राइटर- सोनाली करमरकर
रश्मि घर की कमाने वाली अकेली सदस्य थी, जाहिर था कि हर बात उसे पूछ कर की जाती थी. लिहाजा, वह घर के हालात और ठीक करने के लिए जीजान से जुट गई.
समय बीतता गया. भाईबहन बड़े हो गए. मम्मी ने रश्मि से सलाहमशवरा कर के छोटी बेटी की शादी सीधेसादे अभय से कर दी.
पहले तो रश्मि ने कभी इस बात पर गौर नहीं किया, लेकिन अब जब उस की छोटी बहन घर आती और अपने पति और ससुराल वालों के गुण गाती, तो रश्मि को भी शादी करने की चाहत होने लगी.
एक दिन रश्मि ने शरमाते हुए मम्मी से बात छेड़ी. पापा पीछे खड़े हो कर सब सुन रहे थे.
“कैसी बात करती हो बेटी? घर में तुम अकेली कमाने वाली हो. अभी तो तुम्हारा भाई पढ़ रहा है. तुम शादी कर के चली गई, तो हमारा सहारा चला जाएगा. 1-2 साल और रुक जाओ. जब तुम्हारे भाई की नौकरी लगेगी, तो हम तुम्हारा भी ब्याह कर देंगे,” पापा ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.
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दिन यों ही बीतते रहे, मौसम बदलते रहे. रश्मि हमेशा सोचती, ‘बस और थोड़ा इंतजार… फिर मेरी जिंदगी में भी बहारें होंगी…’
मगर… बहारें तो आईं, लेकिन रश्मि की जिंदगी में नहीं, भाई की जिंदगी में.
हालात ने अजीब सी करवट ली. घर में रहने वाली पैसों की तंगी के चलते भाई अलग रहना चाहता था. जिस दिन उसे पहली तनख्वाह मिली, उस ने मम्मी के सामने एक लड़की ला कर खड़ी कर दी और बोला, “मम्मी, यह है तुम्हारी होने वाली बहू. मैं अपनी नौकरी लगने तक रुका था. मैं दीदी पर एक और बोझ नहीं डालना चाहता. हम दोनों अगले महीने कोर्ट मैरिज कर रहे हैं…”
“अरे वाह बेटा, अच्छी है तुम्हारी पसंद. मुझे बहू अच्छी लगी. लेकिन बेटा, पहले हमें रश्मि के बारे में सोचना चाहिए. उस की भी तो उम्र बढ़ रही है. पहले उस के हाथ पीले कर दें, बाद में तुम्हारी शादी…”
“एक मिनट मम्मी, हम… मेरा मतलब है कि मैं और मेरी पत्नी शादी के बाद अलग रहने वाले हैं.”
“यह क्या कह रहा है तू ?” मां ने हैरानी से पूछा.
“हां मम्मी, मैं तंग आ गया हूं बचपन से गरीबी में रह कर. अब मैं खुली हवा में सांस लेना चाहता हूं. दीदी की शादी की उम्र अब वैसे भी गुजर चुकी हे. उन के लिए तुम्हें कहां रिश्ता मिलने वाला है? जो जैसा है उसे वैसा ही रहने दो.
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“और हां, ध्यान से सुनो… हम दोनों शादी के बाद सीधे हमारे नए घर में चले जाएंगे. हम ने अपने लिए घर देख रखा है. मुझ से किसी बात की उम्मीद मत रखना. हम अब चलते हैं. सीमा को उस के घर छोड़ कर मुझे किसी काम से जाना है,” बात खत्म कर के भाई अपनी मंगेतर सीमा के साथ वहां से चलने को हुआ.
वे दोनों कमरे से बाहर आए तो रश्मि को वहां खड़ी देख कर आंखें चुरा कर निकल गए. भाई को इस तरह से जाते देख कर रश्मि निढाल सी सोफे पर गिर पड़ी. उसे जिंदगी की सारी खुशियां हाथों से छूटती नजर आईं… अपने लोगों का इस तरह रंग बदलना उस के मन में एक सवालिया निशान छोड़ गया.
जिस दिन भाई घर से निकला उस रात कोई भी नहीं सो सका. मम्मी पापा से कह रही थीं, “कैसे करेंगे अब? बेटे ने तो पल्ला झाड़ लिया. वह हमारे बुढ़ापे का सहारा था. बेटी की शादी कैसे करेंगे अब? हमारे पास तो पूंजी भी नहीं है…”
“यहां हमारे खाने के लाले पड़े हैं और तुम्हें बेटी की शादी की पड़ी है? भूल जाओ अब उस की शादी. जिंदगी जिस रफ्तार से चल रही है उसे ऐसे ही चलने दो. उम्र गुजर गई है अब रश्मि की शादी की.
“हर बार लड़का ही सहारा हो, यह जरूरी तो नहीं. लड़की भी तो घर का सहारा बन सकती है. बेटी को पालना अगर हमारा फर्ज है, तो उस का भी फर्ज है हमारा सहारा बनने का. अब सो जाओ,” कह कर उन्होंने करवट बदली, पर सामने रश्मि को देख कर वे चौंक गए.
“अरे, मैं तो बस यों ही गुस्से में कह रहा था. आज बेटे ने साथ छोड़ा है तो जरा सा मायूस हूं, लेकिन तू फिक्र मत कर. सब ठीक हो होगा. एक दिन तुम्हें भी विदा करूंगा. मैं कुछ न कुछ सोचता हूं…” पापा ने बात संभाल तो ली, पर उन के कौन से रूप पर भरोसा करे, रश्मि समझ नहीं पाई.
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घर के खर्चे अब काफी कम हो गए थे. रश्मि की तनख्वाह बढ़ गई थी. मम्मी थोड़ेथोड़े पैसे जमा करती रहीं. पति को हो न हो, उन्हें अपने बेटी की जरूर फिक्र थी.
एक दिन लड़के वाले रश्मि को देखने आए. लड़कलड़की ने एकदूसरे को पसंद किया. बात आगे बढ़ती गई.
‘‘डूयू बिलीव इन वाइब्स?’’ दक्षा द्वारा पूरे गए इस सवाल पर सुदेश चौंका. उस के चेहरे के हावभाव तो बदल ही गए, होंठों पर हलकी मुसकान भी तैर गई. सुदेश का खुद का जमाजमाया कारोबार था. वह सुंदर और आकर्षक युवक था. गोरा चिट्टा, लंबा, स्लिम,
हलकी दाढ़ी और हमेशा चेहरे पर तैरती बाल सुलभ हंसी. वह ऐसा लड़का था, जिसे देख कर कोई भी पहली नजर में ही आकर्षित हो जाए. घर में पे्रम विवाह करने की पूरी छूट थी, इस के बावजूद उस ने सोच रखा था कि वह मांबाप की पसंद से ही शादी करेगा.
सुदेश ने एकएक कर के कई लड़कियां देखी थीं. कहीं लड़की वालों को उस की अपार प्यार करने वाली मां पुराने विचारों वाली लगती थी तो कहीं उस का मन नहीं माना. ऐसा कतई नहीं था कि वह कोई रूप की रानी या देवकन्या तलाश रहा था. पर वह जिस तरह की लड़की चाहता था, उस तरह की कोई उसे मिली ही नहीं थी.
