Story in Hindi
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राम सिंह फौजी के घर से चिट्ठी आई थी. इतनी दूर रहते हुए आदमी के लिए चिट्ठी या खबर ही तो केवल एक सहारा होती है. ये चिट्ठियां भी अजीब होती हैं, कभी खुशी देती हैं, तो कभी दुख भी बढ़ा देती हैं.
राम सिंह फौजी के घर वालों की यह चिट्ठी भी अलग तरह की थी. उस में एक फौजी के घर वालों की सभी दिक्कतें लिखी थीं. बेटे ने लिखा था, ‘पापा, आप कैसे हैं? घर की दीवार गिरने लगी है और दादा भी आजकल बीमार रहते हैं. कोने वाली कोठरी की छत कभी भी गिर सकती है. परसों हुई मूसलाधार बारिश से उस में से बहुत पानी चू रहा था.
‘मां की हालत ठीक है. मैं अब रोजाना स्कूल जाता हूं. मेरी ड्रैस पुरानी हो गई है. पैंट भी मेरी घुटनों पर से फट गई है.
‘पापा, इस बार घर आते समय आप मेरी नई पैंट लेते आना. चप्पल जरूर लाना. छोटू के लिए आप खिलौने वाली टैंक और बंदूक लेते आना. आप जल्दी घर आना पापा.
‘आप का बेटा, राजू.’
राम सिंह सोचने लगा, ‘यह राजू भी होशियार हो गया है. केवल 10 साल का है, लेकिन चिट्ठी भी लिख लेता है. इस बार पैंट और चप्पल जरूर लेता जाऊंगा. छोटू के लिए खिलौने वाला टैंक और बंदूक भी लेता जाऊंगा. मैं इस बार जरूर छुट्टी लूंगा.’
‘‘राम सिंह, खाना खा लिया क्या?’’ पास ही से आवाज आई.
‘‘नहीं यार, खाया नहीं है. अभी थोड़ी देर में खा लूंगा.’’
‘‘कब खा लेगा? 8 बजे आपरेशन पर जाना है और साढ़े 7 बज चुके हैं,’’ राम सिंह का साथी फौजी रंजीत सिंह उस से बोला.
राम सिंह उठ कर भोजन की तरफ बढ़ गया. ‘आजकल यहां के हालात काफी खराब हो चुके हैं. आएदिन गोलीबारी होती रहती है. रोज दोनों तरफ के लोग मारे जाते हैं. न रात को आराम, न दिन को चैन. पता नहीं क्या करने पर उतारू हैं ये लोग. शांति से क्यों नहीं रहते,’ ऐसा सोचते हुए राम सिंह ने बड़े बेमन से खाना खाया.
आज राम सिंह को घर के खाने की बहुत याद आई. दूर राजस्थान के रेतीले इलाके में बसे अपने छोटे से गांव की याद ताजा हो गई. घर से चिट्ठी आते ही हर बार उस का यही हाल हो जाता है. पता नहीं, क्यों?
‘‘राम सिंह, जल्दी से तैयार हो जाओ,’’ मेजर सौरभ घोष की आवाज कानों से टकराते ही राम सिंह ने अपनी राइफल, पट्टा, टौर्च वगैरह उठा ली.
‘‘आज हमें चौकी नंबर 2 पर जाना है. वहां हमला हो सकता है. वह चौकी बहुत खास है. वह हमें हर हाल में बचानी होगी,’’ मेजर सौरभ घोष सभी सिपाहियों से कह रहे थे.
सभी सिपाहियों और अफसरों की टुकड़ी वहां से चौकी नंबर 2 की तरफ बढ़ गई. ‘तड़तड़’ की आवाजों के साथ 1-2 फौजी शहीद हो गए, देश की हिफाजत की खातिर उन्होंने अपनी जान दे दी. देर तक गोलीबारी होती रही. अब कुछ ही लोग बाकी रह गए थे.
राम सिंह के साथ 5 जवान और थे. दुश्मन की एक गोली राम सिंह के पास ही खड़े रंजीत सिंह को आ कर लगी, जिस से उस ने दम तोड़ दिया. अपने दोस्त रंजीत सिंह को मरते देख राम सिंह को अपने शरीर का एक अंग जुदा होता महसूस हुआ.
अचानक राम सिंह ने जोश में आ कर अपनी जान की परवाह न करते हुए दौड़ कर फायरिंग की. दुश्मन के 3 फौजी मारे गए. अब केवल दुश्मन का एक फौजी बचा था. वह चट्टान की आड़ से गोलियां चला रहा था.
राम सिंह ने पेड़ की आड़ से उस पर 3-4 फायर झोंक दिए थे, जो निशाने पर लगे थे और वह दुश्मन भी तड़प कर शांत हो गया.
राम सिंह ने 3-4 पल उसे देखा और बेफिक्र हो कर उस के करीब गया. चेहरामोहरा उलटपलट कर देखा और फिर बुदबुदाया, ‘उम्र तो मेरे बराबर की ही लग रही है.’
राम सिंह ने उस की तलाशी ली. उस के परिचयपत्र को टौर्च की रोशनी में पढ़ा. उस पर लिखा था, रफीक अशरफ, सिपाही, 36 लाइट इंफैंटरी.
राम सिंह ने उस की पैंट की पिछली जेब टटोली, तो वह चौंका और बोला, ‘‘अरे, यह क्या? शायद इस की चिट्ठी है. चलो, देखते हैं,’’ कहते हुए राम सिंह ने अपने पास खड़े एक साथी को टौर्च पकड़ाई.
राम सिंह को थोड़ीबहुत उर्दू पढ़नी आती थी, जो कि उस ने गांव के मौलवी से बचपन में सीखी थी.
राम सिंह ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की:
‘अब्बूजान, अस्सलाम अलैकुम. आप कैसे हैं? हम सब अम्मी, सलीम, दादी अम्मां, दादू सब खैर से हैं. मेरा स्कूल लगना शुरू हो गया है.
‘मैं 8वीं जमात में हो गई हूं. सलीम भी चौथी जमात में आ गया है. मास्टरजी ने हम से नई ड्रैस सिलवाने को कहा है. मेरी फ्रौक पुरानी हो गई?है. सलीम भी नई ड्रैस मांग रहा है.
‘अब्बू, हमारे पास जूते भी नहीं हैं. दादू बोलते हैं कि बेटा इस बार तुम्हारे अब्बू ढेर सारी ड्रैस, जूते और चीजें ले कर आएंगे.
‘दादू का कुरता भी फट गया है. पर उन्हें मास्टरजी तो नहीं डांटते न. अम्मी और दादी अम्मां दोनों बहुत उदास रहती हैं. उन के बुरके भी पुराने और तारतार हो गए हैं. आप सालभर हम से दूर क्यों रहते हैं अब्बू?
‘पिछली ईद पर आप नहीं आए थे, सो हम ने उस दिन सेंवइयां भी नहीं बनाई थीं. सलीम बहुत रोया था उस दिन. इस बार आप जरूर आना.
‘घर पर पैसे खत्म हो गए हैं. पैसे के लिए हम ने अपनी एक बकरी बेची थी. असलम दुकान वाले ने अब उधार देना भी बंद कर दिया है. वह कहता है कि पहले वाले पूरे पैसे दो, उस के बाद सामान दूंगा.
‘आप आ जाइए अब्बू. आते समय आप मेरे लिए फ्रौक, सलीम के लिए ड्रैस, जूते, दादू के लिए कुरता, दादी अम्मां और अम्मी के लिए नए बुरके जरूर लाना.
‘अब्बू, यहां आने पर एक बकरी भी खरीदेंगे, सलीम बहुत जिद करता है न.
‘आप की बेटी, सोफिया.’
राम सिंह ने भरे गले से पूरी चिट्ठी पढ़ी. टौर्च की रोशनी में उसे लगा कि मानो उस का और अशरफ का घर एक ही हो. उसे कोई फर्क नहीं लगा. उसे अपने घर की दीवारें और छत गिरती नजर आईं.
काश, वह इस फौजी के लिए सारी चीजें पहुंचा सकता और असलम दुकान वाले का उधार भी चुका सकता.
दूसरे दिन अखबारों में खबर छपी थी कि राजपूताना राइफल्स के जवान राम सिंह ने अनोखी वीरता दिखाई. नीचे उस की बहादुरी का पूरा ब्योरा छपा था.
पूरा देश राम सिंह की बहादुरी से खुश था, पर इधर राम सिंह खुद को हत्यारा समझ रहा था.
आदमी को मारने के अपराध में कानून सजा देता है. वह खुद को सजा के लायक मान रहा था, पर उस ने ‘आम आदमी’ नहीं मारे थे. वे मरने वाले ‘आम आदमी’ नहीं थे. उन्हें मारने पर उसे राष्ट्रपति से ‘सर्वोच्च वीरता पुरस्कार’ देने का ऐलान हुआ.
15 अगस्त को सम्मान समारोह में कुरसी पर बैठा राम सिंह दोनों देशों के नेताओं, हुक्मरानों के बारे में सोच रहा था, ‘ये लोग शांति क्यों नहीं चाहते हैं? रोज सरहद पर बेगुनाह जवान मारे जाते हैं और ये एयरकंडीशनर लगे कमरों में आराम से बैठे उन जवानों को ‘शहीद’ का खिताब देते हैं. क्या बिगाड़ा है इन बेगुनाह जवानों ने इन नेताओं का?
‘दुनिया के सभी देश शांति से रह कर तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं और इधर ये दोनों बेवकूफ देश लड़ कर जनता के अरमानों को काला धुआं बना रहे हैं.’
राम सिंह यही सोच रहा था कि तभी मंच से उस का नाम पुकारा गया.
राम सिंह ने वह पुरस्कार और पदक लिया तो जरूर, पर उन्हें लेते समय वह मन ही मन में बड़बड़ा रहा था, ‘मुझे पुरस्कार क्यों दिया जा रहा है. मुझे सजा दो. मैं ने हत्याएं की हैं. मुझे पुरस्कार मत दो.’
इतिहास केवल जलियांवाला बाग की खूनी होली का ही हाल बताता है, उस के हत्यारे का अंत नहीं लिखता. मगर जो ‘शहीद उधम सिंह’ नाम से परिचित हैं उन के खून में यह नाम सुनते ही एक गरमी का उबाल सा पैदा हो जाता है. लुधियाना शहर में शहीद उधम सिंह नगर कसबे में घूमते हुए पहली बार इसी तरह का रोमांच मुझे भी हो आया था. मेरे सामने वह चेहरा उभर आया, बिलकुल उसी तरह का, जो कभी मेरे दादाजी ने अपनी आपबीती के छोटे से हिस्से में चित्रित किया था. उन की यह आपबीती इस प्रकार थी…
1938 की बात है. उन दिनों मैं और मेरे 2 साथी लंदन में थे. गुरुद्वारा हमारा अस्थायी घर था. लंदन आने वाला करीब हर भारतीय वहां आ कर कुछ दिन ठहरता था. एक दिन सुबह हम ने वहां एक नए भारतीय को देखा. उस की नजरें भी हम पर पड़ीं, लेकिन हमें काम पर जाने की जल्दी थी इसलिए हम ने शाम को उस से मिलने का फैसला किया. शाम को वह खुद ही कमरे के बाहर हमारी प्रतीक्षा कर रहा था. हमें देख कर वह उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ कर बोला, ‘सत श्री अकाल.’
उस की आवाज में अजीब तरह का खिंचाव था. अभिवादन का जवाब दे कर हम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा. कमीज और तहमत, सिर पर सफेद साफा और पीछे लटकता हुआ तुर्रा. यही उस का पहनावा था. उस के सिर पर केश नहीं थे पर आवाज उस की खास कड़क थी, जो उसे सिख जमींदार घराने का दर्शाती थी. यों पहली नजर में हमें गुंडा लगा था.
‘‘मेरा नाम उधमसिंह है,’’ उस ने बताया. शिष्टाचारवश हम ने बढ़ कर उस से हाथ मिलाया और अपना परिचय दिया.
‘‘कौन सा गांव है, भाई साहब, आप का?’’ मैं ने पूछा.
‘‘सनाम, बरनाले के पास. आप का?’’
‘‘गिल्लां गांव है, लुधियाने के पास.’’ उस के चेहरे पर उभरी रौनक और गहरी हो गई. वह बोला, ‘‘गिल्लां? नहर के पास वाला न? तब तो हम आसपास के ही हैं,’’ और उस ने बढ़ कर मुझे मजबूत आलिंगन में कस लिया. वतन से दूर एक बेगाने देश में कोई हमवतन और वह भी अपने ही गांव के पास का मिल जाए तो इस प्रकार की अलौकिक खुशी होती है. यह हमारी उस से पहली मुलाकात थी. इस के बाद वह हमारे बहुत करीब आता गया पर हम सदा उस से दूर रहने की कोशिश करते. हम सुबह काम पर चले जाते और शाम को वापस आते. वह भी इसी तरह करता, पर हम ने उस से कभी उस के धंधे के बारे में पूछने की कोशिश नहीं की. न ही उस ने कभी बताने की इच्छा जाहिर की. हमारा खयाल था कि वह चार सौ बीसी का धंधा करता होगा. उस के अंदर कोई दिलेर दिल भी होगा, इस की कभी हम ने कल्पना भी नहीं की थी.
वह समय निकाल कर शाम को हमारे पास आ बैठता और घंटों इधरउधर की हांकता रहता. उस की बातें अधिकतर गोरों के प्रति रोष से भरी होती थीं. हर समय वह गोरों को भारत से निकालने के स्वप्न देखता रहता. खासतौर पर 2 गोरे उस की आंखों में बहुत खटकते थे. पहला जनरल डायर और दूसरा ओडवायर. उन्हें मारने की कसमें वह कई बार खा चुका था.एक दिन मैं ने उस से पूछा, ‘‘उधमसिंह, भई, अगर तुम्हें गोरे इतने नापसंद हैं, तो तुम यहां आखिर करने क्या आए हो?’’
‘‘अपना असली मकसद पूरा करने.’’
‘‘कौन सा?’’ हम सब ने एकसाथ पूछा.
‘‘शादी,’’ वह छूटते ही तपाक से बोला.
दिन बीतते गए और उस के साथ हमारे संबंध घनिष्ठ होते गए. इतने घनिष्ठ कि जब हम ने कमरे किराए पर लिए तो उसी मकान में एक कमरा उस ने भी जबरदस्ती किराए पर ले लिया. उस ने इस का कारण बताया, ‘‘तुम से जुदा हो कर मैं रह ही नहीं सकता.’’ अभी भी हम उस के कामधंधे के बारे में अनभिज्ञ थे. एक दिन आखिर मैं ने इस बारे में पूछ ही लिया. तो वह बोला, ‘‘मेरा काम, इनकलाब.’’
