अलीशेर : एक मुसलमान जो रामलीला में बनता था राम

मेला वाली बारी में रामलीला का मेला था. वह जगह बहुत साफसुथरी और हरीभरी थी. चारों तरफ ऊंचेऊंचे पहाड़नुमा भीटे और लंबेलंबे खड़े पेड़ थे. बीच में एक सुंदर तालाब था. एक तरफ रामलीला वाली जगह थी, जहां रामलीला करने वाले लोग राम, लक्ष्मण, सीता और रावण आदि का स्वांग करते थे.

पहले गांव का हिसाब ही अलग था. राम का रोल कोई भी गोराचिट्टा लड़का अदा कर लेता था और सीता का रोल भी कोई कमसिन लड़का, जिसे दाढ़ीमूंछ न आई हो, अदा करता.

इस में हिंदू या मुसलमान होने के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था. जो भी अच्छी तरह रामलीला का पाठ याद कर उस का सही स्वांग कर लेता, उसे वह रोल दे दिया जाता था. लोग इसे सिर्फ नाटक समझते थे और उसे नाटक की तरह करते थे.

हां, राम का रोल हमेशा अलीशेर अदा करते थे. समय के हिसाब से हर रोल आगेपीछे हो जाते थे या बदल दिए जाते थे, लेकिन अलीशेर को हमेशा रामलीला में राम बनाया जाता था, क्योंकि अलीशेर एक खूबसूरत जवान थे और उन्हें राम का पाठ जबानी याद था. जब सिर पर मुकुट लगाए वह स्टेज पर आते तो लोग मोहित हो जाते थे.

एक बार तो ऐसा भी हुआ कि राम और रावण दोनों का पाठ करने वाले मुसलमान ही थे, क्योंकि जिन लोगों को नौकरी मिल गई, वे शहर चले गए और गांव में एक मेहमान की तरह आने लगे.

लेकिन बाद में गांव का माहौल बदलने लगा. मुसलमानों का एक तबका रामलीला में मुसलिम नौजवानों व बच्चों के शामिल होने का विरोध करने लगा. मुल्लों ने फतवा जारी कर के इसे मजहब के खिलाफ बताया. फतवे में रामलीला में भाग लेना तो दूर इसे देखना भी गलत कहा गया.

इस फतवे का लोगों पर बुरा असर पड़ा. रात में रामलीला देखने वालों की संख्या कुछ कम हो गई. फिर भी रामलीला देखने के लिए मुसलमान बच्चे जाते रहे, लेकिन चोरीछिपे, खुलेआम नहीं.

अलीशेर के डीलडौल का गांव में कोई नौजवान नहीं था और उस पर वर्षों का अभ्यास, सारे पाठ जबानी याद. अत: जब भी राम का रोल उन्हें दिया गया, बिना रोकटोक के उन्होंने कर दिया. उन्होंने मुल्लेमौलवियों के फतवे की परवाह नहीं की और न उन्हें मुसलिम बिरादरी से बाहर कर दिए जाने का डर था. वे इसे गांव की इज्जत वाली बात मान कर एक कलाकार की तरह रामलीला में भाग लेते रहे.

वे हफ्ते में केवल जुमा की नमाज पढ़ते थे, वे भी आखिरी कतार में क्योंकि रामलीला के दिनों में वे मुसलमानों के बीच एक अच्छाखासा तमाशा बन जाते थे. कोईकोई तो उन्हें मसजिद में ही छेड़ देता, ‘‘अरे भाई रामचंद्रजी, आप यहां कैसे? रामचंद्रजी मुसलमान तो थे नहीं.’’ कोई दूसरा कहता, ‘‘अब तो इन्हें मंदिर में भी जगह नहीं मिलेगी…’’

वे चुपचाप किसी का जवाब दिए बगैर मसजिद से बाहर निकल जाते. उन्हें रामचंद्रजी का रोल एक खेल सा लगता और यह खेल वे गांव की इज्जत के लिए खेलते थे ताकि सारे इलाके में उन के गांव की धूम मच जाए.

कुछ दिनों के बाद हिंदुओं में एक नई पार्टी उभरी, जिस का नाम था ग्राम युवक संघ. उस ने सब से पहला काम यह किया कि अलीशेर को हमेशा के लिए रामलीला मंडली से बाहर निकाल दिया, क्योंकि वे मुसलमान थे और उन की जगह एक हिंदू को रखा गया.

अलीशेर तो कहीं के भी न रहे. मुसलमानों के बीच तो पहले ही मजाक विरोधी काम करने वाले के रूप में नफरत की निगाह से देखे जाते थे. अब बचे हिंदू, सो उन्होंने भी अलीशेर को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया. अब वे जाते भी तो किधर जाते. जहां जाते लोग उन का मजाक उड़ाते, ‘बेटा न राम के, न रहीम के… किधर जाओगे? बेहतर है, कलमा पढ़ कर दोबारा मुसलमान बन जाओ…’ या इसी तरह कुछ लोग कहते, ‘यार, तुम हिंदू हो जाओ. पहले भी तो तुम्हारे बापदादा हिंदू ही थे,’ अलीशेर इन तमाम बातों का जवाब केवल खामोशी से देते.

अलीशेर खानदानी जमींदार थे, लेकिन उन के चाचा के लड़कों ने चकबंदी में उन की अच्छी जमीन हथिया ली. बदले में उन्हें जो जमीन मिली, वह ऊसर थी. गरीबी की वजह से धीरेधीरे वह जमीन भी बिक गई.

अब उन्हें कोई सहारा नहीं था, इसलिए गांव में लोगों के गायबैल चराने लगे. इस के बदले उन्हें नाश्ता और खाना मिलने लगा. इस के अलावा वे गांव में फेरी भी लगाने लगे. वे कभी अमरूद, कभी कटहल और कभी गुड़ की ‘लकठो’ मिठाई बेचते.

गांव के बच्चों ने उन का नाम रखा था ‘राम मियां.’ बस वे इसी नाम से मशहूर हो गए. गांव के चाहे जिस छोर पर पूछिए, लोग बता देंगे. राम मियां के बाद महल्ले का नाम बताना जरूरी नहीं था.

जब उस दिन रामलीला का मेला लगा तो अलीशेर को बहुत बुरा लगा. कारण कि वह हिंदू लड़का जो राम बना था, लड़कियों जैसी आवाज में रामजी का संवाद बोलने लगा. खैर, अब तो वे बिलकुल इन चीजों से अलग हो चुके थे.