सुदेश का अलग तरह का स्वभाव था. उस की सीधीसादी जीवनशैली थी, गिनेचुने मित्र थे. न कोई व्यसन और न किसी तरह का कोई महंगा शौक. वह जितना कमाता था, उस हिसाब से उस के कपड़े या जीवनशैली नहीं थी. इस बात को ले कर वह हमेशा परेशान रहता था कि आजकल की आधुनिक लड़कियां उस के घरपरिवार और खास कर उस के साथ व्यवस्थित हो पाएंगी या नहीं.
अपने मातापिता का हंसताखेलता, मुसकराता, प्यार से भरपूर दांपत्य जीवन देख कर पलाबढ़ा सुदेश अपनी भावी पत्नी के साथ वैसे ही मजबूत बंधन की अपेक्षा रखता था. आज जिस तरह समाज में अलगाव बढ़ रहा है, उसे देख कर वह सहम जाता था कि अगर ऐसा कुछ उस के साथ हो गया तो…
सुदेश की शादी को ले कर उस की मां कभीकभी चिंता करती थीं लेकिन उस के पापा उसे समझाते रहते थे कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. सुदेश भी वक्त पर भरोसा कर के आगे बढ़ता रहा. यह सब चल रहा था कि उस से छोटे उस के चचेरे भाई की सगाई का निमंत्रण आया. इस से सुदेश की मां को लगा कि उन के बेटे से छोटे लड़कों की शादी हो रही हैं और उन का हीरा जैसा बेटा किसी को पता नहीं क्यों दिखाई नहीं देता.
चिंता में डूबी सुदेश की मां ने उस से मेट्रोमोनियल साइट पर औनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने को कहा. मां की इच्छा का सम्मान करते हुए सुदेश ने रजिस्ट्रेशन करा दिया. एक दिन टाइम पास करने के लिए सुदेश साइट पर रजिस्टर्ड लड़कियों की प्रोफाइल देख रहा था, तभी एक लड़की की प्रोफाइल पर उस की नजर ठहर गई.
ज्यादातर लड़कियों ने अपनी प्रोफाइल में शौक के रूप में डांसिंग, सिंगिंग या कुकिंग लिख रखा था. पर उस लड़की ने अपनी प्रोफाइल में जो शौक लिखे थे, उस के अनुसार उसे ट्रैवलिंग, एडवेंचर ट्रिप्स, फूडी का शौक था. वह बिजनैस माइंडेड भी थी.
उस की हाइट यानी ऊंचाई भी नौर्मल लड़कियों से अधिक थी. फोटो में वह काफी सुंदर लग रही थी. सुदेश को लगा कि उसे इस लड़की के लिए ट्राइ करना चाहिए. शायद लड़की को भी उस की प्रोफाइल पसंद आ जाए और बात आगे बढ़ जाए. यही सोच कर उस ने उस लड़की के पास रिक्वेस्ट भेज दी.
सुदेश तब हैरान रह गया, जब उस लड़की ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. हिम्मत कर के उस ने साइट पर मैसेज डाल दिया. जवाब में उस से फोन नंबर मांगा गया. सुदेश ने अपना फोन नंबर लिख कर भेज दिया. थोड़ी ही देर में उस के फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर होने की वजह से सुदेश थोड़ा असमंजस में था. फिर भी उस ने फोन रिसीव कर ही लिया.
दूसरी ओर से किसी संभ्रांत सी महिला ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं दक्षा की मम्मी बोल रही हूं. आप की प्रोफाइल मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैं चाहती हूं कि आप अपना बायोडाटा और कुछ फोटोग्राफ्स इसी नंबर पर वाट्सऐप कर दें.’’
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सुदेश ने हां कह कर फोन काट दिया. उस के लिए यह सब अचानक हो गया था. इतनी जल्दी जवाब आ जाएगा और बात भी हो जाएगी, सुदेश को उम्मीद नहीं थी. सोचविचार छोड़ कर उस ने अपना बायोडाटा और फोटोग्राफ्स वाट्सऐप कर दिए.
फोन रखते ही दक्षा ने मां से पूछा, ‘‘मम्मी, लड़का किस तरह बातचीत कर रहा था? अपने ही इलाके की भाषा बोल रहा था या किसी अन्य प्रदेश की भाषा में बात कर रहा था?’’
‘‘बेटा, फिलहाल वह दिल्ली में रह रहा है और दिल्ली में तो सभी प्रदेश के लोग भरे पड़े हैं. यहां कहां पता चलता है कि कौन कहां का है. खासकर यूपी, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान वाले तो अच्छी हिंदी बोल लेते हैं.’’ मां ने बताया.
‘‘मम्मी, मैं तो यह कह रही थी कि यदि वह अपने ही क्षेत्र का होता तो अच्छा रहता.’’ दक्षा ने मन की बात कही. लड़का गढ़वाली ही नहीं, अपने इलाके का ही है. मां ने बताया तो दक्षा खुश हो उठी.
शशांक अपने आफिस में काम कर रहा था कि चपरासी ने आ कर कहा, ‘‘साहब, आप को बनर्जी बाबू याद कर रहे हैं.’’ उत्पल बनर्जी कंपनी के निदेशक थे. पीठ पीछे उन्हें सभी बंगाली बाबू कह कर संबोधित करते थे. कंपनी विद्युत संयंत्रों की आपूर्ति, स्थापना और रखरखाव का काम करती थी. कंपनी के अलगअलग प्रांतों में विद्युत निगमों के साथ प्रोजेक्ट थे. शशांक इस कंपनी में मैनेजर था.
‘‘यस सर,’’ शशांक ने बनर्जी साहब के कमरे में जा कर कहा. ‘‘आओ शशांक,’’ इतना कह कर उन्होंने उसे बैठने का इशारा किया.
शशांक के दिमाग में खतरे की घंटी बज उठी. उसे लगा कि उस की हालत उस बकरे जैसी है जिसे पूरी तरह सजासंवार दिया गया है और बस, गर्दन काटने के लिए ले जाना बाकी है. शशांक ने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया और चुपचाप कुरसी पर बैठ गया. ‘‘तुम्हारा फरीदाबाद का प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?’’
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‘‘सर, बहुत अच्छा चल रहा है. निर्धारित समय पर काम हो रहा है और भुगतान भी ठीक समय से हो रहा है.’’ ‘‘बहुत अच्छा है. मुझे तुम से यही उम्मीद थी, पर मैं तुम्हें ऐसा काम देना चाहता हूं जो सिर्फ तुम ही कर सकते हो.’’
शशांक चुपचाप बैठा अपने निदेशक मि. बनर्जी को देखता रहा. उसे लगा कि बस, गर्दन पर तलवार गिरने वाली है. ‘‘शशांक, तुम्हें तो पता है कि लखनऊ वाले प्रोजेक्ट में कंपनी की बदनामी हो रही है. भुगतान बंद हो चुका है. हमें पैसा वापस करने का नोटिस भी मिल चुका है. मैं चाहता हूं कि तुम वह काम देखो.’’
‘‘लेकिन वह काम तो जतिन गांगुली देख रहे हैं,’’ शशांक ने कहा. ‘‘मैं ने फैसला किया है कि अब कंपनी के हित में लखनऊ का प्रोजेक्ट तुम देखोगे और जतिन गांगुली फरीदाबाद का प्रोजेक्ट संभालेगा.’’
शशांक की इच्छा हुई कि कह दे कि उस के साथ इसलिए ज्यादती हो रही है क्योंकि वह बंगाली नहीं है. उस ने सोचा कि कंपनी अध्यक्ष से जा कर मिले पर उसे याद आया कि कंपनी अध्यक्ष सेनगुप्ता साहब भी बंगाली हैं. वह भी बंगाली का ही साथ देंगे. शशांक अपने केबिन में जाने से पहले अपनी सहकर्मी वंदना के केबिन पर रुका.
