिल सके.

मनोहर लाल के यहां दुलारी की जाति के ही एक और आदमी, जो बगल के गांव का छुटभैया नेता था, से उस की मुलाकात हुई. वह मनोहर लाल से अपने गांव के वोट उन के लिए फिक्स करवाने के एवज में सौदा करने आया था और मछली बाजार के ग्राहक की तरह उन से ‘मोलतोल’ कर रहा था. उस नेता के बारे में दुलारी अच्छे से जानती थी कि उस का धंधापानी क्या है और कैसे वह नकली दारू का सप्लायर है, क्योंकि उसी की दी हुई दारू पीने से उस के गांव में कुछ लोगों की मौत हुई थी.

‘‘क्या हुआ…’’ देखते ही मनोहर लाल ने पूछा, ‘‘मिली बेटी आप की…’’

‘‘नहीं मिली…’’ और दुलारी रोने लगी.

‘‘थाने गई थी…’’ पूछने पर दुलारी ने हां में सिर हिलाया.

फिर मनोहर लाल ने थानेदार को अपने एक शागिर्द से फोन करवाया और दुलारी को बताया गया कि बेटी को पुलिस खोज रही है. मिलने पर सूचित करेगी. परेशान नहीं हो.

थकहार कर दुलारी फिर घर लौट आई. अब तक दोपहर का सूरज चढ़ आया था.

2 दिन बीत गए. रोतेरोते दुलारी के आंसू खत्म हो गए. दुलारी ने इन दिनों ठीक से खानापीना भी नहीं किया था और भागदौड़ में उसे तेज बुखार अलग से हो गया.

तीसरे दिन, दोपहर का समय था. दुलारी घर के भीतर अपनी खटिया पर चिंतित बैठी थी. गांव के चौकीदार लुल्लन ने आ कर दुलारी को बताया कि उस की बेटी पड़ोस के जिले के एक अस्पताल में भरती है. पुलिस जा रही है बयान लेने. तुम भी अस्पताल पहुंचो. दारोगाजी ने बोला है.

चौकीदार ने आगे कहा कि तुम्हारी बेटी नशे की हालत में तहसील के बसस्टैंड पर लावारिस मिली है, जिसे कुछ लोगों ने स्थानीय चौकी के सुपुर्द कर दिया था. पुलिस वालों ने उसे अस्पताल में भरती करवा दिया है. जाओ मिल लो.

दुलारी की आंखों में चमक आ गई. उस ने किसी तरह गांव के एक आदमी से कुछ पैसे उधार लिए और अस्पताल साथ चलने की चिरौरी की. वह अस्पताल पहुंची, तो बेटी उसे अकेले एक बिस्तर पर पड़ी मिली, जिसे कुछ पुलिस वाले और डाक्टर घेरे हुए थे और कुछ लिखापढ़ी कर रहे थे. काफी देर बाद दुलारी को अपनी बेटी रूपा से बात करने का मौका मिल पाया.

दुलारी ने देखते ही अपनी बेटी को प्यार से भींच लिया, माथा चूमा, गले लगाया. उस का हीरा उसे मिल गया था. उस ने बेतहाशा उसे चूमा, दुलारा और प्यार किया. बेटी भी मां को देख कर रोने लगी. आखिर वही तो उस का सबकुछ थी.

रूपा ने देर शाम को अपनी मां से अपने साथ रेप और मारपीट की दर्दनाक घटना बताई, जिसे गांव के बगल के यादव टोला के लड़कों ने अंजाम दिया था. दोनों लड़के गांव की ताकतवर और बहुसंख्यक पिछड़ी बिरादरी से थे, लेकिन उन की जातियां अलगअलग थीं. खैर, पुलिस ने रूपा का बयान दर्ज किया और नियमानुसार मैडिकल भी हुआ. एफआईआर भी दर्ज हुई.

दुलारी अगले 2 दिन रूपा के साथ अस्पताल और थानेअदालत के चक्कर लगाती रही.

चूंकि मनोहर लाल इस मामले में थोड़ा लगे हुए थे, इसलिए पुलिस ने जांच शुरू की. पहले आरोपी सुमेश के नाई समुदाय के लोग सामने आ गए और आरोपी के घर वाले रूपा को ही सैक्स की भूखी लड़की साबित करने लगे. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह आरोपी लड़का टोले के पूर्व पंचायत सदस्य का बेटा और वर्तमान विधायक ‘मुंशीजी’ का खास आदमी था. दूसरा आरोपी युवक क्षत्रिय समुदाय का रितेश था, जिस के यहां यह सब करना ‘मर्दानगी’ की पहचान थी. इस समुदाय में अपराध पर बहस न हो कर कौन उस लड़की की मदद कर रहा है, उस पर चर्चा हो रही थी. सब जल्द ही पता चल गया. नाम मनोहर लाल का आया. बात मनोहर लाल तक, जो कुछ समय पहले ही में दिल्ली से एक बिजनेस डील कर के लौटे थे, इस धमकी के साथ पहुंचाई गई कि क्षत्रियों की इज्जत से एक ‘धंधे वाली’ की आड़ में मत खेलो. निबटना है तो निबट लो. देखते हैं चुनाव कैसे जीतते हो.

मनोहर लाल ने इस मामले को ध्यान से सुना. फिर कुछ दिन चुप रहे. उन्हें लगा कि मामला खत्म हो जाएगा. लेकिन, इधर नाई समुदाय जहां लड़के के पक्ष में जुलूस निकाल रहा था, वहीं क्षत्रिय समुदाय मनोहर लाल पर मामले को खत्म करवाने वरना सबक सीखने के लिए तैयार रहने का अल्टीमेटम दे कर पंचायत कर रहा था.

इधर दुलारी की जाति और गांव के कई छुटभैया लोग उस के पास सम?ाते के लिए दबाव बनाने के लिए रोज उस के घर पहुंच रहे थे. पुलिस आरोपियों से पैसा खाने के लिए दबाव बना कर रख रही थी. हालांकि, थानेदार की भी आरोपियों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह दबाव बना कर सिर्फ वसूली कर रहा था.

परेशान थी तो बस दुलारी. उस के गांव और जाति के ताकतवर लोग भी उस के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थे. जो भी उस से मिलता, एक ही ‘डील’ करने की फिराक में रहता. जातबिरादरी के किसी नेता, कार्यकर्ता की कोई दिलचस्पी नहीं थी कि पीडि़त परिवार को ‘इंसाफ’ मिले.

इधर, आरोपी लड़कों के परिवार वालों के साथ यह मामला जातबिरादरी का सवाल दिन ब दिन बनता जा रहा था. इस मामले को सत्ताधारी विधायकों ने भी अपने हित में मोड़ना शुरू कर दिया. नया तर्क गढ़ा गया कि मनोहर लाल को वोट नहीं देने के कारण क्षत्रिय और नाई बिरादरी को बदनाम करने का खेल खेला जा रहा है. एक दलित लौंडिया कैसे रेप का आरोप लगा सकती है…? उस की हैसियत क्या है…? इसी बात पर आरोपियों ने जात की 2 सम्मिलित पंचायत भी करवाईं, जिन में कई स्थानीय नेता शामिल हुए. इस से पुलिस के साथ मनोहर लाल भी बैकफुट आ गए. वे मामले में शामिल नहीं होने की कसमें खाने लगे, क्योंकि उन्हें इस से दलित बिरादरी के वोट खिसकने का कोई डर नहीं था. डर तो बाकी जातियों के बिदकने का था. इन सब से रूपा और दुलारी तो इतने ज्यादा घबरा गईं कि उन्हें अपने ही घर में अब बहुत डर लगने लगा.

इधर, खुलेआम माइक लगा कर मनोहर लाल को ललकारा जाने लगा. मनोहर लाल को बड़े चुनावी नुकसान का डर लग गया, क्योंकि विधानसभा की 2 ताकतवर जातियों की गोलबंदी से उन का चुनाव हारना तय था. उन्हें कुछ लोगों ने सम?ाया कि एक अदद ‘लौंडिया’ के लिए अपनी सियासी पारी को कमजोर मत करो. केस में सम?ाता करवाइए और मामला निबटा दीजिए. रूपा की जाति और गांव के कई छुटभैए नेता भी यही चाहते थे, ताकि मनोहर लाल को दोनों जातियों का सपोर्ट मिल सके और वे चुनाव जीत सकें.

