Mother’s Day Special- मोहपाश : बच्चों से एक मां का मोहभंग

जब से कुमार साहब ने औफिस से 2 महीने की छुट्टी ले कर नैनीताल जाने का मन बनाया था, तब से ही विभा परेशान थी. उस ने पति को टोका भी था, ‘‘अजी, पूरी जवानी तो हम ने घर में ही काट दी, अब भला बुढ़ापे में कहा घूमने जाएंगे.’’

‘‘अरे भई, यह किस डाक्टर ने कहा है कि जवानी में ही घूमना चाहिए, बुढ़ापे में नहीं,’’ कुमार साहब भी तपाक से बोले.

विभा के गिरते स्वास्थ्य को देख कर कुमार साहब बड़े चिंतित थे. उन्होंने कई डाक्टरों को भी दिखाया था. सभी ने एक ही बात कही थी कि दवा के साथसाथ उन्हें अधिक से अधिक आराम की भी जरूरत है.

काफी सोचविचार के बाद कुमार साहब ने 2 महीने नैनीताल में रहने का प्रोग्राम बनाया था कि इस बहाने कुछ समय के लिए ही सही, शहर के प्रदूषित वातावरण से मुक्ति मिलेगी और घर के झमेलों से दूर रह कर विभा को आराम भी मिलेगा.

कुमार साहब का कोई लंबाचौड़ा परिवार न था. 2 बेटे थे, दोनों ही इंजीनियर. बड़ी कंपनियों में कार्यरत थे. विवाह के बाद दोनों ने अपने अलगअलग आशियाने बना लिए थे. शायद यह घर उन्हें छोटा लगने लगा था. वैसे भी एक गली के पुराने घर में रहना उन के स्तर के अनुकूल न था.

जब से बेटे अलग हुए, तब से ही विभा का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता गया. विभा ने बच्चों को ले कर अनेक सुनहरे सपने बुन रखे थे, पर बच्चों के जीवन में शायद मां का कोईर् स्थान ही न था. विभा इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी. बच्चों के व्यवहार ने विभा के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया था.

महीने में 1-2 बार बच्चे उन से मिलने आते थे और कुछ देर बैठ कर औपचारिक बातें कर के चले जाते थे. इसी तरह समय बीतता गया. बच्चों से मिलनाजुलना अब पहले से भी कम हो गया. इसी बीच वे 1 पोते व 1 पोती के दादादादी भी बन गए.

दोनों बहुएं पढ़ीलिखी थीं. उन्होंने भी अपने लिए नौकरी ढूंढ़ ली. अब पहली बार उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ कि उन्हें मांबाबूजी से अलग घर नहीं बसाना चाहिए था. मां घर में होतीं तो बच्चों को संभाल लेतीं.

बड़ी बहू नंदिता तो एक दिन बेटे गौतम को ले कर सास के पास पहुंच भी गई. बहू, पोते को देख कर विभा निहाल हो गई.

‘अमित नहीं आया?’ उस ने शिकायती लहजे में बहू से पूछा.

‘क्या करूं मांजी, उन्हें तो दिनभर औफिस के काम से ही फुरसत नहीं है. कितने दिन से कह रही थी कि मांबाबूजी से मिलने की बड़ी इच्छा है, औफिस से जल्दी आ जाना, पर आ ही नहीं पाते. आखिर परेशान हो कर मैं अकेली ही गौतम को ले कर आ गई.’

‘बहुत अच्छा किया बहू,’ गदगद स्वर में विभा बोली और गौतम को खिलाने लगीं.

‘मांजी, आप को यह जान कर खुशी होगी कि मैं ने नौकरी कर ली है.’

‘हां बेटी, बात तो खुशी की ही है. भला हर किसी को नौकरी थोड़े ही मिलती है? जो नौकरी लायक होता है, उसे ही नौकरी मिलती है. मेरी बहू इतनी काबिल है, तभी तो उसे नौकरी मिली,’ विभा ने खुश होते हुए कहा.

‘पर मांजी, एक समस्या है, अब गौतम को तो आप को ही संभालना पड़ेगा. मैं चाहती हूं कि आप और बाबूजी हमारे साथ रहें. इस घर को किराए पर दे देंगे.’

‘नहीं बेटी, यह तो संभव नहीं है. इस घर से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं. इस घर में मैं ब्याह कर आई थी. इसी घर में मेरी गोद भरी थी. इस घर के कोनेकोने में मेरे अमित और विजय की किलकारियां गूंजती हैं. इसी घर में तुम और स्मिता आईं और यह घर खुशियों से भर गया. अकेली होने पर यही यादें मेरा सहारा बनती हैं. इस घर को मैं नहीं छोड़ सकती.’

विभा ने साफ मना किया तो नंदिता बोली, ‘ठीक है मांजी, फिर मैं औफिस जाते समय गौतम को यहां छोड़ जाया करूंगी और लौटते समय ले जाया करूंगी.’

‘यह ठीक रहेगा,’ विभा ने अपनी सहमति देते हुए कहा. हालांकि उन का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, पर वह अपने एकाकी जीवन से बहुत ऊब चुकी थी. अब दिन भर गौतम उस के साथ रहेगा. इस कल्पना मात्र से ही वह खुश थी.

जब कुमार साहब को इस बात पता चला कि दिनभर गौतम की देखभाल विभा करेगी तो उन्हें यह अच्छा न लगा. अतएव झुंझला कर बोले, ‘जिम्मेदारी लेने से पहले अपना स्वास्थ्य तो देखा होता. दिनभर एक बच्चे को संभालना कोई आसान काम है?’

‘अपने बच्चे हैं. अपने बच्चों के हम ही काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा?’ विभा ने समझाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘गौतम यहां रहेगा तो क्या मुझे अच्छा नहीं लगेगा? मुझे भी अच्छा लगेगा, पर मुझे दुख तो इस बात का है कि तुम्हारे ये स्वार्थी बच्चे काम पड़ने पर तो अपने बन जाते हैं, पर काम निकलते ही पराए हो जाते हैं,’ कुमार साहब बोले तो विभा ने चुप रहने में ही भलाई समझी.

जैसे ही छोटी बहू स्मिता को पता चला कि गौतम दिनभर मांजी के पास रहा करेगा, वैसे ही उस ने भी अपनी बेटी ऋचा को वहां छोड़ने का निर्णय ले लिया.

2 दिनों बाद से ही गौतम और ऋचा पूरा दिन अपनी दादी के साथ बिताने लगे. विभा का पूरा दिन उन दोनों के छोटेछोटे कामों में कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था. कुछ महीने हंसीखुशी बीत गए, पर जैसेजैसे वे बड़े हो रहे थे, विभा के लिए समस्याएं बढ़ती जा रही थीं. अब बच्चे आपस में लड़तेझगड़ते तो थे ही, पूरे घर को भी अस्तव्यस्त कर देते थे, जिसे फिर से जमाने में विभा को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी.

विभा अपनी परेशानियों को कुमार साहब से छिपाने का लाख प्रयत्न करती, पर उन से कुछ छिपा न रहता था. एक दिन वे औफिस से लौटे तो देखा कि विभा के पैर में पट्टी बंधी थी.

‘क्या हुआ पैर में?’ कुछ परेशान होते हुए उन्होंने पूछा.

‘कुछ नहीं,’ विभा ने बात टालने का प्रयत्न किया, पर तभी पास खेलती ऋचा तुतलाती आवाज में बोली, ‘‘दादाजी, दौतम ने तांच ता दिलाछ तोल दिया. दादीमां तांच उथा लही थी. तबी इनते पैल में तांच लद दया. दादाजी, आप दौतम को दांतिए. वह भोत छलालती है. दादीमां को भोत तंग कलता है,’’ ऋचा गौतम की शिकायत लगाते हुए लाड़ से दादाजी के गले में झूल गई.

ऋचा की प्यारीप्यारी तुतलाती बातें सुन कर कुमार साहब मुसकरा दिए,  ‘और तू भी अपनी दादीमां को तंग करती है,’ उन्होंने कहा तो वह तुरंत गरदन हिलाते हुए बोली, ‘नहींनहीं, मैं तभी इन्हें पलेछान नहीं तलती. मैं तो हमेछा इनता ताम ही तरती हूं. बले ही पूछ लो दादीमां छे.’

अभी कुमार साहब और विभा ऋचा की प्यारीप्यारी बातों का आनंद उठा ही रहे थे कि तभी गौतम के चिल्लाने की आवाज आई.

‘अरे, क्या हुआ?’ कहती हुई विभा दूसरे कमरे में भागी. गौतम वहां आंखों में आंसू भरे अपने पैर को पकड़ कर बैठा था.

‘क्या हुआ बेटा?’ विभा ने उसे पुचकारते हुए पूछा.

‘दादीमां, मैं तो स्टूल पर चढ़ कर अलमारी की सफाई कर रहा था, पर पता नहीं स्टूल कैसे खिसक गया और मैं गिर पड़ा,’ गौतम ने सफाई देते हुए कहा.

‘पैर पकड़े क्यों बैठा है? क्या पैर में चोट लग गई?’

‘हां दादीमां, पैर मुड़ गया,’ पैर को और जोर से पकड़ते हुए वह बोला.

विभा ने गौतम को खड़ा कर के चलाने का प्रयास किया, पर दर्द काफी था, वह चल नहीं सका.

‘लगता है गौतम के पैर में मोच आ गई है,’ विभा ने कुमार साहब को बताया तो वे उसे ले कर तुरंत डाक्टर के पास पहुंचे.

मन ही मन वे झुंझला रहे थे कि अब बुढ़ापे में यही काम रह गया हमारा. सचमुच गौतम के पैर में मोच आ गई थी. रात को नंदिता गौतम को लेने के लिए पहुंची तो उस के पैर में मोच आई देख कर वह भी परेशान हो उठी.

कुमार साहब और विभा ने जब नंदिता को गौतम से यह पूछते हुए सुना कि तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई तो वे सन्न रह गए.

‘अभी भी तुम्हारा मोहभंग हुआ या नहीं?’ कुमार साहब ने उदास सी मुसकान बिखेरते हुए पूछा, पर विभा मौन थी मानो उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था. पर बहू का वह वाक्य  ‘तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई,’ उस के कानों में बारबार गूंज रहा था.

ममता की मारी विभा को बच्चों के मोहपाश ने बुरी तरह जकड़ रखा था. वह उस से निकलने का जितना प्रयास करती, उस की जकड़न उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाती. स्थिति यहां तक पहुंची कि विभा ने बिस्तर ही पकड़ लिया.

पिछले कई दिनों से विभा को बुखार था. कुमार साहब ने अमित को फोन कर दिया, ‘बेटा अमित, तुम्हारी मां की तबीयत काफी खराब है. आज तुम गौतम को यहां मत भेजना, वह संभाल नहीं सकेगी. विजय को भी कह देना कि वह भी ऋचा को न भेजे.’

‘पर बाबूजी, ऐसे कैसे चलेगा? नंदिता की नईनई नौकरी है, उसे तो छुट्टी नहीं मिल सकती. मैं कोशिश करूंगा, यदि मुझे छुट्टी मिल गई तो आज मैं गौतम को रख लूंगा. विजय को भी मैं बता दूंगा.’

अगले दिन अमित और विजय के ड्राइवर आ कर दोनों बच्चों को विभा के पास छोड़ गए, साथ ही कह गए कि उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मजबूर हो कर कुमार साहब ने छुट्टी ली और दोनों बच्चों की देखभाल की. दिनभर उन की शरारतों से वे परेशान हो गए.

शाम के समय जब विभा की तबीयत कुछ संभली, तब कुमार साहब ने उसे फिर समझाया, ‘देख लिया अपने बच्चों को? तुम उन के बच्चे पालने में दिनभर खटती रहती हो और तुम्हारी दोनों में से एक बहू से भी यह न हुआ कि 1 दिन की छुट्टी ले कर तुम्हारी देखभाल कर लेती.’

‘क्या करें, उन की भी कोई मजबूरी होगी,’ कह विभा ने करवट बदल ली.

रात को दोनों बेटे बच्चों को लेने आए. जितनी देर वे वहां बैठे, अपनी सफाईर् पेश करते रहे.

‘मां, नंदिता के औफिस में आज बाहर से कोई पार्टी आई हुई थी, इसलिए उसे छुट्टी नहीं मिली और मुझे भी जरूरी मीटिंग अटैंड करनी थी.’

अमित ने कहा तो विजय भी कैसे चुप रहता. बोला, ‘मां, स्मिता ने भी छुट्टी लेने की बहुत कोशिश की, पर उस के कालेज में आजकल परीक्षाएं चल रही हैं. और मैं तो अभी शाम को ही टूर से लौटा हूं.’

कुमार साहब यह अच्छी तरह समझ गए थे कि यहां रह कर विभा को आराम नहीं मिलेगा. उस के स्वार्थी बेटे और बहुएं उस की ममता का नाजायज फायदा उठाते रहेंगे. इसलिए उन्होंने कुछ समय के लिए घर से बाहर जाने की सोची थी.

