Story In Hindi: कोचिंग के पैसे

Story In Hindi: ‘‘तो आप और पैसे नहीं देंगे?’’ अशोक ने पूछा.

‘‘अरे, कहां से ला कर दूं तुम्हें. ये 10,000 रुपए कम हैं क्या… अब तुम अपने खर्च बढ़ा लो, तो मैं क्या कर सकता हूं. और अब हम से नहीं होगा,’’ अशोक के पिताजी ने कहा.

‘‘दे दीजिए न. अब बाहर रहता है, तो खर्चे तो होंगे ही,’’ अशोक की मां मन्नू देवी जब अपने पति बजरंगी बाबू से बोलीं, तो वे मानो गरजने लगे, ‘‘अभी खेती के पीछे इतने खर्चे तुम लोगों को नहीं दिख रहे क्या…

‘‘पहले ही कम बारिश के चलते खेती के पटवन के पीछे डीजल खरीदने में ही हालत खराब थी. भाड़े पर ट्रैक्टर लिया, तो खेत की जुताई हुई.

‘‘फिर बीज और खाद के पीछे अच्छीखासी रकम खर्च हो गई. अभी फसल थोड़ी ठीक लग रही, तो कीड़ों का प्रकोप शुरू हो गया है. उस के लिए भी दवाओं का छिड़काव करना होगा.

‘‘वासंती फसल में जो थोड़ीबहुत रकम आई थी, वह सब इन सब के पीछे स्वाहा हुई जा रही है. भंडार में देख लो जा कर. मुश्किल से 4-6 बोरा अनाज होगा. और शारदीय फसल तैयार होने में 2-4 महीने तो लग ही जाएंगे. यह खेती न हुई, खर्चों का घर हो गया. और इस को शहर की हवा लग रही है…’’

‘‘अभी पढ़ रहा है, तो खर्चे होंगे ही…’’ मन्नू देवी ने भी जवाब दिया, ‘‘यह खर्चा कहां गलत हो रहा है. कल को इस की नौकरी लगी, तो भरभर थैली रुपए बटोरते रहिएगा.’’

‘‘भरभर थैली… इतना आसान है नौकरी, जो मिल जाएगी. देख तो रहा हूं औरों को, पढ़लिख कर मारेमारे फिर रहे हैं,’’ बनारसी बाबू बोले.

‘‘अशुभ क्यों बोलते हैं जी. जो सब के साथ हुआ, वह कोई जरूरी थोड़े ही है कि हमारे साथ भी हो. शुभशुभ बोलो जी,’’ मन्नू देवी ने कहा.

‘‘सही बोल रहा हूं. और जो इस की नौकरी लगी, तो क्या सब हमारी ही जेब में रख जाएगा… इसी गांव में नौकरी करने वालों को भी देख रहा हूं कि वे क्या करते हैं…’’ बनारसी बाबू गुस्से में बोले.

‘‘फिरफिर वही बात. अरे, हम अपना फर्ज निभा दें, यही बहुत है. अभी हमारा जांगर चलता है, फिर बेटों से आस क्या रखना,’’ मन्नू देवी ने कहा.

अंदर कमरे में अपना बैग ठीक करता हुआ अशोक भनभना रहा था, ‘‘जब खर्चा नहीं दे सकते, तो बाहर शहर में पढ़ाने का शौक ही नहीं रखना था. अब वहां खर्चे हैं, तो हैं. उसे वह कैसे रोक सकता है. कुछ तो शहर का स्टैंडर्ड रखना ही होता है. अभी से उधर ध्यान नहीं दिया, तो आगे का भगवान ही मालिक है.’’

‘‘थोड़ा सम झा करो बाबू मेरे,’’ मां मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘बाप हैं तुम्हारे, कोई दुश्मन नहीं हैं. थोड़ा तुम भी सम झा करो कि वे ठीक कह रहे हैं कि नहीं. हर बाप का शौक होता है कि उस का बेटा खूब पढ़ेलिखे. इस में गलत क्या है?’’

‘‘तो मैं भी गलत कहां हूं मां. वहां शहर में जैसेतैसे तो नहीं रहा जा सकता न… सुमिरन साव के बेटे रतन को देख लो. ठाट से रहता है वहां. उस के जैसा खर्च करना तो मैं सोच भी नहीं सकता. फिर भी ढंग से रहना तो पड़ेगा ही. कोचिंग और पढ़ाई के अलावा खानेपीने, कौपीकिताब, टैंपोभाड़ा के खर्चे को कौन रोक सकता है…’’

अशोक अभी भी तैश में था, ‘‘वहां लड़के ही नहीं, लड़कियां भी साथ पढ़ती हैं. उन के साथ फटेपुराने कपड़े पहन कर तो नहीं रहा जा सकता न. अभी पूजा का मौसम है. मु झे भी नए कपड़े खरीदने ही होंगे. मैं खुद सस्ते में काम चलाता हूं. मगर तुम लोगों को लगता है कि मैं वहां ऐयाशी करता हूं.’’

‘‘ये कौन कह रहा है रे. 10,000 में आजकल क्या होता है…’’ मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘मैं अपने राजा बेटा को नहीं जानती क्या कि कितने कम खर्च में वह काम चलाता है.’’

‘‘साफसाफ कह देता हूं कि इस बार जो नए कपड़े नहीं खरीद पाया, तो छठ और दीवाली पर नहीं आऊंगा,’’ अशोक ने कहा.

मन्नू देवी के तो हाथपैर फूल गए. बाप रे, दीवाली और छठ जैसे पर्व में यह नहीं आया, तो किस के बूते वह इसे पार घाट लगाएगी. घर की साफसफाई से ले कर, छठ त्योहार का सारा इंतजाम तक यही दौड़दौड़ कर पूरा करता है. 2 साल पहले एक बार नहीं था, तो उन्हें कितनी परेशानी हुई थी.

इस के बाबूजी को तो जैसे कोई मतलब ही नहीं कि घर की साफसफाई कैसे होगी, और कि क्याक्या सामान चाहिए. उस के दोनों बच्चे अरुण और नन्ही इतने छोटे हैं कि उन्हें बाहर भेजने में डर लगता है. खेत से पूजा के लिए गन्ना लाने से ले कर, पूजा के लिए मौसमी फलों तक के इंतजाम अशोक कितनी तेजी से कर जाता है.

छठपूजा के समय तो मन्नू देवी घर में तकरीबन 2 दिनों तक पूजा के पकवान, ठेंकुआ वगैरह बनाने में बिजी हो जाती हैं कि बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसे में निर्जला उपवास किए बाहर निकलने की ताकत भी कहां रह जाती है.

घर से घाट और घाट से घर दौरा को सिर पर रख कर 3 किलोमीटर दूर नदी तक आनाजाना मामूली बात है क्या. वहां भी इतनी भीड़ और गहमागहमी रहती है. मन्नू देवी यह रिस्क तो नहीं ही ले सकतीं. ऐसे में अशोक नहीं आया, तो उन का मरण हो जाएगा.

बजरंगी बाबू खेतों की ओर जा रहे थे. मन्नू देवी दोबारा पति के पास आ कर निहोरा करने लगीं, तो वे चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे पास अभी नकद कुछ नहीं है. उस को कहो कि एक मन अनाज निकाल कर बेच आए और पैसा ले जाए.’’

अब यहां कौन सा तराजूबटखरा रखा था, जो कोई एक मन अनाज तुलवाता. मन्नू देवी आननफानन बगल में रह रहे भगलू राम को बुला लाईं. उस के सिर पर एक बोरा अनाज रखवाया और अशोक को आवाज देने लगीं, ‘‘अशोक, जरा इधर आना. यह अनाज ले कर सुमिरन साव के आढ़त पर तुलवा कर पैसे ले आना.

बाकी बचा अनाज यहीं रखवा देना.’’

अशोक सारी बातें सुन चुका था, इसलिए बैग में कपड़े रखना छोड़ बाहर निकल आया.

‘‘बाबूजी ने एक मन अनाज बेचने को कहा है… मन्नू देवी बोलीं, ‘‘बाकी अनाज इसी भगलू के सिर पर रख कर वापस ले आना.’’

बाजार में आढ़त पर बोरे का मुंह खुलवा कर गेहूं के दानों को देख कर सुमरिन साव मुंह बनाते हुए बोले, ‘‘घटिया माल है. इस को तो 15 रुपए किलो की दर से ही लेना होगा.’’

‘‘अरे, अभी तो यह 20 रुपए किलो की दर से चल रहा है,’’ अशोक ने हैरत से कहा.

‘‘इस सरकार ने फ्री राशन बांट कर सारा धंधा मंदा कर दिया है,’’ सुमिरन साव अपने चिड़चिड़े अंदाज में बोला, ‘‘हम भी कौन सा खैरात खाने वाले हैं.’’

‘‘खैरात खाने की तुम्हें क्या जरूरत. ऐसे ही नहीं तुम ने बिल्डिंगें और गोदाम बना लिया है…’’ अशोक बुदबुदाया, यही अनाज शहरों में आटे के रूप में 40 रुपए किलो की दर से उसे खरीदना होता है. लेकिन गांव में कोई ढंग का खरीदार भी तो नहीं. 40 किलो अनाज के 600 रुपए अशोक के हाथ में आए, तो वह भुनभुनाया, ‘‘इन 600 रुपए में क्या होगा. एक जींस पैंट ही 1,000 रुपए में आती है. उस पर 3-4 टीशर्ट लेनी हैं, वे भी 1,000 रुपए की पड़ जाएंगी. एक नए डिजाइन का जूता भी लेना है.

‘‘इस के अलावा बाकी के खर्चे अपनी जगह. सैलून में हेयर कटिंग, 3-4 तरह के इत्र, शैंपू, साबुनतेल वगैरह के भी तो खर्चे हैं.’’

अभी तो अशोक ने अपने खर्चे में कौपीकलम और किताब को जोड़ा ही नहीं. 1-1 गाइड ही 500 में आती है. उस ने एक स्टडी लाइब्रेरी में एडमिशन ले रखा है, जिस का मासिक किराया ही 1,000 है. फिर लौज के कमरे का 4,500 का किराया है. ढाबे पर जो वह नियमित दोनों टाइम भोजन करता है, उसे 3,000 महीना देना होता है.

कोचिंग आनेजाने के लिए जो टैंपो का भाड़ा है, उस में भी 1,000 रुपए निकल जाते हैं. इतना तब है, जब वह कितनी कंजूसी के साथ काम चलाता है. और बाप है कि 10,000 से एक रुपया ज्यादा देने को तैयार नहीं है.

अशोक ने तत्काल सारे गेहूं तुलवा दिए. कोई 100 किलो थे. सुमिरन साव ने उसे 1,500 सौ पकड़ा दिए.

घर वापस आ कर अशोक ने देखा, मां काम पर लगी थीं. भगलू अभी भी वहीं खड़ा था. उसे 20 रुपए उस के मेहनताने के देने थे.

अचानक अशोक ने भगलू से कहा, ‘‘एक बोरा अनाज और निकालो और मेरे साथ चलो.’’

सुमिरन साव के यहां वह अनाज तुलवा कर उस ने पैसे लिए. अब उस के पास 3,000 रुपए थे.

बाबूजी ने अशोक को मासिक खर्च के 10,000 पहले ही दे दिए थे. अब ये 3,000 और हैं. उस ने विचार किया कि इतने पैसे से उस का ऐक्स्ट्रा काम चल जाएगा.

अशोक भगलू को 50 का नोट थमाते हुए बोला, ‘‘मां और बाबूजी को मत बताना कि हम ने एक बोरा अनाज और निकाला है. वे यहां कौन गिनती करने आएंगे कि कितने बोरा अनाज निकला है. इतना अनाज तो यहां चूहे और कीड़े खा जाते हैं.’’

भगलू कुछ समझा, कुछ नहीं समझा. उसे जल्दीजल्दी ताड़ीखाने जो जाना था. उस के हाथ में 50 का एक करारा नोट फड़फड़ा रहा था. Story In Hindi

Best Hindi Story: ब्रा

Best Hindi Story: ‘‘उफ, इन औनलाइन शौपिंग वालों ने तो हमारा सारा कामधंधा ही चौपट कर दिया है,’’ सिलाई मशीन के पायदान पर पैर रखे हुए नौरीन अपनेआप से बुदबुदाते हुए बोल रही थी.

नौरीन की परेशानी की वजह यह थी कि अब उस के पास लोग कपड़े सिलवाने कम आते थे. हर हाथ में मोबाइल है. बस, मोबाइल उठाया और अपनी पसंद के कपड़े औनलाइन मंगवा लिए.

भारत और नेपाल की सीमा पर बसा हुआ यह कसबा रौनक से भरा रहता था. सीमा पर बसे होने के चलते चहलपहल बराबर बनी रहती थी. इस कसबे में जरूरत की सारी चीजें बड़ी आसानी से मिला करती थीं.

इस कसबे के जहीन बाग नामक महल्ले में नौरीन और उस की छोटी बहन रोशनआरा रहती थीं. नौरीन 22 साल की हो गई थी और सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थी. कई बार तो उस ने सोचा कि सिलाई का काम बंद कर के कोई परचून की दुकान ही खोल ली जाए, कम से कम बोहनी तो हो जाया करेगी.

सिलाई के काम में तो कभीकभार कोई ग्राहक आता ही नहीं और घर से सिलाई का काम करने वाली नौरीन के पास कपड़े सिलवाने के ग्राहक के रूप में रजिया, फातिमा, सुनीता जैसे आसपास के दूसरे लोग ही आते थे. इन में से बहुत सी औरतें तो इतनी शर्मीली होती थीं कि कुरती का नाप देने में भी शर्म करती थीं.

इस बात पर नौरीन मुसकराते हुए कहती, ‘‘घबराओ मत भाभी, घर में कोई मर्द नहीं है और न ही कोई कैमरा लगा हुआ है, आराम से नाप दो.’’

नौरीन ने 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि घर का खर्चा चलाने के लिए उस का कमाना जरूरी था, इसलिए उस ने सिलाई के काम में अपनी अम्मी का हाथ बंटाना शुरू कर दिया. पहले तो अम्मी के पास खूब काम आता था. सलवारसूट, ब्लाउज के अलावा छोटे बच्चों की कमीजें तक सिलती थीं अम्मी.

कितनी लगन से नौरीन ने सिलाई का काम सीखा और जब अम्मी कमर दर्द से दोहरी हो जातीं, तो नौरीन उन्हें आराम करने को कहती और खुद मशीन के पायदान पर पैर जमा कर बैठ जाती और हलकेहलके पैर चला कर सिलाई करती.

उम्र के 22वें साल में नौरीन के कुंआरे और गोरे चेहरे पर चमक आने लगी. तभी उस की जिंदगी में अहमद की मुहब्बत ने दस्तक दी.

अहमद 25 साल का एक नौजवान था, जो लखीमपुर शहर का रहने वाला था और डिलीवरी बौय का काम करता था. काम के सिलसिले में नौरीन से निगाहें मिलीं और दोनों कब इश्क में गिरफ्तार हो गए, पता ही नहीं चला.

हालांकि, नौरीन की अम्मी को भी इन दोनों के फलतेफूलते इश्क का अहसास हो गया था, पर उन्होंने कभी कोई रोकटोक नहीं लगाई.

‘‘नौरीन के अब्बू नहीं रहे, भला इस उम्र में मैं कहां लड़का ढूंढ़ने जाऊंगी… अच्छा है बच्चे अपने मन से ही अपना साथी चुन लें तो…’’ अपनेआप से अकसर कह उठती थीं नौरीन की अम्मी.

दिन का 10 बजने को थे. नौरीन के मोबाइल पर अहमद का फोन आया, ‘शहर जा रहा हूं. मेरा दोस्त राज जिस होटल में काम करता है, वहां पर बड़े लोगों का सैमिनार है. हम दोनों चलते हैं. मुझे शहर में कुछ देर का काम है, फिर हम दोनों सैमिनार में बैठेंगे, खापी कर शाम तक वापस आ जाएंगे,’ अहमद ने एक सांस में यह बात कह दी थी.

मौसम भी सुहावना था और अहमद के साथ घूमने जाने की बात सुन कर नौरीन का मन भी मचल उठा था.
नौरीन ने अम्मी को बता दिया था कि वह अहमद के साथ शहर तक जा रही है, शाम तक वापस आ जाएगी.

अम्मी ने नौरीन के अहमद के साथ जाने पर कोई एतराज नहीं जताया और कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना और शाम को जल्दी वापस आना.’’

अहमद और नौरीन बाइक पर बैठ कर शहर की ओर जाने लगे. शहर यहां से 30 किलोमीटर दूर था, पर नौरीन सोच रही थी कि काश शहर कभी न आए, बस वह यों ही अहमद के पीछे बैठ कर सफर करती रहे.

‘ग्रैंड रौयल्स’ नाम के एक होटल में वे दोनों पहुंच गए थे. अहमद ने अपने दोस्त राज से मुलाकात की और फिर वे तीनों उस हाल में गए, जहां पर सैमिनार चल रहा था. अहमद और नौरीन एकसाथ बैठ गए थे.

मंच पर 35 साल की एक खूबसूरत सी महिला ने बोलना शुरू किया, ‘‘हमारे इस सैमिनार का विषय कुछ हट कर है. दरअसल, यह कार्यक्रम महिलाओं की ‘ब्रा’ पर है. शहर में तो महिलाएं जागरूक हैं, पर हमारा अभियान गांव और कसबों की महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाने का है, जो शर्म के चलते या तो ब्रा नहीं खरीदती हैं या फिर गलत ढंग की ब्रा पहनती हैं, जिस के चलते उन्हें पीठ दर्द तक का सामना करना पड़ता है…’’

नौरीन यह सब सुन कर पहले तो शरमाने लगी, पर जब उस महिला ने आगे काम की बातें बतानी शुरू कीं, तो उसे अच्छा लगने लगा.