‘‘वंदना, चलो काफी पीते हैं. मुझे तुम से कुछ पर्सनल बात करनी है.’’ काफी पीतेपीते शशांक ने उसे सारी बात बता दी.
‘‘अगले 3 माह में प्रमोशन के लिए निर्णय लिए जाएंगे. यह मामला जतिन गांगुली के प्रमोशन का है. लखनऊ प्रोजेक्ट की जो उस ने हालत की है, उस से प्रमोशन तो दूर उसे कंपनी से निकाल देना चाहिए,’’ वंदना ने कहा. ‘‘क्या मैं सेनगुप्ता साहब से मिलूं?’’
‘‘नहीं, उस से फायदा नहीं होगा. तुम्हें लखनऊ जाना पडे़गा पर फरीदाबाद प्रोजेक्ट की फाइलों की सूची बना कर, आज की स्थिति की रिपोर्र्ट बना कर तुम जतिन गांगुली के दस्तखत ले लेना और उस की कापी सेनगुप्ता साहब को भेज देना. प्रोजेक्ट में गड़बड़ होने पर वे लोग तुम्हें दोष दे सकते हैं,’’ वंदना ने सुझाव दिया. कुछ समय तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही.
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‘‘शशांक, तुम से एक बात पूछना चाहती हूं. मुझे दोस्त समझ कर सचसच बताना,’’ वंदना बोली. ‘‘क्या बात है?’’
‘‘कहीं तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी सरिता के बीच तनाव तो नहीं?’’ ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’
‘‘पिछले हफ्ते तुम फरीदाबाद प्रोजेक्ट की मीटिंग में थे तब शाम को 8 बजे सरिता का फोन मेरे घर पर आया था. तुम्हारे बारे में पूछ रही थी.’’ शशांक को अपनी पत्नी पर क्रोध आ गया. पर उस ने कहा, ‘‘उस दिन मैं उसे बताना भूल गया था. इसलिए वह परेशान होगी.’’
‘‘शशांक, प्रोजेक्ट और प्रमोशन के बीच में अपने परिवार को मत भूलो,’’ वंदना ने गंभीरता से कहा. ‘‘आज कोई मीटिंग नहीं थी क्या? जल्दी आ गए,’’ सरिता ने शशांक के घर पहुंचने पर व्यंग्य भरे लहजे में पूछा.
शशांक के मन में क्रोध भरा हुआ था. वह बिना जवाब दिए अपने कमरे में चला गया. ‘‘मुझे लखनऊ वाले प्रोजेक्ट पर काम दिया गया है. कल ही मैं 1 सप्ताह के लिए लखनऊ जा रहा हूं,’’ उस ने रात को खाना खाते हुए सरिता से कहा.
‘‘अकेले जा रहे हो? क्या तुम्हारी प्यारी दोस्त वंदना नहीं जा रही है?’’ शशांक को लगा कि उस के संयम की सीमा पार हो चुकी है और वह अभी सरिता के गाल पर तमाचा लगा देगा. पर वह आग्नेय नेत्रों से सरिता को देख कर आधा खाना खा कर ही उठ गया.
दूसरे दिन लखनऊ पहुंच कर शशांक कंपनी के अतिथिगृह में ठहरा, जहां उस की मुलाकात अतिथिगृह के प्रभारी हरिराम से हुई. ‘‘नमस्ते साहब,’’ हरिराम ने हाथ जोड़ कर कहा.
कुछ देर इधरउधर की बातें होती रहीं. फिर मिहिर ने कहा, ‘‘अब आप लोग मेरे घर कब आ रहे हैं? ऐसा करो मिताली, नवीनजी को ले कर इसी इतवार को आ जाओ.’’
‘‘मिहिर, इस इतवार को तो नवीनजी का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है.’’
‘‘मिताली, तुम अकेले ही चली जाना,’’ नवीन बोले, ‘‘मैं फिर कभी चला जाऊंगा.’’
मिहिर घर लौट कर आया तो उस की बेचैनी और बढ़ गई थी.
मिताली इतवार को नियत समय पर मिहिर के घर पहुंच गई. घर में इधरउधर देख कर बोली, ‘‘मिहिर, और कोई दिखाई नहीं दे रहा है, क्या सब लोग कहीं गए हैं?’’
‘‘मिताली, मैं यहां अकेला रहता हूं. दरअसल, मैं जिस लड़की से प्यार करता था उस की शादी कहीं और हो गई. मैं ने निश्चय किया था कि उस के अलावा किसी और लड़की से मैं विवाह नहीं करूंगा और मैं ने ऐसा ही किया.’’
मिताली उसे देख कर हैरान रह गई. बोली, ‘‘पर मिहिर, कब तक व कैसे अकेले जीवन व्यतीत करेंगे आप?’’
‘‘मिताली, मैं अकेला बेशक हूं पर उस की यादें मेरे साथ हैं. वही मेरे जीने का सहारा है. यही नहीं मैं तो अब उसे अकसर प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देखता हूं.’’
‘‘तो क्या वह भी इसी शहर में है?’’
‘‘हां, मिताली,’’ मिहिर बोला, ‘‘क्या तुम उस से मिलना चाहोगी, अच्छा चलो, मैं तुम्हें अभी उस से मिलवाता हूं,’’ और भाववेश में मिताली को ले जा कर मिहिर शीशे के सामने खड़ा कर के बोला, ‘‘देखो मिताली, यही है मेरा प्यार.’’
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‘‘मिहिर, यह क्या मजाक है?’’ दूर छिटक कर मिताली गुस्से से बोली.
मिहिर ने उसे सबकुछ सचसच बता डाला और अलमारी से निकाल कर वह ताजमहल व ब्रैसलेट उस के सामने रख दिया.
हतप्रभ खड़ी मिताली कभी मिहिर को तो कभी ब्रैसलेट व सफेद संगमरमर के ताजमहल को देख रही थी जिस पर छोटेछोटे शब्दों में खुदा था, ‘मिताली के लिए’.
मिताली एक अजीब दुविधाजनक स्थिति लिए घर लौटी थी. एक तरफ नवीन था जिस के नाम का मंगलसूत्र उस के गले में पड़ा है. दूसरी तरफ मिहिर, जिस के प्यार का अंकुर कभी उस के मन में फूटा था, किंतु वह फूल पुष्पित न हो सका. और आज इतने सालों के बाद, न जाने कैसे अनायास ही उस में कोंपलें निकलने लगीं.
मिताली रात भर करवटें बदलती रही. सुबह उठी तो सो न पाने के कारण आंखें लाल और सिर में तेज दर्द हो रहा था. नवीन उस की हालत देख कर परेशान हो उठा. अभी तक नौकरानी नहीं आई थी. अत: वह खुद ही चाय बना लाया.
‘‘मिताली, शायद तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है,’’ चाय का प्याला उस की तरफ बढ़ाते हुए नवीन बोला.
‘‘तैयार हो जाओ, मैं आफिस चलते समय तुम्हें डा. मिहिर को दिखा दूंगा.’’
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मिहिर के क्लीनिक में काफी भीड़ थी. अत: नवीन मिताली को छोड़ कर आफिस चला गया. मिताली का जब नंबर आया तो दोपहर हो चुकी थी. मिहिर ने मिताली की जांच की, कुछ दवाएं दीं और बोला, ‘‘चलो, आज हम दोनों बाहर लंच करते हैं.’’