अलीशेर ने रामलीला मेले में तसवीरों की दुकान लगाने का निश्चय किया. कारण कि यदि तसवीर की कीमत 10 रुपए होगी, तो वह मेले में आसानी से 20 रुपए में बिक जाएगी.

बनारस जा कर अलीशेर ने बहुत सारी तसवीरें खरीदीं. राम की तसवीर, कृष्ण की तसवीर, गुरुनानक देव की तसवीर, दरगाह अजमेर शरीफ की तसवीर, मक्कामदीना की तसवीर और कुछ फिल्मी अभिनेताओं की तसवीरें. जब मेला आरंभ हुआ तो उस दुकान पर बच्चों की भीड़ लग गई. एकएक कर के सारी तसवीरें बिक गईं.

अलीशेर को अच्छा फायदा हुआ. बच्चे तो बच्चे होते हैं. उन्हें जो अच्छा लगा खरीद लिया. यदि अलीशेर से यह पूछा जाए कि कौन बच्चा कौन सी तसवीर ले गया, तो वे इस का जवाब नहीं दे सकते थे, क्योंकि भीड़ के आगे उन्हें अपनी तसवीरों को संभाल पाना भी मुश्किल हो गया था.

सूरज डूबने के बाद मेला उठने लगा. अलीशेर को दुकान से अच्छी आमदनी हुई. वह अपनी दुकान बंद कर के ज्यों ही नहर की पगडंडी पर पहुंचे, तो कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया, ‘‘अलीशेर मियां, आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ एक ने कहा.

‘‘तुम ने हमारे बच्चों को मक्कामदीना और अजमेर शरीफ की तसवीरें क्यों दीं? आखिर उन को इस से क्या लेनादेना. वे मुसलमान तो हैं नहीं,’’ दूसरे आदमी ने कहा.

‘‘अलीशेर भाई, आप ऐसे तो न थे. जरूर इस में किसी विदेशी देश का हाथ होगा. आप ही बताइए कि यदि आप के बच्चों को हम देवीदेवता की तसवीर दें, तो आप को कैसा लगेगा?’’ तीसरे ने कहा.

और इस के बाद कुछ लोगों का मुंह उन की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ा, ‘मारोमारो…’ और फिर अलीशेर के ऊपर लाठियों का बरसना तब तक जारी रहा, जब तक वे मर नहीं गए. अलीशेर को अपनी सफाई में कुछ कहने का भी मौका नहीं दिया गया.

पुलिस की जांचपड़ताल के दौरान गांव के लोगों ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. जिस गांव ने 10 साल तक अलीशेर को रामलीला में राम का पाठ करते हुए देखा था, उस दिन उस गांव का एक बच्चा भी उन्हें पहचान न सका. हां, एक पास के गांव का बच्चा, जो उस समय भी उन से खरीदी हुई तसवीर लिए उन्हें घूर रहा था, पुलिस के सामने आया और बोला, ‘‘मैं इन का नाम जानता हूं. इन का नाम है, राम मियां. सारे बच्चे इन्हें इसी नाम से पुकारते हैं.’’

बच्चे की बात सुनते ही पुलिस वाले को क्रोध आया और उस ने बच्चे को एक भद्दी सी गाली दी और कहा, ‘‘राम कब से मियां हो गए?’’

जो मरा उस का नाम एक सच था, जिस बच्चे ने उस का नाम बताया, वह भी एक सच था और पुलिस वाला, जिसे क्रोध आया, वह भी एक सत्य था. सबकुछ सच होते हुए भी एक आदमी की लाश लावारिस पड़ी थी, दूरदूर तक अजीब सी हवा बह रही थी.

चिट्ठी आई है : सैंट की खुशबू से सराबोर लिफाफा

‘‘मनोज बाबू, आप की बैरंग चिट्ठी है.’’

‘‘हमारी बैरंग चिट्ठी,’’ हम ने चुभती हुई निगाहों से रामकिशोर डाकिए की ओर देखा. उस ने अपनी साइकिल के हैंडल पर टंगे हुए झोले में से पत्रों, मनीआर्डर फार्मों का बंडल निकाला और एक बंद लिफाफा निकाल कर हमारी नाक के सामने कर दिया.

‘‘देख लीजिए, आप का ही नामपता लिखा है,’’ रामकिशोर ने कहा. फिर लिफाफा अपनी नाक के पास ले जा कर जोर से सांस खींची और अपनी दाहिनी आंख दबा कर बोला, ‘‘सैंट की खुशबू आ रही है.’’

हम ने लिफाफा उस के हाथ से ले कर उलटपलट कर देखा. लिफाफे पर भेजने वाले का नामपता नहीं था. हम लिफाफे का एक कोना फाड़ने लगे.

‘‘ऊंहूं, पहले 10 रुपए बैरंग चार्जेज दीजिए और मुझे चलता कीजिए,’’ उस ने लिफाफे पर हाथ रखा.

‘‘देता हूं, देता हूं…पहले तनिक देखने तो दो.’’

‘‘आप लिफाफा मुझे दीजिए. मैं इसे खोल देता हूं. आप इस के खत को देख लें. अगर आप के मतलब का हो तो रख लेना वरना मैं पोस्ट आफिस को ‘लेने से इनकारी है’, लिख कर वापस कर दूंगा.’’

रामकिशोर ने एक पिन की सहायता से धीरेधीरे लिफाफा खोला और फिर खत निकाला.

हम ने खत के पहले पन्ने पर नजर डाली, लिखा था :

‘माई डियर, डियर मनोजजी.’ खत की लिखावट जनाना थी. हमारा दिल तेजी से धड़कने लगा. हम ने जल्दी से खत को तह कर के लिफाफे समेत पैंट की जेब में ठूंस लिया.

‘‘हां हां, मेरा ही है,’’ कहने के साथ ही पर्स से 10 का नोट निकाल कर रामकिशोर की ओर बढ़ाया. फिर घर के दरवाजे की ओर देखा और जल्दी से सड़क पर जाते रिकशे को हाथ दे कर रोका.

‘‘चलो,’’ हम ने रिकशा वाले से चलने को कहा.

पार्क के सुनसान कोने में पड़े एक बैंच पर बैठ कर हम ने खत निकाला. इधरउधर सावधानी से देखा. बैंच के आसपास वाले पेड़ों पर नजर डाली कि कहीं कोई उन पर चढ़ा हुआ न हो. कोई नहीं था. यह तसल्ली होने पर हम ने पत्र खोला और पढ़ने लगे :

‘माई डियर, डियर डियर मनोजजी,

प्यार भरा नमस्कार. मेरा तो जी चाहता है कि डियर डियर से ही सारा पत्र भर दूं, क्योंकि आप हो ही इतने डियर…’

हम खत पढ़ते गए. पूरा खत शहद में डूबा हुआ था. एकएक शब्द मिसरी की डली मालूम होता था. लगता था लिखने वाली ने दिल निकाल कर खत में समेट दिया है. जब से उस ने हमें जौगिंग करते हुए अपनी ही टांगों में उलझ कर गिरते देखा है, उस के दिल में हमारे गिरने, संभलने और गिरने की अदा उतर गई है. उसे सपने में भी हम इसी तरह गिरते- संभलते दिखाई देते हैं.