‘‘हमें कसबों और गांवों की महिलाओं के मन से ब्रा के लिए छिपी शर्म निकालनी होगी. अरे भई, ब्रा महज कुछ कपड़ों का जोड़ ही तो है, जिसे हम अपने शरीर को सपोर्ट देने के लिए कुरती या ब्लाउज के अंदर पहनते हैं. अब भला इसे छिपा कर सुखाना या फिर इस की स्ट्रिप को दिख जाने से रोकना, इस में भला झिझकने की क्या बात है?’’ वह महिला बड़े अच्छे ढंग से समझा रही थी.

नौरीन गौर किया कि पीछे के बैनर पर उन की संस्था का नाम ‘नारी मन’ लिखे होने के साथ एक संदेश भी लिखा हुआ था, ‘हमारी ब्रा, हमारा शरीर, एक अभियान है. कब बदलेगा समाज, सवाल अनजान है’.

नौरीन ने बैनर पर लिखा हुआ मैडम की संस्था का मोबाइल नंबर नोट कर लिया और अहमद और नौरीन चाय और नाश्ता करने के बाद वापस कसबे की ओर चल दिए.

शाम को जब नौरीन घर पहुंची, तो उस ने अपनी अम्मी से उन की पुरानी संदूकची खोलने को कहा, तो अम्मी जरा चौंकीं, ‘‘अब भला तुझे उस संदूकची से क्या काम पड़ गया?’’

बदले में नौरीन ने मुसकराते हुए उस संदूकची को बिस्तर के नीचे से घसीटते हुए बाहर निकाला और खोलने लगी. उस संदूकची में अम्मी की उन की जवानी के दिनों की सैटिन की ब्रा लपेट कर रखी हुई थी.

नौरीन ने उस ब्रा को खोला और उलटपलट कर देखने लगी. उसे ऐसा करते देख कर अम्मी शर्म से गड़ गईं, ‘‘अरे मुई, यह तुझे क्या हो गया?’’ अम्मी अब भी शर्म से लाल थीं.

अम्मी को पुरानी बात याद आई, जब यह ब्रा नौरीन के अब्बू बाजार से खरीद कर लाए थे और कई बार अकेले में इसे पहन कर दिखाने के लिए कहा था, मगर उस जमाने में संयुक्त परिवार में रहने वाली अम्मी के लिए ऐसी डिजाइनर और सुर्ख लाल रंग की ब्रा को पहनने के बाद धोने और सुखाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था, इसलिए नौरीन की अम्मी कभी भी यह ब्रा पहन नहीं सकीं और कपड़ों के बीच लपेट कर इस संदूकची में रख दिया था.

नौरीन ने अम्मी की लाल ब्रा पकड़ कर हवा में लटका दी और उसे चारों तरफ से देखने लगी. उस की यह हरकत अब अम्मी को नागवार गुजर रही थी. उन्होंने अब नौरीन को डांटना चाहा, पर नौरीन बोल पड़ी, ‘‘अम्मी, मैं सोच रही हूं कि क्यों न हम ब्रा सिलने का ही काम शुरू कर दें…’’

नौरीन की यह बात सुन कर अम्मी ने अपना माथा पीट लिया, पर नौरीन ने उन्हें समझाया कि हमारे कसबे में रेडीमेड कपड़ों सभी दुकानों पर मर्द बैठे हैं. ज्यादातर महिलाएं उन से ब्रा खरीदते समय इतनी संकोच से भरी रहती हैं कि वे खरीदते समय ब्रा का साइज और क्वालिटी देखती तक नहीं और गलत साइज की ब्रा पहनते रहने से उन के शरीर का आकार खराब हो जाता है और कई बार वे पीठ दर्द से भी परेशान रहती हैं.

इस के बाद नौरीन बोली, ‘‘अम्मी, क्या हम घर पर इसी सिलाई मशीन से रेडीमेड जैसी दिखने वाली ब्रा सिल सकती हैं?’’

नौरीन ने पूछा तो अम्मी ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘अगर घर पर कुछ जरूरी सामान जैसे इलास्टिक, हुक और प्लाटिक के कुंडे वगैरह खरीद लिए जाएं, तो घर पर रेडीमेड जैसी ब्रा बनाई जा सकती हैं, क्योंकि कुछ कपड़ों की खास तरह की कटिंग को जब सफाई से सिला जाता है, तो ब्रा तैयार हो जाती है और इस में और ज्यादा खूबसूरती लाने के लिए इस के कपड़े पर फूलबूटे और चिकन की कढ़ाई तक की जा सकती है.’’

अम्मी को भी नौरीन की बातें अब जंच तो रही थीं, पर उन के मन में शक था कि ये ब्रा उन से औरतें खरीदेंगी भी या नहीं?

‘‘अरे अम्मी, क्यों नहीं खरीदेंगी? जब उन को अच्छे कपड़े की ब्रा हमारे पास ही मिलेगी, जिसे वे कमरे में आराम से पहन कर आगेपीछे से चैक कर लेंगी और अपने बदन पर आराम महसूस करेंगी, तो भला कौन नहीं खरीदना चाहेगा…’’ नौरीन ने उम्मीदभरी बातों से अम्मी का मन मोह लिया था.

नौरीन ने अब उस ‘नारी मन’ संस्था की आंचल मैडम को फोन लगाया और अपने और अपने कसबे के बारे में सबकुछ बताते हुए उन्हें ब्रा के बिजनैस के बारे में बताया.

नौरीन का आइडिया सुन कर आंचल मैडम बहुत खुश हुईं और उन्होंने नौरीन को खूब सराहा और ब्रा सिलने के सामान से ले कर हरमुमकिन मदद देने का वादा किया.

नौरीन ने अपने पते पर ब्रा सिलने का कुछ सामान मंगवा लिया था. बस, अब चुनौती थी कि इन सब सामान को साथ ले कर बढि़या और आरामदायक ब्रा कैसे बनाई जाए. सो, इस के लिए नौरीन ने सिलाईकढ़ाई विशेषांक की पुरानी पत्रिकाएं पढ़ीं, कुछ मदद इंटरनैट से ली और बाकी का काम नौरीन की अम्मी ने आसान कर दिया.

दिनरात की मेहनत के बाद कुछ ब्रा झने कपड़े की तो कुछ कौटन की तैयार हो गई थीं. अब बारी थी कस्टमर ढूंढ़ने की, तो इस के लिए नौरीन ने एक तार पर ब्रा को लटका दिया और बड़े अक्षरों में लिख दिया, ‘यहां महिलाओं की पसंद के अनुसार हर साइज की ब्रा बनाई जाती हैं’.

जब भी कसबे की औरतें अपने सूट वगैरह का नाप देने आतीं, तो उन की नजर इस वाक्य पर जरूर पड़ती.

‘‘तो क्या आप ब्रा भी सिलती हैं?’’ एक दिन फरजाना ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया.

फरजाना 40 साल की मोटी औरत थी और अभी तक की जिंदगी में मारे शर्म के वह सही ब्रा का चुनाव नहीं कर पाई थी, इसलिए उस का शरीर हमेशा ढलकाढलका रहता था.

नौरीन फरजाना अंदर कमरे में ले गई और एक आदमकद शीशे के सामने खड़ा कर दिया और ढेर सारी ब्रा उस के सामने रख दीं.

‘‘हमारे यहां आप बेखटक अपनी पसंद की ब्रा पहन कर ट्राई करो और पसंद आए तभी खरीदो,’’ नौरीन ने कहा और कमरे से बाहर चली गई.

फरजाना को यह अहसास पहली बार मिल रहा था. कितना हलकापन सा महसूस हो रहा था उसे जब उस ने अपने पसंदीदा गुलाबी रंग की ब्रा को अपने तन पर कसा और हुक लगाने के बाद चारों तरफ से अपने मोटे शरीर को निहारा. आज पहली बार उस की पीठ और कंधों को आराम मिल रहा था. उस ने शीशे में पहली बार अपना यह रूप देखा और शरमा गई. कितनी खूबसूरत लग रही थी वह इस गुलाबी ब्रा में.

फरजाना के द्वारा नौरीन के काम की तारीफ सुन कर और भी औरतें नौरीन के पास पहुंचीं और धीरेधीरे ब्रा बेचने का काम तेजी से चल निकला. अब तो जो औरत सिलाई करवाने आती कम से कम 2-3 ब्रा तो जरूर ही खरीदती.

नौरीन और उस की अम्मी बराबर सिलाई करती रहतीं, पर फिर भी नौरीन को इतना काम और उस से होने वाली आमदनी भी 3 लोगों का परिवार चलाने के लिए काफी नहीं लग रही थी.

इस के लिए नौरीन ने अहमद की मदद ली और कुछ छोटेछोटे परचे छपवाए और कसबे में या लखीमपुर शहर में जहां भी अहमद डिलीवरी करने जाता, तो ये परचे भी डिलीवरी करते समय ग्राहक को पकड़ा देता और मुसकरा कर कहता, ‘‘जी हमारे घर की औरतों ने काम शुरू किया है. एक बार सेवा का मौका जरूर दें.’’

यह कदम तो काफी आशावादी था, पर नौरीन को इस का फायदा तब दिखा, जब उस की दुकान में औरतों की तादाद में इजाफा दिखा.

अब तो अम्मी सिलाई मशीन पर बैठी रहतीं और नौरीन बराबर औरतों के ब्रा का नाप लेती रहतीं. यहां पर औरतों को बड़ा फायदा यह मिल रहा था कि वे अपने पसंद की ब्रा सिलवा सकती थीं. मसलन कपड़े और रंग का चुनाव, सीने पर आने वाले कप का चुनाव और स्ट्रिप की मोटाई और पतलापन… ये सब वे अपनी पसंद के मुताबिक बनवा सकती थीं.

अब तो नौरीन ने अपनी दुकान का नाम भी रख दिया था और यह नाम था ‘34 बी’.

यह एक ब्रा के साइज का नंबर होता है, इसलिए पहलेपहल तो नौरीन के काम का मजाक बना. अम्मी ने भी नौरीन से कहा कि वह कम से कम नाम तो कुछ ढंग का रख ले, महल्ले वाले क्या कहेंगे?

पर नौरीन ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘यह नाम मुझे महिलाओं की सोच बदलने में मदद करेगा. ब्रा पहनना या ब्रा का दिख जाना कोई गलत बात तो नहीं, जो इसे छिपाया जाए.’’

नौरीन ने अपना काम फैलाने और जागरूकता जगाने के लिए कसबे के ‘कन्या पाठशाला’ की प्रिंसिपल के साथ मिल कर लड़कियों और टीचरों के साथ एक गोष्ठी का आयोजन किया और लड़कियों को सही साइज की ब्रा पहनने के लिए बढ़ावा दिया.

बुटीक नंबर ‘34 बी’ का नाम अब कसबे और कसबे के बाहर भी फैल रहा था.

अम्मी ने एक बार फिर से नौरीन से बुटीक का नाम बदलने के लिए भी कहा पर नौरीन नहीं मानी. ‘34 बी’ नाम रखना तो एक बहाना है, असली मकसद तो औरतों की झिझक को बाहर भगाना है.

नौरीन और अम्मी के इस बुटीक की धूम चारों ओर छा चुकी थी. इसी बीच नौरीन के पास आंचल मैडम का फोन आया कि नौरीन और उस की अम्मी को उन की संस्था ने महिलाओं की शर्म और झिझक खत्म करने का अभियान चलाने के लिए सम्मानित करने का निश्चय किया है और इस महीने की 10 तारीख को उन दोनों लोगों को लखीमपुर में ‘इंदिरा आडिटोरियम’ में पहुंचना है, जहां पर उन्हें सम्मानित किया जाएगा.

नौरीन के लिए तो यह अनुभव नया था ही, पर इस से भी ज्यादा खुशी उस की अम्मी को मिल रही थी.

उन्होंने एक ऐसे समय को जिया था, जब किसी के लिए ब्रा बोलना या ब्रा को खुले में सुखाना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी और आज उन की बेटी की छोटी सी कोशिश ने खुद उके लिए तो रोजगार ढूंढ़ा ही है, साथ ही साथ बहुत सारी महिलाओं की झिझक खत्म करने में मदद की है और इस बात के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है.

आडिटोरियम में तालियों की गूंज थी. अहमद ने भी आज काम से छुट्टी ले ली, ताकि वह नौरीन को सम्मानित होते हुए देख सके. नौरीन की छोटी बहन रोशनआरा को भी अहमद साथ ले आया था.

नौरीन का नाम पुकारा गया और उसे सम्मानित किया गया. उसे माइक पर कुछ बोलने को कहा गया. नौरीन ने एक कविता सुनाई :

‘‘ये स्तन नहीं, ये संकल्प हैं.

ये बोझ नहीं, ये अधिकार हैं.

ये ब्रा खुद अपनी भाषा हैं,

जहां औरत खुद अपनी परिभाषा है.

छिपाने की नहीं, अब दिखाने की बारी है.

ये ब्रा नहीं हमारी इंकलाबी सवारी हैं.’’

तालियां लगातार बज रही थीं. नौरीन का एक छोटा सा कदम कसबे की औरतों और पूरी नारी जाति के लिए एक बड़ी छलांग थी. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: एक औरत का प्रेम मुकाम

Hindi Romantic Story: ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ उस घर के अहाते से रोज ऐसी ही मारपीट की आवाज सुनाई पड़ती थी. वह नया किराएदार था. शुरू में पड़ोसियों ने किसी के घरेलू मामले से दूर रहना ही बेहतर समझा. यही सोच कर कि किराएदार शराबी होगा. शाम को शराब पी कर आता होगा और अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता होगा. लेकिन जब रोजरोज ऐसा होने लगा, तो पड़ोसियों का सब्र जवाब देने लगा.

दुनिया की रीत है कि अपने आंगन में क्या हो रहा है, इस को कोई नहीं देखता, लेकिन दूसरे के घर में एक बरतन भी खड़क जाए, तो सब के कान खड़े हो जाते हैं.

मामले को जानने के लिए किसी पड़ोसी ने दीवार के ऊपर से झांक कर देखा, तो किसी ने छत पर खड़े हो कर. मामले को जान कर कोई हंसा, तो कोई अचंभे से मुंह खोल कर रह गया. चटकारों का बाजार गरम हो गया.

पर यह मामला तो बिलकुल उलटा था. यह आदमी नहीं, बल्कि औरत थी, जो हर शाम को अपने आदमी की कुटाई करती थी. इस में अचंभे की बात यह भी थी कि आदमी इस कुटाई का कोई विरोध नहीं करता था.

वह सिर झुका कर अपनी पत्नी की ज्यादती को ऐसे सहन करता था, जैसे उस की पत्नी को उसे इस तरह पीटने का ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ हो, जैसे किसी लेखक और प्रकाशक का किसी किताब पर होता है.

पड़ोसियों को बैठेठाले हंसनेहंसाने, चटकारे लेने और मनोरंजन का काम कम से कम कुछ दिनों के लिए मुफ्त में ही मिल गया था. आज तक उन्होंने पतियों के द्वारा पत्नियों की पिटाई होने के किस्से बहुत सुने और देखे थे, लेकिन पत्नी के द्वारा पति की पिटाई होते वे पहली बार देख रहे थे. वह भी एकाध दिन नहीं, रोजाना शाम को तय समय पर और पिटाई के बाद निपट निल बटा सन्नाटा, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

ये पति पत्नी कोई और नहीं, सुधाकर और सविता थे. सुधाकर अपने मातापिता की एकलौती औलाद था. वह हरियाणा के यमुनानगर की थापर पेपर मिल में अपने पिता की सिफारिश पर लैब असिस्टैंट की नौकरी पा गया था.

उस की तनख्वाह कम थी, लेकिन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में नौकरी पक्की थी, इसलिए उस की एमए पास पढ़ीलिखी लड़की सविता से शादी हो गई थी.

सविता देखने में सुंदर, सुशील और मासूम दिखाई पड़ती थी, लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि असल में वह ऐसी थी नहीं. सासबहू के झगड़े वैसे तो आम बात है, लेकिन सविता ने तो जैसे ससुराल में आते ही इस जंग का आगाज कर दिया हो.

सुधाकर ने हरमुमकिन तरीके से सविता को समझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. वह यह समझाने में नाकाम रहा कि सविता आखिर उस की मां से लड़ती ही क्यों है. वह कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर उस की मां से भिड़ जाती थी, फिर तो दोनों तरफ से जबानी जंग शुरू हो जाती थी.

सुधाकर समझ नहीं पाया कि आखिर सविता चाहती क्या है? वह मां को समझाता तो तड़ाक से जवाब मिलता, ‘‘औरत के गुलाम, पिट्ठू. शर्म नहीं आती तुझे. अपनी औरत को तो समझाने से गया, मुझ बुढि़या को समझाने चला है, नालायक, कलयुगी.’’

यह सुन कर सुधाकर सहम जाता. अपनी औरत को समझाता, तो वह उसे उलटे हाथों लेती, ‘‘जाओ, मां के पेटीकोट में जा कर छिप जाओ. वहां से बाहर निकले ही क्यों थे? पूरी जिंदगी वहीं रहते.’’

सुधाकर मां और पत्नी के बीच चक्की के 2 पाटों के बीच जैसा पिसता. घर की इस कलह के बीच सुधाकर
2 बच्चों का पिता बन गया, एक बेटी और एक बेटा.

लेकिन जब घर में कलह की हद हो गई तो एक दिन उस के पिता ने समझाया, ‘‘सुधाकर, तेरी मां और बहू की खटपट से मैं तंग आ गया हूं. तू तो ड्यूटी पर चला जाता है, लेकिन मेरा जीना मुहाल हो जाता है. तू हमें कहीं किराए पर कमरा ले कर दे दे, जिस से यह बुढ़ापा चैन से कटे.’’

यह सुन कर सुधाकर सोच में पड़ गया. वह बोला, ‘‘पिताजी, आप ये कैसी बातें कर रहे हो? यह मकान दादाजी और आप के खूनपसीने की कमाई का पुश्तैनी मकान है. आप किराए के मकान में जा कर क्यों रहोगे? किराए पर रहने की जरूरत पड़ेगी तो हम जा कर रहेंगे.’’