आज मिताली बिना किसी विरोध के मिहिर के साथ चल दी. दोनों ने होटल में खाना खाया, बातें कीं. फिर मिताली घर लौट आई और मिहिर क्लीनिक लौट गया. मिताली का साथ मिहिर को आनंदित करता, उस में नए उत्साह का संचार हो जाता. मिताली को भी मिहिर का साथ सुखद लगता. अब वे हमेशा मिलते रहते.
उस दिन दोपहर से ही आसमान में बादल सूरज के साथ आंखमिचौली कर रहे थे. मिताली को बादलों वाले मौसम में बाहर घूमने में बड़ा मजा आता था. अत: दफ्तर से जल्दी घर लौट आई और फिर शाम को तैयार हो कर वह मिहिर से मिलने क्लीनिक चल दी.
मिहिर भी क्लीनिक से निकलने की तैयारी कर रहा था. अत: दोनों गाड़ी में बैठ कर मिहिर के घर आ गए.
‘‘मिताली, कितना अच्छा लगता है जब तुम साथ होती हो,’’ मिहिर उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘कभीकभी सोचता हूं कि यहां आ कर मैं ने कितना अच्छा किया, यदि यहां न आता तो तुम शायद कभी न मिलतीं.’’
‘‘मिहिर, यदि आप ने अपने दिल की बात तभी मुझ से कह दी होती तो आज आप को यों अकेला जीवन व्यतीत न करना पड़ता.’’
‘‘हां, मिताली, तुम ठीक कहती हो. पर क्या हम अपनी गलती सुधार नहीं सकते?’’
‘‘मिहिर, कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जो कभी सुधारी नहीं जा सकतीं. अच्छा, अब मैं चलती हूं, काफी देर हो गई,’’ कौफी का खाली कप मेज पर रखती हुई मिताली बोली.
मिताली बाहर निकली, किंतु तेज बारिश शुरू हो गई थी. उस ने सोचा कि वह निकल जाए. पता नहीं कब बारिश बंद हो, किंतु इतने खराब मौसम में मिहिर ने उसे जाने नहीं दिया. उस ने कहा कि बारिश बंद हो जाएगी तो वह खुद उसे छोड़ आएगा.
आज जैसे कुदरत भी उन्हें मिलाने को तैयार थी. मिताली की बुद्धि ने भावनाओं के ज्वार के सामने हथियार डाल दिए. उन्हें उचितअनुचित का भी ध्यान न रहा. मिहिर के प्रति मिताली के मन में निकली प्रेम की कोंपलों ने आखिर उस रेशमी डोर को काट ही डाला जिस से मिताली नवीन के साथ बंधी थी.
सुबह बारिश रुकी तो मिताली घर आई पर उस के दिल में एक अपराधबोध था कि उस ने ऐसा क्यों किया. पर वह भी क्या करती, मिहिर की आवाज कानों में पड़ते ही या उस के सामने रहते हुए उसे अपनी सुध ही कहां रहती है जो वह सहीगलत का फैसला कर पाती.
‘‘अरे मिताली, तुम रात भर कहां थीं,’’ नवीन बेचैन हो कर बोले, ‘‘मैं पूरी रात तुम्हें ले कर परेशान होता रहा.’’
‘‘नवीन, कल शाम को मैं
डा. मिहिर के क्लीनिक दवा लेने गई थी. लौटते समय एक सहेली के यहां चली गई. मैं तो बारिश में ही आ रही थी पर उस ने यह कह कर आने नहीं दिया कि इस बरसात में जा कर तुम अपनी तबियत और खराब करोगी क्या?’’
‘‘मिताली, आज शाम की टे्रन से सीमा दीदी, 3-4 दिनों के लिए यहां आ रही हैं. रात में जीजाजी का फोन आया था. कोई चीज मंगानी हो तो बता देना. दोपहर में मैं किसी से भिजवा दूंगा,’’ नवीन ने कहा.
मिताली ने सामान की सूची नवीन को दे दी.
करीब हफ्ते भर रह कर सीमा दीदी वापस चली गईं तब मिताली आफिस गई और फिर वहां से मिहिर के घर चली गई.
मिताली को देखते ही मिहिर बोला, ‘‘अरे तुम कहां थीं, न घर आईं न ही फोन किया. कहीं तुम उस दिन की घटना से नाराज तो नहीं हो?’’
मिताली कुछ बोली नहीं. उस ने मिहिर का माथा छू कर देखा तो वह तप रहा था.
‘‘अपने प्रति इतनी लापरवाही ठीक नहीं है, मिहिर. आप सब का इलाज कर सकते हैं, अपना नहीं,’’ मीठी झिड़की देते हुए मिताली बोली.
‘‘मिताली, मेरी बीमारी सिर्फ तुम ही दूर कर सकती हो. अकेलेपन की यह पीड़ा अब मैं और बरदाश्त नहीं कर सकता, न तन से न मन से. तुम मेरे जीवन में आ जातीं तो जीने की राह आसान हो जाती,’’ अपने दिल की बात मिहिर ने मिताली के समक्ष जाहिर कर दी.
‘‘मिहिर, क्या नवीन को छोड़ देना सही होगा?’’ मिताली ने तर्क पेश किया.
‘‘मेरे लिए मिताली, सही और गलत क्या है यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं कि तुम मेरा प्यार हो और नवीन तुम पर थोपा गया है. तुम्हारा व उस का साथ तो मात्र संयोग है.’’
सच ही तो कह रहे हैं मिहिर. मिताली ने सोचा. नवीन के साथ शादी तय करने के बाद ही तो घर वालों ने उसे बताया था. जबकि मिहिर को मैं ने पसंद किया था. मेरा पहला प्यार है मिहिर.
‘‘मिताली, आज तुम्हारी पसंद तुम्हारे सामने है, जिसे अपनाने में तुम्हें संकोच नहीं करना चाहिए. अपनी इच्छानुसार जीना हर व्यक्ति का अधिकार है. मिताली, तुम मेरे जीवन में आ जाओ. यही हमारी कायरता का प्रायश्चित्त होगा.’’
सच. आखिर सारा दोष मिहिर का तो नहीं, वह भी बराबर की दोषी है. यदि मिहिर ने संकोचवश अपने दिल की बात उस से नहीं कही तो उस ने भी कहां अपने प्यार का इजहार किया था. मिहिर कायर थे तो वही कहां हिम्मती थी. नहीं, अब और अकेलेपन की पीड़ा नहीं उठाने देगी वह. मिहिर के जीवन में आ कर खुशियां भर देगी. मिताली ने मन ही मन फैसला किया तो मिहिर के प्रति उस के हृदय में सहानुभूति की बाढ़ सी आ गई.
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मिताली ने फोन उठाया और नवीन का नंबर मिला कर बोली, ‘‘नवीन, मैं ने एक बार बताया था न कि मैं ने किसी से प्यार किया था. वह कोई और नहीं बल्कि डा. मिहिर हैं. आज मैं ने अपना खोया हुआ प्यार दोबारा पा लिया है.’’
‘‘मिताली, तुम यह क्या बहकी- बहकी बातें कर रही हो,’’ नवीन बोला, ‘‘प्लीज, जल्दी घर आओ. पतिपत्नी के रिश्ते क्या इतने सहज हैं जो तोड़ दिए जाएं.’’
