ईरिकशा : क्या बेला कर पाई 40,000 का गोलमाल

उस का नाम बेला था. लंबा कद, गोरा रंग, भरा हुआ बदन और तीखी नाक. उस के रंगरूप में सब से आकर्षक था. उठा हुआ सीना, जो देखने वालों के कलेजे में आग लगा देता था.

बेला ने दर्जी से नई चोली सिलवाई थी. उसे ले कर वह अपने घर पहुंची, तो चोली की फिटिंग चैक करने के लिए आईने के सामने अपनी पहनी हुई चोली उतार दी और सिलवाई हुई चोली का नाप चैक करने लगी.

बेला ने सामने से देखा, फिर घूम कर पीठ पर चोली की फिटिंग देखने लगी. दर्जी ने सिलाई तो ठीक की थी, पर गला थोड़ा ज्यादा ही कस रहा था. बेला की नजर उस के उठे हुए सीने पर गई, तो उस के चेहरे पर शरारती मुसकान खिल उठी.

‘यही वह जादू की पिटारी है, जिसे दिखा कर तू सारे मर्दों के दिल पर राज करती है,’ बुदबुदाते हुए बेला अपनी नई चोली उतारने लगी कि तभी उस के कमरे का दरवाजा अचानक से खुल गया.

बेला ने अपनी दूध सी गोरी छातियों को हाथ से कैंची बना कर ढक लिया और अंदर की ओर भागने लगी. उसे लगा कि न जाने कोई आदमी ही न आ गया हो, पर वह तो पड़ोस में रहने वाली रेशमा थी.

‘‘अरे, क्या बात है… आज तो तू ने दिन में ही मुहब्बत शुरू कर दी,’’ रेशमा ने अपने दोनों हाथों की उंगलियों को एकदूसरे में भद्दे ढंग से फंसाते हुए कहा, जिसे देख कर बेला की हंसी छूट गई और उस ने रेशमा को बताया कि नई चोली की फिटिंग देखने के लिए पुरानी वाली को उतारा था, पर इस का गला थोड़ा तंग है.

बेला ने एक बार फिर से नई चोली को पहन कर रेशमा को दिखाया, तो रेशमा उस के गले के साइज से संतुष्ट दिखी.

‘‘दूसरी औरतें तो गले का साइज थोड़ा छोटा कराती हैं, जिस से उन का सीना दूसरों को न दिखाई दे और तू इसे बड़ा करवा रही है,’’ रेशमा ने कहा, तो बेला मुसकरा उठी और खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘यह जो हमारे सीने की गहराई है न, इसी के बीच में मर्दों की नजरें टिकी रहती हैं, यह तो दिखाने की चीज है, न कि छिपाने की,’’ बेला की बात सुन कर रेशमा उसे हैरानी से देख रही थी.

बरेली शहर के इस इलाके में बेला अपने पति के साथ किराए पर कमरा ले कर रहती थी. उस का पति एक नई बन रही बिल्डिंग में दिहाड़ी मजदूर का काम करता था और बेला लोगों के घरघर जा कर बरतन धोने और साफसफाई का काम करती थी.

जिन घरों में बेला काम करती थी, वहां के मर्द बेला के जिस्म को देख कर लार गिराते रहते थे. वे सब चोरीछिपे बेला के सीने को घूरते और अपने मन को ठंडक पहुंचाते थे.

बेला को भी इस बात का अच्छी तरह से एहसास था कि उस के पास एक मादक जिस्म है और इसीलिए वह अपने जिस्म का बखूबी इस्तेमाल भी करती थी.

इसी महल्ले में देवीलाल नाम का एक विधुर रहता था. उस की उम्र यही कोई 50 साल के आसपास होगी और देवीलाल के साथ रहती थी उस की 35 साल की बहन, जिस का नाम नीलम था. वे दोनों एकदूसरे का सहारा थे.

देवीलाल की बहन नीलम की उम्र काफी हो गई थी, पर अभी भी उस की शादी नहीं हुई थी. देखने में नीलम कोई बहुत अच्छी नहीं थी और चेहरे का रंग सांवला होने के चलते अब तक उसे कोई जीवनसाथी नहीं मिल पाया था.

बेला देवीलाल और नीलम के घर भी बरतन मांजने और झाड़ूपोंछा करने जाती थी. देवीलाल एक नंबर का औरतखोर मर्द था.

बेला को देखते ही देवीलाल की आंखों में हवस जाग उठती. बेला भी उस की नजरों को अच्छी तरह पहचान गई थी और इसीलिए जब भी वह झाड़ू लगाती, तो जानबूझ कर अपनी साड़ी का पल्ला गिरा देती, जिस से उस की चोली के अंदर से उस की गोरी गोलाइयां झलकने लगतीं, जिन्हें देख कर देवीलाल मन ही मन खूब आहें भरता था.

एक शाम की बात है, जब बेला देवीलाल के घर पहुंची. नीलम शायद कहीं बाहर गई हुई थी. देवीलाल घर में अकेला था. उस ने बेला को देखते ही चाय की फरमाइश की.

बेला किचन में जा कर चाय बनाने लगी कि तभी देवीलाल पीछे से आ गया. उस के हाथ में कुरियर वाले का एक बंडल था, जिसे दिखाते हुए देवीलाल ने कहा, ‘‘मैं ने ये कपड़े औनलाइन मंगवाए हैं. तुम पहन कर देख लो… शायद तुम पर वे अच्छे लगें.’’

बेला ने देवीलाल के हाथों से पैकेट ले लिया और उस को खोल कर देखने लगी. उस पैकेट के अंदर से औरतों के छोटे कपड़े निकले.

बेला ने अपने मुंह पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘दैया रे दैया, ऐसे कपड़े हम तो कभी न पहनें…’’

बेला की बात सुन कर देवीलाल ने कहा, ‘‘अरे, अब नखरे मत करो, इन्हें पहन भी लो…’’

देवीलाल की बात सुन कर बेला ने कहा, ‘‘ऐसे कपड़े तो मौडल पहनती

हैं, जिस के बदले में उन को ढेर सारे पैसे मिलते हैं. अगर मैं पहनूं, तो मुझे क्या मिलेगा?’’

बेला की बात सुन कर देवीलाल ने कहा, ‘‘जो तेरी मरजी हो ले लेना.’’

देवीलाल की बात सुन कर बेला ने वह पैकेट हाथ में ले लिया और मुसकराते हुए एक कमरे की ओर बढ़ गई, फिर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला, तो बेला लाल रंग की ब्रापैंटी में उस के सामने खड़ी थी. उस ने एक मदमस्त अंगड़ाई ली, जिसे देख कर देवीलाल पर पागलपन सवार हो गया. उस ने बेला को गोद में उठाया और बिस्तर पर पटक दिया, फिर उसे बेतहाशा चूमने लगा.

देवीलाल ने बेला के सीने के बीच में अपने सिर को घुसेड़ दिया और उस के जिस्म के हर हिस्से को चाटने लगा. बेला भी सिसकारियां भरने लगी और देवीलाल की पीठ पर अपने हाथों से खरोंचने लगी…

देवीलाल ने बेला के वे छोटे कपड़े उतारने में देर नहीं लगाई और फिर कमरे में गरम सांसों के गूंजने से वहां का तापमान बढ़ गया था. दोनों के जिस्म कुछ देर की मशक्कत के बाद एकदूसरे से अलग हो गए. ऐसा लग रहा था कि वे दोनों मीलों दौड़ कर आए हों.

बेला कपड़े पहनने लगी. देवीलाल अब भी बिस्तर पर निढाल पड़ा हुआ था. बेला ने उस से कहा कि अब उसे देर हो रही है, इसलिए जाना होगा.

देवीलाल बेमन से उठा और अपने पर्स से 500 रुपए के 2 नोट निकाल कर बेला की ओर बढ़ाए. बेला ने उन दोनों नोटों को ले कर अपनी चोली के अंदर रख लिया.

‘‘ये पैसे तो इन छोटे कपड़ों को पहनने का मेहनताना भर है, बाकी जो

तू ने मेरे जिस्म को रौंदा है, उस का भी तो पैसा दे…’’ बेला ने कहा.

देवीलाल ने बेला की तरफ 1,000 रुपए और बढ़ा दिए.

बेला पैसों को ले कर बाहर की ओर जाने लगी कि तभी नीलम भी आ गई. दोनों की नजरें मिलीं और आगे बढ़ गईं.

उस दिन के बाद से जब भी देवीलाल का मन करता, उस दिन वह औफिस नहीं जाता और घर पर ही रुक जाता.

एक रात बेला का पति हरद्वारी जब बिस्तर पर लेटा, तो काफी थका हुआ था. बेला के पास आते ही उस ने बेला के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा.

‘‘मैं बहुत थकी हुई हूं… आज मुझे परेशान मत करो.’’

‘‘आज मना मत करो… मैं भी बहुत परेशान हूं,’’ हरद्वारी ने फुसफुसाते हुए कहा.

बेला ने परेशानी की वजह पूछी, तो हरद्वारी ने बताया कि उस का ठेकेदार उसे बहुत तंग करता है और बातबात पर गालियां देता है. इस के बाद हरद्वारी ने यह भी कहा कि अब वह और मजदूरी नहीं करना चाहता है.

‘‘फिर क्या करोगे तुम?’’ बेला थोड़ा नरम हो गई थी.

हरद्वारी ने उस से कहा कि इस जलालत भरे काम से तो अच्छा है कि वह एक पुराना ईरिकशा खरीद ले और सवारियां ढोए.

बेला ने हरद्वारी के प्रस्ताव पर खुशी जताई, पर हरद्वारी ने उदास मन से बेला से ईरिकशा खरीदने भर के पैसे न होने की बात बताई.

‘‘पर, यह ईरिकशा कितने तक का आ जाएगा?’’ बेला ने पूछा.

‘‘पुराना भी लेंगे, तो 50,000 रुपए से कम कीमत का नहीं आएगा,’’ हरद्वारी की आवाज में थोड़ी सी फुरती दिखाई दे रही थी.

‘‘50,000…’’ बेला बुदबुदाने लगी थी. यह एक बड़ी रकम थी और बेला को पता था कि इतने पैसे उस के पास नहीं हैं.

अगले दिन से ही बेला पैसों के लिए अपना दिमाग दौड़ाने लगी थी. अपनी अलमारी के सारे पैसे निकाल कर देखे. कुछ गहने भी थे. कुलमिला कर इन सब की कीमत 10,000 रुपए से ज्यादा न होती यानी 50,000 में 40,000 अब भी कम थे.

बेला परेशान हो गई. अपने पति को ठेकेदार और दिहाड़ी के काम से वह छुटकारा दिलाना चाहती थी, पर पैसा इस राह में रोड़ा बन रहा था.

अगले दिन जब बेला देवीलाल के घर बरतन मांजने पहुंची, तो वह घर में नहीं था, बल्कि नीलम ही अकेली थी.

नीलम ने होंठों पर गहरे रंग की लिपस्टिक लगाई हुई थी और उस के बाल भी खुले हुए लहरा रहे थे. आज वह रोज से दिखने में ठीकठाक लग रही थी.

‘‘आज आप औफिस नहीं गईं?’’ बेला ने पूछा.

नीलम ने उसे बताया कि देवीलाल किसी काम से बाहर गए हैं और शाम तक वापस आएंगे.

नीलम ने उसे बातोंबातों में यह भी बताया कि आज उस का जन्मदिन है और उस से मिलने एक बौयफ्रैंड आने वाला है.

अभी बेला और नीलम बातें कर ही रही थीं कि नीलम का दोस्त आ गया. दोनों एकदूसरे को देख कर बेचैन हो रहे थे, जिसे देख कर ही बेला उन के बीच के संबंधों की असलियत समझ गई.

नीलम ने जल्दी से बेला को काम निबटा कर चले जाने को कहा और खुद अपने बौयफ्रैंड के साथ ऊपर वाले कमरे में चली गई.

बेला को काम निबटाने में तकरीबन आधा घंटा लग गया. फिर वह ऊपर के कमरे की तरफ बढ़ती चली गई, पर कमरे के पास पहुंच कर उसे ठिठक जाना पड़ा, क्योंकि सामने कमरे में नीलम

और उस का दोस्त बिस्तर पर थे. नीलम अपने दोस्त के पैरों के बीच बैठी हुई मजे ले रही थी.

फिर पता नहीं बेला के दिमाग में क्या आया कि उस ने अपने मोबाइल फोन को निकाल कर इन दोनों की सैक्स करते हुए क्लिपिंग बना ली.

बेला कुछ दिनों तक तो चुप रही और मन ही मन प्लान बनाती रही, फिर एक दिन जब वह नीलम से मिली, तो उस ने नीलम को उस की सैक्स वाली वीडियो दिखाते हुए 40,000 रुपयों की मांग कर डाली और नीलम के द्वारा उसे पैसे नहीं दिए जाने पर यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर देने को कहा.

बेला की बात सुन कर नीलम न तो डरी और न ही शरमाई, बल्कि हंसते हुए कहने लगी, ‘‘मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम यह वीडियो सोशल मीडिया में फैलाओ, समाज और आसपड़ोस वालों को दिखाओ… मैं किसी समाज से नहीं डरती…

‘‘कौन सा समाज…? वही समाज, जिस ने मेरे सांवले रंग के चलते मुझे आज तक कुंआरा रहने पर मजबूर कर दिया,’’ नीलम गुस्से में आ गई थी, ‘‘वही समाज न, जहां आएदिन लड़कियों का रेप होता है और समाज सिर्फ मोमबत्ती जला कर राजनीति करता है…

‘‘और वैसे भी मैं तुम्हें बता दूं कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम देवीलाल भैया को यह बात जा कर बता दोगी, मेरे और मेरे दोस्त के संबंधों के बीच उन्हें सब पता है और हम दोनों को समय देने के लिए ही वे बाहर चले जाते है…’’ इतना कह कर नीलम सांस लेने के लिए रुक गई.

बेला उस की बातें सुन कर हैरान थी. उस के प्लान पर पानी फिर गया था. उस ने सोचा था कि नीलम को ब्लैकमेल कर के वह कुछ पैसे की उगाही कर लेगी, जिस से उस का पति ईरिकशा खरीद सकेगा, पर यहां तो मामला ही उलटा पड़ गया था.

हरद्वारी बेमन से मजदूरी करने जाता था और मुंह लटका कर वापस आ जाता. पैसे का कोई इंतजाम न होने के चलते बेला कुछ दिन परेशान रही, फिर उस ने एक दिन देवीलाल से 40,000 रुपयों की मदद मांगी.