विभा सोच रही थी कि यदि वे नैनीताल चले जाएंगे तो गौतम और ऋचा की देखभाल कौन करेगा. उस ने अपने मन की बात कुमार साहब से कही तो वह भड़क उठे,  ‘‘अरे, जिन के अपने शहर में नहीं रहते उन के बच्चे क्या नहीं पलते? तुम्हारे बेटेबहू इतना कमाते हैं, क्या बच्चों के लिए नौकर नहीं रख सकते? क्या इस शहर में शिशुगृहों की कमी है? तुम ने उन के बच्चों की जिम्मेदारी ले रखी है क्या? उन्हें अपनेआप संभालने दो अपने बच्चों को.’’

जब अमित और विजय को मालूम हुआ कि मां और बाबूजी नैनीताल जा रहे हैं तो वे परेशान हो उठे.

‘‘मांजी, 2 महीने बाद मेरे कालेज में छुट्यिं हो जाएंगी. आप तब चली जाना नैनीताल. यदि आप चली गईं तो बच्चों को कौन संभालेगा,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी बताते हुए विभा से कहा.

विभा क्या उत्तर देती, वह तो स्वयं परेशान थी. तभी पास बैठे कुमार साहब बोले, ‘‘बेटी, यदि हम नैनीताल नहीं जाएंगे तब भी तुम्हारी सास की तबीयत ऐसी नहीं है कि वह 2-2 बच्चों को संभाल सके. यह भला किस का सहारा बनेगी, इसे तो स्वयं सहारे की जरूरत है.’’

बाबूजी की बात सुन कर सब चुप थे. पहली बार उन्हें एहसास हो रहा था कि  उन्हें मांबाबूजी कि कितनी जरूरत थी. कुमार साहब और विभा नैनीताल के लिए रवाना हो गए. विभा उदास थी. कुमार साहब भी खुश न थे. उन के सामने अपने बच्चों के परेशान चेहरे घूम रहे थे. कुमार साहब को उदास देख कर विभा ने पूछा, ‘‘आप उदास क्यों हैं? आप को खुश होना चाहिए, हम नैनीताल जा रहे हैं.’’

‘‘तुम क्या सोचती हो कि बच्चों को परेशान देख कर मुझे अच्छा लगता है? पर मैं यह नहीं चाहता कि बच्चे हमारे प्यार का गलत फायदा उठाएं. इस के लिए उन्हें सबक देना जरूरी है और इस के लिए कठोर भी होना पड़े तो झिझकना नहीं चाहिए.’’

कुमार साहब की बात सुन कर विभा संतुष्ट थी. उस के चारों ओर घिरे उदासी के बादल छंटने लगे थे. वह समझ गई थी कि इस मोहपाश में जकड़ कर वह मां का कर्तव्य पूरा नहीं कर पाएगी. आज पहली बार उसे अनुभव हुआ कि जिस मोहपाश में वह अब तक घिरी थी, उस की जकड़न स्वत: ही ढीली हो रही है.

Mother’s Day Special: ममता की मूरत

रात का लगभग 8 बजे का समय था. मैं औफिस से आ कर खाना बना रही थी और राकेश अपने लैपटौप पर अभी भी औफिस के ही काम में उलझे हुए थे. तभी फोन की घंटी बजी. किस का फोन है, यह उत्सुकता मुझे किचन से खींच लाई. मैं ने देखा राकेश फोन पर बात करते हुए बहुत परेशान हो उठे हैं.

‘प्लीज, आप उन्हें अस्पताल पहुंचा दीजिए. मैं फौरन निकल रहा हूं, फिर भी मुझे पहुंचने में 2-3  घंटे तो लग ही जाएंगे,’ इतना कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया. इस से पहले कि मैं कुछ पूछती उन्होंने हड़बड़ी में मुझे पूरी बात बताते हुए अपने कुछ कपड़े और जरूरी सामान बैग में रखना शुरू कर दिया.

राकेश की चाचीजी, जो मथुरा में रहती हैं अचानक बहुत बीमार हो गई थीं. उन की हालत को देखते हुए किसी पड़ोसी ने हमें फोन किया था. चाचीजी का हमारे सिवा इस दुनिया में और है ही कौन? उन की अपनी औलाद तो है नहीं और चाचाजी का कुछ वर्ष हुए देहांत हो चुका है.

हमारी शादी में चाचीजी ने ही मेरी सास की सारी रस्में की थीं. राकेश के मातापिता तो बहुत पहले एक कार ऐक्सीडैंट में मारे गए थे. तब राकेश की दीदी गरिमा तो अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश कर रही थीं, लेकिन राकेश स्कूल में पढ़ रहे थे. अपनी दीदी से 8 साल छोटे जो हैं. तब चाचाचाची ने ही दीदी की शादी की थी और राकेश को स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई के लिए होस्टल भेज दिया था. चाचाचाची ने दीदी को और मुझे अपनी औलाद की तरह प्यार दिया है, यह बात इन 2 वर्षों में राकेश मुझे कई बार बता चुके हैं.

पहले पूरा परिवार साथ ही रहता था लेकिन राकेश जब चौथी कक्षा में पढ़ते थे, तभी इन के चाचाजी का तबादला मथुरा हो गया था. इस के बाद तो उन के तबादला कई और शहरों में भी होता रहा लेकिन मथुरा में उन्होंने अपना घर बना लिया था, इसलिए उन के देहांत के बाद चाचीजी मथुरा आ गई थीं. और वे जाती भी कहां?

मेरा चाचीजी से ज्यादा परिचय नहीं था. हमारी शादी के वक्त वे सिर्फ 5-6 दिन हमारे साथ रही थीं. दरअसल, हम दोनों बैंकाक घूमने जाना चाहते, इसलिए वे मथुरा लौट गई थीं. मैं क्याक्या सोचने लग गई थी. राकेश की आवाज से मैं वर्तमान में लौटी. वे कह रहे थे कि देखो जल्दी में मैं कहीं कुछ रखना तो नहीं भूल गया.

बैग पैक हो गया तो राकेश अकेले चाचीजी को कैसे संभालेंगे यह सोच कर मैं ने भी साथ चलने की बात की तो वे बोले कि पहले जा कर स्थिति देख लूं, जरूरत हुई तो तुम्हें भी बुला लूंगा. फिर वे मथुरा के लिए रवाना हो गए.

शादी के बाद यह पहला अवसर था जब मैं रात के समय घर में अकेली थी. अजीब सा डर व बेचैनी मुझे सोने नहीं दे रही थी. रात 2 बजे के लगभग राकेश से मेरी बात हुई. पता लगा चाचीजी बेहोश हैं. कई तरह के टैस्ट हो रहे हैं, अभी कुछ ठीक से कहा नहीं जा सकता. राकेश काफी परेशान लग रहे थे.

अगली सुबह 11 बजे राकेश का फोन आया कि वे चाचीजी के इलाज तथा डाक्टरों के रवैये से संतुष्ट नहीं हैं. वे उन्हें ले कर दिल्ली आ रहे हैं. दिल्ली के एक अस्पताल से बातचीत चल रही है.

शाम होतेहोते वे चाचीजी को ले कर दिल्ली पहुंच गए. नीम बेहोशी की हालत में चाचीजी बहुत ही कमजोर लग रही थीं. रंग भी पीला पड़ा हुआ था. उन के अस्पताल पहुंचने से पहले ही मैं वहां पहुंच गई. डाक्टरों ने तत्परता से इलाज शुरू कर दिया.

5 दिनों बाद चाचीजी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, लेकिन डाक्टरों ने दवा के साथसाथ परहेज और आराम करने की सख्त हिदायत दी थी. हम उन्हें घर ले आए. बीमारी कोई विशेष नहीं थी. बढ़ती उम्र, अकेलापन, चिंता, काम की थकान, उस पर ठीक से समय पर न खाना बीमारी के कारण थे.

हम दोनों के लिए अब और छुट्टियां लेना मुश्किल था. उन के लिए किसी नौकर या नर्स का प्रबंध नहीं हो पा रहा था, इसलिए हम ने घर पर काम करने वाली बाई को ही दिन भर में 2-3 चक्कर लगा कर उन्हें दूध, चाय, नाश्ता आदि देते रहने के लिए कहा और औफिस जाना शुरू कर दिया था. हां, दिन में कई बार हम फोन पर चाचीजी से बात कर लेते थे. उन का हालचाल जान लेते थे. कोई परेशानी तो नहीं? पूछते रहते थे.

राकेश की तो पता नहीं हां, मेरी परेशानियां कुछ बढ़ गई थीं. आज तक जो घर सिर्फ हमारा था वह एकाएक मुझे मेरी ससुराल लगने लगा था. अब उठनेबैठने, पहननेओढ़ने में मैं कुछ बंदिशें महसूस करने लगी थी. हालांकि चाचीजी ने इस बारे कभी कुछ कहा नहीं था, लेकिन उन का घर पर होना ही मेरे लिए काफी था.

लेकिन मैं पूरे उत्साह से यह सब कर रही थी, क्योंकि चाचीजी आशा से कहीं जल्दी स्वास्थ्य लाभ कर रही थीं. 1 सप्ताह बाद ही उन्हें कामवाली की जरूरत नहीं रही. वे अपने छोटेछोटे काम स्वयं ही उठ कर करने लगी थीं. मैं खुश थी कि वे जल्दी ही ठीक हो कर मथुरा लौट जाएंगी. कुछ ही दिनों की तो बात है.

एक दिन राकेश बोले कि अब हम चाचीजी को वापस नहीं जाने देंगे. वे अब हमारे साथ ही रहेंगी. अब इस उम्र में उन का अकेले रहना मुश्किल है. फिर बीमार हो गईं तो? फिर हमारा भी तो उन के प्रति कोई कर्तव्य है. उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है. राकेश ने कुछ गलत तो नहीं कहा था लेकिन मेरा मन बेचैन हो उठा.

मुझे याद है जब मेरे लिए राकेश का रिश्ता आया तो मम्मीपापा ने मेरी राय पूछी थी. राकेश दिखने में कैसे हैं? पढ़ेलिखे कितना हैं? कमाते कितना हैं? यह सब जानने की मुझे जरूरत ही महसूस नहीं हुई थी क्योंकि लगा था कि मम्मीपापा और मामाजी ने देख लिया है तो सब ठीक ही होगा. मेरे लायक ही होगा. मैं तो लड़के के परिवार के बारे में जानना चाहती थी. पूछा तो पता लगा कि घर में सासससुर नहीं हैं. बस एक बड़ी बहन है, जो शादीशुदा है. मेरे लिए इतना ही जानना काफी था क्योंकि मेरे दिमाग में सास की छवि ऐसी थी जिस से बहू हमेशा डरीसहमी रहती है. मेरी सहेली जया, जिस की शादी कुछ ही महीने पहले हुई थी, उस से जब भी बात होती थी वह अपने पति के बारे में कम सास के बारे में बात ज्यादा करती थी. हमेशा परेशान रहती थी.

उस पर मेरी दीदी जबतब मायके आतीं तो कई दिनों तक लौटने का नाम नहीं लेती थीं. हमेशा मां ही उन्हें समझाबुझा कर वापस भेजती थीं. उन्हें भी पति या देवर से नहीं सास से ही ढेरों शिकायतें होती थीं.

लेकिन हमारे यहां तो राकेश की चाचीजी रहने वाली थीं. अपनी सास की तो चलो कोई 2 बात सुन भी ले, चचियासास की बातें, ताने, उलाहने भला कोई क्यों सुने? हालांकि ऐसा सोचना बड़ा ही गलत था, स्वार्थी सोच था, लेकिन मुझे बहुत परेशान करने लगा था.

एक शाम औफिस से घर पहुंची तो देखा चाचीजी ने मशीन लगा कर घर भर के मैले कपड़े इकट्ठा कर धो डाले थे. मैं तो इतवार को ही मशीन लगा कर सप्ताह भर के कपड़े धोती हूं. पिछले दिनों चाचीजी की बीमारी के चक्कर में यह काम रह ही गया था. इतने कपड़े एकसाथ धुले देख कर मैं हैरान रह गई, ‘‘यह क्या चाचीजी, आप ने यह सब क्यों किया? आप को तो अभी आराम करना चाहिए.’’

‘‘दिन भर आराम ही तो करती हूं सीमा, फिर आजकल मशीन में कपड़े धोना भी कोई काम है?’’ कहते हुए चाचीजी हंस दीं.

अब रात के खाने के वक्त गपशप का दौर चलने लगा था. चाचीजी राकेश के बचपन की आदतों, शरारतों के बारे में बतातीं. मुझे मेरी ससुराल के बारे में बहुत सी ऐसी बातें भी बतातीं, जिन्हें बताने वाला कोई नहीं था. राकेश की चिढ़, पसंदनापसंद के बारे में भी मुझे पता लग रहा था. अब मुझे उन्हें चिढ़ाने, छेड़ने में बड़ा मजा आ रहा था. ऐसे में चाचीजी भी हंसते हुए मेरा पूरा साथ देती थीं.