हमें ऐसी कोई घटना याद नहीं आ रही थी क्योंकि हम जौगिंग करते ही नहीं फिर गिरनासंभलना कैसा? हां, एक बार बीच सड़क पर फेंके गए केले के छिलके पर हमारा पांव जरूर फिसला था. शायद उसे ही इस हसीना ने जौगिंग समझ लिया हो.

ढेर सारी प्यार भरी बातों और न भूलनेभुलाने की कसमों के बाद खत के अंत में उस ने केवल ‘आप के दर्शनों की प्यासी’ ही लिखा था. नामपता उस ने इसलिए नहीं लिखा था कि वह अभी गुमनाम रहना चाहती थी. पहली ही चिट्ठी में ज्यादा खुल जाना उसे खल रहा था.

रामकिशोर डाकिया के इंतजार में अपने घर के बाहर हम बेचैनी से टहल रहे थे. उस के आने से पहले ही हम लंच के बहाने घर आ गए थे. दूर से हमें उस की साइकिल नजर आई. हमारे घर से 12 घर दूर रामकिशोर ने अपनी साइकिल एक बिजली के खंबे के साथ टिकाई और अपने हाथ में खतों का बंडल लिए उस घर की डाक देने को बढ़ा. हम तेजी से उस के पास पहुंचे.

रामकिशोर ने शर्माजी के घर के आगे लगे लेटर बाक्स में डाक डालनी चाही मगर डाक कुछ ज्यादा होने से उस छोटे से लैटर बाक्स में समा नहीं रही थी. उस ने शर्माजी की ‘काल बेल’ बजाई और साथ वाले घर का पत्र डालने चला गया.

‘‘अरे, मनोज बाबू, आप,’’ शर्माजी घर से बाहर आ गए, ‘‘कहिए, क्या काम है जो आप ने घंटी बजाई है.’’

‘‘शर्माजी, घंटी मैं ने नहीं पोस्टमैन ने बजाई है,’’ हम ने जल्दी से बताया, ‘‘मैं तो अपनी डाक पूछने चला आया था.’’

‘‘कोई खास डाक है क्या?’’ शर्माजी अपनी डाक संभालते हुए बोले.

‘‘जी, नहीं. लंच के बाद आफिस जा रहा था. सोचा, कोई डाक हो तो देखता चलूं.’’

‘‘आज आप की कोई डाक नहीं है,’’ रामकिशोर ने बताया और खंभे के साथ लगी साइकिल पर सवार हो कर निकल गया.

हम गरदन झुका कर वापस हुए.

पूरे एक सप्ताह से हमारे नाम कोई बैरंग चिट्ठी नहीं आई थी. इसलिए बेचैनी बढ़ी हुई थी. दफ्तर के काम में भी दिल नहीं लगता था. कुछ न कुछ गलती हो जाती और बड़े साहब की टेढ़ी निगाह के सामने आंखें झुकानी पड़ जाती थीं. उस दिन भी किसी बैरंग चिट्ठी के मिलने की उम्मीद लिए हम रिकशे में बैठ घर को चल दिए.

घर के दरवाजे पर रामकिशोर एक लंबा सा लिफाफा लिए खड़ा था और लीना के ताऊजी उस के साथ बहस में उलझे हुए थे.

लिफाफे को देखते ही हम समझ गए कि आज फिर बैरंग चिट्ठी आई है. हम जल्दी से रिकशा वाले को किराया थमा कर पोस्टमैन की ओर बढ़े.

‘‘मैं किसी और का खत आप को नहीं दे सकता,’’ रामकिशोर कह रहा था.

‘‘अरे, मनोज हमारा बच्चा है और फर्ज कर लो वह 4-6 महीने को शहर से कहीं बाहर गया हो तो क्या तुम सिरे से उस की डाक दोगे ही नहीं? फिर यह कौन सा रजिस्टर्ड पत्र है, बैरंग ही तो है. लाओ, इधर करो जी,’’ ताऊजी हलके गुस्से भरे स्वर में बोले.

‘‘लाओ, पत्र मुझे दो…मैं आ गया हूं,’’ हम ने रामकिशोर से कहा और 10-10 के 2 नोट उस की ओर बढ़ाए.

रामकिशोर ने लिफाफा हमारे हवाले किया.

‘‘क्षमा करना ताऊजी, हमें किसी की डाक किसी और को देने के आदेश नहीं हैं. गाइड में यही बताया गया है.’’

‘‘अरे, जाओ. किस के सामने गाइड की बात करते हो. मैं ने तो स्वयं 5 बार गाइड देखी है,’’ ताऊ ने होंठ सिकोड़े, ‘‘उस का वह गाना… ‘आज फिर मरने की तमन्ना है…’’’

‘‘ताऊजी, मैं फिल्म ‘गाइड’ की बात नहीं…पोस्टल गाइड की बात कर रहा हूं,’’ रामकिशोर ने अपनी साइकिल संभाली.

‘‘मनोज बेटे, जरा यह लिफाफा दिखाना. मेरा एक ड्राफ्ट तुम्हारे पते पर आने वाला है. बैरंग खत रजिस्ट्री से ज्यादा हिफाजत से आता है. इसलिए मैं ने उस ड्राफ्ट को बैरंग डाक से भेजने को बोला था,’’ कह कर ताऊजी ने लिफाफा लेने को हाथ बढ़ाया.

‘‘ताऊजी, आफिस का एक गोपनीयपत्र मेरे घर के पते पर आने वाला था और मैं भेजने वाले आफिस के डिस्पैचर की ‘हैंड राइटिंग’ पहचानता हूं. यह मेरे लिए ही है.’’

‘‘अरे वाह, लिफाफा खोले बगैर कैसे कह सकते हो?’’ ताऊजी ने जरा जोर दे कर कहा.

हम ने थोड़ा पीछे हट कर लिफाफा खोला और पत्र निकाल कर उस का एकएक पन्ना अलग करना चाहा ताकि ताऊजी को तसल्ली हो जाए कि उन का ड्राफ्ट नहीं है.