देवीलाल ने बेला को साफ मना कर करते हुए कहा कि अगर 2-4 हजार रुपयों की बात होती, तब तो वह जुगाड़ कर सकता था, पर 40,000 रुपए तो बहुत बड़ी रकम है.

पर, बेला की मदद करने के लिए देवीलाल ने उसे एक आदमी का पता और फोन नंबर देते हुए कहा, ‘‘यह आदमी एक नंबर का जिस्म का भूखा है. अगर तुम इस आदमी को अपने जिस्म के जाल में फंसा लो और उस के साथ हमबिस्तर हो जाओ, तो वह तुम्हें यह रकम भी दे सकता है.’’

बेला के सामने और कोई रास्ता तो था नहीं, इसलिए वह दिए गए पते पर जा पहुंची. यह वही जगह थी, जहां पर उस का पति मजदूरी करता था और जिस आदमी से उसे मिलना था, वह भी वही ठेकेदार था, जो उस के मरद को गालियां देता था.

उस ठेकेदार का नाम हरी सिंह था. बेला को अपने सामने देख उस के मुंह में पानी आ गया. कभी वह बेला के सीने को घूरता, तो कभी उस की नाभि को, फिर वह बोला, ‘‘रातभर के कितने पैसे लेगी?’’

बेला को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले, फिर भी उस ने कहा, ‘‘मुझे 40,000 रुपए चाहिए…’’

‘‘अपनेआप को कहीं की हीरोइन समझती है, 40,000… जानती भी है

कि कितनी बड़ी रकम होती है…’’ कि हरी सिंह आंखें निकालता हुआ बोल रहा था.

बेला वहां चुपचाप खड़ी थी. कुछ देर बाद हरी सिंह बोलने लगा, ‘‘हां, पर एक तरीका है.’’

हरी सिंह की यह बात सुन कर बेला की आंखों में चमक आ गई और उस के कान हरी सिंह की बात सुनने को आतुर हो उठे.

‘‘माल तो तू बढि़या है, इसलिए कहता हूं कि मेरा एक दोस्त और भी है… अगर तू हम दोनों को बारीबारी से खुश करती रहे तो हम लोग तुझे पैसा इकट्ठा कर के दे देंगे.’’

बेला के सामने और कोई रास्ता न होने के चलते उस ने हामी भर ली. हरी सिंह ने उसे अगले दिन शाम के समय उसी जगह पर बुलाया और हवस का खेल शुरू हो गया था.

उस कमरे में हरी सिंह और एक नया आदमी बैठे शराब पी रहे थे. बेला उन के सामने गई, तो हरी सिंह ने कहा, ‘‘आज तुझे पहले इन्हें खुश करना है… मेरा नंबर तो इन के बाद आएगा.’’

दूसरा आदमी बेला के जिस्म पर अपने हाथ फिराने लगा था. जाहिर सी बात थी कि बेला को इस बात से कोई कोफ्त नहीं हो रही थी.

धीरेधीरे उस आदमी ने बेला के कपड़े उतार दिए और कोने में पड़ी खटिया पर पटक कर सैक्स का मजा लेने लगा. उस के बाद हरी सिंह आ गया और वह भी बेला के बदन से खेलने लगा.

बेचारी बेला… उस का जिस्म थक चुका था, पर अपने पति को ईरिकशा दिलवाने की उम्मीद अभी भी बनी हुई थी. वह हर तरीके से उन लोगों को खुश रखना चाहती थी.

‘‘यह तू रोज शाम को देर से क्यों आती है?’’ हरद्वारी ने पूछा.

‘‘बस यों समझ ले कि तेरे ईरिकशा के लिए मेहनत कर रही हूं,’’ बेला ने कहा.

अब तो हरी सिंह पैसों का लालच दे कर बेला को वक्तबेवक्त बुलाता और उस के जिस्म से खेलता. बेला ने कई बार पैसे भी मांगे, पर हरी सिंह हर बार टालता ही रहा.

बेला समझ गई थी कि हरी सिंह उस की मजबूरी का फायदा उठा रहा है, इसलिए उस ने उंगली टेढ़ी करने की सोची और जब एक दिन हरी सिंह बेला के साथ सैक्स कर रहा था, तो चुपके से बेला ने उस की सैक्स वीडियो बना ली और खामोशी से घर चली आई.

2 दिन के बाद बेला हरी सिंह के अड्डे पर पहुंची और वीडियो क्लिप उसे दिखाते हुए बोली, ‘‘मुझे मेरी मेहनत के पैसे दे दो, नहीं तो मैं यह क्लिप तुम्हारे बीवीबच्चों और महल्ले में सब को दिखा दूंगी,’’ बेला ने चीख कर कहा, तो थोड़ी देर के लिए हरी सिंह और उस का दोस्त सहम गए, पर अगले ही पल वे दोनों जोरजोर से हंसने लगे.

‘‘तू हमारी सैक्स वीडियो बना कर हमें ब्लैकमेल क्या करेगी, हम तुझे बताते हैं कि सैक्स की वीडियो कैसे बनाई जाती है…’’ हरी सिंह बोला और तेजी से उठ कर बेला के शरीर से कपड़े हटाने लगा, पर आज बेला आरपार के मूड में थी, सो वह विरोध करने लगी.

हरी सिंह का दोस्त मोबाइल के कैमरे से यह सब शूट करने लगा. हरी सिंह जबरन बेला के साथ सैक्स की कोशिश करने लगा और जब तक उस का जी नहीं भरा, वह बेला के शरीर पर जुटा रहा.

‘‘अब मैं यह वीडियो इंटरनैट पर डाल कर पैसे भी कमाऊंगा और तेरे पति को भी दिखाऊंगा, ताकि तू हम से आइंदा पैसे की डिमांड न कर सके,’’ हरी सिंह बोला.

बेचारी बेला अब लुटपिट चुकी थी. भले ही वह लटकेझटके दिखा कर मर्दों को अपनी तरफ खींचती थी, दूसरे मर्दों के साथ सोने से गुरेज भी नहीं करती थी, पर अपना यह राज आज तक उस ने अपने पति से छिपाया हुआ था और उस के घर के आसपास के लोगों में भी उस की इमेज एक मेहनतकश औरत की बनी हुई थी.

‘अगर यह वीडियो मेरे पति को दिखा देगा, तो वह तो मारे शर्म के मर ही जाएगा और फिर मेरे आसपास का समाज… समाज की नजरों में तो मैं एक धंधे वाली के समान हो जाऊंगी…’ एकसाथ कई बातें बेला के जेहन में गूंज रही थीं.

‘‘ठीक है… मुझे तुम लोगों से कोई पैसे नहीं चाहिए, पर तुम यह वीडियो मेरे पति को मत दिखाना और न ही इसे इंटरनैट पर डालना…’’ बेला ने हाथ जोड़ कर कहा.

उस की इस बात पर हरी सिंह कुटिलता से मुसकरा उठा मानो उसे मुंहमांगी मुराद मिल गई थी.

एक तरफ बेला थी, जिस ने पति और समाज के डर से हरी सिंह से पैसे लिए बिना अपनी इज्जत को बचा लिया था. वहीं दूसरी तरफ देवीलाल की बहन नीलम थी, जो बिना समाज की चिंता किए अपने बौयफ्रैंड के साथ मजे कर रही थी.

हो सकता है वे दोनों औरतें अपनीअपनी जगह सही हों, पर इन सब के बीच हरद्वारी का ईरिकशा आज तक नहीं आ पाया है और उसे अब भी ठेकेदार के पास काम करने जाना पड़ रहा है और उस की भद्दी गालियां भी सहनी पड़ रही हैं.

आबरू : घर से क्यों भागी निशा

Social Story in Hindi: न जाने कितने लोगों ने हुस्न की उस मलिका को अपना दिल देना चाहा होगा, लेकिन चांद हर किसी को नहीं मिलता. जब वह तंग टीशर्ट और मिनी स्कर्ट पहनती थी, तो देखने वालों का दिल मचल जाता था. जहां एक ओर निशा नशीली आंखों वाली खूबसूरत लड़की थी, वहीं दूसरी ओर हरी चमकीली आंखों वाली रिया की अदा भी मोहक थी. घर से भागी हुई निशा को जब कोई महफूज ठिकाना नहीं मिला, तो उस ने खुराना फर्म में 5 हजार रुपए महीने की नौकरी कर ली. धीरेधीरे निशा का फर्म के मालिक निशांत से मेलजोल का सिलसिला बढ़ने लगा और वह उस की ललचाई निगाहों में बसने लगी.

यह फर्म विदेशों में माल सप्लाई करती थी. उस माल की जांचपड़ताल के लिए विदेशी अफसर 2-4 महीने में दिल्ली पहुंच कर पूरा हिसाबकिताब करते थे.

20 साला रिया भी खुराना फर्म में पहले से काम करती थी. एक दिन जब निशा देर से दफ्तर पहुंची, तो रिया उस पर ताना मारते हुए बोली, ‘‘आ गई हुस्नपरी. भला यहां कौन तुम से देर

से आने की वजह पूछने की हिम्मत करेगा? तुम बौस की चहेती जो बनती जा रही हो.’’

‘‘जलन होती है क्या?’’ निशा ने तिलमिला कर कहा.

‘‘लगता है, तुम बुरा मान गई. मैं तो यों ही मजाक कर रही थी. दरअसल, बौस के कमरे से 2 बार बुलावा आ चुका है. उन्हें किसी फाइल की जरूरत है, जो तुम्हारी टेबल की दराज में बंद है.

‘‘चाबी तुम्हारे पास है, इसलिए उसे खोला कैसे जा सकता था. अब तुम आ गई हो, तो झटपट निकाल कर ले जाओ.’’

‘‘मैं जरा बाथरूम में जा कर मुंह धो लूं. बस में इतनी भीड़ थी कि पसीने से तरबतर हो गई हूं,’’ इतना कह कर निशा बाथरूम से जल्दी निबट कर बौस के केबिन की ओर गई. चपरासी ने मुसकरा कर दरवाजा खोल दिया.

निशा के अंदर जाते ही किसी दूसरे को बौस से मिलने का मौका कम ही मिलता था. अंदर क्या गुल खिलता था, यह बात शायद रिया जानती थी.

केबिन में घुसते ही होंठों पर मुसकराहट लाते हुए निशा बोली, ‘‘सर, मुझे कुछ देर हो गई. कैसे याद किया?’’

बौस ने निशा की ओर देखा. उस ने अपने काले घुंघराले लंबे बालों को कसने के लिए पतला आसमानी रंग का रेशमी फीता बांध रखा था. उस के टौप के ऊपरी 2 बटन खुले थे.

‘‘आओआओ, वहां क्यों खड़ी हो? कुरसी पर बैठो,’’ बौस बोला.

सामने कुरसी पर अदा के साथ बैठते हुए निशा बोली, ‘‘क्या करूं सर, खचाखच भरी बस सामने से निकल गई, चढ़ने का मौका ही नहीं मिला.’’

‘‘कोई बात नहीं. तुम जा कर कुछ देर आराम कर लो, फिर कल वाली दी गई फाइल ले कर आना.’’

कोई दूसरा होता, तो बौस भड़क कर सारा गुस्सा उस पर उतार देते, लेकिन मामला एक हसीना का था, इसलिए वे चुप रह गए.

अपनी सीट पर बैठते ही निशा ने टेबल की दराज खोली, फाइल निकाली. उसी समय बगल में बैठी रिया ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या कहा बौस ने?’’

‘‘बोलता क्या, मु?ा पर नजरें टिकाईं, तो सबकुछ भूल गया,’’ निशा बोली.

‘‘वह तो मैं जानती थी. तेरी नजरों के तीर ने जब उसे पहले ही घायल कर दिया, तो बोलने के लिए गले की आवाज का रुक जाना कोई बड़ी बात नहीं.’’

‘‘तुम्हें क्यों जलन होती है रिया?’’

‘‘जब किसी से इश्क होता है, तो होंठ सिल जाते हैं और निगाहें बोलना शुरू कर देती हैं. तुम कुछ दिनों में बौस को पहचान लोगी.’’

‘‘मुझे तो नहीं लगता कि बौस की नीयत में कुछ खोट है,’’ निशा बोली.

‘‘यह तुम्हारा भरम है. सच जल्दी ही तुम्हारे सामने आ जाएगा.’’

शाम के 6 बजे तक दफ्तर से तकरीबन सभी लोग जा चुके थे. निशा ने रिया से कहा, ‘‘चलो, हम चल कर किसी पास के रैस्टोरैंट में कुछ खापी लेते हैं. वहीं पर बातें भी होती रहेंगी.’’

‘‘ठीक है,’’ और दोनों बाहर जाने की तैयारी करने लगीं, तभी बौस ने निशा को अपने कमरे में बुलाया.

‘‘लो, बौस को तुम्हारी याद आ गई. अब तो घंटेभर से पहले तुम्हें फुरसत नहीं मिलेगी. तुम बौस से निबटती रहना, मैं अपने क्वार्टर पर जा रही हूं. फिर किसी दिन रैस्टोरैंट में चलेंगे,’’ इतना कह कर रिया चली गई.

‘‘कैसे याद किया सर?’’ निशा ने बौस के कमरे में जा कर पूछा.

‘‘बैठो. आज तुम्हें कुछ जरूरी काम से देर तक रुकना पड़ेगा. तुम थकी होगी, इसलिए मैं ने कौफी मंगाई है.’’

निशा ने अपना हैंडबैग अलग रखा और बौस की टेबल के सामने कुरसी पर इतमीनान से बैठ गई.

थोड़ी देर बाद किसी होटल का बैरा कौफी सैट और नाश्ता डाइनिंग टेबल पर सजाने लगा. साथ में अंगरेजी शराब की बोतल, कांच के गिलास और बर्फ भी थी.

दूसरे दिन रिया ने निशा से 2 घंटा देर से आने की वजह जाननी चाही, तो वह चुप रही. उस दिन बौस भी बहुत देर से दफ्तर पहुंचा था.

‘‘मेरी जान, तुम ने बौस के साथ रातभर क्या गुल खिलाया?’’

‘‘जो भी समझ लो.’’

‘‘उस ने तुम्हें रात को कितने बजे छोड़ा?’’

‘‘3 बज रहे थे. बौस मुझे खुद अपनी कार से घर तक छोड़ने गए थे.’’

‘‘यह तो होना ही था. रातभर काफी परेशान किया होगा, जैसा कि तुम्हारे मुरझाए चेहरे से लग रहा है.’’

‘‘घर पहुंच कर मुझे देर तक नींद नहीं आई. तुम्हारी चेतावनी भी याद आने लगी थी.’’

‘‘और क्या हुआ?’’