अब मनोहर लाल को लगा कि चुप्पी से काम नहीं चलेगा, क्योंकि मामला बिगड़ चुका है. मनोहर लाल अब अपने ‘सियासी’ नुकसान के डर से इस मामले को मैनेज कराने में लग गए. उन्होंने अपने शार्गिंदो से लड़की को सैक्स की भूखी होने का प्रचार भी करवाया. उस की मां का भी दामन दागदार बताने की पूरी कोशिश करवाई गई, ताकि यह लगे कि उन्हें इस मामले से कोई दिलचस्पी नहीं है. इस तरह पूरा एक महीना निकल गया.

लेकिन, इन सब से बहुत दूर विधवा दुलारी को बस इसी बात का संतोष था कि उस की बेटी उस के पास आ गई है. एक गरीब को और क्या चाहिए. पुलिस, थाना, वकील, कचहरी उस के बस का नहीं है. अब उसे और किसी चीज में कोई दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि वह रोज थानेकचहरी और वकील के पास जाने का खर्च ही नहीं उठा सकती थी. उसे तकरीबन रोज थाने बुलाया जाता और दिनभर बयान लेने के नाम पर बैठाए रखा जाता.

इस मामले का विवेचक भी दलित जाति का था, जिस के लिए एकमात्र मकसद पैसा कमाना था, क्योंकि वह एक खेत खरीदने के लिए 30 लाख की रकम किसी भी कीमत पर जल्द इकट्ठा करना चाहता था. इस केस में आरोपी, पुलिस, जाति के छोटे नेता, कार्यकर्ता सब अपने हिसाब से फायदा लेने के लिए खेल रहे थे.

लेकिन, दुलारी और रूपा इन सब से बेपरवाह और अनजान थीं. वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को फिर से पटरी पर लाना चाहती थीं, जो रूपा के साथ हुई घटना के बाद उतर गई थी.

दुलारी को अपनी बेटी मिल गई थी, बाकी उसे किसी ‘इज्जत’ की कोई फिक्र नहीं थी. भूखे, नंगे और गरीब लोग इंसाफ के बारे में नहीं सोचते.

तकरीबन एक हफ्ता और बीता होगा. एक दिन सुबह अचानक दुलारी को मनोहर लाल के एक शागिर्द ने हवेली पर पहुंचने का संदेश दिया. दुलारी हवेली पर गई भी. बेटी के भविष्य को ले कर लंबी भूमिका बनाने के बाद, जिस में उसे रूपा के बदनाम होने से ले कर, शादी, सुरक्षा का डर सबकुछ दिखाया गया, धमकी वाली भाषा में भी समझाया गया. बोला गया कि समझौता कर लो.

डरीसहमी दुलारी से कुछ कागजों पर अंगूठा लगवाया गया, जो बाद में अदालत में समझौते के प्रपत्र के बतौर पुलिस द्वारा जमा किया गया. हवेली से चलते वक्त उसे एक लिफाफा दिया गया, जिसे उस ने घर में खोल कर देखा. उस मे 500 के 10 नोट थे. उस के इंसाफ का ‘सौदा’ हो चुका था, जिस में, जाति के नेता, पुलिस, सरपंच सब शामिल थे. लेकिन, इस सौदे में शामिल नहीं थी तो सिर्फ दुलारी की ‘इच्छा’, जिसे पैसे और ताकत के दम पर मनोहर लाल ने हम जाति होने के बावजूद रौंदवा दिया था.

हालांकि, इस के बाद भी मनोहर लाल इस बार फिर विधायक नहीं बन पाए, क्योंकि पिछड़ों ने दलितों को इसलिए वोट नहीं दिए, ताकि वे सियासीतौर पर मजबूत न हों. शायद एक विधवा की आह ने उन के सियासी कैरियर को भस्म कर दिया था. Long Hindi Story

Story In Hindi: सफर

Story In Hindi, लेखक – सुमित सेनगुप्ता

मैं यानी अनिल दादर रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में आ कर बैठ गया हूं. स्टेशन के पास ही शापुर रैस्टोरैंट है. उन की बनाई ग्रिल्ड पौम्फ्रैट फ्राई, दाल फ्राई और रुमाली रोटी का कौम्बिनेशन मेरा हौट फेवरेट है. दादर आते ही मैं उन की दुकान में जरूर झांकता हूं. इस के लिए एक बार भारी कीमत चुकातेचुकाते बच गया था.

दरअसल, जो ट्रेन कभी 10 मिनट लेट से कुर्लाटीटी स्टेशन से नहीं छूटती थी, वह ट्रेन उस दिन 45 मिनट लेट हुई और मु झे बचाया. वह समय दुर्गापूजा की पूर्वसंध्या का था. मैं मुंबई से पटना लौट रहा था. उस समय पटना के लिए सिर्फ एक ही ट्रेन थी, वह भी हफ्ते में 2 दिन, इसलिए ज्यादातर लोग कोलकाता हो कर ही आतेजाते थे.

उस दिन कुर्ला स्टेशन तक आतेआते मैं ने मन ही मन प्रतिज्ञा कर ली थी कि आज ट्रेन मिल जाए, तो ऐसे लालच में कभी नहीं पड़ूंगा. लालच में पाप, पाप में मौत. मगर 3 महीने बाद ही वह प्रतिज्ञा तोड़ दी.

भीष्म अपनी प्रतिज्ञा निभा कर अमर हो गए और मैं हर बार अपनी प्रतिज्ञा तोड़ कर ‘हक्काबक्का’ हो रहा हूं. सिगरेट नहीं पीऊंगा कह कर कितनी बार छोड़ी है, उस का याद नहीं. ‘घर के फ्रिज की मिठाई चुराऊंगा नहीं’ कह कर पत्नी ने माफीनामा लिखवाया था. हर बार पकड़ा गया. इतनी सारी निराशाओं के बीच एक चीज नहीं बदली, वह है मेरा अडि़यल किरदार.

पेटभर खाने के बाद दोपहर 4 बजे वेटिंग रूम की कुरसी पर शरीर लटका दिया. पुणे वापसी की ट्रेन साढ़े 6 बजे आएगी. तभी वेटिंग रूम इंचार्ज आ कर मेरा टिकट देखना चाहते हैं. मैं मोबाइल की स्क्रीन खोल कर दिखाता हूं.

वे देखते ही चौंक जाते हैं और बोलते हैं, ‘‘अरे, यह ट्रेन तो सुबह साढ़े 5 बजे निकल गई है.’’

उन की बात सुन कर मेरी नींद भरी आंखों से नींद गायब. उन के हाथ से अपना मोबाइल ले कर देखता हूं…

आज खुद ही अपने लिए बेवजह की मुसीबत खड़ी कर बैठा हूं. लैपटौप पर टिकट बुक करते समय सुबह को शाम सम झ बैठा. पूरी तरह शर्मिंदा और बेइज्जत हो कर उठ खड़ा हुआ. अभी बस पकड़नी होगी, नहीं तो घर पहुंच कर और शर्मिंदा होना पड़ेगा.

कुछ दूर खड़ी पुणे जाने वाली बस. मुंबई से पुणे शहर पहुंचने के 3 पते… शिवाजीनगर, स्टेशन और स्वारगेट. स्टेशन मेरे लिए सुविधाजनक है. अच्छा है बस स्टेशन ही जाएगी. बस को 4 एजेंट घेरे हुए हैं. जहां से जो मुमकिन हो ग्राहक पकड़ कर ला रहे हैं. मेरे जाते ही वे टूट पड़ते हैं, मुमकिन हो तो मु झे गोदी में उठा कर बैठा देते.

बस काफी खाली है. खिड़की के पास सीट ले कर बैठ गया. अरे, बाप रे… 5-6 सवारियों को ले कर बस तुरंत छोड़ देती है. राहत की सांस आती है कि चलो 8 बजे तक पुणे पहुंच जाएंगे.

बस आगे बढ़ती है, दाएं मुड़ती है, फिर दाएं, उस के बाद फिर दाएं और थोड़ा आगे जा कर रुक जाती है.

यानी जहां से बस निकली थी, वहीं अब खड़ी है. फिर डेढ़ घंटे तक ऐसे ही 5 बार चक्कर काटती है.

आखिर में तंग आ कर मैं पूछता हूं, ‘‘यह सब करने का मतलब?’’