हम शाम को औफिस से लौटते तो चाचीजी बढि़या सा स्वादिष्ठ नाश्ता बना कर हमारा इंतजार कर रही होतीं. अब सुबहशाम मुझे सब्जी कटी हुई मिलती, सलाद तैयार और तरहतरह की चटनियां पिसी मिलतीं. वे अकसर आटा भी गूंध दिया करती थीं. यह सब देख कर यही लगता कि वे दिन भर पल भर को भी बैठती नहीं हैं.

अब घर में कोई हर चीज अपने ठिकाने पर करीने से रखी मिलती, जिन्हें पहले हम अकसर समय की कमी के कारण यहांवहां इस्तेमाल के बाद छोड़ दिया करते थे.

एक छुट्टी के दिन हम चाचीजी को मौल घुमाने ले जा रहे थे. उन्होंने रास्ते में एक जगह गाड़ी रोकने के लिए कहा तो हम हैरान रह गए. फिर भी राकेश ने तुरंत गाड़ी रोकी तो चाचीजी फौरन उतर कर पास के एटीएम की ओर बढ़ गईं. 2 ही मिनटों बाद वे नोट हाथ में ले कर लौटीं.

हमें हैरान देख कर वे बोलीं, ‘‘हैरान मत हो. अपनी हालत को देखते हुए यह कार्ड मैं ने अस्पताल के सामान के साथ रख लिया था. वहां अस्पताल में पैसों की जरूरत तो पड़नी ही थी न? पर मुझे क्या पता था मेरी हालत इतनी बिगड़ जाएगी कि पड़ोसी को फोन कर के तुम्हें बुलाना पड़ेगा.’’

‘‘वह तो ठीक है  चाचीजी, लेकिन अब तो हम हैं. आप को पैसे निकलवाने की क्या जरूरत थी? वैसे क्षमा करना, आप को आए इतने दिन हो गए, खयाल ही नहीं आया मुझे. आप से पूछना चाहिए था आप की जरूरत के बारे में,’’ राकेश ने झेंपते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं बेटा मुझे भला पैसों का क्या करना है? लेकिन पहली बार अपने बेटेबहू के साथ बाजार जा रही हूं तो पैसे पास में होने ही चाहिए. चलोचलो देर हो रही है,’’ चाचीजी ने पूरे उत्साह से कहा.

मौल में पहुंचते ही चाचीजी रेडीमेड कपड़ों के शोरूम में चली गईं. हमें लगा वे बीमारी की हालत में इतनी जल्दी में अस्पताल आईं कि साथ में बहुत सी चीजें नहीं ला पाईं. उन्हें कपड़ों के लिए परेशानी होती होगी, इसलिए वहां गई हैं. लेकिन रेडीमेड शर्ट और जींस के काउंटर पर जा कर वे राकेश से कपड़े खरीदने के लिए कहने लगीं. राकेश ने बहुत मना किया लेकिन वे कब मानने वाली थीं.

राकेश जींस ट्राई कर रहे थे तब मुझ से बोलीं, ‘‘आजकल की सब लड़कियां जींस पहनती हैं. दफ्तर जाने वाली तो कहती हैं कि इस में उन्हें सुविधा रहती है. बहू, तुम नहीं पहनतीं?’’

उन की बात सुन कर मैं हैरान रह गई. पुरानी पीढ़ी की हो कर भी वे ऐसी बात कह रही हैं?

‘‘नहींनहीं चाचीजी मैं भी…’’ कहते हुए मैं रुक गई. लगा कहीं यों ही बातोंबातों में मुझ से कुछ उगलवाना तो नहीं चाह रहीं.

‘‘पहनती हो लेकिन मेरे कारण रोज साड़ी और सूट की बंदिशों में कैद हो गई हो. लेकिन मैं ने तो कभी कुछ कहा ही नहीं,’’ चाचीजी बड़ी मासूमियत से बोलीं.

‘‘बहू, तुम भी अपने लिए एक जींस और एक बढि़या सी टौप खरीद लो. मैं भी तो देखूं मेरी बहू इन कपड़ों में कैसी लगती है,’’ कहते हुए उन्होंने मेरे लिए कपड़े पसंद करने शुरू कर दिए. मैं हैरान सी खड़ी उन्हें देखती रह गई. अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आ रहा था, लेकिन यह सब सच था सपना नहीं.

कपड़े खरीदते ही चाचीजी बोलीं, ‘‘भई, बहुत भूख लग रही है. वैसे भी मेरे ठीक होने की खुशी में एक बढि़या सी दावत होनी ही चाहिए.’’

रेस्टोरैंट में हमारे मना करने पर भी चाचीजी ने बहुत कुछ मंगवा लिया, उस पर आइसक्रीम भी. बाद में राकेश जब वहां पैसे देने लगे तो उन्होंने तुरंत नोट उन के हाथ में पकड़ाते हुए कहा, ‘‘ये लो तुम ही दे दो. क्या फर्क पड़ता है.’’ इस पर हम तो हंस ही रहे थे, बिल लाने वाला वेटर भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया.

घर आ कर राकेश ने कहा कि आप को इतने पैसे खर्च नहीं करने चाहिए थे तो वे बोलीं, ‘‘तुम्हारे चाचाजी के बाद अब मुझे पैंशन मिलती है. मैं अकेली जान अब इस उम्र में अपने पर कितना खर्च करूंगी?’’

वे जब से ठीक हुई हैं अकसर शाम को सैर करने चली जाती हैं. फल, सब्जियां, दूध और मिठाई न जाने क्याक्या ले कर ही लौटती हैं. खाली हाथ कभी नहीं आतीं.

सुबह हम औफिस के लिए तैयार हो रहे थे तो वे पास आ कर बोलीं, ‘‘बेटा राकेश, अब मैं बिलकुल ठीक हूं. अब मेरा वापसी का टिकट करवा दो.’’

सुनते ही हम दोनों अवाक रह गए.

‘‘क्या हुआ चाचीजी, आप को यहां कोई परेशानी है क्या?’’ हम दोनों एकसाथ बोल उठे.

‘‘नहींनहीं बेटा, अपने घर में कैसी परेशानी. फिर भी लौटना तो होगा ही न.

2 महीने हो गए हैं, मैं कब तक तुम लोगों…’’

सुनते ही मैं परेशान हो उठी, ‘‘चाचीजी, आप से इतना तो मना करते हैं फिर भी आप अपनी मरजी से दिन भर काम में लगी रहती हैं.’’

‘‘नहींनहीं सीमा, मैं काम की बात नहीं कर रही. यह भी कोई काम है. बटन दबाया कपड़े धुल गए. बटन दबाया चटनी, मसाला पिस गया. घर की सफाई और बरतन का काम तो कामवाली कर जाती है. दिन भर में काम ही कितना होता है? लेकिन बेटा 2 महीने हो गए हैं, कब तक तुम लोगों पर बोझ बनी रहूंगी?’’

बोझ शब्द सुनते ही मेरी आंखें भर आईं. मैं उन से लिपट गई. ऐसी ममता की मूरत भला बोझ कैसे हो सकती है? कितनी गलत सोच थी मेरी सास के बारे में. मुझे चाचीजी से कोई शिकायत नहीं. कितनी परेशान हो गई थी मैं जब राकेश ने उन के यहीं रहने की बात की थी. लेकिन अब मैं उन के बिना जीने की कल्पना ही नहीं कर सकती थी. उन के प्यार, आशीर्वाद और उन की उपस्थिति के बिना हमारा जीवन, हमारा घरपरिवार कितना अधूरा रह जाएगा. कौन हर शाम घर पर हमारा इंतजार करेगा? कौन भूख न होने पर भी मनुहार कर के हमें खाना खिलाएगा? कौन बिना किसी स्वार्थ के हम पर इतना निश्छल स्नेह लुटाएगा?

हम दोनों ने उन्हें साफ शब्दों में कह दिया कि वे अब कहीं नहीं जाएंगी. अब इस उम्र में हमारे होते हुए वे अकेली नहीं रहेंगी. अब यह उन की मरजी है कि वे अपने मथुरा वाले घर पर ताला लगाना चाहती हैं या उसे किराए पर उठाना चाहती हैं. हमारी जिद और हमारे प्यार के आगे उन की एक नहीं चली.

चाचीजी कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘तुम इतना कहते हो तो तुम्हारे पास ही रह जाऊंगी, लेकिन मेरी एक शर्त है.’’

मैं समझ गई कि चाचीजी क्या कहना चाहती हैं. मैं झट से बोली, ‘‘आप एक बार मथुरा जा कर अपने कुछ कपड़े, कुछ जरूरी सामान लाना चाहती हैं न? इस में शर्त की क्या बात है, अगले ही वीक ऐंड पर हम दोनों आप को मथुरा ले चलेंगे.’’

‘‘वह तो मैं जाऊंगी ही पर मेरी शर्त तो कुछ और ही है.’’

चाचीजी के इतना कहते ही मैं कुछ परेशान हो गई. सोचा, पता नहीं वे क्या शर्त रखेंगी.

तभी राकेश बोल उठे, ‘‘चाचीजी, शर्त क्यों आप तो आदेश दीजिए क्या चाहिए?’’

हमारे परेशान चेहरे को देख कर चाचीजी की हंसी निकल गई. वे हंसते हुए बोलीं, ‘‘हांहां, शर्त नहीं मेरा आदेश ही है कि यदि मुझे यहां रोकना है तो मुझे जल्दी से एक पोता देना होगा. 2 साल हो गए हैं शादी को, कब तक यों ही डोलते रहोगे?’’

सुनते ही हम दोनों शरमा गए. जिस प्यार और अधिकार से चाचीजी ने कहा है तो हमारे सोचने के लिए कुछ बचा ही कहां है. चाचीजी ने हमारे जीवन को नए माने दे दिए हैं. पता नहीं ममता की यह मूरत वर्षों बिना औलाद के कैसे रही होगी? चलो बीमारी के बहाने ही सही, वे हमारे पास अपनी ममता लुटाने तो आ गई हैं.

Mother’s Day Special- निश्चय: क्या सुधा ने लिया मातृत्व का गला घोंटने का फैसला?

सुधा और अनिल ने एकसाथ डाक्टरी की पढ़ाई की थी. दोनों की यही इच्छा थी कि वे अमेरिका जा कर अपना काम शुरू करें और साथसाथ पढ़ाई भी जारी रखें. दोनों के परस्पर विवाह पर भी मातापिता की ओर से कोई रुकावट नहीं हुई थी. इसलिए दोनों विवाह के कुछ समय बाद ही अमेरिका आ गए.

अमेरिका का वातावरण उन्हें काफी रास आया. अनिल और सुधा ने यहां आ कर 5 वर्ष में काफी तरक्की कर ली थी. अब अनिल ने नौकरी छोड़ कर अपना क्लीनिक खोल लिया था, लेकिन सुधा अभी भी नौकरी कर रही थी. उस का कहना था, ‘नौकरी में बंधेबंधाए घंटे होते हैं. उस के साथसाथ घर पर भी समया- नुसार काम और आराम का समय मिलता है, जबकि अपने काम में थोड़ा लालच भी होता है और यह भी निश्चित होता है कि जब तक अंतिम रोगी को देख कर विदा न कर दिया जाए, डाक्टर अपना क्लीनिक नहीं छोड़ सकता.’  खैर, जो भी हो, सुधा को नौकरी करना ही ज्यादा उचित लगा था. शायद पैसों के पीछे भागना उसे अच्छा नहीं लगता था और न ही वह उस की जरूरत समझती थी. वह अब एक भरापूरा घरपरिवार चाहती थी. भरेपूरे परिवार से उस का मतलब था कि घर में बच्चे हों, हंसी- ठिठोली हो. जीवन के एक ही ढर्रे की नीरसता से वह ऊबने लगी थी.

पहलेपहल जब वे यहां आए थे तो दोनों की ही इच्छा थी कि अभी 3-4 वर्ष पढ़ाई पूरी करने के पश्चात अपनी प्रैक्टिस जमा लें और आर्थिक स्थिति मजबूत कर लें, फिर बच्चों का सोचेंगे. अब सुधा को लगने लगा था कि वह समय आ गया है, जब वह एकाध वर्ष छुट्टी ले कर या नौकरी छोड़ कर आराम कर सकती है और मां बनने की अपनी इच्छा पूरी कर सकती है. इसी आशय से एक दिन उस ने अनिल से बात भी चलाई थी, लेकिन वह यह कह कर टाल गया था कि ‘नहीं, अभी तो हमें बहुत कुछ करना है.’ यह ‘बहुत कुछ करना’ जो था, वह सुधा अच्छी तरह जानती थी.

वास्तव में अनिल यहां आ कर इतना ज्यादा भौतिकवादी हो गया था कि दिनरात रुपए के पीछे भागता फिरता था. वे केवल 2 ही प्राणी थे. रहने को अच्छा बड़ा सा मकान था, जो सभी सुखसुविधाओं से सुसज्जित था. दोनों के पास गाडि़या थीं. अपना एक क्लीनिक भी था, लेकिन अनिल पर तो नर्सिंगहोम खोलने की धुन सवार थी. नर्सिंगहोम खोलने से सुधा ने कभी इनकार नहीं किया था, लेकिन वह अब थोड़ा आराम भी करना चाहती थी. उसे लगता था कि पिछले कितने वर्ष भागदौड़ में ही बीत गए हैं.