‘‘हम दोनों शाम को रैस्टोरैंट में बातें करेंगे. मुझे कुछ जरूरी काम सौंपा गया है,’’ निशा ने धीमी आवाज में कहा.

रिया दिनभर यह जानने को बेचैन थी कि बौस ने निशा पर किस तरह फंदा डाला और उस के साथ क्याक्या हुआ, लेकिन निशा टालती रही.

शाम को दफ्तर खत्म होने के बाद जब लोग घर जाने की तैयारी करने लगे, तब चपरासी ने रिया को खबर दी, ‘‘बौस आप को बुला रहे हैं.’’

उसे जाते देख कर निशा ने कहा, ‘‘लो, आज तुम्हारी बारी है. अच्छी तरह निबट लेना. मैं तो चली.’’

जब रिया बौस के केबिन में पहुंची, तो बौस ने कहा, ‘‘रिया, स्कौटलैंड से वहां की बड़ी फर्म का सचिव पीटर फेरी हमारी कंपनी के माल और फाइलों की जांच करने आया है. दिन में मैं ने उसे फैक्टरी में घुमाफिरा कर तो खुश कर दिया, लेकिन रात में वह होटल नाज में फाइलों की चैकिंग करेगा.

‘‘उस का कमरा नंबर 120 है. तुम्हें फाइलों की चैकिंग इस तरह करानी है, ताकि उसे कोई गड़बड़ी न मिले. तुम

इस मामले में काफी होशियार हो. पिछली रात मैं ने निशा से सारी फाइलें ठीक करा दी हैं.’’

‘‘सर, अगर आप निशा को ही मेरी जगह भेज देंगे, तो अच्छा रहेगा. विदेश से आए लोगों के पास हर बार मुझे ही जाना पड़ता है,’’ रिया ने अपनी बात रखी.

‘‘इसलिए कि तुम उन्हें बेहतर तरीके से खुश करती रही हो. निशा तो अभी ठीक से सीख भी नहीं पाई है.’’

‘‘उन में कुछ लोग ज्यादा ही परेशान  करते हैं,’’ रिया ने कहा.

‘‘नौकरी करनी है, तो यह सब भी बरदाश्त करना पड़ेगा. तुम्हें 10 हजार की तनख्वाह यों ही नहीं दी जाती. मेरा ड्राइवर तुम्हें तुम्हारे घर से होटल पहुंचाएगा. वहां का काम खत्म होने पर वह तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देगा.

‘‘तुम्हारे खानेपीने का इंतजाम पीटर फेरी के साथ ही रहेगा. अगर वह तुम्हारी सेवा से खुश हो गया, तो अपनी फर्म को और ज्यादा माल विदेश भेजने में सहूलियत होगी,’’ बौस ने समझाया.

‘‘अब मैं जाऊं सर?’’ रिया ने पूछा.

‘‘जाओ. खयाल रखना,’’ बौस ने मुसकरा कर उसे विदा किया.

दूसरे दिन रिया दफ्तर नहीं आई. रातभर उसे होटल नाज में रहना पड़ा था.

तीसरे दिन रिया चहकते हुए निशा से बोली, ‘‘मैं बहुत खुश हूं. मैं तुम से अपनी खुशी का इजहार रैस्टोरैंट में करना चाहती हूं. चलो, वहां चलें.’’

‘‘लेकिन…’’

‘‘इस समय मूड मत खराब करो,’’ कहते हुए रिया निशा को खींच कर रैस्टोरैंट ले गई.

रैस्टोरैंट में रिया ने निशा के लिए कौफी और अपने लिए ह्विस्की और नाश्ते का और्डर दिया.

‘‘आज मैं दफ्तर नहीं जाऊंगी. तुम जा कर बौस को बता देना कि मैं बहुत थकी हुई हूं. वे समझ जाएंगे कि मुझे स्कौटलैंड से आए पीटर फेरी की रातभर सेवा करनी पड़ी थी.’’

‘‘अब मैं समझ,’’ निशा हंसते हुए रिया से बोली.

रिया ने मुसकराते हुए बताया, ‘‘यार, पीटर फेरी तो गजब का मर्द निकला. मैं ने आज तक ऐसा दिलदार मर्द नहीं देखा. वह पूरी रात मेरे जिस्म से खेलता रहा.

‘‘मैं ने उसे कई बार फाइल पढ़ने के लिए कहा, लेकिन नशे में वह केवल हर पन्ने पर सही का निशान लगाते हुए दस्तखत करता रहा.

‘‘वह बारबार मेरी तारीफों के पुल बांधता रहा. उस की बातें सुन कर मैं भी मन ही मन खुश थी. हर औरत अपनी खूबसूरती की तारीफ सुन कर मर्द पर ज्यादा मेहरबान होती है.

‘‘न जाने कब किस मोड़ पर किसी से प्यार हो जाए, यह कहा नहीं जा सकता. हम लाख अपने दिल को समझाएं, नियम और मर्यादा में खुद को बांध कर रखें, मगर दिल अगर किसी पर मरमिटना चाहे, तो दिमाग कुछ नहीं सुनतासोचता.

‘‘उस मर्द के बच्चे ने मेरा सारा जिस्म निचोड़ डाला. जवानी एक ऐसा नशा होती है, जिस में औरत हो या मर्द, दोनों में मदहोशी बनी रहती है.

‘‘सच कहूं, पीटर फेरी इतना खुश था कि वह जातेजाते मेरे पर्स में 20 हजार रुपए रख गया और दोबारा मुझ से ही मिलने का वादा लेता गया.’’

इस के बाद कुछ देर तक दोनों में खामोशी रही, फिर रिया ने निशा से पूछा, ‘‘यार, तुम्हारी रात बौस के साथ कैसी कटी थी?’’

‘‘मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, क्योंकि जिस दिन ऐसी नौबत आएगी, मैं नौकरी से इस्तीफा दे दूंगी. वैसे, मैं तुम्हें बता दूं कि बौस मेरे साथ शादी करना चाहता है.

‘‘उस रात वह मुझे बारबार यही समझाता रहा कि उस से शादी कर के मैं बेहद खुश रहूंगी, क्योंकि अभी तक उसे ऐसी कोई लड़की पसंद नहीं आई, जिसे वह अपना हमसफर बना सके.

‘‘उस ने मुझे यह भी बताया कि तुम ने उस पर कई बार डोरे डालने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही.

‘‘सच पूछो, तो तुम ऐसे ही काम निबटाने के लिए फर्म में रखी गई हो. जैसेजैसे फर्म की आमदनी बढे़गी, तुम्हारी तनख्वाह भी बढ़ेगी.

‘‘एक बात याद रखना. इस नौकरी को छोड़ने के बाद तुम्हें ऐसा सुनहरा मौका नहीं मिलेगा. विदेशी लोग तो कभीकभी आते हैं, लेकिन तुम ने दूसरों को ज्यादा जोश दिखाया, तो कहीं की नहीं रहोगी, इसलिए बेहतर होगा कि किसी को अपना जीवनसाथी बना कर इस काम को छोड़ दो.

‘‘कुछ नहीं तो अपने बौस पर ही फंदा कसना शुरू करो. शायद वह तुम्हारे बस में आ जाए, क्योंकि इस कला में तुम काफी माहिर हो.’’

‘‘वह ऐसा नहीं है, जिस पर मेरे हुस्न का जादू चल सके,’’ रिया बोली.

‘‘फिर तुम ने कैसे सोच लिया कि मैं एक ही रात में उस की गुलाम बन गई थी. वह चाहता तो नशे में मेरे साथ बदसुलूकी कर सकता था, पर हिम्मत नहीं बटोर सका.

‘‘जिंदगी में हर किसी का एक सपना होता है. उसे पूरा करने के लिए कुछ लोग तुम्हारा रास्ता चुनते हैं, तो कुछ मेरी तरह कड़ी मेहनत करते हैं,’’ इतना कह कर निशा वहां से चली गई.

मेरे कपड़े उन के कपड़े : कैरैक्टर की कहानी

खैर, कैरैक्टर तो मैं अपना बहुत पहले नीलाम कर चुका हूं. यह जो मेरे पास दोमंजिला मकान, आलीशान गाड़ी है, सब मैं ने अपना कैरैक्टर नीलाम करने के बाद ही हासिल की है. इनसान जिंदगी में चाहे कितनी ही मेहनत क्यों न करे, पर जब तक वह अपने कैरैक्टर को बंदरिया के मरे बच्चे सा अपने से चिपकाए रखता है, तब तक भूखा ही मरता है.

इधर बंदे ने अपना कैरैक्टर नीलाम किया, दूसरी ओर हर सुखसुविधा ने उसे सलाम किया. कहने वाले जो कहें सो कहते रहें, पर अपना तजरबा है कि जब तक बंदे के पास कैरैक्टर है, उस के पास केवल और केवल गरीबी है.

पर कैरैक्टर नीलाम करने के बाद कमबख्त फिर गरीबी आन पड़ी. जमापूंजी कितने दिन चलती है? अब मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपना क्या नीलाम करूं? अनारकली होता, तो मीना बाजार जा पहुंचता.

जब मुझे पता चला कि उन के कपड़े डेढ़ करोड़ रुपए में बिके, तो अपना तो कलेजा ही मुंह को आ गया. लगा, मेरे लिए नीलामी का एक दरवाजा और खुल गया. जिस के कपड़े ही डेढ़ करोड़ के नीलाम हो रहे हों, वह बंदा आखिर कितना कीमती होगा?

बस, फिर क्या था. मुझे उन के कपड़ों की नीलामी की बोली के अंधेरे में उम्मीद की किरण नहीं, बल्कि दोपहर का चमकता सूरज दिखा और मैं ने आव देखा न ताव, अपने और बीवी के सारे कपड़ों के साथ पड़ोसी की बीवी के भी चार फटेपुराने कपड़ों की गठरी बांधी और लखपति होने के सपने लेता बाजार चलने को हुआ, तो बीवी ने टोका, ‘‘अब ये मेरे कपड़े कहां लिए जा रहे हो? पागलपन की भी हद होती है.’’

‘‘मैं बाजार जा रहा हूं… नीलाम करने,’’ मैं ने ऐसा कहा, तो बीवी चौंकी, ‘‘अपना सबकुछ नीलाम करने के बाद अब कपड़े भी नीलाम करने की नौबत आ गई क्या?’’

‘‘आई नहीं. नौबत क्रिएट कराई है उन्होंने. तेरेमेरे इन कपड़ों में मुझे लाखों रुपए की कमाई दिख रही है. चल फटाफट बंधी गांठ उठवा और शाम को मेरे आते ही लखटकिया की बीवी हो जा.’’

‘‘पर, इन कपड़ों को कौन गधा खरीदेगा?’’ कहते हुए वह परेशान हो गई.

‘‘अरी भागवान, ये कोई मामूली कपड़े नहीं हैं, बल्कि ये लैलामजनूं, हीररांझा, शीरींफरहाद के ऐतिहासिक कपड़े हैं.

‘‘तू भी न… सारा दिन टैलीविजन के पास बैठीबैठी बस सासबहू के सीरियल ही देखती रहती है. कभी समाचार सुनने नहीं, तो कम से कम देख ही लिया कर. उन के कपड़े की एक जोड़ी डेढ़ करोड़ रुपए में बिकी. हो सकता है कि लाखों रुपए में न सही, तो कम से कम हजारों रुपए में अपने ये कपड़े भी कोई खरीद ले.’’

‘‘घर में कोई जोड़ी बदलने के लिए भी छोड़ी है कि नहीं? कोई क्या पागल है, जो हमारे न पहनने लायक कपड़ों की बोली लगाएगा?’’

यह मेरी बीवी भी न, जब देखो शक में ही जीती रहती है.

‘‘क्यों न लगाएगा… मैं अपने कपड़ों को चमत्कारी रंग दे कर ऐसा प्रचार करूंगा कि… मसलन, ये कपड़े मेरी बीवी को हीर ने उसे तब दिए थे, जब वह पहली बार मुझ से मंदिर जाने के बहाने मिलने आई थी.

‘‘और ये कपड़े मेरी बीवी को लैला ने हमारी फर्स्ट मैरिज एनिवर्सरी पर दिए थे. यह वाला सूट हीर ने उसे उस की बर्थडे पर गिफ्ट किया था.

‘‘यह सूट तो तुम्हें महारानी विक्टोरिया ने खुद अपने हाथों से सिल कर दिया था. और मेरा कुरतापाजामा मजनूं ने मेरी शादी पर तब मुझे पहनाया था, जब मैं घोड़ी लायक पैसे न होने के चलते गधे पर शान से बैठ कर तुम्हें ब्याहने गया था.

‘‘यह तौलिया महात्मा गांधी का है, जिस से वे अपनी नाक पोंछा करते थे. यह उन्होंने मेरे दादाजी को भेंट में दिया था. यह रूमाल जवाहरलाल नेहरू का है. मेरे पिताजी जब 15 अगस्त को उन से मिलने गए थे, तो लालकिले पर झंडा फहराने के बाद इसे उन्होंने उन्हें उपहार के तौर पर दिया था.’’

‘‘और यह मफलर?’’

‘‘रहने दे. इसे बाद में देखेंगे. इसे कुछ काम तो करने दे,’’ जब मैं बोला, तो पहली बार उसे मुझ पर यकीन हुआ और उस ने कोई सवाल नहीं उठाया.

उलटे सुनहरे ख्वाब बुनते हुए मैं ने अपने सिर पर कपड़ों की बंधी गांठ रखी और मैं एक बार फिर अपने माल को नीलाम करने बाजार में जा खड़ा हुआ.

बाजार में पहुंचते ही खाली जगह देख कर दरी बिछाई और अपने और अपनी परीजादी को गिफ्ट में मिले सारे कपड़े उस पर बिखेर दिए.

पर यह क्या… एक घंटा बीता… 2 घंटे बीते… कोई कपड़ों के पास आ ही नहीं रहा था. उलटा, जो भी हमारे कपड़ों के पास से गुजर रहा था, नाक पर हाथ रख लेता. शाम तक मैं नीलामी करने वालों को टुकुरटुकुर ताकता रहा. अब समस्या यह कि गांठ जो बांध भी लूं, तो उठवाए कौन?

तभी एक पुलिस वाला आ धमका. वह डंडे से मेरी बीवी के कपड़ों को टटोलने लगा, तो मुझे उस की इस हरकत पर बेहद गुस्सा आया. पर बाजार की बात थी, सो चुप रहा.

‘‘अरे, यह सब क्या है? चोरी के कपड़े हैं क्या? यमुना के किस छोर से चिथड़े उठा लाया?’’