जवाब आता है, ‘‘आरटीओ औफिस के लोग खड़े हैं. ज्यादा देर खड़ी रही तो फाइन देना पड़ेगा.’’

जिंदगी में कितनी तरह के अनुभव होते हैं. आखिरकार शाम साढ़े 7 बजे बस दादर से निकलती है. तब तक सभी सीटें भर चुकी हैं. दिन शुक्रवार है, इसलिए पुणे में तैनात मुंबई के नौजवान लड़केलड़कियां वीकैंड पर घर लौट रहे हैं. बस में उन्हीं की भरमार है.

मेरे पास एक कम उम्र की लड़की बैठ गई है. उम्र न सिर्फ कम है, बल्कि ध्यान से देखा तो कद भी छोटा है. पैर पूरी तरह फुटरैस्ट तक नहीं पहुंच रहे.

तभी मेरा फोन बज उठा. फोन के दूसरी तरफ मेरी पत्नी श्रावंती. खतरा… फोन उठाते ही रास्ते के हौर्न की आवाज सुनाई देगी. मेरी नाकामी का भेद खुल जाएगा. पर फोन न उठाना भी ठीक नहीं. वह छोड़ेगी नहीं, लगातार बजाती रहेगी. फोन बंद कर दूं तो भी मुसीबत, बात न करने पर श्रावंती टैंशन लेगी. हाई ब्लडप्रैशर की पेशेंट है. अकेली घर पर है, यह भी समस्या है.

मजबूरन रिसीवर को ढकते हुए जोर से बोला, ‘‘चढ़ गया हूं, बाद में फोन करता हूं.’’

मकसद था मुंबई शहर छोड़ कर बस जब सुनसान इलाके में पहुंचेगी, तो बात कर लूंगा.

पश्चिम भारत में बेवजह हौर्न बजाने की आदत कम है. यह बात मु झे मेरे पुरानी कंपनी के डायरैक्टर मिस्टर बाफना ने कोलकाता के कैमाक स्ट्रीट औफिस में बैठ कर सम झाई थी. उस दिन लंबे समय तक लोडशैडिंग के चलते सड़क किनारे बने कौंफ्रैंस रूम की खिड़कियां खोलनी पड़ी थीं. फिर कारों के हौर्न के शोर से कान पक गए थे.

कुछ देर बाद बस एक पैट्रोल पंप पर रुकती है. जल्दी से उतर कर एक सुनसान जगह ढूंढ़ कर श्रावंती को रिपोर्ट कर देता हूं. बस की रफ्तार देख कर अंदाजा लगा लिया है कि रात 11 बजे से पहले पुणे नहीं पहुंचेगी. ट्रेन होती तो साढ़े 9 बजे ही पहुंच जाता, इसलिए पहले ही ट्रेन लेट होने की कहानी गढ़ ली है.

बस मुंबई शहर छोड़ कर मुंबईपुणे ऐक्सप्रेसवे पर चल पड़ती है. महसूस करता हूं कि पास वाली लड़की सीट पर सो गई है. बीचबीच में झुक कर मेरे कंधे से टकरा रही है. बेचारी पूरे दिन औफिस में काम कर के अब सफर कर रही है. वह मेरी छोटी बेटी जितनी है. तोरसा भी बस में मेरे कंधे पर सिर रख कर सोती थी.

कभी गोद में सिर दे कर लेट जाती थी. छोटी उम्र से ही वह मेरी बगलगीर थी.

एक बार औफिस के काम से कुछ दिनों के लिए कोलकाता जाना हुआ. तोरसा तब 3 साल की थी. जिद करने लगी कि मेरे साथ कोलकाता जाएगी. यह सुन कर कोलकाता से भाई की पत्नी दोला ने कहा, ‘‘दादा, ले आइए. मैं संभाल लूंगी.’’

चेयरकार से दोनों गए थे. वह मंजर आज भी आंखों में तैरता है. एक कोल्डड्रिंक की बोतल, चिप्स का पैकेट सामने रख कर 3 साल की बच्ची खिड़की के पास बैठी बाहर का नजारा देखतेदेखते पटना से कोलकाता पहुंच गई. हावड़ा स्टेशन पर उतर कर उस ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा. ‘ठकठक’ कर चलने लगी.

औफिस के एक साथी गोपाल ने देख कर कहा था, ‘‘तेरी बेटी बहुत स्मार्ट है.’’

मन ही मन आज सोचता हूं, ‘जरूरत से ज्यादा सम झदार…’

22 साल पूरे होतेहोते एमबीए कर के दूल्हे के हाथ ससुराल चली गई और उस की बड़ी बहन को शादी के लिए मनाने में तो नाकों चने चबवा लिए. आखिर धमकी दे कर शादी के पीढ़े पर बैठाना पड़ा.

बस अचानक तेज ब्रेक मारती है. झटके से लड़की जाग जाती है और शर्मिंदा होती है.

वह शरमाते हुए कहती है, ‘‘सौरी अंकल, मैं सो गई थी.’’

मैं प्यार से कहता हूं, ‘‘कोई बात नहीं, तुम थक गई होगी. मेरी छोटी बेटी भी ऐसे ही सो जाती थी.’’

अब लड़की ने पूछा, ‘‘आप कहां उतरोगे?’’

मैं ने कहा, ‘‘पुणे स्टेशन.’’

सुन कर उसे राहत मिली. उस का अगला सवाल, ‘‘आप बंगाली हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘जी, कैसे पता चला?’’

लड़की बोली, ‘‘आप के बोलने के लहजे से. हमारे डिपार्टमैंट में बंगाली बहुत हैं.’’

अब मैं ने पूछा, ‘‘आप मराठी हो?’’

उस लड़की ने कहा, ‘‘आप को कैसे पता?’’

मैं ने जवाब दिया, ‘‘मेरे साथ वाले पड़ोसी भी मराठी हैं. आप ने अपनी ‘आई’ से बात की है न?’’

इतना सुन कर वह जोर से हंसी.

2 घंटे चलने के बाद बस एक रोड साइड ढाबे के पास रुकती है. यहां सभी उतरेंगे. कोई चाय पीएगा, कोई खाना खाएगा, कोई वाशरूम जाएगा.

मैं भी उतरा. समय देखा, तकरीबन 10 बजे हैं यानी पुणे स्टेशन पहुंचतेपहुंचते रात के 12 बज ही जाएंगे. आज पकड़ा जाऊंगा. मेरा झूठ टिकेगा नहीं, क्योंकि रात जितनी बढ़ेगी, देरी होगी, श्रावंती के फोन उतने ही बार आएंगे और किसी न किसी समय आसपास का शोर पकड़ में आ जाएगा और मैं फंस जाऊंगा.

फिर सुनसान जगह ढूंढ़ कर फोन लगाता हूं. यहां के लोग ट्रेन में ज्यादा बात नहीं करते. हौकर्स भी वैसे नहीं चलते, यह श्रावंती जानती है, इसलिए सुनसानी के आंचल में बच सकता हूं.

सब ठीक चल रहा था, श्रावंती से बात शांति से हो रही थी. अचानक हमारी बस के पास खड़ी बस भयानक आवाज में गरज उठी. श्रावंती के कान में वह आवाज जरूर पहुंची और ऐसा ही हुआ.

वह बोली, ‘‘बस की आवाज आ रही है. तुम कहां हो?’’

मैं धीरे से बोला, ‘‘अरे, खंडाला घाट के ऊपर ट्रेन खड़ी है. पास ही ऐक्सप्रैसवे है.’’

श्रावंती मान जाती है या मन ही मन सम झ जाती है. मैं बच गया. जल्दी से बात खत्म की. बोला, ‘‘बात ठीक से सुनाई नहीं दे रही. टावर नहीं मिल रहा.’’

पास वाली लड़की बस में लौट आई. एक जीरो शुगर कोक की बोतल मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली, ‘‘अंकल, यह लीजिए.’’

उस ने नोटिस किया था कि मेरी पानी की बोतल खाली हो गई है. टैंशन में मैं भूल गया था पानी खरीदना.

हमारी बस लोनावला घाट में जाम में फंस गई. पुणे शहर के नजदीक पहुंचते ही रात का 1 बज गया. रेल स्टेशन पहुंचतेपहुंचते रात के 2 बज गए थे.

लड़की से पूछा, ‘‘आप कहां जाओगी?’’