मैं हंस पड़ा और बोला, ‘‘वह तो तुम्हारी बातों और कारनामों से ही लगता है. अच्छा भई इनकलाबी, तेरा गुरु कौन है?’’
‘‘उस ने बताया भगत सिंह.’’ जैसेजैसे समय बीतता गया हम उस के प्रति अधिकाधिक शक्की होते गए. यह बात निराली होती जा रही थी. उस समय 1939 चल रहा था. एक दिन सिरदर्द के कारण मैं औफिस से जल्दी घर लौट आया. आ कर चाय बनाई और पीने ही लगा था कि तभी खटखट सीढि़यां चढ़ता हुआ वह अंदर आ गया.
‘‘आ, उधमा, चाय पी,’’ मैं ने कहा तो वह बोला ‘‘नहीं, नहीं, बस पी. मैं कुछ दिन पहले यहां रखी एक चीज लेने आया हूं. ले सकता हूं?’’
‘‘जरूर भई, अगर तेरी कोई चीज है तो जरूर ले सकता है.’’ मेरे कमरे में एक आला था जो न जाने कब से कीलें ठोंक कर बंद किया हुआ था. मैं ने कभी उस पर ध्यान भी नहीं दिया था. उस ने जेब से एक पेचकश निकाला और फट्टियों के पेच खोल दिए. फिर बीच में से एक रिवाल्वर निकाल कर जेब में डाला और फट्टियों को उसी तरह ठोंक कर वह मेरे सामने आ खड़ा हुआ. फिर उस ने चाय की मांग की. मैं ने उस के लिए चाय बनाई और खुद इस उधेड़बुन में लग गया कि कैसा खतरनाक आदमी है यह. अगर पुलिस यहां आ कर रिवाल्वर ढूंढ़ लेती तो मुझे बेकार में मुसीबत उठानी पड़ती.
मैं ने पूछा, ‘‘कब रख गया था भई, तू इसे यहां?’’
‘‘यार, सद्दा, अब तुम से क्या छिपाना. गोरी सरकार न जाने क्यों मुझ से डरती है? मेरा नाम पुलिस ने दस नंबरियों की लिस्ट में लिख रखा है. इसीलिए मुझे वापस अपने मुल्क जाने की भी इजाजत नहीं है. पिछले कुछ दिनों से तो पुलिस की मुझ पर खास नजर है. इसीलिए मैं इसे यहां रख गया था.’’ फिर उस की आवाज में वही कड़क पैदा हो गई, ‘‘क्या तुम बहादुर हिंदुस्तानी नहीं हो? क्या तुम उस देश की औलाद नहीं हो, जहां भगत सिंह पैदा हुआ?’’
‘‘जानते हो एक बार जब वह छोटा था तो उस से किसी ने पूछा था, ‘तुम ने अपने खेत में क्या बोया है, भागू?’ वह नन्हा सा बालक बड़े जोश में बोला था, ‘बंदूकें,’ तुम भी उसी धरती के बेटे हो. देश के लिए अपनी कुरबानी से डरते हो? और क्या तुम्हें मुझ पर अब जरा भी विश्वास नहीं? अगर यही बात है तो, जाओ, तुम्हें मैं कुछ नहीं कहूंगा. जाओ, तुम्हें इजाजत है. जा कर पुलिस को बता दो कि मेरे पास हथियार है. वह आ कर मुझे पकड़ लेगी. सद्दा, मैं तुम से मुहब्बत करता हूं. अगर तुम्हें इस से खुशी होगी तो मैं उमरकैद भी झेल लूंगा.’’ इतना कह कर वह चुप हो गया और मुझ पर होने वाली प्रतिक्रिया देखने लगा. मगर मैं आंखें झुकाए बुत बना बैठा रहा. थोड़ी देर बाद वह उठा और तेजी से बाहर चला गया. उस दिन पहली बार मैं ने जाना कि उस में देश के प्रति प्रेम कितना कूटकूट कर भरा हुआ था. अब मेरे दिल में उस के लिए प्यार और श्रद्धा थी. बातों ही बातों में मैं ने एक दिन उस से कहा, ‘‘उधमसिंह, तुम अगर देश को आजाद करवाना चाहते हो तो तुम्हें भारत में रह कर ही कुछ करना चाहिए. यहां तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ सकता.’’
मेरी बात सुन कर उस के चेहरे पर गम की तसवीर उभर आई, ‘‘हां,’’ वह लंबी सांस छोड़ता हुआ बोला, ‘‘मेरे देश के हजारों निहत्थे भाइयों को डायर और ओडवायर ने जलियांवाला बाग में गोलियों से भुनवा दिया था. उन में मेरा भाई और बापू भी…’’ उस की आंखें भर आईं और गला रुंध गया.
फिर धीरेधीरे उस ने अपने बचपन की वह घटना सुनाई जिस से उसे उन की मौत का पता चला था. 13 अप्रैल, 1919 यानी बैसाखी का दिन था. जलियांवाला बाग में अनजान, निहत्थे, परवाने इकट्ठे हो कर सभा कर रहे थे. गुलामी की दास्तां सुनने के लिए बूढ़े, बच्चे और स्त्रियां वहां इकट्ठी हुई थीं. ब्रिटिश सरकार इस अहिंसक सभा की ताकत देख चुकी थी. एक गांधी के साथ हजारों गांधी बनते देख वह बौखला उठी. उस की चालाक राजनीति भी कांप गई. इसलिए इस से निबटने का अधिकार सरकार ने फौजी जनरलों को दिया और उन जनरलों को ताकत के घमंड में इस बला से निबटने का एक ही तरीका सूझा, वह था गोलियां चलाने का. उन के हुक्म से ही मशीनगनों का घेरा बाग के चारों तरफ लगा दिया गया. इन घेरा डालने वालों में वे नमकहराम भी थे जो अपनी नौकरी के लिए देश को आजाद होता नहीं देखना चाहते थे. इस के बाद की खूनी होली की कहानी इतिहास के कई पन्नों पर काली स्याही से लिखी हुई है. यह कहानी कुछ ही दिनों में बड़ेबड़े शहरों से दूरदराज के गांवों में जा पहुंची. लाशों को पहचान कर अपने पतियों, भाइयों, बहनों और बेटों को जान लेने वाले तो थोड़े ही थे. अधिकांश लोगों ने तो जो घर नहीं पहुंचे उन्हें भी मारा गया समझ लिया.
संगरूर जिले का एक गांव है सनाम. एक घर में गांव के वृद्धवृद्धाओं का रोना सुनाईर् दे रहा था. उस का पति और बेटा भी जलियांवाला बाग में गए थे और आज उन्हें गए तीसरा दिन था. तभी एक छोटा सा बालक भागता हुआ आ कर अपनी मां की गोद में दुबक गया. मां और इतने लोगों को रोता देख बालक चाहे कुछ नहीं समझा था, पर इतना जरूर समझ गया कि लोग ऐसे किसी के मरने पर ही रोते हैं. अबोध बालक कुछ बड़ा हुआ और स्कूल जाने लगा. एक दिन सुबह बच्चों की एक टोली तख्तीबस्ता संभाले, बातें करती, उछलतीकूदती स्कूल जा रही थी. उस में यह बालक भी था. जलियांवाला बाग की खूनी होली को 3 वर्ष बीत चुके थे. मौत के गम धुंधले पड़ चुके थे. तभी एक बालक ने उस से पूछा, ‘‘उधमा, तेरा बापू और वीर कहां गए हैं?’’
बालक बिना सोचे ही बोला, ‘‘परदेश को.’’
‘‘तुझे किस ने कहा, ओए?’’
‘‘मां ने. क्यों?’’
‘‘मेरी मां तो रात बापू से कह रही थी, ‘बेचारे उधम के बापू और वीर को मरे 3 साल हो गए. गोरे बड़े बुरे हैं. जब उधम जवान होगा तो वह जरूर उन की मौत का बदला लेगा.’ तेरे बापू और वीर को, उधमा, गोरों ने ही मार दिया है. है न?’’
छोटे से उधम की आंखों के आगे बचपन का वह दिन नाच उठा जो उस ने मां की गोद में दुबक कर देखा था. उसे थोड़ाथोड़ा विश्वास हो गया कि राणा ठीक ही कह रहा होगा. अपने बाप और भाई की मौत की कहानी सुनते ही वह ताव खा गया. उसने सोचा कि वह मां से सचाई जानेगा और अगर यह सच है तो वह अंगरेजों से बदला लेगा. वह लगभग दौड़ता हुआ घर पहुंचा और एक ही सांस में मां से कई सवाल पूछ गया, ‘‘मां, बापू और वीर को गोरों ने मार दिया था क्या? तू तो कहती थी परदेश गए हैं. आज राणा ने मुझे सबकुछ बता दिया.’’
मां अपने बेटे को लौटता देख पहले ही हैरान थी. अब दबी हुई बात उस के मुंह से सुन सकते की हालत में आ गई. पति और जवान बेटे की याद कर पुराना घाव फूट निकला. उस की आंखों में आंसू चमक आए. काम छोड़ उस ने अपने बेटे को छाती से लगा लिया और फफकफफक कर रोने लगी. ‘‘मां, तू रो मत. मैं ला कर उन गोरों को अपने खेत की क्यारियों में गाड़ दूंगा. तू बता, वे कौन थे.’’ ‘कौन’ के बारे में बूढ़ी ने लोगों से यही सुना था कि वह ‘डैर’ था, कोईर् बड़ा अफसर और एक उस का साथी था. यही उस ने उधम को भी बता दिया. उधम ने भी सोच लिया कि वह बड़ा हो कर जरूर बदला लेगा.
जलियांवाला बाग की घटना से सारे देश में रोष की लहर फैल गई थी. ठाकुर बाबू ने ‘सर’ की उपाधि त्याग दी. बड़ेबड़े नेताओं के भाषण आग में घी का काम करने लगे. ये सब देख कर गोरी सरकार डर गई. लोगों को शांत करने के लिए उस ने जनरल डायर और ओडवायर को उन के पदों से हटा कर इंगलैंड भेज दिया. अपनी कहानी के अंत में उधम सिंह ने बताया कि वह गदर पार्टी का मैंबर बन गया था. उसी के सहारे वह अमेरिका गया और फिर यहां आ गया. एक दिन शाम को हम सब चाय पी रहे थे. वह भी साथ था. प्याला खाली कर के वह मेज पर रखता हुआ बोला, ‘‘अच्छा दोस्तो, आज शायद यह तुम लोगों के साथ मेरी आखिरी चाय है. यदि कोई गलती हुई हो तो माफ कर देना,’’ फिर उस ने जेब से बटुआ निकाला और मेरे एक साथी को कुछ पैसे दिए. शायद कभी उधार लिए होंगे, पर मेरा ध्यान उस के नाम कार्ड पर गया. उस पर लिखा था, ‘एमएसए.’ मैं बड़ा हैरान हुआ.
‘‘यह क्या, भाई, उधम?’’ मैं ने कार्ड की तरफ इशारा किया.
‘‘मोहम्मद सिंह ‘आजाद’,’’ वह बोला और जोर से हंस दिया. उसी दिन शाम को हमारा प्रोग्राम कैंस्टन हौल जाने का बन गया. उस दिन वहां भारत में उठ रहे आजादी के इनकलाब के बारे में मीटिंग होनी थी. हम अपनी सीटों पर बैठे थे. मीटिंग अभी शुरू भी नहीं हुईर् थी कि तभी मेरे साथी ने इशारा किया. सामने की 2 पंक्तियां छोड़ कर एक किनारे पर ‘वह’ बैठा था.
‘‘अरे, यह तो कहीं जा रहा था,’’ साथी बोला.
‘‘इसे कहां जाना है. इस की बातों और सच में बड़ा फर्क है,’’ दूसरे साथी ने कहा और दोनों हंस दिए. मीटिंग शुरू हो चुकी थी. सामने मंच पर कई लोगों के बीच जनरल डायर बैठा था. उसी के साथ उस के दाईं ओर ओडवायर बैठा था. ये दोनों ही उधम के असली शिकार थे. वह कहता था कि इन्होंने हजारों निहत्थों… जलियांवाला बाग… मेरा खून गरम हो कर तेजी से नाडि़यों में चक्कर काटने लगा. तभी वह उठा और बाहर चला गया. कुछ देर बाद फिर वह अंदर आ गया और धीमी चाल चलता हुआ मंच की ओर चढ़ चला. उस समय डायर बोल रहा था, ‘‘दंगे करने वाले हिंदुस्तानी बिलकुल पागल हैं…’’
सब एकटक भाषण सुन रहे थे. तभी फुरती से उधम ने अपनी जेब से हाथ निकाला. मैं इतना ही देख पाया कि उस के हाथ में वही रिवाल्वर था. इस के बाद ‘ठांय…ठांय…ठांय…’ 3 गोलियों की आवाज हुई. सारा हौल कांप उठा. मंच पर बैठे डायर का सिर छाती पर आ गिरा. ओडवायर भी एक ओर लुढ़क गया.
‘‘तो उस ने अपना काम पूरा कर दिया. अपने बाप और भाई की मौत का बदला, हजारों निहत्थों की मौत का बदला…’ कुछ ही क्षण में उस के साथ बिताए सारे क्षण मेरे सामने उभरते चले गए. गोली मार कर वह भागा नहीं, रिवाल्वर थामे उसी प्रकार खड़ा रहा. थोड़ी देर में ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और हौल का घेरा डाल लिया. सुबह अखबारों में छपा था, ‘एक भारतीय युवक मोहम्मद सिंह ‘आजाद’ ने जनरल डायर और ओडवायर पर गोलियां चलाईं. उस समय वे कैंग्सटन हौल में भारत में उभरी स्थिति पर भाषण दे रही थे. जनरल डायर की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई. ओडवायर गोलियों से हताहत हो गए हैं.’ उस पर मुकदमा चला और उसे सजा ए मौत मिली.
मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ था. काली रात और भी स्याह होती जा रही थी. तभी उस में एक रोशनी उभर आई और एक चेहरे में बदल गई. वह था उधम का चेहरा… देश का बेटा या गुंडा, इनकलाबी या चारसौबीस… उस की याद के कई पन्ने मेरे सामने पलटने लगे. मगर उस का चेहरा मुसकरा रहा था. अदालत के कटघरे में खड़ा वह अपनी वकालत कर रहा था.