‘‘नहीं साहब, ये वाले हीर के हैं, ये वाले लैला के हैं. ये वाले मजनूं के हैं और ये वाले ओबामा की जवानी के दिनों के…

‘‘और ये…

‘‘फरहाद के…’’

‘‘छि:, इतने गंदे?’’

‘‘बरसों से धोए नहीं हैं न साहब. जस के तस संभाल कर रखे हैं.’’

‘‘मतलब, पुलिस वाले को उल्लू बना रहा है?’’

‘‘उल्लू… और आप को? मर जाए, जो आप को उल्लू बनाए,’’ कह कर मैं ने उस के दोनों पैरों को हाथ लगाया, तो वह आगे बोला, ‘‘म्यूजियम से चुरा कर लाया है क्या?’’ कह कर वह मुसकराता हुआ मेरी जेब में झांकने लगा, तो मैं ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘साहब, उन की देखादेखी मैं भी इन्हें नीलाम करने ले आया था.’’

‘‘पता है, वे किस के कपड़े थे? चल उठा जल्दी से इन गंदे कपड़ों को, वरना…’’

तभी सामने से पुराने कपड़े लेने वाली एक औरत आ धमकी और कमर नचाते हुए बोली, ‘‘ऐ, क्या लोगे इन सब पुराने कपड़ों का? 2 पतीले लेने हों, तो जल्दी बोलो…’’

मास्साबों का दर्द : गांवभर की भौजाई क्यों हो गए हैं मास्साब

हमारे गांवदेहात में एक कहावत मशहूर है कि ‘गरीब की लुगाई गांवभर की भौजाई’. कुछ यही हाल हमारे देश के मास्साबों का हो गया है. सरकार ने इन्हें भी गांवभर की भौजाई समझ लिया है. जनगणना से ले कर पशुगणना तक, ग्राम पंचायत के पंच से ले कर संसद सदस्य तक के चुनाव मास्साबों के जिम्मे है.

किस गांव में कितने कमउम्र बच्चों को पोलियो की खुराक देनी है, गांव के कितने मर्दऔरतों ने नसबंदी कराई है, कितने बच्चों के जाति प्रमाणपत्र कचहरी में धूल खा रहे हैं, कितनों की आईडी रोजगार सहायक के कंप्यूटर में कैद है, कितने परिवार गरीबी की रेखा के नीचे दब कर छटपटा रहे हैं और कितने गरीबी की रेखा को पीछे सरकाते हुए आगे निकल गए हैं, कितने परिवार घर में शौचालय न होने के चलते खुले में शौच करते हैं. कितने लोगों के आधार कार्ड नहीं बने हैं, कितनों के बैंक में लिंक नहीं हुए, बच्चों का वजीफा, साइकिल, खाता खोलने के लिए बैंकों के कितने चक्कर लगाने हैं, इन सब बातों की जानकारी भला मास्साबों से बेहतर कौन जान सकता है. सरकार ने मास्साबों के इसी हुनर को देख कर पढ़ाई को छोड़ कर बाकी सारे काम उन्हें दे रखे हैं. सरकार जानती है कि पढ़ाई का क्या है, वह तो बच्चे को जिंदगीभर करनी है. पढ़ाईलिखाई के महकमे की बैठकों में अफसर पढ़ाई को छोड़ कर बाकी सारी बातें करते हैं. किसी गांव को पूरी तरह पढ़ालिखा बनाना मास्साबों को बाएं हाथ का खेल लगता है.

मास्साब कहते हैं कि हम तो सरकारी आदेशों के गुलाम हैं. सरकार जो चाहे खुशीखुशी कर देते हैं. आखिर पगार काहे की लेते हैं. सरकार द्वारा दिए गए लोगों के भले के कामों की वजह से मास्साब की ईमानदारी पर शक किया जाने लगा है. जब सरकारी स्कूलों में मास्साब कभी किचन शैड, शौचालय या ऐक्स्ट्रा कमरा बनाने का काम कराते हैं, तो वे देश के लिए इंजीनियर और ठेकेदार का रोल भी निभाते हैं. यही बात गांव वालों को खलती है और वे मास्साब की ईमानदारी पर भी बेवजह शक करने लगते हैं. गांवों में अकसर ही लोगों को यह शिकायत रहती है कि मास्साब नियमित स्कूल नहीं आते, बच्चों को ठीक से नहीं पढ़ाते, घर में कोचिंग क्लास चलाते हैं.

अरे जनाब, आप को पता होना चाहिए कि बच्चे मास्साब के कंधों पर कितना बड़ा बोझ हैं. बच्चे भी क्या कम हैं, वे स्कूल पढ़ने नहीं रिसर्च करने आते हैं. बच्चे मास्साब के स्मार्टफोन का मजा लेते हैं. ह्वाट्सऐप पर भेजे वीडियो व फोटो को भी वे शेयर करते हैं. मास्साब की फेसबुक पर वे कमैंट करने में भी पीछे नहीं हैं. कभी मास्साब को समय मिलता है और वे लड़कों को भारत का इतिहास पढ़ाते हैं, तो भी क्लास की लड़कियों के इतिहास की जानकारी लेने में बिजी रहते हैं. लड़कियों के इतिहास पर लड़कों

की रिसर्च चलती रहती है. इस के लिए थीसिस, जिसे नासमझ प्रेमपत्र भी कहते हैं, लिखने का काम भी करते हैं, तभी उन्हें पीएचडी यानी शादी बतौर अवार्ड मिल पाती है. यह बात और है कि ज्यादातर लड़कों का इस काम में भूगोल बिगड़ने का खतरा रहता है. रिजल्ट भी खराब आता है, जिस की जिम्मेदारी मास्साबों पर थोपी जाती है. लड़कों की गलतियों की सजा मास्साबों की वेतन वृद्धि रोक कर वसूल की जाती है.

यही वजह है कि मास्साब कभीकभी नकल की खुली छूट दे देते हैं. इस से रिजल्ट भी अच्छा बन जाता है और छात्रों की नजर में मास्साब की इज्जत भी बढ़ जाती है. इस तरह मास्साब एक पंथ दो काज निबटा लेते हैं. मास्टरी के क्षेत्र में औरतों की चांदी है. मैडमजी सुबहसवेरे ही सजसंवर कर स्कूल चली जाती हैं और चूल्हाचौका सासूजी के मत्थे मढ़ जाती हैं.

कुमारियां तो स्कूल को किसी फैशन परेड का रैंप समझती हैं, तो श्रीमतियां अपने घर के काम निबटा लेती हैं. वे स्कूल समय में मटर छील लेती हैं, पालकमेथी के पत्तों को तोड़ कर सब्जी बनाने की पूरी तैयारी कर लेती हैं. कभीकभार जब समय नहीं रहता, तो स्कूल के मिड डे मील की बची हुई रेडीमेड सब्जीपूरी भी घर ले जाती हैं. ठंड के दिनों में स्वैटर बुनने की सब से अच्छी जगह सरकारी स्कूल ही होती है, जहां पर कुनकुनी धूप में बच्चों को मैदान में बिठा कर उन्हें जोड़घटाने के सवालों में उलझा कर मैडम अपने पति के स्वैटर के फंदों का जोड़घटाना कर ह्वाट्सऐप के मजे लेती हैं.

कुछ मैडमें अपने नन्हेमुन्ने बच्चों को भी साथ में स्कूल ले आती हैं, जिन के लालनपालन की जिम्मेदारी क्लास के गधा किस्म के बच्चों की होती है. उन की इस सेवा के बदले उन का प्रमोशन अगली क्लास में कर दिया जाता है. जब से सरकार ने मास्साबों की भरती में औरतों को 50 फीसदी रिजर्वेशन व उम्र की सीमा को खत्म किया है, तब से सास बनी बैठी औरतों ने भी मास्टरनी बनने की ठानी है. अब देखना यही है कि रसोई की कमान मर्दों के हाथों में आती है या नहीं?

देश के महामहिम राष्ट्रपति रह चुके डा. राधाकृष्णन के जन्मदिन 5 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है. स्कूली बच्चे चंदा कर के मास्साब के लिए शाल और चायबिसकुट का इंतजाम करते हैं.

देश के राष्ट्रपति द्वारा इस दिन दिल्ली में होनहार मास्साबों को सम्मानित किया जाता है. कुछ मास्साब यहां भी अपने हुनर को दिखा कर टैलीविजन चैनलों पर अवार्ड लेते दिख जाते हैं. अवार्ड लेने के बाद मास्साबों को गांवगांव, गलीगली में सम्मानित किया जाता है. इसी चक्कर में मास्साब कईकई दिनों तक स्कूल नहीं पहुंच पाते. पर कभीकभार स्कूल के हाजिरी रजिस्टर पर दस्तखत कर उसे भी गौरवान्वित कर आते हैं.

ठीक ही तो है कि सारी ईमानदारी का बोझ अकेले मास्साबों के कंधों पर नहीं डाला जा सकता. जब से देश को बनाने की जिम्मेदारी अंगूठा लगाने वाले जनप्रतिनिधि निभाने लगे हैं, तब से मास्साबों को शर्म आने लगी है. इतनी पढ़ाई के बाद भी मास्साब अंगूठे की छाप नहीं बदल सके? काश, मास्साबों का यह दर्द कोई समझ पाता.

फर्क कथनी और करनी का : सुच्चामल फैला रहा था रायता

सुच्चामल हमारी कालोनी के दूसरे ब्लौक में रहते थे. हर रोज मौर्निंग वाक पर उन से मुलाकात होती थी. कई लोगों की मंडली बन गई थी. सुबह कई मुद्दों पर बातें होती थीं, लेकिन बातों के सरताज सुच्चामल ही होते थे. देशदुनिया का ऐसा कोई मुद्दा नहीं होता था जिस पर वे बात न कर सकें. उस पर किसी दूसरे की सहमतिअसहमति के कोई माने नहीं होते थे, क्योंकि वे अपनी बात ले कर अड़ जाते थे. उन की खुशी के लिए बाकी चुप हो जाते थे. बड़ी बात यह थी कि वे, सेहत के मामले में हमेशा फिक्रमंद रहते थे. एकदम सादे खानपान की वकालत करते थे. मोटापे से बचने के कई उपाय बताते थे. दूसरों को डाइट चार्ट समझा देते थे. इतना ही नहीं, अगले दिन चार्ट लिखित में पकड़ा देते थे. फिर रोज पूछना शुरू करते थे कि चार्ट के अनुसार खानपान शुरू किया कि नहीं. हालांकि वे खुद भी थोड़ा थुलथुल थे लेकिन वे तर्क देते थे कि यह मोटापा खानपान से नहीं, बल्कि उन के शरीर की बनावट ही ऐसी है.

एक दिन सुबह मुझे काम से कहीं जाना पड़ा. वापस आया, तो रास्ते में सुच्चामल मिल गए. मैं ने स्कूटर रोक दिया. उन के हाथ में लहराती प्लास्टिक की पारदर्शी थैली को देख कर मैं चौंका, चौंकाने का दायरा तब और बढ़ गया जब उस में ब्रैड व बड़े साइज में मक्खन के पैकेट पर मेरी नजर गई. मैं सोच में पड़ गया, क्योंकि सुच्चामल की बातें मुझे अच्छे से याद थीं. उन के मुताबिक वे खुद भी फैटी चीजों से हमेशा दूर रहते थे और अपने बच्चों को भी दूर रखते थे. इतना ही नहीं, पौलिथीन के प्रचलन पर कुछ रोज पहले ही उन की मेरे साथ हुई लंबीचौड़ी बहस भी मुझे याद थी.

वे पारखी इंसान थे. मेरे चेहरे के भावों को उन्होंने पलक झपकते ही जैसे परख लिया और हंसते हुए पिन्नी की तरफ इशारा कर के बोले, ‘‘क्या बताऊं भाईसाहब, बच्चे भी कभीकभी मेरी मानने से इनकार कर देते हैं. कई दिनों से पीछे पड़े हैं कि ब्रैडबटर ही खाना है. इसलिए आज ले जा रहा हूं. पिता हूं, बच्चों का मन रखना भी पड़ता है.’’

‘‘अच्छा किया आप ने, आखिर बच्चों का भी तो मन है,’’ मैं ने मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं बृजमोहन, आप को पता है मैं खिलाफ हूं इस के. अधिक वसा वाला खानपान कभीकभी मेरे हिसाब से तो बहुत गलत है. आखिर बढ़ते मोटापे से बचना चाहिए. वह तो श्रीमतीजी भी मुझे ताना देने लगी थीं कि आखिर बच्चों को कभी तो यह सब खाने दीजिए, तब जा कर लाया हूं.’’ थोड़ा रुक कर वे फिर बोले, ‘‘एक और बात.’’

‘‘क्या?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा, तो वे नाखुशी वाले अंदाज में बोले, ‘‘मुझे तो चिकनाईयुक्त चीजें हाथ में ले कर भी लगता है कि जैसे फैट बढ़ रहा है, चिकनाई तो दिल की भी दुश्मन होती है भाईसाहब.’’

‘‘आइए आप को घर तक छोड़ दूं,’’ मैं ने उन्हें अपने स्कूटर पर बैठने का इशारा किया, तो उन्होंने सख्त लहजे में इनकार कर दिया, ‘‘नहीं जी, मैं पैदल चला जाऊंगा, इस से फैट घटेगा.’’

आगे कुछ कहना बेकार था क्योंकि मैं जानता था कि वे मानेंगे ही नहीं. लिहाजा, मैं अपने रास्ते चला गया.

2 दिन सुच्चामल मौर्निंग वौक पर नहीं आए. एक दिन उन के पड़ोसी का फोन आया. उस ने बताया कि सुच्चामल को हार्टअटैक आया है. एक दिन अस्पताल में रह कर घर आए हैं. अब मामला ऐसा था कि टैलीफोन पर बात करने से बात नहीं बनने वाली थी. घर जाने के लिए मुझे उन की अनुमति की जरूरत नहीं थी. यह बात इसलिए क्योंकि वे कभी भी किसी को घर पर नहीं बुलाते थे बल्कि हमारे घर आ कर मेरी पत्नी और बच्चों को भी सादे खानपान की नसीहतें दे जाते थे.

मैं दोपहर के वक्त उन के घर पहुंच गया. घंटी बजाई तो उन की पत्नी ने दरवाजा खोला. मैं ने अपना परिचय दिया तो वे तपाक से बोलीं, ‘‘अच्छाअच्छा, आइए भाईसाहब. आप का एक बार जिक्र किया था इन्होंने. पौलिथीन इस्तेमाल करने वाले बृजमोहन हैं न आप?’’