‘‘नवीन, मुझे क्या करना है क्या नहीं, अपनी जिंदगी किस के साथ व्यतीत करनी है किस के साथ नहीं, यह मुझ से बेहतर और कौन जान सकता है? मैं ने काफी सोचसमझ कर फैसला लिया है. रही बात कानूनी काररवाई की तो वह हम बाद में पूरी कर लेंगे,’’ कह कर मिताली ने फोन बंद कर दिया.
रमा के पिता ने विजय को घर बुला कर कहा, ‘‘तुम घर के लड़के हो. रमा के लिए लड़के वाले देखने आए थे. उन्होंने रमा को पसंद कर लिया है. मैं चाहता हूं तुम मेरे साथ चलो. हम भी उन का घरपरिवार देख आएं.’’
विजय चाह कर भी मना न कर सका. लड़के वालों ने अच्छा स्वागतसत्कार किया. रमा के पिता ने विवाह की स्वीकृति दे दी.
विजय ने बातोंबातों में लड़के का मोबाइल नंबर ले लिया. साथ ही, घर का पता दिमाग में नोट कर लिया. विजय भलीभांति जानता था कि वह जो कर रहा है और करने वाला है, वह गलत है. लेकिन उस ने स्वयं को समझाया कि रास्ता गलत है, पर मकसद तो अपने प्यार को पाना है. विजय ने रमा के चरित्रहनन की झूठी कहानी बना कर लड़के के पते पर भेजी. साथ ही, रमा को पढ़ाने वाले प्रोफैसर, उस की सहेलियों को भी रमा के विषय में लिख भेजा.
एकदो पत्र तो उस ने महल्ले के लड़कों के नाम, एक अधेड़ प्रोफैसर के नाम इस तरह भेजे मानो रमा अपने प्रेम का इजहार कर रही हो. बात तेजी से फैली. कुछ लोगों ने रमा को पत्र का जवाब लिखा. कुछ लोगों ने उस के पिता को पत्र दिखाया. न जाने कितने प्रकार के अश्लील पत्र रमा की तरफ से विजय ने भेजे.
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कालेज, महल्ले में तमाशा खड़ा हो गया. रमा को समझ ही नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है. जितनी सफाई रमा और उस का परिवार देता, मामला उतना ही उछलता. लड़कियों को ले कर भारतीय समाज संवेदनहीन है. सब मजे लेले कर एकदूसरे को किस्से सुना रहे थे.
हालांकि समझने वाले समझ गए थे कि किसी ने शरारत की है लेकिन समझने के बाद भी लोग अश्लील पत्रों का आनंद ले कर एकदूसरे को सुना रहे थे. प्रोफैसर ने तो अपने कक्ष में बुला कर रमा को अपने सीने से लगा लिया और कहा, ‘‘मैं भी तुम से प्यार करता हूं.’’ जब रमा ने थप्पड़ जमाया तब प्रोफैसर को समझ आया कि वे धोखा खा गए.
लड़के के मोबाइल पर अज्ञात नंबर से रमा का प्रेमी बन कर विजय ने यह कहते हुए जान से मारने की धमकी दी कि रमा और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं पर घर वाले उस की जबरदस्ती शादी कर रहे हैं. यदि तुम ने शादी की तो मार दिए जाओगे.
लड़के वालों के परिवार ने रिश्ता तोड़ दिया. अच्छीभली लड़की का पूरे महल्ले में तमाशा बन गया. बेगुनाह होते हुए भी रमा और उस का परिवार किसी से नजर नहीं मिला पा रहे थे.
विजय को अनोखा आनंद आ रहा था. उस के मातापिता का उजाड़ चेहरा देख कर उसे लग रहा था कि मंजिल अब करीब है.
रमा के पिता तो शहर छोड़ने का मन मना चुके थे. पुलिस में रिपोर्ट करने पर पुलिस अधिकारी ने उलटा उन्हें ही समझा दिया, ‘‘लड़की का मामला है, आप लोगों की खामोशी ही सब से बढि़या उत्तर है. जितनी आप सफाई देंगे, जांच करवाएंगे, आप की ही मुसीबत बढ़ेगी.’’
विजय को फोन कर के रमा के पिता ने अपने घर बुलाया. रमा की मां का रोरो कर बुरा हाल था. रमा के पिता ने उदास स्वर में विजय से कहा, ‘‘पता नहीं मेरी बेटी से किस की क्या दुश्मनी है कि उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया. उस की शादी टूट गई. हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. बेटा, तुम तो जानते हो रमा को अच्छी तरह से.’’
विजय ने अपनी खुशी को छिपाते हुए गंभीर स्वर में कहा, ‘‘जी अकंलजी, मैं तो बचपन से देख रहा हूं. रमा पाकपवित्र लड़की है. मैं तो आंख बंद कर के विश्वास करता हूं रमा पर.’’
‘‘बेटा, तुम रमा से शादी कर लो,’’ रमा के पिता ने हाथ जोड़ते हुए विजय से कहा, ‘‘मैं तुम्हारा जीवनभर ऋणी रहूंगा. अन्यथा हम तो शहर छोड़ कर जाने की सोच रहे हैं.’’ रमा दरवाजे के पास छिप कर सुन रही थी और देख रही थी अपने दबंग पिता को नतमस्तक होते हुए.
सास को देख रमेश उठ कर बैठ गया, ‘‘मम्मी, आइए. कब से हम लोग आप का इंतजार कर रहे हैं. विनोद और प्रमोद भी घर से गायब हैं. लगता है, क्लब में यारदोस्तों के साथ पत्तों में मशगूल होंगे. हम दोनों बैठेबैठे बोर हो रहे थे अकेले.’’
सोफे पर पसर कर इंद्रा ने बेटीदामाद के चेहरों पर टटोलती सी दृष्टि डाली. न कोई दुख, न उदासी. बस, एक तटस्थ सा भाव, जैसे यह भी एक औपचारिकता है. खबर मिली, चले आए. बस.
मगर दुख और चिंता का भाव आता भी तो क्योंकर? कभी बच्चों ने पिता को पिता नहीं समझा. मातापिता की कलह में विजय हमेशा मां के हाथ रही. पिता सदा से एक परित्यक्त जीवन ढोता रहा. न उस की इच्छा और रुचि की कोई चिंता करने वाला था, न उस के दुख में कोई दुखी होने वाला. घर में सब से बेकार, सब से फालतू कोई चीज यदि थी तो वह था पिता नाम का प्राणी. फिर उस के प्रति किसी प्रकार की ममता, आदर या स्नेह आता तो कैसे?
‘‘अस्पताल क्यों नहीं गए?’’ इंद्रा ने सोफे की पीठ पर बाल फैलाते हुए अचला की ओर देखा.
‘‘अस्पताल? बाप रे, कौन जाता पागल कुत्ते से कटवाने अपने को?’’ अचला ने हाथमुंह नचाते हुए टेढ़ा मुंह बनाया.
‘‘साफसाफ क्यों नहीं कहती कि पापा अस्पताल में हैं, इसलिए हम लोग आप सब से मिलने आए हैं. उन के रहते तो इस घर में पांव रखने में भी डर लगता है. मुझे कैसी खूंखार आंखों से घूरते हैं. बाप रे’’ रमेश ने बिटिया को अचला की गोद में डाल, उसे शाल उढ़ाते हुए मन की सच्ची बात उगल दी.