अचानक खत के पन्नों में से कोई फोटो निकल कर ताऊजी के पैरों के पास जा गिरा. इस से पहले कि हम वह फोटो उठाते ताऊजी ने झुक कर फोटो पर हाथ डाल दिया और हमारा कलेजा हलक में आ फंसा. आंखों तले अंधेरा छा गया. उस हसीना ने अपना जो फोटो इस खत के साथ भेजा था वह अब ताऊजी के कब्जे में था. अब जो तूफान ताऊजी और लीना घर में उठाएंगे, उस का अंदाजा कर के हमारे पांव लड़खड़ा गए. खैर, अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालते हुए हम ताऊजी के साथ ड्राइंग रूम तक आए और सोफे में धंस गए.

लीना पानी का गिलास ले कर ड्राइंग रूम में आई तो गिलास को मुंह से लगाए चोर निगाहों से हम ने ताऊजी की ओर देखा. वह फोटो देख रहे थे और हम उस तूफान को देख रहे थे जो अभी आने वाला था.

‘‘हा हा हा…’’ ताऊजी जोर से हंस रहे थे, ‘‘अरे, देखो बेटी, इस का गोपनीयपत्र,’’ ताऊजी ने फोटो मेज पर रख दिया.

हम ने धड़कते दिल से फोटो पर नजर डाली. वह बड़ेबड़े बालों वाली एक कुतिया का फोटो था. हमारी तो जान में जान आ गई. दिमाग ने तेजी से काम करना शुरू कर दिया. हम ने जल्दी से पत्र के पन्नों को जेब में ठूंसा.

लीना ने फोटो को उलटपलट कर देखा और बोली, ‘‘क्या अब कुत्तेबिल्ली पालने की ठानी है? मैं कहे देती हूं आप के कुत्तेबिल्लियों के लिए एक पैसा घरखर्च में से नहीं दूंगी और न यहां गंदगी फैलाने दूंगी.’’

‘‘आप से पैसे मांग कौन रहा है,’’ हम काफी हद तक संभल गए थे, ‘‘यह फोटो तो अपने बड़े साहब के लिए है. वह कुत्ते को खरीदना चाहते हैं. वह अपने बेटे को जन्मदिन पर सरप्राइज गिफ्ट देना चाहते हैं. इसलिए पत्र व्यवहार हमारे घर के पते पर हो रहा है.’’

‘‘फिर ठीक है,’’ लीना ने लंबी सांस छोड़ी.

उस कुतिया के फोटो को ऊपर की जेब के हवाले कर हम सोफे से उठे और जल्दी से आफिस की राह पकड़ी.

इस घटना के 2 दिन बाद आफिस से घर लौटा तो लीना एक लिफाफा हमारी आंखों के सामने लहरा कर बोली, ‘‘10 रुपए निकालो. आप की यह बैरंग चिट्ठी आई है.’’

लिफाफे पर नजर डालते ही हमें अपनी सांस रुकती हुई महसूस हुई. हमें वह सुंदर लिखावट कोई जहरीली नागिन सी लहराती लग रही थी, सोफे पर हम किसी बुत की तरह बैठे एकटक लीना के हाथ में पकड़े लिफाफे को देख रहे थे.

‘‘अरे, क्या हुआ आप को?’’ लीना ने लिफाफा डाइनिंग टेबल पर डाल दिया और जल्दी से हमारे माथे पर हाथ रखा फिर नब्ज पर हाथ रख कर बोली, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

लीना ने पानी का गिलास भर कर हमारे सामने रखा.

हम ने एक ही सांस में गिलास खाली कर के मेज पर रखा और फिर लिफाफे पर हाथ डालना चाहा.

‘‘ऊंहूं,’’ लीना ने लिफाफा परे खींच लिया, ‘‘पहले 10 का नोट.’’

लीना की आवाज में शोखी और होंठों पर मीठी मुसकान थी. लीना चूहेबिल्ली का खेल खेल रही थी. हम जानते थे अभी आवाज की शोखी किसी शेरनी की दहाड़ में बदल जाएगी. होंठों की मुसकान ज्वालामुखी का रूप धारण कर लेगी.

हम ने डरतेडरते जेब से पर्स निकाल कर टेबल पर डाल दिया. लीना ने पर्स में से 100 का नोट खींच लिया और लिफाफा हमारे सामने डाल दिया.

पहले से खोले गए लिफाफे में से हम ने खत निकालना चाहा, लेकिन लिफाफे में से कुछ न निकला. हम ने लिफाफे में झांक कर देखा और कहा, ‘‘इस में… तो…खत…नहीं है.’’

‘‘हां, मैं ने भी लिफाफा खोल कर देखा था. यह खाली था.’’

‘‘लिफाफा खाली था?’’ हम ने अविश्वास से पूछा.

‘‘हां, बिलकुल खाली था,’’ लीना ने हाथ में पकड़े नोट से खेलते हुए कहा.

‘‘सच कहती हो?’’

‘‘हां. खत शायद इस में डाला ही नहीं गया था.’’

हम ने खाली लिफाफा जेब में डाल लिया और लीना से बोले, ‘‘बड़े साहब को बता दूंगा कि लिफाफे में इस बार खत नहीं निकला.’’

दूसरे दिन हम आफिस में जल्दी जाने का बहाना लगा कर निकले और पोस्ट आफिस पहुंच गए. रामकिशोर एक मेज पर बैठा अपने सामने रखी डाक को क्रम से लगा रहा था और छोटेबड़े बंडल बनाबना कर उन पर रबड़ बैंड कस रहा था. कुछ देर बाद वह बाहर आया और अपनी साइकिल पर डाक का झोला टांगने लगा.

‘‘रामकिशोरजी,’’ हम ने अपने स्वर में शहद घोला.

‘‘अरे, मनोज बाबू, आप,’’ रामकिशोर ने मुड़ कर हमारी ओर देखा, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’

‘‘रामकिशोरजी, आप ने कल जो बैरंग लिफाफा लीना को दिया था उस में खत नहीं था.’’

‘‘खत तो था,’’ रामकिशोर ने बतलाया.

‘‘मगर लिफाफा तो खाली था. शायद लीना ने खत निकाल लिया है,’’ हम ने मरी आवाज में कहा.

‘‘लीना ने नहीं…वह खत मैं ने निकाल लिया था,’’ रामकिशोर ने अपनी बुशर्ट की जेब में से तह किया हुआ पत्र निकाल हमारे हाथ पर रख दिया, ‘‘जब लीनाजी बैरंग खत के हर्जाने के 10 रुपए लेने अंदर गईं तो मैं ने फुर्ती से लिफाफा खोला, पत्र निकाला और फिर से बंद कर दिया था.’’