जवाब आया, ‘‘शिवाजीनगर.’’

फिर मैं ने पूछा, ‘‘कोई आप को लेने आ रहा है?’’

कुछ देर चुप रह कर मेरी तरफ देखती हुई वह बोली, ‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी.’’

थोड़ा अधिकार दिखाते हुए मैं बोला, ‘‘मु झे ‘खड़की’ जाना है. चलो, तुम्हें छोड़ देता हूं. इतनी रात अकेली कैसे जाओगी.’’

लड़की ने एक आटोरिकशा बुलाया और आटोरिकशा वाले को मराठी में सम झाया कि उसे ‘शिवाजीनगर’ छोड़ कर मु झे ‘खड़की’ पहुंचाना है. मेरा फोन चार्ज खत्म हो चुका था. पहले ही श्रावंती से कह दिया था, ‘‘ट्रेन बहुत लेट है. फोन का चार्ज भी खत्म हो रहा है. तुम चिंता मत करो.’’

लड़की को उस के अपार्टमैंट के दरवाजे तक छोड़ कर विदा किया. आटोरिकशा वाला ‘खड़की’ की ओर चल पड़ा.

मैं ड्राइवर से कहा, ‘‘गाड़ी वापस मोड़ो. मु झे ‘एनआईबीएम’ जाना है.’’

आटोरिकशा वाला बोला, ‘‘लेकिन, उस ने तो ‘खड़की’ कहा था.’’

मैं ने कहा, ‘‘क्या करूं… इतनी रात अकेली कैसे छोड़ दूं? मुंबई से साथ चले थे. सच बोलने पर वह पहुंचाने को राजी नहीं थी.’’

आटोरिकशा वाला बोला, ‘‘चलिए सर, जहां बोलोगे पहुंचा दूंगा.’’ Story In Hindi

Hindi Story: रबड़ का आदमी

Hindi Story, लेखक – प्रभात गौतम

इत्तिफाक से उस दिन हमारा आमनासामना हो गया. नरेश कालेज के दिनों में मेरा सहपाठी रह चुका था. हमारी आपस में कभी भी गहरी दोस्ती नहीं रही थी, पर आज वह इतना अपनापन दिखा रहा था, जैसे हम जन्मजन्मांतर के साथी हों. बिना मेरी बोरियत को समझे वह लगातार अपने कालेज के दिनों की घटनाएं दोहराए जा रहा था.

मैं कभी सड़क पर गुजरती कारों को देख रहा था, तो कभी आसमान पर छाए हलके बादलों को. किसी भी तरह जल्दी से जल्दी उस से छुटकारा पाने के लिए मैं ‘हां या न’ में उस का समर्थन जता देता था, जिस से वह और भी खुश हो रहा था.

‘‘अच्छा अभी तो मैं चलता हूं. फिर कभी घर आना. यहीं गांधीनगर में,’’ जैसे ही नरेश ने अपनी बात को खत्म किया, मैं ने अपने घर जाने का उतावलापन जाहिर कर दिया.

‘‘फिर कभी क्यों राजन… चलो, अभी चलते हैं. इसी बहाने भाभीजी के हाथों की चाय भी पी लेंगे,’’ नरेश तुरंत बोल पड़ा.

मुझे लगा कि मेरे द्वारा आसमान में उछाला गया कोई पत्थर मेरे ही सिर पर आ गिरा है. मुझे अपनी गलती का पछतावा होने लगा. कितना अच्छा होता मैं यहीं रुक कर कुछ देर और उस की बातें सुन लेता, जिस से मेरा रविवार का मजा खराब होने से तो बच जाता.

घर पर पहुंचने पर जो मेरा बुरा हाल होने वाला था, उस का मुझे आभास होने लगा था. मैं उस की बातों में सारे सामान की लिस्ट भूल चुका था, जो मुझे घर के लिए ले जाना था.

‘‘यार, थोड़ी मिठाई और नमकीन भी ले चल. भूख लगी है,’’ नरेश जैसे फिर बेशर्मी पर उतर आया.

मैं अंदर ही अंदर गुस्से से भर गया था और जेब में पड़े एकलौते नोट के जाने का शोक मनाते हुए मिठाई की दुकान की तरफ बढ़ रहा था.

घर के भीतर आते ही नरेश ‘धम्म’ से सोफे पर बैठ गया और दीवारों पर लगी पेंटिंग्स पर अपनी राय जाहिर करने लगा, जबकि मुझे सीधे लग रहा था कि वह इन के बारे में कुछ नहीं जानता.

कमरे में सजे गुलदस्ते, मूर्तियां नरेश ऐसे देख रहा था जैसे वह इसे पहली बार देख रहा हो. बातचीत को कुछ देर भी रोकना उसे गंवारा नहीं था. कोई न कोई बात खोज कर वह लगातार बोलता जा रहा था और नहीं तो वह कालेज के दिनों की क्लास के दोस्तों की बात ही छेड़ देता, जिसे वह कुछ ही देर पहले बता चुका था. यहां तक कि मुझे ही मेरी आदतों से अवगत कराने लगता था. मुझे उस के मुंह से शराब की हलकीहलकी बदबू भी आ रही थी.

‘‘अरे राजन, तुम तो आज बड़े उदास नजर आ रहे हो. कहीं भाभीजी से झगड़ा तो नहीं हो गया,’’ नरेश मेरी उदासी भांप कर बोल पड़ा.

मुझे अपने एकमात्र नोट के जाने का दुख सता रहा था जिसे बचाने के लिए मुझे अपनी औफिस की पार्टी छोड़नी पड़ी थी और औफिस से घर के लिए कभी किसी से, कभी किसी से लिफ्ट लेनी पड़ी थी.

‘‘नहीं… तो. मैं उदास कहां हूं. वह तो थोड़ी सी थकावट है,’’ मैं ने चेहरे पर बनावटी मुसकराहट लाने की कोशिश की.

‘‘तुम बैठो, मैं अभी तुम्हारे लिए चाय बनवा देता हूं,’’ मैं ने बात पलटने के अंदाज में कहा, जिस से मुझे उठ कर श्रीमतीजी को हालात समझाने का मौका भी मिल सके.

‘‘चाय आए तब तक तुम मिठाई ही ले आओ,’’ अब नरेश एकदम अनौपचारिकता पर उतर आया था, जो मुझे बेशर्मी लग रही थी. मन चाहा कि उसे इसी समय धक्का मार कर बाहर निकाल दूं, पर किसी तरह अपनेआप को रोका और कमरे से बाहर आ गया. हालांकि, मैं मन ही मन उसे ढेर सारी गालियां दे चुका था.

अपनी पत्नी को थोड़े में सारी बात समझा कर मैं दोबारा नरेश के सामने वाले सोफे पर बैठ गया. अब उसे हमारी बातचीत के विषय याद नहीं आ रहे थे. आसपास नजरें दौड़ा कर वह किसी अखबार या पत्रिका की तलाश में था, जिसे जानते हुए भी मैं अनजान बना हुआ था, क्योंकि मैं अखबार वगैरह मंगवाता ही नहीं था.

कुछ देर के लिए हमारे बीच चुप्पी बनी रही, जिसे तोड़ने के लिए नरेश अपने जूते हिला कर ‘खटखट’ की आवाज कर लेता था. कभी हम घूमते पंखे को देखते थे, कभी दीवारों पर टंगे कलैंडर में तारीखें पढ़ने लगते थे. जैसे ही वह मेरी तरफ देखता था, मैं अपने चेहरे पर बनावटी मुसकराहट तैरा लेता.

कुछ ही देर में चाय, मिठाई और नमकीन से सजी ट्रे के साथ मेरी पत्नी हमारे सामने थी, जिस को देखते ही नरेश ने फिर से अपनी बकबक शुरू कर दी. वह लगातार चाय, नमकीन की तारीफ कर प्लेट साफ किए जा रहा था. मेरे साथ होने वाली बातें बड़े यकीन से वह मेरी पत्नी को बताए जा रहा था, जो कभी मेरे साथ घटित ही नहीं हुई थीं. फिर भी हम दोनों चुपचाप उसे सुने जा रहे थे.

मुझे नरेश के द्वारा सुनाए जा रहे किसी भी चुटकुले पर हंस नहीं आ रही थी. कई बार तो मुझे वह एक डाकू या लुटेरा जैसा लगने लगा था, जो हमारे घर को लूटने पर आमदा है और हम उसे चुपचाप बैठे देख रहे हैं. पत्नी भी उस की बातों का औपचारिक जवाब दे कर चुप हो जाती थी.