कभी चैन से छुट्टियां बिताने का भी समय दोनों को नहीं मिल पाया. वैसे भी सुधा अब वास्तव में मातृत्व का सुख भी लेना चाहती थी.  प्राय: जब अनिल क्लीनिक से घर लौटने में देर कर देता तो सुधा अकेली बैठीबैठी यही सब सोचा करती कि कैसी मशीनी जिंदगी जी रहे हैं, वे लोग. बाहर से थक कर आओ तो घर का काम करना होता था. अपने लिए तो कोई समय ही नहीं बचता था. रोज ही वह सोचती कि अनिल से बात करेगी पर हर रोज अनिल किसी न किसी बहाने से बच्चे की बात को टाल जाता.

धीरेधीरे सुधा की शादी को 8 साल बीत गए. पहले पढ़ाईलिखाई के कारण ही उस ने विवाह औसत आयु की अपेक्षा देर से किया था. फिर काम और अनिल की बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के कारण वह अपनी इच्छा को पूरा नहीं कर पाई थी, लेकिन एक डाक्टर होने के नाते अब वह जानती थी कि वैसे ही बच्चे को जन्म देने की दृष्टि से उस की आयु बढ़ती जा रही है. दूसरी ओर अनिल की ओर से कोई उत्साह भी नहीं दिखाई देता था. अंत में उस ने यही तय किया कि वह अनिल से साफसाफ कह देगी कि उस के नर्सिंगहोम और दूसरी इच्छाओं की खातिर वह अपने अरमानों का गला नहीं घोंटेगी. वह अब और अधिक प्रतीक्षा नहीं करेगी.

अनिल जब रात को लौटा तो सुधा टीवी के सामने बैठी उस की प्रतीक्षा कर रही थी. अनिल ने जब आराम से खाना वगैरह खा लिया तो सुधा ने धीरेधीरे बात आरंभ की, लेकिन अनिल ने उत्साह दिखाना तो दूर, उसे फटकार दिया, ‘‘यह  क्या बेवकूफी भरी हरकत है. Mother’s Day Special- निश्चय: क्या सुधा ने लिया मातृत्व का गला घोंटने का फैसला? अपने इलाके में एक शानदार नर्सिंगहोम खोलना है, जिस में तुम्हारी सहायता की आवश्यकता भी होगी. अभी कम से कम 3 साल तक इस विषय में सोचना भी असंभव है.’’

सुधा की अवस्था एक चोट खाई हुई नागिन जैसी हो गई. वह चिल्ला कर बोली, ‘‘भाड़ में जाए तुम्हारी सफलता, तुम्हारा पैसा और भाड़ में जाए नर्सिंगहोम…मुझे नहीं चाहिए यह सब- कुछ…  बात बिगड़ते देख कर अनिल ने बड़ी चतुराई से स्थिति को संभालने की कोशिश की. सुधा को पुचकार कर समझाने लगा और अपनी ओर से पूरा प्रयत्न कर के उसे शांत किया.

इस झगड़े के लगभग 4 महीने पश्चात एक दिन सुधा को लगा कि वह गर्भवती है. इस बात से वह बहुत प्रसन्न थी. डाक्टर से जांच करवाने के पश्चात ही वह अनिल को यह समाचार देना चाहती थी. वह एक दोपहर अपने ही अस्पताल की डाक्टर के पास जांच करवाने गई. जांच रिपोर्ट ने यही बताया कि अब वह मां बनने वाली है. शाम को जब सुधा घर आई तो वह अपने को रोक नहीं पा रही थी. उस ने 2 बार रिसीवर उठाया कि अनिल को बताए, लेकिन फिर यह सोच कर रुक गई कि यदि वह फोन पर बता देगी तो अनिल के चेहरे पर आने वाले खुशी और आनंद के भावों को कैसे देख सकेगी.

रात को जब अनिल घर आया तो सुधा ने उसे बड़े उत्साह से यह खुशखबरी सुनाई. अनिल तो सुन कर भौचक्का रह गया. वह गुस्से से बोला, ‘‘तुम्हें ऐसा करने को किस ने कहा था? मेरी सारी योजनाओं को तुम ने मिट्टी में मिला दिया. कोई जरूरत नहीं, अभी इस की. कल जा कर गर्भपात करवा लो. मैं डाक्टर से समय ले दूंगा.’’

इतना सुनते ही सुधा चीख कर बोली, ‘‘मैं इस बच्चे को जन्म दूंगी. मैं ने कितनी प्रतीक्षा के बाद इसे पाया है. इतने चाव से इस की प्रतीक्षा की और आज मैं इस की हत्या कर दूं? ऐसा कभी नहीं हो सकता.’’

अनिल बोला, ‘‘तुम यह तो सोचो कि इस से मुझे कितनी मुश्किल होगी. कम से कम 1 साल तक तो तुम बंध ही जाओगी और मुझे तुम्हारे होते हुए दूसरे डाक्टरों की नियुक्ति करनी पड़ेगी. तुम तो जानती ही हो कि यहां डाक्टरों को कितना ज्यादा वेतन देना पड़ता है. मैं ने तुम से कहा था कि हमें अभी किसी बच्चे की कोई आवश्यकता नहीं है…अभी हमारे पास फुरसत ही कहां है, इन सब झमेलों के लिए.’’

‘‘आवश्यकता तो मुझे है…मेरा मन करता है कि मैं भी मां बनूं. मेरी भी इच्छा होती है कि एक नन्हामुन्ना बच्चा मेरे इस सूने, नीरस से घर और जीवन को अपनी मीठी आवाज और किलकारियों से भर दे,’’ सुधा बोली.

‘‘तो तुम नहीं जाओगी डाक्टर के पास?’’ अनिल ने क्रोध में भर कर पूछा.

‘‘हरगिज नहीं,’’ सुधा फिर चीखी.

‘‘तो फिर कान खोल कर सुन लो, अगर तुम इस बच्चे को रखना चाहती हो तो मुझे खोना होगा,’’ इतना कह कर अनिल घर का द्वार बंद कर बाहर चला गया.

कुछ क्षणों में ही अनिल की कार के स्टार्ट होने की आवाज आई. सुधा टूट कर पलंग पर गिर पड़ी और फूटफूट कर रोने लगी. सोचने लगी कि क्या करे, क्या न करे. उसे लगता कि 2 नन्हीनन्ही बांहें उस की ओर बढ़ रही हैं. उसे लगा, कोई नन्हा शिशु उस की गोद में आने को मचल रहा है. न जाने कब सुधा रोतेरोते कल्पना के जाल बुनतीबुनती सो गई. सवेरा हुआ तो वह उठी. रोज की भांति तैयार हुई और अपने अस्पताल की ओर चल पड़ी. दिन भर सोचती रही कि शायद अनिल का फोन आएगा या वह स्वयं आ कर उसे मना लेगा, लेकिन कोई फोन नहीं आया.

सुधा भारी मन से घर लौटी. देर तक टीवी देखने के बहाने अनिल का इंतजार करती रही, लेकिन अनिल घर ही नहीं आया. अगले दिन सवेरे अनिल आया और कुछ जरूरी सामान उठा कर बोला, ‘‘अगर तुम ने अपना फैसला नहीं बदला तो मेरी भी एक बात सुन लो, मैं भी अब इस घर में कभी कदम नहीं रखूंगा. मैं ने वहीं एक फ्लैट ले लिया है और वहीं रह कर अपना क्लीनिक संभालूंगा. बाद में नर्सिंगहोम का काम भी मैं खुद ही संभाल लूंगा. तुम्हारा और मेरा अब कोई संबंध नहीं है.’’

अनिल के जाते ही सुधा का निश्चय और भी पक्का हो गया. धीरेधीरे मन को समझाबुझा कर उस ने भी कामकाज में स्वयं को व्यस्त कर लिया. अगर कभी अनिल का खयाल आया भी तो उस ने अपनेआप को किसी न किसी बहाने से बहलाने की ही कोशिश की और स्वयं को किसी भी क्षण दुर्बल नहीं होने दिया. कभीकभार दोनों की मुलाकात हो भी जाती तो दोनों चुपचाप एकदूसरे से किनारा कर लेते. समय गुजरता गया. सुधा ने एक सुंदर, स्वस्थ बेटे को जन्म दिया. वह शिशु को पा कर बहुत प्रसन्न थी. अनिल के पास भी उस ने सूचना भिजवाई, लेकिन वह अपनी संतान को देखने भी नहीं आया.

अनिल अब दिनबदिन अधिक व्यस्त होता जा रहा था. उस के नर्सिंगहोम की ख्याति फैल रही थी. एक दिन अचानक अनिल को अपने नर्सिंगहोम से फोन आया. उसे जल्दी ही बुलाया गया था. एक महिला का गंभीर औपरेशन होना था. महिला दिल की मरीज थी और डाक्टरों ने उसे कहा था कि यदि वह बच्चा पैदा करने का साहस करेगी तो उस की जान को खतरा है.

वही महिला आज डाक्टर अनिल के पास गर्भावस्था में आ पहुंची थी. उस के बचने की संभावना बिलकुल नहीं थी. औपरेशन तो करना ही था, सो किया गया, लेकिन अनिल जच्चाबच्चा को न बचा सका. बड़ा ही दुखद दृश्य था. उस महिला का पति फूटफूट कर बच्चों की तरह रो रहा था. थोड़ी देर तक जी भर कर रो लेने के पश्चात जब उस का आवेग थोड़ा सा कम हुआ तो अनिल ने एक ही प्रश्न पूछा, ‘‘यदि तुम्हारी पत्नी गंभीर हालत में थी तो तुम ने उसे डाक्टर के मना करने पर भी ऐसा करने से रोका क्यों नहीं?’’

उस व्यक्ति ने भीगी आंखों से उत्तर दिया, ‘‘मेरी पत्नी जानती थी कि मुझे बच्चों से बहुत लगाव है. मैं आसपास के बच्चों को ही प्यार कर के अपना जी बहला लेता था.

‘‘आखिरी समय तक मैं उस से प्रार्थना करता रहा कि उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं और वह बच्चे को जन्म देने के योग्य नहीं, लेकिन वह मुझे प्रसन्न करने के लिए अकसर कहती, ‘यदि मैं मर भी गई तो यह बच्चा तो हम दोनों के प्यार और रिश्ते की यादगार के रूप में तुम्हारे पास रहेगा ही. मुझे इसी से बेहद खुशी मिलेगी.’

‘‘अंत में जिस बात के लिए उस ने इतना बड़ा बलिदान दिया, वह भी पूरी न हुई. न वह रही, न बच्चा. मैं उसे मना करता रहा, लेकिन उस ने मेरी एक न सुनी,’’ और वह व्यक्ति फिर रोने लगा.

अनिल भारी मन से घर आया. सहसा उसे अपनी सुधा की बहुत याद आने लगी. उस ने साहस बटोर कर घर के बाहर खड़ी गाड़ी स्टार्ट की और सुधा के घर के सामने जा पहुंचा. अनिल ने दरवाजे पर लगी घंटी बजाई. थोड़ी देर में दरवाजा खुला. सुधा अवाक् अनिल को देखती रह गई. कुछ क्षणों तक दोनों उसी अवस्था में खड़े रहे. फिर धीरे से अनिल ने कहा, ‘‘माफी यहीं से ही मांग लूं या अंदर आने की मुझे अनुमति है?’’ थोड़ी देर के लिए सुधा कुछ सोचती रही. फिर दरवाजा छोड़ कर उस ने अनिल के अंदर आने के लिए रास्ता बना दिया.

Mother’s Day Special- प्रश्नों के घेरे में मां: भाग 1

अरु भाभी और शशांक भैया के चेहरे के उठतेगिरते भावों को पढ़तेपढ़ते मैं सोच रही थी कि बंद मुट्ठी में रेत की तरह जब सबकुछ फिसल जाता है तब क्यों इनसान चेतता है?

बीच में ही बात काटते हुए शशांक बोल पडे़ थे, ‘नहीं डाक्टर अवस्थी, ऐसा नहीं कि हम लोग निधि को प्यार नहीं करते या हमेशा उसे मारतेपीटते ही रहते हैं. समस्या तो यह है कि निधि बहुत गंदी बातें सीख रही है.’

नन्ही निधि का छोटा सा बचपन मेरी आंखों के सामने कौंध उठा. घटनाएं चलचित्र की तरह आंखों के परदे पर आजा रही थीं.

उस दिन तेज बरसात हो रही थी. ओले भी गिर रहे थे. पड़ोस के मकान से जोरजोर से आती आवाजें सुन कर मेरा दिल दहल उठा. शशांक कह रहे थे, ‘बदमिजाज लड़की, साफसाफ बता, क्या चाहती है तू? क्या इस नन्ही सी जान की जान लेना चाहती है. छोटी बहन आई है यह नहीं कि खुद को सीनियर समझ कर उस की देखभाल करे. हर समय मारपीट पर ही उतारू रहती है.’