‘‘शाबाश, रामकिशोर. तुम ने मुझे बहुत बड़ी मुश्किल से बचा लिया,’’ हम ने कहा. जी चाहता था रामकिशोर को गले लगा लूं.

‘‘यह तो मेरा फर्ज था,’’ रामकिशोर ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मैं आप का शुक्रिया अदा नहीं कर सकता,’’ हम ने जेब से पर्स निकाला.

‘‘यहां नहीं, मनोज बाबू…शुक्रिया शाम को चौक के ‘ब्ल्यू मून’ रेस्तरां मेें अदा करें.’’

उस के बाद तो मेरे बैरंग खतों की वसूली उसी रेस्तरां में होने लगी. वहां न लीना का डर था न उस के ताऊजी का, न किसी और का. जब भी हमारा कोई बैरंग पत्र आता रामकिशोर डाकखाने में हर्जाना भर देता और शाम को बैरंग चार्जेज वसूल कर लेता.

अब पत्रों में प्यार सी मिठास और बढ़ गई थी. मगर अब तक वह हसीना मिलने की जो जगह लिखती वह कभी वहां न मिलती और उस से अगले खत में न आने पर माफी मांगी जाती.

उस दिन आफिस में काम ज्यादा होने के कारण हम देर से रेस्तरां में पहुंचे थे. एक मेज के सामने रामकिशोर दरवाजे की ओर पीठ किए अपने किसी दोस्त के साथ बैठा था. उन दोनों के सामने चाय की प्यालियों के साथ नमकीन की प्लेटें थीं.

हम उन को डिस्टर्ब नहीं करना चाहते थे इसलिए उन के पीछे वाली मेज पर विपरीत दिशा में मुंह कर के बैठ गए.

बैरे से हम ने कोल्ड डिं्रक की बोतल मंगवा ली और हम रामकिशोर के मित्र के जाने का इंतजार करने लगे. उस के दोस्त के सामने हम बैरंग खत नहीं लेना चाहते थे.

‘‘राम, तुम्हारे बकरे का क्या हाल है?’’ रामकिशोर के दोस्त ने उस की पीठ पर हाथ मारा.

‘‘अरे, गोपाल क्या बताऊं… रोजरोज बेचारा छुरी के नीचे आ ही जाता है,’’ और फिर इसी के साथ धीरे से ही ही ही कर के हंस दिया.

‘‘और तुम्हारे इनाम की रकम भी तो बढ़ती जाती होगी,’’ गोपाल ने चम्मच से नमकीन मुंह में डालते हुए कहा.

‘‘हां, यार…दशहरेदीवाली पर बख्शीश देने के बजाय भाषण झाड़ा करता था कि तुम्हें महकमे से पगार मिलती है फिर लोगों से त्योहारों का इनाम क्यों मांगते हो? तुम्हारी शिकायत हो सकती है,’’ रामकिशोर ने पिछली दीवाली पर हमारे कहे शब्दों को दोहराया और हमारे लहजे/उच्चारण की नकल उतारी, ‘‘और अब उस रकम से कई गुना ज्यादा बैरंग चार्जेज डिपार्टमेंट को और चोरीछिपे खतों को पहुंचाने का इनाम मुझे दिया जाता है.’’

‘‘मगर प्यारे, यह कमाल मेरी जनाना हैंड राइटिंग का भी तो है वरना ऐसे प्यार में डूबे खत किसी लड़की से लिखवा सकते थे,’’ गोपाल कह रहा था, ‘‘मगर यार, वह प्रेमी को पत्र लिखने की कला वाली पुस्तक समाप्त होने को है.’’

‘‘कोई बात नहीं, उस का दूसरा भाग बाजार से ले लो,’’ रामकिशोर ने जेब से पर्स निकाला.

हम ने चुपचाप उठ कर काउंटर पर बिल चुकाया और रेस्तरां से बाहर हो गए.

4 दिन बाद रामकिशोर एक मोटा सा बैरंग लिफाफा ले कर घर आया.

‘‘50 रुपए इस बैरंग खत का हर्जाना महकमे को भरना होगा,’’ रामकिशोर ने लिफाफे से अपनी हथेली खुजाई.

‘‘वापस कर दो. लिख दो कि लेने से इनकारी है,’’ हम ने रामकिशोर पर पलट वार किया.

लालच : पायल का सच

नीचे से ऊपर तक पानी में भीगे जोगवा को घर के भीतर घुसते देख कर सुखिया चिल्लाई, ‘‘बाहर देह पोंछ कर अंदर नहीं आ सकते थे? सीधे घर में घुस आए. यह भी नहीं सोचा कि घर का पूरा फर्श गीला हो जाएगा.’’

जोगवा को सुखिया की बात पर गुस्सा तो आया, पर उसे चुप रहने का इशारा कर के वह कोने में पड़े एक पीढ़े पर बैठ गया.

पलभर खोजी नजरों से चारों ओर देख कर जोगवा ने अपनी धोती थोड़ी ढीली की और उस की कमर में बंधा मिट्टी का लोंदा फर्श पर गिर पड़ा.

‘‘यह क्या है?’’ सुखिया ने धीमी आवाज में पूछा.

‘‘मालिक के कुएं में बालटी गिर गई थी. उसे निकालने के लिए जब मैं कुएं में उतरा, तो यह चीज हाथ लगी. मैं सब की नजरों से छिपा कर ले आया हूं,’’ जोगवा बोला.

मिट्टी के उस लोंदे को टटोल कर सुखिया ने पूछा, ‘‘पर यह है क्या?’’

जोगवा के चेहरे पर हलकी सी मुसकान फैल गई. उस ने कहा,

‘‘तुम देखोगी, तो खुशी से पागल हो जाओगी… सम झी?’’ इतना कह कर उस ने कोने में रखे घड़े के पानी से कीचड़ में लिपटी उस चीज को रगड़रगड़ कर साफ किया, तो उस के हाथ में एक पायल  झलकने लगी.

‘‘अरे सुखिया, देख यह चांदी की है. कितनी मोटी और वजनदार है. असली चांदी की लगती है,’’ जोगवा अपनी खुशी संभाल नहीं पा रहा था.

चांदी की पायल देख कर सुखिया खुशी से  झूम उठी. वह जोगवा का सिर सहलाते हुए बड़े प्यार से बोली, ‘‘क्या इस की जोड़ी नहीं थी?’’