आखिरकार सबकुछ खा पीने के बाद जब नरेश जाने के लिए उठा, तो मुझे कुछ संतोष हुआ. कदम बढ़ाते हुए मैं उसे बाहरी दरवाजे तक ले आया था, पर वह था कि कोई न कोई विषय पर नई बात शुरू कर देता था.

‘‘कितने बरसों बाद तो हम मिले हैं,’’ कह कर नरेश फिर से पत्नी की तरफ मुखातिब हो गया.

‘‘भाभीजी, आप क्या करती हैं? आप तो अच्छी पढ़ीलिखी हैं कहीं सर्विस क्यों नहीं कर लेतीं?’’ उस ने पत्नी से पूछा.

‘‘करना तो चाहती हूं, पर मिले भी तो,’’ पत्नी ने टालने के अंदाज में जवाब दिया.

‘‘तुम दिला दो इन्हें सर्विस,’’ मैं ने कुछ गुस्से से कहा.

‘‘आप की तो इंगलिश भी बहुत अच्छी लग रही है. आप बता रही थीं आप ने बीएड भी कर रखा है… कोई स्कूल जौईन करना चाहें तो आप कल ही आ जाओ. आप की नौकरी पक्की. अभी 20,000 से स्टार्ट करवा दूंगा, फिर आगे देख लेंगे. स्कूल का मालिक मेरा अच्छा जानकार है. एकदम जिगरी यार. समझो, अपना ही स्कूल है.’’

नरेश ने किसी नामी स्कूल का नाम बताया. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह इतने बड़े स्कूल के मालिक का जानकार होगा.

इस एक वाक्य से एकदम नरेश अच्छे और भले आदमी में तबदील हो गया. जैसे मेरे सामने पैंटशर्ट पहने कोई दूत खड़ा था. मैं उस के कपड़ों में लगे परफ्यूम की भीनीभीनी महक महसूस कर रहा था. उस की बातें अब हमें बड़ी अच्छी लग रही थी.

‘‘आप खाना खा कर जाते,’’ पत्नी ने भी अब उस की मेहमाननवाजी शुरू कर दी थी.

‘‘नहीं, आप ने इतना कुछ तो खिला दिया. खाना खाऊंगा आप की पहली तनख्वाह मिलने पर,’’ कह कर नरेश आगे बढ़ने लगा.

‘‘मैं तुम्हें स्कूटर पर छोड़ देता हूं,’’ मैं भी पूरी तरह नरेश की खातिरदारी पर उतर आया था. वह मना करते हुए चुपचाप आगे बढ़ गया.

…और कमरे में वापस जाते हुए मैं नरेश की तारीफ के पुल बांधे जा रहा था. Hindi Story

News Story In Hindi: भाषा की आड़ में सियासी जंग

News Story In Hindi: बारिश का मौसम आ गया था. पहाड़ों पर रोजाना पहाड़ खिसकने और लोगों के जाम में फंसने की खबरें आ रही थीं. दिल्ली में हुई जरा सी बारिश से सड़कों पर पानी भरा, तो दिल्ली सरकार की पोलपट्टी खुल गई.

इन सब परेशानियों को नजरअंदाज करते हुए विजय ने एक शाम अनामिका को कनाट प्लेस के एक कैफे में बुलाया. शाम के 5 बज रहे थे. विजय कैफे में था, जबकि अनामिका को 6 बजे तक आना था. वह बारिश के चलते जाम में फंस गई थी.

विजय ने कहा भी था कि ओला बाइक ले लेना, पर अनामिका ने कार से आना मुनासिब सम झा, तो अब जाम की भेंट चढ़ गई थी.

कैफे बड़ा खूबसूरत था. चूंकि बारिश हो रही थी, तो वहां भीड़ भी अच्छीखासी थी. विजय के सामने की सीट पर एक साउथ इंडियन नौजवान बैठा था. उम्र होगी तकरीबन 26 साल और वह किसी अच्छी कंपनी का मुलाजिम लग रहा था. वह बैरा से टूटीफूटी हिंदी में बात कर रहा था.

विजय चूंकि हरियाणा से था, पर दिल्ली में पलाबढ़ा था, तो उस ने हरियाणवी में उस साउथ इंडियन नौजवान के मजे लेने की नीयत से पूछा, ‘‘छोरे, केरल का सै के?’’

उस साउथ इंडियन को सिर्फ केरल सम झ में आया, तो वह तिलमिला कर बोला, ‘‘मैं केरल नहीं, तमिलनाडु से आई.’’

‘आई’ सुनते ही विजय की हंसी निकल गई और वह बोला, ‘‘आ रै, तू तो छोरी लिकड़ा…’’

उस साउथ इंडियन के कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, पर वह बोला, ‘‘मैं मलयाली नहीं, तमिल है.’’

‘‘फेर आड़े के धार लेण आया सै…’’ विजय अपनी हंसी रोकते हुए बोला.

‘‘मुझे आप की भाषा नहीं सम झ आती. मेरी हिंदी बड़ी पूअर है. वैरी लिटिल हिंदी जानती,’’ उस नौजवान ने जवाब दिया.

‘‘या हिंदी ना सै झकोई, हरियाणवी सै,’’ विजय ने फिर मजे लिए.

‘‘सर, मेरी सम झ में कुछ नहीं आती… आप क्या बोलती…’’ वह नौजवान परेशान हो कर बोला.

‘‘मैं बोलती कि तू भैंस की पूंछ सै. खाग्गड़ का खाग्गड़ हो ग्या, पर ‘बोलता’ को ‘बोलती’ बोल्लण तै बाज नी आंदा,’’ विजय ने फिर चुटकी ली.

‘‘फ्रैंड, मैं यहां कौफी पीने आई. क्या आप भी कौफी लेंगी?’’ उस नौजवान ने खी झ कर पूछा.

‘‘अरे, नहीं फ्रैंड, मैं बस मजाक कर रहा था. मेरी गर्लफ्रैंड आने वाली है. हमारी कौफी डेट है. आप भी हमें जौइन करें. मु झे बड़ी खुशी होगी,’’ विजय अब मजाक के मूड में नहीं था.

उस नौजवान को काफीकुछ सम झ में आया और वह लंबी सांस लेते हुए बोला, ‘‘आप ने तो मुझे डरा दिया था. मैं जरूर आप के साथ कौफी लेगी.’’

‘‘मेरे भाई, ‘लेगी’ नहीं ‘लूंगा’ बोलो…’’ विजय ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम विजय है और आप का क्या नाम है?’’

‘‘आप मु झे सुंदरम कह सकते हैं,’’ वह नौजवान हाथ मिलाते हुए बोला.

‘‘और मेरा नाम अनामिका है…’’ तभी पीछे खड़ी अनामिका ने अपना परिचय दिया, ‘‘और विजय, तुम क्यों इन भाई साहब के मजे ले रहे थे. बड़ी हरियाणवी निकल रही थी आज. तुम्हें किसी को उस की भाषा या बोलने के अंदाज पर जज कर के उस का मजाक नहीं बनाना चाहिए.’’

‘‘पर यार, मु झे टाइमपास करना था. सोचा कि इस की ही क्लास ले लूं,’’ विजय ने अनामिका को सफाई दी.

‘‘पर तुम यह देखो न कि हम तीनों यहां एक टेबल पर बैठे हैं, फिर भी 3 अलगअलग भाषाओं तमिल, हरियाणवी और भोजपुरी को जानते हुए कितने अपनेपन से बात या संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘यह तो सच है. अच्छा, यह बताओ कि कौन सी कौफी लोगी? और आप तमिल भाई साहब… माफ करना सुंदरम भाई साहब, कौन सी कौफी लेना पसंद करेंगे?’’ विजय बोला.

‘‘मैं फिल्टर कौफी लेगी. मु झे वही पसंद है,’’ सुंदरम ने धीरे से कहा.

‘‘पर यहां तो कौफी की कई वैराइटी हैं. आज आप कुछ नया ट्राई करो,’’ अनामिका बोली.

‘‘नया क्या?’’ सुंदरम ने पूछा, ‘‘हम तो फिल्टर कौफी ही पीते हैं.’’