‘‘बेटा, तू कुछ भी कर… अब इन सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है.’’

सुधाकर को पता नहीं था कि बापबेटे की बात को सविता ने कान लगा कर सुन लिया है. जैसे ही वह अपने कमरे में पहुंचा, सविता ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा था बुड्ढा?’’

‘‘सविता, जबान संभाल कर. गुस्से और नफरत में तहजीब नहीं खोते.’’

‘‘ऐसी तहजीब रखो अपने पास, मेरी जूती पर. बुड्ढे को बुड्ढा नहीं कहूंगी, तो क्या जवान कहूंगी. गोद में ले कर खिला लो, दूध पीता बच्चा है तुम्हारा बाप.’’

‘‘सविता, तुम हदें पार कर रही हो.’’

‘‘मैं तो हदें पार कर ही रही हूं. तुम ध्यान से सुन लो… अब इस घर में या तो तुम्हारे मांबाप रहेंगे या फिर हम रहेंगे. और यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

अगले दिन से ही सविता ने जिन्ना की तरह घर को दो फाड़ करने का डायरैक्ट ऐक्शन शुरू कर दिया. सुधाकर घर की कलह से कांग्रेस के नेताओं की तरह घबरा गया. उस ने घर में किसी अनहोनी के डर से किराए का मकान तलाशना शुरू कर दिया.

मौडल टाउन में सुधाकर को एक ऐसा मकान किराए पर मिल गया, जिस का अहाता खास बड़ा था और जिस का मकान मालिक दूर जींद जिले में रहता था.

किराए के मकान में आ कर सुधाकर को लगा कि सविता के बरताव में बदलाव आ जाएगा, लेकिन जल्दी ही उसे एहसास हो गया कि सविता में रंचमात्र भी फर्क नहीं आया है. अब उस का सारा गुस्सा उस की तरफ डायवर्ट हो गया है. अब सविता का सारा गुस्सा उसे अपने ऊपर झेलना पड़ता.

सविता की नाराजगी अब यह थी कि सुधाकर अपने मांबाप के पास क्यों जाता है. वह सुधाकर के घर आते ही उस पर फट पड़ती थी. अब तो वह गालीगलौज से पेश आती थी और मारपीट पर भी उतर आती थी.

‘‘हरामखोर, यहां आता ही क्यों है? उन्हीं बुड्ढेबुढि़या की गोद में जा कर मर, जिन के बिना तुझ से रहा नहीं जाता. मुझ से शादी ही क्यों की थी, जब तुझे उन के साथ ही रहना था?’’

सुधाकर को समझमें नहीं आता था कि आखिर सविता को हो क्या गया है? कुछ भी हो पुश्तैनी घर में उस ने उस से कभी ‘तूतड़ाक’ से बात नहीं की थी और न ही अपने प्रति उसने आज तक इतनी नफरत देखी थी. आखिर यह नफरत उस के मन में आई कैसे?

सुधाकर कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता था. उस ने यह मकान ही किराए के लिए इसलिए पसंद किया था कि इस में मकान मालिक नहीं रहता था. ऐसे मकान मिलने बड़ी मुश्किल होते हैं. अगर उस ने तमाशा खड़ा किया और पड़ोसियों ने मकान मालिक से शिकायत कर दी, तो फिर ऐसा किराए का मकान मिलना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए न चाह कर भी सुधाकर उस के जुल्म को सहता गया. मार खा कर भी वह चुप रहता, क्योंकि एक उम्मीद बाकी थी.

अपनी भड़ास उतारने के बाद सविता आश्चर्यजनक रूप से सामान्य हो जाती थी. सविता का यह राज भी आज तक उसे समझमें नहीं आया था. सविता का गुस्सा और नाराजगी उस के लिए पहेली बने हुए थे.

एक दिन सविता की कालेज के समय की सहेली सुदीक्षा उसे ‘सरप्राइज’ करने के लिए बिना सूचना दिए उस से मिलने के लिए उस का घर तलाशती हुई तकरीबन उसी समय उस के घर पर पहुंची, जब सुधाकर के घर वापस आने का समय था.

अभी सुदीक्षा दरवाजे पर पहुंची ही थी कि उसे घर के अंदर से ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ और गालीगलौच की आवाज सुनाई दी. ऐसे में वह घर के अंदर कैसे जाए? वह उलटे पांव वापस लौटी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सविता अपने पति के साथ ऐसा भी कर सकती है. रातभर वह सविता के बारे में सोचती रही.

सुदीक्षा सविता को कालेज के दिनों से जानती थी और उस की नजर में उस की प्यारी सहेली सविता बिलकुल भी ऐसी नहीं थी. वह जितना उस के बारे में सोचती, उस का कौतूहल उतना ही बढ़ता जाता.

अगले दिन सुदीक्षा सविता से ऐसे समय मिलने पहुंची, जब उस का पति औफिस में और बेटी स्कूल गई हुई थी. बेटा तो सविता का अभी छोटा ही था.

सुदीक्षा को देखते ही सविता खुश हो गई. उस ने उसे गले लगा लिया. फिर दोनों बैठ कर बतियाने लगीं.

चाय पीते हुए चालाकी से बातों ही बातों में सुदीक्षा ने कल वाली बात छेड़ दी. पहले तो सविता बचती रही, फिर लंबी सांस खींच कर बोली, ‘सुदीक्षा, अब तुझसे क्या बताऊं और क्या छिपाऊं? तू तो मेरी कालेज लाइफ के बारे में सबकुछ जानती ही है.’’

‘‘हां, वह तो मैं अच्छे से जानती हूं. वरुण से तेरे लव अफेयर के बारे में भी,’’ सुदीक्षा ने चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘तुझेतो पता ही है सुदीक्षा. मैं वरुण से कितना प्यार करती थी. हम दोनों ने साथ जीनेमरने की कसमें तक खा रखी थीं.’’

‘‘हांहां, मैं सब जानती हूं.’’

‘‘लेकिन सुदीक्षा, मैं उस समय ठहरी एक संस्कारी लड़की. मैं चाहती और जैसा वरुण चाहता भी था कि दूसरी बिगड़ी हुई लड़कियों की तरह खूब मौजमस्ती करती और गुलछर्रे उड़ा सकती थी. बहुत सी बिगड़ी लड़कियां तो अपने यारों के साथ कालेज के खाली पड़े क्लासरूम या फिर किसी कोने में ही…

‘‘उन दिनों सीसीटीवी कैमरे का चलन तो था ही नहीं. कुछ लड़कियां तो रोज ही किसी न किसी के साथ, लेकिन मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

‘‘सही कह रही हो.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप ने सबकुछ जानते हुए भी सुधाकर से मेरी शादी कर दी और मैं कोई विद्रोह न कर सकी. सारी कसमें धरी की धरी रह गईं. मैं तो वरुण की नजरों में बेवफा हो गई और सुधाकर को कभी मन से अपना न सकी. यह अपराधबोध मुझेदिनरात सताता है.’’

कुछ देर सुदीक्षा माथा पकड़ कर बैठी रही, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी लैला, क्या इस अपराधबोध और वरुण के प्यार को जिंदगीभर बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपटाए रखेगी?

ये लैला बनने के दिन नहीं, यह मौडर्न जमाना है… जरा कुछ सोच.’’

‘‘सुदीक्षा, तुम कुछ भी कहो. मुझेहमेशा लगता है कि मैं ने वरुण के साथ बहुत गलत किया. मैं इस के लिए खुद को कुसूरवार मानती हूं और गुस्से से भर उठती हूं. अपने बस में नहीं रहती. पहले यह गुस्सा अपने सासससुर पर निकालती थी और अब वह गुस्सा सुधाकर पर निकालती हूं. उस का चेहरा देख कर ही मैं तमतमा उठती हूं.’’

‘‘लेकिन सुधाकर तो बहुत अच्छे हैं, उन पर गुस्सा क्यों करती है?’’

‘‘सुदीक्षा, देख तू भी एक औरत है. एक औरत ही दूसरी औरत के दिल की बात को समझसकती है कोई मर्द नहीं. एक औरत का दिल जिस पर आता है, वह कभी उसे भुला नहीं सकती.

‘‘वरुण की कमी शादी के बाद मुझेबहुत खलने लगी. आज भी वह मेरे रोमरोम में बसा हुआ है. सुधाकर हीरे का भी क्यों न बन जाए, वह वरुण की जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अरे सविता, तू तो इस जमाने की हीर बन रही है, बुलाऊं क्या तेरे रांझवरुण को यहीं पर,’’ सुदीक्षा ने हंसते हुए उस के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘चल पगली कहीं की. वह तो बेचारा मेरी याद में न जाने कहां तड़प रहा होगा. काश, वह एक बार आ जाता तो मैं उस के पैरों में गिर कर उस से माफी मांग लेती.’’

‘‘अच्छा चल, वरुण की बात बाद में करेंगे, यह बता इस सब में सुधाकर की क्या गलती है?’’

‘‘सुधाकर की इस में यह गलती है कि वह इस दुनिया में जनमा ही क्यों? न वह इस दुनिया में होता और न मेरी उस से शादी होती. फिर शायद मैं वरुण की ही होती.’’

सुदीक्षा यह सुन कर अपना सिर पकड़कर बैठ गई, फिर हंसते हुए और अफसोस जताते हुए बोली, ‘‘सविता, हम औरतें इसी कारण से इस दुनिया में लांछित हैं. यह दुनिया एक औरत के प्रेम मुकाम को नहीं समझपाती. तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी शादी वरुण से कर दी होती तो यह सबकुछ न होता, जो तुम्हारे घर में हो रहा है.

‘‘लेकिन मर्द औरतों की भावनाओं को नहीं समझपाते. वे बेदर्द हो कर हमारी भावनाओं को कुचलते हैं और हम पर राज करने की कोशिश में लगे रहते हैं, इसलिए बहुत सी औरतों को विद्रोह भी करना पड़ता है. लेकिन कई बार हम भी मर्दों को नहीं समझपाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’ सविता ने पूछा.

‘‘जिस वरुण के लिए सविता तू मरी जा रही है और अपने परिवार मैं तू ने उस के लिए इतनी उथलपुथल मचा रखी है, उस की करतूतों को सुन कर तेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी.’’

‘‘यह क्या कह रही है सुदीक्षा. मेरा वरुण ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो मैं न सुन पाऊं. दुनिया में उस से अच्छा आदमी हो ही नहीं सकता.’’

‘‘तेरा सोचना कुछ भी गलत नहीं है. सब लैलाओं को अपना मजनूं ऐसा ही लगता है. ले अब सुन अपने रांझवरुण की करतूत. तेरी शादी के कुछ महीने बाद ही वह अपने पड़ोस की शादीशुदा भाभी को भगा ले गया, फिर वह कई दिन जेल में रहा.’’

‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता,’’ सविता ने अपने कानों पर हाथ धरते हुए कहा.

‘‘अब अनजान मत कर. अपने रोमियो की हकीकत सुन. बहुत बन ली तू जुलियट, अपने परिवार में टैंशन कर के. पता है आजकल वह एक नहीं 2-2 बिगड़ी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और तू कहती है वह कुंआरा ही तेरी याद में तड़प रहा होगा. यह मर्द जात है कहीं भी मुंह मार देती है, बस मौका मिला चाहिए.’’

‘‘तू झठ बोल रही है,’’ सविता ने कहा.

‘‘मैं झठ बोल रही हूं, तो ले यह देख, मैं सुबूत साथ लाई हूं.’’

जब सुदीक्षा ने अपने मोबाइल में वरुण और उस की प्रेमिकाओं के फोटो और उस की जेल जाने की तसवीरें दिखाईं, तो सविता का प्रेम भूत एक झटके में उतर गया. उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, लेकिन वह हकीकत को भी तो झठला नहीं सकती थी.

प्रेम भूत उतरते ही सविता को सुधाकर वरुण से लाख अच्छा लगने लगा था.

‘‘सुदीक्षा, तू ने तो सच में मेरी आंखें खोल दीं. मैं वरुण के प्रेम में डूब कर अपना घर तबाह कर रही थी.’’

‘‘मैं तो तुझसे केवल वैसे ही मिलने आई थी, लेकिन तेरे हालात ने मुझेतेरे सामने हकीकत लाने को मजबूर कर दिया. वरुण की करतूतों के बारे में तो मुझेबहुत पहले ही पता चल गया था, लेकिन मुझेयह नहीं पता था कि तू उस के प्रेम की यादों को अभी तक सीने से चिपकाए बैठी है.’’

कुछ देर और रुकने के बाद सुदीक्षा वहां से चली गई. अगली बार जब सुदीक्षा उस से मिलने आई, तो उस ने सविता को पुश्तैनी मकान में अपने सासससुर के साथ सुख से रहते पाया. यह देख कर उस के चेहरे पर भी मुसकान खिल गई. Hindi Romantic Story

Family Story In Hindi: फुलमतिया – जब सौतन से हुआ सामना

Family Story In Hindi: शाम के 5 बज रहे थे. मेरी सास के श्राद्ध में आए सभी मेहमान खाना खा चुके थे. ननदें भी एकएक कर के विदा हो चुकी थीं.

सासू मां की मौत के बाद के इन 13 दिनों तक तो मु झे किसी की तरफ देखने का मौका ही नहीं मिला, पर आज सारा घर सासू मां के बगैर बहुत खाली लग रहा था.

मेरे पति शायद अपने दफ्तर के कुछ कागजात ले कर बैठे थे और बेटा अगले महीने होने वाले इम्तिहान की तैयारी कर रहा था. रसोई में थोड़ा काम बाकी था, जो बसंती कर रही थी.

मैं सासू मां के कमरे में आ कर थोड़ा सुस्ताने के लिए उन के पलंग पर बैठी ही थी कि फुलमतिया की आवाज सुनाई दी, ‘‘मेमसाहब, मैं जाऊं?’’

मैं ने पलट कर देखा, तो वह कमरे की चौखट के सहारे खड़ी थी. थकीथकी सी फुलमतिया आज कुछ ज्यादा ही बूढ़ी लग रही थी.

मेरे हिसाब से फुलमतिया की उम्र 40-45 से ज्यादा नहीं है, जबकि इस उम्र की मेरी सहेलियां तो पार्टी में यों फुदकती हैं कि उर्मिला मातोंडकर और माधुरी दीक्षित भी शरमा जाएं, पर यहां इस बेचारी को देखो.

वह फिर से बोली, ‘‘मेमसाहब, और कोई काम बाकी तो नहीं रह गया है? अच्छी तरह सोच लो.’’

‘‘नहीं फुलमतिया, अब जितना काम बाकी है, वह बसंती कर लेगी. वैसे भी तुम ने पिछले 10-12 दिनों से मेहमानों की देखभाल में बहुत मेहनत की है, अब घर जा कर आराम करो.

‘‘तुम ने खाना तो खा लिया था न ठीक से? मु  झे तो कुछ देखने का मौका ही नहीं मिला. एक तरफ श्राद्ध, दूसरी तरफ मेहमानों का आनाजाना. ऊपर से भंडार संभालना. लोग सिर्फ एकलौती बहू के सुख को देखते हैं, उस के   झं  झट और जिम्मेदारी को नहीं.’’

फुलमतिया जाने के बजाय मेरी सासू मां के पलंग से टिक कर वहीं जमीन पर बैठ गई, जहां मैं उसे पिछले 16 साल से बैठती देखती आ रही हूं.

उस दिन भी वह यहीं बैठी थी, जब मैं नईनवेली दुलहन के रूप में पहली बार इस कमरे में दाखिल हुई थी.

मेरे ससुराल वालों के सगेसंबंधी, सासननदों की सहेलियां, पड़ोसनें सब मु  झे देखने आ रही थीं और मेरी नजर घूमघूम कर फुलमतिया की खूबसूरती और जवानी पर ठहर रही थी.

आज भी फुलमतिया के कपड़ों में कोई खास बदलाव नहीं आया है. वही घाघरा, चोली. बस, सिर के अधपके बाल और चेहरे की  झुर्रियां उस के गुजरे वक्त की दास्तां सुनाती हैं.

मैं ने सासू मां के मुंह से सुना था कि फुलमतिया बिहार के किसी गरीब गांव से ब्याह करवा कर शहर आई थी. वह अपने मांबाप की 10वीं औलाद थी, इसलिए 11-12 साल की उम्र में जिस अधेड़ उम्र के आदमी के साथ ब्याही गई, वह शहर में मजदूर था. उस के गांव के पुश्तैनी मकान में बेटेबहू पहले से मौजूद थे, जो उस से उम्र में बड़े भी थे. उसे पूरे घर की नौकरानी बना दी गई. जब उस से न सहा गया, तो एक दिन जिद कर के अपने पति के साथ शहर चली आई. लेकिन गरीब की बेटी तो आसमान से गिरी और खजूर पर अटकी.

शहर की गंदी बस्ती के छोटे से कमरे में एक सौतन अपने 3 बच्चों के साथ पहले से मौजूद थी. शुरू हुआ लड़ाई  झगड़े का नया सिलसिला.

आखिरकार तंग आ कर एक दिन मजबूर पति ने पहले वाली औरत को उस के 2 बच्चों के साथ घर से बाहर निकाल दिया.

छोटी बच्ची फुलमतिया की चहेती बन गई थी, इसलिए फुलमतिया ने उसे अपने पास रख लिया.

कुछ दिन ठीक से गुजरे. फुलमतिया को भी 2 बच्चे हुए. पर गरीब को चैन कहां? इधर फुलमतिया पर मस्त जवानी आ रही थी और उधर उस का पति बूढ़ा और बीमार रहने लगा था.

आसपास के मनचले उस के इर्दगिर्द ही मंडराने लगे. पर पेट कहां किसी की सुनता है? आखिर में जब पति की बीमारी का दर्द और बच्चों की भूख न देखी गई, तो एक दिन वह मिल मालिक के कदमों पर जा पड़ी.