‘‘ज…ज…जी भाभीजी.’’ मैं थोड़ा झेंप सा गया और समझ भी गया कि अपने घर में उन्होंने खूब हवा बांध रखी है हमारी. सुच्चामल के बारे में पूछा, तो वे मुझे अंदर ले गईं. सुच्चामल ड्राइंगरूम के कोने में एक दीवान पर पसरे थे. मैं ने नमस्कार किया, तो उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आई. चेहरे के भावों से लगा कि उन्हें मेरा आना अच्छा नहीं लगा था. हालचाल पूछा, ‘‘बहुत अफसोस हुआ सुन कर. आप तो इतना सादा खानपान रखते हैं, फिर भी यह सब कैसे हो गया?’’

‘‘चिकनाई की वजह से.’’ जवाब सुच्चामल के स्थान पर उन की पत्नी ने थोड़ा चिढ़ कर दिया, तो मुझे बिजली सा झटका लगा, ‘‘क्या?’’

‘‘कैसे रोकूं अब इन्हें भाईसाहब. ऐसा तो कोई दिन ही नहीं जाता जब चिकना न बनता हो. कड़ाही में रिफाइंड परमानैंट रहता है. कोई कमी न हो, इसलिए कनस्तर भी एडवांस में रखते हैं.’’ उन की बातों पर एकाएक मुझे विश्वास नहीं हुआ.

‘‘लेकिन भाभीजी, ये तो कहते हैं कि चिकने से दूर रहता हूं?’’

‘‘रहने दीजिए भाईसाहब. बस, हम ही जानते हैं. किचेन में दालों के अलावा आप को सब से ज्यादा डब्बे तलनेभूनने की चीजों से भरे मिलेंगे. बेसन का 10 किलो का पैकेट 15 दिन भी नहीं चलता. बच्चे खाएं या न खाएं, इन को जरूर चाहिए. बारिश की छोड़िए, आसमान में थोड़े बादल देखते ही पकौड़े बनाने का फरमान देते हैं.’’

यह सब सुन कर मैं हैरान था. सुच्चामल का चेहरा देखने लायक था. मन तो किया कि उन की हर रोज होने वाली बड़ीबड़ी बातों की पोल खोल दूं, लेकिन मौका ऐसा नहीं था. सुच्चामल हमेशा के लिए नाराज भी हो सकते थे. यह राज भी समझ आया कि सुच्चामल अपने घर हमें शायद पोल खुलने के डर से क्यों नहीं बुलाना चाहते थे. इस बीच, डाक्टर चैकअप के लिए वहां आया. डाक्टर ने सुच्चामल से उन का खानपान पूछा, तो वह चुप रहे. लेकिन पत्नी ने जो डाइट चार्ट बताया वह कम नहीं था. सुच्चामल सुबह मौर्निंग वाक से आ कर दबा कर नाश्ता करते थे.

हर शाम चाय के साथ भी उन्हें समोसे चाहिए होते थे. समोसे लेने कोई जाता नहीं था, बल्कि दुकानदार ठीक साढ़े 5 बजे अपने लड़के से 4 समोसे पैक करा कर भिजवा देता था. सुच्चामल महीने में उस का हिसाब करते थे. रात में भरपूर खाना खाते थे. खाने के बाद मीठे में आइसक्रीम खाते थे. आइसक्रीम के कई फ्लेवर वे फ्रिजर में रखते थे. मैं चलने को हुआ, तो मैं ने नजदीक जा कर समझाया, ‘‘चलता हूं सुच्चामल, अपना ध्यान रखना.’’

‘‘ठीक है.’’

‘‘चिकने से परहेज कर के सादा खानपान ही कीजिए.’’

‘‘मैं तो सादा ही…’’ उन्होंने सफाई देनी चाही, लेकिन मैं ने बीच में ही उन्हें टोक दिया, ‘‘रहने दीजिए, तारीफ सुन चुका हूं. डाक्टर साहब को भी भाभीजी ने आप की सेहत का सारा राज बता दिया है.’’ मेरी इस सलाह पर वे मुझे पुराने प्राइमरी स्कूल के उस बच्चे की तरह देख रहे थे जिस की मास्टरजी ने सब से ज्यादा धुनाई की हो. अगले दिन मौर्निंग वाक पर गया, तो हमारी मंडली के लोगों को मैं ने सुच्चामल की तबीयत के बारे में बताया, तो वे सब हैरान रह गए.

‘‘कैसे हुआ यह सब?’’ एक ने पूछा, तो मैं ने बताया, ‘‘अजी खानपान की वजह से.’’

एक सज्जन चौंक कर बोले, ‘‘क्या…? इतना सादा खानपान करते थे, ऐसा तो नहीं होना चाहिए.’’

‘‘अजी काहे का सादा.’’ मेरे अंदर का तूफान रुक न सका और सब को हकीकत बता दी. मेरी तरह वे भी सुन कर हैरान थे. सुच्चामल छिपे रुस्तम थे. कुछ दिनों बाद सुच्चामल मौर्निंग वाक पर आए, लेकिन उन्होंने खानपान को ले कर कोई बात नहीं की. 1-2 दिन वे बोझिल और शांत रहे. अचानक उन का आना बंद हो गया.

एक दिन पता चला कि वे दूसरे पार्क में टहल कर लोगों को अपनी सेहत का वही ज्ञान बांट रहे हैं जो कभी हमें दिया करते थे. हम समझ गए कि सुच्चामल जैसे लोग ज्ञान की गंगा बहाने के रास्ते बना ही लेते हैं. यह भी समझ आ गया कि कथनी और करनी में कितना फर्क होता है. सुच्चामल से कभीकभी मुलाकात हो जाती है, लेकिन वे अब सेहत के मामले पर नहीं बोलते.

मायके जाने की धमकी : मिर्जा को आया गुस्सा

उस दिन मिर्जा इस तरह से फुफकारते हुए चले आ रहे थे, जैसे जलेबी का खमीर उबाल खा रहा हो. बाल ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे तूफान आने के बाद पेड़ गिरे होते हैं. जुमे का दिन और… दिन के 11 बजे मिर्जा मैलेकुचैले कपड़ों में? देखते ही मुझ पर तो जैसे आसमान की बिजली गिर पड़ी.

मैं ने अपनेआप को बड़ी मुश्किल से काबू में किया और मन ही मन कहा. ‘जलते जलाल तू, कुदरत कमाल तू, आई बला को टाल तू,’ फिर झपट कर मिर्जा का हाथ थामा और कहा, ‘‘मिर्जा, यह तुम ही हो…’’

ऐसा सुनना था कि मिर्जा गरजते हुए बोले, ‘‘तो क्या तुझे मोनिका लेवेंस्की दिखाई दे रही है?’’

मैं ने मौके की नजाकत को समझा और कहा, ‘‘यार, मैं ने तो यों ही कहा था. पहले अंदर आओ.’’

उन्हें सोफे पर बैठाते हुए मैं बोला, ‘‘देख मिर्जा, मैं तेरा लंगोटिया यार हूं. मुझे बता कि आज तू ने जुमे की तैयारी क्यों नहीं की? जुमे के दिन 11 बजे तक तो तुम दूल्हे की तरह सजसंवर कर जामा मसजिद में इमाम साहब के सामने खड़े हो कर अजान पढ़ा करते थे. लेकिन आज यहां पर, वह भी इस हालत में… कहीं भाभी ने…’’

मैं बात पूरी उगल भी न पाया था कि मिर्जा गरजते हुए बोले, ‘‘अगर तू वाकई मेरा सच्चा यार है, तो बता कि शादी पर औरत ही क्यों ब्याह कर लाई जाती है? मर्द को ब्याह कर ससुराल क्यों नहीं ले जाया जाता?’’

यह सुनते ही मेरा दिमाग घूम गया. मैं ने हंस कर कहा, ‘‘यार मिर्जा, तू यह बता कि पान की लत तो खैर तुम्हें विरासत में ही मिली है, अब कहीं भांग वगैरह तो नहीं लेनी शुरू कर दी?’’

मिर्जा तमतमा उठे और बोले, ‘‘एक मुसलमान पर इस तरह की तुहमत लगाते हो. क्या तू ने मुझे काफिर समझा है? मैं पक्का मुसलमान हूं और सात वक्त की नमाज पढ़ता हूं.’’

अब तो मेरा वहम यकीन में बदल चुका था. शायद खुदा ने दो वक्त अलग से मिर्जा को दिए हैं. तभी मिर्जा बोले, ‘‘मैं इशराक व तहज्जुद 12 महीने की पढ़ता हूं.’’ इस के बाद मिर्जा खड़े होते हुए बोले, ‘‘तू भी मेरा दुख बांटने वाला वह सच्चा यार नहीं रहा.’’

मिर्जा की आवाज भर्रा गई थी और गला रुंध गया था. मैं ने सोफे पर बैठाते हुए मिर्जा को समझाया, ‘‘तुम गलत समझ रहे हो. मुझे आज भी तुम से उतनी ही हमदर्दी है, जितनी कभी कुंआरेपन में भी नहीं रही होगी.’’

‘‘तो क्या औरतों के मायके जाने की धमकी जायज है?’’ मिर्जा बोले. मेरी समझ में अब सारा माजरा आ रहा था कि आज जरूर इन की बेगम ने मायके जाने की धमकी दी है और यह जोरू का परमानैंट गुलाम मिर्जा उसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा है.

मैं ने कहा, ‘‘जायज तो नहीं है, पर मर्दों से लड़ने के वास्ते फर्स्ट क्वालिटी का हथियार तो यही है न?’’ इतना सुनते ही मिर्जा एकदम आपे से बाहर हो गए और बोले, ‘‘तो क्या दूसरा हथियार भी होता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां मिर्जा, तुम तो खुशनसीब हो, जो भाभी ने अपना दूसरा हथियार यानी बेलन तुम्हें नहीं दिखाया.’’

मिर्जा गुस्से में भड़क कर चिल्लाए, ‘‘अरे बेवकूफ, मत पूछ कि आज तो उस ने अमेरिका इराक युद्ध की तरह अपने बड़े हथियार का भी इस्तेमाल कर लिया. यह तो अच्छा हुआ कि मैं किवाड़ के पास खड़ा था, फुरती से उस की आड़ ले ली, नहीं तो जुमे की नमाज के साथ आज तो अपनी भी नमाजे जनाजा अदा की जाती.’’

मैं ने मिर्जा से कहा, ‘‘चलो, अच्छा हुआ, लेकिन अभी तक तुम्हारी दूल्हा ब्याह कर ले जाने वाली बात समझ में नहीं आई.’’

यह सुन कर मिर्जा कुछ संजीदा हो कर बोले, ‘‘देख, ध्यान से सुन. घर में तकरार होने पर बीवी हमेशा मायके जाने की धमकी देती है और यह धमकी अच्छेअच्छे मर्द को मेमने की तरह मिमियाने को मजबूर कर देती है.

‘‘अगर दूल्हा ब्याह कर ससुराल ले जाया जाता, तो बेलन वगैरह का खतरा होने पर मायके जाने की धमकी को काम में ला सकता था और मर्द सीना तान कर ससुराल में शान से राज करता.’’

मैं ने मिर्जा की बात पर दिखावटी हमदर्दी दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो, जैसे एक जीभ बत्तीस दांतों से घिरी हो कर काबू में नहीं रह सकती, उसी तरह औरत ससुराल में अकेली सभी पर भारी पड़ती है. ‘‘अगर तुम्हारे चालू फार्मूले पर समाज चलता, तो बच्चू मिर्जा, खोपड़ी का नटबोल्ट कस कर समझ ले कि अगर दूल्हा ससुराल में रहता, तो पता है क्या होता? होता यह कि पत्नी बेलन से तुम्हारा सिर तोड़ती.

‘‘अगर जीजा साले की बहन को घूर कर भी धमकाता, तो वे उसे लठिया देते. सासससुर के उपदेश अलग से दिमाग चाट कर रख देते.‘‘सालियां अमरबेल की तरह तुम्हारे जेबरूपी पेड़ को परजीवी बन कर सुखा देतीं. सालों के बच्चों को जिद करने पर न जाने महीने में कितनी बार फिल्म दिखाने ले जाना पड़ता और तब भी वे घर आ कर कहते, ‘पापापापा, फूफाजी ने फिल्म तो दिखाई, पर हमें वहां चाट नहीं खिलाई.’

‘‘इस तरह तुम्हें बेकार में ही कंजूस मक्खीचूस की उपाधि मिल जाती. भले ही तुम ने चाट पर मक्खियों का परमानैंट कब्जा होने के चलते न खिलाई हो, पर इसे कोई नहीं मानता.

‘‘अगर चाट खिलाने से बच्चे बीमार पड़ जाते, तो सास ऐसे लताड़ती जैसे कि पता नहीं क्या खिला लाया. बड़ी मनौतियां मान कर 2 पोते हुए, इन्हें तो मार कर ही इस का कलेजा ठंडा होगा.

‘‘इसलिए मिर्जा, जो कायदेकानून हमारे बड़ों ने बनाए हैं, वे जरूर सोचसमझ कर ही बनाए हैं, इसलिए तू अपना दिल छोटा न कर और भाभी को अपने मन की भड़ास निकाल लेने दिया कर… समझे हजरत मिर्जा?’’

अब मिर्जा धीरेधीरे मुसकराए और बोले, ‘‘यार, वाकई आज तो तू ने कमाल कर दिया. इतने काम की बात मेरे दिमाग में आज तक क्यों नहीं आई? मैं ने इतनी उम्र यों ही गंवाई.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, अब जा कर घर में जुमे की नमाज अदा कर. और हां, दुआ में मुझे मत भूल जाना और भाभी की अच्छी सेहत की दुआ जरूर मांगना.’’ यह सुन कर मिर्जा झेंपते हुए अपने घर की तरफ चल दिए.

रहिमन दाढ़ी राखिए : आम आदमी का गणित

मैं जवानी के दिनों में कंजूस नस्ल का आदमी था, इसलिए आदतन हमेशा बचत की तरकीबों के बारे में ही सोचता रहता था. एक दिन जब मैं अपने पड़ोसी वर्माजी से अखबार मांग कर पढ़ रहा था, तो अखबार में छपी एक खबर देख कर मुझे झटका सा लगा. सूचना इस तरह से थी, ‘एक आदमी अपनी पूरी जिंदगी में दाढ़ी बनाने पर तकरीबन एक लाख रुपए और एक साल बरबाद कर देता है’. खबर पढ़ते ही मैं अपने दूसरे पड़ोसी शर्माजी के घर भागा.