‘‘ऐस्प्रैसो, कैप्पुचीनो, लैटे, अमेरिकनो, फ्लैट ह्वाइट, मोचा, फ्रैपुचीनो, मैकियाटो, कौफी क्रेमा, लुंगो…’’ अभी अनामिका ने इतना ही कहा था कि सुंदरम ने बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘‘बस, मैं सम झ गई. जो आप को पसंद, वही मैं लेती.’’

‘‘मैं भी वही लेती,’’ विजय ने इतना कहा, तो अनामिका ने भी ठहाका लगाया. सुंदरम सम झ गया कि उस ने फिर गलत हिंदी बोली है.

अनामिका ने बैरा को बुला कर 3 कैप्पुचीनो का और्डर दिया और साथ में 3 वैज सैंडविच भी मंगाए.

‘‘जब तुम ने तमिल, हरियाणवी और भोजपुरी वाली बात कही, तो मेरे दिमाग में ‘त्रिभाषा फार्मूला’ वाला मामला याद आ गया. आजकल यह मुद्दा बहुत ज्यादा गरम है. इस पर सरकार और विपक्ष आमनेसामने है,’’ विजय ने अनामिका से कहा.

‘‘यह बड़ा पेचीदा मामला है. जब हम किसी भाषा की बात करते हैं, तो यह सोचना चाहिए कि उस के बोलने और सम झने वालों की तादाद कितनी है. अब संस्कृतनिष्ठ हिंदी की ही बात करें, तो यह आज के जमाने में किस काम की है, यह मेरी सम झ से परे है’’ अनामिका बोली.

‘‘मैं तुम्हारा मतलब नहीं सम झा?’’ विजय ने कौफी का सिप लेते हुए कहा.

‘‘राष्ट्र के उत्थान के पश्चात हम विश्वव्यापी समस्याओं पर विजय प्राप्त कर लेंगे एवं समग्र मनुष्य जाति से निवेदन करेंगे कि सन्मार्ग पर चलना ही एकमेव उद्देश्य रहे,’’ जब अनामिका ने इतनी भारीभरकम हिंदी पेश की, तो विजय के साथसाथ सुंदरम की भी आंखें फटी की फटी रह गईं.

‘‘अनामिका, मु झे नहीं पता था कि हिंदी का यह रूप भी है. लेकिन ऐसे मुश्किल शब्दों का क्या फायदा, जो सम झ में ही न आएं. और वैसे भी भाषा को ले कर जो झगड़ा महाराष्ट्र में चल रहा है, वह तो और भी डरा देने वाला है. सारे सियासी दल इसे भुना रहे हैं और पिस रही है बेचारी आम जनता,’’ विजय ने कहा.

‘‘तुम सही कह रहे हो. वहां तो मराठी और हिंदी वालों में इतनी ज्यादा ठन गई है कि लोग एकदूसरे से मारपीट करने लगे हैं.

‘‘बीते दिनों मराठी में बात नहीं करने पर एक फूड स्टौल मालिक को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के एक नेता अविनाश जाधव ने थप्पड़ मारा था. इस घटना के विरोध में व्यापारियों के प्रदर्शन के जवाब में ठाणे में आयोजित की जाने वाली रैली से पहले मनसे के नेता आविनाश जाधव को पुलिस ने हिरासत में ले लिया,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी भाषा विवाद पर एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने साफ किया है कि भाषा के नाम पर किसी भी तरह की गुंडागर्दी बरदाश्त नहीं की जाएगी. भाषा के आधार पर मारपीट करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी ऐक्शन लिया जाएगा,’’ विजय ने बात को आगे बढ़ाया.

‘‘मुझे ऐसा लगता है कि ‘त्रिभाषा फार्मूला’ के नाम पर भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में हिंदी के साथसाथ संस्कृत भाषा को भी थोपना चाहती है. साथ ही यह बात भी बड़ी अहम है कि जो भी लोग नई शिक्षा नीति बना रहे हैं, वे खुद अंगरेजी बोलने वाले हैं और इसी भाषा में पढ़ेलिखे हैं.

‘‘ऐसे लोग हिंदी या दूसरी तमाम भारतीय भाषाएं बोलने वालों को अपने से कमतर सम झते हैं. उन्हें तो हर उस गरीब और वंचित से दिक्कत है, जो सरकारी स्कूल में पढ़ कर आगे बढ़ने की सोच रहा है. आसान शब्दों में कहूं, तो यह दलितों को पढ़ाई से दूर रखने की साजिश है.

‘‘ऐसा ही कुछ अमेरिका में भी हो रहा है. वहां के गोरे लोग नस्ल के आधार पर दूसरों को सरकार द्वारा चलने वाले स्कूलों में पढ़ते देख ज्यादा खुश नहीं हैं. वे अपने बच्चों को उन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने भेज रहे हैं, जहां की फीस बहुत ज्यादा है. डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आने के बाद यह नस्लीय भेद खुल कर सामने आ रहा है,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘तुम सही कह रही हो. हमारे यहां भी कुछकुछ वैसा ही माहौल बनाया जा रहा है. यहां जो भाषा का विवाद है, वहां हिंदी को प्रमोट करने की राजनीतिक चाल लगती है. जब हर जगह हिंदी पढ़ना जरूरी हो जाएगा, तब हिंदी भाषा से जुड़े रोजगार भी बढ़ेंगे और सरकारी नौकरियां भी निकालनी पड़ेंगी.

‘‘सरकारी दफ्तरों में ही देख लो. जब से अंगरेजी सरकारी दस्तावेजों का हिंदी में अनुवाद का काम शुरू हुआ है, तब से राजभाषा विभाग भी बना दिए हैं, पर वहां जो शब्दश: अनुवाद होता है, वह हिंदी किसी काम की नहीं है. लोग अंगरेजी में ही ज्यादा सहज महसूस करते हैं,’’ विजय ने अपनी बात रखी.

सुंदरम को ज्यादा तो कुछ सम झ नहीं आ रहा था, पर उस ने महाराष्ट्र वाली खबरें पढ़ी थीं और तमिलनाडु में भी इसी विवाद पर सुना था. उसे इस बात की खुशी थी कि विजय और अनामिका इस मुद्दे पर बहुत अच्छी बहस कर रहे थे.

हुआ यह है कि केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को समग्र शिक्षा योजना के तहत मिलने वाला पैसा देने से मना कर दिया है. केंद्र का कहना है कि तमिलनाडु ने नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को लागू करने से इनकार कर दिया है. इसी वजह से राज्य को समग्र शिक्षा योजना का फंड नहीं दिया जा रहा है.

इस मसले पर तमिलनाडु राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर कहा था कि केंद्र सरकार ने अब तक 2,152 करोड़ रुपए जारी नहीं किए हैं. शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए इस फंड की जरूरत है.

एमके स्टालिन ने यह भी कहा था कि हिंदी सिर्फ मुखौटा है और केंद्र सरकार की असली मंशा संस्कृत थोपने की है. उन्होंने कहा कि हिंदी के चलते उत्तर भारत में अवधी, बृज जैसी कई बोलियां खत्म हो गईं.

राजस्थान का उदाहरण देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार वहां उर्दू को हटा कर संस्कृत थोपने की कोशिश कर रही है. दूसरे राज्यों में भी ऐसा होगा, इसलिए तमिलनाडु इस का विरोध कर रहा है.

‘‘किस सोच में पड़ गए सुंदरम? लगता है तुम्हें हमारी बहस सम झ नहीं आई, जो इतने चुप हो?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मुझे अच्छा लगा. भले ही मेरी टूटीफूटी हिंदी है, पर आज इसी से मु झे आप जैसे फ्रैंड मिले हैं,’’ सुंदरम ने कहा.

‘‘अरे, एक ही मीटिंग में तुम्हारी हिंदी सुधर गई. हमारे साथ रहोगे तो हरियाणवी और भोजपुरी भी सीख जाओगे,’’ विजय ने कहा, तो वे तीनों हंसने लगे. News Story In Hindi

Story In Hindi: नाच

Story In Hindi: रोमिला को बैंक में काउंटर के पीछे बैठे और मुस्तैदी से अपना काम करते हुए जवान क्लर्क लड़केलड़कियां बड़े अच्छे लगते थे, इसलिए वह भी इन लोगों की तरह बैंक की सरकारी नौकरी ही पाना चाहती थी, पर बैंक पीओ के इम्तिहान में 2 बार नाकाम रहने के बाद से रोमिला का मनोबल बुरी तरह से टूट गया था और वह डिप्रैशन में रहने लगी.