मिल मालिक ने भरोसा दिया, कुछ पैसे दिए और काम भी दिया, पर जितना दिया उस से कई गुना ज्यादा लूटा.

तब उसे सारे रिश्ते बिना मतलब के लगने लगे. जो चंद रुपए मिलते थे, वे तो पति की दवादारू और बच्चों की भूख मिटाने में ही खर्च हो जाते.

एक तो पेट की भूख, ऊपर से बारबार पेट गिरवाना. जब फुलमतिया मालिक के लिए बो  झ बन गई, तो छंटनी हो गई. फिर वही भूख, वही तड़प.

ऐसे में एक दिन जिस का हाथ थाम कर वह शहर आई थी, वही चल बसा. आगे की जिंदगी मुश्किलों भरी लग रही थी कि इलाके के दादा रघुराज ने उस के बच्चों के सिर पर हाथ रखा और उस की मांग में सिंदूर भर दिया.

उस बस्ती में ऐसी 4 और औरतें थीं, जिन की मांग में रघुराज का सिंदूर भरा था. वह इन सभी औरतों को कमाने का रास्ता देता और सिंदूर के प्रति जिम्मेदारी निभाने में महीने में 50 रुपए भी देता. बदले में जब जिस के पास मन होता, रात गुजारता.

अब तक फुलमतिया भी बस्ती के रिवाज की आदी हो चुकी थी. वह सम  झ गई थी कि भुखमरी की इस दुनिया में सारे रिश्ते बिना मतलब के हैं. जो पेट की आग बुझा दे, वही रिश्ते का है.

इस 50 रुपए वाले पति ने उसे मंदिर के पास थोड़ी जगह दिलवा दी थी, जहां वह मंदिर आने वालों को फूल बेचती.

मेरी सासू मां की उस से वहीं मुलाकात हुई थी, जो उन दिनों रोज मंदिर जाती थीं. फिर जब पैर के जोड़ों के दर्द से परेशान मेरी सासू मां ने बाहर आनाजाना बंद कर दिया, तो घर में ही पूजापाठ करना शुरू कर दिया.

अब फुलमतिया घर आ कर फूल दे कर जाने लगी. कुछ दिनों में उन दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती हो गई.

धीरेधीरे फुलमतिया न सिर्फ फूल देने आती, बल्कि मेरी सासू मां के पैरों की मालिश भी करती. वह घर के छोटेमोटे काम भी निबटाती और खाली समय में सासू मां के साथ बैठी बतियाती. हर काम में चुस्त फुलमतिया पूरे घर की फुलमतिया बन गई.

हमारे घर से भी उस का बिना मतलब का रिश्ता जुड़ गया, क्योंकि यहां से भी उसे खाना, कपड़े और जरूरत के मुताबिक पैसे भी मिलने लगे थे.

इस बीच रघुराज से उसे 2 बच्चे भी हुए. दूसरी तरफ उस की सौतन की छोटी बेटी, जिस को उस ने अपनी बेटी की तरह पाला था, किसी पराए मर्द के साथ भाग खड़ी हुई और उस का अपना बेटा मुंबई चला गया.

एक बार फुलमतिया 3 दिन तक नहीं आई. जब वह आई, तो पता चला कि उस के पति का किसी ने कत्ल कर दिया है. न तो उस के कपड़ों में कोई अंतर आया, न उस के बरताव में. सिर्फ सिंदूर की जगह खाली थी, लेकिन 6 महीने बाद एक बार फिर वहां सिंदूर चढ़ गया.

उस दिन मेरी सासू मां ने गुस्से में कहा था, ‘यह क्या फूलो, तू ने फिर ब्याह रचा लिया. कम से कम एक साल तक तो इंतजार किया होता.’

मेरी सासू मां की डांट को उस ने हंसी में उड़ाते हुए जवाब दिया था, ‘मरे के साथ थोड़े ही मरा जाता.’’

उस के इस जवाब के सामने सासू मां भी चुप हो गईं.

बाद में सासू मां के मुंह से ही सुना था कि फुलमतिया का यह पति अच्छा है. इस की 2 ही पत्नियां हैं. रिकशा चला कर वह जितना कमाता है, अपने दारू के खर्च के लिए रख कर बाकी दोनों पत्नियों में बांट देता है.

यह सुन कर हम सब हंस दिए थे. मेरे पास कभी इतना समय ही नहीं बचता था कि उस की कहानी सुनूं. हां, जब कभी उसे दारोगा के यहां हाजिरी देनी होती, तो सासू मां से कहने की हिम्मत नहीं होती, तब वह मु  झ से कहती.

एक दिन मैं ने उस से पूछा था कि वह दारोगा के पास क्यों जाती है? उस ने कहा था, ‘न जाऊं तो दारोगा मेरी दुकान किसी और को दे देगा.’

यह सुन कर मैं चुप रह गई थी. मेरे पास उसे इस जंजाल से निकालने का कोई उपाय नहीं था, तो उसे उस के बिना मतलब के रिश्तों के साथ छोड़ देना ही बेहतर था.

अचानक फुलमतिया की हिचकियों से मेरा ध्यान टूटा. इधर मैं अपने खयालों में गुम थी और उधर वह न जाने कब से रो रही थी.

पिछले कई दिनों से लोग आ रहे थे, रो रहे थे, पर इतने पवित्र आंसू कम ही बहे होंगे. कौन कहता है कि उस का चरित्र साफसुथरा नहीं है? अगर वह चरित्रहीन है, तो वह बाप क्या है, जो सिर्फ बच्चे पैदा करना जानता है, उन्हें पालता नहीं?

वह आदमी क्या है, जो बेटेबहू, पत्नी के रहते एक बच्ची को ब्याह कर शहर ले आता है? वह गुंडा क्या है, जो सिर्फ 50 रुपए के बदले औरत के तन से खेलता है? वह दारोगा क्या है, जो समाज की हिफाजत करने की तनख्वाह लेता है और औरत के जिस्म को भोगता है?

इन सवालों के जवाब ढूंढ़ते हुए मु  झे कुछ और थकान महसूस होने लगी.

मैं ने फुलमतिया से कहा, ‘‘रो मत, एक दिन तो सभी को जाना है.

‘‘बसंती, जरा फुलमतिया के बच्चों के लिए खाना पैक कर देना.’’

‘‘थोड़ा ज्यादा देना मेमसाहब, वह मेरी सौतन की बेटी है न, जो भाग गई थी, परसों अपने 3 बच्चों के साथ मर्द को छोड़ कर आ गई है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पता नहीं, कह रही थी कि उस का मर्द दूसरी जोरू ले आया है और कहता है कि वह अब ढीली पड़ गई है, उस में कुछ बचा नहीं है.’’

मैं ने एक लंबी सांस छोड़ कर कहा, ‘‘ठीक है, रसोई में जाओ और बसंती से कह कर जितना खाना लेना चाहो, ले जाओ. एक टिफिन कैरियर लेती जाओ, पर कल वापस जरूर साथ लाना. कल सफाई का काम भी ज्यादा होगा, थोड़ा बसंती का हाथ बंटा देना.’’

‘‘कल सुबह तो मैं नहीं आ पाऊंगी मेमसाहब.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘दारोगाजी ने हाजिरी देने के लिए बुलाया है.’’

‘‘पर अब तो तुम बूढ़ी हो गई हो फुलमतिया.’’

‘‘मु  झे नहीं, दूसरी बेटी को ले कर जाना है.’’

‘‘वह तो अभी बहुत छोटी है.’’

‘‘मेमसाहब, हमारे यहां क्या छोटी और क्या बड़ी. माहवारी शुरू होते ही सलवार पहना दी. बस, वह सलवारसूट में बड़ी दिखने लगी और क्या…’’

‘‘पर तुम तो कहती थीं कि वह घर का काम संभालती है और तुम उसे बाहर ज्यादा निकलने भी नहीं देती हो?’’

‘‘पिछली पूर्णिमा को फूल ज्यादा बिकेंगे, सोच कर कुछ ज्यादा फूल ले लिए थे. एक पेटी उस के हाथ में थमा दी थी. सिपाही ने देख लिया, तो उस ने जा कर दारोगा से शिकायत कर दी.

‘‘आज सुबह दारोगा दुकान पर आया था और बोला, ‘सुना है कि तेरी बेटी कली से फूल बन गई है. उसे कब तक छिपा कर रखेगी, कल शाम को थाने में ले आना.’’’

मेरा जी चाहा कि उठ कर सीधी थाने जाऊं और उस दारोगा की सरकारी पिस्तौल से उसी पर गोली चलाऊं. सरकारी पिस्तौल का कभी तो सही इस्तेमाल होना चाहिए. फिर मैं बोली, ‘‘ठीक है फुलमतिया, कल तुम्हारी बेटी नहीं, मैं जाऊंगी तुम्हारे साथ.’’

वह घबरा कर बोली, ‘‘नहीं मेमसाहब, साहब बहुत नाराज होंगे. कहीं मेरा आना ही न रोक दें इस घर में. गरीब की बेटी है, कब तक वह खैर मनाएगी.’’

‘‘पर ऐसा कब तक चलता रहेगा? ऐसे तो एक और नई फुलमतिया तैयार हो जाएगी.’’

‘‘हमारे लिए आप कब तक और किसकिस से लड़ेंगी मेमसाहब. एक दारोगा जाएगा, दूसरा आएगा. दूसरा जाएगा, तो तीसरा आएगा. अगर इस बीच कभी कोई भला दारोगा आया भी तो उधर गुंडेमवाली की फौज खड़ी हो जाएगी.

‘‘आप इस महल में बैठ कर कुछ नहीं सम  झ सकतीं, कभी चल कर हमारी बस्ती में आइए, आप को हजारों फुलमतिया मिल जाएंगी.’’

मैं हैरान हो कर उस की बातें सुनती रही. वह उठ कर लड़खड़ाते हुए कदमों से जा रही थी. अचानक मैं ने उसे पुकारा, ‘‘फुलमतिया, अपनी बेटी को नहला कर कल सुबह यहां ले आना. मेरा घर बहुत बड़ा है. मु  झे फुरसत नहीं है. बसंती पूरा घर संभालते हुए थक जाती है.

‘‘वह बसंती का हाथ बंटाएगी और मैं उसे पढ़नालिखना सिखा कर कहीं काम पर लगा दूंगी.’’

इतना सुन कर फुलमतिया मेरे कदमों में लोट गई और उन्हें आंसुओं से भिगो दिया. मैं ने उसे गले लगा लिया. आंसू मेरी आंखों में भी थे, खुशी के आंसू. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: गृह प्रवेश – जगन्नाथ सिंह का दबदबा

Hindi Family Story: बरामदे में चारपाइयां पड़ी थीं. दक्षिण दिशा में एक तख्त था, जिस पर बिस्तर बिछा हुआ था. बरामदे से उत्तर दिशा में गोशाला थी. वहीं एक बड़ा सा आंगन था, जिसे एक आदमी बहुत देर से पानी की मोटर चला कर धो रहा था. उस के बदन पर एक बनियान थी और वह लुंगी लपेटे हुए था, जिसे घुटनों तक ला कर अपनी कमर में बांधा था.

वे थे कुशघर पंचायत के मुखिया जगन्नाथ सिंह. उन का समाज में काफी दबदबा था. उस पंचायत के लोग उन की इज्जत करते थे या डरते थे. शायद डर कर ही उन्हें लोग ज्यादा इज्जत देते थे.

‘‘मुखियाजी प्रणाम…’’ भीखरा उन के पास आते हुए बोला.

मुखियाजी ने पूछा, ‘‘भीखरा, आज इधर कैसे आना हुआ? सुना है, आजकल तू ब्लौक के चक्कर लगा रहा है… बीडीओ साहब बता रहे थे.’’

‘‘जी हां मालिक, उन्होंने ही मुझे आप के पास भेजा है,’’ भीखरा ने हाथ जोड़े हुए ही कहा.

‘‘किसलिए?’’

‘‘मालिक, सरकार गरीबों के लिए मकान बनाने के लिए पैसा दे रही है.’’

‘‘हां, तो तू इसीलिए बीडीओ साहब के पास गया था.’’

‘‘हां मालिक. अगर आप की मेहरबानी हो जाए, तो हमारा भी एक मकान बन जाए.

‘‘बरसात में तो झोंपड़ी टपकने लगती है और नाली का गंदा पानी ?ोंपड़ी में घुस जाता है.’’

‘‘पर, तू मेरे पास क्यों आया है?’’

‘‘बीडीओ साहब ने कहा है कि दरख्वास्त पर मुखियाजी से दस्तखत करा के लाओ, इसलिए मैं आप के पास आया हूं.’’

‘‘ठीक है, इस दरख्वास्त को मेरे बिस्तर पर रख दे. पहले तू गाड़ी धुलवाने में मेरी मदद कर,’’ मुखियाजी ने कहा. भीखरा ने वैसा ही किया. जब गाड़ी धुल गई, तब मुखियाजी ने कहा, ‘‘गाय का गोबर हटा दे.’’

भीखरा ने गोबर को हटा कर उस जगह को साफ कर दिया. हाथ धो कर वह उन के पास अपने कागज लेने गया.

मुखियाजी ने भीखरा से कहा, ‘‘देखो भीखरा, मैं इस पर दस्तखत तो कर दूंगा, लेकिन तुम्हें     4 हजार रुपए खर्च करने पड़ेंगे.

‘‘वह पैसा मैं नहीं लूंगा, बल्कि बीडीओ साहब को दे दूंगा. सब का अपनाअपना हिस्सा होता है. सरकारी मुलाजिम बिना हिस्सा लिए तुम्हारा काम जल्दी नहीं करेंगे.’’

‘‘मालिक, भला मैं इतना पैसा कहां से लाऊंगा?’’ भीखरा ने कहा.

‘‘यह तो तुम्हारी समस्या है, तुम ही जानो,’’ मुखियाजी ने कहा.

‘‘तब मालिक, आप ही दे दीजिए. मैं आप को धीरेधीरे चुका दूंगा.’’

‘‘देखो भीखरा, मेरे पास इस समय पैसा नहीं है. तुम देख ही रहे हो कि यह गाड़ी मैं ने साढ़े 6 लाख रुपए में खरीदी है और घर का खर्च… इसलिए मैं लाचार हूं. मेरे पास होता, तो मैं तुम्हें जरूर दे देता. तुम कहीं और से उपाय कर लो.’’

‘‘मैं कहां जाऊं मालिक. मैं तो आप के भरोसे यहां आया था. मेरे बापदादा ने इस घर की बहुत सेवा की है मालिक.’’

‘‘तुम कह तो ठीक ही रहे हो, पर इस समय चाह कर भी मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकता.’’

मुखियाजी मंजे हुए खिलाड़ी थे. वे जानते थे कि अगले चुनाव में भीखरा की जाति के वोट बड़ी अहमियत रखेंगे और हर चुनाव में वे इन्हीं लोगों के वोट से जीतते आए हैं.

वे भीखरा को नाराज भी नहीं करना चाहते थे, साथ ही अपना कमीशन भी वसूल कर लेना चाहते थे.

इस समय भीखरा पर पक्का मकान बनाने का नशा सवार था, इसलिए वह कहीं न कहीं से उधार जरूर लेगा. बीडीओ साहब के हर आवंटन पर उन का 15 सौ रुपए कमीशन तय था और वे इसे जाने नहीं देना चाहते थे.

‘‘देखो भीखरा, अभी तो तुम कहीं और से कर्ज ले लो और अपना मकान बनवा लो.

‘‘सोचो, पक्का मकान बन जाएगा, तब तुम लोगों को कितना आराम हो जाएगा. बरसात में तुम्हारी ?ोंपड़ी में नाली का पानी नहीं घुसेगा और न झोपड़ी तेज बारिश में टपकेगी.’’

‘‘लेकिन मालिक, मैं रोजरोज मजदूरी करने वाला आदमी इतने पैसे कहां से लाऊंगा?’’ भीखरा ने कहा.

‘‘एक उपाय है. तुम बालमुकुंद पांडे के पास जाओ और मेरा नाम ले कर कहना कि मैं ने तुम्हें भेजा है. उन के पास पैसा है. वे जरूर तुम्हें दे देंगे,’’ मुखियाजी ने उसे समझाते हुए कहा.

भीखरा वहां से उठ कर बालमुकुंद पांडे के पास गया. वे बरामदे में कुरसी पर बैठ कर अपने पोते को खिला रहे थे. भीखरा की झोॆपड़ी और उन का मकान आमनेसामने था. बीच में गली पड़ती थी.

बालमुकुंद पांडे ने उस से बहुत बार कहा था कि वह अपनी जमीन उन्हें बेच दे. उस में वे अपनी गायों को बांधने के लिए गोशाला बनाना चाहते थे, लेकिन भीखरा ने मना कर दिया था.

वैसे, बालमुकुंद पांडे उस से जमीन खरीदना चाहते थे. भीखरा की झोंपड़ी से पांडेजी के मकान की खूबसूरती मिट रही थी. वे रोज सुबहसुबह एक दलित का मुंह भी नहीं देखना चाहते थे.

भीखरा ने जैसे ही उन के बरामदे के नीचे से ‘पंडितजी प्रणाम’ कहा, तभी उन का माथा ठनका कि भीखरा आज इधर कैसे? जरूर कोई बात है.

उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘‘आओ भीखरा, आज तुम इधर कैसे आ गए?’’

‘‘पंडितजी, मुखियाजी ने भेजा है.’’

‘‘क्यों? कोई बात है क्या?’’

‘‘हां पंडितजी,’’ भीखरा ने उन्हें सारी बातें सचसच बता दीं.

बालमुकुंद पांडे बोले, ‘‘भीखरा,  यह मौका हाथ से जाने मत दो,’’ और मन ही मन वे सोचने लगे, ‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे.’