‘‘पानी के अंदर तो लगा था कि कुछ और भी है, पर तब तक मेरा दम घुटने लगा और मैं पानी के अंदर से ऊपर आ गया,’’ जोगवा ने बताया.

सुखिया जोगवा की कमर में हाथ डाल कर बड़े प्यार से बोली, ‘‘सुनोजी, मेरा मन कहता है कि तुम इस की जोड़ी जरूर ला दोगे. देखो न, यह मेरे पैर में कितनी अच्छी लग रही है…’’ सुखिया पायल को एक पैर में पहन कर बोली, ‘‘मैं इसे पहन कर अपने मायके जाऊंगी और जो लोग तुम्हें भुक्खड़ कह कर खुश होते थे, तुम्हारा मजाक उड़ाते थे, उन्हें दिखा कर बताऊंगी कि मेरा घरवाला कंगाल नहीं है. इस से तुम्हारी इज्जत और भी बढ़ जाएगी.’’

‘‘ठीक है, मैं एक बार और कुएं में उतरूंगा. पर दिन के उजाले में नहीं, बल्कि रात के अंधेरे में… जब सारा गांव गहरी नींद में सोया होगा,’’ जोगवा बोला, तो सुखिया के होंठों पर हंसी फैल गई.

आखिरकार रात हो गई. सारा गांव सन्नाटे में डूबा हुआ था. गहरी नींद में सोए गांव को देख कर जोगवा घर से बाहर निकला. उस के पीछेपीछे सुखिया भी रस्सी ले कर निकली. दोनों धीरेधीरे मालिक के घर की ओर बढ़े.

कुएं के करीब पहुंचने पर दोनों ने पलभर रुक कर इधरउधर देखा. कहीं कुछ नहीं था. सुखिया ने कुएं में रस्सी डाल दी.

कुएं में उतरने से पहले जोगवा सुखिया से बोला कि वह रस्सी को अपनी कमर में लपेट ले, ताकि हाथ से अचानक छूटने का खतरा न रहे.

सुखिया ने वैसा ही किया. रस्सी के एक छोर को अपनी कमर से लपेट कर उस ने दोनों हाथों से उसे कस कर पकड़ लिया.

जोगवा रस्सी के सहारे धीरे-धीरे कुएं के अंधेरे में गुम हो गया. वह अथाह पानी में जोर लगा कर अंदर धंसता चला गया. कीचड़ से भरे तल को उस ने रौंद डाला. कंकड़पत्थर और न जाने क्याक्या उस के हाथ में आए, पर पायल जैसी कोई चीज हाथ न लगी.

जब जोगवा का दम घुटने लगा, तब जल्दीजल्दी हाथपैर मार कर वह पानी की सतह पर आया और कुएं का कुंडा पकड़ कर दम लेने लगा.

सुखिया को कुएं के भीतर से जोगवा के पानी के ऊपर उठने की आहट मिली, तो उस की बांछें खिल उठीं. वह रस्सी के हिलने का इंतजार करने लगी. लेकिन जब अंदर से कोई संकेत नहीं मिला, तब वह निराश हो गई.

कुछ देर दम भरने के बाद जोगवा फिर पानी में घुसा. इधर अंधेरे में कुछ दूरी पर कुत्तों के भूंकने की आवाजें सुनाई पड़ीं.

सुखिया का कलेजा कांप उठा. उस ने कुएं में  झुक कर जोगवा को आवाज लगाई, पर कुएं से उसी की आवाज लौट आई. उस का जी घबराने लगा.

तभी अचानक मालिक के मकान का दरवाजा खुला. लालटेन की धीमी रोशनी कुएं के चबूतरे पर पड़ी.

‘‘कौन है? वहां कौन खड़ा है?’’ दरवाजे के पास से कड़कदार आवाज आई.

मालिक की आवाज सुन कर सुखिया का दिल दहल उठा. उस के हाथपैर कांपने लगा.

दहशत में न जाने कैसे सुखिया की कमरे से बंधी रस्सी छूट कर हाथ में आ गई और हाथ से छूट गई. जोगवा के ऊपर आने का सहारा कुएं के अंधेरे में गुम हो गया.

मालिक लालटेन ले कर कुएं तक आए. वहां उन्हें कोई दिखाई नहीं पड़ा. इधरउधर  झांक कर वे लौट गए.

इधर जोगवा ने पानी से ऊपर आ कर जैसे ही रस्सी पकड़ कर दम लेना चाहा, तो रस्सी ऊपर से आ कर उस की देह में सांप की तरह लिपट गई.

रस्सी उस के लिए नागफांस बन गई और वह पानी में डूबनेउतराने लगा. हाथपैर मारना मुहाल हो गया. धीरेधीरे पानी में उठने वाला हिलोर शांत हो गया.

सुखिया अंधेरे में गिरतीपड़ती घर पहुंची. डर से उस का पूरा शरीर कांप रहा था. सांस धौंकनी की तरह चल रही थी. मालिक के हाथों जोगवा के पकड़े जाने के डर ने उसे रातभर सोने नहीं दिया.

पौ फटते ही मालिक के कुएं के पास भीड़ जमा हो गई. सुखिया को किसी ने आ कर जब जोगवा के डूब जाने की खबर दी, तो वह पछाड़ खा कर गिर पड़ी. गांव वालों ने जोगवा की लाश को कुएं से निकाल कर आंगन में रख दिया.

सुखिया रोतेरोते जब जोगवा की लाश के पास गई, तो उस की आंखें उस के हाथ में दबी किसी चीज पर अटक गईं. सुखिया ने जोगवा के हाथ को अपने हाथ में ले कर जब पायल की रुन झुन की आवाज सुनी, तो उस का कलेजा फट गया. उस चीज को मुट्ठी में भींच कर सुखिया दहाड़ मार कर रोने लगी. उस के लालच ने जोगवा की जान ले ली थी.

 

चालाक लड़की: भाग 3

राजेश का आलीशान बंगला देख कुमुदिनी हैरान रह गई. दरबान ने बंगले का गेट खोला और नमस्ते की. नौकर ने राजेश की अटैची टैक्सी से निकाल कर बंगले में रखी.

‘‘मैडम, यह है अपनी कुटिया. आप के आने से हमारी कुटिया भी पवित्र हो जाएगी,’’ राजेश ने कुमुदिनी से कहा.

‘‘बहुत ही खूबसूरत बंगला बनाया है. कितनी भाग्यशाली हैं इस बंगले की मालकिन?’’