कमरे में गूंजती बेरहम आवाजें बाहर तक सुनाई पड़ रही थीं. निधि की कराह के साथ पूरे वेग से फूटती रुलाई को साफसाफ सुना जा सकता था.

‘पापा प्लीज, मुझे मत मारो. ऐसा मैं ने किया क्या है?’

‘पूरा का पूरा रोटी का टुकड़ा सीमा के मुंह में ठूंस दिया और पूछती है किया क्या है? देखा नहीं कैसे आंखें फट गई थीं उस बेचारी की?’

‘पापा, मैं ने सोचा सब ने नाश्ता कर लिया है. गुड्डी भूखी होगी,’ रोंआसी आवाज में अंदर की ताकत बटोरते हुए निधि ने सफाई सी दी.

‘एक माह की बच्ची रोटी खाएगी, अरी, अक्ल की दुश्मन, वह तो सिर्फ मां का दूध पीती है,’ आंखें तरेरते हुए शशांक बिफर उठे और एक थप्पड़ निधि के गाल पर जड़ दिया.

उस घर में जब से सीमा का जन्म हुआ था. ऐसा अकसर होने लगा था और वह बेचारी पिट जाती थी.

निधि का आर्तनाद सुन कर मैं सोचती कि ये कैसे मांबाप हैं जो इतना भी नहीं समझ पाते कि ऐसा क्रूर और कठोर व्यवहार बच्चे की कोमल भावनाओं को समाप्त करता चला जाएगा.

निधि बचपन से ही मेरे घर आया करती थी. जिस दिन अरु अस्पताल से सीमा को ले कर घर आई, वह बेहद खुश थी. दादी की मदद ले कर अपने नन्हेनन्हे हाथों से उस ने पूरे कमरे में रंगबिरंगे खिलौने सजा दिए.

सीमा का नामकरण संस्कार संपन्न हुआ. मेहमान अपनेअपने घर चले गए थे. परिवार के लोग बैठक में जमा हो कर गपशप में मशगूल थे. निधि भी सब के बीच बैठी हुई थी. अचानक अपनी गोलगोल आंखें मटका कर बालसुलभ उत्सुकता से उस ने मां की तरफ देख कर पूछ लिया, ‘मां, मेरा भी नामकरण ऐसे ही हुआ था?’

‘ऊं हूं,’ चिढ़ाने के लिए उस ने कहा, ‘तुम्हें तो मैं फुटपाथ से उठा कर लाई थी.’

निधि को विश्वास नहीं हुआ तो दोबारा प्रश्न किया, ‘सच, मम्मी?’

अरु ने निधि की बात को सुनी- अनसुनी कर सीमा के नैपीज और फीडर उठाए और अपने कमरे में चली गई.

अगले दिन 10 बजे तक जब निधि सो कर नहीं उठी, तब अरु का ध्यान बेटी की तरफ गया. उस ने जा कर देखा तो पता चला कि तेज बुखार से निधि का पूरा शरीर तप रहा था. आंखों के डोरे लाल थे. कपोलों पर सूखे आंसुओं की परत जमा थी. अरु ने पुचकार कर पूछा, ‘तबीयत खराब है या किसी ने कुछ कहा है?’

निधि ने मां की किसी भी बात का उत्तर नहीं दिया.

निधि का बुखार तो ठीक हो गया पर अब वह हर समय गुमसुम सी बैठी रहती थी. घर में वह न तो किसी से कुछ कहती, न ज्यादा बात ही करती थी. अपने कमरे में पड़ीपड़ी घंटों किताब के पन्ने पलटती रहती. घर के सभी सदस्य यही समझते कि निधि पहले से ज्यादा मन लगा कर पढ़ने लगी है.

एक दिन सीमा को तेज बुखार चढ़ गया. दादी और शशांक दोनों घर पर नहीं थे. अरु समझ नहीं पा रही थी कि सीमा को ले कर कैसे डाक्टर के पास जाए. तभी निधि स्कूल से आ गई. उसे भी हरारत के साथ खांसीजुकाम था. अरु सीमा को निधि के हवाले कर डाक्टर के पास दवाई लेने चली गई. वापस लौटी तो सीमा के लिए ढेर सारी दवाइयां और टानिक थे पर उस में निधि के लिए कोई दवा नहीं थी.

शाम को शशांक और दादी लौट आए. कोई सीमा की पेशानी पर हाथ रखता, कोई गोदी में ले कर पुचकारता. मां पानी की पट्टियां सीमा के माथे पर रखती जा रही थीं पर किसी ने निधि की ओर ध्यान नहीं दिया.

शाम को सीमा थोड़ी ठीक हुई तो अरु उसे गोद में ले कर बालकनी में आ गई. मैं भी कुछ पड़ोसिनों के साथ अपनी बालकनी में बैठी थी. अचानक निधि ने एक छोटा सा पत्थर उठा कर नीचे फेंक दिया तो प्रतिक्रिया में अरु जोर से चिल्लाई, ‘निधि, चल इधर, वहां क्या देख रही है? छत से पत्थर क्यों फेंका?’

अरु की तेज आवाज सुन कर मेरे साथ बैठी एक पड़ोसिन ने कहा, ‘रहने दीजिए भाभीजी, बच्चा है.’

‘ऐसे ही तो बच्चे बिगड़ते हैं. यदि अभी से नहीं रोका तो सिर पर चढ़ कर बोलेगी,’ अरु की आवाज में चिड़- चिड़ापन साफ झलक रहा था.

मैं निधि के बारे में सोचने लगी थी कि उसे भी तो सीमा की तरह बुखार था. उस का भी तो मन कर रहा होगा कोई उसे पुचकारे, उस की तबीयत के बारे में पूछे. क्योंकि सीमा के जन्म से पहले उस के शरीर पर लगी छोटी सी खरोंच भी पूरे परिवार को चिंता में डाल देती थी. लेकिन इस समय सभी सीमा की तबीयत को ले कर चिंतित थे और निधि को अपने घर वालों की उपेक्षा बरदाश्त नहीं हो पा रही थी.

विदाई: क्या कविता को नीरज का प्यार मिला?

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विदाई- भाग 2: क्या कविता को नीरज का प्यार मिला?

उस ने आगे बढ़ कर अपनी पत्नी को बांहों में भर लिया. कविता अचानक हिचकियां ले कर रोने लगी. नीरज की आंखों से भी आंसू बह रहे थे.

कविता के शरीर ने जब कांपना बंद कर दिया तब नीरज ने उसे अपनी बांहों के घेरे से मुक्त किया. अब तक अपनी मजबूत इच्छाशक्ति का सहारा ले कर उस ने खुद को काफी संभाल भी लिया था.

‘‘मेरे सामने यह रोनाधोना नहीं चलेगा, जानेमन,’’ उस ने मुसकरा कर कविता के गाल पर चुटकी भरी, ‘‘इन मुसीबत के क्षणों को भी हम उत्साह, हंसीखुशी और प्रेम के साथ गुजारेंगे. यह वादा इसी वक्त तुम्हें मुझ से करना होगा, कविता.’’

नीरज ने अपना हाथ कविता के सामने कर दिया.

कविता शरमाते हुए पहली बार सहज ढंग से मुसकराई और उस ने हाथ बढ़ा कर नीरज का हाथ पकड़ लिया.

उस रात नीरज अपनी ससुराल में रुका. दोनों ने साथसाथ खाना खाया. फिर देर रात तक हाथों में हाथ ले कर बातें करते रहे.

भविष्य के बारे में कैसी भी योजना बनाने का अवसर तो नियति ने उन से छीन ही लिया था. अतीत की खट्टीमीठी यादों को ही उन दोनों ने खूब याद किया.

सुहागरात, शिमला में बिताया हनीमून, साथ की गई खरीदारी, देखी हुई जगहें, आपसी तकरार, प्यार में बिताए क्षण, प्रशंसा, नाराजगी, रूठनामनाना और अन्य ढेर सारी यादों को उन्होंने उस रात शब्दों के माध्यम से जिआ.

हंसतेमुसकराते, आंसू बहाते वे दोनों देर रात तक जागते रहे. कविता उसे यौन सुख देने की इच्छुक भी थी पर कैंसर ने इतना तेज दर्द पैदा किया कि उन का मिलन संभव न था.

अपनी बेबसी पर कविता की रुलाई फूट पड़ी. नीरज ने बड़े सहज अंदाज में पूरी बात को लिया. वह तब तक कविता के सिर को सहलाता रहा जब तक वह सो नहीं गई.

‘‘मैं तुम्हारी अंतिम सांस तक तुम्हारे पास हूं, कविता. इस दुनिया से तुम्हारी विदाई मायूसी व शिकायत के साथ नहीं बल्कि प्रेम व अपनेपन के एहसास के साथ होगी, यह वादा है मेरा तुम से,’’ नींद में डूबी कविता से यह वादा कर के ही नीरज ने सोने के लिए अपनी आंखें बंद कीं.

अगले दिन सुबह नीरज और कविता 2 कमरों वाले एक फ्लैट में  रहने चले आए. यह खाली पड़ा फ्लैट नीरज के एक पक्के दोस्त रवि का था. रवि ने फ्लैट दिया तो अन्य दोस्तों व आफिस के सहयोगियों ने जरूरत के दूसरे सामान भी फ्लैट में पहुंचा दिए.

नीरज ने आफिस से लंबी छुट्टी ले ली. जहां तक संभव होता अपना हर पल वह कविता के साथ गुजारने की कोशिश करता.

उन से मिलने रोज ही कोई न कोई घर का सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त आ जाते. सभी अपनेअपने ढंग से सहानुभूति जाहिर कर उन दोनों का हौसला बढ़ाने की कोशिश करते.

नीरज की समझ में एक बात जल्दी ही आ गई कि हर सहानुभूतिपूर्ण बातचीत के बाद वह दोनों ही उदासी और निराशा का शिकार हो जाते थे. शब्दों के माध्यम से शरीर या मन की पीड़ा को कम करना संभव नहीं था.

इस समझ ने नीरज को बदल दिया. कविता का ध्यान उस की घातक बीमारी पर से हटा रहे, इस के लिए उस ने ज्यादा सक्रिय उपायों को इस्तेमाल में लाने का निर्णय किया.

उसी शाम वह बाजार से लूडो और कैरमबोर्ड खरीद लाया. कविता को ये दोनों ही खेल पसंद थे. जब भी समय मिलता दोनों के बीच लूडो की बाजी जम जाती.

एक सुबह रसोई में जा कर नीरज ने कविता से कहा, ‘‘मुझे भी खाना बनाना सिखाओ, मैं चाय बनाने के अलावा और कुछ जानता ही नहीं.’’

‘‘अच्छा, खाना बनाना सीखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी जनाब,’’ कविता उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए मुसकराई.

‘‘मैडमजी, मैं पूरी लगन से सीखूंगा.’’

‘‘मेरी डांट भी सुननी पड़ेगी.’’

‘‘मुझे मंजूर है.’’

‘‘तब पहले सब्जी काटना सीखो,’’ कविता ने 4 आलू मजाकमजाक में नीरज को पकड़ा दिए.

नीरज तो सचमुच आलुओं को धो कर उन्हें काटने को तैयार हो गया. कविता ने उसे रोकना भी चाहा, पर वह नहीं माना.

उसे ढंग से चाकू पकड़ना भी कविता को सिखाना पड़ा. नीरज ने आलू के आड़ेतिरछे टुकड़े बड़े ध्यान से काटे. दोनों ने ही इस काम में खूब मजा लिया.

‘‘अब मैं तुम्हें खिलाऊंगा आलू के पकौड़े,’’ नीरज की इस घोषणा को सुन कर कविता ने इतनी तरह की अजीबो- गरीब शक्लें बनाईं कि उस का हंसतेहंसते पेट दुखने लगा.

नीरज ने बेसन खुद घोला. तेल की कड़ाही के सामने खुद ही जमा रहा. कविता की सहायता व सलाह लेना उसे मंजूर था, पर पकौड़े बनाने का काम उसी ने किया.

उस दिन के बाद से नीरज भोजन बनाने के काम में कविता का बराबर हाथ बंटाता. कविता को भी उसे सिखाने में बहुत मजा आता. रसोई में साथसाथ बिताए समय के दौरान वह अपना दुखदर्द पूरी तरह भूल जाती.

‘‘मैं नहीं रहूंगी, तब भी आप कभी भूखे नहीं रहोगे. बहुत कुछ बनाना सीख गए हो अब आप,’’ एक रात सोने के समय कविता ने उसे छेड़ा.

‘‘तुम से मैं ने यह जो खाना बनाना सीखा है, शायद इसी की वजह से ऐसा समय कभी नहीं आएगा, जो तुम मेरे साथ मेरे दिल में कभी न रहो,’’ नीरज ने उस के होंठों को चूम लिया.