अचला ने पिता की इच्छा के विरुद्घ घर से भाग कर उस से शादी की थी, क्योंकि सुरेंद्र की नजरों में वह एक आवारा और गुंडा किस्म का लड़का था. इसी वजह से वह ससुर से घृणा करता था.
‘‘तुम ठीक कहते हो. आजकल वे सचमुच पागल कुत्ते की तरह काटने दौड़ते हैं. मैं ने भी फैसला कर लिया है कि अब अस्पताल नहीं जाऊंगी. शायद जाना भी न पड़े. जानते हो, डाक्टर कहते हैं, वे 2-4 दिन के मेहमान हैं.’’
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इंद्रा ने चाय का घूंट निगलते हुए अचला की ओर देखा, ‘‘पहला दौरा उन्हें तब हुआ था जब विनोद कालेज से उषा को भगा कर मुंबई में बेच आया था. 3 दिनों तक वे घर नहीं आए थे. तीसरे दिन पता चला था, होटल में शराब पीतेपीते उन्हें दौरा पड़ा था. वहीं से उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया था. और अब तुम्हारे जाने के बाद उन के इस दूसरे दौरे ने उन के दिल की धज्जियां उड़ा दी हैं. मैं तो आज तक नहीं समझ पाई इस आदमी को. क्या चाहता है, क्या सोचता है, क्या नहीं है इस के पास?’’
निर्लप्त से स्वर में बोलतेबोलते उस ने चाय का खाली प्याला मेज पर रख दिया.
रात को खापी कर देर तक ड्राइंगरूम में बैठ सब ऊधम मचाते रहे. अचला और रमेश के आगमन की सूचना पा कर उन के मित्र भी मिलने चले आए थे.
इंद्रा को सुबह 7 बजे की फ्लाइट पकड़नी थी, सो 6 बजे का अलार्म लगा कर नौकर को सब आदेश दे, वह बिस्तर में दुबक गई.
सुबह घड़ी के अलार्म की जगह मोबाइल की घंटी टनटनाई तो इंद्रा रजाई फेंक कर बिस्तर से उठ बैठी.
‘‘हैलो,’’ उधर से आवाज आई, ‘‘मिस्टर सुरेंद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे.’’
‘‘ओहो, अच्छाअच्छा.’’
मोबाइल रख कर कुछ क्षण वह जैसे निर्णय सा लेती रही, ‘इन्हें भी यही वक्त मिला था खबर देने को,’ बड़बड़ाती हुई वह गुसलखाने में घुस गई.
वहां से हाथमुंह धो कर निकली तो नौकर को पुकारा, ‘‘देखो, रामू, मेरी चाय यहीं दे जाओ और ड्राइवर से कहो गाड़ी तैयार करे. जाने का टाइम हो गया है, समझे. और हां देखो, विनोद और प्रमोद को मेरे पास भेज दो जगा कर. कहना बहुत जरूरी काम है. समझ गए?’’
‘‘जी,’’ कह कर रामू ला गया तो वह ड्रैसिंगटेबल के सामने बैठ कर जल्दीजल्दी बालों में कंघी करने लगी. जूड़ा बना कर उस ने होंठों पर लिपस्टिक फैलाई ही थी कि विनोद आंखें मलता सामने आ कर खड़ा हो गया, ‘‘क्या बात है, मम्मी? सुबहसुबह नींद क्यों बिगाड़ दी हमारी? क्या हमें जगाए बिना आप की सवारी सैमिनार में नहीं जा सकती थी?’’
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इंद्रा ने लिपस्टिक को फिनिशिंग टच दे कर बेटे के चेहरे पर आंखें टिका दीं, ‘‘तुम्हारे पापा नहीं रहे. अभीअभी अस्पताल से फोन आया है. रात को वे बहुत बेचैन रहे और सुबह कोई 4 बजे के करीब डाक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद उन का हार्ट सिंक कर गया.’’
‘‘क्या?’’ विनोद की अधखुली आंखें अब पूरी तरह खुल कर फैल गई थीं, ‘‘इतनी जल्दी?’’
‘‘जल्दी क्या? उन्होंने तो अपनी मौत खुद बुलाई है. खैर, मैं ने तो तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मैं तो जा रही हूं. रुक नहीं सकती. वचन जो दे चुकी हूं. तुम लोग रमेश अंकल को फोन कर देना. वे आ कर सब संभाल लेंगे, समझे.’’
नित्य की तरह माथे पर सुहाग चिह्न लगाने के अभ्यस्त हाथ एक क्षण के लिए कांपे. क्या अब भी यह सौभाग्य चिह्न माथे पर अंकित करना चाहिए?
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सौभाग्य चिह्न? कैसा सौभाग्य चिह्न? क्या इस रूप में उस ने कभी इसे माथे पर अंकित किया था?
बस, अन्य सौंदर्य प्रसाधनों की तरह जैसे चेहरे पर पाउडर और होंठों पर लिपस्टिक लगाती रही, वैसे ही यह भी उस के गोरे, उजले माथे पर शोभता रहा. फिर सोचना क्या?
हवा में ठिठका उस का हाथ आगे बढ़ा और माथे पर लाल रंग की गोलमोल बिंदी टिक गई.
कैसे पति? कैसी पत्नी? जब वे अपना रास्ता नहीं छोड़ सके तो मैं ही क्यों छोड़ दूं?
साड़ी का पल्ला ठीक करती हुई वह ड्रैसिंगटेबल के सामने से उठी और पर्स उठा कर बाहर निकल गई. ‘‘देखो, विनोद, कोई पूछे तो कह देना जब खबर आई, मैं घर से जा चुकी थी, समझे.’’
पलट कर तेजतेज कदम रखती हुई वह सीढि़यां उतर कर गाड़ी में बैठ गई. अनिश्चय की स्थिति में सकपकाया सा विनोद गाड़ी को गेट से निकलते देखता रहा. क्या मम्मीपापा में कभी कोई संबंध था? यदि हां, तो फिर कौन सा?
राकेश का माथा ठनका. अब उस ने प्रथमा की बचकानी हरकतों पर गौर करना शुरू किया. उसे दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आने लगी. उसे याद आया कि बातबात पर ‘पापा’ कहने वाली प्रथमा आजकल उस से बिना किसी संबोधन के ही बात करती है. उस की उम्र का अनुभव उसे चेता रहा था कि प्रथमा उस से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रही है मगर उस के घर का संस्कारी माहौल इस की बगावत कर रहा था, वह ऐसी किसी भी संभावना के खिलाफ था. इस कशमकश से बाहर निकलने के लिए राकेश ने एक रिस्क लेने की ठानी. वह अपने तजरबे को परखना चाहता था. प्रथमा की मानसिकता को परखना चाहता था. जल्द ही उसे ऐसा एक मौका भी मिल गया. साल अपनी समाप्ति पर था. हर जगह न्यू ईयर सैलिब्रेशन की तैयारियां चल रही थीं. रितेश को उस के एक इवैंट मैनेजर दोस्त ने न्यू ईयर कार्निवाल का एक कपल पास दिया. ऐन मौके पर रितेश का जाना कैंसिल हो गया तो प्रथमा ने राकेश से जिद की, ‘‘चलिए न. हम दोनों चलते हैं.’’ राकेश को अटपटा तो लगा मगर वह इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था, इसलिए उस के साथ जाने के लिए तैयार हो गया.