‘‘छोड़ो, इधर बाथरूम है. आप फ्रैश जाओ. मैं आप के लिए कपड़े लाता हूं,’’ कह कर राजेश दूसरे कमरे में जा कर एक बड़ी सी कपड़ों की अटैची ले आया. अटैची खोली तो उस में कपड़े तो कम थे, सोनेचांदी के गहने व नोटों की गड्डियां भरी पड़ी थीं.

‘‘नहींनहीं, यह अटैची मैं भूल से ले आया. कपड़े वाली अटैची इसी तरह की है,’’ और राजेश तुरंत अटैची बंद कर उसे रख कर दूसरी अटैची ले आया.

‘‘यह लो अपनी पसंद के कपड़े… मेरा मतलब, साड़ीब्लाउज या सूट निकाल लो. इस में रखे सभी कपड़े नए हैं.’’

‘‘पसंद तो आप की रहेगी,’’ तिरछी नजरों से कुछ मुसकरा कर कुमुदिनी ने कहा.

‘‘यह नीली ड्रैस बहुत ज्यादा फबेगी आप पर. यह रही मेरी पसंद.’’

वह ड्रैस ले कर कुमुदिनी बाथरूम में चली गई. तब तक राजेश भी अपने बाथरूम में नहा कर ड्राइंगरूम में आ कर कुमुदिनी का इंतजार करने लगा.

कुमुदिनी जब तक वहां आई, तब तक नौकर चायनाश्ता टेबल पर रख कर चला गया.

दोनों ने नाश्ता किया. राजेश ने पूछा, ‘‘खाने में क्या चलेगा?’’

‘‘आप तो मेहमानों की पसंद का खाना खिलाना चाहते हो. मैं ने कहा न आप की पसंद.’’

‘‘मैं तो आलराउंडर हूं. फिर भी?’’

‘‘वह सबकुछ तो ठीक है, पर मैं आप के बारे में कुछ…’’

‘‘क्या? साफसाफ कहो.’’

‘‘आप के नौकरचाकर श्रीमतीजी को जरूरत बता सकते हैं. मेरे चलते आप के घर में पंगा खड़ा हो, मुझे गवारा नहीं.’’

‘‘आप चाहो तो मैं परसों तक नौकरों को छुट्टी पर भेज देता हूं, पर मेरी एक शर्त है.’’

‘‘कौन सी शर्त?’’

‘‘खाना आप को बनाना पड़ेगा.’’

‘‘हां, मुझे मंजूर है, पर आप के घर में कोई पंगा न हो.’’

‘‘पहले यह तो बताओ खाने में…’’ राजेश ने पूछा.

‘‘आप जो खिलाओगे, मैं खा लूंगी,’’ आंखों में झांक कर कुमुदिनी ने कहा.

राजेश ने एक नौकर से चिकन और शराब मंगवाई और बाद में सभी नौकरों को छुट्टी पर भेज दिया. तब तक रात के 9 बज चुके थे.

‘‘आप ने तो…’’ शराब से भरे जाम को देखते हुए कुमुदिनी ने कहा.

‘‘जब मेरी पसंद की बात है तो साथ तो देना ही पड़ेगा,’’ राजेश ने जाम आगे बढ़ाते हुए कहा.

‘‘मैं ने आज तक इसे छुआ भी नहीं है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं चलेगी. मैं अगर अपने हाथ से पिला दूं तो…?’’ और राजेश ने जबरदस्ती कुमुदिनी के होंठों से जाम लगा दिया.

‘‘काश, आप के जैसा जीवनसाथी मुझे मिला होता तो मैं कितनी खुशकिस्मत होती,’’ आंखों में आंखें डाल कर कुमुदिनी ने कहा.

‘‘यही तो मैं सोच रहा हूं. काश, आप की तरह घर मालकिन रहती तो सारा घर महक जाता.’’

‘‘अब मेरी बारी है. यह लो, मैं अपने हाथों से आप को पिलाऊंगी,’’ कह कर कुमुदिनी ने दूसरा रखा हुआ जाम राजेश के होंठों से लगा दिया.

शराब पीने के बाद राजेश से रहा न गया और उस ने कुमुदिनी के गुलाबी होंठों को चूम लिया.

‘‘आप तो मेहमान की बहुत ज्यादा खातिरदारी करते हो,’’ मुसकराते हुए कुमुदिनी ने कहा.

‘‘बहुत ही मधुर फूल है कुमुदिनी का. जी चाहता है, भौंरा बन कर सारा रस पी लूं,’’ राजेश ने कुमुदिनी को अपने आगोश में लेते हुए कहा.

‘‘आप ने ही तो यह कहा था कि कुमुदिनी रात में सारे माहौल को महका देती है.’’

‘‘मैं ने सच ही तो कहा था. लो, एक जाम और पीएंगे,’’ गिलास देते हुए राजेश ने कहा.

‘‘कहीं जाम होंठ से टकराते हुए टूट न जाए राजेश साहब.’’

‘‘कैसी बात करती हो कुमुदिनी. यह बंदा कुमुदिनी की मधुर खुशबू में मदहोश हो गया है. यह सब तुम्हारा है कुमुदिनी,’’ जाम टकराते हुए राजेश ने कहा और एक ही सांस में शराब पी गया.

कुमुदिनी ने अपना गिलास राजेश के होंठों से लगाते हुए कहा, ‘‘इस शराब को अपने होंठों से छू कर और भी ज्यादा नशीली बना दो राजेश बाबू, ताकि यह रात आप के ही नशे में मदहोश हो कर बीते.’’

नशे में धुत्त राजेश ने कुमुदिनी को बांहों में भर कर प्यार किया. कुमुदिनी भी अपना सबकुछ उस पर लुटा चुकी थी. राजेश पलंग पर सो गया.

थोड़ी देर में कुमुदिनी उठी और अपने पर्स से एक छोटी सी शीशी निकाल राजेश को सुंघाई. शीशी में क्लोरोफौर्म था. इस के बाद कुमुदिनी ने किसी को फोन किया.

राजेश जब सुबह उठा, उस समय 8 बजे थे. राजेश के बिस्तर पर कुमुदिनी की साड़ी पड़ी थी. साड़ी को देख उसे रात की सारी बातें याद हो आईं. उस ने जोर से पुकारा, ‘‘ऐ कुमुदिनी.’’

बाथरूम से नल के तेजी से चलने की आवाज आ रही थी. राजेश ने दोबारा आवाज लगाई, ‘‘कुमुदिनी, हो गया नहाना. बाहर निकलो.’’

पर, कुमुदिनी की कोई आवाज नहीं आई. तब राजेश ने बाथरूम का दरवाजा धकेला, तो उसे कुमुदिनी नहीं दिखी.