‘‘तुम ने गोली क्यों चलाई?’’ जज ने पूछा.
वह कड़क कर बोला, ‘‘हजारों बेगुनाहों और निहत्थों से भी क्या किसी ने ऐसे पूछा था?’’
‘‘जानते हो तुम्हारे जुर्म की सजा फांसी होगी?’’
‘‘हां, बहुत अच्छी तरह जानता हूं,’’ तुम्हारी अदालत में एक अंगरेज को मारने की सजा मौत है और हजारों हिंदुस्तानियों को मारने का इनाम शाबाशी.’’
‘‘उन्होंने सरकार का हुक्म पूरा किया था, यह उन का कर्तव्य था. हमारी अदालत तुम्हें फांसी की सजा देगी.’’
‘‘मौत का डरावा मुझे मत दीजिए, जजसाहब. आप जो चाहें कर सकते हैं. मैं ने भी अपने देश का एक काम पूरा किया है जो मेरा कर्तव्य था. मेरी पार्टी की अदालत ने भी उन्हें गोलियों की सजा दी थी. सजा देने का यह काम मुझे सौंपा गया था. मगर मुझे दुख है कि ओडवायर छूट गया. फिर भी कोई बात नहीं. मेरा कोईर् और भाई उसे भी पार लगा देगा. उस से कहना कि तैयार रहे.’’ जज ने कलम उठा कर सजा का फौर्म भरा और मेज पर कलम मार कर निब तोड़ दी. तभी मैं ने उसे सींखचों में खड़ा देखा. मैं उस से बात कर रहा था.
‘‘यह तुम ने क्या किया, उधमा?’’
‘‘मैं ने अपने देशवासियों की निर्मम मौत का बदला लिया है.’’
‘‘मगर तुम तो यहां शादी करने आए थे?’’
वह जोर से हंसा, ‘‘तुम्हें बरात में नहीं बुलाया, सद्दा, इसलिए. तुम्हें पता नहीं मेरी शादी तो हो गई, अब तो कुछ दिन में मेरी सुहागरात आने वाली है. तुम्हें शादी में बुला नहीं सका.’’ मेरी आंखों में आंसू उभर आए. तभी समय पूरा होने की घंटी खनखना गई. अपने आंसू छिपाने के लिए मैं लौट पड़ा. वह बोला, ‘‘अच्छा, अलविदा, सद्दा. देखो, मेरे लिए रोना नहीं,’’ और वह लय के साथ कुछ गुनगुनाने लगा.
आज उस लय को याद करता हूं तो लगता है, बिलकुल इन शब्दों की तान थीं, ‘मेरा रंग दे बसंती चोला…’
रविवार का दिन था. श्वेता अपने पैरों के नाखूनों को शेप दे रही थी कि तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज आई.
“हैलो, क्या आप का नाम श्वेता है?”
“जी… पर आप कौन? मैं ने आप को पहचाना नहीं.”
“मेरा नाम गिरिजा है. मैं रूपराज की पत्नी हूं. अब मैं कौन हूं समझ में आ ही गया होगा?” श्वेता कोई जवाब तो नहीं दे पाई पर वह सदमे में आ गई.
“यहां बैठ कर आराम से बात नहीं हो सकती. पास के रैस्टोरैंट में चल कर हम बात करें? कपड़े बदल कर जल्दी से चलो,” गिरिजा बोलीं.
उन की आवाज में जो गंभीरता थी उस से श्वेता को वैसे ही करने के लिए मजबूर कर दिया. उस के मन के अंदर हजारों प्रश्न उठने लगे,’झगड़ा करने आई है क्या… मेरे पति को मुझ से अलग मत करो ऐसा विनती करेगी और आदमियों को ला कर मुझे धमकी देगी…’ क्या करना चाहिए उस के समझ में नहीं आया. श्वेता कपड़े बदल कर उन के साथ रवाना हो गई.
श्वेता जहां काम करती थी वहां पर रूपराज एक बड़ा अधिकारी था. करीब ढाई हजार आदमीऔरत वहां पर काम करते थे. जहां आदमीऔरत साथ काम करते हैं तो एकदूसरे से मिलनाजुलना स्वाभाविक ही है. एक ही कंपनी में काम करने से कई बार रूपराज से उस की बातचीत हुई थी. एक दिन लिफ्ट में साथ आने का मौका भी मिला और फिर एक दिन मोबाइल नंबरों का आदानप्रदान भी.
रूपराज के फोन पर बात करने पर वह मना नहीं कर सकी. उस से बात करना अच्छा लगने लगा. फिर मिलने की इच्छा भी होने लगी. दोनों के बीच प्रेम शुरू हो चुका था. श्वेता को लगा कि अब इस प्रेम को शादी में बदलना चाहिए.
“मैं पहले से ही शादीशुदा हूं…” कहते हुए रूपराज हकलाया,”मेरी पत्नी एक राक्षसी है, मोटी है और बदसूरत ही नहीं निपूती भी है. हमेशा चिल्लाती रहती है. सामानों को उठा कर फेंकती है. प्रेम से एक शब्द भी नहीं बोलती. मुझे तो घर जाने की इच्छा भी नहीं होती…” कह कर टेबल पर दोनों हाथ रख कर रोने लगा.
“तुम्हें देखते ही मैं तुम पर फिदा हो गया. तुम बेहद खूबसूरत हो और तुम्हें देख कर मैं सबकुछ भूल गया कि मैं शादीशुदा हूं. मुझे लगा तुम्हें मालूम पड़े तो तुम मुझ से रिश्ता नहीं रखोगी, यही सोच कर मैं ने सच को तुम से छिपाया. मुझे छोड़ कर मत चली जाना श्वेता…”
यह सुनने के बाद श्वेता को रूपराज से जो प्रेम था वह और भी बढ़ गया. इतने प्रेम से रहने वाले पति से, प्रेम न करने वाली पत्नी के ऊपर उसे गुस्सा भी आया.
“तुम चिंता मत करो. मैं उस से तलाक ले लूंगा. उस के बाद हम शादी कर लेंगे. पर तब तक मैं तुम्हें देखे बिना नहीं रह सकता. होस्टल में तो आनाजाना संभव नहीं. एक नया घर ले लेता हूं, तुम वहां रहो. 2 महीने में तलाक हो जाएगा…”
विश्वास करने लायक बात तो थी, मगर उस की पत्नी इस तरह आ कर उस के सामने खड़ी हो जाएगी यह उस ने नहीं सोचा था. रैस्टोरैंट में श्वेता और गिरिजा कोने की एक टेबल पर बैठे.
और्डर दे कर गिरिजा ने मौन को तोड़ा,”क्या बात है श्वेता, तुम कुछ भी बोल नहीं रही हो… मैं क्या कहूंगी ऐसा तुम्हें डर लग रहा है क्या?”
“मैं… यहां इस होस्टल में रहती हूं यह आप को कैसे पता चला?”
गिरिजा खिलखिला कर हंसी,”आदमी दूसरी औरत के पास जा रहा है एक औरत उसे समझ नहीं सकती क्या ?
पति से जब पूछा तब उन्होंने ठीक से जवाब नहीं दिया तब डिटैक्टिव ऐजैंसी की मैं ने सहायता ली. उस ने हर बात को सहीसही बता दिया.
“छोटी उम्र में तुम्हारे मातापिताजी गुजर गए और नजदीकी रिश्तेदार भी कोई नहीं है. औफिस में तुम किसी से भी ज्यादा बातचीत नहीं करतीं. सिर्फ शुक्रवार को ही तुम साड़ी पहनती हो और बाकी दिन चूड़ीदार या कोई वैस्टर्न ड्रैस पहनती हो. पिछली बार जब तुम रूपराज के साथ बाहर गई थीं तो उस ने तुम्हें एक पिंक कलर की सिल्क की साड़ी दिलाई थी. यह सबकुछ भी मुझे मालूम है.”
अपराधिक भावना से श्वेता ने सिर झुका लिया.
“चलो रख लो… ऐसा कह कर एक चौकलेट देने वाला भी तुम्हें कोई नहीं है. एक गंभीर आदमी के आते ही तुम उस पर फिसल गईं. मैं दिखने में सुंदर नहीं हूं, मोटी हूं, काली हूं और हमारे पिताजी की वजह से एक बेमेल शादी हो गई.”
वह आगे बोलीं,”मेरी बहन ने एक लड़के से प्रेम किया, वह कौन है, कैसा है मेरे पिताजी ने इसे भी मालूम नहीं किया. उन से बात कर के दीदी की शादी करवा दी. मेरे पिताजी को तो उस के बारे में मालूम करना चाहिए था. यदि लड़का ठीक होता तो शादी करवाते. पर ऐसा नहीं हुआ.
“उस आदमी के सही न होने कारण मेरी दीदी ने आत्महत्या कर ली. मैं भी कहीं प्रेम में न पड़ जाऊं ऐसा सोच कर वे डर गए और उन के औफिस में काम करने वाले रूपराज से जल्दीजल्दी में मेरी शादी करवा दी.पर रूपराज को हमारे पिताजी के रुपयों पर ही आंख थी, यह समझने के पहले ही उन का देहांत हो गया. हमारा कोई बच्चा नहीं है, यह तो एक बहाना है. जिन के बच्चा नहीं होता वे खुशी के साथ नहीं रहते हैं क्या? मन में प्रेम हो तो यह संभव है,” गिरिजा का गला भर आया. आंखों में नमी आ गई.
अपनी गलती को श्वेता ने महसूस किया.
“देखो, अपनी समस्या को बता कर सांत्वना लेने के लिए मैं यहां नहीं आई. मेरे पति को छोड़ दो यह भी नहीं कहूंगी. जब उस ने मेरे शरीर का बहाना बना कर दूसरी स्त्री को ढूंढ़ लिया है, तो उसी समय से मेरी शादीशुदा जिंदगी का कोई अर्थ नहीं है, यह बात मेरी समझ में आ गई थी.सिर्फ तुम्हारे बारे में बात करने के लिए मैं तुम्हें ढूंढ़ कर आई, तुम से बात करने.”
‘यदि मुझे समझाने के लिए मां होती तो मेरी यह गलती नहीं हुई होती…’ श्वेता सोचने लगी.
“तुम कैसी लड़की हो श्वेता? कोई तुम्हें बस इतना कहे कि वह तुम्हें चाहता है, वह शादीशुदा है तो तुम्हें अपना होश खो देना चाहिए? तुम्हें पूछताछ कर के सच का पता नहीं लगाना चाहिए?
“मुझे एक फोन तो कर सकती थीं न… तुम अकेली हो, नौकरी करती हो, फिर क्यों यह सैकंड हैंड हसबैंड के साथ रहना चाहती हो?
“तुम्हें कानून की जानकारी नहीं है? वह तलाक मांगे तो मैं तलाक दे दूंगी तुम ने ऐसा क्यों सोच लिया? रूपराज ने अभी तक तलाक की अर्जी भी नहीं लगाई है. वैसे, अर्जी लगा भी दे तो तलाक मिलने में 2-3 साल तो लग ही जाएंगे. यदि मैं कोई विरोध करूं तो और भी समय लग सकता है. तब तक रूपराज तुम से शादी नहीं कर सकता. यदि करे तो कानून के हिसाब से वह सही नहीं होगा.”
गिरिजा की गंभीर और सही बातों का श्वेता के पास कोई जवाब नहीं था,”अभी क्या करना चाहिए मेरी समझ में नहीं आ रहा है. आप ही बताइए क्या करूं?” श्वेता बोली.
“हमारे घर में प्रेम के कारण आत्महत्या हुई है, वैसे ही यहां नहीं हो, इसी बात को ध्यान में रख कर मैं यहां आई हूं. होस्टल में जाओ और तसल्ली से सोचो. तुम्हें रूपराज से कितना प्रेम है और रूपराज को तुम से कितना प्रेम है और वह कितना सच्चा है इसे भी मालूम करो? हमारा तलाक हो भी जाए तो रुपए, मकान और सबकुछ मेरे पास आ जाएंगे. आवाज देते ही काम के लिए आदमी हाजिर, बड़ा बंगला, हमेशा ड्राइवर के साथ गाड़ी… इन सब सुविधाओं को छोड़ने के लिए रूपराज तैयार होगा क्या, इसे मालूम करो. यदि इन सब को छोड़ कर वह तुम्हारे साथ आने को तैयार है तो वह सच्चा प्रेम है. फिर तुम उस से शादी कर लो और खुश रहो. पर पहले उसे परखो और सचाई को जानो. यदि कोई धोखा खाने वाला आदमी हो तो वहां धोखा देने वाला आदमी भी होता है.
“रूपराज की बातों को सुन कर जल्दी से होस्टल खाली कर के नया मकान ले कर चली मत जाना. जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है. तुम्हें कुछ मदद की जरूरत है तो मुझे फोन कर देना,” कह कर गिरिजा बिल चुका कर बाहर निकल गईं.
‘रूपराज ने जिस गिरिजा के बारे में बताया था उस में और इस गिरिजा में कितना अंतर है… यह सब देखे बिना ही मैं रूपराज के प्रेमजाल में फिसल गई यह मेरी ही गलती थी,’ यह सोचते हुए श्वेता ने एक दिन रूपराज से बात की.
तलाक के बारे में प्रश्न पूछने पर उस ने बेरुखी से जवाब दिया. वह श्वेता को अलग मकान में रखना चाहता था.
गिरिजा के साथ जो आरामदायक जीवन उसे मिला है, वह उसे खोना नहीं चाहता था. वह खुद को अच्छा आदमी भी दिखाना चाहता था ताकि समाज में उस की इज्जत बनी रहे. श्वेता के साथ छिप कर जिंदगी जीने का जो जाल उस ने बिछाया था वह श्वेता की समझ में आ चुका था. यह जान कर एक दिन उस ने गुस्से में कहा,”अरे, तुम कैसी बात कर रही हो. मेरे साथ घूमीफिरी हो, कितने दिन होटलों में आई हो, मौजमस्ती की हो, उन सब को मैं फोन पर डाल कर भेज दूंगा. फिर कोई तुम से शादी नहीं करेगा. मैं जैसा बोल रहा हूं वैसा रहो नहीं तो मैं क्या करूंगा मुझे ही नहीं पता.”