पार्टी में प्रथमा के जिद करने पर वह डांसफ्लोर पर भी चला गया. जैसा कि उस का अनुभव कह रहा था, प्रथमा उस से एकदम चिपक कर डीजे की तेज धुन पर थिरक रही थी. कभी अचानक उस की बांहों में झूल जाती तो कभी अपना चेहरा बिलकुल उस के पास ले आती. अब राकेश का शक यकीन में बदल गया. वह समझ गया कि यह उस का वहम नहीं है बल्कि प्रथमा अपने पूरे होशोहवास में यह सब कर रही है. मगर क्यों? क्या यह अपने पति यानी रितेश के साथ खुश नहीं है? क्या इन के बीच सबकुछ ठीक नहीं है? प्रथमा जनून में अपनी हदें पार कर के कोई सीन क्रिएट करे, इस से पहले ही वह उसे अपनी तबीयत खराब होने का बहाना बना कर वहां से वापस ले आया. राकेश को रातभर नींद नहीं आई. पिछले दिनों की घटनाएं उस की आंखों में चलचित्र की तरह गुजरने लगीं.
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रितेश का अपनी मां से अत्यधिक लगाव ही प्रथमा के इस व्यवहार की मूल जड़ था. नवविवाहिता पत्नी को छोड़ कर उस का अपनी मां के पल्लू से चिपके रहना एक तरह से प्रथमा के वजूद को चुनौती थी. उसे लग रहा था कि उस का रूप और यौवन पति को बांधने में नाकामयाब हो रहा है. ऐसे में इस नादान बच्ची ने यह रास्ता चुना. शायद उस का अवचेतन मन रितेश को जताना चाहता था कि उस के लावण्य में कोई कमी नहीं है. वह किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है.
बेचारी बच्ची, इतने दिनों तक कितनी मानसिक असुरक्षा से जूझती रही. रितेश को तो शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा कि उस का मम्मीप्रेम क्या गुल खिला रहा है. और वह भी तो इस द्वंद्व को कहां समझ सका…या फिर शायद प्रथमा मुझ पर डोरे डाल कर अपनी सास को कमतरी का एहसास कराना चाहती है. ‘कारण जो भी हो, मुझे प्रथमा को इस रास्ते से वापस मोड़ना ही होगा,’ राकेश का मन उस के लिए द्रवित हो उठा. उस ने मन ही मन आगे की कार्ययोजना तय कर ली और ऐसा होते ही उस की आंखें अपनेआप मुंदने लगीं और वह नींद की आगोश में चला गया.
अगले दिन राकेश ने औफिस से आते ही पत्नी के पास बैठना शुरू कर दिया और चाय उस के साथ ही पीने लगा. वह रितेश को किसी न किसी बहाने से उस की चाय ले कर प्रथमा के पास भेज देता ताकि वे दोनों कुछ देर आपस में बात कर सकें. चाय पी कर राकेश पत्नी को ले कर पास के पार्क में चला जाता. जाने से पहले रितेश को हिदायत दे कर जाता कि वह दोस्तों के पास जाने से पहले प्रथमा के साथ कम से कम 1 घंटे बैठे.
शुरूशुरू में तो प्रथमा और रितेश को इस फरमान से घुटन सी हुई क्योंकि दोनों को ही एकदूसरे की आदत अभी नहीं पड़ी थी मगर कुछ ही दिनों में उन्हें एकदूसरे का साथ भाने लगा. कई बार राकेश दोनों को अकेले सिनेमा या फिर होटल भी भेज देता था. हां, पत्नी को अपने साथ घर पर ही रोके रखता. एकदो बार रितेश ने साथ चलने की जिद भी की मगर राकेश ने हर बार यह कह कर टाल दिया कि अब इस उम्र में बाहर का खाना उन्हें सूट नहीं करता. राकेश ने महसूस किया कि अब रितेश भी प्रथमा के साथ अकेले बाहर जाने के मौके तलाशने लगा है यानी उस की योजना सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.
हनीमून के बाद रितेश कभी प्रथमा को मायके के अलावा शहर से बाहर घुमाने नहीं ले गया. इस बार उन की शादी की सालगिरह पर राकेश ने जब उन्हें 15 दिनों के साउथ इंडिया ट्रिप का सरप्राइज दिया तो रितेश ने जाने से मना का दिया, कहा, ‘‘हम दोनों के बिना आप इतने दिन अकेले कैसे रहेंगे? आप के खाने की व्यवस्था कैसे होगी? नहीं, हम कहीं नहीं जाएंगे और अगर जाना ही है तो सब साथ जाएंगे.’’ ‘‘अरे भई, मैं तो तुम दोनों को इसलिए भेज रहा हूं ताकि कुछ दिन हमें एकांत मिल सके. मगर तुम हो कि मेरे इशारे को समझ ही नहीं रहे.’’ राकेश ने अपने पुराने नाटकीय अंदाज में कहा तो रितेश की हंसी छूट गई. उस ने हंसते हुए प्रथमा से चलने के लिए पैकिंग करने को कहा और खुद भी उस की मदद करने लगा.
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15 दिनों बाद जब बेटाबहू लौट कर आए तो दोनों के ही चेहरों पर असीम संतुष्टि के भाव देख कर राकेश ने राहत की सांस ली. दोनों उस के चरणस्पर्श करने को झुके तो उन्होंने बच्चों को बांहों में समेट लिया. प्रथमा ने आज न जाने कितने दिनों बाद उसे फिर से ‘पापा’ कह कर संबोधित किया था. राकेश खुश था कि उस ने राह भटकती एक नादान को सही रास्ता दिखा दिया और खुद भी आत्मग्लानि से बच गया.
राइटर- सोनाली करमरकर
“ठीक है, मैं आज ही तुम्हारे पापा से बात करूंगी,” मम्मी ने उसे दिलासा दिया.
अगला दिना हमेशा से ज्यादा खूबसूरत था. पापा ने रश्मि से गोविंद के बारे में बात की, उस की सारी जानकारी ली. मम्मी ने भी प्यार से नाश्ता कराया. रश्मि मानो बादलों पर सवार हो कर औफिस पहुंची. तभी उसे गोविंद का एसएमएस मिला कि वह 2-3 दिन बाद आएगा.
इस तरह 5 दिन गुजर गए. रश्मि के मन में अब बुरे खयाल आने लगे. जब रश्मि गोविंद को फोन करती, तो वह बड़े रूखेपन से पेश आता और कहता कि अभी वह बिजी है.
उस दिन जब रश्मि औफिस पहुंची तो उसे गोविंद अपने केबिन में नजर आया. मारे खुशी के वह उस की तरफ गई, पर बिजी होने का बहाना बना कर गोविंद फोन उठा कर किसी और से बात करने लगा. जैसे रश्मि के लिए यह वहां से जाने का इशारा हो.
किसी अनजाने डर से रश्मि का मन कांप उठा, फिर भी उस ने अपने मन को समझाया कि हो सकता है वाकई गोविंद बिजी हो, आखिर मैनेजर है वह कंपनी का. वह भी काम में अपना ध्यान लगाने की कोशिश करने लगी.
शाम को 5 बजे जब रश्मि गोविंद के केबिन में गई, तो पता चला कि वह तो कब का जा चुका है. रश्मि ने जल्दी से गोविंद को फोन मिलाया तो उस का मोबाइल स्विच औफ आने लगा.
‘आखिर क्या बात हो सकती है, जो गोविंद मुझे ऐसे टाल रहा है…’ सोच कर रश्मि बेचैन होने लगी. अगले 2 दिनों तक गोविंद यों ही उस से लुकाछुपी खेलता रहा.