वह घर के अंदर गया. सारा सामान इधरउधर पड़ा था. रुपएपैसे व जेवर वाला सूटकेस, घर की कीमती चीजें गायब थीं. राजेश को समझते देर नहीं लगी. उस के मुंह से निकला, ‘‘चालाक लड़की…’’

 

जुम्मन के मन की बात : दर्द ए दिल

अब्बू और अम्मी के राज में भी सभी तरह की बातें करते थे, पर कभी मन की बात नहीं कर सके. वैसे भी बाप के होटल में गुजारा करने वालों की कोई  सुनता नहीं. जवानी फूटी तो बगल और नाक के नीचे वाले हिस्सों में छोटेछोटे बाल उगने शुरू हुए, तो स्कूल और कालेज की लड़की सहपाठी से ईलू टाइप मन की बात कहने की इच्छा बलवती हुई, पर बेरोजगारों की जब ऊपर वाला नहीं सुनता तो लड़की सहपाठी क्या खाक सुनेगी. यह विचार मन में आते ही जुम्मन चचा के मन के उपवन में मन की बात दफन हो कर रह गई.

डिगरी हासिल होने पर घर वालों से यूपीएससी की तैयारी करने की मन की बात शेयर करना चाहते थे, कम आमदनी वाले पिता सुलेमान दर्जी के सामने मन की मरजी वाली अर्जी दायर नहीं कर पाए. नतीजतन, सरकारी दफ्तर में चपरासी बन कर रह गए.

आप को पता ही है कि मुलाजिम से अफसर तक सब की सुनने वाले की बात भला कोई सुनता है क्या?

हालत और हालात के चलते बातों की खेती करने वाले जुम्मन चचा के अंदर का हुनर मरने सा लगा. नौकरी लगी नहीं कि निकाह के लिए रिश्ते आने शुरू हो गए.

पतली, कमसिन और हसीन बेगम की इच्छा पालने वाले जुम्मन मियां शर्म और हया के चलते इस बार भी घर वालों से मन की बात कह सकने में नाकाम रहे. नतीजतन, भारीभरकम दहेज के साथ पौने 3 गुना भारीभरकम वजन वाली बेगम से उन का कबूलनामा पढ़वा दिया गया.

निकाह के बाद मन की बात करना तो दूर मन की बात सोचना भी चचा जुम्मन के लिए दूभर हो गया. दफ्तर और घरेलू कामों की दोहरी जिम्मेदारी जो मिल गई थी. पिछले 22 साल से जुम्मन की घरगृहस्थी में एमन बेगम की बात ही कही, सुनी और मानी जाने लगी.

एक दिन की बात है. चचा जुम्मन सूजे हुए चेहरे के साथ लंगड़ाते हुए ‘अल्प संसद’ के उपनाम से मशहूर असलम की चाय दुकान पर पहुंचे. ढुलमुल अर्थव्यवस्था की तरह चचा की अवस्था को देख कर ‘कब, कहां, कैसे’ के संबोधन के साथ मुफ्त का अखबार पढ़ने और चाय की चुसकी के बीच खबरों का स्थानीय पोस्टमार्टम करने वाले बुद्धिजीवी पूछ बैठे, ‘‘अरे, यह क्या हो गया चचाजान?’’

जुम्मन चचा ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया, ‘‘अब क्या बताऊं भाई, कल दोपहर में तुम्हारी चाचीजान के लिए चाय बनाई थी…’’

‘‘तो क्या चाय सही नहीं बनने के चलते चाची ने खातिरदारी कर डाली?’’ भीड़ में से किसी ने चुटकी ली.

जुम्मन चचा खीजते हुए बोले, ‘‘बिना बात के बेतिया मत बनो यार. पूरी बात सुनते नहीं कि लहेरिया सराय बन बीच में लहराने लगते हो.’’

‘‘मोकामा की तरह मौन हो कर चुपचाप सुन नहीं सकते क्या भाई…’’ मामले की गंभीरता देखते हुए असलम चाय वाले ने अपनी बात रखी.

असलम की बात सुन कर सभी खामोशी से जुम्मन चचा की ओर मुखातिब हुए.

‘‘हां तो मैं बची हुई चाय को सुड़क रहा था कि घर की दीवार पर टंगे ससुराल से मदद से मिले 24 इंच वाले एलईडी पर अचानक छप्पन इंच वाले सज्जन प्रकट हो गए यानी न्यूज चैनल पर संयुक्त राष्ट्र में पीएम के मन की बात का लाइव प्रसारण होने लगा.

‘‘कार्यक्रम देख कर मेरे मन के अंदर भी कई बातें एकसाथ उफान मारने लगीं. यह सोच कर मेरा मन मुझे धिक्कारने लगा कि एक हमारे पीएम साहब हैं, जो संयुक्त राष्ट्र से अपने मन की बात कर रहे हैं. और एक मैं हूं, जो खुद के घर में भी मन बात नहीं कर सकता. कार्यक्रम देखते हुए मुझे प्रेरणा और हौसले का बूस्टर डोज मिला.

‘‘चाय की आखिरी चुसकी के साथ मन ही मन प्रण किया कि आज मैं भी हर हाल में मन की बात कह कर रहूंगा. फिर क्या, टीवी बंद कर बेगम के सामने मैं मन की बात करने लगा. उस के 22 साल के इमोशनल अत्याचार और ससुराल वालों की दखलअंदाजी वाली ट्रैजिडी पर खुल कर मन की बात कहने लगा.

‘‘अभी मेरे मन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि तुम्हारी चाची ने जम कर मेरी सुताई कर दी… कल दोबारा मुझे घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा…’’

चाय के गिलास से निकल रही भाप को चेहरे के सूजन क्षेत्र की ओर ले जाते हुए जुम्मन चचा ने अपना पूरा दर्द सुनाया.

‘ओह…’ एकसाथ हमदर्दी के कई स्वर चाय दुकान पर गूंज उठे.

‘‘लेकिन भाई, कल का कार्यक्रम देख कर मुझे एक बात की सीख जरूर मिल गई… यही कि पीएम की नकल नहीं करनी चाहिए…’’ जुम्मन चचा की बात पूरी होने से पहले ही बैंच पर बैठे उस्मान ने जोश में आ कर अपनी बात कही.

‘‘अरे नहीं मियां…’’ लंबी सांस लेते हुए जुम्मन चचा बोले, ‘‘अगर बेगम साथ न हो, तो बंदा संयुक्त राष्ट्र में भी मन की बात कर सकता है और अगर बेगम साथ हो, तो घर के अंदर भी मन की बात करना मयस्सर नहीं…’’

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