फिर उन्होंने पूछा, ‘‘मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?’’

भीखरा ने कहा, ‘‘पंडितजी, मुझे   4 हजार रुपए उधार चाहिए. मैं धीरेधीरे कर के चुका दूंगा.’’

‘‘मैं कहां कह रहा हूं कि तुम नहीं दोगे? मैं तुम्हें पैसे जरूर दूंगा, जिस से तुम्हारे पास पक्का मकान हो जाए.’’

‘‘पंडितजी, आप की बड़ी मेहरबानी होगी. मेरे बच्चे जिंदगीभर आप का एहसान नहीं भूलेंगे.’’

‘‘लेकिन, देखो भीखरा…’’ पंडितजी ने पैतरा बदलते हुए कहा, ‘‘भाई, यह पैसे के लेनदेन का मामला है. इस के लिए तो तुम्हें कुछ गिरवी रखना पड़ेगा और इस पैसे का ब्याज मैं महीने का

8 रुपए प्रति सैकड़ा के हिसाब से लूंगा.’’

‘‘ब्याज तो मालिक हम हर महीने चुकाते जाएंगे, पर गिरवी रखने लायक मेरे पास है ही क्या?’’ भीखरा ने अपनी मजबूरी बताई.

‘‘तुम्हारे पास जमीन है न, उसी को गिरवी रख दो. सरकार तुम्हें जो पैसा देगी, उसी में से तुम कुछ बचत कर के मु?ो लौटा देना और अपने कागज ले जाना,’’ पंडितजी ने  कहा.

भीखरा तैयार हो गया. उस ने एक सादा स्टांप पेपर पर अपने अंगूठे के निशान लगा दिए. पंडितजी ने गांव के ही 2 लोगों के गवाह के रूप में दस्तखत करा कर भीखरा को पैसे दे दिए.

भीखरा ने वह पैसे मुखियाजी को दे दिए. मुखियाजी ने उसे भरोसा दिलाया कि वे उस का काम बहुत जल्दी कराने की कोशिश करेंगे, पर उस का काम होतेहोते 2 साल लग गए.

आज उस के घर में गृह प्रवेश था. पंडितजी ने कहा, ‘‘अब तुम दोनों एकसाथ घर में प्रवेश करो. पहले मंगली जाएगी और उस के पीछेपीछे तुम.’’

उसी समय न जाने कहां से बालमुकुंद पांडे वहां पहुंच गए और जोर से बोले, ‘‘भीखरा, तुम गृह प्रवेश तब करोगे, जब मेरा पैसा चुका दोगे.’’

भीखरा ने कहा, ‘‘पंडितजी, हम आप का सारा पैसा दे देंगे. अभी तो हमें गृह प्रवेश कर लेने दीजिए.’’

‘‘नहीं, आज मैं किसी की नहीं सुनूंगा. जब से तुम ने पैसा लिया है, तब से एक रुपया भी नहीं दिया है. इस समय मूल पर ब्याज लगा कर 19,369 रुपए होते हैं. ये रुपए मु?ो दे दो और खुशीखुशी गृह प्रवेश करो.’’

‘‘पंडितजी, इतना पैसा कैसे हो गया?’’ भीखरा की पत्नी ने पूछा.

‘‘तुम्हारी सम?ा में नहीं आएगा. ऐ रामलोचन, तुम आओ… मैं तुम्हें सम?ाता हूं,’’ पंडितजी ने रामलोचन को आवाज दे कर कहा.

पंडितजी ने उसे समझाया, तो वह भी मान गया कि पंडितजी सही कह रहे हैं.

भीखरा ने बालमुकुंद पांडे से प्रार्थना की, पर वे नहीं माने. थोड़ी देर में मुखियाजी भी वहां पहुंच गए.

भीखरा ने उन से भी कहा, पर उन्होंने साफ कह दिया कि वे इस में उस की कोई मदद नहीं कर सकते. या तो पंडितजी के रुपए लौटा दो या जमीन छोड़ दो.

‘‘मालिक, लेकिन हम अपने बच्चों को ले कर कहां जाएंगे? अब तो मेरी झोंपड़ी भी नहीं रही,’’ भीखरा ने मुखियाजी से गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘वह तुम सोचो. जिस दिन पंडितजी से तुम ने रुपए उधार लिए थे, उस दिन नहीं सोचा था?’’ मुखियाजी ने कहा.

उस समय वहां पर काफी भीड़ इकट्ठा हो गई थी. सभी भीखरा को ही कुसूरवार ठहरा रहे थे.

भीखरा ने हाथ जोड़ कर पंडितजी से कहा, ‘‘पंडितजी, इस समय हम आप का पैसा देने में लाचार हैं. हम यह गांव छोड़ कर जा रहे हैं. अब यह मकान आप का है और आप ही इस में गृह प्रवेश कीजिए.’’

थोड़ी देर बाद अपनी आंखों में आंसू लिए दोनों पतिपत्नी अपने बच्चों के साथ गांव छोड़ कर चले गए. इधर पंडितजी अपनी पत्नी के साथ उस घर में हंसीखुशी गृह प्रवेश कर रहे थे. Hindi Family Story

Story In Hindi: छूतखोर – एक बाबा की करामात

Story In Hindi: सुमन लाल की बेटी दामिनी अब तक 18 वसंत देख चुकी थी. वह उम्र के जिस पड़ाव पर थी, उस पड़ाव पर अकसर मन मचल ही जाता है. पर वह एक समझदार लड़की थी. इस बात को सुमन लाल अच्छी तरह से जानता था, फिर भी उस को अपनी बेटी की शादी की चिंता सताने लगी थी.

एक दिन सुमन लाल ने इस बात का जिक्र अपनी पत्नी शीला से किया, तो उस ने भी सहमति जताई.

अब तो सुमन लाल दामिनी के लिए एक पढ़ालिखा वर ढूंढ़ने की कोशिश करने लगा. आखिरकार एक दिन सुमन लाल की तलाश खत्म हुई.

लड़का पढ़ालिखा था और अच्छे खानदान से ताल्लुक रखता था. सुमन लाल को यह रिश्ता जम गया. बात भी पक्की हो गई.

एक दिन लड़के वालों ने लड़की को देखने की इच्छा जताई. सुमन लाल खुशीखुशी राजी हो गया.

लड़के वाले सुमन लाल के गांव पहुंचे. कुछ देर तक इधरउधर की बात करने के बाद किसी ने कहा, ‘‘क्यों

न इन दोनों को बाहर टहलने के लिए भेज दिया जाए. इस से दोनों एकदूसरे को जानसमझ लेंगे.’’

सभी लोगों की सहमति से वे दोनों झल के किनारे चले गए, जो गांव के बाहर थी.

?ाल बहुत खूबसूरत और बड़ी थी. उसे पार करने के लिए लकड़ी का एक पतला सा पुल बना हुआ था.

लड़के ने दामिनी से बातें करते हुए उसी पुल पर जाने की इच्छा जताई. दोनों पुल पर चलने लगे.

थोड़ी देर बाद अचानक एक घटना घट गई. हुआ यों कि गांव का ही एक दबंग लड़का, जो कई दिनों से दामिनी के पीछे पड़ा था, वहां पर आ धमका. उस के एक हाथ में चाकू था.

बातों में खोई दामिनी को उस वक्त पता चला, जब उस दबंग लड़के ने उस का हाथ पकड़ लिया.

दामिनी के होने वाले पति ने कुछ कहना चाहा, पर इस से पहले ही वह चाकू लहराता हुआ बोला, ‘‘अबे, चल निकल… नहीं तो तेरी आंखें बाहर निकाल कर रख दूंगा.’’

दामिनी का होने वाला पति डर के मारे वहां से भाग निकला. दामिनी चिल्लाती रह गई, पर उस की लौटने की हिम्मत न हुई.

वह दबंग लड़का दामिनी के साथ मनमानी करने लगा. दामिनी ने बचाव का कोई रास्ता न देखते हुए उसी पुल से ?ाल में छलांग लगा दी.

धीरेधीरे दामिनी डूबने लगी. यह देख कर वह दबंग लड़का भी वहां से रफूचक्कर हो गया.

इसी दौरान उसी गांव का एक लड़का वहां से गुजर रहा था. जब उस ने दामिनी को पानी में डूबते हुए देखा, तो वह झल में कूद पड़ा.

उस लड़के ने तैर कर डूबती हुई दामिनी को बचा लिया.

थोड़ी देर बाद जब दामिनी को होश आया, तो वह लड़का उसे ले कर उस के घर आ गया.

घर पर जब दामिनी ने सब लोगों को आपबीती सुनाई, तो वे दंग रह गए.

सब लोगों ने उस लड़के से पूछा, तो उस ने अपना नाम सुमित बताया. वह इसी गांव के पश्चिम टोले में रहता था.

तभी अचानक सुमन लाल की भौंहें तन गईं. उस की सारी खुशियां पलभर में छू हो गईं.

सुमन लाल हैरानी से बोला, ‘‘पश्चिम टोला तो केवल अछूतों का टोला है. क्या तुम अछूत हो?’’

सुमित ने ‘हां’ में सिर हिलाया. फिर क्या था. सुमन लाल अब तक जिस लड़के के कारनामे पर फूला नहीं समा रहा था, अब उसी को बुराभला कह रहा था.

पास में खड़ी दामिनी सारा तमाशा देख रही थी. सुमित अपना सिर झकाए चुपचाप सबकुछ सुन रहा था.

फिर अचानक वह बिना कुछ बोले एक बार दामिनी की तरफ देख कर वहां से चला गया.

सुमित के देखने के अंदाज से दामिनी को लगा कि जैसे वह उस से कह रहा हो कि तुम्हें बचाने का क्या इनाम दिया है तुम्हारे पिता ने.

अब तो सब दामिनी को बुरी नजर से देखने लगे थे. गांव में खुसुरफुसुर होने लगी थी.

एक दिन दामिनी ने फैसला किया कि उस की यह जिंदगी सुमित की ही देन है, तो क्यों न वह सारे रिश्ते तोड़ कर सुमित से ही रिश्ता जोड़ ले.

एक दिन दामिनी सारे रिश्ते तोड़ कर सुमित के घर चली गई. वहां पहुंच कर उस ने देखा कि सुमित का छोटा भाई बेइज्जती का बदला लेने की बात कर रहा था.

सुमित उसे समझ रहा था, तभी दामिनी बोली, ‘‘तुम्हारा भाई ठीक ही तो कह रहा है. उन जाति के ठेकेदारों को सबक सिखाना ही चाहिए.’’

दामिनी को अचानक अपने घर आया देख कर सुमित चौंका और हड़बड़ा कर बोला, ‘‘अरे दामिनीजी, आप यहां? आप को यहां नहीं आना चाहिए. आप घर जाइए, नहीं तो आप के मांबाप परेशान होंगे. मुझे आप लोगों से कोई शिकायत नहीं है.’’

दामिनी बोली, ‘‘कौन से मांबाप… मैं तो उन के लिए उसी दिन मर गई थी, जिस दिन तुम ने मुझे नई जिंदगी दी थी. अब मैं यह नई जिंदगी तुम्हारे साथ जीना चाहती हूं. अगर तुम ने मुझे अपनाने से मना किया, तो मैं अपनी जान दे दूंगी.’’

दामिनी की जिद के आगे सुमित को झकना पड़ा. उस ने दामिनी के साथ कोर्ट मैरिज कर ली.

धीरेधीरे समय बीतने लगा. सुमित ने शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी. आखिरकार एक दिन उस की मेहनत रंग लाई और वह लेखपाल के पद पर लग गया.

एक दिन सुमित गांव के किनारे की जमीन की नापजोख का काम देख रहा था, तभी वहां पर सुमन लाल आ गया.

सुमित ने तो सुमन लाल को एक ही नजर में पहचान लिया था, मगर सुमन लाल की आंखें उसे नहीं पहचान सकीं.

सुमन लाल पास आ कर बोला, ‘‘नमस्कार लेखपाल साहब.’’

जवाब में सुमित ने अपना सिर हिला दिया.

सुमन लाल बोला, ‘‘साहब, यह बगल वाला चक हमारा ही है. इस पर जरा ध्यान दीजिएगा.’’

सुमित ने जवाब में फिर सिर हिला दिया.

सुमन लाल समझ गया कि साहब बड़े कड़क मिजाज के हैं. अब तो वह उन की खुशामत करने में लग गया, ‘‘अरे ओ भोलाराम, साहब के लिए कुछ शरबत बनवा लाओ. देखते नहीं कि साहब को गरमी लग रही है.

‘‘आइए साहब, इधर बगीचे में बैठिए. कुछ शरबतपानी हो जाए, काम तो होता ही रहेगा.’’

सुमित सुमन लाल की चाल को समझ गया था. उस ने सोचा कि सबक सिखाने का यही अच्छा मौका है.

सुमित जा कर चारपाई पर बैठ गया. थोड़ी ही देर बाद शरबत आ गया. सुमित ने शरबत पी लिया, फिर बोला, ‘‘आप का चक मापने का नंबर तो कल ही आएगा.’’

सुमन लाल बोला, ‘‘ठीक है साहब, कल ही सही. सोचता हूं कि क्यों न आज आप हमारे घर ठहर जाएं. एक तो हमें आप की खिदमत करने का मौका भी मिल जाएगा और आप को भी पुण्य कमाने का मौका.’’

‘‘पुण्य कमाने का मौका, पर वह कैसे?’’ सुमित ने पूछा.

‘‘अरे साहब, हमारे घर पर कई दिनों से एक साधु बाबा पधारे हैं. वे काशी से आए हैं.’’

सुमित बोला, ‘‘ठीक है, पर यह पुण्य का काम तो मेरी पत्नी को ही ज्यादा भाता है. मैं उन्हीं को ले कर आऊंगा बाबाजी के दर्शन के लिए.’’

सुमन लाल बोला, ‘‘बहुत अच्छा रहेगा साहब, जरूर ले आइएगा.’’

घर पहुंच कर सुमित ने दामिनी को सारी घटना कह सुनाई. दामिनी साथ में जाने के लिए मना करने लगी.

सुमित ने उसे प्यार से समझाया कि यही तो मौका है उन जाति के ठेकेदारों को सबक सिखाने का.

दामिनी जाने के लिए राजी हो गई, तो सुमित ने पूछा, ‘‘अरे दामिनी, तुम्हारा देवर कहीं नहीं दिख रहा है.’’

दामिनी बोली, ‘‘मैं तो बताना ही भूल गई कि वह कुछ दिनों के लिए मामा के यहां गया है.’’

अगले दिन शाम होतेहोते सुमित कार ले कर सुमन लाल के घर पहुंच गया.

सुमन लाल ने बताया, ‘‘साहब, यही हैं काशी से आए हुए बाबाजी.’’

सुमित ने अनमने ढंग से बाबा को हाथ जोड़े, तो उस बाबा ने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘खुश रहो बच्चा.’’

सुमित ने देखा कि सुमन लाल की पत्नी बाबाजी के पैर दबा रही थी और बाबाजी बड़े ठाट से पैर दबवाने का मजा ले रहे थे.

धीरेधीरे सुमन लाल के घर के बाहर भीड़ लगनी शुरू हो गई थी. कुछ लोग अपने खेतों का मसला ले कर सुमित के पास आ रहे थे, तो कुछ बाबाजी के दर्शन करने के लिए.

सुमन लाल ने पूछा, ‘‘साहब, क्या आप की पत्नी नहीं आईं?’’

सुमित बोला, ‘‘हां, आई हैं. वे कार में बैठी हैं.’’

सुमन लाल ने अपनी पत्नी शीला से कहा, ‘‘अरे सुनती हो, जाओ जा कर साहब की पत्नी को ले आओ. बेचारी कब से कार में बैठी हैं.’’

शीला जैसे ही उठ कर चली, सुमन लाल तुरंत बाबाजी के पैर दबाने लगा.

थोड़ी ही देर में कार के पास से रोने की आवाजें आने लगीं. सुमन लाल ने गौर किया, तो पता चला कि शीला और लेखपाल की पत्नी एकदूसरे से लिपट कर रो रही थीं.

सुमन लाल ने जब पास आ कर देखा, तो हैरान रह गया. लेखपाल की पत्नी तो उस की बेटी दामिनी थी.

सुमित बोला, ‘‘सुमन लालजी, मैं वही सुमित हं, जिसे आप ने बेइज्जत कर के अपने घर से भगा दिया था.’’

सारे गांव वाले चुप थे. किसी के पास कोई जवाब नहीं था.

अभी यह सब हो ही रहा था कि तभी बाबाजी की आवाज सुन कर सभी गांव वालों का ध्यान उन की तरफ गया. पर यह क्या… बाबाजी तो एकएक कर के अपनी नकली दाढ़ीमूंछें उतारने लगे और बोले ‘‘मैं सुमित का छोटा भाई हूं.’’

फिर वह सुमन लाल से बोला, ‘‘मेरे भाई ने तो अपनी जान पर खेल कर आप की बेटी की जान बचाई थी, पर एहसान मानने के बजाय आप ने कहा कि उस के छूने से आप की बेटी नापाक हो गई.

‘‘आज सभी गांव वाले डूब मरिए कहीं चुल्लू भर पानी में, क्योंकि आज तो आप का सारा गांव ही नापाक हो गया है. आज तो आप सभी लोगों ने एक अछूत को छुआ है, इसीलिए यह सारा गांव ही ‘छूतखोर’ हो गया है.

‘‘अब मैं यहां पर एक पल भी नहीं रुकना चाहता,’’ सुमित के छोटे भाई का इतना कहना था कि वे तीनों गाड़ी में बैठ गए.

सुमन लाल ने उन लोगों को रोकना चाहा, पर उस की आवाज हलक के बाहर ही नहीं निकली. धीरेधीरे कार सब की आंखों से ओझल होती चली गई. Story In Hindi

Hindi Family Story: अनकही पीड़ा – बिट्टी कैसे खुश रहेगी

Hindi Family Story: आज अजीत कितना खुश था. मां व बिट्टी ने भी बहुत दिनों बाद घर में हंसीखुशी का माहौल देखा.