नीरज से लिपट कर बहुत देर तक खामोश रहने के बाद कविता ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘आप के प्यार के कारण अब मुझे मौत से डर नहीं लगता है.

‘‘जिस से जानपहचान नहीं उस से डरना क्या. जीवन प्रेम से भरा हो तो मौत के बारे में सोचने की फुरसत किसे है,’’ नीरज ने इस बार उस की आंखों को बारीबारी से चूमा.

‘‘आप बहुत अच्छे हो,’’ कविता की आंखें नम होने लगीं.

‘‘थैंक यू. देखो, अगर मैं तुम्हारी तारीफ करने लगा तो सुबह हो जाएगी. कल अस्पताल जाना है. अब तुम आराम करो,’’ अपनी हथेली से नीरज ने कविता की आंखें मूंद दीं.

कुछ ही देर में कविता गहरी नींद के आगोश में पहुंच गई. नीरज देर तक उस के कमजोर पर शांत चेहरे को प्यार से निहारता रहा.

हर दूसरे दिन नीरज अपने किसी दोस्त की कार मांग लाता और कविता को उस की सहेलियों व मनपसंद रिश्तेदारों से मिलाने ले जाता. कभीकभी दोनों अकेले किसी उद्यान में जा कर हरियाली व रंगबिरंगे फूलों के बीच समय गुजारते. एकदूसरे का हाथ थाम कर अपने दिलों की बात कहते हुए समय कब बीत जाता उन्हें पता ही नहीं चलता.

नीरज कितनी लगन व प्रेम से कविता की देखभाल कर रहा है, यह किसी की नजरों से छिपा नहीं रहा. कविता के मातापिता व भाई हर किसी के सामने नीरज की प्रशंसा करते न थकते.

नीरज के अपने मातापिता को उस का व्यवहार समझ में नहीं आता. वे उस के फ्लैट से हमेशा चिंतित व परेशान से हो कर लौटते.

विदाई- भाग 1: क्या कविता को नीरज का प्यार मिला?

नीरज 3 महीने की टे्रनिंग के लिए दिल्ली से मुंबई गया था पर उसे 2 माह बाद ही वापस दिल्ली लौटना पड़ा था.

‘‘कविता की तबीयत बहुत खराब है. डा. विनिता कहती हैं कि उसे स्तन कैंसर है. तुम फौरन यहां आओ,’’ टेलीफोन पर अपने पिता से पिछली शाम हुए इस वार्त्तालाप पर नीरज को विश्वास नहीं हो रहा था.

कविता और उस की शादी हुए अभी 6 महीने भी पूरे नहीं हुए थे. सिर्फ 25-26 साल की कम उम्र में कैंसर कैसे हो गया? इस सवाल से जूझते हुए नीरज का सिर दर्द से फटने लगा था.

एअरपोर्ट से घर न जा कर नीरज सीधे डा. विनिता से मिलने पहुंचा. इस समय उस का दिल भय और चिंता से बैठा जा रहा था.

डा. विनिता ने जो बताया उसे सुन कर नीरज की आंखों से आंसू झरने लगे.

‘‘तुम्हें तो पता ही है कि कविता गर्भवती थी. उसे जिस तरह का स्तन कैंसर हुआ है, उस का गर्भ धारण करने से गहरा रिश्ता है. इस तरह का कैंसर कविता की उम्र वाली स्त्रियों को हो जाता है,’’ डा. विनिता ने गंभीर लहजे में उसे जानकारी दी.

‘‘अब उस का क्या इलाज करेंगे आप लोग?’’ अपने आंसू पोंछ कर नीरज ने कांपते स्वर में पूछा.

बेचैनी से पहलू बदलने के बाद डा. विनिता ने जवाब दिया, ‘‘नीरज, कविता का कैंसर बहुत तेजी से फैलने वाला कैंसर है. वह मेरे पास पहुंची भी देर से थी. दवाइयों और रेडियोथेरैपी से मैं उस के कैंसर के और ज्यादा फैलने की गति को ही कम कर सकती हूं, पर उसे कैंसरमुक्त करना अब संभव नहीं है.’’

‘‘यह आप क्या कह रही हैं? मेरी कविता क्या बचेगी नहीं?’’ नीरज रोंआसा हो कर बोला.

‘‘वह कुछ हफ्तों या महीनों से ज्यादा हमारे साथ नहीं रहेगी. अपनी प्यार भरी देखभाल व सेवा से तुम्हें उस के बाकी बचे दिनों को ज्यादा से ज्यादा सुखद और आरामदायक बनाने की कोशिश करनी होगी. कविता को ले कर तुम्हारे घर वालों का आपस में झगड़ना उसे बहुत दुख देगा.’’

‘‘यह लोग आपस में किस बात पर झगड़े, डाक्टर?’’ नीरज चौंका और फिर ज्यादा दुखी नजर आने लगा.

‘‘कैंसर की काली छाया ने तुम्हारे परिवार में सभी को विचलित कर दिया है. कविता इस समय अपने मायके में है. वहां पहुंचते ही तुम्हें दोनों परिवारों के बीच टकराव के कारण समझ में आ जाएंगे. तुम्हें तो इस वक्त बेहद समझदारी से काम लेना है. मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं,’’ नीरज की पीठ अपनेपन से थपथपा कर डा. विनिता ने उसे विदा किया.

ससुराल में कविता से मुलाकात करने से पहले नीरज को अपने सासससुर व साले के कड़वे, तीखे और अपमानित करने वाले शब्दों को सुनना पड़ा.

‘‘कैंसर की बीमारी से पीडि़त अपनी बेटी को मैं ने धोखे से तुम्हारे साथ बांध दिया, तुम्हारे मातापिता के इस घटिया आरोप ने मुझे बुरी तरह आहत किया है. नीरज, मैं तुम लोगों से अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता हूं,’’ गुस्से में उस के ससुर ने अपना फैसला सुनाया.

‘‘इस कठिन समय में उन की मूर्खतापूर्ण बातों को आप दिल से मत लगाइए,’’ थकेहारे अंदाज में नीरज ने अपने ससुर से प्रार्थना की.

‘‘इस कठिन समय को गुजारने के लिए तुम सब हमें अकेले छोड़ने की कृपा करो. बस,’’ उस के साले ने नाटकीय अंदाज में अपने हाथ जोड़े.

‘‘तुम भूल रहे हो कि कविता मेरी पत्नी है.’’

‘‘आप जा कर अपने मातापिता से कह दें कि हमें उन से कैसी भी सहायता की जरूरत नहीं है. अपनी बहन का इलाज मैं अपना सबकुछ बेच कर भी कराऊंगा.’’

‘‘देखिए, आप लोगों ने आपस में एकदूसरे से झगड़ते हुए क्याक्या कहा, उस के लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं. मेरी गृहस्थी उजड़ने की कगार पर आ खड़ी हुई है. कविता से मिलने को मेरा दिल तड़प रहा है…उसे मेरी…मेरे सहारे की जरूरत है. प्लीज, उसे यहां बुलाइए,’’ नीरज की आंखों से आंसू बहने लगे.

नीरज के दुख ने उन के गुस्से के उफान पर पानी के छींटे मारने का काम किया. उस की सास पास आ कर स्नेह से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं.

अब उन सभी की आंखों में आंसू छलक उठे.

‘‘कविता की मौसी उसे अपने साथ ले कर गई हैं. वह रात तक लौटेंगी. तुम तब तक यहां आराम कर लो,’’ उस की सास ने बताया.

अपने हाथों से मुंह कई बार पोंछ कर नीरज ने मन के बोझिलपन को दूर करने की कोशिश की. फिर उठ कर बोला, ‘‘मैं अभी घर जाता हूं. रात को लौटूंगा. कविता से कहना कि मेरे साथ घर लौटने की तैयारी कर के रखे.’’

आटोरिकशा पकड़ कर नीरज घर पहुंचा. उस का मन बुझाबुझा सा था. अपने मातापिता के रूखे स्वभाव को वह अच्छी तरह जानता था इसलिए उन्हें समझाने की उस ने कोई कोशिश भी नहीं की.

कविता की जानलेवा बीमारी की चर्चा छिड़ते ही उस की मां ने गुस्से में अपने मन की बात कही, ‘‘तेरी ससुराल वालों ने हमें ठग कर अपनी सिरदर्दी हमारे सिर पर लाद दी है, नीरज. कविता के इलाज की भागदौड़ और उस की दिनरात की सेवा हम से नहीं होगी. अब उसे अपने मायके में ही रहने दे, बेटे.’’

‘‘तेरे सासससुर ने शादी में अच्छा दहेज देने का मुझे ताना दिया है. सुन, अपनी मां से कविता के सारे जेवर ले जा कर उन्हें दे देना,’’ नीरज के पिता भी तेज गुस्से का शिकार बने हुए थे.

नीरज की छोटी बहन वंदना ने जरूर उस के साथ कुछ देर बैठ कर अपनी आंखों से आंसू बहाए पर कविता को घर लाने की बात उस ने भी अपने मुंह से नहीं निकाली.

अपने कमरे में नीरज बिना कपड़े बदले औंधे मुंह बिस्तर पर गिर पड़ा. इस समय वह अपने को बेहद अकेला महसूस कर रहा था. अपने घर व ससुराल वालों के रूखे व झगड़ालू व्यवहार से उसे गहरी शिकायत थी.

उस के अपने घर वाले बीमार कविता को घर में रखना नहीं चाहते थे और ससुराल में रहने पर नीरज का अपना दिल नहीं लगता. वह कविता के साथ रह कर कैसे यह कठिन दिन गुजारे, इस समस्या का हल खोजने को उसे काफी माथापच्ची करनी पड़ी.

उस रात कविता से नीरज करीब 2 माह बाद मिला. उसे देख कर नीरज को मन ही मन जबरदस्त झटका लगा. उस की खूबसूरत पत्नी का रंगरूप मुरझा गया था.

गुलदारनी – भाग 2 : चालाक शिकारी की कहानी

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : जटपुर गांव के आसपास के जंगलों में एक मादा गुलदारनी का खौफ था. इस गांव में ब्याह कर आई स्वाति का भी अपनी ससुराल में दबदबा था. उस ने गांव के चौधरी राम सिंह को अपनी तरफ कर लिया था. वह गांव के मनचलों के साथ भी सैल्फी खिंचवाती थी. इस बीच स्वाति के पति नरदेव पर छेड़छाड़ करने का आरोप लगा. स्वाति ने चौधरी राम सिंह को यह मामला सुलझाने के लिए कहा. अब पढि़ए आगे…

बाबूराम ने चौधरी राम सिंह की बात का मान रखते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप की पगड़ी का मान रख रहा हूं, नहीं तो थाने में रिपोर्ट लिखवा कर नरदेव को जेल भिजवा कर ही दम लेता. बस चौधरी साहब, हमारा भी इतना मान रख लो कि नरदेव से माफी मंगवा दो.’’

रात के साए में चौधरी राम सिंह स्वाति और नरदेव को ले कर बाबूराम के घर पहुंचे. नरदेव ने बाबूराम से माफी मांग ली और आइंदा कभी ऐसी हरकत न करने की कसम खाई. सब ने यही समझा कि नरदेव के माफी मांगने से पहले ही मामले का खात्मा हो गया.

चौधरी राम सिंह भी मामले को निबटा समझ कर यही सोच रहे थे कि अब तो स्वाति उन के एहसान तले दब जाएगी और उन के फंदे में फंस जाएगी, लेकिन स्वाति फंदे में फंसने वाली कहां थी. वह उन्हें तरसाती रही.

उस रात चौधरी राम सिंह को खबर मिली कि जंगल में ‘गुलदारनी’ ने एक पिंजरा और पलट दिया है, लेकिन जंगल महकमे का अफसर भी उसे पकड़ने पर आमादा था. उस का मानना है कि बकरे की अम्मां कब तक खैर मनाएगी. आज नहीं तो कल पिंजरे में फंस कर रहेगी.

उधर गांव के खिलाड़ी लड़कों को जब यह पता चला कि स्वाति भाभी और नरदेव भैया का बाबूराम से कोई पंगा हो गया है और वे परेशानी में हैं तो उन अल्हड़ लड़कों ने बिना सोचेसमझे स्वाति भाभी को खुश करने के लिए बाबूराम के बेटे कुंदन की धुनाई कर दी.

यह खबर सुन कर स्वाति बहुत खुश हुई. उस ने लड़कों को बुलवा कर उन के साथ सैल्फी ली और उन्हें मिठाई खिलाई.

लेकिन ऐसा करते हुए स्वाति भूल गई कि बाबूराम का नासूर अभी हरा है. जब बाबूराम को यह पता चला कि कुंदन की पिटाई करने वाले लड़कों को स्वाति ने मिठाई खिलाई है, तो वह आगबबूला हो गया. उसे लगा कि स्वाति ने उसे बेवकूफ बनाया है. एक ओर तो नरदेव से माफी मंगवा दी, वहीं दूसरी ओर उस के लड़के को पिटवा दिया.