उन से कैलकुलेटर ले कर अपनी दाढ़ी बनाने पर खर्च किए गए पैसों का हिसाब लगाने लगा. हिसाब लगाने के बाद मुझे थोड़ी राहत मिली कि मैं ने दाढ़ी बनाने पर ज्यादा खर्च नहीं किया है, क्योंकि मैं हमेशा अपनी दाढ़ी दूसरों के घर बनाना पसंद करता हूं. लेकिन, जज्बाती आदमी होने की वजह से मुझे अफसोस भी हुआ कि मेरी दाढ़ी के चक्कर में मेरा न सही, पर दूसरों का ही खर्च तो हुआ.

यह बात मेरे दिल में कील की तरह चुभ गई. इसलिए मैं ने उसी दिन तय कर लिया कि आज से दाढ़ी नहीं बनाऊंगा. इरादे पर अमल करते हुए 2 महीने बीत गए. मेरी दाढ़ी अच्छीखासी बढ़ गई थी. मैं चेहरे से आतंकवादी नजर आने लगा. इस का फायदा उठा कर मेरे एक दुश्मन पड़ोसी ने थाने में मेरी शिकायत कर दी कि मेरा चेहरा ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ में दिखाए गए एक दुर्दांत अपराधी से मिलता है. बस, पुलिस को और क्या चाहिए. पहुंच गई मेरे दरवाजे पर. पुलिस मुझे पकड़ कर ले जाने लगी.

किसी तरह एक हजार रुपए दे कर इस मुसीबत से पीछा छुड़ाया, लेकिन फिर भी मैं अपने इरादे पर डटा रहा. अचानक एक दिन मेरी मुलाकात पुरानी प्रेमिका रितु से हो गई, जो कुकिंग कोर्स करने के लिए अमेरिका गई हुई थी. वह तो मुझे देखते ही डर गई. उसे लगा कि मैं ने उस की जुदाई में ही देवदास की तरह दाढ़ी बढ़ा ली है. रितु अचानक चिल्लाते हुए बोली, ‘‘अगर इसी तरह मजनूछाप चेहरा बनाए रहे, तो मुझ से शादी करना तो दूर, तुम सगाई भी नहीं कर पाओगे.’’ दाढ़ी बनाने के लिए 2 रुपए का सिक्का मेरे हाथ में थमा कर वह पैर पटकती हुई चली गई. लेकिन, मैं भी धुन का पक्का था. मैं ने भी सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए, मैं अपने इरादे पर डटा रहूंगा, इसलिए मैं ने रितु का दिल तोड़ दिया. अब लोगों में मेरी अलग ही पहचान बन चुकी थी. मैं संन्यासी निरोधानंद के नाम से जाना जाने लगा था.

बढ़ी हुई दाढ़ी मेरे लिए वरदान साबित हुई. जैसा कि अपने देश में होता है, अचानक मेरे चमत्कार के चर्चे दूरदूर तक फैलने लगे. औरत, मर्द, बच्चे और बूढ़े मेरे पैर छू कर आशीर्वाद लेने लगे. इस से मैं खुशी से फूला न समाता था. लोग मेरी बातें सुनने के लिए बेचैन रहते थे. कोई मुझ से अपनी दिमागी तकलीफ का हल पूछता, तो कोई दूसरी तकलीफों से नजात पाने के बारे में पूछता. कोई अपने गुजरे समय के बारे में पूछता, तो कोई आने वाली जिंदगी के बारे में पूछता. ज्यादातर लोग तो इस लोक से ज्यादा परलोक के बारे में पूछते. मैं सभी को अपने जवाब से खुश कर के भेजता.

पहली बार मेरा संन्यासियों की ऐश्वर्य भरी जिंदगी से परिचय हुआ था. कल तक जो लड़कियां मुझे देखते ही मुंह बिदका कर भाग जाती थीं, अब वे मेरे पैर छू कर हंसते हुए अपना कोमल हाथ मेरे हाथ में दे कर अपनी तकदीर के बारे में जानना चाहती थीं. मैं उन की तकदीर बतातेबताते अपनी तकदीर पर फख्र कर उठता था. कभीकभी तो मुझे अपनेआप पर गुस्सा भी आता था कि मैं और पहले संन्यासी क्यों नहीं बना. अब तो यह हाल है कि मेरे महल्ले में कोई भी जलसा, मीटिंग या फिर किसी तरह का फंक्शन हो, मेरे बिना अधूरा समझा जाता है. किस लड़के या लड़की का रिजल्ट कैसा होगा? किस के घर लड़का होगा या लड़की होगी? किस की नौकरी लगेगी या नहीं? किस की शादी कब होगी? सभी का हिसाब मेरे पास है. अब तो कोई भी चढ़ावा चढ़ा कर अपनी तकदीर जान सकता था.

इस साल के चुनाव में तो गजब हो गया. मेरे इलाके के सांसद के पास मेरी जानकारी पहुंच गई. सुबह से ही वह मेरे आश्रम में पहुंच गए और सकुचाते हुए बोले, ‘‘देखिए स्वामीजी, अब आप के ऊपर ही मेरा सबकुछ टिका है. अगर आप चाहें, तो मुझे इस बार भी जनता की सेवा करने का मौका दिला सकते हैं. इस के बदले में आप को मुंहमांगा चढ़ावा मिलेगा.’’ मैं उन का दुख देख कर पिघल गया और उन्हें एक यज्ञ करने की नेक सलाह दे डाली. यज्ञ खत्म होतेहोते वह जीत भी गए. अब वह मुझे छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं. अब मैं उन का पारिवारिक सदस्य हूं व राजनीतिक सलाहकार भी.

पिछले दिनों उन के लड़के ने एक राह चलती लड़की के साथ बलात्कार कर दिया. लेकिन मेरी पहुंच की वजह से कोई उन का और उन के लड़के का बाल भी बांका न कर सका. अब धीरेधीरे मेरी पहुंच विदेशों में भी होने लगी है. माफिया वालों से तो मेरा संपर्क पहले से ही था. फिल्म वाले भी अब अपनी फिल्मों के मुहूर्त पर मुझे बुलाने लगे हैं. वहां जाने का मैं महज 5 लाख रुपए लेता हूं.

बहुत सारी हीरोइनें भी मेरी चेलियां बन गई हैं. कौन सी फिल्म पिटेगी या चलेगी, यह मेरे दिए गए ज्योतिष काल की तारीख पर फिल्म को रिलीज करने पर निर्भर करता है. मैं तकरीबन पूरी दुनिया घूम चुका हूं. देशविदेश में मेरे चेले बढ़ते जा रहे हैं. मेरे एयरकंडीशंड आश्रम की लंबाईचौड़ाई तकरीबन 3 एकड़ में है. फिलहाल तो मेरे पास 15 विदेशी गाडि़यां हैं. देश के सभी महानगरों में मेरी कोठियां भी हैं. मेरी जिंदगी बहुत ही अच्छे ढंग से गुजर रही है. अब तो बस एक ही तमन्ना है कि किसी तरह अमेरिका का राष्ट्रपति भी मेरा चेला बन जाए.

सोचा न था: अमन के साथ क्या हुआ था

सोचा न था इंजीनियरिंग करने के बावजूद अमन इतना ज्यादा लापरवाह था कि लगीलगाई नौकरी छोड़ आता था. इस बात से उस के पिता रामचरण इस कदर परेशान हुए कि उन्हें लकवा मार गया. अमन को मजबूरन ड्राइवर बनना पड़ा. तभी उस की मुलाकात एक रूसी लड़की सोफिया से हुई, जो उस के करीब आती चली गई.

दफ्तर से घर आते ही रामचरण चारपाई पर लेट गया और अपनी पत्नी शांति को आवाज लगाते हुए बोला, ‘‘एक गिलास पानी पिला दे. बड़ी थकान हो रही है.’’

‘‘यह लो…’’ पानी का गिलास रामचरण के सामने बढ़ाते हुए शांति बोली, ‘‘क्या हुआ? आज घर जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘हां, वह जरा तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, तो…’’ बोलतेबोलते रामचरण जोर से खांसने लगा, तो शांति ने पानी का गिलास उस के मुंह में ही लगा दिया.

‘‘आह…’’ कर के रामचरण ने फिर चारपाई पर लेटते हुए पूछा, ‘‘अमन कहां है? अभी तक घर नहीं आया क्या?’’

‘‘घर पर ही है. सोया हुआ है,’’ पानी का जूठा गिलास पास पड़े स्टूल पर रखते हुए बड़े उदास मन से शांति बोली, ‘‘पता नहीं, क्या लिखा है इस लड़के के भविष्य में? जहां पर भी नौकरी करता है, 2-4 महीने से ज्यादा टिक ही नहीं पाता.’’

‘‘तो क्या यह नौकरी भी छूट गई उस की?’’ चिंता के मारे रामचरण को फिर जोर से खांसी उठ गई, तो शांति पानी लेने भागी.

‘‘नहीं चाहिए,’’ अपने हाथ के इशारे से रामचरण ने पानी लेने से मना करते हुए कहा, ‘‘थोड़ा जहर दे दे, ताकि चैन से मर पाऊं मैं. अरे, जिंदगी तो हमारी खराब हो गई है, जो हम ने ऐसे कपूत को जन्म दिया. इस से तो अच्छा होता कि वह पैदा होते ही मर…’’ रामचरण बोलने ही जा रहा था कि शांति ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया कि वह ऐसी बातें अपने मुंह से न निकाले.

‘‘अरे, तो और क्या कहूं मैं… बोल न? 30 की उम्र पार कर चुका है, पर अब तक इस की शादी नहीं हुई है. कोई ढंग की नौकरी नहीं करता. ऐसे लड़के को कौन अपनी बेटी देगा? इस लड़के का खुद का ही ठौरठिकाना नहीं है?’’

‘‘अच्छा, तुम ज्यादा परेशान मत हो. करेगा कुछ न कुछ,’’ शांति ने उसे ढाढ़स बंधाया. पर फिक्र तो अब उसे भी होने लगी थी कि अमन की उम्र के लड़कों की शादी हो चुकी है, वे अपने घरपरिवार संभालने लगे हैं और यह लड़का अब भी ऐसे ही निठल्ला पड़ा है. कहीं नौकरी लगती भी है, तो उसे भी लात मार आता है. आखिर यह चाहता क्या है?

‘‘कुछ बोलो, समझओ, तो अपने मांबाप पर ही चढ़ बैठता है. पूरे घर में क्लेश मचा देता है और खुद बाहर निकल जाता है. इस नवाबजादे की ऐश तो देखो, बढि़याबढि़या स्वादिष्ठ खाना और फैंसी कपड़े ही चाहिए, मगर करना कुछ नहीं है.’’

रोज की तरह आज भी अमन रात के तकरीबन 12 बजे घर आया और खाना खा कर मोबाइल ले कर बैठ गया, तो रामचरण गुस्से से तमतमा उठा, क्योंकि उसे पता था कि वह कहीं किसी अड्डे पर बैठ कर अपने आवारा दोस्तों के साथ ताश और जुआ खेल रहा होगा. जब भूख और नींद ने आ घेरा तो इसे घर की याद आ गई होगी और मुंह उठा कर यहां चला आया. लेकिन यह कोई धर्मशाला या होटल नहीं है कि जिसे जब मन करे मुंह उठा कर चला आए.

रामचरण गुस्से में बकबक किए जा रहा था और अमन उस की बातों को अनसुना कर मोबाइल पर लगा पड़ा था.

बेटे की इस हरकत पर रामचरण गुस्से से उबल पड़ा और अमन के हाथ से फोन छीनते हुए गरजते हुए बोला, ‘‘सम?ाता क्या है तू अपनेआप को? कहीं का नवाब है क्या या इस घर में कोई खजाना गड़ा है, जो तू नहीं भी कमाएगा तो जिंदगी आराम से चल जाएगी? आखिर कब तक मैं तुझे कमाकमा कर खिलाता रहूंगा?’’

रामचरण की बातों को समझने के बजाय अमन उस पर ही चिल्लाते हुए कहने लगा कि उन्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है. वह अपना देख लेगा.

‘‘हां, तो निकल जा इस घर से,’’ रामचरण भी गरजा, ‘‘इस घर में तुझ जैसे निठल्ले के लिए अब कोई जगह नहीं है. बाहर जा कर खाक छानेगा न, तब अक्ल ठिकाने आएगी,’’ बोलतेबोलते रामचरण जोर से हांफने लगा.

शांति जब तक रामचरण के लिए पानी ले कर आती, तब तक वह वहीं जमीन पर नीचे गिर पड़ा. पति को जमीन पर छटपटाते देख कर शांति बिलख कर रोने लगी.

पिता को इस हालत में देख अमन भी परेशान हो उठा कि अचानक से इन्हें क्या हो गया. एंबुलैंस को फोन लगाया, तो फोन नहीं उठाया गया.

तब अमन ने अपने एक दोस्त दीपक को फोन किया और वह जल्द ही अपनी गाड़ी ले कर पहुंच गया. आननफानन में ही रामचरण को अस्पताल में भरती कराया गया, तब जा कर उस की जान बच पाई. पर उसे लकवा मार गया और उस ने हमेशा के लिए खटिया पकड़ ली.

घर में एक रामचरण ही कमाने वाला था, लेकिन अब वही बिछावन पर पड़ गया, तो घर कैसे चलेगा? घर में शादी लायक जवान बेटी है, सब कैसे होगा? इस सोच में शांति घुली जा

रही थी. इधर पिता की बिगड़ती हालत देख कर अब अमन को लगा कि बाहर जा कर कुछ कमानाधमाना पड़ेगा, इसलिए वह अपनी इंजीनियरिंग की डिगरी ले कर फिर नौकरी की तलाश में निकल पड़ा. मगर लाख हाथपैर मारने के बाद भी उसे कहीं नौकरी नहीं मिली.

मिलती भी कैसे, जब अमन ने खुद लगीलगाई नौकरी को लात मार दी थी, लेकिन अब उसे अपनी गलती का  एहसास होने लगा था. भले ही नौकरी उस की पसंद की नहीं थी, मगर हर महीने तनख्वाह तो मिलती थी, जिस से वह दोस्तों के साथ मजे करता था, अपनी पसंद के कपड़े पहनता था. मगर अब तो एकएक पाई के लिए वह तरस रहा था.

शांति भी अमन को कहां से पैसे देती, जब उस का खुद ही घर चलाना मुश्किल हो रहा था. पास रखे पैसों से किसी तरह घर चल रहा था और रामचरण की दवादारू हो पा रही थी, पर यह पैसा भी कब तक चलेगा, कहा नहीं जा सकता.

अमन के पास अब एक ही रास्ता बचा था कि वह अपने दोस्त दीपक से कुछ मदद मांगे. जब उस ने अपनी परेशानी दीपक को बताई, तो दीपक कहने लगा कि वह उसे ड्राइवर की नौकरी पर लगा सकता है.