श्वेता डर गई. उस ने गिरिजा से मदद मांगी,”वह धमकाता है…”
तब गिरिजा ने कहा,”तो तुम क्यों डर रही हो? जो कुत्ते भूंकते हैं वे काटते नहीं. तुम्हारी फोटो डालते ही साथ में उस की तसवीर नहीं आएगी क्या? हां, तुम सतर्क जरूर रहो. गुस्से में लोग खून करने में भी पीछे नहीं रहते…
“तुम पुलिस की मदद लो. जहां विनम्र होना जरूरी हो वहां होना चाहिए पर कोई गलती करे तो उस को छोङो भी मत. किसी काम को शुरू करने के बाद मन में दुख नहीं होना चाहिए…” गिरिजा बोलीं.
फिसल कर गिरने वाली श्वेता का गिरिजा ने हाथ पकड़ कर खींचा था और उसे सही राह दिखाई थी. फिर भी वह औफिस वालों की निगाहों और रूपराज की धमकियों को सहन न कर पाई.
“तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा हो तो नौकरी छोड़ दो श्वेता,” गिरिजा बोलीं.
“नौकरी छोड़ दूं तो कैसे? फिर मेरा क्या होगा?”
“श्वेता… तुम्हें ड्रैस डिजाइनिंग का काम अच्छी तरह आता है न, तुम अपनी ड्रैस स्वयं ही डिजाइन करती हो… यह सब कैसे मालूम है मत पूछो. मैं हूं न तुम्हारे साथ. बस, पहले छोटे दुकान से शुरू करेंगे. हम दोनों के नाम से उस का नाम ‘श्वेगी’ रखेंगे. अलगअलग जगहों से कपड़े खरीदेंगे. अच्छा चलेगा तो यात्रा भी करेंगे.”
“नहीं तो?”
“नहीं तो दुकान बंद कर के ठेला लगा कर चाट बेचेंगे,” कह कर गिरिजा हंसी.
कठोर परिश्रमी, किसी बात से न डरने वाली और मजबूत इरादों वाली गिरिजा दृढ़ता से खड़ी थीं. उसे प्यार देने के लिए कोई नहीं था. एक दीदी थीं वह भी चल बसी थीं. पिता भी नहीं है. शादी की, तो पति भी दूसरी लड़की को ढूंढ़ता फिर रहा है बावजूद भी वह निडर हो कर खड़ी है. अपने फैसलों को सोचसमझ कर ले रही है. दूसरी लड़की धोखा न खाए इसलिए उस की मदद कर रही है.
गिरिजा से संबंध रखने में श्वेता का भी स्वभाविमान जाग उठा. दोनों के संयुक्त प्रयास से ‘श्वेगी फैशन’ का जन्म हुआ. जीने का आत्मविश्वास जागृत होने से और अपने परिश्रम से वे दोनों सफलता की ओर बढ़ते चले गए.
‘अभी आया,’ कह कर रमेश गया था. लेकिन जब काफी देर तक न लौटा, तो रागिनी बेचैन हो उठी.
रागिनी की परेशानी उस के चेहरे पर उभर आई, जिसे किशोर भांप गया. वह हौले से बोला, ‘‘क्या बात है रागिनी?’’
‘‘भैया नहीं आया.’’
‘‘वह अब नहीं आएगा.’’
‘‘क्या मतलब?’’ रागिनी ने हैरानी से पूछा.
‘‘रमेश अब नहीं आएगा… तुम्हें अकेले ही जाना पड़ेगा…
‘‘रमेश का परसों इंटरव्यू है. उस का इंटरव्यू मैं ही लूंगा. रमेश उस में कामयाबी पाने के लिए तुम्हें मेरे पास छोड़ गया है,’’ किशोर ने कहा.
‘‘इंटरव्यू में कामयाबी पाने के लिए मुझे आप के पास छोड़ गया है… मैं कुछ समझ नहीं?’’ रागिनी ने पूछा.
‘‘रमेश का खयाल है कि मैं तुम्हारे जिस्म से खेल कर उसे पास कर दूंगा, इसीलिए वह तुम्हें मेरे पास छोड़ गया है.’’
‘‘नहीं… ऐसा नहीं हो सकता. आप झठ बोल रहे हैं.’’
‘‘मैं सच कह रहा हूं. वह तुम्हें इसीलिए छोड़ गया है.’’
‘‘ऐसा आप कैसे कह सकते हैं?’’
‘‘क्योंकि मैं ने भी एक दिन ऐसा ही किया था.’’
‘‘क्या…’’ किशोर की बात सुन कर रागिनी चौंकी.
‘‘जो गलती आज रमेश कर गया है, वैसी मैं ने भी एक दिन की थी,’’ कहते हुए किशोर बीते दिनों में खो गया…
किशोर के पिता ठेकेदार थे. बचपन के कुछ साल हंसीखुशी में गुजरे थे. मातापिता दोनों ही उसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन साधना के घर में कदम रखते ही उस के दिन बदल गए थे.
साधना जवान और खूबसूरत थी. वह किशोर के पिता भूषण की स्टैनो थी. भूषण को साधना से प्यार हो गया, फिर उन दोनों ने शादी कर ली.
साधना के घर में आते ही किशोर की मां लता के बुरे दिन आ गए. साधना ने अपने रूप और जवानी के बल पर भूषण को अपनी मुट्ठी में कर लिया. वह उन के दिल की रानी बनने के साथसाथ घर की मालकिन भी बन गई.
भूषण को पहली पत्नी लता की अब जरा भी परवाह न थी. उस की हालत नौकरानी जैसी हो गई.
तकरीबन एक साल बाद साधना ने एक बेटी को जन्म दिया. वह रिश्ते में किशोर की बहन लगती थी, लेकिन उस ने दिल से कभी भी उसे अपनी बहन नहीं माना था. वह उस से नफरत करता था.
लता ने पति की दूसरी शादी का विरोध न किया, पर अंदर ही अंदर वह घुटती रही. इस से उस के शरीर को रोग लग गया, जो धीरेधीरे बढ़ता रहा. आखिरकार उस की मौत हो गई.
किशोर अपनी मां की मौत की जिम्मेदार साधना को ही समझता था. मां उसे बहुत प्यार करती थी. लेकिन जब वह ही न रही, तो उस घर में क्या रखा था? आखिर किशोर ने पिता का घर छोड़ दिया.
किशोर ने जल्दी ही प्राइवेट नौकरी कर ली. साथ ही, वह सरकारी नौकरी के लिए भी कोशिश करता रहा. कुछ समय बाद उसे रेलवे में नौकरी मिल गई.
तकरीबन 3 साल बाद नौकरी में तरक्की हासिल करने के लिए किशोर ने इम्तिहान दिया, जिस में वह पास हो गया. अब इंटरव्यू की बारी थी. उसे पता चला कि मदनलाल इंटरव्यू लेने वाला है. वह अधेड़ उम्र का कुंआरा और ऐयाश आदमी था.
किशोर ने जब मदनलाल के बारे में 3-4 लोगों से पूछताछ की, तो पता चला कि वह बहुत रसीला है. एक जानकार ने कहा, ‘जो मदनलाल के पास औरत भेजेगा, वही इंटरव्यू में पास होगा.’
किशोर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? कामयाबी पाने के लिए किसी औरत को मदनलाल के पास भेजे या शराफत के रास्ते पर चल कर फेल हो जाए? इसी उधेड़बुन में वह एक दिन मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर खड़ा था कि तभी उसे अपनी सौतेली बहन रश्मि मिल गई.
किशोर घर छोड़ने के बाद कभी भी अपने पिता से मिलने नहीं गया था. कभीकभार वे कहीं दिख भी जाते, तो किशोर उन के सामने पड़ने से बच जाता.
लेकिन रश्मि को देखते ही उसे लगा कि उस की मुश्किल का हल मिल गया?है. वह एक तीर से दो शिकार कर सकता है. रश्मि को मदनलाल के पास पहुंचा कर इम्तिहान में कामयाबी भी हासिल कर सकता है और इस के साथ ही अपनी मां की मौत का बदला भी ले सकता है.
यह विचार मन में आते ही उस की आंखों में चमक आ गई. वह मुसकराते हुए बोला, ‘रश्मि, कहां जा रही हो?’
‘घर.’
‘समय हो तो चलो, तुम्हें एक जगह ले चलता हूं.’
किशोर की बात सुन कर रश्मि की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.
रश्मि ने न कुछ सोचा, न ही उस के दिल में कोई शक हुआ और न ही यह विचार मन में आया कि वह आज क्यों उसे साथ ले जाना चाहता है. वह उस के साथ जाने को तुरंत तैयार हो गई.
किशोर रश्मि को बिना समय गंवाए मदनलाल की कोठी पर ले गया.
‘सर, यह मेरी बहन है,’ किशोर ने मुसकराते हुए कहा.
मदनलाल ने उन का स्वागत किया. काफी देर तक इधरउधर की बातें होती रहीं, फिर किशोर बोला, ‘सर, मैं अभी लौट कर आया.’
वह रश्मि को बहाने से मदनलाल की कोठी पर छोड़ कर चला गया. उस ने अपनी मां की सौतन की बेटी को वासना के पुजारी के पास पहुंचा कर अपनी मां की मौत का बदला ले लिया था.
उस दिन मदनलाल ने रश्मि की इज्जत लूट ली थी. इस बात को रश्मि सहन न कर सकी और कुछ दिनों बाद उस ने खुदकुशी कर ली.
मरने से पहले उस ने किशोर को चिट्ठी लिखी, ‘बहन व भाई का रिश्ता बहुत पवित्र होता है. भाई के ऊपर बहन की हिफाजत की भी जिम्मेदारी होती?है. मैं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, जो तुम ने मेरी इज्जत ही लुटवा दी?’
रश्मि की मौत से किशोर को गहरा सदमा लगा था. जीतेजी उस ने रश्मि को बहन नहीं माना था, लेकिन मरने के बाद उस की याद उसे हमेशा तड़पाती रहती.
‘‘तो क्या आप भी मेरे साथ…’’ अचानक रागिनी की आवाज सुन कर किशोर चौंक उठा. फिर हौले से वह बोला, ‘‘क्या रमेश तुम्हारा सगा भाई है?’’
‘‘नहीं…’’ रागिनी बोली, ‘‘रमेश की मां को तलाक दे कर पिताजी ने मेरी मां से शादी कर ली थी.’’
‘‘तो यह बात है… तुम्हारी भी मेरी जैसी ही कहानी है. मैं भी अपनी मां की मौत का बदला लेना चाहता था और रमेश भी तुम्हें इसीलिए छोड़ कर गया है.’’
‘‘तो क्या आप भी?’’
‘‘नहीं, मैं ने आज तक किसी औरत के जिस्म से खिलवाड़ नहीं किया है,’’ किशोर बोला, ‘‘मैं ने तब जो जुर्म किया था, अब मैं उस का प्रायश्चित्त करना चाहता हूं.’’
‘‘वह कैसे?’’
‘‘तुम्हें अपनी बहन बना कर…’’
‘‘सच?’’
‘‘हां, एकदम सच. क्या तुम बनोगी मेरी बहन?’’
‘‘भैया,’’ रागिनी दौड़ कर किशोर के गले से लग गई, तो उस की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.
‘‘मेरी रानी, यह रहा तुम्हारा कैमरा. ऐसा ही चाहिए था न?’’ फौजी रामबहादुर ने बैग से कैमरा निकाल कर माया को देते हुए कहा.
‘‘अरे, वाह. मुझे ऐसा ही कैमरा चाहिए था. फौज की कैंटीन का कैमरा. लो, तुम अभी मेरी तसवीर खींच लो,’’ माया खुशी से चहकते हुए बोली.
रामबहादुर ने माया को अपनी मदमस्त नजरों से देखा. उस दिन वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. वह सजधज कर बाजार जाने वाली थी, तभी रामबहादुर आ गया था. उस ने माया को भींच कर अपनी बांहों में भर लिया और चुंबनों की बरसात कर दी.
‘‘रुक जाओ, कोई आ जाएगा. दरवाजा खुला है,’’ माया ने मस्तीभरे लहजे में कहा.
‘‘दरवाजा खुला है, तो बंद हो जाएगा,’’ यह कह कर रामबहादुर ने माया से अलग हो कर फौरन दरवाजा बंद कर लिया.
‘‘अरे, तुम्हारा क्या इरादा है? अभी मेरा मूड नहीं है. मैं बाजार जा रही हूं. मेरा मेकअप खराब हो जाएगा,’’ माया ने रामबहादुर को रोकते हुए कहा.
‘‘मेकअप फिर से कर लेना. तुम जितनी बार सजोगी, उतनी बार तुम्हारी छवि निखरेगी. अभी तो मुझे मत रोको,’’ यह कह कर रामबहादुर ने माया को कस कर अपनी बांहों में भींच लिया.
माया ने कोई विरोध नहीं किया.
प्यार का खेल खत्म होेने के बाद वह बोली, ‘‘रामबहादुर, मुझे छोड़ कर तुम कहीं मत जाना. तुम ने मेरी उजड़ी जिंदगी में रंग भर दिए हैं. विधवा होने के बाद मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन तुम ने दोबारा बहार ला दी.’’
रामबहादुर ठंडा पड़ चुका था. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता, भले ही मेरी नौकरी छूट जाए.’’
माया अपने पसंदीदा कैमरे पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘मैं फिर से मेकअप कर लूं, तो तुम मेरी तसवीरें खींच देना.’’
‘‘ठीक है, तुम तैयार हो कर आओ,’’ कह कर रामबहादुर पलंग पर लेट गया.
रामबहादुर फौज में था. उस की ड्यूटी सेना की कैंटीन में थी. वह माया के घर में किराए पर रहता था. कुछ दिनों के लिए वह गांव से अपनी पत्नी को लाया था, लेकिन मां की तबीयत ठीक न रहने से वह पत्नी को गांव छोड़ आया था. इस के बाद वह माया की ओर खिंच गया था.
माया केवल फौजियों को ही मकान किराए पर देती थी. उस का कहना था कि फौजी कैंटीन से सस्ता सामान ला कर देते हैं और ज्यादा दिनों तक घर पर कब्जा भी नहीं जमाए रहते, क्योंकि उन का जल्दी ही तबादला हो जाता है. जाते समय वे काफी सामान आधे दाम पर बेच कर चले जाते हैं.
रामबहादुर ने कैंटीन का सामान दे कर माया से नजदीकी बढ़ाई. मुफ्त में सामान पा कर माया उस की तरफ खिंचती चली गई.
माया 30 साल की थी. 5 साल पहले अपने पति की एक सड़क हादसे में हुई मौत के बाद वह टूट चुकी थी. अपनी और अपने 7 साल के बेटे मुनमुन की चिंता उसे खाए जा रही थी.