अजीत ने मेरे पैर छू कर कहा, ‘‘दीदी, अगर आप 4 हजार रुपए का इंतजाम न करतीं, तो यह नौकरी भी हाथ से निकल जाती. आप का यह उपकार मैं जिंदगीभर नहीं भुला सकूंगा.’’

भाई की बातों को सुन कर मुझे कुछ अंदर तक महसूस हुआ. बड़ी हूं न, खुद को हर हाल में सामान्य रखना है.

मैं भाई का गाल स्नेह से थपथपा कर बोली, ‘‘पगले, बड़ी बहन हमेशा छोटे भाई के प्रति फर्ज का पालन करती?है. मैं ने कोई एहसान नहीं किया है.’’

वह भावुक हो उठा, ‘‘दीदी, आप ने इस घर के लिए बहुत सी तकलीफें उठाई हैं. पिताजी की मौत के बाद कड़ा संघर्ष किया है. अपने लिए कभी कुछ नहीं सोचा. अब आप चिंता न करें, सब ठीक हो जाएगा.’’

मेरे भीतर कुछ कसकता चला गया. अगर इसे पता लग जाए कि कितना कुछ गंवाने के बाद मैं 4 हजार की रकम हासिल कर सकी हूं, तो इस की खुशी पलभर में ही काफूर हो जाएगी और यह भी पक्की बात?है कि उस हालत में यह चोपड़ा का खून कर देने से नहीं हिचकेगा. लेकिन इसे वह सब बताने की जरूरत ही क्या है?

थोड़ी देर पहले बिट्टी चाय ले आई थी. मैं ने उसे लौटा दिया. मैं ने 2 दिन से कुछ नहीं खाया. मां से झूठ बोला कि उपवास चल रहा है.

बिट्टी इस साल इंटर का इम्तिहान दे रही?है. वह ज्यादा भावुक लड़की है. घरपरिवार के विचार मेरे दिमाग को घेरे हुए हैं. गुजरा हुआ सबकुछ नए सिरे से याद आ रहा है.

3 साल पहले जब पिताजी बीमारी से लड़तेलड़ते हार गए थे, तब कैसी घुटती हुई पीड़ा भरी आवाज में कहा था, ‘रेखा बेटी, मौत मेरे बिलकुल पास खड़ी है. मैं जीतेजी तेरे हाथ पीले न कर सका. मुझे माफ कर देना.

‘जिंदगी की राहों में बहुत रोड़े और कांटे मिलेंगे, मगर मुझे यकीन है कि तू घबराएगी नहीं, उन का डट कर मुकाबला करेगी.’

लेकिन क्या सच में मैं मुकाबला कर सकी? पिताजी की मौत के बाद जब अपनों ने साथ छोड़ दिया, तब केवल एक गोपाल अंकल ही थे, जिन्होंने अपनी तमाम घरेलू दिक्कतों के बावजूद हमारी मदद की थी. हमेशा हिम्मत बढ़ाते रहे, एक बाप की तरह.

मैं स्नातक थी. उन्हीं की भागदौड़ और कोशिशों से एक कंपनी में सैक्रेटरी के पद पर मेरी नियुक्ति हो सकी थी.

फार्म का अधेड़ मैनेजर चोपड़ा मुझ से हमदर्दी रखने लगा?था. वह कार में घर आ कर मां से मिल कर हालचाल पूछ लेता. मां खुश हो जातीं. वे सोचतीं कुछ और हड़बड़ी में मुंह से कुछ और ही निकल जाता.

गोपाल अंकल का तबादला आगरा हो गया. इधर अजीत नौकरी के लिए जीजान से कोशिश कर रहा था. वह सुबह घरघर अखबार डालने का काम करता.

अजीत ने अनेक जगहों पर जा कर इंटरव्यू दिया, पर नतीजा जीरो ही रहा. कभीकभी वह बेहद मायूस हो जाता, तब मैं यह कह कर उस का हौसला बढ़ाती कि उसे सब्र नहीं खोना चाहिए. कभी न कभी तो उसे नौकरी जरूर मिलेगी.

एक हफ्ता पहले अजीत ने?घर आ कर बताया था कि किसी फर्म में एक जगह खाली है, पर वह नौकरी 4 हजार रुपए की रिश्वत एक अफसर को देने पर ही मिल सकती?है.

मेरे बैंक के खाते में महज 9 सौ रुपए पड़े थे. मां के जेवर पिताजी की बीमारी में ही बिक गए थे. इतनी बड़ी रकम बगैर ब्याज के कोई महाजन देने को तैयार न था. घर में सब पैसे को ले कर चिंता में थे.

चूंकि मैं रुपयों को ले कर तनाव में?थी, इसलिए काम में गलतियां भी कर गई. पर चोपड़ा ने डांटा नहीं, बल्कि प्यार से मेरी परेशानी का सबब पूछा. उस की हमदर्दी पा कर मैं ने अपनी समस्या बता दी. उस ने मेरी मदद करने का भरोसा दिया.

फिर एक दिन चोपड़ा ने मुझे अपने शानदार बंगले में बुलाया और कहा कि उस की बीवी रीमा मुझ से मिलने को बेताब है. वह मुझे कुछ उपहार देना चाहती?है.

शाम को 7 बजे के आसपास मैं वहां पहुंची, तो बंगला सुनसान पड़ा था.

चोपड़ा ने अपनी फैं्रचकट दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए हंस कर कहा था, ‘रेखा, मेरी बीवी को अचानक एक मीटिंग में जाना पड़ गया. वह तुम से न मिल पाने के लिए माफी मांग गई है और तुम्हारे लिए यह लिफाफा दे गई है.’

मैं ने लिफाफा खोला. अंदर 4 हजार रुपए थे. मैं चकरा कर रह गई थी.

मैं हकला कर बोली, ‘सर, ये रुपए…उन्हीं ने…?’

तब चोपड़ा के चेहरे पर शैतानी मुसकान खेलने लगी. उस धूर्त ने झट दरवाजे की सिटकिनी लगा दी और मुझे ऊपर से नीचे तक ललचाई नजरों से घूरता हुआ बोला, ‘इन्हें रख लो, रेखा डार्लिंग. तुम्हें इन रुपयों की सख्त जरूरत है और मैं ये रुपए दे कर तुम पर मेहरबानी नहीं कर रहा हूं. यह तो एक हाथ ले दूसरे हाथ दे का मामला है. तुम नादानी मत करना. अपनेआप को तुम खुशीखुशी मेरे हवाले कर दो.’

एक घंटे बाद मैं वहां से अपना सबकुछ गंवा कर बदहवास निकली और लड़खड़ाते कदमों से नदी के पुल पर जा पहुंची थी. मुझे खुद से नफरत हो गई थी. मैं जान देने को तैयार थी. मुझे अपनी जिंदगी बोझ सी लग रही थी. ऊपर से नीचे तक मैं पसीने में डूबी थी.

लेकिन उसी समय दिमाग में अजीत, बिट्टी और सूनी मांग वाली मां के चेहरे घूमने लगे थे. मैं सोचने लगी, मेरी मौत के बाद उन का क्या होगा?

मैं ने खुद को संभाला और घर लौट आई.

अजीत को रुपए दे कर मैं तबीयत खराब होने का बहना बना कर लेट गई.

‘‘यह तू क्या सोचे जा रही है, बेटी?’’ अचानक मां की अपनापन लिए प्यार भरी आवाज सुन कर मेरे सोचने का सिलसिला टूट गया.

मैं ने चौंक कर उन की तरफ देखा. मां ने मेरा सिर छाती में छिपा कर चूम लिया. मुझे एक अजीब तरह का सुकून मिला.

अचानक मां ने भर्राई हुई आवाज में कहा, ‘‘मेरी बच्ची, चल उठ और खाना खा ले. हिम्मत से काम ले. हौसला रख. अपने पिता की नसीहत याद कर. निराश होने से काम नहीं चलता बेटी. तू नाखुश व भूखी रहेगी, तो अजीत और बिट्टी भला किस तरह खुश रहेंगे. समझदारी से काम ले, जो बीत गया उसे भूल जा.’’

मेरे कांपते होंठों से निकला, ‘‘मां…’’

‘‘तू मेरी बेटी नहीं, बेटा है,’’ मां ने इतना कहा, तो मैं उन से लिपट गई.

अचानक मेरे दिमाग में खयाल आया कि क्या मां मेरी अनकही पीड़ा को जान गई हैं? Hindi Family Story

Family Story In Hindi: अमीर – बड़े दिलवाला लालू

Family Story In Hindi: ‘‘उठो… आंगनबाड़ी जाना है न?’’ मां लालू को जगाने की कोशिश कर रही थी.

‘थोड़ी देर और…’’ लालू ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

‘‘मुझे और तेरे बापू को काम पर जाने में रोज देरी होती है. चलो, तैयार हो जाओ,’’ मां झंझला कर बोली, तो लालू को उठना पड़ा.

मां ने बासी और कड़क रोटी चायनुमा पानी में डुबो कर नरम की थी. टिन की थाली में वही रोटी परोस कर लालू के सामने सरका दी.

लालू वही नरम और बासी रोटी बड़े चाव से खाने लगा.

‘‘ढंग से खाओ, कपड़ों पर मत गिराना,’’ मां बोली.

‘‘क्यों डांटती हो? बच्चा ही तो है,’’ बापू लालू की तरफ से बोला.

‘‘कल ही कपड़े धोए हैं,’’ मां के मन में साबुन का हिसाबकिताब चल रहा था.

इस के बाद मां और बापू चाय का पानी पी कर काम पर चले गए.

‘‘तुम ने रोटी नहीं खाई?’’ लालू ने पूछा, ‘‘ठकुराइन के घर की रोटी बहुत अच्छी होती है.’’

‘तुम्हारे उठने से पहले ही खा ली थी बेटा,’ मां और बापू दोनों सफाई से झठ बोल गए.

मां गांव के प्रधान के घर पर झाड़ू, बरतन, सफाई करती थी और बापू उन

के खेतों में मजदूर था. इन के घर में चूल्हा जलता था, तो सिर्फ चाय बनाने के लिए, वह भी गुड़ वाली चाय. वरना जो जूठा, बचा हुआ खाना मिलता, उसी पर वे लोग अपना गुजारा कर लेते थे.

मां और बापू दोनों दिनरात मजदूरी में जुटे रहते. बापू को कभी काम मिलता, तो कभी नहीं. मां को पुराने कपड़े, सामान, बचा हुआ खाना मिलता था.

प्रधान के घर में खाना खा कर मां अपना गुजारा कर लेती और अच्छा खाना मिले भले बासी ही सही, अपने बेटे लालू के लिए बांध कर घर ले आती.     5 साल का लालू इसी साल से आंगनबाड़ी में जाने लगा था.

बापू ने उस को इस जिद से भरती करवाया था कि वे दोनों तो अनपढ़ हैं. अगर वे लिखनापढ़ना जानते, तो वे मजदूर नहीं होते. लेकिन उन का बेटा पढ़ेगा. आगे चल कर वे उसे शहर भेजेंगे. वह पढ़लिख कर बड़ा आदमी बनेगा, उस के लिए भले ही उन दोनों को सारी जिंदगी भूखे पेट क्यों न रहना पड़े.

लालू को आंगनबाड़ी भेजने की एक और भी वजह थी. सरकारी नियमों के मुताबिक वहां से कौपीकिताबें मुफ्त में मिलती थीं. साल में एक बार 2 जोड़ी कपड़े मिलते थे. अगर छुट्टी न करो, तो हर रोज दोपहर का खाना मिलता था.

देशभर में 15 अगस्त बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था. आंगनबाड़ी में भी खास समारोह होना था.

आंगनबाड़ी को झाड़ू लगा कर साफ कराया गया. फूलों की माला से झंडे का स्तंभ सजाया गया. उस के चारों ओर रंगोली से नक्काशी बनाई गई.

थोड़ी ही देर में गांव के सरपंचजी आए. उन्होंने झंडा फहराया. सभी ने राष्ट्रगान गाया. उस के बाद ‘भारत माता की जय’ का जयघोष हुआ. फिर सरपंचजी ने भाषण किया.

समारोह खत्म होने के बाद सभी बच्चों को एकएक डब्बा दिया गया, जिस में 2 समोसे, 2 लड्डू और कुछ नमकीन थी. सभी बच्चे अपनाअपना डब्बा खोल कर समोसेलड्डू पर टूट पड़े.

लालू ने भी अपना डब्बा खोला. समोसे की बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी. लालू ने नाक के पास ले जा कर वह खुशबू सूंघी. गांव के रतन हलवाई की दुकान के आसपास ऐसी ही खुशबू फैली रहती है.

लालू ने समोसे और लड्डू को प्यार भरी नजरों से देखा, फिर एक बार सूंघा और डब्बा बंद कर दिया.

आज 15 अगस्त होने की वजह से आंगनबाड़ी में छुट्टी थी. नतीजतन, दोपहर का खाना नहीं मिलने वाला था.

सारे बच्चे लड्डूसमोसा खा कर के घर जाने लगे. कुछ बच्चों ने नमकीन अपनी निकर की जेबों में भर ली और खाली डब्बे वहीं फेंक दिए.

लालू के हाथ में अभी भी डब्बा था, भरा हुआ डब्बा. लालू बड़े ध्यान से संभाल कर डब्बा ले कर अपने घर जा रहा था.

दूर खेतों में खड़े अपने झोंपड़े में आ कर लालू ने वह डब्बा ठंडे चूल्हे के पास रख दिया. थोड़ी देर के लिए वह झोंपडे़ में इधरउधर घूमा, फिर डब्बा चूल्हे के पास से उठाया. उसे डर था कि कहीं कोई चूहा या बिल्ली इसे खा न जाए. उस ने वह डब्बा चूल्हे के ऊपर जो तवा था, उस पर रख दिया. अब वह निश्चिंत हो गया और खेलने के लिए झोंपड़े के बाहर चला गया.

वह खेल में मस्त हो गया कि तभी अचानक उसे कुछ याद आया और दौड़ कर झोंपड़े के अंदर चला आया. डब्बा तो तवे पर सहीसलामत था, मगर चींटियों की कतारें उस के अंदरबाहर आजा रही थीं. उस ने झट से डब्बा खोला. अभी ज्यादा चींटियां अंदर नहीं घुसी थीं. उस ने फूंक मारमार कर चींटियों को भगाया.

इस हड़बड़ी में उस के हाथों पर कुछ चींटियां चिपक कर मर गई थीं. लालू ने अपने कपड़ों से लड्डू पोंछ कर साफ किए. वह खुश हुआ, लड्डू सहीसलामत थे.

पर अब क्या करे? उसे एक तरकीब सूझ. उन के पास एक ही खटिया थी, जो झोंपड़े के बाहर पड़ी रहती थी, जिस पर उस का बापू सोता था. खटिया के पाए ढीले हो गए थे, डोरियां ढीली पड़ गई थीं, उन में अच्छाखासा झोल आ गया था. लालू ने उस पर वह डब्बा रख दिया. अब उसे तसल्ली हो गई कि डब्बा एकदम महफूज है.

वह फिर से खेलने लगा. घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था. आज वह खेल में ही अपना ध्यान लगा रहा था, पर खटिया पर रखे डब्बे पर भी नजर रख रहा था कि कहीं कुत्ता मुंह न मारे.

4-5 साल का छोटा भूखा, थका हुआ बच्चा कितनी देर खाने का डब्बा संभालता? आखिरकार डब्बा गोद में लिए वह खटिया पर लुढ़क गया.

शाम ढलतेढलते मांबापू दोनों काम से वापस आ गए. मां ने लालू को जगाया. आंख मलतेमलते वह जाग गया. मांबापू ने देखा कि उस की गोद में एक डब्बा है.

मां ने पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘आज आंगनबाड़ी में हमें यह दिया गया है,’’ लालू ने डब्बा मां के हाथों में देते हुए कहा.

मां ने डब्बा खोल कर देखा. उस में 2 लड्डू, 2 समोसे और नमकीन थी.

‘‘तुम ने खाया क्यों नहीं बेटा? आज तो तुम्हें वहां खाना भी नहीं मिला होगा,’’ बापू कह रहा था. उस की आवाज में नाराजगी थी.

यह नाराजगी लालू के खाना न खाने पर थी या एक वक्त का खाना न मिलने पर थी, यह तो वही जाने.

‘‘क्यों नहीं खाया?’’ मां गुस्से से बोली. उस की आवाज में गुस्से के साथसाथ तड़प भी थी कि उस का बच्चा दिनभर का भूखा है.

मांबापू सोचने लगे, ‘इस ने खाना क्यों नहीं खाया? डब्बा गोद में लिए लेटा रहा… तबीयत तो ठीक है न इस की? क्या हो गया है इसे?’

मांबापू दोनों ने नाराजगी और तड़प भरे दिल से लालू को डांट लगाई, ‘चलो, पहले लड्डू, समोसा खा लो. खाना गोद में लिए कोई सोता है भला?’

लालू बोला, ‘‘मां, मैं ने इसे तवे पर रखा था, तो इस में चींटियां घुस गईं. पर मैं ने लड्डू को पोंछपोंछ कर साफ कर दिया. चूहा, बिल्ली, कुत्ता कोई इसे मुंह न लगाए, इसलिए गोद में ले कर दिनभर संभालता रहा, तुम दोनों के लिए.’’

थकी हुई मां के जिस्म में न जाने कहां से ताकत आ गई. वह ?ाट से उठ गई. दो कदम की दौड़ लगा कर वह अपने बच्चे के पास आ गई. उस ने लालू का चेहरा कई बार चूमा.