इस मामले को सुलझाने में भी एक बार फिर चौधरी राम सिंह काम आए. उन्होंने समझाबुझा कर किसी तरह बाबूराम को शांत किया.

लेकिन स्वाति और नरदेव से भी जलने वाले कम न थे. उन का पड़ोसी हरिया उन से खूब जलता था. हरिया का नरदेव से किसी न किसी बात पर पंगा होता ही रहता था. कोई भी एकदूसरे को नीचा दिखाने का मौका नहीं चूकता था. स्वाति के बढ़ते दबदबे से भी हरिया चिंतित रहता था.

नरदेव पर लगा छेड़खानी का आरोप हरिया के लिए स्वाति और नरदेव को नीचा दिखाने का सुनहरा मौका था. वह उन की गांवभर में बदनामी तो कर ही रहा था, मामले को किसी तरह दबने भी नहीं देना चाहता था. उस ने बाबूराम की कमजोर नब्ज पकड़ी.

हरिया दारू की बोतल ले कर बाबूराम के चबूतरे पर पहुंचा. नमकीन की थैली उस ने कुरते की जेब में ठूंस रखी थी.

हरिया के हाथ में बोतल देख कर बाबूराम की आंखें चमक उठीं, ‘‘क्या ले आया रे हरिया आज?’’

‘‘कुछ नहीं, बस लालपरी है. सोचा, बहुत दिन हो गए बड़े भैया के साथ दो घूंट लगा लूं.’’

यह सुन कर बाबूराम हरिया के लिए चारपाई पर जगह बनाने के लिए ऊपर को खिसक गया.

‘‘बैठो, आराम से बैठो हरिया. यह तुम्हारा ही तो घर है.’’

‘‘हांहां, बाबूराम भैया. हम ने कब इसे गैरों का घर समझा है. यह तो तुम हो जो हमें मुसीबत में भी याद नहीं करते.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है हरिया, बस बात को क्या बढ़ाएं?’’

इसी बीच बाबूराम घर से 2 गिलास और नमकीन के लिए प्लेट ले आया और कोठरी का दरवाजा बंद कर दिया.

हरिया ने पैग बनाने शुरू किए और लालपरी का रंग धीरेधीरे बाबूराम पर चढ़ना शुरू हो गया.

मौका ताड़ कर हरिया ने पांसा फेंका, ‘‘बाबूराम भैया, हमारे और तुम्हारे संबंध बचपन से कितने गाढ़े हैं. तुम्हारी बेटी को नरदेव ने छेड़ा तो छुरी अपने दिल पर चल गई भैया. तुम्हारी बेटी हमारी बेटी भी तो है. तुम ने इस बेइज्जती को सहन कैसे कर लिया भैया?’’

‘‘हरिया, हम गरीब आदमी जो हैं. पुलिस का केस बन जाए तो दिनरात दौड़ना पड़ता है. पुलिस भी पैसे वालों और दमदार लोगों की सुनती है. बस, यही सोच कर हम रुक गए.’’

‘‘बाबूराम भैया, तुम पुलिस का चक्कर छोड़ो. गांव में पंचायत बिठवा दो. 5 जूते तो उस को अपनी बेटी से लगवा ही दो.’’

‘‘हरिया, मैं ने इस पर भी बहुत सोचविचार किया, लेकिन पंचायत के पंच कौन बनेंगे…? कौन जाने?’’

‘‘तो क्या भैया हम पर यकीन नहीं है? पंचायत में अपने पंच बनवाने का माद्दा तो हम भी रखते हैं.’’

‘‘तो ठीक है हरिया, तू ही बिसात बिछा. गांव वालों से बात कर. चौधरी से बात कर. वही कुछ कर सकते हैं. गांव में उन की धाक है. समझदार भी हैं और निष्पक्ष भी.’’

हरिया ने अगले दिन से ही स्वाति और नरदेव के खिलाफ गोटी बिछानी शुरू कर दी.

चौधरी राम सिंह के कानों में खबर पहुंची तो वे सीधे स्वाति के पास पहुंचे. उन्होंने स्वाति को चेताते हुए कहा, ‘‘स्वाति, पंचायत बैठ गई, तो बेइज्जती होगी. इस आग पर बिना पानी डाले काम न चलेगा. प्रधान तेजप्रताप न माना, तो पंचायत बैठ कर ही रहेगी.’’

‘‘तो फिर क्या करना होगा…?’’

‘‘प्रधान मेरे हाथ में नहीं है. उस की लगाम कसने की कोई तरकीब सोचो. यह सारी आग पंचायत की हरिया की लगाई हुई है.’’

स्वाति समझ गई कि चौधरी राम सिंह जितना इस मामले में कर सकते थे, उन्होंने कर लिया. प्रधान का शिकार किए बिना काम नहीं चलेगा.

स्वाति ने अपना दिमाग लड़ाया. प्रधान की पत्नी रत्नो से उस की बातचीत तो है, लेकिन दूसरा महल्ला होने के चलते उस का उधर कम ही आनाजाना है. स्वाति की जानकारी में था कि रत्नो देशी घी बड़ा अच्छा तैयार करती है. उसी का बहाना बना कर वह प्रधानजी के घर पहुंच गई.

‘‘स्वाति बेटी, तू किसी के हाथ खबर भिजवा देती तो मैं देशी घी तेरे घर ही पहुंचवा देती.’’

‘‘चाची, तुम्हारे दर्शन करे बहुत दिन हो गए थे. मैं ने सोचा तुम्हारे दर्शन कर लूं. आनेजाने से ही तो जानपहचान बढ़ती है.’’

‘‘हां, सो तो है. तू भी कोई दावत का इतंजाम कर. खुशखबरी सुना तो हम भी तेरे घर आएं.’’

‘‘यह भली कही चाचीजी. आज ही लो. शाम को प्रधानजी की और तुम्हारी दावत पक्की.’’

स्वाति को तो मौका मिलना चाहिए था. उस ने प्रधानजी और रत्नो की दावत का पूरा इंतजाम कर लिया.

स्वाति ने खूब अच्छे पकवान बनाए. प्रधानजी के बराबर में बैठ कर उन की खूब सेवा की. खाने के बाद चाय की प्याली पेश की गई.

स्वाति जानती थी कि खाने के वक्त ज्यादा बातें नहीं हो पातीं, लेकिन चाय का समय तो होता ही इन बातों के लिए है.

स्वाति ने दांव चला, ‘‘रत्नो चाची, ऐसा लगता है कि आप कभी बाहर घूमने नहीं जातीं?’’

‘‘यह बात प्रधानजी से कहा. हम कितना चाहते हैं कि हरिद्वार के दर्शन कर आएं, लेकिन ये कभी ले जाते ही नहीं.’’

अब तक प्रधानजी स्वाति के मोहपाश में फंस चुके थे. उन्होंने भी अपने तरकश से तीर निकाला, ‘‘स्वाति, तुम्हीं बताओ, क्या अकेले घूमना अच्छा लगता है. कोई साथ हो…’’

‘‘हम हैं न प्रधानजी. नरदेव और मैं चलूंगी आप दोनों के साथ. और हमारी कार किस काम आएगी,’’ स्वाति ने प्रधानजी की बात को लपकते हुए और उस का समाधान करते हुए कहा.

2 दिन बाद वे चारों हरिद्वार में घूम रहे थे. रात में फिल्म का शो देखा. होटल में ठहरे. सारा बंदोबस्त स्वाति का था. गंगा में चारों ने एक ही जगह स्नान किया. प्रधानजी न चाह कर भी कनखियों से स्वाति के भीगे कमसिन बदन को देखते रहे.

स्वाति सब समझ रही थी कि प्रधानजी मन हार चुके हैं. स्वाति ने जब देखा कि प्रधानजी उस की बात को अब ‘न’ नहीं करेंगे तो मौका देख कर कहा, ‘‘प्रधानजी, यह हरिया हमारा पुराना दुश्मन है. सारा मामला सुलझ गया तो पंचायत की बात उठा दी. अब आप ही बताओ कि क्या गांव में ऐसे बैर बढ़ाना चाहिए?’’

प्रधानजी तो स्वाति पर लट्टू हो चुके थे. स्वाति का दिल जीतने के लिए उन्होंने कहा, ‘‘स्वाति, मेरे होते हुए तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं. मेरे होते हुए पंचायत नहीं होगी. बाबूराम को मैं समझा दूंगा, हरिया को तुम देखो. वह अडि़यल बैल है. उस से मेरी नहीं बनती है.’’

स्वाति प्रधानजी के मुंह से यही तो सुनना चाहती थी. उस का ‘मिशन प्रधान’ कामयाब हुआ.

वे 3 दिन – भाग 1 : इंसान अपनी सोच से मौडर्न बनता है

‘‘मेरी प्यार बूआ, आप तो एकदम जंच रही हो, बिलकुल पंजाबी लड़कियों की तरह. पंजाबी सलवार… लिपस्टिक… क्या बात है,’’ नव्या ने दिल्ली से आई अपनी बूआ को कुहनी मारते हुए छेड़ा और फिर उन के गले लग गई और उन के गालों को चूम लिया.

नव्या की बूआ निकिता को उन के भैया ने कल फोन कर तुरंत बुढ़ाना आ जाने को कहा था.

‘हैलो निकिता, हम लोग 3 दिन के लिए शिमला जा रहे हैं. नव्या के फाइनल एग्जाम हैं और साथ में उस की तबीयत भी ठीक नहीं है. तुम हमारे पीछे से उस के पास आ जातीं, तो हमें परेशानी नहीं होती. अब जवान लड़की है, तो अकेले या आसपड़ोस वालों के भरोसे भी छोड़ कर जाने को मन नहीं मान रहा है.’

‘नहीं भाईसाहब, आप बिलकुल बेफिक्र हो कर जाइए, मैं कल सुबह की किसी बस से शाम तक वहां पहुंच जाऊंगी.’

‘‘क्या हुआ री नव्या तुझे? भाई साहब बता रहे थे कि तेरी तबीयत ठीक नहीं है,’’ निकिता बूआ ने आते ही चिंतित आवाज में पूछा, ‘‘और तू ने यह क्या पहन रखा है… यह फटी जींस और कटे शोल्डर वाला टौप. तुम यह सब कब से पहनने लगी?’’

‘‘अरे, कुछ नहीं बूआ, वही मंथली पीरियड…’’

‘‘मतलब, तू टाइम से है?’’ निकिता बूआ उछल कर खड़ी हो गईं और अपना गाल पोंछने लगीं, जहां पर एक मिनट पहले नव्या ने चूमा था. जैसे उन के गाल पर किसी ने कीचड़ मल दिया हो.

‘‘तेरी मां ने तुझे इतना भी नहीं सिखाया है कि इन दिनों में किसी नहाएधोए को छूना नहीं चाहिए. अब मुझे फिर से नहा कर आना पड़ेगा.’’

‘‘सौरी बूआ, आप पहले चाय तो ले लीजिए. मैं ने आप के लिए अदरक वाली चाय बना दी है और साथ में आप की पसंद के पालक के पकौड़े भी हैं,’’ बूआ का मूड अच्छा करने की गरज से नव्या ने बात बदलते हुए कहा.

‘‘तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या? 3 दिन रसोई में जाना तो दूर उस के आसपास भी नहीं फटकना चाहिए. तुझे लगता है कि मैं तेरे हाथ का छुआ पानी भी पीऊंगी?’’ अब निकिता बूआ की आवाज कुछ कठोर हो गई थी.

नव्या को बूआ के गरममिजाज और दकियानूसी विचारों के बारे में मालूम था, जो दिल्ली में रहते हुए भी मानो बुढ़ाना में रह रही थीं, पर उन का ऐसा रूप देखने का मौका पहली बार पड़ा था.

नव्या कुछ समय के लिए सहम गई, फिर माहौल को बदलने के लिए अपनी बूआ को लाड़ लड़ाते हुए उन का हाथ पकड़ कर उन्हें सोफे पर बिठाने लगी.

‘‘अरे, तुझे अभी तो मना किया था मुझे छूने को… पर तू है कि तुझे कोई बात समझ ही नहीं आ रही है,’’ बूआ चिल्लाईं.

‘‘बूआ, मुझे इन सब चीजों की आदत नहीं है न, तो बारबार भूल जाती हूं,’’ नव्या ने निकिता के कंधे से अपना हाथ हटा लिया और उन के साथसाथ खुद भी सोफे पर बैठ गई.

नव्या के बैठते ही बूआ फिर से तुनक गईं, ‘‘अगर ये 3 दिन तुम थोड़ेबहुत नियम मान लोगी, तो तुम पर आसमान टूट कर गिर जाएगा क्या?

‘‘अच्छा है, अम्मां यह सब देखने से पहले ही इस दुनिया से विदा हो गईं, नहीं तो वे यह सब देख कर जीतेजी मर जातीं. तेरी मां का राज आते ही पूरे घर में अपवित्रता आ गई.