माया का पति एक कंपनी में मैनेजर था. कंपनी के मालिक ने माया को क्लर्क की नौकरी दे दी थी, लेकिन उस का चालचलन ठीक न होने से बाद में उसे निकाल दिया गया.
नौकरी छूटने के बाद माया की रोजीरोटी का जरीया 10 कमरों का मकान ही था. 2 कमरों में वह खुद रहती थी और 8 कमरे किराए पर दिए हुए थे.
रामबहादुर के आने के बाद माया की सारी समस्याएं दूर हो गई थीं. वह उसे हर तरह का सुख दे रहा था.
माया अकसर उस से कैंटीन के किसी न किसी सामान की फरमाइश करती रहती थी.
बात तब की है, जब रामबहादुर माया के लिए कैमरा नहीं लाया था.
एक दिन माया ने पूछा था, ‘रामबहादुर, तुम्हारी कैंटीन में अटैची, कंबल, कैमरा भी तो मिलता होगा न?’
‘सबकुछ मिलता है. बोलो, क्या चाहिए तुम्हें?’ रामबहादुर ने कहा था.
‘फिलहाल तो कैमरा चाहिए,’ यह कह कर माया ने पूछा था, ‘ला दोगे न?’
‘हां, आज ही ला दूंगा कैमरा. ड्यूटी पर जा रहा हूं. लौटूंगा तो कैमरा साथ होगा,’ यह कह कर रामबहादुर ड्यूटी पर चला गया था.
फौजी रामबहादुर से कैमरा पा कर माया बेहद खुश थी. इस के बाद तो उस ने रामबहादुर से कंबल, अटैची और शराब भी मंगवाई.
रामबहादुर कुछ सामान खरीद कर लाता, तो कुछ चुरा कर. उस की चोरी इसलिए नहीं पकड़ी जा रही थी, क्योंकि उस ने अपनी मीठी जबान से अफसरों का दिल जीत रखा था.
उसी कैंटीन में रामबहादुर का दोस्त श्रवण भी काम करता था. उसे शक हो गया था कि रामबहादुर माया की दीवानगी में सैनिक का फर्ज भूल कर चोरी कर रहा है.
उस ने रामबहादुर को खूब समझाया कि वह माया का साथ छोड़ दे और ईमानदारी से ड्यूटी करते हुए अपने घरपरिवार की ओर ध्यान दे.
रामबहादुर उस की बातें सुन कर ‘हांहां’ करता और फिर शराब का नशा करते ही सबकुछ भूल जाता.
एक दिन श्रवण ने रामबहादुर को कैंटीन से सामान चुराते हुए पकड़ लिया.
‘‘देखो श्रवण, तुम मेरे काम में दखल न दो, वरना यह गुस्ताखी तुम्हें बहुत महंगी पड़ेगी,’’ रामबहादुर ने धमकाते हुए कहा.
‘‘नहीं रामबहादुर, नहीं. मैं एक सच्चा फौजी हूं. अपनी मौजूदगी में मैं तुम्हें गलत काम नहीं करने दूंगा. कैंटीन का सामान केवल फौजी भाइयों और उन के परिवार के लिए है. यहां का सामान चोरी करने के लिए नहीं है,’’ यह कह कर श्रवण ने रामबहादुर के हाथ से सामान से भरा बैग छीन लिया.
‘‘तू ने यह क्या किया बे? रुक, मैं अभी तेरी शिकायत अफसर से करता हूं,’’ रामबहादुर गरजा.
‘‘तू क्या शिकायत करेगा मेरी? मैं ने तुझे गलत काम करते हुए पकड़ा है. तेरी शिकायत तो मैं करूंगा,’’ श्रवण ने फटकार लगाई.
श्रवण ने रामबहादुर की शिकायत तमाम अफसरों से की, लेकिन उस की सुनवाई कहीं नहीं हुई. उलटे अफसरों ने श्रवण को ही डांट दिया.
अफसरों के रवैए से श्रवण बेहद दुखी हुआ. उस के मन में आया कि वह सेना की नौकरी छोड़ दे, लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के चलते वह मन मार कर रह गया.
इधर रामबहादुर के गलत काम पर रोक नहीं लगी. वह बदस्तूर कैंटीन का सामान चुरा कर ले जाता रहा. उस पर ईमानदारी का ठप्पा जो लगा हुआ था.
माया के प्रेमजाल में फंस कर वह सैनिक का फर्ज भूल गया था. क्या वह वही रामबहादुर था, जिस ने अपने स्टडीरूम में एक बड़े अफसर की तसवीर टांग रखी थी और उसे देख कर ही वह सेना में जाने का सपना देखा करता था?
जब उस का सपना पूरा हुआ था, तो उस के मातापिता, भाईबहन और गांव के लोग कितने खुश हुए थे. गांव में उस की कितनी जरूरत है. लेकिन अगर इस घिनौनी हरकत का पता चलेगा, तो लोग क्या कहेंगे?
अब रामबहादुर को इस बात की परवाह नहीं थी. वह तो माया का दीवाना था. लेकिन कुछ दिनों बाद माया उस से तनख्वाह के पैसे भी मांगने लगी. यह भी कहने लगी कि वह अपने घर पर पैसे न भेजा करे.
रामबहादुर ने उसे काफी समझाने की कोशिश की, पर उस पर कोई असर नहीं पड़ा. उस ने कहा, ‘‘पत्नी जैसा सुख मैं तुम्हें देती हूं और तुम हो कि सारा पैसा घर भेज देते हो. आखिर तुम्हारी कमाई पर मेरा भी तो हक है.’’
रामबहादुर को यह सब पसंद नहीं था. उसे माया में दिलचस्पी कम होने लगी. उन दोनों के बीच अकसर झगड़ा होने लगा.
रामबहादुर जिस माया पर मरमिटा था, अब उस से वह अपना पिंड छुड़ाना चाहता था.
एक रात को माया ने रामबहादुर को गुंडों से पिटवा दिया.
रामबहादुर को गहरी चोट लगी थी, लेकिन बदनामी के डर से उस ने किसी को कुछ नहीं बताया.
श्रवण को जब यह मालूम हुआ, तो उस से रहा न गया. वह उस के पास गया. उस ने रामबहादुर के घर वालों को बुलाया और बराबर उस की देखरेख करता रहा.
अब रामबहादुर को अपनी करनी पर पछतावा हो रहा था. उस ने श्रवण से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘श्रवण, मुझे माफ कर दे भाई.
‘‘मैं अपना फर्ज भूल गया था. उस सैनिक का फर्ज, जो देश की आन, बान और शान के लिए खुशीखुशी अपनी जान न्योछावर कर देता है. मैं अपने साथियों का हिस्सा बेच रहा था. मेरी अक्ल मारी गई थी.
‘‘जिस माया के लिए मैं चोरी करता था, उसी ने मेरे साथ मारपीट कराई. लेकिन भाई, यह बात किसी से मत कहना. अब मैं कोई गलत काम नहीं करूंगा,’’ कहते हुए रामबहादुर की आंखों में आंसू थे.
श्रवण को असलीनकली आंसुओं की पहचान थी. उसे यकीन हो गया कि रामबहादुर को अपनी करनी पर पछतावा है. वह उसे गले लगा कर बोला, ‘‘मुझे खुशी है कि तुम देर से ही सही, पर संभल गए. चलो, मैं ने तुम्हें माफ किया.
‘‘बेहतर होगा कि तुम माया का घर छोड़ दो और पुरानी बातों को भूल कर एक सच्चे सैनिक का फर्ज निभाओ.
‘‘और हां, गांव तुम्हारे चलते ही बिगड़ा है. आइंदा कभी वहां शराब मत ले जाना.’’
‘‘ठीक है भाई. मैं माया का घर छोड़ दूंगा. मुझे नहीं मालूम था कि वह इतना नीचे गिर सकती है.
‘‘हां, मैं मानता हूं कि गांव के लड़के मेरे चलते ही शराब के आदी हुए हैं. अब मैं कभी वहां शराब नहीं ले जाऊंगा और उन्हें समझाऊंगा कि वे शराब कभी न पीएं,’’ रामबहादुर ने कहा.
ठीक होने के बाद रामबहादुर ने माया का घर छोड़ दिया. माया ने कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि वह किसी और को अपने जाल में फंसा चुकी थी.
रामबहादुर का माया से पिंड छूटा. वह दूर किराए का मकान ले कर अपनी पत्नी के साथ सुख से रहने लगा. जब कभी उसे माया की याद आती, तो उस का मन नफरत से भर उठता.
वह सोचता, ‘कहां पत्नी का प्यार और कहां माया का मायाजाल.’
‘‘आजकल काम मंदा चल रहा है. 2-4 दिन ठहर कर आना,’’ लहना सिंह ने सादा वरदी में महीना लेने आए ट्रैफिक पुलिस के एक सिपाही से कहा.
‘‘यह नहीं हो सकता. थानेदार साहब ने बोला है कि पैसे ले कर ही आना. आज बड़े साहब के यहां पार्टी है,’’ सिपाही ने कोल्डड्रिंक की बोतल खाली कर उसे थमाते हुए कहा.
‘‘अरे भाई, 4 दिन से गाड़ी खाली खड़ी है. जेब बिलकुल खाली है,’’ लहना सिंह ने मजबूरी जताई.
‘‘जब थानेदार साहब यहां आएं, तब उन से यह सब कहना. कैसे भी हो, मु झे तो 3 सौ रुपए थमाओ. मु झे औरों से महीना भी इकट्ठा करना है,’’ सिपाही पुलिसिया रोब के साथ बोला.
लहना सिंह ने जेब में हाथ डाला. महज 60-70 रुपए थे. अब वह बाकी रकम कहां से पूरी करे? वह उठा और अड्डे पर मौजूद दूसरे साथियों से खुसुरफुसुर की.
किसी ने 20 रुपए, किसी ने 50 रुपए, तो किसी ने सौ रुपए थमा दिए.
लहना सिंह सिपाही के पास पहुंचा और गिन कर उसे ‘महीने’ के 3 सौ रुपए थमा दिए.
सिपाही रुपए ले कर चलता बना.
लहना सिंह भाड़े का छोटा ट्रक चलाता था. पहले वह एक ट्रक मालिक के यहां ड्राइवर था, जिस के कई ट्रक थे. फिर उस ने अपने मालिक से ही यह छोटा ट्रक कबाड़ी के दाम पर खरीद लिया था.
लहना सिंह ने कुछ हजार रुपए ऊपर खर्च कर के ट्रक को काम करने लायक बना लिया था.
ट्रक काफी पुराना था. उस के सारे कागजात पुराने थे. कई साल से उस का रोड टैक्स नहीं भरा गया था.
ऐसे ट्रक को बेचने वाला मालिक काफी तेजतर्रार था. उस ने पुलिस से ‘महीना’ बांधा हुआ था. अब यही ‘महीना’ लहना सिंह को देना पड़ता था.
पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. जहांतहां कीचड़ और पानी भरा था. धंधा काफी मंदा था. उसे कभी काम मिल जाता था, कभी कई तक दिन खाली बैठना पड़ता था. पहले लहना सिंह खुद दूसरों का ट्रक चलाता रहा था, लेकिन अब मालिक बन कर अड्डे के तख्त पर दूसरे ट्रक मालिकों के साथ वह ताश खेलता था.
आज घर राशन ले जाना था. बीमार मां और पत्नी को भी अस्पताल दवा लेने जाना था. खर्च बहुत थे, मगर कमाई नहीं हुई थी.
तभी लाला मिट्ठल लाल अड्डे पर आ गया.
‘‘आओ लालाजी,’’ लहना सिंह ने बडे़ प्यार से कहा.
‘‘अरे लहना सिंह, किस की गाड़ी का नंबर है?’’
‘‘अपना है जी. कहां जाना है?’’
‘‘जमालपुर.’’
‘‘चलेंगे जी. क्या माल है?’’
‘‘अनाज की बोरियां हैं. तकरीबन 20 क्विंटल माल है.’’
‘‘कोई बात नहीं जी. ले जाएंगे.’’
‘‘गाड़ी ठीक है न?’’
‘‘अरे लालाजी, आप ने कई बार बरत रखी है. क्या कभी आप का काम रुका है?’’
‘‘कितना भाड़ा लोगे?’’
‘‘2 हजार रुपए.’’
‘‘बहुत ज्यादा है.’’
‘‘नहीं लालाजी, आज के महंगाई के जमाने में ज्यादा नहीं है.’’
‘‘5 सौ रुपए दूंगा.’’
‘‘नहीं जी, आप 2 सौ रुपए कम
कर लो.’’
‘‘चलो, 17 सौ दे देंगे.’’
‘‘ठीक है जी. आप मालिक हो. कब गाड़ी लगाऊं?’’
‘‘अभी ले चलो. मेरा गोदाम तो देखा हुआ है तुम ने.’’
‘‘लालाजी 5 सौ रुपए पेशगी दे दो. डीजल डलवाना है.’’
लालाजी ने 5 सौ रुपए दे दिए.
लालाजी के साथसाथ लहना सिंह, ड्राइवर और क्लीनर चारों ट्रक में सवार हो गए.
पैट्रोल पंप रास्ते में ही था. 4 सौ रुपए का डीजल डलवा कर सौ रुपए ड्राइवर को रास्ते के खर्च के लिए थमा कर लहना सिंह अड्डे पर लौट आया.
लालाजी ने गोदाम से 50-50 किलो वाले 40 कट्टे ट्रक में रखवा दिए. ट्रक जमालपुर की तरफ चल पड़ा.
जमालपुर जाने के लिए 2 रास्ते थे. पहला रास्ता थोड़ा लंबा था, मगर कच्चा था. लेकिन इस रास्ते पर चैकिंग न के बराबर होती थी. नंबर दो का काम करने वालों के लिए और लहना सिंह जैसे गाड़ी वालों के लिए जिन के कागजात पूरे नहीं थे, महफूज रास्ता था.
दूसरा रास्ता पक्का था. साफसपाट, सीधा था. मगर इस रास्ते पर ट्रैफिक पुलिस, टैक्स वालों और दूसरे महकमों की चैकिंग बहुत होती रहती थी. ऊपर से यह रास्ता रेलवे लाइन के साथसाथ रेलवे स्टेशन को पार करता आगे बढ़ता था.
यहां पर रेलवे पुलिस का अधिकार क्षेत्र था. किसी भी लिहाज से यह नंबर दो वालों के लिए और बिना पूरे कागजात वाली गाड़ी वालों के लिए महफूज नहीं था.