एक दिन तंग आ कर रश्मि जब गोविंद के घर पहुंची तो दरवाजे पर ताला झूल रहा था. वह वहीं गोविंद का इंतजार करती रही. जब साढ़े 8 बजे के आसपास गोविंद घर लौटा तो रश्मि को वहां देख कर वह दंग रह गया. ताला खोल कर गोविंद ज्यों ही अंदर गया, पीछेपीछे रश्मि भी आ गई.
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“तुम्हे क्या लगा था गोविंद कि अगर तुम टालते रहोगे तो हम मिल नहीं सकते? इतना रूखा बरताव क्यों है तुम्हारा? इस तरह क्यों कतरा रहे हो मुझ से?” अंदर आते ही रश्मि बिफर पड़ी.
“रश्मि, मैं ज्यादा कुछ नहीं कह सकता. बस, यह समझ लो कि हमारी शादी अब नहीं हो सकती,” गोविंद ने बात खत्म करते हुए कहा.
“अरे, यह क्या बात हुई? शादी का फैसला तो हम दोनों का था. अब इस तरह तुम कैसे बदल सकते हो? और तुम्हारी मां ने भी तो हां कहा था, फिर अब क्या मुसीबत आ गई?” रश्मि गुस्से से बोली.
“देखो रश्मि, मां ने अब इनकार कर दिया है. और वजह तुम न ही जानो तो अच्छा है. बस, इतना कह सकता हूं कि आज के बाद हम दोनों न ही मिलें तो बेहतर है.”
“वजह तो तुम्हें बतानी पड़ेगी. आखिर खुशियां बड़ी मुश्किल से मेरे दरवाजे पर आई हैं. मैं उन को तुम्हारे साथ जीना चाहती हूं,” रश्मि की आंखों की बेबसी गोविंद को तड़पा रही थी. वह नहीं चाहता था कि रश्मि वजह जाने.
“ठीक है, बताता हूं. लेकिन यह भी सुन लो कि जो मैं तुम्हे बताना चाहता हूं उस से मैं सहमत तो नहीं हूं, पर मैं कुछ नहीं कर सकता.
“मैं जब यहां से टूर पर गया था, वहीं से मां को लेने अपने गांव चला गया था. मां तुम्हारे बारे में जान कर बहुत खुश थीं. तुम्हें देने के लिए उन्हें कुछ खरीदारी करनी थी, तो उन्होंने मुझे 2 दिन और रुकने को कहा.
“जिस रात को हम निकलने वाले थे उस दिन दोपहर की डाक से हमें एक लिफाफा मिला, जिस में तुम्हारे बारे में काफी गलतसलत लिखा गया था…”
“क्या लिखा था,” रश्मि ने बड़ी हैरानी से पूछा.
“उस में लिखा था कि चिट्ठी लिखने वाला तुम्हें अच्छी तरह जानता है. तुम्हारा चरित्र अच्छा नहीं है, इसी वजह से तुम्हारी शादी 2-3 बार टूट चुकी है, वरना 30 साल की उम्र तक तुम कुंआरी क्यों रहती? वह भी अच्छाखासा कमाने वाली हो तब भी?
“बस, मां ने चिट्ठी पढ़ कर इस शादी से मना कर दिया. वे नहीं चाहती हैं कि उन की बहू चरित्रहीन हो. मैं ने समझाने की बहुत कोशिश की, मगर वे मानने को तैयार नहीं हैं और मैं उन्हें इस उम्र में अकेला नहीं छोड़ सकता.
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“तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी मुश्किल होगी, पर मुझे मां के लिए यह सहना ही होगा. मुझे माफ कर दो…” सब बता कर गोविंद ने उस के सामने वह लिफाफा रख दिया.
रश्मि ने लिफाफा खोल कर देखा तो उस की आंखें फटी रह गईं. उस ने उस लिखावट को पहचान लिया. आखिर कैसे भूल सकती थी वह उस लिखावट को जो उस के लिए आदर्श थी… बचपन में उस में संस्कार भरने वाले यही तो अक्षर थे.
3 बार अपनी शादी टूटने का सबब रश्मि की समझ में आ गया. भावनाओं के बवंडर में उलझी वह अनायास बोल पड़ी, “आप ने यह क्या कर दिया पापा..” और फिर उस के सब्र का बांध टूट गया.
“रश्मि, क्या यह खत तुम्हारे पापा ने भेजा है?” गोविंद ने हैरान हो कर पूछा.
रश्मि कुछ न कह सकी. वह अपने पापा को गोविंद की नजरों में गिराना नहीं चाहती थी. लेकिन गोविंद अब जानने को मचल रहा था. रश्मि ने कड़े मन से अपने अतीत की सारी बातें उस के सामने रख दीं.
“मैं तो अपने हिस्से का फर्ज निभा चुकी हूं गोविंद. अब पापा की बारी है न? आखिर कब तक फर्ज के नाम पर मैं तनहाई के बियाबान रास्ते पर चलती रहूंगी? कब तक रोऊंगी? कब तक कमजोर रहूंगी? खोखले रिश्ते के मकड़जाल में कब तक उलझी रहूंगी?
“तुम कहो तो मैं अपने पापा का घर हमेशा के लिए छोड़ दूंगी…” पता नहीं रश्मि की संजीदा आवाज में कैसी कसक थी, जो गोविंद को भीतर तक झकझोर गई.
“नहीं पगली. ऐसा नहीं कहते. तुम्हारे पापा को डर है कि तुम्हारी शादी हो गई तो उन का क्या होगा, क्योंकि बेटे ने तो पहले से ही पल्ला झाड़ लिया है. उन की भावनाओं को मैं समझ सकता हूं रश्मि. ये बातें तुम्हें पहले बतानी चाहिए थीं. हम कुछ हल जरूर निकाल लेते..”
“क्या अब कुछ नहीं हो सकता है? मुझे यों अकेला छोड़ कर मत जाओ गोविंद. मैं तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊंगी,” रश्मि ने उसे कस कर पकड़ लिया.
“हां, हम जरूर कोशिश करेंगे…” गोविंद उसे सहला कर शांत करता रहा, “रश्मि, मेरे खयाल से तुम्हारे पापा अपनी और तुम्हारी मम्मी की बची हुई जिंदगी के लिए परेशान हैं, तुम्हारी शादी से नहीं. अगर तुम्हारी शादी होती है तो उन्हें दामाद के घर में रहना शायद पसंद न आए.
“देखो, हम दोनों की नौकरी इसी शहर में है, तो शादी के बाद हम दोनों उम्रभर उन के साथ रह लेंगे. कभीकभी मां भी हमारे साथ रहने आ जाया करेंगी. मैं तुम्हारे मम्मीपापा का बेटा बन कर उन का खयाल रखूंगा. फिर तो उन्हें हमारी शादी से कोई एतराज नहीं होगा न?”
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गोविंद की बातों से रश्मि के मन में उम्मीद के चिराग टिमटिमा उठे, “क्या यह मुमकिन है गोविंद?” उस ने भरी आंखों से पूछा.
“हां, थोड़ा मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं है. मेरी मां को राजी करवाना पड़ेगा. और मैं तुम्हारे लिए इतना तो करूंगा ही रश्मि.”
“अपने रिश्ते को समेट लो गोविंद… इस से पहले कि कुछ और बिखर जाए…” रश्मि ने बड़े विश्वास से अपना सिर गोविंद के कंधे पर रख दिया. गोविंद ने उसे अपनी मजबूत बांहों में कस लिया.