रोमिला 25 साल की युवती थी. उस ने बीकौम करने के बाद बैंकिंग इम्तिहानों की तैयारी शुरू कर दी थी, क्योंकि आगे चल कर वह बैंकिंग में ही अपना कैरियर बनाना चाहती थी.

रोमिला को लग रहा था कि अब उसे कभी भी बैंक की सरकारी नौकरी नहीं मिल पाएगी, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में कंपीटिशन हद से ज्यादा बढ़ गया था.

रोमिला एक ठाकुर परिवार से थी और उस के पापा निरंजन सिंह भी चाहते थे कि रोमिला जल्द से जल्द बैंक पीओ का इम्तिहान पास कर ले, पर बेटी के बारबार नाकाम होने के चलते वे सरकारी नौकरी में जातिगत रिजर्वेशन के सख्त खिलाफ थे. उन्हें लगता था कि अगर पिछड़ी जाति के लड़केलड़कियों को नौकरी में रिजर्वेशन नहीं दिया जाता, तो रोमिला का चयन कब का हो जाता.

समयसमय पर निरंजन सिंह अपनी बेटी रोमिला का हौसला भी बढ़ाते रहते थे, पर इस बार रोमिला के नाकाम रहने पर उस का दुख उन से देखा नहीं गया, तो वे अपने सब से करीबी दोस्त और शहर के बड़े नामी वकील अनिल सिसौदिया के पास गए और उन से रोमिला की हालत को बताया और उपाय पूछा कि रोमिला का सरकारी नौकरी में सैलेक्शन कैसे हो? इस के लिए वे कितने भी पैसे खर्च कर सकते हैं.

अनिल सिसौदिया ने निरंजन सिंह को बताया कि सरकारी नौकरी पाना जितना मुश्किल है, उतना ही आसान भी.

अनिल सिसौदिया की इस बात पर निरंजन सिंह खी झ गए और बोले, ‘‘इतना ही आसान होता तो मेरी काबिल लड़की नौकरी पा गई होती.’’

वकील अनिल सिसौदिया ने निरंजन सिंह को बताया कि उन की बेटी अगर सवर्ण होने के नाते नौकरी नहीं पा रही है, तो उपाय बहुत आसान भी है.

‘‘क्या उपाय है?’’ निरंजन सिंह सरकारी नौकरी पाने का उपाय सुनने को बेताब हो रहे थे.

अनिल सिसौदिया ने बताया कि वे अपनी लड़की की शादी किसी दलित जाति के सीधेसादे और गरीब लड़के से कर दें, जिस से उन की बेटी का दलित जाति का सर्टिफिकेट बन जाएगा. उस सर्टिफिकेट के चलते जब बेटी को नौकरी मिल जाएगी, तो कुछ दिनों बाद उस की बेटी अपने पति पर जोरजुल्म करने का आरोप लगा कर तलाक ले ले और चुपचाप सरकारी नौकरी का मजा लेती रहे.

वकील अनिल सिसौदिया की बात सुनकर निरंजन सिंह का खून उबाल मारने लगा. उन की कनपटी लाल
हो गई.

‘‘अनिल, तुम पगला गए हो क्या… तुम मेरी बेटी को किसी निचली जाति के लड़के से ब्याहने की बात सोच भी कैसे सकते हो? यह कह कर तुम मेरी बेइज्जती कर रहे हो. इन दलित लोगों के घर में हम भला अपनी बेटी कैसे दे सकते हैं…’’ निरंजन सिंह चीख रहे थे.

वकील अनिल सिसौदिया ने निरंजन सिंह को पानी पीने को दिया और उन्हें सम झाया कि वे सिर्फ सरकारी नौकरी पाने के लिए किसी गएगुजरे, बेरोजगार और गरीब दलित जाति के लड़के से ब्याह के नाम पर कोर्टमैरिज करने को कह रहे हैं. शादी यहां से कहीं दूर जा कर होगी और आप उस बेरोजगार दलित लड़के को कोई रोजगार दिला देना या अपने पैसों के कर्ज तले दबे देना. हां, थोड़ा आत्मसमान को ठेस तो पहुंचेगी, पर फिर कुछ पाने के लिए थोड़ाबहुत सम झौता तो करना ही पड़ेगा.

निरंजन सिंह का मूड थोड़ा उखड़ा हुआ तो था, पर काफी हद तक बात उन की सम झ में आ गई थी और फिर घर जा कर उन्होंने यह बात रोमिला को बताई.

पहले तो रोमिला ने भी थोड़ी नाराजगी जताई, पर वह हर हाल में सरकारी नौकरी पाना चाहती थी, इसलिए फिर उसे यह प्रस्ताव सही लगने लगा था. एक बार वह बैंक की सरकारी नौकरी पा ले, फिर तो अपने उस दलित पति को तलाक देने में देर नहीं करेगी. इस तरह सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.

‘पर ऐसा लड़का मिलेगा कहां? और फिर हर लड़का शादी के बाद अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाना चाहेगा. ऐसे में अपनी इज्जत को बचाना एक बड़ी चुनौती होगी,’ रोमिला सोच रही थी.

‘हमारे आसपास देखने पर या फिर पिछड़ी बस्तियों में मरियल, लाचार और बेरोजगार दलित लड़का बड़ी आसानी से मिल ही जाता है,’ यह सोच कर निरंजन सिंह को भी बड़ी आसानी से एक लड़का मिल भी गया.

वह 35 साल का मनोज नाम का एक दलित विधुर था. उस के अंदर लड़कियों जैसी हरकतें ज्यादा थीं और वह गांव की नौटंकी में औरत बन कर नाचगाना करता था. मनोज की पत्नी मर चुकी थी.

निरंजन सिंह को लड़कियों जैसी हरकत वाले मनोज से शादी कर देना थोड़ा सुरक्षित महसूस हुआ था और उन्हें यह दलित इतना लाचार लगा कि वह हमेशा उन की बेटी से दब कर ही रहेगा, इसलिए निरंजन सिंह ने मनोज से उस की दोबारा शादी की बात चलाई, तो वह थोड़ा हैरत में पड़ गया.

मनोज अपनी पत्नी के मर जाने के बाद सदमे जैसी हालत में था और शराब की लत लगा बैठा था. वैसे, उस के पास खुद का पेट भरने के लिए भी पैसे तक नहीं थे. ऐसे में भला वह शादी की बात कैसे सोचता?

पर निरंजन सिंह ने गांव के प्रधान को अपनी तरफ कर लिया और अपनी बेटी को अनाथ दिखाते हुए झूठ
बोला कि वे अनाथ लड़कियों की शादी मनोज जैसे विधुर से कराते हैं, ताकि दोनों लोगों का भला हो सके.

प्रधान को निरंजन सिंह की बात में सचाई लगी और वे मनोज को दूसरी शादी के लिए राजी करने लगे. उन्होंने मनोज को भरोसा भी दिलाया कि कोर्ट में शादी करने पर उसे 50,000 रुपए भी मिलेंगे.

रुपयों की बात सुन कर मनोज को ठीक लगा और उस ने दोबारा शादी करने के लिए हां कर दी.

मनोज को शादी से कोई सरोकार नहीं था. उसे तो 50,000 रुपए का लालच था, जो शादी के बाद मिलने वाले थे और वह उन से जम कर शराब पी सकता था.

शहर में कोर्ट में मनोज और रोमिला की शादी करा दी गई. निरंजन सिंह के परिवार को इस तरह बेटी की शादी बड़ी अजीब सी लग रही थी, पर वे लोग जानते थे कि यह सब एक ड्रामा है और कुछ दिनों के बाद नौकरी मिलते ही रोमिला मनोज को लात मार कर वापस आ जाएगी.

रोमिला शादी कर के मनोज के साथ जाते समय थोड़ा घबरा रही थी कि जब मनोज उस के साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहेगा, तो वह क्या करेगी? किसी दलित के साथ रहना या फिर संबंध बनाने की बात तो उस ने सोची तक नहीं थी, पर सरकारी नौकरी के लालच में वह यह सब कर रही थी.

रोमिला को डर सता रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि मनोज उसे दबोच कर उस के साथ जबरदस्ती करने लगे. अपनी सुरक्षा के लिए उस ने एक चाकू अपनी कमर में छिपा लिया था और मनोज के टूटेफूटे घर जा कर कमरे में एक ओर खड़ी हो गई, पर मनोज ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, बल्कि कमरे में जाते ही शराब के 2 पैग मार कर नींद के आगोश में चला गया.

मनोज के घर पर खाना बनाने के लिए गैस और दूसरा सामान नहीं था. एक गैस कनैक्शन और दूसरे सामान का इंतजाम रोमिला के पापा ने कर दिया था. आखिर कुछ महीने तो रोमिला को यहां काटने थे और अपना शहरी स्टाइल भी छिपा कर रखना था, ताकि लोगों को किसी तरह का शक न हो और जाति प्रमाणपत्र बनने में कोई परेशानी न हो.

कुछ और समय बीता तो रोमिला ने अपना नया जाति प्रमाणपत्र बनवा लिया और बैंक की नौकरी के लिए दलित बन कर आवेदन कर दिया, जहां पर उसे जातिगत रिजर्वेशन मिलना था.

बैंक पीओ का इंतजाम पास था, इसलिए रोमिला जीजान से पढ़ाई करने लगी. कभीकभी तो उसे खाने की सुध भी नहीं रहती थी और वैसे भी उसे इस बार तो अपनी कामयाबी की पूरी उम्मीद थी, क्योंकि उस के पास पिछड़ी जाति का प्रमाणपत्र भी था, पर यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था.

इम्तिहान वाले दिन रोमिला बहुत आशावादी थी, पर प्रश्नपत्र देख कर उस के होश उड़ गए थे. सभी सवाल बेहद मुश्किल थे.

रोमिला सवालों के जवाब नहीं दे पाई और उसे तुरंत आभास हो गया कि यह प्रतियोगिता वह पास नहीं कर पाएगी. और हुआ भी यही. नतीजा आने पर रोमिला का सैलेक्शन नहीं हुआ था और वह रैंकिंग में भी बहुत पीछे रह गई थी.

यह साफ हो गया था कि प्रतियोगी परीक्षा में पास होने के लिए जातिगत रिजर्वेशन से कुछ नहीं होता, बल्कि कामयाबी तो उन्हीं को मिलती है, जो इस के सही हकदार होते हैं.

उस रात अचानक मनोज को तेज बुखार आ गया. जब मनोज से रहा नहीं गया तो उस ने रोमिला को पुकारा और दवा मांगी.

जब रोमिला बुखार की गोली ले कर गई तो मनोज आंखें बंद किए लेटा हुआ था और बड़बड़ा रहा था, ‘‘रमिया… रमिया… छोड़ दो उसे. छोड़ दो रमिया को…’’

रोमिला ने मनोज को उठा कर दवा खिलाई और रमिया के बारे में पूछने लगी.

उस दिन मनोज ने अपने दिल में छिपी हुई बातों का राज उजागर किया, ‘‘रमिया मेरी पत्नी थी. हम दोनों बहुत खुश थे. रमिया लंबी, पतली देह वाली औरत थी उस की साड़ी और चोली के बीच की कमर और गहरी नाभि मु झे बहुत पसंद थी.

‘‘रमिया खाना भी बहुत अच्छा बनाती थी, पर शायद दलित जाति का होना रमिया और मेरे लिए शाप बन
गया था.

‘‘एक दिन की बात है. गांव के ठाकुर और पंडित हमारे घर आए और रमिया पर भरपूर नजर डालते हुए ठाकुर बोले, ‘सुना है तेरी घरवाली मीट बहुत अच्छा बनाती है. चल, आज हम तेरे घर में बैठ कर तेरी पत्नी के हाथ का मीट खाएंगे.’

‘‘बड़ी जाति के लोग एक दलित के घर खाना खाएंगे, यह बात बड़ी अजीब लगी थी, पर हम दोनों को भरोसा हो गया था कि हो सकता है कि बदलते समय के साथ ऊंचनीच का भेदभाव खत्म हो गया हो.

‘‘ठाकुर और पंडित ने अपने साथ लाया हुआ बकरे का मीट रमिया को दे दिया और खुद जा कर खटिया पर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़ाने लगे, जबकि रमिया खुशीखुशी अपनी साड़ी को अपनी सांवली कमर में खोंस कर मीट बनाने की तैयारी करने लगी थी.

‘‘तभी ठाकुर ने हम से कहा, ‘तुम नौटंकी में नाचने वाली का रोल बड़ा अच्छा निभाए थे. जरा हम भी तो देखें कि मनोज भैया कैसे नाचे थे…’

‘‘ठाकुर के मुंह से अपने हुनर की तारीफ सुन कर हम खुश हो गए और जल्दी से कमरे में जा कर औरतों का सिंगार कर के और घाघरा और चोली ओढ़ कर आ गए और दोनों के सामने नाच दिखाने लगे और खुद गाना भी गा रहे थे.

‘‘गाते समय हमारी आवाज किसी औरत की तरह ही पतली और सुरीली लग रही थी… गाने के बोल थे, ‘हमार नाम आपन मुंह से बोलो राजाजी, चोली तंग है हमारे जरा हुक तो खोलो राजाजी…’

‘‘रसोई के अंदर रमिया को यह नौटंकी अच्छी नहीं लग रही थी, पर वह चुपचाप मीट बना रही थी. ठाकुर और पंडित की नजर तो रमिया पर थी. वे दोनों रमिया का नाच देखना चाहते थे, इसलिए हमारा नाच रुकवा कर उन्होंने रमिया से नाच दिखाने को कहा.

रमिया ने थोड़ा नानुकुर तो किया पर कुछ देर बाद सामने आ कर कमर हिला कर नाच दिखाने लगी, लेकिन उन दोनों की नीयत खराब थी और उन्होंने जबरदस्ती रमिया के साथ बारीबारी गलत काम किया.

‘‘अपने साथ हुए गलत काम के चलते ही रमिया ने नदी में कूद कर अपनी जान दे दी…’’ यह कहता हुआ मनोज रो रहा था.

रोमिला भी थोड़ा दुखी थी, पर वह कर क्या भी सकती थी. वह तो पहले ही बैंक के इम्तिहान में फेल होने से दुखी थी, क्योंकि उस के सारे प्लान और किएकराए पर पानी फिर गया था. एक दलित से शादी कर के भी उसे कामयाबी नहीं मिल पाई थी.

अगले दिन की बात है. रोमिला नहाने जा रही थी कि तभी दरवाजे पर कुंडी बजने की आवाज हुई.

मनोज ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने गांव के कुछ नई उम्र के बिगड़ैल लड़के खड़े थे. वे गिनती में 5 थे. उन लोगों ने मनोज को धक्का दिया और अंदर आ गए.

रोमिला पर भरपूर नजर डालते हुए एक लड़का बोला, ‘‘तनिक कमर लचका कर हम सब लोगों को नाच तो दिखा दे.’’

उस लड़के की बात का रोमिला ने डरते हुए विरोध किया, तो वे सब उस पर दबाव बनाने लगे और कहने लगे कि यहां तो यही रिवाज है कि दलित औरतें नाचती हैं और लोग मजा लेते हैं और तुम ने तो दलित से शादी कर ली है, इसलिए तुम हमारे सामने नाचोगी. अगर नहीं नाची तो हम सब तुम्हारा रेप करेंगे.

रेप का नाम सुन कर रोमिला सहम गई थी. उस ने सोचा कि रेप होने से अच्छा है कि वह कमर हिला कर नाच ही दे.

तभी एक लड़के ने मोबाइल पर गाना बजा दिया, ‘लहंगा तोहार बड़ा महंगा, बड़ी गरमी बा इस लहंगे मा…’

रोमिला ने अपनी भलाई सम झते हुए नाचना शुरू कर दिया. धीरेधीरे उस ने महसूस किया कि वे शोहदे उसे हवस भरी नजरों से घूर रहे हैं और उस का नाच देखने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.

रोमिला सोच रही थी कि काश वह जाति प्रमाणपत्र लगा कर नौकरी पाने के चक्कर में न पड़ी होती तो यह सब नहीं करना पड़ता, क्योंकि सरकारी नौकरी मेहनत करने से मिलती है, केवल पिछड़ी जाति के प्रमाणपत्र से कुछ नहीं होता. Story In Hindi

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