लालाजी लंबे और महफूज रास्ते से जा रहे थे. ट्रक आगे बढ़ रहा था कि तभी ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया.
‘‘क्या हुआ?’’ झपकी ले रहे लालाजी ने आंखें खोल कर पूछा.
‘‘आगे सड़क टूटी हुई है जी.’’
लालाजी ने उचक कर देखा. सड़क का एक लंबा हिस्सा टूट कर बिखर गया था. घुटनों तक पानी था. अब क्या करें?
ड्राइवर ने लहना सिंह को मोबाइल से फोन किया और सारी बात बताई.
‘‘लालाजी से पूछ ले कि क्या करना है?’’ लहना सिंह ने कहा.
लालाजी सोच में डूबे थे. उन के पास नंबर दो का माल था. दूसरा रास्ता चैकिंग करने वालों से भरा रहता था. माल पकड़ा जा सकता था.
अभी तक लालाजी को यह पता नहीं था कि लहना सिंह के ट्रक के कागजात पूरे नहीं थे. क्या गाड़ी वापस ले चलें? मगर माल आज ही पहुंचाना था. पार्टी सारा पैसा पेशगी दे गई थी.
‘‘दूसरे रास्ते से ले चलो.’’
‘‘ठीक है जी,’’ कह कर ड्राइवर ने गाड़ी मोड़ ली.
रेलवे स्टेशन से थोड़ा पहले ट्रक रोक कर उस ने क्लीनर को ‘जरा नजर डाल आ’ का इशारा किया.
क्लीनर स्टेशन के पास पहुंचा. चौक सुनसान था. रेलवे स्टेशन खाली था. रेलवे लाइन के साथ लगती सड़क भी खाली थी.
क्लीनर के इशारा करते ही ड्राइवर ने ट्रक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया.
रेलवे पुलिस की चौकी का इंचार्ज अचानक चौकी से बाहर चला आया.
उसी वक्त ड्राइवर ट्रक को चलाता हुआ चौक पर पहुंचा. ट्रक को देखते ही चौकी इंचार्ज ने रुकने का इशारा किया.
ट्रक रुक गया. पुलिस वाला पास आते हुए बोला, ‘‘ट्रक कहां जा रहा है?’’
‘‘जमालपुर.’’
‘‘इधर से क्यों जा रहे हो?’’
‘‘उधर का रास्ता खराब है जी.’’
‘‘गाड़ी में क्या है?’’
‘‘अनाज है जी.’’
‘‘माल का बिल है?’’
‘‘माल मेरा अपना है जी. अपने घर ही ले जा रहा हूं. किसी को बेचा नहीं है, इसलिए बिल किस बात का?’’ लालाजी ने दिलेरी दिखाते हुए कहा.
‘‘गाड़ी के कागजात दिखाओ.’’
इस पर ड्राइवर सकपका गया. उस ने एक कटीफटी कौपी थमा दी.
‘‘यह क्या है?’’
‘‘आरसी है जी.’’
‘‘अबे, यह आरसी है?’’ पुलिस वाले ने कौपी के पन्ने पलटते हुए कहा.
‘‘और कोई कागजात है?’’
‘‘नहीं जी.’’
‘‘रोड टैक्स की रसीद? बीमा की रसीद या प्रदूषण की रसीद? कुछ है?’’
‘‘नहीं जी.’’
‘‘नीचे उतर.’’
ड्राइवर के साथसाथ लालाजी भी नीचे उतर आए.
‘‘साहबजी, मु झे नहीं पता था कि इस गाड़ी के कागजात पूरे नहीं हैं, वरना मैं माल नहीं लाता,’’ लालाजी ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
‘‘हमें माल से कोई मतलब नहीं है. आप अपना माल उतरवा लें. गाड़ी के कागजात नहीं हैं और यह रेलवे पुलिस के इलाके में आ गई है. इसलिए इसे बंद करना पड़ेगा.’’
ड्राइवर ने मोबाइल निकाल कर लहना सिंह को फोन कर दिया.
‘हौसला रख. मैं आ रहा हूं,’ लहना सिंह ने कहा.
तब तक गाड़ी थाने में बंद हो गई.
लहना सिंह की मिन्नतों का कोई असर न हुआ. चालान पर ड्राइवर के बाएं हाथ के अंगूठे की छाप लगवा कर चौकी इंचार्ज ने मुख्य कौपी उसे थमा दी.
‘‘इस चालान का फैसला कौन करेगा साहब?’’ लहना सिंह ने पूछा.
‘‘जिला अदालत में चले जाना. वहां पर मजिस्ट्रेट इस के लिए नियुक्त है, वह जुर्माना लगा कर गाड़ी छोड़ देगा.’’
लहना सिंह जिला अदालत पहुंचा. पता चला कि इन दिनों अदालतें बंद थीं. ड्यूटी मजिस्टे्रट को जुर्माना लगाने का अधिकार नहीं था. गाड़ी कानूनी तौर पर लहना सिंह के नाम नहीं थी, इसलिए सुपुर्दगी के आधार पर भी ट्रक नहीं छूट सकता था. लहना सिंह के पास 3 हफ्ते तक इंतजार करने के सिवा और कोई चारा न था.
3 हफ्ते बाद अदालतें खुलीं. भुक्तभोगियों ने लहना सिंह को बता दिया था कि उस को ज्यादा से ज्यादा 5 हजार रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है.
जेब में 6 हजार रुपए रख लहना सिंह ड्राइवर के साथ अदालत पहुंचा. चालान ड्राइवर के नाम काटा गया था. मजिस्ट्रेट अभी चैंबर में ही बैठे थे. लहना सिंह रीडर के पास पहुंचा. सौ रुपए का एक नोट उस की मुट्ठी में दबा कर फुसफुसाया, ‘‘ठीक है.’’
‘‘मैं 12 बजे आवाज दिलवाऊंगा और साहब को सिफारिश लगा दूंगा,’’ रीडर भी फुसफुसाया.
12 बजे आवाज पड़ी. ड्राइवर के साथ लहना सिंह अंदर पहुंचा. साहब ने उस की तरफ फिर ड्राइवर की तरफ गौर से देखा.
‘‘गाड़ी का मालिक कौन है?’’
‘‘मैं हूं जी,’’ लहना सिंह बोला.
‘‘गाड़ी के कागजात कहां हैं?’’
लहना सिंह ने कटीफटी कौपी सामने रख दी. साहब ने सारे पन्ने देखे, फिर चालान नियमों पर नजर डाली.
ऐसी गाड़ी को तो जब्त कर ‘डिस्सपोज औफ’ कर देना चाहिए, मगर ऐसा अधिकार प्रशासन को था, पर उन्हें नहीं.
चैंबर में बैठे साहब ने ढाई हजार रुपए का जुर्माना लगाने का आदेश दे कर फाइल रीडर को थमा दी. रसीद में जरूरी बातें दर्ज कर लहना सिंह को रसीद वापस थमा दी गई.
साहब ने ‘गाड़ी तुरंत छोड़ दो’ लिख कर रसीद लौटा दी. घूस के कुल 28 सौ रुपए और 3 हफ्ते तक बेरोजगारी झेल कर लहना सिंह ने गाड़ी छुड़ा ली.
ड्राइवर के साथ उस ने कसम खाई कि रेलवे स्टेशन और किसी भी उस इलाके में जहां ‘महीना’ नहीं बंधा, गाड़ी नहीं ले जाना है.
‘‘जब मैं उसे देखता हूं, तो अपने होश खो बैठता हूं. उस के बिना तो मेरा जीना मुश्किल हो गया है,’’ राकेश ने अपने दोस्त अजय से कहा.
अजय ने चेहरे पर हलकी सी मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘यार राकेश, तू तो बड़ा छिपा रुस्तम निकला. तू ने आज तक कभी यह बात नहीं बताई.’’
राकेश बोला, ‘‘प्यार ऐसी चीज है, जिस के बारे में किसी को नहीं बताया जा सकता. तू मेरा बचपन का दोस्त है, इसलिए मैं ने तुझे यह बात बताने की हिम्मत की है.’’
राकेश और अजय एक झोंपड़ी में बैठे हुए ये बातें कर रहे थे, जो राकेश के खेत पर बनी हुई थी. यहीं पर खेतों में सिंचाई करने के लिए एक ट्यूबवैल लगा था.
राकेश ज्यादातर ट्यूबवैल पर ही रहता है. यहीं उस के कुछ दोस्त आ जाते थे, जिन से उस का मन लगा रहता था.
गांव की ज्यादातर औरतें इसी ट्यूबवैल पर पानी भरने आती थीं. क्या करें, उन की भी मजबूरी थी, क्योंकि गांव का पानी खारा था.
गीता भी यहां रोजाना पानी लेने आती थी. राकेश और गीता की प्रेम कहानी इसी ट्यूबवैल से शुरू हुई थी.
राकेश बीए में पढ़ता था. उस के 2 बड़े भाई थे. एक भाई नौकरी करता था और दूसरा भाई खेती संभालता था.
राकेश कालेज से पढ़ कर यहीं झोंपड़ी में आ जाता था, क्योंकि यहां हरेभरे पेड़ थे और शांत माहौल था.
रोजाना की तरह गीता आज भी पानी भरने आई थी. वह अपना बरतन भरने वाली थी कि बिजली चली गई. वह सोच में पड़ गई कि अब क्या करे.
उधर राकेश पास में ही चारपाई पर बैठा किताबें पढ़ रहा था. अकेली लड़की, आसपास भी कोई नहीं, ऐसे में किसी का भी मन भटक सकता है. ऐसा ही राकेश के साथ भी हुआ. वह गीता को प्यारभरी नजरों से देखने लगा.
राकेश को देख कर गीता के मन में शक पैदा होने लगा और वह घबरा कर इधरउधर देखने लगी.
राकेश गीता से बातें करना चाह रहा था, पर उस की हिम्मत नहीं हो रही थी.
थोड़ी देर बाद राकेश हिम्मत बटोर कर चारपाई से उठा और गीता की तरफ बढ़ा, लेकिन उस के पास पहुंचते ही वह सबकुछ भूल गया.
गीता ने राकेश को देख कर अच्छी तरह पहचान लिया कि वह उस से बात करना चाहता है, पर घबराहट के चलते कुछ कह नहीं पा रहा है.
गीता का डर खत्म हुआ और उस के खूबसूरत चेहरे पर मुसकान आ गई.
गीता की इस मुसकान को देख कर राकेश के दिल में गुदगुदी होने लगी. इसी बीच बिजली आ गई. राकेश ने फौरन मोटर चला दी और गीता पानी भरने लगी.
पानी भर कर गीता गांव की तरफ जाने लगी, तो राकेश उसे तब तक देखता रहा, जब तक वह गांव में नहीं पहुंच गई.
एक दिन राकेश ने ठान लिया कि वह गीता से अपने प्यार का इजहार कर के ही रहेगा. उसी समय गीता रोजाना की तरह पानी भरने आई.
राकेश हिम्मत कर के गीता के पास गया और बोला, ‘‘गीता, मुझे तुम से कुछ कहना है.’’
गीता बोली, ‘‘क्या?’’
राकेश बोला, ‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’’
गीता ने कहा, ‘‘बुरा क्यों मानूंगी?’’
राकेश हिम्मत कर के धीरे से बोला, ‘‘गीता, मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. तुम मुझे अच्छी लगने लगी हो.’’
यह सुन कर गीता का चेहरा सुर्ख पड़ गया. यह देख राकेश डर गया.
गीता बिना कुछ बोले पानी का बरतन ले कर चली गई. रास्ते में वह राकेश के बारे में सोचती जा रही थी और बीचबीच में उस के चेहरे पर हलकी मुसकराहट भी आ जाती थी.
इस के बाद राकेश और गीता के बीच रोजाना बातें होती रहीं और दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा.
अजय को पता चला कि राकेश जिस लड़की से प्यार करता है, वह तो उसी की महबूबा है, तो वह उस से जलने लगा.
अजय का गीता से एक साल से इश्क का चक्कर चल रहा था. गीता भी अजय को प्यार करती थी, लेकिन राकेश को इस बारे में कुछ पता नहीं था.
गीता का खिंचाव अजय से हट कर राकेश की तरफ बढ़ने लगा, यह बात अजय को अच्छी नहीं लग रही थी.
एक दिन अजय ने गीता से पूछा, ‘‘तू राकेश से बात क्यों करती है?’’
गीता ने जवाब दिया, ‘‘तुझे क्या मतलब है? मैं किसी से भी बात करूं, मेरी मरजी.’’
यह सुन कर अजय के अंदर मानो ज्वालामुखी फट पड़ा था. वह मन ही मन राकेश से नफरत करने लगा. उस ने सोच लिया, ‘अगर गीता मेरी नहीं हुई, तो मैं किसी की भी नहीं होने दूंगा.’
अजय ने भोला से बात की. भोला एक नंबर का ऐयाश था. उस की कमजोरी लड़की औैर शराब थी.
‘‘भोला, अगर आज तेरी मदद मिले, तो तु झे हुस्न और शराब दोनों मिल सकते हैं.’’
यह सुन कर भोला पागल भेडि़ए की तरह फड़फड़ाने लगा और बोला, ‘‘जल्दी बोल यार, क्या करना है?’’
अजय ने जैसे ही शराब की बोतल निकाली, भोला के मुंह में पानी आ गया.
अजय बोला, ‘‘आज जितनी पीना चाहे उतनी पी लेना, लेकिन अभी नहीं. काम हो जाने के बाद.’’
भोला अजय के साथ राकेश के ट्यूबवैल पर आ गया.
राकेश वहां चारपाई पर बैठ कर पढ़ाई कर रहा था. अजय और भोला उस के पास आ कर बैठ गए.
राकेश कुछ कहने वाला था कि अजय ने राकेश के गले में रस्सी डाली और उसे खींचने लगा. राकेश ने थोड़ी देर हाथपैर मारे, फिर शांत हो गया.
दोनों ने उसे झोंपड़ी में डाल दिया और झोंपड़ी के पीछे छिप गए. वहां दोनों ने खूब शराब पी.
थोड़ी देर बाद गीता पानी भरने आई. जब राकेश दिखाई नहीं दिया, तो वह झोंपड़ी के अंदर चली गई. उस ने जैसे ही राकेश की लाश को देखा, तो वह डर के मारे कांपने लगी.
वह कुछ सोचती, उस से पहले ही अजय और भोला ने उसे दबोच लिया.
अजय गीता से बोला, ‘‘आज तेरी वजह से मेरे दोस्त की जान गई है. पहले तू ने मु झ से प्यार किया और फिर राकेश से. तु झे यह नहीं पता कि मेरे दिल पर क्या बीत रही थी.
‘‘तुम लड़कियों में यही कमी है. पहले प्यार का ढोंग करती हो, फिर किनारा कर जाती हो. आज तु झे इस की सजा जरूर मिलेगी.’’
यह कह कर उन दोनों ने गीता को पकड़ लिया और बारीबारी से मुंह काला करने के बाद उसे जाने दिया.
बेचारी गीता अपने दुपट्टे को मुंह में दबाए रोती हुई गांव की तरफ चल दी. साथ ही, वह अपनेआप को कोसती जा रही थी कि आज अगर वह दोतरफा प्यार नहीं करती, तो शायद राकेश की जान और उस की इज्जत नहीं जाती.
Story in Hindi
आश्चर्य में डूबी रश्मि मुझे ढूंढ़ती हुई रसोईघर में पहुंची तो उस की नाक ने उसे एक और आश्चर्य में डुबो दिया, ‘‘अरे वाह, कचौरियां, बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है. किस के लिए बना रही हो, मां?’’
‘‘तेरे पिताजी के दोस्त आ रहे हैं आज,’’ उड़ती हुई दृष्टि उस के थके, कुम्हलाए चेहरे पर डाल मैं फिर चकले पर झुक गई.
‘‘कौन से दोस्त?’’ हाथ की किताबें बरतनों की अलमारी पर रखते हुए उस ने पूछा.
‘‘कोई पुराने साथी हैं कालिज के. मुंबई में रहते हैं आजकल.’’
जितनी उत्सुकता से उस के प्रश्न आ रहे थे, मैं उतनी ही सहजता से और संक्षेप में उत्तर दिए जा रही थी. डर रही थी, झूठ बोलते कहीं पकड़ी न जाऊं.
गरमागरम कचौरी का टुकड़ा तोड़ कर मुंह में ठूंसते हुए उस ने एक और तीर छोड़ा, ‘‘इतनी बढि़या कचौरियां आप ने हमारे लिए तो कभी नहीं बनाईं.’’
उस का फूला हुआ मुंह और उस के साथ उलाहना. मैं हंस दी, ‘‘लगता है, तेरे कालिज की कैंटीन में आज तेरे लिए कुछ नहीं बचा. तभी कचौरियों में ज्यादा स्वाद आ रहा है. वरना वही हाथ हैं और वही कचौरियां.’’
‘‘अच्छा, तो पिताजी के यह दोस्त कितने दिन ठहरेंगे हमारे यहां?’’ उस ने दूसरी कचौरी तोड़ कर मुंह में ठूंस ली थी.
‘‘ठहरे तो वह रमाशंकरजी के यहां हैं. उन से रिश्तेदारी है कुछ. तुम्हारे पिताजी ने तो उन्हें आज चाय पर बुलाया है. तू हाथ तो धो ले, फिर आराम से प्लेट में ले कर खाना. जरा सब्जी में भी नमक चख ले.’’
उस ने हाथ धो कर झरना मेरे हाथ से ले लिया, ‘‘वह सब चखनावखना बाद में होगा. पहले आप बेलबेल कर देती जाइए, मैं तलती जाती हूं. आशु नहीं आया अभी तक स्कूल से?’’
‘‘अभी से कैसे आ जाएगा? कोई तेरा कालिज है क्या, जो जब मन किया कक्षा छोड़ कर भाग आए? छुट्टी होगी, बस चलेगी, तभी तो आएगा.’’
‘‘तो हम क्या करें? अर्थशास्त्र के अध्यापक पढ़ाते ही नहीं कुछ. जब खुद ही पढ़ना है तो घर में बैठ कर क्यों न पढ़ें. कक्षा में क्यों मक्खियां मारें?’’ उस ने अकसर कक्षा छोड़ कर आने की सफाई पेश कर दी.
4 हाथ लगते ही मिनटों में फूलीफूली कचौरियों से परात भर गई थी. दहीबड़े पहले ही बन चुके थे. मिठाई इन से दफ्तर से आते वक्त लाने को कह दिया था.
‘‘अच्छा, ऐसा कर रश्मि, 2-4 और बची हैं न, मैं उतार देती हूं. तू हाथमुंह धो कर जरा आराम कर ले. फिर तैयार हो कर जरा बैठक ठीक कर ले. मुझे वे फूलवूल सजाने नहीं आते तेरी तरह. समझी? तब तक तेरे पिताजी और आशु भी आ जाएंगे.’’
‘‘अरे, सब ठीक है मां. मैं पहले ही देख आई हूं. एकदम ठीक है आप की सजावट. और फिर पिताजी के दोस्त ही तो आ रहे हैं, कोई समधी थोड़े ही हैं जो इतनी परेशान हो रही हो,’’ लापरवाही से मुझे आश्वस्त कर वह अपनी किताबें उठा कर रसोई से निकल गई. दूर से गुनगुनाने की आवाज आ रही थी, ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे, महके यों ही जीवन में…’
मैं अवाक् रह गई. अनजाने में वह कितना बड़ा सत्य कह गई थी, वह नहीं जानती थी. सचमुच इन के कोई दोस्त नहीं वरन दफ्तर के साथी रमाशंकर की बहन और बहनोई आ रहे थे रश्मि को देखने.
लेकिन बेटे वालों के जितने नाजनखरे होते हैं, उस के हिसाब से कितनी बार यह नाटक दोहराना पड़ेगा, कौन जानता है. और लाड़दुलार में पली, पढ़ीलिखी लड़कियों का मन हर इनकार के साथ विद्रोह की जिस आग से भड़क उठता है, मैं नहीं चाहती थी, मेरी सीधीसादी सांवली सी बिटिया उस आग में झुलस कर अभी से किसी हीनभावना से ग्रस्त हो जाए.
इसी वजह से वह जितनी सहज थी, मैं उतनी ही घबरा रही थी. कहीं उसे संदेह हो गया तो…
भारतीय परंपरा के अनुरूप हमारे माननीय अतिथि पूरे डेढ़ घंटे देर से आए. प्रतीक्षा से ऊबे रश्मि और आशु अपने पिता पर अपनी खीज निकाल रहे थे, ‘‘रमाशंकर चाचाजी ने जरूर आप का अप्रैल फूल बनाया है. आप हैं भी तो भोले बाबा, कोई भी आप को आसानी से बुद्धू बना लेता है.’’
‘‘नहीं, बेटा, रमाशंकरजी अकेले होते तो ऐसा संभव था, क्योंकि वह अकसर ऐसी हरकतें किया करते हैं. पर उन के साथ जो मेहमान आ रहे हैं न, वे ऐसा नहीं करेंगे. नए शहर में पहली बार आए हैं इसलिए घूमनेघामने में देर हो गई होगी. पर वे आएंगे जरूर…’’
‘‘मान लीजिए, पिताजी, वे लोग न आए तो इतनी सारी खानेपीने की चीजों का क्या होगा?’’ रश्मि को मिठाई और मेहनत से बनाई कचौरियों की चिंता सता रही थी.
‘‘अरे बेटा, होना क्या है. इसी बहाने हमतुम बैठ कर खाएंगे और रमाशंकरजी और अपने दोस्त को दुआ देंगे.’’
बच्चों को आश्वस्त कर इन्होंने खिड़की का परदा सरका कर बाहर झांका तो एकदम हड़बड़ा गए.
‘‘अरे, रमाशंकरजी की गाड़ी तो खड़ी है बाहर. लगता है, आ गए हैं वे लोग.’’
‘‘माफ कीजिए, राजकिशोरजी, आप लोगों को इतनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ी, जिस के लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं,’’ क्षमायाचना के साथसाथ रमाशंकरजी ने घर में प्रवेश किया, ‘‘पर यह औरतों का मामला जहां होता है, आप तो जानते ही हैं, हमें इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर उतरना पड़ता है.’’
वह अपनी बहन की ओर कनखियों से देख मुसकरा रहे थे, ‘‘हां, तो मिलिए मेरी बहन नलिनीजी और इन के पति नरेशजी से, और यह इन के सुपुत्र अनुपम तथा अनुराग. और नलिनी बहन, यह हैं राजकिशोरजी और इन का हम 2, हमारे 2 वाला छोटा सा परिवार, रश्मि बिटिया और इन के युवराज आशीष.’’
‘‘रमाशंकरजी, हमारे बच्चों को यह गलतफहमी होने लगी थी कि कहीं आप भूल तो नहीं गए आज का कार्यक्रम,’’ सब को बिठा कर यह बैठते हुए बोले.
रमाशंकरजी ने गोलगोल आंख मटकाते हुए आशु की तरफ देखा, ‘‘वाह, मेरे प्यारे बच्चो, ऐसी शानदार पार्टी भी कोई भूलने की चीज होती है भला? अरे, आशु बेटा, दरवाजा बंद कर लो. कहीं ऐसा न हो कि इतनी अच्छी महक से बहक कर कोई राह चलता अपना घर भूल इधर ही घुस आए,’’ अपने चिरपरिचित हास्यमिश्रित अभिनय के साथ जिस नाटकीय अदा से रमाशंकरजी ने ये शब्द कहे उस से पूरा कमरा ठहाकों से गूंज गया.
प्रतीक्षा से बोझिल वातावरण एकाएक हलका हो गया था. बातचीत आरंभ हुई तो इतनी सहज और अनौपचारिक ढंग से कि देखतेदेखते अपरिचय और दूरियों की दीवारें ढह गईं. रमाशंकरजी का परिवार जितना सभ्य और सुशिक्षित था, उन के बहनबहनोई का परिवार उतना ही सुसंस्कृत और शालीन लगा.
चाय पी कर नलिनीजी ने पास रखी अटैची खोल कर सामान मेज पर सजा दिया. मिठाई के डब्बे, साड़ी का पैकेट, सिंदूर रखने की छोटी सी चांदी की डिबिया. फिर रश्मि को बुला कर अपने पास बिठा कर उस के हाथों में चमचमाती लाल चूडि़यां पहनाते हुए बोलीं, ‘‘यही सब खरीदने में देर हो गई. हमारे नरेशजी का क्या है, यह तो सिर्फ बातें बनाना जानते हैं. पर हम लोगों को तो सब सोचसमझ कर चलना पड़ता है न? पहलीपहली बार अपनी बहू को देखने आ रही थी तो क्या खाली हाथ झुलाती हुई चली आती?’’
‘‘बहू,’’ मैं ने सहसा चौंक कर खाने के कमरे से झांका तो देखती ही रह गई. रश्मि के गले में सोने की चेन पहनाते हुए वह कह रही थीं, ‘‘लो, बेटी, यह साड़ी पहन कर आओ तो देखें, तुम पर कैसी लगती है. तुम्हारे ससुरजी की पसंद है.’’
रश्मि के हाथों में झिलमिलाती हुई चूडि़यां, माथे पर लाल बिंदी, गले में सोने की चेन…यह सब क्या हो रहा है? हम स्वप्न देख रहे हैं अथवा सिनेमा का कोई अवास्तविक दृश्य. घोर अचरज में डूबी रश्मि भी अलग परेशान लग रही थी. उसे तो यह भी नहीं मालूम था कि उसे कोई देखने आ रहा है.
हाथ की प्लेटें जहां की तहां धर मैं सामने आ कर खड़ी हो गई, ‘‘क्षमा कीजिए, नलिनीजी, हमें भाईसाहब ने इतना ही कहा था कि आप लोग रश्मि को देखने आएंगे, पर आप का निर्णय क्या होगा, उस का तो जरा सा भी आभास नहीं था, सो हम ने कोई तैयारी भी नहीं की.’’
‘‘तो इस में इतना परेशान होने की क्या बात है, सरला बहन? बेटी तो आप की है ही, अब हम ने बेटा भी आप को दे दिया. जी भर के खातिर कर लीजिएगा शादी के मौके पर,’’ उन का चेहरा खुशी के मारे दमक रहा था, ‘‘अरे, आ गई रश्मि बिटिया. लो, रमाशंकर, देख लो साड़ी पहन कर कैसी लगती है तुम्हारी बहूरानी.’’
‘‘हम क्या बताएंगे, दीदी, आप और जीजाजी बताइए, हमारी पसंद कैसी लगी आप को? हम ने हीरा छांट कर रख दिया है आप के सामने. अरे भई, अनुपम, ऐसे गुमसुम से क्यों बैठे हो तुम? वह जेब में अंगूठी क्या वापस ले जाने के इरादे से लाए हो?’’ रमाशंकरजी चहके तो अनुपम झेंप गया.
‘‘हमारी अंगूठी के अनुपात से काफी दुबलीपतली है यह. खैर, कोई बात नहीं. अपने घर आएगी तो अपने जैसा बना लेंगे हम इसे भी,’’ नलिनीजी हंस दीं.
पर मैं अपना आश्चर्य और अविश्वास अब भी नियंत्रित नहीं कर पा रही थी, ‘‘वो…वो…नलिनीजी, ऐसा है कि आजकल लड़के वाले बीसियों लड़कियां देखते हैं…और इनकार कर देते हैं…और आप…?
‘‘हां, सरला बहन, बड़े दुख की बात है कि संसार में सब से महान संस्कृति और सभ्यता का दंभ भरने वाला हमारा देश आज बहुत नीचे गिर गया है. लोग बातें बहुत बड़ीबड़ी करते हैं, आदर्श ऊंचेऊंचे बघारते हैं, पर आचरण ठीक उस के विपरीत करते हैं.
‘‘लेकिन हमारे घर में यह सब किसी को पसंद नहीं. लड़का हो या लड़की, अपने बच्चे सब को एक समान प्यारे होते हैं. किसी का अपमान अथवा तिरस्कार करने का किसी को भी अधिकार नहीं है. हमारे अनुपम ने पहले ही कह दिया था, ‘मां, जो कुछ मालूम करना हो पहले ही कर लेना. लड़की के घर जा कर मैं उसे अस्वीकार नहीं कर सकूंगा.’
‘‘इसलिए हम रमाशंकर और भाभी से सब पूछताछ कर के ही मुंबई से आए थे कि एक बार में ही सब औपचारिकताएं पूरी कर जाएंगे और हमारी भाभी ने रश्मि बिटिया की इतनी तारीफ की थी कि हम ने और लड़की वालों के समस्त आग्रह और निमंत्रण अस्वीकार कर दिए. घरघर जा कर लड़कियों की नुमाइश करना कितना अपमानजनक लगता है, छि:.’’
उन्होंने रश्मि को स्नेह से निहार कर हौले से उस की पीठ थपथपाई, ‘‘बेटी का बहुत चाव था हमें, सो मिल गई. अब तुम्हें 2-2 मांओं को संभालना पड़ेगा एकसाथ. समझी बिटिया रानी?’’ हर्षातिरेक से वह खिलीखिली जा रही थीं.
‘‘अच्छा, बहनजी, अब आप का उठने का विचार है या अपनी लाड़ली बहूरानी को साथ ले कर जाने का ही प्रण कर के आई हैं?’’ रमाशंकरजी अपनी चुटकियां लेने की आदत छोड़ने वाले नहीं थे, ‘‘बहुत निहार लिया अपनी बहूरानी को, अब उस बेचारी को आराम करने दीजिए. क्यों, रश्मि बिटिया, आज तुम्हारी जबान को क्या हो गया है? जब से आए हैं, तुम गूंगी बनी बैठी हो. तुम भी तो कुछ बोलो, हमारे अनुपम बाबू कैसे लगे तुम्हें? कौन से हीरो की झलक पड़ती है इन में?’’
रश्मि की आंखें उन के चेहरे तक जा कर नीचे झुक गईं तो वह हंस पड़े, ‘‘भई, आज तो तुम बिलकुल लाजवंती बन गई हो. चलो, फिर किसी दिन आ कर पूछ लेंगे.’’
तभी इन्होंने एक लिफाफा नरेशजी के हाथों में थमा दिया, ‘‘इस समय तो बस, यही सेवा कर सकते हैं आप की. पहले से मालूम होता तो कम से कम अनुपमजी के लिए एक अंगूठी और सूट का प्रबंध तो कर ही लेते. जरा सा शगुन है बस, ना मत कीजिएगा.’’
हम लोग बेहद संकोच में घिर आए थे. अतिथियों को विदा कर के आए तो लग रहा था जैसे कोई सुंदर सा सपना देख कर जागे हैं. चारों तरफ रंगबिरंगे फूलों की वादियां हैं, ठंडे पानी के झरझर झरते झरने हैं और बीच में बैठे हैं हम और हमारी रश्मि. सचमुच कितना सुखी जीवन है हमारा, जो घरबैठे लड़का आ गया था. वह भी इंजीनियर. भलाभला सा, प्यारा सा परिवार. कहते हैं, लड़की वालों को लड़का ढूंढ़ने में वर्षों लग जाते हैं. तरहतरह के अपमान के घूंट गले के भीतर उड़ेलने पड़ते हैं, तब कहीं वे कन्यादान कर पाते हैं.
क्या ऐसे भले और नेक लोग भी हैं आज के युग में?
नलिनीजी के परिवार ने लड़के वालों के प्रति हमारी तमाम मान्यताओं को उखाड़ कर उस की जगह एक नन्हा सा, प्यारा सा पौधा रोप दिया था, मानवता में विश्वास और आस्था का. और उस नन्हे से झूमतेलहराते पौधे को देखते हुए हम अभिभूत से बैठे थे.
‘‘अच्छा, जीजी, चुपकेचुपके रश्मि बिटिया की सगाई कर डाली और शहर के शहर में रहते भी हमें हवा तक नहीं लगने दी?’’ देवरानी ने घुसते ही बधाई की जगह बड़ीबड़ी आंखें मटकाते हुए तीर छोड़ा.
‘‘अरे मंजु, क्या बताएं, खुद हमें ही विश्वास नहीं हो रहा है कि कैसे रश्मि की सगाई हो गई. लग रहा है, जैसे सपना देख कर जागे हैं. उन लोगों ने देखने आने की खबर दी थी, पर आए तो पूरी सगाई की तैयारी के साथ. और हम लोग तो समझो, पानीपानी हो गए एकदम. लड़के के लिए न अंगूठी, न सूट, न शगुन का मिठाईमेवा. यह देखो, तुम्हारी बिटिया के लिए कितना सुंदर सेट और साड़ी दे गए हैं.’’
मंजु ने सामान देखा, परखा और लापरवाही से एक तरफ धर कर, फिर जैसे मैदान में उतर आई, ‘‘अरे, अब हमें मत बनाइए, जीजी. इतनी उमर हो गई शादीब्याह देखतेदेखते, आज तक ऐसा न देखा न सुना. परिवार में इतना बड़ा कारज हो जाए और सगे चाचाचाची के कान में भनक भी न पड़े.’’
‘‘मंजु, इस में बुरा मानने की क्या बात है. ये लोग बड़े हैं. जैसा ठीक समझा, किया. उन की बेटी है. हो सकता है, भैयाभाभी को डर हो, कहीं हम लोग आ कर रंग में भंग न डाल दें. इसलिए…’’
‘‘मुकुल भैया, आप भी…हम पर इतना अविश्वास? भला शुभ कार्य में अपनों से दुरावछिपाव क्यों करते?’’ छोटे भाई जैसे देवर मुकुल से मुझे ऐसी आशा नहीं थी.
‘‘अच्छा, रानीजी, जो हो गया सो तो हो गया. अब ब्याह भी चुपके से न कर डालना. पहलीपहली भतीजी का ब्याह है. सगी बूआ को न भुला देना,’’ शीला जीजी दरवाजे की चौखट पर खड़ेखड़े तानों की बौछार कर रही थीं.
‘‘हद करती हैं आप, जीजी. क्या मैं अकेले हाथों लड़की को विदा कर सकती हूं? क्या ऐसा संभव है?’’
‘‘संभवअसंभव तो मैं जानती नहीं, बीबी रानी, पर इतना जरूर जानती हूं कि जब आधा कार्य चुपचाप कर डाला तो लड़की विदा करने में क्या धरा है. अरे, मैं पूछती हूं, रज्जू से तुम ने आज फोन करवाया. कल ही करवा देतीं तो क्या घिस जाता? पर तुम्हारे मन में तो खोट था न. दुरावछिपाव अपनों से.’’
शीला जीजी हाथ का झोला सोफे पर पटक कर स्वयं भी पसर गईं, ‘‘उफ, इन बसों का सफर तो जान सोख लेता है. पर क्या किया जाए, सुन कर बैठा भी तो नहीं गया. जैसे ही यह दफ्तर से आए, सीधे बस पकड़ कर चले आए. अपनों की मायाममता होती ही ऐसी है. भाई का जरा सा सुखदुख सुनते ही छटपटाहट सी होने लगती है. पर तुम पराए घर की लड़की, क्या जानो, हमारा भाईबहन का संबंध कितना अटूट है.’’
शीला जीजी के शब्द कांटों की तरह कलेजे को आरपार चीरे डाल रहे थे.
‘‘ला तो रश्मि, जरा दिखा तो तेरे ससुराल वालों ने क्या पहनाया तुझे? सुना है बड़े अच्छे लोग हैं…बड़े भले हैं…रज्जू ने फोन पर बताया. दूर के ढोल ऐसे ही सुहावने लगते हैं. अपने सगे तो तुम्हारे दुश्मन हैं.’’
‘‘अच्छा, मामीजी, जल्दी से पैसे निकालिए, बहन की सगाई हुई है. कम से कम मुंह तो मीठा करवा दीजिए सब का,’’ शीला जीजी के बेटे ने जैसे मुसीबतों के पहाड़ तले से खींच कर उबार लिया मुझे.
‘‘हां…हां, अरुण, एक मिनट ठहरो, मैं रुपए लाती हूं,’’ कहती हुई मैं वहां से उठ गई.
देखतेदेखते अरुण रुपयों के साथ इन का स्कूटर भी ले कर उड़ गया. लौटा तो मिठाई, नमकीन मेज पर रखते हुए बोला, ‘‘मामीजी, मिठाई वाले का उधार कर आया हूं. पैसे कम पड़ गए. आप बाद में आशु से भिजवा दीजिएगा 30 रुपए. पता लिखवा आया हूं यहां का.’’
मैं सकते में खड़ी थी. 50 का नोट भी कम पड़ गया था. कैसे? पर जब मेज पर नजर पड़ी तो कारण समझ में आ गया. एक से एक बढि़या मिठाइयां मेज पर बिखरी पड़ी थीं और शीला जीजी और मुकुल भैया अपने बच्चों सहित बड़े प्रेम से मुंह मीठा कर रहे थे. लड़की की सगाई जो हुई थी हमारी.
‘‘अच्छा, तो अकेलेअकेले बिटिया रानी की सगाई की मिठाई उड़ाई जा रही है,’’ दरवाजे पर मेरे मझले मामामामी अपने बेटेबहुओं के साथ खड़े थे, ‘‘क्यों, सरला, तेरा नाम जरूर सरला है, पर निकली तू विरला. क्यों री, तेरे एक ही तो मामा बचे हैं लेदे के और उन्हें भी तू ने समधियों से मिलवाना जरूरी नहीं समझा? अरे बेटा, हम लोग बुजुर्ग हैं, तजरबेकार हैं, शुभ काम में अच्छी ही सलाह देते. याद है, तेरे ब्याह पर मैं ने ही तुझे गोद में उठा कर मंडप में बिठाया था?’’
उफ्, किस मुसीबत में फंस गए थे हम लोग. छोटाबड़ा कोई भी हम पर विश्वास करने को तैयार नहीं था. नाहक ही सब को फोन कर के दफ्तर से खबर करवाई. कल की खुशी की मिठाई मुंह में कड़वी सी हो गई थी.
‘‘मामाजी, बात यह हुई कि हमें खुद ही पता नहीं था. वे लोग रश्मि को देखने आए थे…’’ खीजा, झुंझलाया स्वर स्वयं मुझे अपने ही कानों में अटपटा लग रहा था.
पर मामाजी ने मेरी बात बीच में ही काट दी, ‘‘अरे, हां…हां, ये सब बहाने तो हम लोग काफी देर से सुन रहे हैं. पर बेटा, बड़ों की सलाह लिए बिना तुम्हें ‘हां’ नहीं कहनी चाहिए थी. खैर, अब जो हो गया सो हो गया. अच्छाबुरा जैसा भी होगा, सब की जिम्मेदारी तुम्हीं पर होगी.
‘‘पर आश्चर्य तो इस बात का है कि राजकिशोरजी ने भी हम से दुराव रखा. आज की जगह कल फोन कर लेते तो हम समधियों से बातचीत कर लेते, उन्हें जांचपरख लेते. खैर, तुम लोग जानो, तुम्हारा काम. हम तो सिर्फ अपना फर्ज निभाते आए हैं.
‘‘पुराने लोग हैं, उसूलों पर चलने वाले. तुम लोग ठहरे नए जमाने के आधुनिक विचारों वाले. चाहो तो शादी की सूचना का कार्ड भिजवा देना, चले आएंगे. न चाहो तो कोई बात नहीं. कोई गिला- शिकवा करने नहीं आएंगे उस के लिए.’’
समझ में नहीं आ रहा था, यह क्या हो रहा है. सिर भन्ना गया था. बेटी की शादी की बधाई तथा उस के सुखमय भविष्य के लिए आशीषों की वर्षा की जगह हम पर झूठ, धोखेबाजी, दुरावछिपाव और न जाने किनकिन मिथ्या आरोपों की बौछार हो रही थी और हम इन आरोपों की बौछार तले सिर झुकाए बैठे थे…आहत, मर्माहत, निपट अकेले, निरुपाय.
सब को विदा करतेकराते रात के साढ़े 9 बज गए थे. मन के साथ तन भी एक अव्यक्त सी थकान से टूटाटूटा सा हो आया था. घर में मनहूस सी शांति पसरी पड़ी थी. मौन इन्होंने ही तोड़ा, ‘‘लगता है, रश्मि की सगाई की खबर सुन कर कोई खुश नहीं हुआ. अपनी सगी बहन…अपना भाई…’’ धीरगंभीर व्यथित स्वर.
घंटों से उमड़ताघुमड़ता अपमान और दुख आंखों की राह बह निकला.
‘‘ओफ्फोह, मां, आप भी बस, रोने से क्या वे खुश हो जाएंगे? सब के सब कुढ़ रहे थे कि दीदी का ब्याह इतनी आसानी से और इतने अच्छे घर में क्यों तय हो गया. बस, यही कुढ़न हमारे ऊपर उलटेसीधे तानों के रूप में उड़ेल गए. उंह, यह भी कोई बात हुई,’’ कुछ ही घंटों में आशु भावनाओं की काफी झलक पा गया था.
‘‘छि: बेटा, ऐसे नहीं कहते. वे हमारे बड़े हैं…अपने हैं…उन के लिए ऐसे शब्द नहीं कहने चाहिए.’’
‘‘उंह, बड़े आए अपने. 80 रुपए की मिठाइयां खा गए, ऊपर से न जाने क्या- क्या कह गए. ऐसे ही नाराज थे तो मिठाई क्यों खाई? क्यों मुंह मीठा किया? प्लेटों पर तो ऐसे टूट रहे थे जैसे मिठाई कभी देखी ही न हो. इतना गुस्सा आ रहा था कि बस, पर आप के डर से चुप रह गया कि बोलते ही सब के सामने मुझे डांट देंगी.’’
16 वर्षीय आशु भी अपना आक्रोश मुझ पर निकाल रहा था, ‘‘सब से अच्छा यही है कि दीदी की शादी में किसी को न बुलाया जाए. चुपचाप कोर्ट में जा कर शादी कर ली जाए.’’
मैं गुमसुम सी खड़ी थी. समझ नहीं आ रहा था कि क्या खून के रिश्ते इतनी आसानी से झुठलाए जा सकते हैं?
शायद नहीं…तो फिर?
आशु के तमतमाए चेहरे पर एक दृष्टि डाल, मैं मेज पर फैली बिखरी प्लेटें समेटने लगी. कैसे हैं ये मन के बंधन, जो नितांत अनजान और अपरिचितों को एक प्यार भरी सतरंगी डोर से बांध देते हैं तो अपने ही आत्मीयों को पल भर में छिटका कर परे कर देते हैं.
कैसी विडंबना है यह? जो आज की टूटतीबिखरती आस्थाओं और आशाओं को बड़े यत्न से सहेज कर मन में प्रेम और विश्वास का एक नन्हा सा पौधा रोप गए थे. वे कल तक नितांत पराए थे और आज उस नवजात पौधे को जड़मूल से उखाड़ कर अपने पैरोंतले पूरी तरह कुचल कर रौंदने वाले हमारे अपने थे. सभी आत्मीय…
इन में से किसे अपना मानें, किसे पराया, कुछ भी तो समझ में नहीं आ रहा है.