झोंपड़े से पीठ टिकाए बैठा बापू मांबेटे का यह प्यारदुलार देख रहा था. उस ने सिर पर बांधा हुआ कपड़ा अपने हाथों से हलके से उतार कर अपनी आंखें पोंछीं. वह अपनी जगह से उठ गया और प्यार से बेटे के पास खटिया पर जा बैठा. उस ने लालू को सीने से लगाया और उस के माथे को चूमा. उस के उन नन्हे हाथों को चूमा, जो खाना खाने के बजाय खाने की हिफाजत कर रहे थे.

लालू ने अपनी मां से वह डब्बा लिया और बड़े प्यार से उस में से एक समोसा उठाया.

‘‘एक कौर मेरी रानी मां का,’’ कहते हुए लालू ने समोसा मां को खिलाया.

मां ने समोसे का छोटा सा टुकड़ा काट लिया. वही जूठा समोसा बापू के मुंह के पास ले जा कर कहा, ‘‘एक कौर मेरे राजा बापू का.’’

बाप ने भी समोसे खा लिया.

मां के गले से सिसकी निकली. बापू का गला रुंध गया. बापू ने समोसे के साथ सिसकी निगल ली.

मांबापू को समोसा खाते देख कर लालू खिलखिला कर हंस पड़ा. मां ने बचा हुआ समोसा बड़े प्यार से अपने लालू को खिलाया.

लालू बोला, ‘‘अब मेरी मां लड्डू खाएंगी, मेरा बापू लड्डू खाएगा. फिर लालू लड्डू खाएगा.’’

तेल में बने उस लड्डू का स्वाद क्या बताएं कि असली देशी घी के लड्डू का स्वाद भी फीका पड़ जाए.

खुले आसमान के नीचे चांदनी की चादर ओढ़े, झलाती हुई खटिया पर रानी मां, राजा बापू और उन का नन्हा राजदुलारा लालू एकदूसरे को टुकड़टुकड़ा खाना खिला रहे थे. तीनों के मुंह समोसे, लड्डू से और दिल खुशी से भरे थे. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: गरीब का डर – बेटी को ले कर परेशान पिता

Hindi Family Story: टैलीविजन और सोशल मीडिया पर जैसे आग लगी हुई है, जब से श्रद्धा और आफताब वाला केस चला है. 35 टुकड़े फ्रिज में रखे गए थे. एकएक कर के वह जंगल में फेंक रहा था.‘‘नराधम, राक्षस, पापी, कुत्ता, नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, कीड़े पड़ेंगे बदन में, मर जाए नासपिटा, न जाने कैसी कोख से जन्म लिया है, मांबाप के नाम को कलंक लगा दिया है, ऐसे कपूत से तो बेऔलाद भले…’’ रामआसरे अपनी सब्जी की पोटलियां खोलतेखोलते जोरजोर से बड़बड़ा रहा था.

प्लास्टिक की छोटी बालटी में पानी भरभर कर रामआसरे की पत्नी शारदा प्लास्टिक के छोटे मग से सब्जियों पर पानी छिड़कती जा रही थी. वह जानती थी कि पिछले कई दिनों से आफताब वाले केस को ले कर रामआसरे बड़ा दुखी है. रोज बड़बड़ करता है. घर में भी बेचैन सा रहता है. रोटी भी बेमन से खाता है. वह क्या करे? उस के बस में कुछ नहीं है.

रामआसरे देश का गरीब आदमी है, जिस तक सरकार की कोई योजना का लाभ नहीं जाता है, न ही मिल पाता है. पटरियों पर सब्जी की दुकानें लगाने वाले गरीबों की सुनता कौन है? स्मार्ट सिटी बनाने में सड़कें चौड़ी करने के लिए उन को हर बार लात मार कर भगा दिया जाता है. कभी भी जगह बदल देते हैं, यहां से खाली करो वहां दूसरी जगह दुकान लगाओ.

बेचारे दरबदर होते रहते हैं सब्जी वाले. सड़कें चौड़ी करने के चक्कर में इन की पुरानी ग्राहकी टूट जाती है. बड़ी मुश्किल होती है दुकान जमने में. अब यह परेशानी कौन सुने?सुबह से शाम तक काम ही काम. 2 बच्चों का भरणपोषण, बीमार मां की सेवा… गरीब आदमी है मां को आश्रम में नहीं डालेगा. ये अमीरों के चोंचले हैं.मां चाहे बीमार हो, लेकिन मां तो मां है.

मां के भरोसे ही जवान छोरी को छोड़ कर सब्जी की दुकान में शारदा के साथ बैठ कर शांति से सब्जी बेच पाता है.दोपहर में शारदा घर चली जाती है, तो वह अपनी बेटी की चिंता भी भूल जाता है. मां और पत्नी के घर रहने से बेटी की देखभाल भी हो जाती है.

शारदा 5 बजे शाम को पैट्रोल पंप वाले साहब लोगों के घर खाना बनाने जाती है और 7 बजे वापस भी आ जाती है. बनिया परिवार है. 5 जने हैं घर में. सभी की पसंद का खाना अलगअलग बनता है. कई सारे नौकरचाकर हैं.

शाम का खाना बनाने के लिए शारदा जाती है. सुबह और दोपहर के खाने के लिए दूसरे नौकर रखे हैं. बड़े लोगों की बड़ी बातें.3,000 रुपए महीना मिलते हैं इस बनिया परिवार से. इस के अलावा उन की जवान छोरी के कपड़े भी मिल जाते हैं, जो रामआसरे की जवान छोरी कजरी के काम आ जाते हैं.

होलीदीवाली पर मिठाई का डब्बा, शारदा को नई साड़ी और 1,000 रुपए इनाम में देते हैं. 4 साल से शारदा वहां खाना बना रही है. तब कजरी 15 साल की थी. आज 19 साल की हो गई है.मां की बीमारी की दवा वगैरह भी बनिया परिवार दिला देता है.

एक बार मां ज्यादा बीमार पड़ी थी. साहब ने पहचान के डाक्टर को फोन लगा कर जांच करने को कहा था. इतना अच्छा घर कैसे छोड़े? कितनी मदद मिल जाती है. गरीब आदमी का जीवन चल जाता है.उस दिन तो रामआसरे ने हद कर दी.

जैसे ही टीवी पर श्रद्धा और आफताब की खबर देखी, तो कजरी को डांटने लगा, ‘‘बता तेरा कोई लफड़ावफड़ा तो नहीं है किसी के साथ?’’कजरी डर गई थी बाप का गुस्सा  देख कर. रामआसरे के 2 घर छोड़ कर शकील चाचा का घर था. वहां भी जाना बंद करवा दिया था. शकील चाचा के घर में 2 जवान छोरी और एक जवान छोरा था.

शकील चाचा की पत्नी सायरा और रामआसरे के परिवार के अच्छे संबंध थे. आनाजाना था. बेड़ा गर्क हो आफताब का, जिस ने देश की हवा में जहर घोल दिया था.रामआसरे ने शाम को चाय की टपरी पर बैठना भी बंद कर दिया था शकील चाचा से बचने के लिए. शकील चाचा और रामआसरे के बच्चे साथसाथ खेलकूद कर जवान हुए थे.

रामआसरे को शकील चाचा के घर का जर्दा पुलाव और बिरयानी पसंद थी. जब शकील चाचा के घर से जर्दा पुलाव आता था, तो पूरा घर खुश हो कर खाता था. ऐसे ही होलीदीवाली की गुझिया की खुशबू शकील चाचा को पसंद थी. पूरा परिवार गुझिया पसंद करता था, पर कीड़े पड़ें आफताब को, जिस ने देश का माहौल खराब कर दिया.

रामआसरे ने घर में सख्त मना कर दिया था कि शकील चाचा की दुकान से कोई सामान नहीं आए. शकील चाचा की किराने की छोटी सी दुकान थी. जवान छोरे असलम को किसी गाड़ी के शोरूम में लगवा दिया था. वह सुबह 10 बजे चला जाता था और रात में 9 बजे तक घर आता था. 2 जवान छोरियों के साथ कजरी की दोस्ती थी. वह घर आतीजाती थी.

आफताब और श्रद्धा केस के बाद वह भी बंद करवा दिया था. एक अजीब सी दहशत थी रामआसरे के भीतर, जो गुस्से में कभी भी फट पड़ती थी.रामआसरे के मना करने के बाद भी परिवार के बच्चों में दोस्ती थी. क्या प्यार और इनसानियत के रिश्ते कभी टूट सकते हैं? लेकिन वे रामआसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए उस के सामने नहीं मिलते थे.

शकील चाचा के छोरे असलम ने महल्ले में आए एक नए परिवार को भी दावत पर बुला लिया था. परिवार क्या था, बस मां और बेटे थे. बेटे का नाम शिवम था. पिता की कुछ साल पहले सड़क हादसे में मौत हो गई थी.उसी दावत में शिवम ने पहली बार कजरी को देखा तो देखता ही रह गया था. कजरी की सादगी उस के मन को भा गई थी.

असलम की बहनों के साथ कजरी कभी किसी काम से बाजार जाती थी, वहीं 1-2 बार उस की शिवम से ‘हायहैलो’ हो गई थी. इस से ज्यादा कुछ नहीं.शिवम सोच रहा था कि बात शुरू कैसे करे? उस ने सोचा कि वह असलम से बात करेगा, इसलिए उस ने असलम को मोबाइल पर अपनी बात बताई.

असलम बोला, ‘‘कुछ सोचते हैं. रामआसरे अंकल के सामने तो मिलने से रहे…’’अचानक असलम को आइडिया सूझा. उस ने शिवम को कहा, ‘‘तू एक काम कर कि रामआसरे अंकल की दुकान से सब्जी खरीदना शुरू कर दे. इस बहाने वे तुझे देखेंगे, फिर धीरेधीरे बात शुरू करना.’’

‘‘उस से क्या होगा?’’ शिवम ने पूछा.‘‘अरे यार, उन से बात तो शुरू हो जाएगी. कभीकभी कजरी खाना देने आती है, उसे देख भी लेना और मौका मिले तो बात भी कर लेना,’’ असलम ने कहा.‘‘यह आइडिया सही है,’’ शिवम खुश हुआ.उसी दिन शिवम सब्जी लेने पहुंच गया.

जानबूझ कर ज्यादा ही सब्जी खरीदी. सब्जी की तारीफ भी की.रामआसरे खुश हो गया और बोला, ‘‘बाबू साहब, सब्जी मंडी से ले कर आता हूं… ताजी हैं.’’शिवम ऐसे ही हर दूसरे दिन कुछ न कुछ सामान रामआसरे की दुकान पर लेने पहुंच जाता. आज शिवम लंच टाइम में गया, तो खुशी के मारे उछल पड़ा. वहां कजरी थी.‘‘कजरी तुम… बापू कहां गए हैं?’’

शिवम को देखते ही कजरी भी खुश हो गई. वह बोली, ‘‘बापू बैंक गए हैं. आप सब्जी लेने आए हो?’’‘‘सब्जी तो ठीक है… आज बड़े दिनों बाद मौका मिला है तुम से बात करने का. कहीं बाहर मिलो न, ढेर सारी बातें करनी हैं… अपना मोबाइल नंबर दो,’’ शिवम बोला.

‘‘मोबाइल नहीं है मेरे पास…’’ कजरी बोली, ‘‘पहले था, पर अब बापू टैंशन में रहते हैं मोबाइल और सोशल मीडिया को ले कर, इसलिए नहीं रखने देते.’’

‘‘ओह, फिर मुलाकात कैसे हो…’’ शिवम बोला.‘‘असलम से बात करना तुम, शायद वह कोई रास्ता बताए,’’ कजरी बोली.‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’

शिवम बोला और वह सब्जी खरीद कर वापस चला गया.रात को ही शिवम ने असलम को फोन पर आज की मुलाकात के बारे में बताया, फिर कजरी से बाहर मिलने के लिए मदद भी मांगी.

असलम बोला, ‘‘सोचता हूं कुछ.’’दूसरे दिन असलम ह्वाट्सएप ग्रुप पर मैसेज देख रहा था. ‘हैप्पी सावन’ के मैसेजों की भरमार थी.

अचानक उसे एक बात ध्यान आई कि 2 दिन बाद ही पीछे खाली मैदान में सावन का मेला लगता है, झूले और तमाम खानेपीने के स्टौल. कजरी को झूला झूलने का शौक है. वहीं मिलवा देगा उन दोनों को.2 दिन बाद हलकीहलकी फुहारें पड़ रही थीं.

कजरी शाहिदा और शमीम के साथ झूला झूलने वालों की कतार में खड़ी थी.सामने वाली चाय की टपरी में शिवम असलम के साथ चाय पी रहा था.

2 झूले खाली हुए ही थे. शाहिदा और शमीम आगे बढ़ी झूले में बैठने के लिए. कजरी भी बैठने की जिद करने लगी कि इतने में शिवम ने पीछे से उस के कंधे पर हाथ रख दिया.कजरी एकदम पलटी और बोली, ‘‘शिवम तुम…’’‘‘हां कजरी, चलो हम दोनों भुट्टा खाते हैं.’’

‘‘कजरी, तुम जाओ और शिवम से बात कर लो,’’ तभी असलम भी आ गया.कजरी शिवम के साथ भुट्टे के ठेले के पास चली गई.‘‘गरम भुट्टे का स्वाद नीबू और नमक के साथ बड़ा ही अच्छा लगता है… क्यों शिवम?’’‘‘बिलकुल कजरी,’’

शिवम बोला, ‘‘उतना ही नमकीन, जितना हमारा प्यार.’’

‘‘प्यार और नमकीन…?’’ कजरी हंसने लगी.

‘‘हां कजरी, जिंदगी में नमक से कभी दूर नहीं हो सकते. तुम मेरी जिंदगी का नमक हो.’

’‘‘अच्छा,’’ यह सुन कर कजरी हंस पड़ी.वे दोनों मेले में घूमते रहे और ढेर सारी बातों के बीच वक्त कब उड़ गया, पता ही नहीं चला.तभी असलम भी अपनी बहनों के साथ आ गया. उन के हाथों में भी भुट्टे थे.‘‘चलें शिवम?’’ असलम ने पूछा.‘‘ठीक है,’’

शिवम बोला.कजरी भी खुश थी इस मुलाकात से.‘‘शिवम, बापू से बात कब करोगे?’’‘‘जल्दी ही कुछ सोचते हैं,’’ शिवम बोला.असलम ने भी उन की हां में हां मिलाई.इस बात के कुछ दिन बाद असलम सुबहसुबह ही रामआसरे के घर पहुंच गया. रामआसरे घर के बाहर झाड़ू लगा रहा था. असलम जानता था कि वह सुबह घर के बरामदे की झाड़ू खुद ही लगाता है,

फिर पानी से छिड़काव करता है, तो मिट्टी की एक सौंधी सी खुशबू फैल जाती है.असलम को देखते ही रामआसरे का मूड खराब हो गया, ‘‘कहां सुबहसुबह आ टपका यह…’’‘‘नमस्ते अंकलजी,’’ असलम ने कहा.‘‘क्या हुआ? क्यों आए हो यहां?’’

रामआसरे पूछ बैठा.‘‘आप से बात करनी है, इसलिए चला आया. सुबह आप मिल जाओगे, नहीं तो सारा दिन आप को टाइम नहीं मिलेगा.’’‘‘कौन सी बात करनी है तुम्हें?’’ रामआसरे बोला.‘‘शादी की…’’ असलम इतना ही बोला था कि रामआसरे गुस्से में चिल्ला उठा, ‘‘अरी ओ शारदा, आ जा… जल्दी से देख तेरी बेटी के लक्षण…’’शारदा आवाज सुन कर दौड़ी चली आई, ‘‘क्या हुआ सुबहसुबह?’’

पर सामने असलम को देखा तो चुप हो गई.‘‘यह देखो शादी की बात करने आया है,’’ रामआसरे बोला.‘‘किस की शादी?’’ शारदा ने पूछा.‘‘कजरी की.’’असलम शांत था.‘‘अब भी बोलेगी कि तेरी लड़की कजरी ने कोई गुल नहीं खिलाया…’’ रामआसरे चिल्लाया.

‘‘अरे, पूरी बात तो सुनो कि यह क्या बोल रहा है…’’ शारदा ने कहा.‘‘अब बचा क्या है सुनने को… मैं तो बरबाद हो गया,’’ रामआसरे बोला.‘‘शांत रहो और पहले असलम की बात सुनो,’’ शारदा बोली.‘‘आंटीजी, एक लड़का है, जो कजरी से शादी करना चाहता है,’’

असलम ने अपनी बात पूरी की.‘मतलब, असलम खुद की शादी की बात नहीं करने आया…’ रामआसरे ने सोचा, फिर बोला, ‘‘तुम खुद की शादी की बात नहीं करने आए थे?’’‘‘मैं कब बोला आप को कि अपनी शादी की बात कर रहा हूं…’’‘‘अच्छाअच्छा… फिर?’’

रामआसरे उत्सुक हो गया.‘‘एक लड़का है शिवम, जो कजरी से शादी करना चाहता है. कजरी भी उसे जानती है,’’ असलम बोला.‘‘मतलब, इश्क वाला मामला है और तू बिचौलिया है. हद हो गई और हमें पता ही नहीं,’’ रामआसरे फिर गुस्साया.‘‘चुप रहो तुम…’’

शारदा बोली, ‘‘असलम, तुम आगे बोलो.’’‘‘आंटीजी, शायद आप उसे जानती होंगी…’’ असलम ने कहा.‘‘मैं कैसे जानूंगी?’’ शारदा हैरानी से बोली.‘‘मांबेटी दोनों एक…’’ रामआसरे बोला.‘‘अंकलजी, वे जो पैट्रोल पंप वाले साहब हैं न… शिवम, उन के पैट्रोल पंप पर काम करता है.’’

‘‘अच्छा… उस का कोई फोटो है?’’ शारदा बोली.‘‘हां आंटीजी,’’ कहते हुए असलम ने मोबाइल में फोटो दिखाया.शारदा ने जैसे ही फोटो देखा तो वह खुशी से चिल्ला पड़ी, ‘‘यह शिवम है…’’‘‘तू जानती है इसे?’’ रामआसरे ने बोलते हुए फोटो पर ध्यान से नजर दौड़ाई.