‘‘मुझे कहना तो नहीं चाहिए, पर जिस घर में ऐसा पाप हो रहा हो, वहां कहां से कुलदीपक आता. अब चाहे देवीदेवताओं की लाख मन्नतें कर लो, कुछ हासिल नहीं होने वाला है, जब घर में ही ऐसा अनर्थ.

‘‘अम्मां थीं तब तक शहर से ब्याह कर आई तेरी संस्कारहीन मां को सबकुछ मानना पड़ा, चाहे डंडे के जोर पर ही. पर अब तो लगता है, यहां जंगल राज आ गया है.’’

निकिता बूआ इस बार 8-9 साल बाद बुढ़ाना आई थीं. घर का खाका ही बदल गया था. तख्त की जगह सोफा था, टीवी भी नया था.

अब तक सब्र से काम लेती हुई नव्या को भी गुस्सा आ गया. घर से निकलते हुए उस की मम्मी द्वारा दी गई सारी नसीहतों को भी वह भूल गई, क्योंकि अब बात उस की मम्मी के संस्कारों पर आ गई थी.

‘‘बूआ, मम्मी के संस्कारों की तो आप बात न ही करें तो बेहतर होगा. भूल गईं आप अपना समय… जब पहली बार अपने कपड़ों पर धब्बे देख कर कितना डर गई थीं आप.

आप को लगा था कि आप कैंसर जैसी किसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आ गई हैं. आप रोतेरोते दादी के पास गई थीं और पूजा करती हुई दादी ने आप के कपड़े देख कर आप को पुचकारने के बजाय अपने से दूर धकेल दिया था.

गुलदारनी – भाग 1: चालाक शिकारी की कहानी

इलाके में मादा गुलदार ताबड़तोड़ शिकार कर रही थी. न वह इनसानों को छोड़ रही थी, न जानवरों को. वह छोटेबड़े का शिकार करते समय कोई लिहाज नहीं करती थी.

वह अपने शिकार को बुरी तरह घसीटघसीट कर, तड़पातड़पा कर मारती थी.

जंगल महकमे के माहिरों के भी मादा गुलदार को पकड़ने की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं. वह इतनी चालाक शिकारी थी कि पिंजरे में फंसना तो दूर, वह पिंजरे को ही पलट कर भाग जाती थी. उसे ढूंढ़ने के लिए अनेक ड्रोन उड़ाए गए, लेकिन शिकार कर के वह कहां गुम हो जाती थी, किसी को पता ही नहीं चलता.

मादा गुलदार की चालाकी के किस्से इलाके में मशहूर हो गए. आसपास के गांव के लोग उसे ‘गुलदारनी’ कह कर पुकारने लगे.

जटपुर की रहने वाली स्वाति भी किसी ‘गुलदारनी’ से कम नहीं थी. वह कुछ साल पहले ही इस गांव में ब्याह कर आई थी. 6 महीने में ही उस ने अपने पति नरदेव समेत पूरे परिवार का मानो शिकार कर लिया था. नरदेव उस के आगेपीछे दुम हिलाए घूमता था.

सासससुर अपनी बहू स्वाति की अक्लमंदी के इतने मुरीद हो गए थे कि उन को लगता था कि पूरी दुनिया में ऐसी कोई दूसरी बहू नहीं. ननद तो अपनी भाभी की दीवानी हो गई थी. घर में स्वाति के और्डर के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था.

घर फतेह करने के बाद स्वाति ने धीरेधीरे बाहर भी अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. गांव में चौधरी राम सिंह की बड़ी धाक थी. इज्जत के मामले में कोई उन से बढ़ कर नहीं था. हर कोई सलाहमशवरा लेने के लिए उन की चौखट पर जाता. लंगोट के ऐसे पक्के कि किरदार पर एक भी दाग नहीं

एक दिन नरदेव और स्वाति शहर से खरीदारी कर के मोटरसाइकिल से लौट रहे थे. नरदेव ने रास्ते में चौधरी राम सिंह को पैदल जाते देखा, तो नमस्ते करने के लिए मोटरसाइकिल रोक ली.

स्वाति ने चौधरी राम सिंह का नाम तो खूब सुना था, पर वह उन्हें पहचानती नहीं थी.

नरदेव ने स्वाति से राम सिंह का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आप हमारे गांव के चौधरी राम सिंह हैं. रिश्ते में ये मेरे चाचा लगते हैं.’’

स्वाति के लिए इतना परिचय काफी था. उस की आंखों का आकर्षण किसी को भी बींध देने के लिए काफी था.

स्वाति बिना हिचकिचाए बोली, ‘‘चौधरी साहब, आप को मेरी नमस्ते.’’

‘‘नमस्ते बहू, नमस्ते,’’ चौधरी राम सिंह ने दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा.

तब तक स्वाति मोटरसाइकिल से उतर कर चौधरी राम सिंह के सामने खड़ी हो गई. अपनी लटों को ठीक करते हुए वह बोली, ‘‘चौधरी साहब, केवल ‘नमस्ते’ से ही काम नहीं चलेगा, कभी घर आइएगा चाय पर. हमारे हाथ की चाय नहीं पी, तो फिर कैसी ‘नमस्ते’.’’

इतना सुन कर चौधरी राम सिंह की केवल ‘हूं’, निकली.

स्वाति अपने पल्लू को संभालते हुए मोटरसाइकिल पर सवार हो गई. चौधरी राम सिंह उन्हें दूर तक जाते देखते रह गए. उन पर एक बावलापन सवार हो गया. वे रास्तेभर ‘चाय पीने’ का मतलब निकालते रहे.

चौधरी राम सिंह रातभर यों ही करवटें बदलते रहे और स्वाति के बारे में सोचते रहे. वे किसी तरह रात कटने का इंतजार कर रहे थे.

उधर घर पहुंच कर नरदेव ने स्वाति से पूछा, ‘‘तुम ने चौधरी को चाय पीने का न्योता क्यों दिया?’’

‘‘तुम भी निरे बुद्धू हो. गांव में चौधरी की कितनी हैसियत है. ऐसे आदमी को पटा कर रखना चाहिए, न जाने कब काम आ जाए.’’

स्वाति का जवाब सुन कर नरदेव लाजवाब हो गया. उसे स्वाति हमेशा अपने से ज्यादा समझदार लगती थी. वह फिर अपने कामधाम में लग गया.

चौधरी राम सिंह को जैसे दिन निकलने का ही इंतजार था.

सुबह होते ही वे नरदेव के चबूतरे पर पहुंच गए. उन्होंने नरदेव के पिता मनुदेव को देखा, तो ‘नमस्ते’ कहते हुए चारपाई पर ऐसे बैठे, जिस से निगाहें घर की चौखट पर रहें.

नरदेव ने खिड़की से झांक कर चौधरी राम सिंह को देखा तो तुरंत स्वाति के पास जा कर बोला, ‘‘लो स्वाति, और दो चौधरी को चाय पीने का न्योता, सुबह होते ही चतूबरे पर आ बैठा.’’

‘‘तो खड़ेखड़े क्या देख रहे हो? उन्हें चाय के लिए अंदर ले आओ.’’

‘‘लेकिन स्वाति, चाय तो चबूतरे पर भी जा सकती है, घर के अंदर तो खास लोगों को ही बुलाया जाता है.’’

‘‘तुम भी न अक्ल के अंधे हो. तुम्हें तो पता ही नहीं, लोगों को कैसे अपना बनाया जाता है.’’

नरदेव के पास स्वाति के हुक्म का पालन करने के सिवा कोई और रास्ता न था. वह बाहर जा कर चबूतरे पर बैठे चौधरी राम सिंह से बोला, ‘‘चाचा, अंदर आ जाइए. यहां लोग आतेजाते रहते हैं. अंदर आराम से बैठ कर चाय पिएंगे.’’

चौधरी राम सिंह को स्वाति के दर पर इतनी इज्जत की उम्मीद न थी. नरदेव ने उन्हें अंदर वाले कमरे में बिठा दिया. नरदेव भी पास में ही रखी दूसरी कुरसी पर बैठ कर उन से बतियाने लगा.

कुछ ही देर में स्वाति एक ट्रे में चाय, नमकीन, बिसकुट ले कर आ गई. नरदेव को चाय देने के बाद वह चौधरी राम सिंह को चाय पकड़ाते हुए बोली, ‘‘चौधरी साहब, आप के लिए खास चाय बनाई है, पी कर बताना कि कैसी बनी है.’’

स्वाति के इस मनमोहक अंदाज पर चौधरी राम सिंह खुश हो गए. स्वाति चाय का प्याला ले कर मेज के दूसरी तरफ खाट पर बैठ गई. फिर स्वाति ने एक चम्मच में नमकीन ले कर चौधरी राम सिंह की ओर बढ़ाई तो चौधरी राम सिंह ऐसे निहाल हो गए, जैसे मैना को देख कर तोता.

चाय पीतेपीते लंगोट के पक्के चौधरी राम सिंह अपना दिल हार गए. जातेजाते चाय की तारीफ में कितने कसीदे उन्होंने पढ़े, यह खुद उन को भी पता नहीं.

फिर तो आएदिन चौधरी राम सिंह चाय पीने के लिए आने लगे. स्वाति भी खूब मन से उन के लिए खास चाय बनाती.

अब चौधरी राम सिंह को गांव में कहीं भी जाना होता, उन के सब रास्ते स्वाति के घर के सामने से ही गुजरते. उन के मन में यह एहसास घर कर गया कि स्वाति पूरे गांव में बस उन्हीं को चाहती है.

कुछ ही दिनों बाद राम सिंह ने देखा कि गांव में बढ़ती उम्र के कुछ लड़के स्वाति के घर के सामने खेलने के लिए जुटने लगे हैं. लड़कों को वहां खेलते देख कर चौधरी राम सिंह बडे़ परेशान हुए.

एक दिन उन्होंने लड़कों से पूछा, ‘‘अरे, तुम्हें खेलने के लिए कोई और जगह नहीं मिली? यहां गांव के बीच में क्यों खेल रहे हो?’’

‘‘ताऊजी, हम से तो स्वाति भाभी ने कहा है कि हम चाहें तो यहां खेल सकते हैं. आप को तो कोई परेशानी नहीं है न ताऊजी?’’

‘‘न…न… मुझे क्या परेशानी होगी? खूब खेलो, मजे से खेलो.’’

चौधरी राम सिंह लड़कों पर क्या शक करते? लेकिन, उन का मन बेहद परेशान था. हालत यह हो गई थी कि उन्हें किसी का भी स्वाति के पास आना पसंद नहीं था.

एक दिन चौधरी राम सिंह ने देखा कि स्वाति उन लड़कों के साथ खड़ी हो कर बड़ी अदा के साथ सैल्फी ले रही थी. सभी लड़के ‘भाभीभाभी’ चिल्ला कर स्वाति के साथ फोटो खिंचवाने के लिए कतार में लगे थे.

उस रात चौधरी राम सिंह को नींद नहीं आई. उन्हें लगा कि स्वाति ने उन का ही शिकार नहीं किया है, बल्कि गांव के जवान होते हुए लड़के भी उस के शिकार बन गए हैं.

चौधरी राम सिंह को रहरह कर जंगल की ‘गुलदारनी’ याद आ रही थी, जो लगातार अपने शिकार के मिशन पर निकली हुई थी.

एक दिन गांव में होहल्ला मच गया. बाबूराम की बेटी ने नरदेव पर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया. शुरू में गांव में किसी को इस बात पर यकीन न हुआ. सब का यही सोचना था कि इतनी पढ़ीलिखी, खूबसूरत और कमसिन बीवी का पति ऐसी छिछोरी हरकत कैसे कर सकता है. लेकिन कुछ गांव वालों का कहना था, ‘भैया, बिना आग के कहीं धुआं उठता है क्या?’

अभी गांव में खुसुरफुसुर का दौर जारी ही था कि शाम को बाबूराम ने दारू चढ़ा कर हंगामा बरपा दिया. उस ने नशे की झोंक में सरेआम नरदेव को देख लेने और जेल भिजवाने की धमकी दे डाली.

जब स्वाति को इस बात का पता चला तो उस ने नरदेव को बचाने के लिए मोरचा संभाल लिया. चौधरी राम सिंह को तुरंत बुलावा भेजा गया.

स्वाति का संदेशा पाते ही वे हाजिरी लगाने पहुंच गए. चाय पीतेपीते उन्होंने कहा, ‘‘स्वाति, जब तक मैं हूं, तुम चिंता क्यों करती हो. अपना अपनों के काम नहीं आएगा, तो किस के काम आएगा.’’

चौधरी राम सिंह के मुंह से यह बात सुन कर स्वाति हौले से मुसकराई और बोली, ‘‘चौधरी साहब, हम भी तो सब से ज्यादा आप पर ही भरोसा करते हैं, तभी तो सब से पहले आप को याद किया.’’

चौधरी राम सिंह तो पहले से ही बावले हुए पड़े थे, यह सुन कर और बावले हो गए. उन्हें लगा कि स्वाति का दिल जीतने का उन के पास यह सुनहरा मौका है. उन्होंने यह मामला निबटाने के लिए पूरी ताकत लगा दी.

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