‘‘ड्राइवर की नौकरी… पर यार, मैं तो इंजीनियर…’’ अमन को लगा कि क्या इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के वह ड्राइवर की नौकरी करेगा?

‘‘हां, तो क्या हो गया. काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, काम काम होता है और अभी तो तुझे काम की बहुत जरूरत है, क्योंकि तेरे पिता बीमार हैं. कोई कमाने वाला नहीं है तेरे घर में. तो सोच ले कि क्या करना है तुझे.. और वैसे भी, अब तेरी उम्र नहीं रही कि कोई तुझे नौकरी दे, तो क्या इंजीनियरिंग की डिगरी  ले कर चाटेगा?’’ दीपक ने अमन को साफसाफ समझ दिया.

दीपक कोई बहुत पढ़ालिखा नहीं था. 12वीं पास था, वह लेकिन समझदार था. वह जानता था कि जीने के लिए पैसा कमाना जरूरी है.

दीपक का यहीं दिल्ली में अपना गैराज था, जहां नईपुरानी गाडि़यों की मरम्मत होती थी. उस की कई लोगों से अच्छी जानपहचान बन चुकी थी. अब मरता क्या न करता. हार कर अमन ने ड्राइवर की नौकरी पकड़ ली. मगर वहां भी वह गाड़ी के मालिक की बेटी पर ही डोरे डालने लगा, तो मालिक ने उसे नौकरी से निकाल दिया.

इसी तरह 1-2 जगहों पर उस ने ऐसी ही हरकत की और अपनी नौकरी से हाथ धो बैठा.

इस बार दीपक ने अमन को एक विधायक के यहां ड्राइवर की नौकरी पर लगवा दिया, जो उन की 23 साल की बेटी आयशा को कालेज से ला और पहुंचा सके.

लेकिन अमन ने अपने मन में कुछ और ही सोच रखा था. वह चाहता था कि विधायक साहब की बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसा कर उस से शादी कर के पूरी जिंदगी उन के पैसों पर ऐश करेगा. फिर उसे कहीं नौकरी करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

अमन आयशा को रिझाने के लिए रोज तरहतरह की हरकतें करता. समय से पहले उसे कालेज लेने पहुंच जाता. रोज धुले और चमकदार कपड़े पहनता. अपने हाथ में वह सलमान खान की तरह ब्रेसलेट पहनता, परफ्यूम लगाता, आंखों पर धूप के काले चश्मे चढ़ा लेता और फिर गाड़ी चलाते हुए रोमांटिक गाने लगा कर पूरे रास्ते आयशा को घूरता रहता था.

मगर आयशा उस पर ध्यान ही नहीं देती थी. वह अपने काम से काम रखती थी. वह बहुत ही सम?ादार लड़की थी, इसलिए अमन की बेवकूफियों को नजरअंदाज कर दिया करती थी और अमन को लगता था कि वह भी उसे पसंद करती है, इसलिए कुछ बोलती नहीं है.

लेकिन जब एक दिन अमन को अचानक से यह कह कर नौकरी से निकाल दिया गया कि अब उन्हें उस की जरूरत नहीं है, तो वह ठगा सा रह गया. लड़की तो गई ही हाथ से, नौकरी भी चली गई उस की. मुंगेरीलाल के हसीन सपने, सपने ही रह गए और वह फिर कोई दूसरी नौकरी की तलाश में जुट गया, क्योंकि घर के खर्च, रामचरण की दवाओं का खर्चा, सब तो अमन के जिम्मे ही था.

अमन ने फिर दीपक के सामने अपनी परेशानी रखी, तो इस बार दीपक ने उसे दूरिज्म टैक्सी में लगवा दिया.

एक दिन अमन की टैक्सी में एक रशियन लड़की सोफिया आ कर बैठी और बोली कि वह यहां इंडिया घूमने आई है, तो क्या वह उसे घुमाएगा? अमन ने हां बोल दी.

सोफिया अमन के साथ दिल्ली में कई जगहों पर घंटों घूमती रही और फिर शाम को एक होटल

के बाहर रुक कर अमन को भाड़े के पैसे देते हुए मुसकरा कर बोली कि वह कल भी उसे यहां से पिकअप कर ले. अमन को तो ग्राहक से मतलब था. वह कौन है, कहां से आई है, उस से उसे क्या लेनादेना, इसलिए दूसरे दिन भी वह अपनी टैक्सी उसी होटल के सामने ले आया, जहां सोफिया पहले से ही उस का इंतजार कर रही थी.

इसी तरह यह रोज का सिलसिला बन गया. सोफिया उसी होटल के सामने उस का इंतजार करती और अमन तय समय पर उसे लेने वहां पहुंच जाया करता था.

एक दिन सोफिया ने अमन को अपने परिवार के बारे में सबकुछ बताया कि उस के परिवार में उस के मम्मीपापा और एक छोटा भाई है, जो यूरोप में रहते हैं. वहां उस के पापा डाक्टर हैं और उस की मम्मी एक एनजीओ चलाती हैं. उस ने यह भी बताया कि उसे बचपन से ही इंडिया और यहां के लोग बहुत पसंद हैं. वह अपने मम्मीपापा के साथ अकसर इंडिया आती रहती थी.

‘‘अमन, अब तुम बताओ, तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं? और तुम्हारे फादर, मतलब तुम्हारे ‘पिटाजी’ क्या काम करते हैं? तुम लोग अपने फादर को ‘पिटाजी’ ही बुलाते हो न?’’

सोफिया की बात पर अमन को जोर की हंसी आ गई.

‘‘अरे, तुम हंस क्यों रहे हो? मैं ने कुछ ‘गलट’ कहा क्या?’’

‘नहीं, कुछ गलत नहीं कहा आप ने. लेकिन ‘पिटाजी’ कहा न, उस पर मुझे हंसी आ गई,’’ बोल कर अमन फिर हंसने लगा, तो सोफिया भी हंस पड़ी और बोली, ‘‘तुम मुझे हिंदी बोलना सिखा दोगे क्या?’’

अमन ने हां कहते हुए जैसे ही गाड़ी घुमाई, तो सोफिया उस के ऊपर गिरतेगिरते बची.

‘‘ओह, आप को लगी तो नहीं?’’ अमन ने पूछा.

‘‘लगी है, यहां पर,’’ अपने दिल पर हाथ रख कर सोफिया मुसकरा पड़ी, तो अमन भी मुसकरा उठा.

अब सोफिया अकसर फोन पर अमन से प्यार भरी बातें करती और कहती कि उस के सपने में अकसर वही दिखता है, तो इस का यह मतलब हुआ कि वह अमन से प्यार करने लगी है.

इस बात पर अमन कुछ कहता तो नहीं था, पर उसे भी सोफिया अच्छी लगने लगी थी, इसलिए वह अब बिना बुलाए भी सोफिया को लेने उस के होटल पहुंच जाता था.

अमन जबतब अपने घर से अपनी मां के हाथ का बना खाना सोफिया के लिए ले आता था, जिसे खा कर सोफिया काफी खुश होती थी. सोफिया भी कई बार उसे टीशर्ट, जूते वगैरह गिफ्ट कर चुकी थी.

बेटे को अच्छे से कमातेधमाते देख कर रामचरण खुश तो होता, पर सोचता कि काश, वह कोई अच्छी नौकरी कर रहा होता, क्योंकि उस ने बड़े अरमानों से बेटे को इंजीनियरिंग की तालीम दिलवाई थी और सोचा था कि अमन भी एक दिन उस का नाम रोशन करेगा. खैर, अब जो है उसी में खुश रहना पड़ेगा. यह सोच कर रामचरण बिस्तर पर पड़ापड़ा राहत की सांस लेता था.

रामचरण एक सरकारी बैंक में टैंपरेरी मैसेंजर का काम करता था, जहां उसे बंधीबंधाई और वह भी बहुत कम तनख्वाह मिलती थी, जिस से ही पूरे घर का खर्चा चलता था. उन्होंने सोचा था कि बेटा अच्छा कमाने लगेगा, तो उस के भी दिन फिरेंगे. मगर यहां तो बेचारे की उसी नौकरी पर आफत आ पड़ी थी. पता नहीं, अब दोबारा से नौकरी कर भी पाएगा या नहीं.

बैंक मैनेजर साहब भले इनसान थे, जिन्होंने रामचरण की काफी मदद की थी. बैंक के बाकी सब स्टाफ ने भी चंदा कर के उस की पैसों से मदद की थी. तभी तो उतने दिन उस का घर और डाक्टर और दवा का खर्चा चल पाया, वरना तो क्या होता नहीं पता.

अमन और सोफिया के बीच अब केवल ड्राइवर और ग्राहक तक ही रिश्ता नहीं रह गया था, बल्कि दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ चुके थे.

इसी तरह 6 महीने बीत गए. अब अमन को सोफिया पर और सोफिया को अमन पर भरोसा होने लगा था. वे एकदूसरे से बेझिझक अपनी बात शेयर करते और साथ में समय गुजारते थे.

एक दिन सोफिया ने अमन को होटल बुला कर उसे एक बैग देते हुए कहा कि यह बैग उसे इस पते पर पहुंचाना है.

अमन ने उस से पूछा भी नहीं कि उस बैग में है क्या. उस ने उस बैग को उसी पते पर पहुंचा दिया और यह सिलसिला चल पड़ा.

अब अकसर सोफिया अमन को दूसरेतीसरे पते पर बैग पहुंचाने के लिए कहती और इस के लिए वह उसे डबलट्रिपल पैसे भी देती थी.

एक दिन फिर सोफिया ने अमन को अर्जेंट बुलाया और एक काला बैग पकड़ाते हुए कहा कि यह बैग उसे अभी इसी समय इस पते पर पहुंचाना है.

‘‘मगर, इस में है क्या और इतना अर्जेंट क्यों पहुंचाना है? कल नहीं पहुंचा सकते क्या? आज मुझे अपने पापा को डाक्टर के पास ले कर जाना है.’’

सोफिया बोली, ‘‘नहीं, यह बैग अभी इसी समय इस पते पर पहुंचाना होगा और इस के लिए मैं तुम्हें 5,000 रुपए दूंगी.’’

‘‘पैसे की बात नहीं है. मुझे आज पापा को डाक्टर के पास लेना जाना बहुत जरूरी है, इसलिए कह रहा हूं,’’ अमन ने अपनी परेशानी फिर दोहराई, मगर इस बार सोफिया झल्लाते हुए बोली, ‘‘नहीं. अर्जेंट है तो अर्जेंट है.’’

आज सोफिया के चेहरे पर वह मासूमियत नहीं दिख रही थी, बल्कि घबराहट दिख रही थी, एक डर दिख रहा था.

अमन को अब सोफिया पर कुछ शक होने लगा कि ऐसा क्या है इस बैग में, जो उसे अभी ही पहुंचाना है? आज तक वह बैग लेने वाले आदमी का चेहरा नहीं देख पाया था, क्योंकि उस के चेहरे पर मास्क लगा होता था.

खैर, अमन ने अपना माथा झटका और बैग ले कर होटल से निकल गया, क्योंकि उसे भी पैसों की जरूरत थी और फिर सोफिया को वह नाराज नहीं करना चाहता था.

अभी अमन की टैक्सी थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि तेज आवाज में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाते हुए उसे रुकने को बोली.

‘‘जी… इंस्पैक्टर साहब…’’ गाड़ी रोक कर अमन ने घबराते हुए पूछा.

‘‘नीचे उतरो और गाड़ी की डिक्की खोलो,’’ एक पुलिस वाले ने डंडा घुमाते हुए कहा.

‘‘पर इंस्पैक्टर साहब, गाड़ी में कुछ भी नहीं है,’’ अमन ने सफाई दी.

‘‘अभी पता चल जाएगा. इस बैग में क्या है? खोलो इसे…’’ पुलिस इंस्पैक्टर ने अपने सिपाही को और्डर दिया, तो उस ने बैग खोला, जिसे देख कर अमन के पसीने छूट गए, क्योंकि उस बैग में कोई मामूली सामान या कपड़े वगैरह नहीं थे, बल्कि ड्रग्स थी.

पुलिस को पक्की जानकारी मिली थी कि इसी टैक्सी से ड्रग्स की तस्करी हो रही है. घबराहट में अमन ने सोफिया को फोन लगाया, मगर उस का फोन स्विच औफ आ रहा था. दोबारा उसे फोन मिलाने ही लगा कि पुलिस ने उस के हाथ से फोन छीन लिया और पकड़ कर उसे पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया.

स्पैशल टास्क फोर्स ने अमन से पूछताछ शुरू कर दी कि उस के इस धंधे में और कौनकौन लोग शामिल हैं, मगर हर बार वह एक ही बात दोहराता कि उसे कुछ नहीं पता.

अमन के फोन से सोफिया का नंबर मिला और जब उन्होंने पूछा कि यह लड़की कौन है और उस से उस का क्या रिश्ता है, तो अमन कहने लगा कि सोफिया ही उसे बैग अलगअलग पतों पर पहुंचाने को बोलती थी और वह पहुंचा दिया करता था. इस से ज्यादा उसे कुछ नहीं पता है.

स्पैशल टास्क फोर्स को यह तो समझ में आ गया कि इस का मास्टरमाइंड कोई और ही है और अमन केवल एक मुहरा है.

अमन से तो सोफिया यही बोल कर बैग पहुंचाने को कहती थी कि इस बैग में खानेपीने का सामान है. लेकिन उस में ड्रग्स हो सकती है, यह तो वह सपने में भी नहीं सोच सकता था. काश, वह एक बार बैग खोल कर देख लेता, तो आज इतनी बड़ी मुसीबत में न फंसता.

ड्रग्स सप्लाई कोई मामूली बात नहीं, बल्कि यह एक अपराध है और ऐसे केस में लोगों को 10 से

20 साल तक की सजा हो सकती है. लेकिन, उस ने सपने में भी सोचा न था कि एक दिन जिंदगी उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा देगी. वह तो पैसे कमा कर अपने मांबाप की मदद करना चाहता था. सोच रहा था कि पैसे जमा कर के वह अपनी बहन की शादी करेगा, फिर अपना घर बसाएगा. मगर यहां तो सब गलत हो गया.

उधर अमन के मांबाप को जब पता चला कि उन के बेटे को ड्रग्स सप्लाई के केस में गिरफ्तार कर लिया गया है, तो अमन की मां तो खड़ेखड़े ही बेहोश हो कर गिर पड़ी और रामचरण के प्राण पखेरू उड़ गए. क्या मिला उन्हें जिंदगी में… न अच्छे बेटे का सुख और न समाज में इज्जत.

मगर दीपक जानता था कि अमन लाख बुरा सही, मगर वह इतना घटिया काम कभी नहीं कर सकता. वह उसे बचपन से जानता है. उस ने गाड़ी के मालिक को भी यकीन दिलाया कि अमन ऐसा कर ही नहीं सकता,, बल्कि उसे फंसाया है किसी ने.

पुलिस की मार से तो बड़े से बड़ा अपराधी अपना गुनाह कबूल कर लेता है, मगर इतनी मार खाने के बाद भी अमन एक ही बात दोहरा रहा था कि उसे कुछ नहीं पता. पुलिस की शक की सूई अब सोफिया पर जा अटकी, तो तुरंत उस ने होटल का दरवाजा खटखटाया. लेकिन पता चला कि सोफिया अभी कुछ देर पहले ही चैकआउट कर के जा चुकी है.

अभी सोफिया हवाईजहाज पर बैठने ही वाली थी कि स्पैशल टास्क फोर्स ने उसे धर दबोचा. अब सोफिया के पास कोई चारा नहीं था सबकुछ बताने के सिवा. उस ने जो बताया, वह सुन कर अमन के पैरों के नीचे से भी जमीन खिसक गई, क्योंकि सोफिया ने उसे अपने और अपने परिवार के बारे में सब ?ाठ बताया था. उस के मांबाप कई साल पहले एक हादसे में गुजर चुके थे.

सोफिया के पास रहनेखाने को कुछ नहीं बचा, तो किसी तरह वह इंडिया आ गई और यहां एक डांस बार में काम कर के अपना गुजारा चलाने लगी. मगर असली धंधा उस का ड्रग्स सप्लाई करना था.

सोफिया दिल्ली के अलगअलग हुक्का बार और क्लब में ड्रग्स सप्लाई करती थी और उस के लिए वह अमन जैसे मजबूर, सीधेसाधे लड़के को फंसा कर उस के साथ प्यार का नाटक करती थी, ताकि उस का काम आसानी से होता रहे. लेकिन इस बार वह पकड़ी गई.

पता चला कि सोफिया के साथ और 4 लोग ड्रग्स तस्करी के धंधे से जुड़े हुए थे और स्पैशल टास्क फोर्स अब उन की तलाश में जुटी है. पुलिस ने सोफिया के पास से साढ़े 6 लाख रुपए नकद भी बरामद किए.

अमन को पुलिस ने चेतावनी दे कर छोड़ दिया, क्योंकि उस की कोई गलती नहीं थी. उसे फंसाया गया था. मगर अपनी जिंदगी में उस ने जोकुछ भी खोया, क्या अब वह उसे वापस कभी मिल सकता है? शायद नहीं, क्योंकि चिडि़या खेत जो चुग चुकी थी.

टिकट चोर : महेश क्यों ट्रेन में बेटिकट चढ़ा

Social Story in Hindi: काफी देर सोचने के बाद महेश ने फैसला किया कि उसे बिना टिकट खरीदे ही रेल में बैठ जाना चाहिए, बाद में जोकुछ होगा देखा जाएगा, क्योंकि रेल कुछ ही देर में प्लेटफार्म पर आने वाली है. महेश रेल में बिना टिकट के बैठना नहीं चाहता था. जब वह घर से चला था, तब उस की जेब में 2 हजार के 2 कड़क नोट थे, जिन्हें वह कल ही बैंक से लाया था. घर से निकलते समय सौसौ के 2 नोट जरूर जेब में रख लिए थे कि 2 हजार के नोट को कोई खुला नहीं करेगा. जैसे ही महेश घर से बाहर निकला कि सड़क पर उस का दोस्त दीनानाथ मिल गया, जो उस से बोला था, ‘कहां जा रहे हो महेश?’

महेश ने कहा था, ‘उदयपुर.’

दीनानाथ बोला था, ‘जरा 2 सौ रुपए दे दे.’

‘क्यों भला?’ महेश ने चौंकते हुए सवाल किया था.

‘अरे, कपड़े बदलते समय पैसे उसी में रह गए…’ अपनी मजबूरी बताते हुए दीनानाथ बोला था, ‘अब घर जाऊंगा, तो देर हो जाएगी. मिठाई और नमकीन खरीदना है. थोड़ी देर में मेहमान आ रहे हैं.’

‘मगर, मेरे पास तो 2 सौ रुपए ही हैं. मुझे भी खुले पैसे चाहिए और बाकी 2 हजार के नोट हैं,’ महेश ने भी मजबूरी बता दी थी.

‘देख, रेलवे वाले खुले पैसे कर देंगे. ला, जल्दी कर,’ दीनानाथ ने ऐसे कहा, जैसे वह अपना कर्ज मांग रहा है.

महेश ने सोचा, ‘अगर इसे 2 सौ रुपए दे दिए, तो पैसे रहते हुए भी मेरी जेब खाली रहेगी. अगर टिकट बनाने वाले ने खुले पैसे मांग लिए, तब तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी. कोई दुकानदार भी कम पैसे का सामान लेने पर नहीं तोड़ेगा.’

दीनानाथ दबाव बनाते हुए बोला था, ‘क्या सोच रहे हो? मत सोचो भाई, मेरी मदद करो.’

‘मगर, टिकट बाबू मेरी मदद नहीं करेगा,’ महेश ने कहा, पर न चाहते हुए भी उस का मन पिघल गया और जेब से निकाल कर उस की हथेली पर 2 सौ रुपए धर दिए.

दीनानाथ तो धन्यवाद दे कर चला गया.

जब टिकट खिड़की पर महेश का नंबर आया, तो उस ने 2 हजार का नोट पकड़ाया.

टिकट बाबू बोला, ‘खुले पैसे लाओ.’

महेश ने कहा कि खुले पैसे नहीं हैं, पर वह खुले पैसों के लिए अड़ा रहा. उस की एक न सुनी.

इसी बीच गाड़ी का समय हो चुका था. खुले पैसे न होने के चलते महेश को टिकट नहीं मिला, इसलिए वह प्लेटफार्म पर आ गया.

प्लेटफार्म पर बैठ कर महेश ने काफी विचार किया कि उदयपुर जाए या वापस घर लौट जाए. उस का मन बिना टिकट के रेल में जाने की इजाजत नहीं दे रहा था, फिर मानो कह रहा था कि चला जा, जो होगा देखा जाएगा. अगर टिकट चैकर नहीं आया, तो उदयपुर तक मुफ्त में चला जाएगा.

इंदौरउदयपुर ऐक्सप्रैस रेल आउटर पर आ चुकी थी. धीरेधीरे प्लेटफार्म की ओर बढ़ रही थी. महेश ने मन में सोचा कि बिना टिकट नहीं चढ़ना चाहिए, मगर जाना भी जरूरी है. वहां वह एक नजदीकी रिश्तेदार की शादी में जा रहा है. अगर वह नहीं जाएगा, तो संबंधों में दरार आ जाएगी.

जैसे ही इंजन ने सीटी बजाई, महेश यह सोच कर फौरन रेल में चढ़ गया कि जब ओखली में सिर दे ही दिया, तो मूसल से क्या डरना?

रेल अब चल पड़ी. महेश उचित जगह देख कर बैठ गया. 6 घंटे का सफर बिना टिकट के काटना था. एक डर उस के भीतर समाया हुआ था. ऐसे हालात में टिकट चैकर जरूर आता है.

भारतीय रेल में यों तो न जाने कितने मुसाफिर बेटिकट सफर करते हैं. आज वह भी उन में शामिल है. रास्ते में अगर वह पकड़ा गया, तो उस की कितनी किरकिरी होगी.

जो मुसाफिर महेश के आसपास बैठे हुए थे, वे सब उदयपुर जा रहे थे. उन की बातें धर्म और राजनीति से निकल कर नोटबंदी पर चल रही थीं. नोटबंदी को ले कर सब के अपनेअपने मत थे. इस पर कोई विरोधी था, तो कोई पक्ष में भी था. मगर उन में विरोध करने वाले ज्यादा थे.

सब अपनेअपने तर्क दे कर अपने को हीरो साबित करने पर तुले हुए थे. मगर इन बातों में उस का मन नहीं लग रहा था. एकएक पल उस के लिए घंटेभर का लग रहा था. उस के पास टिकट नहीं है, इस डर से उस का सफर मुश्किल लग रहा था.

नोटबंदी के मुद्दे पर सभी मुसाफिर इस बात से सहमत जरूर थे कि नोटबंदी के चलते बचत खातों से हफ्तेभर के लिए 24 हजार रुपए निकालने की छूट दे रखी है, मगर यह समस्या उन लोगों की है, जिन्हें पैसों की जरूरत है.

महेश की तो अपनी ही अलग समस्या थी. गाड़ी में वह बैठ तो गया, मगर टिकट चैकर का भूत उस की आंखों के सामने घूम रहा था. अगर उसे इन लोगों के सामने पकड़ लिया, तो वह नंगा हो जाएगा. उस का समय काटे नहीं कट रहा था.

फिर उन लोगों की बात रेलवे के ऊपर हो गई. एक आदमी बोला, ‘‘आजादी के बाद रेलवे ने बहुत तरक्की की है. रेलों का जाल बिछा दिया है.’’

दूसरा आदमी समर्थन करते हुए बोला, ‘‘हां, रेल व्यवस्था अब आधुनिक तकनीक पर हो गई है. इक्कादुक्का हादसा छोड़ कर सारी रेल व्यवस्था चाकचौबंद है.’’

‘‘हां, यह बात तो है. काम भी खूब हो रहा है.’’

‘‘इस के बावजूद किराया सस्ता है.’’

‘‘हां, बसों के मुकाबले आधे से भी कम है.’’

‘‘फिर भी रेलों में लोग मुफ्त में चलते हैं.’’

‘‘मुफ्त चल कर ऐसे लोग रेलवे का नुकसान कर रहे हैं.’’

‘‘नुकसान तो कर रहे हैं. ऐसे लोग समझते हैं कि क्यों टिकट खरीदें, जैसे रेल उन के बाप की है.’’

‘‘हां, सो तो है. जब टिकट चैकर पकड़ लेता है, तो लेदे कर मामला रफादफा कर लेते हैं.’’

‘‘टिकट चैकर की यही ऊपरी आमदनी का जरीया है.’’

‘‘इस रेल में भी बिना टिकट के लोग जरूर बैठे हुए मिलेंगे.’’

‘हां, मिलेंगे,’ कईर् लोगों ने इस बात का समर्थन किया.

महेश को लगा कि ये सारी बातें उसे ही इशारा कर के कही जा रही हैं. वह बिना टिकट लिए जरूर बैठ गया, मगर भीतर से उस का चोर मन चिल्ला कर कह रहा है कि बिना टिकट ले कर रेल में बैठ कर उस ने रेलवे की चोरी की है. सरकार का नुकसान किया है.

रेल अब भी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी. मगर रेल की रफ्तार से तेज महेश के विचार दौड़ रहे थे. उसे लग रहा था कि रेल अब भी धीमी रफ्तार से चल रही है. उस का समय काटे नहीं कट रहा था. भीतरी मन कह रहा था कि उदयपुर तक कोई टिकट चैकर न आए.

अभी रेल चित्तौड़गढ़ स्टेशन से चली थी. वही हो गया, जिस का डर था. टिकट चैकर आ रहा था. महेश के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. अब वह भी इन लोगों के सामने नंगा हो जाएगा. सब मिल कर उस की खिल्ली उड़ाएंगे, मगर उस के पास तो पैसे थे. टिकट खिड़की बाबू ने खुले पैसे न होने के चलते टिकट नहीं दिया था. इस में उस का क्या कुसूर? मगर उस की बात पर कौन यकीन करेगा? सारा कुसूर उस पर मढ़ कर उसे टिकट चोर साबित कर देंगे और इस डब्बे में बैठे हुए लोग उस का मजाक उड़ाएंगे.

टिकट चैकर ने पास आ कर टिकट मांगी. उस का हाथ जेब में गया. उस ने 2 हजार का नोट आगे बढ़ा दिया.

टिकट चैकर गुस्से से बाला, ‘मैं ने टिकट मांगा है, पैसे नहीं.’’

‘‘मुझे 2 हजार के नोट के चलते टिकट नहीं मिला. कहा कि खुले पैसे दीजिए. आप अपना जुर्माना वसूल कर के उदयपुर का टिकट काट दीजिए,’’ कह कर महेश ने अपना गुनाह कबूल कर लिया.

मगर टिकट चैकर कहां मानने वाला था. वह उसी गुस्से से बोला, ‘‘सब टिकट चोर पकड़े जाने के बाद यही बोलते हैं… निकालो साढ़े 5 सौ रुपए खुले.’’

‘‘खुले पैसे होते तो मैं टिकट लेकर नहीं बैठता,’’ एक बार फिर महेश आग्रह कर के बोला, ‘‘टिकट के लिए

मैं उस बाबू के सामने गिड़गिड़ाया, मगर उसे खुले पैसे चाहिए थे. मेरा उदयपुर जाना जरूरी था, इसलिए बिना टिकट लिए बैठ गया. आप मेरी मजबूरी क्यों नहीं समझते हैं.’’

‘‘आप मेरी मजबूरी को भी क्यों नहीं समझते हैं?’’ टिकट चैकर बोला, ‘‘हर कोई 2 हजार का नोट पकड़ाता रहा, तो मैं कहां से लाऊंगा खुले पैसे. अगर आप नहीं दे सकते हो, तो अगले स्टेशन पर उतर जाना,’’ कह कर टिकट चैकर आगे बढ़ने लगा, तभी पास बैठे एक मुसाफिर ने कहा, ‘‘रुकिए.’’

उस मुसाफिर ने महेश से 2 हजार का नोट ले कर सौसौ के 20 नोट गिन कर दे दिए.

उस टिकट चैकर ने जुर्माना सहित टिकट काट कर दे दिया.

टिकट चैकर तो आगे बढ़ गया, मगर उन लोगों को नोटबंदी पर चर्चा का मुद्दा मिल गया.

अब महेश के भीतर का डर खत्म हो चुका था. उस के पास टिकट था. उसे अब कोई टिकट चोर नहीं कहेगा. उस ने उस मुसाफिर को धन्यवाद दिया कि उस ने खुले पैसे दे कर उस की मदद की. रेल अब भी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी.

वह सरकार की मनमानी की वजह से टिकट चोर बन जाता. गनीमत है कि कुछ लोग सरकार और प्रधानमंत्री से ज्यादा समझदार थे और इस बेमतलब की आंधी में अपनी मुसीबतों की फिक्र करे बिना ही दूसरों की मदद करने वाले थे.

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