‘‘हां, कई बार देखा है. बंगले पर काम से आताजाता है. बड़ी पूजा में भी देखा था. नाम नहीं जानती थी,’’ शारदा के चेहरे से खुशी छलक पड़ रही थी.‘‘कजरी… ओ कजरी…’’ शारदा ने आवाज लगाई, पर कजरी कब से दरवाजे पर खड़ी थी और उन की बातें सुन रही थी.

‘‘कजरी, तू इस लड़के को जानती है?’’ रामआसरे ने पूछा.‘‘हां बापू, जानती हूं,’’ कजरी ने जवाब दिया.‘‘तू इसे पसंद करती है?’’ शारदा बोली.‘‘हां मां…’’ कहते हुए कजरी ने मां की पीठ में सिर छिपा लिया.रामआसरे खुश हो गया, फिर वह असलम से बोला,

‘‘बेटा, बाप हूं न… डर जाता हूं कि कहीं कुछ गलत न हो जाए…’’‘‘अंकलजी, कोई बात नहीं. माहौल ही ऐसा है.’’शारदा बोली, ‘‘साहब, लोगों के लिए मिठाई ले कर जाऊंगी आज.’’‘‘हम दोनों साथ चलेंगे,’’ रामआसरे बोला.‘‘और मेरी मिठाई अंकलजी?’’

असलम बोला.‘‘तेरी कोई मिठाई नहीं. मिठाई का डब्बा ले कर आ रहा हूं तेरे घर. शकील से बोलना कि जर्दा पुलाव खाए बहुत दिन हो गए हैं,’’ कह कर रामआसरे हंसने लगा. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: दागी कंगन – कालगर्ल मुन्नी की दास्तान

Best Hindi Kahani: ‘‘मुन्नी, तुम यहां पर कैसे?’’ ये शब्द कान में पड़ते ही मुन्नी ने अपनी गहरी काजल भरी निगाहों से उस शख्स को गौर से देखा और अचानक ही उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘निहाल भैया…’’

वह शख्स हामी भरते हुए बोला, ‘‘हां, मैं निहाल.’’

‘‘लेकिन भैया, आप यहां कैसे?’’

‘‘यही सवाल तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि मुन्नी तुम यहां कैसे?’’

अपनी आंखों में आए आंसुओं के सैलाब को रोकते हुए मुन्नी, जिस का असली नाम मेनका था, बोली, ‘‘जाने दीजिए भैया, क्या करेंगे आप जान कर. चलिए, मैं आप को किसी और लड़की से मिलवा देती हूं. मुझ से तो आप के लिए यह काम नहीं होगा.’’

‘‘नहीं मुन्नी, मैं हकीकत जाने बगैर यहां से नहीं जाऊंगा. आखिर तुम यहां आई कैसे? तुम्हें मालूम है कि तुम्हारा भाई राकेश और तुम्हारे मम्मीपापा कितने दुखी हैं?

‘‘वे सब तुम्हें ढूंढ़ढूंढ़ कर हार गए हैं. पुलिस में रिपोर्ट की, जगहजगह के अखबारों में तुम्हारी गुमशुदगी के बारे में खबर दी, लेकिन तुम्हारा कुछ पता ही नहीं चला.

‘‘और आज… जब इतने बरसों बाद तुम मिली, तो इन हालात में… एक कालगर्ल के रूप में.

‘‘मुन्नी, सचसच बताओ, तुम यहां कैसे पहुंची. हमें तो लगा कि तुम प्रकाश, वह तुम्हारा प्रेमी, के साथ भाग गई?थी.

‘‘कितनी पूछताछ की राकेश ने उस से तुम्हारे लिए, लेकिन वह तो कुछ दिनों के लिए खुद ही नदारद था.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं निहाल भैया, लेकिन अब सच जान कर भी क्या फायदा सब मेरी ही तो गलती है, सो सजा भुगत रही हूं.’’

‘‘नहीं मुन्नी, ऐसा मत कहो. तुम मुझे सच बताओ.’’

मुन्नी कहने लगी, ‘‘भैया, आप ने जो सुना था, सच ही था. मैं और प्रकाश एकदूसरे को प्यार करते थे. वह मेरे कालेज का दोस्त था. आप को याद होगा कि हम दोनों कालेज से एक फील्ड ट्रिप के लिए शहर से बाहर गए थे. वहीं पर हमारे मन में प्यार के अंकुर फूटे और धीरेधीरे हमारा प्यार परवान चढ़ गया था.

‘‘कालेज की पढ़ाई पूरी होतेहोते हमा घर में मेरी सगाई की बातें चलने लगी थीं. मैं ने पापामम्मी को जैसे ही प्रकाश के बारे में बताया, वे आगबबूला हो उठे. मुझे लगा कि कहीं वे लोग मेरी शादी जबरदस्ती किसी और से न करा दें. सो, मैं ने सारी बात प्रकाश को बताई.

‘‘प्रकाश ने मुझे भरोसा दिलाया और कहा, ‘मेनका, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें अपने से अलग नहीं होने दूंगा. बस, तुम मुझ पर?भरोसा रखो.’

‘‘मुझे उस पर पूरा भरोसा था. अब मैं घर में होने वाली हर बात उसे बताने लगी थी. और जैसे ही मुझे लगा कि पापामम्मी मेरी मरजी के खिलाफ शादी तय करने जा रहे हैं, मैं ने प्रकाश को सब बता दिया.

‘‘उसी शाम वह मुझ से मिला. मैं खूब रोई और बोली, ‘मुझे कहीं भगाकर ले चलो प्रकाश, वरना मैं किसी और की हो जाऊंगी और हम हमेशा के लए बिछड़ जाएंगे.’

‘‘प्रकाश ने कहा, ‘मैं अपने घर में बात करता हूं मेनका, तुम बिलकुल चिंता मत करो.’

‘‘अगले ही दिन प्रकाश मेरे लिए अपनी मम्मी के दिए कंगन ले कर आया और बड़े ही अपनेपन से बोला, ‘मेनका, यह मां का आशीर्वाद है हमारे लिए. वे तो तुम्हें बहू बनाने के लिए राजी हैं, पर पिताजी नहीं मान रहे?हैं. सो, हम दोनों घर से भाग जाते?हैं.’

‘‘मैं ने पूछा, ‘लेकिन, हम भाग कर जाएंगे कहां?’

‘‘वह बोला, ‘वैसे तो हमारे पास कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन वाराणसी में मेरा एक दोस्त रहता है. मैं ने उस से बात की है. वह वहां नौकरी करता है. हम उसी के पास चलेंगे. वह अपनी ही कंपनी में मेरे लिए नौकरी का इंतजाम भी कर देगा.’

‘‘प्रकाश ने यह भी समझाया, ‘हम वहां रजिस्टर्ड शादी कर लेंगे और फिर अपने घर का इंतजाम भी वहीं कर लेंगे. शायद कुछ समय में हमारे मम्मीपापा भी इस शादी को रजामंदी दे दें.’

‘‘मुझे उस की बातों में सचाई नजर आई और मैं ने उस के साथ भाग जाने का फैसला कर लिया.

‘‘अगले ही दिन मैं घर से कुछ कपड़े व रुपए ले कर रेलवे स्टेशन पहुंच गई.

‘‘हम दोनों प्रकाश के दोस्त के घर पहुंचे और वहां 2 दिन में ही प्रकाश ने नौकरी शुरू कर दी.

‘‘5 दिन बाद उस का दोस्त मुझ से बोला, ‘भाभी, प्रकाश ने आप को बाहर कहीं बुलाया है. आप तैयार हो जाइए. मैं आप को वहां ले चलता हूं.’

‘‘एक बार तो मुझे लगा कि प्रकाश ने मुझे क्यों नहीं बताया, पर अगले ही पल मैं उस के दोस्त के साथ चली गई. मैं जहां पहुंची, वहां प्रकाश पहले से ही मौजूद था.

‘‘उस ने मुझे एक आंटी से मिलवाया और बोला, ‘जिस कंपनी में मैं काम करता हूं, ये उस की मालकिन हैं.’

‘‘वे आंटी भी मुझ से बड़े प्यार से मिलीं. कुछ देर बाद प्रकाश बोला, ‘मेनका, मैं कुछ देर के लिए बाहर हो कर आता हूं, तब तक तुम यहीं रहो.’

‘‘एक बार को मुझे घबराहट हुई, पर आंटी की प्यार भरी छुअन में मुझे मां का रूप नजर आया, सो मैं वहां रुक गई. उस के बाद मेरी जिंदगी में जैसे तूफान आ गया. मुझे एक ही रात में समझ आ गया कि प्रकाश मुझे थोड़े से रुपयों के लालच में उन आंटी के हाथों बेच गया था.

‘‘अब हर रात अलगअलग तरह के ग्राहक आने लगे. मैं ने आंटी के खूब हाथपैर जोड़े और रोरो कर कहा, ‘आंटी प्लीज मुझे जाने दीजिए, मैं भले घर की लड़की हूं. मेरे मम्मीपापा, भाई क्या सोचेंगे मेरे बारे में.’

‘‘लेकिन, आंटी ने मेरी एक न सुनी. पहले 2 लड़कों ने मेरा बलात्कार किया और मुझे कई दिन तक भूखा रखा गया. जब मैं मानी, तब खाना दिया गया और इलाज भी कराया गया. सब लड़कियों ने कहा कि इन की बात मान जाओ, क्योंकि बाहर तो अब कोई अपनाएगा ही नहीं. मैं रोज सजधज कर तैयार होने लगी.

‘‘लेकिन, मुझे बारबार अपने किए पर पछतावा होता. एक बार वहां से भागने की कोशिश भी की, पर पकड़ी गई. उस रात आंटी ने मेरी खूब पिटाई की और उन के दलाल भूखे भेडि़यों की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े.

‘‘वहां की एक लड़की प्रिया ने मुझे समझाया, ‘मेनका, अब तुम्हारे पास इस नरक से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं?है. तुम्हारे साथ कितनी बार तो आंटी के आदमियों ने गैंगरेप किया, तुम्हें क्या हासिल हुआ? इस से तो ग्राहकों की भूख मिटाओगी, कम से कम पैसे तो मिलेंगे. समझौता करने में ही समझदारी है.’

‘‘उस समय मुझे प्रिया की बात ठीक ही लगी और मैं ने अपनेआप को आंटी को सौंप दिया. आंटी बहुत खुश हुईं और मुझे प्यार से रखने लगीं. बस, तब से मेरी ग्राहक को पटाने की ट्रेनिंग शुरू हुई.

‘मुझे दूसरी औरतों के साथ रात के समय सजधज कर भेज दिया जाता. सड़क के किनारे खड़ी हो कर दूसरी लड़कियां अपनी अदाओं से आतेजाते मर्दों को रिझातीं. मैं उन्हें देख कर दंग रह जाती. हर कोई मोटा मुरगा फंसाने की फिराक में रहती.’’

मेनका की बात सुन कर निहाल ने थोड़ा गुस्से में पूछा, ‘‘तुम जब बाहर निकली, तो रात के समय वहां से भाग क्यों नहीं गई?’’

‘‘कैसी बातें करते हैं भैया आप. इतना आसान होता, तो क्या मैं इस धंधे में टिकी रहती? आंटी के दलाल पूरी चौकसी रखते हैं हम पर.’’ मेनका की कहानी सुन कर निहाल की आंखों से आंसू बह निकले.

मेनका आगे बताने लगी, ‘‘दूसरी लड़कियों के साथ मैं भी धीरेधीरे ग्राहक पटाने की ट्रेनिंग ले चुकी थी. शुरू में तो ग्राहक पटाना भी बहुत बुरा लगता था. रात के समय सड़क पर घटिया हरकतें कर अपने अंग दिखा कर उन्हें पटाना पड़ता था.

‘‘उस पर भी लड़कियों में आपस में होड़ मची रहती थी. मैं किसी ग्राहक को जैसेतैसे पटाती, तो रास्ते से ही दूसरी लड़कियां कम पैसों में उसे खींच ले जातीं.

‘‘भैया, मैं नई थी. मुझ से ग्राहक पटते ही नहींथे, तो आंटी बहुत नाराज होतीं. सड़क पर ग्राहक ढूंढ़ने के लिए खड़ी होती, तो लोगों की लालची मुसकान देख कर मेरा दिल दहल जाता. जब कोई पास आ कर बात करता, तो डर के मारे दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. कोईकोई तो मेरे पूरे बदन को छू कर भी देखता.

‘‘बस, इतना ही  और उस के लिए तुम्हारी देह का सौदा हर रात होता है,’’ निहाल ने कहा. उस की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे, जिन्हें रोकने की वह नाकाम कोशिश कर रहा था.

‘‘बहुत बुरा हाल था भैया. एक बार एक आदमी बहुत नशे में था. मुझे उस के मुंह से आती शराब की बदबू बरदाश्त नहीं हुई और मैं ने उस से अपना मुंह फेर लिया. वह मुझे गाली देते हुए बोला, ‘तू खुद क्या दूध की धुली है?’

‘‘और उस ने मुझे पूरे बदन पर सारी रात दांतों से काट डाला. मैं बहुत रोई, चीखीचिल्लाई, पर कोई मेरी मदद को न आया.

‘‘अगले दिन आंटी ने चमड़ी उधेड़ दी और बोली, ‘हर ग्राहक को नाराज कर देती है. तेरे प्रेमी को ऐसा क्या दिखा था तुझ में क्या सुख देती तू उस को इसीलिए शायद यहां सड़ने को पटक गया तुझे.’

‘‘यह सब सुन कर मुझे बहुत बुरा लगा. मैं ने सोच लिया कि अब काम करूंगी, तो ठीक से.’’

‘‘फिर तुम वाराणसी से मुंबई कैसे पहुंच गई मुन्नी?’’ निहाल ने पूछा.

‘‘वाराणसी छोटा सा शहर है. लोग पैसा कम देते हैं. ऊपर से कई तरह की छूत की बीमारियां हमें दे जाते हैं. जो पैसे मिलते, वे बीमारियों पर ही खर्च हो जाते.

‘‘एक बार मुंबई की कुछ लड़कियां हमें ट्रेनिंग देने आईं, तो मैं ने उन से कहा कि मुझे भी मुंबई ले चलिए. कम से कम बड़े शहर के लोग रकम तो अच्छी देंगे. मैं थोड़ी पढ़ीलिखी हूं और अंगरेजी भी बोलती हूं, इसलिए उन्हें मैं मुंबई के लायक लगी. सो, मुझे यहां भेज दिया. बस, तब से मैं ने इसे अपने कारोबार की तरह अपना लिया.

‘‘कई बार रेड पड़ी. थाने भी गई. शुरू में डरती थी, लेकिन अब मन को मजबूत कर लिया. अब कोई डर नहीं. जब तक जिंदगी है, इसी नरक में जीती रहूंगी. अब तो ग्राहक भी सोशल मीडिया और ह्वाट्सऐप पर मिल जाते हैं. कोडवर्ड होता है, जिस से हमारे दलाल बात करते हैं,’’ और वह ठहाका लगा कर हंस पड़ी. निहाल मेनका के चेहरे पर ढिठाई की हंसी पढ़ चुका था, फिर भी उस ने पूछा, ‘‘निकलना चाहती हो इस नरक से?’’

वह बोली, ‘‘कौन निकालेगा भैया… आप और उस के बाद कहां जाऊंगी? अपने मम्मीपापा के घर या आप के घर? कौन अपनाएगा मुझे?

‘‘निहाल भैया, अब तो मेरी अर्थी इन गंदी गलियों से ही उठेगी,’’ वह बोली और फिर जोर से ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

‘‘भैया, मेरी तो सारी बातें पूछ लीं, पर आप ने अपनी नहीं बताई कि आज आप यहां कैसे? आप की शादी हुई या नहीं? आप तो बहुत नेक इनसान हुआ करते थे, फिर यहां कैसे?’’ मेनका ने पूछा.

‘‘पूछो मत मुन्नी, मेरी पत्नी किसी और के साथ संबंध रखती है. मुझे तो जैसे नकार ही दिया है. 2 बच्चे भी हैं. मन तो उन के साथ लगा लेता हूं, पर तुम से कैसे कहूं? तन की भूख मिटाने यहां चला आता हूं कभीकभी.

‘‘मुझे नहीं मालूम था कि आज इस जगह तुम से मिलना होगा. सच पूछो तो समझ नहीं आ रहा है कि आज मैं तुम्हें गलत समझूं या सही.

‘‘तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियां हम मर्दों को सुख देती हैं और हमारे घर टूटने से बचाती हैं. हम मर्द तो एक रात का सुख ले कर खुश हो जाते हैं. पर हमारे चलते मजबूरी की मारी लड़कियां अपनी जिंदगी को इस नरक में जीने के लिए मजबूर होती हैं और इन बंद गलियों में कीड़ेमकौड़े की जिंदगी जीती?हैं.

‘‘मुझे माफ करो मुन्नी, यह लो तुम्हारी एक रात की कीमत,’’ इतना कह कर निहाल ने मुन्नी की तरफ पैसे बढ़ा दिए.

मेनका ने कहा, ‘‘भैया, मेरा दर्द बांटने के लिए शुक्रिया, पर किसी को घर में न बताना कि मैं यहां हूं. मेरे मम्मीपापा और भाई मुझे गुमशुदा ही समझ कर जीते रहें तो अच्छा, वरना वे तो जीतेजी मर जाएंगे. और इस रात की कोई कीमत नहीं लूंगी आप से.

‘‘आज आप ने मेरा दर्द बांटा है, किसी दिन शायद मैं आप का दर्द बांट सकूं. अपनी बहन समझ कर आना चाहें तो फिर आ जाइए कभी.’’ सुबह होने को थी. निहाल चुपचाप वहां से उठ कर अपने घर आ गया. Best Hindi Kahani

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें