नागरिकता बिल

देश के कुछ हिस्सों में इस बिल का पुरजोर विरोध हुआ था और कुछ हिस्सों में जम कर स्वागत भी हो रहा था.

मीडिया वाले लगातार इस अहम खबर पर नजरें गड़ाए हुए थे और पिछले कई दिनों से वे इसी खबर को प्रमुखता से दिखा रहे थे.

रजिया बैठी हुई टैलीविजन पर यह सब देख रही थी. उस की आंखों में आंसू तैर गए. खबरिया चैनल का एंकर बता रहा था कि जो मुसलिम शरणार्थी भारत में रह रहे हैं, उन को यहां की नागरिकता नहीं मिल सकती है.

‘क्यों? हमारा क्या कुसूर है इस में… हम ने तो इस देश को अपना सम झ कर ही शरण ली है… इस देश में सांस ली है, यहां का नमक खाया है और आज राजनीति के चलते यहां के नेता हमें नागरिक मानने से ही इनकार कर रहे हैं. हमें कब तक इन नेताओं के हाथ की कठपुतली बन कर रहना पड़ेगा,’ रजिया बुदबुदा उठी.

रजिया सोफे से उठी और रसोईघर की खिड़की से बाहर  झांकने लगी. उस की आंखों में बीती जिंदगी की किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे.

तब रजिया तकरीबन 20 साल की एक खूबसूरत लड़की थी. उस की मां बचपन में ही मर गई थी. बड़ी हुई तो बाप बीमारी से मर गया. उस के देश में अकाल पड़ा, तो खाने की तलाश में भटकते हुए वह भारत की सरहद में आ गई और शरणार्थियों के कैंप में शामिल हो गई थी. भारत सरकार ने शरणार्थियों के लिए जो कैंप लगाया था, रजिया उसी में रहने लगी थी.

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पहलेपहल कुछ गैरसरकारी संस्थाएं इन कैंपों में भोजन वगैरह बंटवाती थीं, पर वह सब सिर्फ सोशल मीडिया पर प्रचार पाने के लिए था, इसलिए कुछ समय तक ही ऐसा चला. कुछ नेता भी इन राहत कैंपों में आए, पर वे भी अपनी राजनीति चमकाने के फेर में ही थे. सो, वह सब भी चंद दिनों तक ही टिक पाया.

शरणार्थियों को आभास हो चुका था कि उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा. जिन के पास कुछ पैसा था, वे रेहड़ीखोमचा लगाने लगे, तो कुछ रैड सिगनलों पर भीख मांगने लगे. कुछ तो घरों में नौकर बन कर अपना गुजारा करने लगे.

एक दिन शरणार्थी शिविर में एक नेताजी अपना जन्मदिन मनाने पहुंचे. उन के हाथों से लड्डू बांटे जाने थे. लड्डू बांटते समय उन की नजर सिकुड़ीसिमटी और सकुचाई रजिया पर पड़ी, जो उस लड्डू को लगातार घूरे जा रही थी.

नेताजी ने रजिया को अपने पास बुलाया और पूछा, ‘लड्डू खाओगी?’

रजिया ने हां में सिर हिलाया.

‘मेरे घर पर काम करोगी?’

रजिया कुछ न बोल सकी. उस ने फिर हां में सिर हिलाया.

‘विनय, इस लड़की को कल मेरा बंगला दिखा देना और इसे कल से काम पर रख लो. सबकुछ अच्छे से सम झा भी देना,’ नेताजी ने रोबीली आवाज में अपने सचिव विनय से कहा.

‘आखिरकार जनता का ध्यान हम नेताओं को ही तो रखना है,’ कहते हुए नेताजी ने एक आंख विनय की तरफ दबा दी.

विनय को नेताजी की बात माननी ही थी, सो वह अगले दिन रजिया को उन के बंगले पर ले आया और उसे साफसफाई का सारा काम सम झा दिया.

रजिया इतने बड़े घर में पहली बार आई थी. चारों तरफ चमक ही चमक थी. वह खुद भी आज नहाधो कर आई थी. कल तक जहां उस के चेहरे पर मैल की पपड़ी जमी रहती थी, वहां आज गोरी चमड़ी दिख रही थी. विनय को भी यह बदलाव दिखाई दिया था.

विनय ने रजिया को खाना खिलाया. पहले तो संकोच के मारे रजिया धीरेधीरे खाती रही, पर उस की दुविधा सम झ कर जैसे ही विनय वहां से हटा, रजिया दोनों हाथों से खाने पर जुट गई और उस ने अपना मुंह तब ऊपर किया, जब उस के पेट में बिलकुल जगह न रह गई. उस का चेहरा भी अब उस के पेट के भरे होने की गवाही दे रहा था.

अब रजिया नेताजी के बंगले पर दिनभर काम करती और शाम ढले कैंप में वापस चली जाती.

यों ही दिन बीतने लगे. रजिया का काम अच्छा था. धीरेधीरे उस ने शाम को शरणार्थी कैंप में जाना भी छोड़ दिया. वह शाम को नेताजी के बंगले में ही कहीं जमीन पर सो जाती थी.

आज नेताजी के घर में जश्न का माहौल था, क्योंकि चुनाव में उन्होंने बड़ी जीत हासिल की थी. नीचे हाल में चारों तरफ सिगरेट के धुएं की गंध थी. शराब के दौर चल रहे थे. जश्न देर रात तक चलना था, इसलिए विनय ने रजिया से खाना खा कर सो जाने के लिए कहा और खुद नेताजी के आगेपीछे डोल कर अपने नमक का हक अदा करने लग गया.

नेताजी के कई दोस्त उन से शराब के साथ शबाब की मांग कर रहे थे. जब इस मांग ने जोर पकड़ लिया, तो नेताजी ने धीरे से रजिया के कमरे की तरफ इशारा कर दिया.

ऊपर कमरे में रजिया सो रही थी. देर रात कोई उस के कमरे में गया, जिस ने उस का मुंह दबाया और अपने शरीर को उस के शरीर में गड़ा दिया.

बेचारी रजिया चीख भी नहीं पा रही थी. एक हटा तो दूसरा आया. न जाने कितने लोग थे, रजिया को पता ही न चला. वह बेहोश हो गई और शायद मर ही जाती, अगर विनय सही समय पर न पहुंच गया होता.

विनय ने रजिया को अस्पताल में दाखिल कराया. वह गुस्से से आगबबूला हो रहा था, पर क्या करता, नेताजी के अहसान के बो झ तले दबा जो हुआ था.

‘इन के पति का नाम बताइए?’ नर्स ने पूछा.

‘जी, विनय रंजन,’ विनय ने अपना नाम बताया.

नाम बताने के बाद एक पल को विनय ठिठक गया था.

‘मैं ने यह क्यों किया? पर क्यों न किया जाए?’ उस ने सोचा. आखिर उस की शरण में भी पहली बार कोई लड़की आई थी.

विनय उस समय छोटा सा था, जब उस के मम्मीपापा एक हादसे में मारे गए थे. तब इसी नेता ने उसे अनाथालय में रखा था और उस की पढ़ाई का खर्चा भी दिया था.

नेताजी के विनय के ऊपर और बहुत से अहसान थे, पर उन अहसानों की कीमत वह इस तरह चुका तो नहीं सकता.

रजिया की हालत में सुधार आ रहा था. वह कुछ बताती, विनय को इस की परवाह ही नहीं थी, उस ने तो मन ही मन एक फैसला ले लिया था.

अपने साथ कुछ जरूरी सामान और रजिया को ले विनय ने शहर छोड़ दिया.

बस में सफर शुरू किया तो कितनी दूर चले गए, उन्हें कुछ पता नहीं था. वे तो दूर चले जाना चाहते थे, बहुत दूर, जहां शरणार्थी कैंप और उस नेता की गंध भी न आ सके.

और यही हुआ भी. वे दोनों भारत के दक्षिणी इलाके में आ गए थे और अब उन को अपना पेट भरने के लिए एक अदद नौकरी की जरूरत थी.

विनय पढ़ालिखा तो था ही, इसलिए उसे नौकरी ढूंढ़ने में समय न लगा. नौकरी मिली तो एक घर भी किराए पर ले लिया.

रजिया भी सदमे से उबर चुकी थी, पर विनय उस से कभी भी उस घटना का जिक्र न करता और न ही उस को याद करने देता.

रजिया का हाथ शिल्प वगैरह में बहुत अच्छा था. एक दिन उस ने एक छोटा सा कालीन बना कर विनय को दिखाया.

वह कालीन विनय को बहुत अच्छा लगा और उस ने वह कालीन अपने बौस को गिफ्ट कर दिया.

‘अरे… वाह विनय, इस कालीन को रजिया ने बनाया है. बहुत अच्छा… घर में आसानी से मिलने वाली चीजों से बना कालीन…

‘क्यों न तुम ऐसे कालीनों का एक कारोबार शुरू कर दो. भारत में बहुत मांग है,’ बौस ने कहा.

‘अरे… सर… पर, उस के लिए तो पैसों की जरूरत होगी,’ विनय ने शंका जाहिर की.

‘अरे, जितना पैसा चाहिए, मैं दूंगा और जब कारोबार चल जाएगा, तब मु झे लौटा देना,’ बौस जोश में था.

विनय ने नानुकर की, पर उस का बौस एक कला प्रेमी था. उस ने खास लोगों से बात कर विनय का एक छोटा सा कारखाना खुलवा दिया.

फिर क्या था, रजिया कालीन का मुख्य डिजाइन बनाती और कारीगर उस को बुनते. कुछ ही दिनों में विनय का कारोबार अच्छा चल गया था और जिंदगी में खुशियां आने लगीं.

डोरबेल की तेज आवाज ने रजिया का ध्यान भंग किया. दरवाजा खोला तो सामने विनय खड़ा था. उसे देखते ही रजिया उस के सीने से लिपट गई.

‘‘अरे बाबा, क्या हुआ?’’ विनय ने चौंक कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं विनय. मैं इस देश में शरणार्थी की तरह आई थी, उस नेता ने मु झे सहारा दिया. वहां भी तुम ने साए की तरह मेरा ध्यान रखा, पर उस जश्न वाली रात को नेता के साथियों ने मेरे साथ बलात्कार किया. न जाने कितने लोगों ने मु झें रौंदा, मु झे तो पता भी नहीं, फिर भी तुम ने इस जूठन को अपनाया. तुम महान हो विनय. मु झ से वादा करो कि तुम मु झे कभी नहीं छोड़ोगे.’’

‘‘पर, आज अचानक से यह सब क्यों पगली. मेरा भी तो इस दुनिया में तुम्हारे सिवा कोई नहीं है. उस नेता के कई अहसान थे मुझ पर, सो मैं सामने से उस से लड़ न सका, पर तुम को उन भेडि़यों से बचाने के लिए मैं ने नेता को भी छोड़ दिया, लेकिन आज अचानक बीती बातें क्यों पूछ रही हो रजिया?’’ विनय ने रिमोट से टैलीविजन चालू करते हुए पूछा.

‘‘वह… दरअसल, नागरिकता वाले कानून के तहत भारत में सिर्फ हिंदू शरणार्थियों को ही नागरिकता मिल सकती है और मैं तो हिंदू नहीं विनय. आज यह कानून आया है, अगर कल को यह कानून आ गया कि जो शरणार्थी जहां के हैं, उसी देश वापस चले जाएं तब तो मु झे तुम को छोड़ कर जाना होगा. इस मुई राजनीति का कुछ भरोसा नहीं,’’ कहते हुए रजिया रो पड़ी.

‘‘अरे पगली, तुम इतना दिमाग मत लगाओ. अब तुम्हें मेरी जिंदगी ने नागरिकता दे दी है, तब किसी देश के कागजी दस्तावेज की जरूरत नहीं है तुम्हें. जोकुछ होगा, देखा जाएगा और फिर जब हम दोनों शादी कर लेंगे, तो भला तुम को यहां का नागरिक कौन नहीं मानेगा,’’ कहते हुए विनय ने रजिया की पेशानी चूमते हुए कहा.

उस समय रजिया और विनय की आंखों में आंसू थे.

धन्नो : भानुमती किस कमी से परेशान रहती थी

भानुमती नाम था उन का. निम्नमध्य- वर्गीय परिवार, परिवार माने पूरे डेढ़ दर्जन लोग, कमाने वाला इकलौता उन का पति और वे स्वयं राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका.

‘‘जब देखो तब घर में कोहराम छिड़ा रहता है,’’ वे अकसर अनु से कहती थीं. अनु उन से आधी उम्र की थी. उस की नियुक्ति प्रिंसिपल के पद पर हुई थी. भानुमती अकसर देर से स्कूल आतीं और जब आतीं तो सिर पर पट्टी बंधी रहती. सिर में उन के सदैव दर्द रहता था. चिड़चिड़ा स्वभाव, स्कूल आती थीं तो लगता था किसी जंग के मैदान से भाग कर आई हों.

उन्हें अनुशासन में बांधना असंभव था. अनु उन से एक सुहृदया बौस की तरह पेश आती थी. यही कारण था कि सब की अप्रिय, भानुमतीजी अपने जीवन की पोथी उस के सामने खोल कर बैठ जाती थीं.

एक दिन प्रार्थना सभा में वे चक्कर खा कर गिर पड़ीं. तुरंत चिकित्सा आदि की गई तो पता चला कि पिछले 24 घंटे से उन्होंने एक बूंद पानी भी नहीं पिया था. वे 7 दिन से व्रत कर रही थीं. स्कूल आना बेहद जरूरी था क्योेंकि परीक्षा चल रही थी. समय ही नहीं जुटा पाईं कि अपना ध्यान रख सकें. जब उन्हें चाय आदि पिला कर स्वस्थ किया गया तो एकदम से फफक पड़ीं.

‘‘आज घर में 10 रुपए भी नहीं हैं. 7 अपने बच्चे, 2 हम, सासससुर, 1 विधवा ननद व 4 उस के बच्चे. सब के तन पर चादर तानतेतानते चादर ही फट गई है, किसकिस का तन ढकूं? किसकिस के पेट में भोजन डालूं? किसकिस के पैरों को पत्थरकंकड़ चुभने से बचाऊं? किस को पढ़ाऊं, किस को नहीं? सब जरूरी हैं. एक का कुरता सिलता है तो दूसरे की सलवार फट जाती है. एक की रोटी सिंकती है तो दूसरे की थाली खाली हो जाती है. और ये लक्ष्मीमाता मेरे घर के दरवाजे की चौखट से कोसों दूर…वहां विष्णु के पैर दबा रही हैं. खुद तो स्वर्णजडि़त ताज पहने, कमल के फूल पर विराजमान हैं और यहां उन के भक्तों को कांटों के गद्दे भी नसीब नहीं होते…’’

न मालूम क्याक्या बड़बड़ा रही थीं. उस दिन तो जैसे किसी वेगवती नदी का बांध टूट गया हो. उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा. न ऊपर वाले को न नीचे वाले को….

थोड़ा स्वस्थ होने पर बोलीं, ‘‘चाय का यह घूंट मेरे गले में दिन भर बाद उतरा है पर किसी को फिक्र है मेरी? पति तो इस भीड़ में ऐसे खो गए हैं कि मेरी शक्ल देख कर भी मुझे पहचान नहीं पाएंगे. बस, बच्चे पैदा कर डाले, वह भी 7. आज के जमाने में जहां लोगों के घर 1 या 2 बच्चे होते हैं, मेरे घर में दूसरों को देने लायक ऐक्स्ट्रा बच्चे हैं. 6 बेटियां हैं, परंतु उन्हें तो बेटा चाहिए, चाहिए तो बस चाहिए, आखिर 7वां बेटा हुआ.

‘‘सच पूछो तो मैडम, मुझे अपनी कोखजनों से कोई लगाव नहीं है, कोई ममता नहीं है. आप कहेंगी कि कैसी मां हूं मैं? बस, मैं तो ऐसी ही हूं…रूखी. पैसे का अभाव ब्लौटिंग पेपर की तरह समस्त कोमल भावनाओं को सोख गया है. पानी सोख लेने वाला एक पौधा होता है, ठीक उसी तरह मेरे इस टब्बर ने पैसों को सोख लिया है,’’ वे रोती जा रही थीं और बोलती जा रही थीं.

‘‘जीवन में कुछ हो न हो, बस पैसे का अभाव नहीं होना चाहिए. मुझे तो आजकल कुछ हो गया है, पेड़ों पर लगे पत्ते रुपए नजर आते हैं. मन करता है, उन्हें तोड़ लाऊं. सड़क पर पड़े ईंट के टुकड़े रुपयों की गड्डी नजर आते हैं और नल से पानी जब खाली लोहे की बालटी में गिरता है तो उस में भी पैसों की खनक जैसी आवाज मुझे सुनाई देती है.’’

उस दिन उन की यह दशा देख कर अनु को लगा कि भानुमतीजी की मानसिक दशा बिगड़ रही है. उस ने उन की सहायता करने का दृढ़ निश्चय किया. मैनेजमैंट के साथ मीटिंग बुलाई, भानुमतीजी की सब से बड़ी लड़की जो कालेज में पढ़ रही थी, उसे टैंपोररी नौकरी दिलवाई, दूसरी 2 लड़कियों को भी स्कूल के छोटे बच्चों के ट्यूशन दिलवाए.

अनु लगभग 8 साल तक उस स्कूल में प्रिंसिपल रही और उस दौरान भानुमतीजी की समस्याएं लगभग 50 फीसदी कम हो गईं. लड़कियां सुंदर थीं. 12वीं कक्षा तक पढ़ कर स्वयं ट्यूशन करकर के उन्होंने कुछ न कुछ नौकरियां पकड़ लीं. सुशील व कर्मठ थीं. 4 लड़कियों की सहज ही बिना दहेज के शादियां भी हो गईं. 1 बेटी डाक्टरी में निकल गई और 1 इंजीनियरिंग में.

ननद के बच्चे भी धीरेधीरे सैटल हो गए. सासससुर चल बसे थे, पर उन का बुढ़ापा, भानुमतीजी को समय से पहले ही बूढ़ा कर गया था. 47-48 साल की उम्र में 70 साल की प्रतीत होती थीं भानुमतीजी. जब कभी कोई बाहर से सरकारी अफसर आता था और शिक्षकों का परिचय उन से करवाया जाता था, तो प्राय: कोई न कोई अनु से प्रश्न कर बैठता था :

‘‘आप के यहां एक टीचर काफी उम्र की हैं, उन्हें तो अब तक रिटायर हो जाना चाहिए.’’

उन की उम्र पता चलने पर, उन के चेहरे पर अविश्वास के भाव फैल जाते थे. जहां महिलाएं अपनी उम्र छिपाने के लिए नईनई क्रीम, लोशन व डाई का प्रयोग करती हैं वहीं भानुमतीजी ठीक इस के विपरीत, न बदन पर ढंग का कपड़ा न बालों में कंघी करना. लगता है, वे कभी शीशे में अपना चेहरा भी नहीं देखती थीं. जिस दिन वे मैचिंग कपड़े पहन लेती थीं पहचानी नहीं जाती थीं.

‘‘महंगाई कितनी बढ़ गई है,’’ वे अकसर कहती रहती थीं. स्टाफरूम में उन का मजाक भी उड़ाया जाता था. उन के न मालूम क्याक्या नाम रखे हुए थे… उन्हें भानुमतीजी के नाम से कोई नहीं जानता था.

एक दिन इंटरस्कूल वादविवाद प्रतियोगिता के सिलसिले में अनु ने अपने नए चपरासी से कहा, ‘‘भानुमतीजी को बुला लाओ.’’

वह पूरे स्कूल में ढूंढ़ कर वापस आ गया. तब अनु ने उन का पूरा नाम व क्लास लिख कर दिया, तब कहीं जा कर वे आईं तो अनु ने देखा कि चपरासी भी हंसी को दबा रहा था.

अनु ने वादविवाद का विषय उन्हें दे दिया और तैयारी करवाने को कहा. विषय था : ‘टेलीविजन धारावाहिक और फिल्में आज साहित्य का स्थान लेती जा रही हैं और जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता जा रहा है वैसे ही टेलीविजन के धारावाहिक या फिल्में भी.’

वादविवाद प्रतियोगिता में बहुधा टीचर्स की लेखनी व वक्ता का भावपूर्ण भाषण होता है. 9वीं कक्षा की नीति प्रधान, भानुमतीजी की क्लास की थी. उस ने ओजपूर्ण तर्क रखा और समस्त श्रोताओं को प्रभावित कर डाला. उस ने अपना तर्क कुछ इस प्रकार रखा था :

‘टेलीविजन धारावाहिक व फिल्में समाज का झूठा दर्पण हैं. निर्धन किसान का घर, पांचसितारा होटल में दिखाया जाता है. कमरे में परदे, सोफासैट, खूबसूरत पलंग, फर्श पर कालीन, रंगीन दीवारों पर पेंटिंग और बढि़या स्टील के खाली डब्बे. भारी मेकअप व गहनों से लदी महिलाएं जेवरात की चलतीफिरती दुकानें लगती हैं.’

व्यंग्यात्मक तेवर अपनाते हुए नीति प्रधान पुरजोर पौइंट ढूंढ़ लाई थी, टेलीविजन पर गरीबी का चित्रण और वास्तव में गरीबी क्या होती है?

‘गरीब के नए कपड़ों पर नए कपड़ों का पैबंद लगाया दिखाते हैं. वे तो अकसर ऐसे लगते हैं जैसे कोई बुटीक का डिजाइन. गरीबी क्या होती है? किसी गरीब के घर जा कर देखें. आजकल के युवकयुवतियां घुटनों पर से फटी जीन्स पहनना फैशन मानते हैं, तब तो गरीब ही सब से फैशनेबल हैं. बड़ेबड़े स्टेटस वाले लोग कहते हैं :

‘आई टेक ब्लैक टी. नो शुगर प्लीज.’

‘अरे, गरीब के बच्चे सारी जिंदगी ब्लैक टी ही पीते रहे हैं, दूध और शक्कर के अभाव में पलतेपलते वे कितने आधुनिक हो गए हैं, उन्हें तो पता ही नहीं चला. आजकल अकसर लोग महंगी होलव्हीट ब्रैड खाने का ढोल पीटते हैं. अरे, गरीब तो आजीवन ही होलव्हीट की रोटियां खाता आया है. गेहूं के आटे से चोकर छान कर रोटियां बनाईं तो रोटियां ही कम पड़ जाएंगी. और हां, आजकल हर वस्तु में रिसाइक्ंिलग शब्दों का खूब इस्तेमाल होता है, गरीब का तो जीवन ही रिसाइकल है. सर्दी की ठिठुरती रातों में फटेपुराने कपड़ों को जोड़ कर जो गुदड़ी सिली जाती है उसे कोई फैशनेबल मेमसाहब अपना बटुआ खाली कर खरीद कर ले जाएंगी.’

धन के अभाव का ऐसा आंखोंदेखा हाल प्रस्तुत करने वाला और कौन हो सकता था? प्रतियोगिता में नीति प्रथम घोषित हुई थी.

अनु को दिल्ली आए अब 10-12 वर्ष हो गए थे. अब तो वह शिक्षा मंत्रालय में, शिक्षा प्रणाली के योजना विभाग में कार्य करने लगी थी. अत: उस स्कूल के बाद छात्रों व अध्यापकों के साथ उस की नजदीकियां खत्म हो गई थीं. अकसर अनु को वहां की याद आती थी. उस स्कूल की लगभग सभी अध्यापिकाएं….सब के जीवन में कहीं न कहीं कोई न कोई कमी तो थी ही. कोई स्वास्थ्य से परेशान तो कोई अपने पति को ले कर दुखी. कोई समाज से तो कोई मकान से.

जहां सब सुख थे, वहां भी हायतौबा. मिसेज भंडारी बड़े हंसमुख स्वभाव की महिला थीं, संपन्न, सुंदर व आदरणीय. उन्हें ही अनु कार्यभार सौंप कर आई थी. वे अकसर अपनी सास के बारे में बात करती और कहती थीं, ‘‘मेरी सास के पास कोई दुख नहीं है, फिर भी वे दुख ढूंढ़ती रहती हैं, वास्तव में उन्हें सुखरोग है.’’

एक दिन अनु दिल्ली के एक फैशनेबल मौल में शौपिंग करने गई थी. वहां अचानक उसे एक जानापहचाना चेहरा नजर आया. करीने से कढ़े व रंगे बाल, साफसुथरा, मैचिंग सिल्क सलवार- सूट, हाथों में पर्स. पर्स खोल कर रुपयों की गड्डी निकाल कर काउंटर पर भुगतान करते हुए उन के हाथ और हाथों की कलाइयों पर डायमंड के कंगन.

‘‘भानुमतीजी, आप…’’अविश्वास के बीच झूलती अनु अपलक उन्हें लगभग घूर रही थी.

‘‘अरे, अनु मैडम, आप…’’

दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया. भानुमती के कपड़ों से भीनीभीनी परफ्यूम की खुशबू आ रही थी.

अनु ने कहा, ‘‘अब मैं मैडम नहीं हूं, आप सिर्फ अनु कहिए.’’

अनु ने देखा 4-5 बैग उन्हें डिलीवर किए गए.

‘‘आइए, यहां फूडकोर्ट में बैठ कर कौफी पीते हैं,’’ अनु ने आग्रह किया.

‘‘आज नहीं,’’ वे बोलीं, ‘‘बेटी आज जा रही है, उसी के लिए कुछ गिफ्ट खरीद रही थी. आप घर आइए.’’

अनु ने उन का पता और फोन नंबर लिया. मिलने का पक्का वादा करते हुए दोनों बाहर निकल आईं. अनु ने देखा, एक ड्राइवर ने आ कर उन से शौपिंग बैग संभाल लिए और बड़ी सी गाड़ी में रख दिए. अनु की कार वहीं कुछ दूरी पर पार्क थी. दोनों ने हाथ हिला कर विदा ली.

भानुमतीजी की संपन्नता देख कर अनु को बहुत खुशी हुई. सोचने लगी कि बेचारी सारी जिंदगी मुश्किलों से जूझती रहीं, चलो, बुढ़ापा तो आराम से व्यतीत हो रहा है. अनु ने अनुमान लगाया कि बेटा होशियार तो था, जरूर ही अच्छी नौकरी कर रहा होगा. समय निकाल कर उन से मिलने जरूर जाऊंगी. भानुमतीजी के 3-4 फोन आ चुके थे. अत: एक दिन अनु ने मिलने का कार्यक्रम बना डाला. उस ने पुरानी यादों की खातिर उन के लिए उपहार भी खरीद लिया.

दिए पते पर जब अनु पहुंची तो देखा बढि़या कालोनी थी. गेट पर कैमरे वाली सिक्योरिटी. इंटरकौम पर चैक कर के, प्रवेश करने की आज्ञा के बाद अनु अंदर आई. लंबे कौरीडोर के चमकते फर्श पर चलतेचलते अनु सोचने लगी कि भानुमतीजी को कुबेर का खजाना हाथ लग गया है. वाह, क्या ठाटबाट हैं.

13 नंबर के फ्लैट के सामने दरवाजा खोले भानुमतीजी अनु की प्रतीक्षा में खड़ी थीं. खूबसूरत बढि़या परदे, फर्नीचर, डैकोरेशन.

‘‘बहुत खूबसूरत घर है, आप का.’’

कहतेकहते अचानक अनु की जबान लड़खड़ा गई. वह शब्दों को गले में ही घोट कर पी गई. सामने जो दिखाई दिया, उसे देखने के बाद उस में खड़े रहने की हिम्मत नहीं थी. वह धम्म से पास पड़े सोफे पर बैठ गई. मुंह खुला का खुला रह गया. गला सूख गया. आंखें पथरा गईं. चश्मा उतार कर वह उसे बिना मतलब पोंछने लगी. भानुमतीजी पानी लाईं और वह एक सांस में गिलास का पानी चढ़ा गई. भानुमतीजी भी बैठ गईं. चश्मा उतार कर वे फूटफूट कर रो पड़ीं.

‘‘देखिए, देखिए, अनुजी, मेरा इकलौता बेटा.’’

हक्कीबक्की सी अनु फे्रम में जड़ी 25-26 साल के खूबसूरत नौजवान युवक की फोटो को घूर रही थी, उस के निर्जीव गले में सिल्क के धागों की माला पड़ी थी, सामने चांदी की तश्तरी में चांदी का दीप जल रहा था.

‘‘कब और कैसे?’’

सवाल पूछना अनु को बड़ा अजीब सा लग रहा था.

‘‘5 साल पहले एअर फ्रांस का एक प्लेन हाइजैक हुआ था.’’

‘‘हां, मुझे याद है. अखबार में पढ़ा था कि पायलट की सोच व चतुराई के चलते सभी यात्री सुरक्षित बच गए थे.’’

‘‘जी हां, ग्राउंड के कंट्रोल टावर को उस ने बड़ी चालाकी से खबर दे दी थी, प्लेन लैंड करते ही तमाम उग्रवादी पकड़ लिए गए थे परंतु पायलट के सिर पर बंदूक ताने उग्रवादी ने उसे नहीं छोड़ा.’’

‘‘तो, क्या वह आप का बेटा था?’’

‘‘हां, मेरा पायलट बेटा दुष्यंत.’’

‘‘ओह,’’ अनु ने कराह कर कहा.

भानुमतीजी अनु को आश्वस्त करने लगीं और भरे गले से बोलीं, ‘‘दुष्यंत को पायलट बनने की धुन सवार थी. होनहार पायलट था अत: विदेशी कंपनी में नौकरी लग गई थी. मेरे टब्बर का पायलट, मेरी सारी जिंदगी की जमापूंजी.’’

‘‘उस ने तो बहुत सी जिंदगियां बचा दी थीं,’’ अनु ने उन के दुख को कम करने की गरज से कहा.

‘‘जी, उस प्लेन में 225 यात्री थे. ज्यादातर विदेशी, उन्होंने उस के बलिदान को सिरआंखों पर लिया. मेरी और दुष्यंत की पूजा करते हैं. हमें गौड तुल्य मानते हैं. भूले नहीं उस की बहादुरी और बलिदान को. इतना धन मेरे नाम कर रखा है कि मेरे लिए उस का हिसाब भी रखना मुश्किल है.’’

अनु को सब समझ में आ गया.

‘‘अनुजी, शायद आप को पता न होगा, उस स्कूल की युवा टीचर्स, युवा ब्रिगेड ने मेरा नाम क्या रख रखा था?’’

अस्वस्थ व अन्यमनस्क होती हुई अनु ने आधाअधूरा उत्तर दिया, ‘‘हूं… नहीं.’’

‘‘वे लोग मेरी पीठ पीछे मुझे भानुमती की जगह धनमती कहते थे, धनधन की माला जपने वाली धन्नो.’’

अनु को उस चपरासी की शरारती हंसी का राज आज पता चला.

‘‘कैसी विडंबना है, अनुजी. मेरे घर धन आया तो पर किस द्वार से. लक्ष्मी आई तो पर किस पर सवार हो कर…उन का इतना विद्रूप आगमन, इतना घिनौना गृहप्रवेश कहीं देखा है आप ने?’’

: मधु

Mother’s Day Special: ममता का तराजू

‘‘मां, मैं किस के साथ खेलूं? मुझे भी आप अस्पताल से छोटा सा बच्चा ला दीजिए न. आप तो अपने काम में लगी रहती हैं और मैं अकेलेअकेले खेलता हूं. कृपया ला दीजिए न. मुझे अकेले खेलना अच्छा नहीं लगता है.’’

अपने 4 वर्षीय पुत्र अंचल की यह फरमाइश सुन कर मैं धीरे से मुसकरा दी थी और अपने हाथ की पत्रिका को एक किनारे रखते हुए उस के गाल पर एक पप्पी ले ली थी. थोड़ी देर बाद मैं ने उसे गोद में बैठा लिया और बोली, ‘‘अच्छा, मेरे राजा बेटे को बच्चा चाहिए अपने साथ खेलने के लिए. हम तुम्हें 7 महीने बाद छोटा सा बच्चा ला कर देंगे, अब तो खुश हो?’’

अंचल ने खुश हो कर मेरे दोनों गालों के तड़ातड़ कई चुंबन ले डाले व संतुष्ट हो कर गोद से उतर कर पुन: अपनी कार से खेलने लगा था. शीघ्र ही उस ने एक नया प्रश्न मेरी ओर उछाल दिया, ‘‘मां, जो बच्चा आप अस्पताल से लाएंगी वह मेरी तरह लड़का होगा या आप की तरह लड़की?’’

मैं ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘बेटे, यह तो मैं नहीं जानती. जो डाक्टर देंगे, हम ले लेंगे. परंतु तुम से एक बात अवश्य कहनी है कि वह लड़का हो या लड़की, तुम उसे खूब प्यार करोगे. उसे मारोगे तो नहीं न?’’

‘‘नहीं, मां. मैं उसे बहुत प्यार करूंगा,’’ अंचल पूर्ण रूप से संतुष्ट हो कर खेल में जुट गया, पर मेरे मन में विचारों का बवंडर उठने लगा था. वैसे भी उन दिनों दिमाग हर वक्त कुछ न कुछ सोचता ही रहता था. ऊपर से तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी.

अंचल आपरेशन से हुआ था, अत: डाक्टर और भी सावधानी बरतने को कह रहे थे. मां को मैं ने पत्र लिख दिया था क्योंकि इंगलैंड में भला मेरी देखभाल करने वाला कौन था? पति के सभी मित्रों की पत्नियां नौकरी और व्यापार में व्यस्त थीं. घबरा कर मैं ने मां को अपनी स्थिति से अवगत करा दिया था. मां का पत्र आया था कि वह 2 माह बाद आ जाएंगी, तब कहीं जा कर मैं संतुष्ट हुई थी.

उस दिन शाम को जब मेरे पति ऐश्वर्य घर आए तो अंचल दौड़ कर उन की गोद में चढ़ गया और बोला, ‘‘पिताजी, पिताजी, मां मेरे लिए एक छोटा सा बच्चा लाएंगी, मजा आएगा न?’’

ऐश्वर्य ने हंसते हुए कहा, ‘‘हांहां, तुम उस से खूब खेलना. पर देखो, लड़ाई मत करना.’’

अंचल सिर हिलाते हुए नीचे उतर गया था.

मैं ने चाय मेज पर लगा दी थी. ऐश्वर्य ने पूछा, ‘‘कैसी तबीयत है, सर्वदा?’’

मैं ने कहा, ‘‘सारा दिन सुस्ती छाई रहती है. कुछ खा भी नहीं पाती हूं ठीक से. उलटी हो जाती है. ऐसा लगता है कि किसी तरह 7 माह बीत जाएं तो मुझे नया जन्म मिले.’’

ऐश्वर्य बोले, ‘‘देखो सर्वदा, तुम 7 माह की चिंता न कर के बस, डाक्टर के बताए निर्देशों का पालन करती जाओ. डाक्टर ने कहा है कि तीसरा माह खत्म होतेहोते उलटियां कम होने लगेंगी, पर कोई दवा वगैरह मत खाना.’’

2 माह के पश्चात भारत से मेरी मां आ गई थीं. उस समय मुझे 5वां माह लगा ही था. मां को देख कर लगा था जैसे मुझे सभी शारीरिक व मानसिक तकलीफों से छुटकारा मिलने जा रहा हो. अंचल ने दौड़ कर नानीजी की उंगली पकड़ ली थी व ऐश्वर्य ने उन के सामान की ट्राली. मैं खूब खुश रहती थी. मां से खूब बतियाती. मेरी उलटियां भी बंद हो चली थीं. मेरे मन की सारी उलझनें मां के  आ जाने मात्र से ही मिट गई थीं.

मैं हर माह जांच हेतु क्लीनिक भी जाती थी. इस प्रकार देखतेदेखते समय व्यतीत होता चला गया. मैं ने इंगलैंड के कुशल डाक्टरों के निर्देशन व सहयोग से एक बच्ची को जन्म दिया और सब से खुशी की बात तो यह थी कि इस बार आपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ी थी. बच्ची का नाम मां ने अभिलाषा रखा. वह बहुत खुश दिखाई दे रही थीं क्योंकि उन की कोई नातिन अभी तक न थी. मेरी बहन के 2 पुत्र थे, अत: मां का उल्लास देखने योग्य था. छोटी सी गुडि़या को नर्स ने सफेद गाउन, मोजे, टोपा व दस्ताने पहना दिए थे.

तभी अंचल ने कहा, ‘‘मां, मैं बच्ची को गोद में ले लूं.’’

मैं ने अंचल को पलंग पर बैठा दिया व बच्ची को उस की गोद में लिटा दिया. अंचल के चेहरे के भाव देखने लायक थे. उसे तो मानो जमानेभर की खुशियां मिल गई थीं. खुशी उस के चेहरे से छलकी जा रही थी. यही हाल ऐश्वर्य का भी था. तभी नर्स ने आ कर बतलाया कि मिलने का समय समाप्त हो चुका है.

उसी नर्स ने अंचल से पूछा, ‘‘क्या मैं तुम्हारा बच्चा ले सकती हूं?’’

अंचल ने हड़बड़ा कर ‘न’ में सिर हिला दिया. हम सब हंसने लगे.

जब सब लोग घर चले गए तो मैं बिस्तर में सोई नन्ही, प्यारी सी अभिलाषा को देखने लगी, जो मेरे व मेरे  परिवार वालों की अभिलाषा को पूर्ण करती हुई इस दुनिया में आ गई थी. परंतु अब देखना यह था कि मेरे साढ़े 4 वर्षीय पुत्र व इस बच्ची में कैसा तालमेल होता है.

5 दिन बाद जब मैं घर आई तो अंचल बड़ा खुश हुआ कि उस की छोटी सी बहन अब सदा के लिए उस के पास आ गई है.

बच्ची 2 माह की हुई तो मां भारत वापस चली गईं. उन के जाने से घर बिलकुल सूना हो गया. इन देशों में बिना नौकरों के इतने काम करने पड़ते हैं कि मैं बच्ची व घर के कार्यों में मशीन की भांति जुटी रहती थी.

देखतेदेखते अभिलाषा 8 माह की हो गई. अब तक तो अंचल उस पर अपना प्यार लुटाता रहा था, पर असली समस्या तब उत्पन्न हुई जब अभिलाषा ने घुटनों के बल रेंगना आरंभ किया. अब वह अंचल के खिलौनों तक आराम से पहुंच जाती थी. अपने रंगीन व आकर्षक खिलौनों व झुनझुनों को छोड़ कर उस ने भैया की एक कार को हाथ से पकड़ा ही था कि अंचल ने झपट कर उस से कार छीन ली, जिस से अभिलाषा के हाथ में खरोंचें आ गईं.

उस समय मैं वहीं बैठी बुनाई कर रही थी. मुझे क्रोध तो बहुत आया पर स्वयं पर किसी तरह नियंत्रण किया. बालमनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए मैं ने अंचल को प्यार से समझाने की चेष्टा की, ‘‘बेटे, अपनी छोटी बहन से इस तरह कोई चीज नहीं छीना करते. देखो, इस के हाथ में चोट लग गई. तुम इस के बड़े भाई हो. यह तुम्हारी चीजों से क्यों नहीं खेल सकती? तुम इसे प्यार करोगे तो यह भी तुम्हें प्यार करेगी.’’

मेरे समझाने का प्रत्यक्ष असर थोड़ा ही दिखाई दिया और ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे सवा 5 वर्षीय यह बालक स्वयं के अधिकार क्षेत्र में किसी और के प्रवेश की बात को हृदय से स्वीकार नहीं कर पा रहा है. मैं चुपचाप रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद जब मैं रसोई से बाहर आई तो देखा कि अंचल अभिलाषा को खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था.

शाम को ऐश्वर्य घर आए तो अंचल उन की ओर रोज की भांति दौड़ा. वह उसे उठाना ही चाहते थे कि तभी घुटनों के बल रेंगती अभिलाषा ने अपने हाथ आगे बढ़ा दिए. ऐश्वर्य चाहते हुए भी स्वयं को रोक न सके और अंचल के सिर पर हाथ फेरते हुए अभिलाषा को उन्होंने गोद में उठा लिया.

मैं यह सब देख रही थी, अत: झट अंचल को गोद में उठा कर पप्पी लेते हुए बोली, ‘‘राजा बेटा, मेरी गोद में आ जाएगा, है न बेटे?’’ तब मैं ने अंचल की नजरों में निरीहता की भावना को मिटते हुए अनुभव किया.

तभी भारत से मां व भैया का पत्र आया, जिस में हम दोनों पतिपत्नी को यह विशेष हिदायत दी गई थी कि छोटी बच्ची को प्यार करते समय अंचल की उपेक्षा न होने पाए, वरना बचपन से ही उस के मन में अभिलाषा के प्रति द्वेषभाव पनप सकता है. इस बात को तो मैं पहले ही ध्यान में रखती थी और इस पत्र के पश्चात और भी चौकन्नी हो गई थी.

मेरे सामने तो अंचल का व्यवहार सामान्य रहता था, पर जब मैं किसी काम में लगी होती थी और छिप कर उस के व्यवहार का अवलोकन करती थी. ऐसा करते हुए मैं ने पाया कि हमारे समक्ष तो वह स्वयं को नियंत्रित रखता था, परंतु हमारी अनुपस्थिति में वह अभिलाषा को छेड़ता रहता था और कभीकभी उसे धक्का भी दे देता था.

मैं समयसमय पर अंचल का मार्ग- दर्शन करती रहती थी, परंतु उस का प्रभाव उस के नन्हे से मस्तिष्क पर थोड़ी ही देर के लिए पड़ता था.

बाल मनोविज्ञान की यह धारणा कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण न केवल युवावस्था में अपितु बचपन में भी होता है. अर्थात पुत्री पिता को अधिक प्यार करती है व पुत्र माता से अधिक जुड़ा होता है, मेरे घर में वास्तव में सही सिद्ध हो रही थी.

एक दिन कार्यालय से लौटते समय ऐश्वर्य एक सुंदर सी गुडि़या लेते आए. अभिलाषा 10 माह की हो चुकी थी. गुडि़या देख कर वह ऐश्वर्य की ओर लपकी.

मैं ने फुसफुसाते हुए ऐश्वर्य से पूछा, ‘‘अंचल के लिए कुछ नहीं लाए?’’

उन के ‘न’ कहने पर मैं तो चुप हो गई, पर मैं ने अंचल की आंखों में उपजे द्वेषभाव व पिता के प्रति क्रोध की चिनगारी स्पष्ट अनुभव कर ली थी. मैं ने धीरे से उस का हाथ पकड़ा, रसोई की ओर ले जाते हुए उसे बताया, ‘‘बेटे, मैं ने आज तुम्हारे मनपसंद बेसन के लड्डू बनाए हैं, खाओगे न?’’

अंचल बोला, ‘‘नहीं मां, मेरा जरा भी मन नहीं है. पहले एक बात बताइए, आप जब भी हमें बाजार ले जाती हैं तो मेरे व अभिलाषा दोनों के लिए खिलौने खरीदती हैं, पर पिताजी तो आज मेरे लिए कुछ भी नहीं लाए? ऐसा क्यों किया उन्होंने? क्या वह मुझे प्यार नहीं करते?’’

जिस प्रश्न का मुझे डर था, वही मेरे सामने था, मैं ने उसे पुचकारते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटे, पिताजी तो तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. उन के कार्यालय से आते समय बीच रास्ते में एक ऐसी दुकान पड़ती है जहां केवल गुडि़या ही बिकती हैं. इसीलिए उन्होंने एक गुडि़या खरीद ली. अब तुम्हारे लिए तो गुडि़या खरीदना बेकार था क्योंकि तुम तो कारों से खेलना पसंद करते हो. पिछले सप्ताह उन्होंने तुम्हें एक ‘रोबोट’ भी तो ला कर दिया था. तब अभिलाषा तो नहीं रोई थी. जाओ, पिताजी के पास जा कर उन्हें एक पप्पी दे दो. वह खुश हो जाएंगे.’’

अंचल दौड़ कर अपने पिताजी के पास चला गया. मैं ने उस के मन में उठते हुए ईर्ष्या के अंकुर को कुछ हद तक दबा दिया था. वह अपनी ड्राइंग की कापी में कोई चित्र बनाने में व्यस्त हो गया था.

कुछ दिन पहले ही उस ने नर्सरी स्कूल जाना आरंभ किया था और यह उस के लिए अच्छा ही था. ऐश्वर्य को बाद में मैं ने यह बात बतलाई तो उन्होंने भी अपनी गलती स्वीकार कर ली. इन 2 छोटेछोटे बच्चों की छोटीछोटी लड़ाइयों को सुलझातेसुलझाते कभीकभी मैं स्वयं बड़ी अशांत हो जाती थी क्योंकि हम उन दोनों को प्यार करते समय सदा ही एक संतुलन बनाए रखने की चेष्टा करते थे.

अब तो एक वर्षीय अभिलाषा भी द्वेष भावना से अप्रभावित न रह सकी थी. अंचल को जरा भी प्यार करो कि वह चीखचीख कर रोने लगती थी. अपनी गुडि़या को तो वह अंचल को हाथ भी न लगाने देती थी और इसी प्रकार वह अपने सभी खिलौने पहचानती थी. उसे समझाना अभी संभव भी न था. अत: मैं अंचल को ही प्यार से समझा दिया करती थी.

मैं मारने का अस्त्र प्रयोग में नहीं लाना चाहती थी क्योंकि मेरे विचार से इस अस्त्र का प्रयोग अधिक समय तक के लिए प्रभावी नहीं होता, जबकि प्यार से समझाने का प्रभाव अधिक समय तक रहता है. हम दोनों ही अपने प्यार व ममता की इस तुला को संतुलन की स्थिति में रखते थे.

एक दिन अंचल की आंख में कुछ चुभ गया. वह उसे मसल रहा था और आंख लाल हो चुकी थी. तभी वह मेरे पास आया. उस की दोनों आंखों से आंसू बह रहे थे.

मैं ने एक साफ रूमाल से अंचल की आंख को साफ करते हुए कहा, ‘‘बेटे, तुम्हारी एक आंख में कुछ चुभ रहा था, पर तुम्हारी दूसरी आंख से आंसू क्यों बह रहे हैं?’’

वह मासूमियत से बोला, ‘‘मां, है न अजीब बात. पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा है?’’

मैं ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘देखो बेटे, जिस तरह तुम्हारी एक आंख को कोई तकलीफ होती है तो दूसरी आंख भी रोने लगती है, ठीक उसी प्रकार तुम और अभिलाषा मेरी व पिताजी की दोनों आंखों की तरह हो. यदि तुम दोनों में से एक को तकलीफ होती हो तो दूसरे को तकलीफ होनी चाहिए. इस का मतलब यह हुआ कि यदि तुम्हारी बहन को कोई तकलीफ हो तो तुम्हें भी उसे अनुभव करना चाहिए. उस की तकलीफ को समझना चाहिए और यदि तुम दोनों को कोई तकलीफ या परेशानी होगी तो मुझे और तुम्हारे पिताजी को भी तकलीफ होगी. इसलिए तुम दोनों मिलजुल कर खेलो, आपस में लड़ो नहीं और अच्छे भाईबहन बनो. जब तुम्हारी बहन बड़ी होगी तो हम उसे भी यही बात समझा देंगे.’’

अंचल ने बात के मर्म व गहराई को समझते हुए ‘हां’ में सिर हिलाया.

तभी से मैं ने अंचल के व्यवहार में कुछ परिवर्तन अनुभव किया. पिता का प्यार अब दोनों को बराबर मात्रा में मिल रहा था और मैं तो पहले से ही संतुलन की स्थिति बनाए रखती थी.

तभी रक्षाबंधन का त्योहार आ गया. मैं एक भारतीय दुकान से राखी खरीद लाई. अभिलाषा ने अंचल को पहली बार राखी बांधनी थी. राखी से एक दिन पूर्व अंचल ने मुझ से पूछा, ‘‘मां, अभिलाषा मुझे राखी क्यों बांधेगी?’’

मैं ने उसे समझाया, ‘‘बेटे, वह तुम्हारी कलाई पर राखी बांध कर यह कहना चाहती है कि तुम उस के अत्यंत प्यारे बड़े भाई हो व सदा उस का ध्यान रखोगे, उस की रक्षा करोगे. यदि उसे कोई तकलीफ या परेशानी होगी तो तुम उसे उस तकलीफ से बचाओगे और हमेशा उस की सहायता करोगे.’’

अंचल आश्चर्य से मेरी बातें सुन रहा था. बोला, ‘‘मां, यदि राखी का यह मतलब है तो मैं आज से वादा करता हूं कि मैं अभिलाषा को कभी नहीं मारूंगा, न ही उसे कभी धक्का दूंगा, अपने खिलौनों से उसे खेलने भी दूंगा. जब वह बड़ी हो कर स्कूल जाएगी और वहां पर उसे कोई बच्चा मारेगा तो मैं उसे बचाऊंगा,’’ यह कह कर वह अपनी एक वर्षीय छोटी बहन को गोद में उठाने की चेष्टा करने लगा.

अंचल की बातें सुन कर मैं कुछ हलका अनुभव कर रही थी. साथ ही यह भी सोच रही थी कि छोटे बच्चों के पालनपोषण में मातापिता को कितने धैर्य व समझदारी से काम लेना पड़ता है.

आज इन बातों को 20 वर्ष हो चुके हैं. अंचल ब्रिटिश रेलवे में वैज्ञानिक है व अभिलाषा डाक्टरी के अंतिम वर्ष में पढ़ रही है. ऐसा नहीं है कि अन्य भाईबहनों की भांति उन में नोकझोंक या बहस नहीं होती, परंतु इस के साथ ही दोनों आपस में समझदार मित्रों की भांति व्यवहार करते हैं. दोनों के मध्य सामंजस्य, सद्भाव, स्नेह व सहयोग की भावनाओं को देख कर उन के बचपन की छोटीछोटी लड़ाइयां याद आती हैं तो मेरे होंठों पर स्वत: मुसकान आ जाती है.

इस के साथ ही याद आती है अपने प्यार व ममता की वह तुला, जिस के दोनों पलड़ों में संतुलन रखने का प्रयास हम पतिपत्नी अपने आपसी मतभेद व वैचारिक विभिन्नताओं को एक ओर रख कर किया करते थे. दरवाजे की घंटी बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूं. सामने अंचल हाथ में एक खूबसूरत राखी लिए खड़ा है. मुसकराते हुए वह कहता है, ‘‘मां, कल रक्षाबंधन है, अभिलाषा आज शाम तक आ जाएगी न?’’

‘‘हां बेटा, भला आज तक अभिलाषा कभी रक्षाबंधन का दिन भूली है,’’ मैं हंसते हुए कहती हूं.

‘‘मैं ने सोचा, पता नहीं बेचारी को लंदन में राखी के लिए कहांकहां भटकना पड़ेगा. इसलिए मैं राखी लेता आया हूं. आप ने मिठाई वगैरा बना ली है न?’’ अंचल ने कहा.

मैं ने ‘हां’ में सिर हिलाया और मुसकराते हुए पति की ओर देखा, जो स्वयं भी मुसकरा रहे थे.

लेखिका- कल्पना गुप्ता 

Women’s Day- मेरा अभिमान: क्या पति को भूल गई निवेदिता?

‘‘कितनी खूबसूरत लग रही है निवेदिता दुलहन के वेश में. गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें और तीखातिकोना चेहरा,’’ समता मौसी दुलहन की बलाएं लेते हुए बोलीं.

‘‘काश, दूल्हे के बारे में भी यही कहा जा सकता…’’ घर आए मेहमानों में से किसी ने कहा.

‘‘यह बात तो है… कहां हमारी निवेदिता एमए तक पढ़ी है… इतनी खूबसूरत और आश्रय सिर्फ 12वीं जमात तक पढ़ा है. पिता की मौत के बाद उन की जगह ही नौकरी लग गई है. रंग भी कुछ दबा हुआ है,’’ निवेदिता की बूआ ने कहा.

निवेदिता के घर में भी पैसा नहीं था. अगर उस के मातापिता को शादी की जल्दी थी. निवेदिता और पढ़ना भी चाहती थी, पर उस की शादी तय कर दी गई.

‘‘हां, कमाताखाता लड़का देख कर शादी कर रहे हैं,’’ किसी ने बात को आगे बढ़ाया.

शादी के बाद रात को निवेदिता सुहाग सेज पर बैठी हुई थी और उम्मीद के मुताबिक बिना किसी तामझाम व दिखावे के आश्रय कमरे में आ गया और गंभीर अंदाज में बोला, ‘‘निवेदिता, आज हमारे मिलन की पहली रात है और ऐसा दस्तूर है कि इस दिन गिफ्ट जरूर दिया जाना चाहिए.

‘‘तुम्हें मेरी माली हालत पता ही है. पहले पिताजी की बीमारी के चलते लिया हुआ कर्ज उतारना पड़ा. इसी वजह से कुछ भी बचत नहीं हुई. फिर भी मैं तुम्हारे लिए यह घड़ी लाया हूं.

‘‘यह घड़ी सस्ती जरूर है, पर समय महंगी घडि़यों के बराबर ही बताती है. यह भी बताती है कि समय कीमती है, इसे बरबाद मत करो. और भी कुछ उपहार चाहिए हों तो मांग सकती हो, बशर्ते वह खरीदना मेरी हद में हो.’’

‘‘क्या मैं ऐसा कुछ चाहूं, जो आप की हद में हो तो आप देंगे?’’ निवेदिता ने झिझकते हुए पूछा.

‘‘जरूर,’’ आश्रय ने जवाब दिया.

‘‘मैं राज्य लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक परीक्षा में बैठना चाहती हूं. क्या आप मुझे इजाजत देंगे? मुझे ओबीसी कोटे में जल्दी ही नौकरी भी मिल सकती है,’’ निवेदिता ने पूछा.

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‘‘तुम्हारी पढ़ाई के लैवल के बारे में मैं अच्छी तरह से जानता हूं. निवेदिता, तुम इस एग्जाम में बैठ सकती हो. एक बार पतिपत्नी के संबंध बन जाने के बाद काबू करना मुश्किल होता है, इसलिए मैं चाहता हूं कि जब तक तुम अपने इम्तिहान में कामयाब न हो जाओ, तब तक हम दोनों एक नहीं होंगे’’

‘‘क्या…? आप ने मुझ से शादी किसी मजबूरी में की है? क्या आप मुझे प्यार नहीं करते हैं?’’ निवेदिता ने घबरा कर पूछा, क्योंकि उसे इस तरह के जवाब की उम्मीद नहीं थी.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तुम्हें काफी दिन से देख रहा हूं. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, इसलिए तुम्हारे कामयाब होने के बाद ही हम दोनों इस प्यार के सच्चे हकदार होंगे,’’ आश्रय ने निवेदिता की गोरीगोरी कलाइयों को पकड़ते हुए कहा.

‘‘और, अगर मेरा चयन नहीं हो पाया तो…?’’ निवेदिता ने सवाल किया.

‘‘जब भी जोकुछ होगा, सिर्फ तुम्हारी रजामंदी से होगा,’’ आश्रय बोला.

‘‘बाहर सब को क्या जवाब देंगे?’’ निवेदिता ने पूछा.

‘‘किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं है. बस, इतना कहना है कि हमें अगले 3 साल तक बच्चे की जरूरत नहीं है,’’ आश्रय ने जवाब दिया.

‘‘वाह… आश्रय, मैं कल से ही पढ़ाई शुरू कर देती हूं.’’

दूसरे दिन से निवेदिता ने पढ़ाई शुरू कर दी. आश्रय ने अपनी मम्मी को भी निवेदिता की इच्छा के बारे में बता दिया. घर में 3 लोगों का काम बहुत ज्यादा नहीं था. रसोईघर का ज्यादातर काम आश्रय की मम्मी कर देती थीं.

निवेदिता देर रात तक पढ़ती, तो आश्रय बीच में चाय या कौफी बना कर उसे दे देता. कभीकभार सिर दुखने पर अपने हाथों से तब तक हलकीहलकी मसाज करता, जब तक कि निवेदिता की आंख न लग जाती.

आखिरकार वह ऐतिहासिक पल भी आ ही गया, जब निवेदिता सभी लिखित इम्तिहानों और इंटरव्यू में कामयाब हो कर डिप्टी कलक्टर बन गई.

‘‘अब सिर्फ प्यार,’’ निवेदिता  आश्रय के गले में बांहों का फंदा डाल कर बोली.

‘‘मेहनत तो तुम्हारी ही है निवेदिता. मैं तो सिर्फ तुम्हारे साथ था. तुम मेरी पत्नी हो गुलाम नहीं. आज तो सिर्फ और सिर्फ प्यार होगा,’’ आश्रय मुसकराता हुआ बोला.

अभी वे दोनों बात कर ही रहे थे कि अचानक आश्रय के मोबाइल फोन की घंटी बजी.

‘‘क्या…? कब…? अच्छाअच्छा… हम अभी पहुंचते हैं,’’ आश्रय घबराई आवाज में बोला.

‘‘क्या हुआ…?’’ निवेदिता ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस तुम्हारे पापा की थोड़ी सी तबीयत खराब हो गई है,’’ आश्रय ने बताया.

निवेदिता और आश्रय जब तक पहुंचते, तब तक निवेदिता के पापा की मौत हो चुकी थी. अपनी मां को हिम्मत देने के लिए निवेदिता को वहीं पर रुकना पड़ा.

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निवेदिता को अपनी ट्रेनिंग की सूचना मिली, जो कि उस के मायके से तकरीबन 300 किलोमीटर दूर थी.

जौइन करने के साथ ही पता चला कि निवेदिता को अनुकूल शर्मा के अंडर ट्रेनिंग लेनी है.

अनुकूल शर्मा कुछ समय पहले तक निवेदिता के गृह जिले में ही थे और उन की अच्छे अफसरों में गिनती होती है.

अनुकूल शर्मा आ गए और अपने चैंबर में घुस गए. इजाजत ले कर निवेदिता भी चैंबर में आ गई.

‘‘तुम्हारे साथ वह बाहर कौन था?’’ लेटर देखते हुए अनुकूल शर्मा ने पूछा.

‘‘मेरे पति हैं,’’ निवेदिता ने कहा.

‘‘अब अगले 3 महीनों तक घरबार, पति, बच्चे सब भूल जाओ… समझी?’’ अनुकूल शर्मा ने कहा.

‘‘जी,’’ निवेदिता ने जवाब दिया.

‘‘मैं जा रहा हूं निवेदिता. अगले  3 महीनों तक खूब मेहनत करो. आगे की जिंदगी बहुत अच्छी होगी,’’ जातेजाते आश्रय ने निवेदिता से कहा.

अनुकूल शर्मा के अंडर में निवेदिता की टे्रनिंग खूब अच्छी चल रही थी. निवेदिता को अब तक सरकारी गाड़ी नहीं मिली थी. इसी वजह से वह अनुकूल शर्मा के साथ उन्हीं की सरकारी गाड़ी से टूर पर जाती थी.

ऐसे ही एक दिन जब वे दोनों टूर से लौट रहे थे, तो अनुकूल शर्मा बोले, ‘‘मुझे लगता है निवेदिता, तुम्हारे साथ ज्यादती हुई है.’’

‘‘आप को ऐसा क्यों लगता है सर…’’ निवेदिता ने अचरज भाव से पूछा.

‘‘तुम इतनी खूबसूरत और होशियार हो और तुम्हारा पति 12वीं जमात पास क्लर्क,’’ अनुकूल शर्मा ने कहा.

‘‘जिंदगी में हमें जो मिलता है, उसे हम बदल नहीं सकते,’’ निवेदिता बोली.

‘‘हम चाहें तो कुछ भी बदल सकते हैं. तुम ने भी यह नौकरी पा कर अपनी जिंदगी बदल दी है.’’

‘‘पर, अब किया क्या जा सकता है. आज मैं जोकुछ भी हूं, आश्रय के चलते ही हूं,’’ निवेदिता बोली.

‘‘कल उसी आश्रय के चलते तुम्हें शर्मिंदगी होगी. किसी पार्टी में तुम उसे ले जा नहीं पाओगी. तुम्हारे पीछे लोग उसे मखमल में टाट का पैबंद बताएंगे. रही कुछ करने की बात तो उस ने तुम पर कितने रुपए खर्च किए होंगे? लाख 2 लाख. तुम उसे 5 लाख दे कर हिसाब चुकता कर दो.

‘‘मैं ने भी अपनी देहाती पत्नी से तलाक के लिए अर्जी दी हुई है, क्योंकि वह मेरे स्टेटस के मुताबिक नहीं है. तुम भी ऐसा कर सकती हो. कल पछताने से आज सही फैसला लेना बेहतर है…’’ अनुकूल शर्मा बोले, ‘‘मुझे तो लगता है कि आश्रय मर्द ही नहीं है, वरना 3 साल तक कौन पति ऐसा होगा, जो अपनी पत्नी से दूर रहेगा?’’

निवेदिता ने कोई जवाब नहीं दिया.

दरअसल, पिछले 2 महीने से कुछ ज्यादा समय से साथ रहने के चलते अनुकूल शर्मा को ऐसा लगने लगा था कि निवेदिता उन की तरफ खिंच रही है.

एक दिन अचानक निवेदिता के पास कलक्टर का फोन पहुंचा और उसे तुरंत मिलने के लिए बुलाया गया.

‘‘बधाई हो निवेदिता, अनुकूल शर्मा जैसे काबिल अफसर ने आप की बहुत अच्छी रिपोर्ट दी है,’’ कलक्टर खुश हो कर बोले.

‘शुक्रिया सर’ कह कर निवेदिता कलक्टर औफिस से बाहर आ गई.

‘‘बधाई हो निवेदिता, एक पार्टी तो बनती ही है. ऐसा करते हैं कि आज  तुम औफिस का चार्ज ले लो. शनिवार और रविवार की छुट्टी है. हम पास  के शहर चलेंगे. वहां पार्टी करेंगे. सबकुछ मेरी तरफ से होगा,’’ अनुकूल शर्मा बोले.

‘‘जी सर,’’ कह कर निवेदिता अपने नए औफिस में चार्ज लेने चली गई.

जब आश्रय को निवेदिता के चार्ज लेने की बात पता चली, तो वह बहुत खुश हुआ. उस ने फोन पर अपने मन की बात कही.

‘‘तुम्हें देखने की बहुत इच्छा हो रही है. शनिवार और रविवार को छुट्टी है. मैं वहां आ जाता हूं.’’

‘‘अरे, नहींनहीं. शनिवार और रविवार को तो मुझे कलक्टर साहब के साथ राजधानी जाना है,’’ निवेदिता ने झूठ बोलते हुए उसे रोक दिया.

शुक्रवार की शाम जब आश्रय दफ्तर से घर लौटा, तो रसोईघर में से हलवा बनने की मस्त महक आ रही थी.

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‘‘मां, आज हलवा क्यों बन रहा है? कोई त्योहार है क्या?’’ दरवाजे से अंदर आते हुए आश्रय ने पूछा.

‘‘त्योहार से भी बढ़ कर है…’’ मां रसोईघर में से ही बोलीं.

‘‘मैं समझा नहीं,’’ आश्रय ने पूछा.

‘‘तो रसोईघर के भीतर आ कर देख ले,’’ मां बोलीं.

‘‘अरे, निवेदिता तुम…’’ रसोईघर में घुसते ही आश्रय खुशी से चिल्लाया.

निवेदिता ने अपनी स्थायी नियुक्ति तक की पूरी बात आश्रय को बता दी.

‘‘चलो निवेदिता, शाम का खाना हम कहीं बाहर खाते हैं,’’ आश्रय बोला.

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं. इन 3 दिनों का एक पल भी मुझे किसी के साथ शेयर नहीं करना है. मुझे सिर्फ तुम और तुम चाहिए,’’ निवेदिता किसी जिद्दी बच्ची सी बोली.

शनिवार की सुबह तकरीबन 10 बजे अनुकूल शर्मा का फोन आया, ‘निवेदिता, कहां हो तुम? हमें पार्टी केलिए जाना था.’

‘‘सर, मैं स्वर्ग में हूं और यहां से नहीं आ सकती.’’

‘स्वर्ग… वह कहां है?’ अनुकूल शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘सर, यह हर उस जगह है, जहां पतिपत्नी अपने परिवार के साथ रहते हैं. मैं भी अपने पति के साथ हूं. आप ने ट्रेनिंग के दौरान मुझे एक बात सिखाई थी कि सोने का गहना कितना ही बड़ा क्यों न हो, अगर उस में छोटा सा हीरा लग जाए तो उस की कीमत दोगुनी हो जाती है.

‘‘आश्रय भी मेरी जिंदगी का एक ऐसा ही हीरा है, जिस के लगने से  मेरी जिंदगी अनमोल हो गई है. मुझे कभी भी आश्रय के चलते कोई शर्मिंदगी नहीं होगी.

‘‘धन्यवाद और नमस्कार सर. मैं आप से 2 दिन बाद मिलती हूं,’’ इतना कह कर निवेदिता ने फोन काट दिया.

Women’s Day- प्रतिबंध: क्या औरतों पर रोक लगाने से रुक गया यौन शोषण

इस मल्टीनैशनल कंपनी पर यह दूसरी चोट है. इस से पहले भी एक बार यह कंपनी बिखर सी चुकी है. उस समय कंपनी की एक खूबसूरत कामगार स्नेहा ने अपने बौस पर आरोप लगाया था कि वे कई सालों से उस का यौन शोषण करते आ रहे हैं. उस के साथ सोने के लिए जबरदस्ती करते आ रहे हैं और यह सब बिना शादी की बात किए.

स्नेहा को लग रहा था कि बौस उस से शादी कर ही लेंगे क्योंकि वे घर सज्जा में भी उस की राय लेते रहे थे.

ऐसा नहीं था कि स्नेहा केवल खूबसूरत ही थी, काबिल नहीं. उस ने बीटैक के बाद एमटैक कर रखा था और वह अपने काम में भी माहिर थी. वह बहुत ही शोख, खुशमिजाज और बेबाक थी. उस ने अपनी कड़ी मेहनत से कंपनी को केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी कामयाबी दिलवाई थी.

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इस तरह स्नेहा खुद भी तरक्की करती गई थी. उस का पैकेज भी दिनोंदिन मोटा होता जा रहा था. वह बहुत खुश थी. चिडि़या की तरह हरदम चहचहाती रहती थी. उस के आगे अच्छेअच्छे टिक नहीं पाते थे.

पर अचानक स्नेहा बहुत उदास रहने लगी थी. इतनी उदास कि उस से अब छोटेछोटे टारगेट भी पूरे नहीं होते थे.

इसी डिप्रैशन में स्नेहा ने यह कदम उठाया था. वह शायद यह कदम उठाती नहीं, पर एक लड़की सबकुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अपने प्यार में साझेदारी कभी नहीं.

जी हां, स्नेहा की कंपनी में वैसे तो तमाम खूबसूरत लड़कियां थीं, पर हाल ही में एक नई भरती हुई थी. वह अच्छी पढ़ीलिखी और ट्रेंड लड़की थी. साथ ही, वह बहुत खूबसूरत भी थी. उस ने खूबसूरती और आकर्षण में स्नेहा को बहुत पीछे छोड़ दिया था.

इसी के चलते वह लड़की बौस की खास हो गई थी. बौस दिनरात उसे आगेपीछे लगाए रहते थे. स्नेहा यह सब देख कर कुढ़ रही थी. पलपल उस का खून जल रहा था.

आखिरकार स्नेहा ने एतराज किया, ‘‘सर, यह सब ठीक नहीं है.’’

‘‘क्या… क्या ठीक नहीं है?’’ बौस ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘आप अपना वादा भूल बैठे हैं.’’

‘‘कौन सा वादा?’’

‘‘मुझ से शादी करने का…’’

‘‘पागल हो गई हो तुम… मैं ने तुम से ऐसा वादा कब किया…? आजकल तुम बहुत बहकीबहकी बातें कर रही हो.’’

‘‘मैं बहक गई हूं या आप? दिनरात उस के साथ रंगरलियां मनाते रहते…’’

बौस ने अपना तेवर बदला, ‘‘देखो स्नेहा, मैं तुम से आज भी उतनी ही मुहब्बत करता

हूं जितनी कल करता था… इतनी छोटीछोटी बातों पर ध्यान

मत दो… तुम कहां से कहां पहुंच

गई हो. अच्छा पैकेज मिल रहा है तुम्हें.’’

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, अपनी मेहनत से हूं.’’

‘‘यही तो मैं कह रहा हूं… स्नेहा, तुम समझने की कोशिश करो… मैं किस से मिल रहा हूं… क्या कर रहा हूं, क्या नहीं, इस पर ध्यान मत दो… मैं जोकुछ भी करता हूं वह सब कंपनी की भलाई के लिए करता हूं… तुम्हारी तरक्की में कोई बाधा आए तो मुझ से शिकायत करो… खुद भी जिंदगी का मजा लो और दूसरों को भी लेने दो.’’

पर स्नेहा नहीं मानी. उस ने साफतौर पर बौस से कह दिया, ‘‘मुझे कुछ नहीं पता… मैं बस यही चाहती हूं कि आप वर्षा को अपने करीब न आने दें.’’

‘‘स्नेहा, तुम्हारी समझ पर मुझे अफसोस हो रहा है. तुम एक मौडर्न लड़की हो, अपने पैरों पर खड़ी हो. तुम्हें इस तरह की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए.’’

‘‘आप मुझे 3 बार हिदायत दे चुके हैं कि मैं इन छोटीछोटी बातों पर ध्यान न दूं… मेरे लिए यह छोटी बात नहीं है… आप उस वर्षा को इतनी अहमियत न दें, नहीं तो…

‘‘नहीं तो क्या…?’’

‘‘नहीं तो मैं चीखचीख कर कहूंगी कि आप पिछले कई सालों से मेरी बोटीबोटी नोचते रहे हो…’’

बौस अपना सब्र खो बैठे, ‘‘जाओ, जो करना चाहती हो करो… चीखोचिल्लाओ, मीडिया को बुलाओ.’’

स्नेहा ने ऐसा ही किया. सुबह अखबार के पन्ने स्नेहा के बौस की करतूतों से रंगे पड़े थे. टैलीविजन चैनल मसाला लगालगा कर कवरेज को परोस रहे थे.

यह मामला बहुत आगे तक गया. कोर्टकचहरी से होता हुआ नारी संगठनों तक. इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि सभी सकते में आ गए. वह यह कि वर्षा का खून हो गया. वर्षा का खून क्यों हुआ? किस ने कराया? यह राज, राज ही रहा. हां, कानाफूसी होती रही कि वर्षा पेट से थी और यह बच्चा बौस का नहीं, कंपनी के बड़े मालिक का था.

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इस सारे मामले से उबरने में कंपनी को एड़ीचोटी एक करनी पड़ी. किसी तरह स्नेहा शांत हुई. हां, स्नेहा के बौस की बरखास्तगी पहले ही हो चुकी थी.

कंपनी ने राहत की सांस ली. उसने एक नोटीफिकेशन जारी किया कि कंपनी में काम कर रही सारी लड़कियां और औरतें जींसटौप जैसे मौडर्न कपड़े न पहन कर आएं.

कंपनी के नोटीफिकेशन में मर्दों के लिए भी हिदायतें थीं. उन्हें भी मौडर्न कपड़े पहनने से गुरेज करने को कहा गया. जींसपैंट और टाइट टीशर्ट पहनने की मनाही की गई.

इन निर्देशों का पालन भी हुआ, फिर भी मर्दऔरतों के बीच पनप रहे प्यार के किस्सों की भनक ऊपर तक पहुंच गई.

एक बार फिर एक अजीबोगरीब फैसला लिया गया. वह यह कि धीरेधीरे कंपनी से लेडीज स्टाफ को हटाया जाने लगा. गुपचुप तरीके से 1-2 कर के जबतब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा. किसीकिसी को कहीं और शिफ्ट किया जाने लगा.

दूसरी तरफ लड़कियों की जगह कंपनी में लड़कों की बहाली की जाने लगी. इस का एक अच्छा नतीजा यह रहा कि इस कंपनी में तमाम बेरोजगार लड़कों की बहाली हो गई.

इस कंपनी की देखादेखी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनियों ने भी यही कदम उठाया. इस तरह देखते ही देखते नौजवान बेरोजगारों की तादाद कम होने लगी. उन्हें अच्छा इनसैंटिव मिलने लगा. बेरोजगारों के बेरौनक चेहरों पर रौनक आने लगी.

पहले इस कंपनी की किसी ब्रांच में जाते तो रिसैप्शन पर मुसकराती हुई, लुभाती हुई, आप का स्वागत करती हुई लड़कियां ही मिलती थीं. उन के जनाना सैंट और मेकअप से रोमरोम में सिहरन पैदा हो जाती थी. नजर दौड़ाते तो चारों तरफ लेडीज चेहरे ही नजर आते. कुछ कंप्यूटर और लैपटौप से चिपके, कुछ इधरउधर आतेजाते.

पर अब मामला उलटा था. अब रिसैप्शन पर मुसकराते हुए नौजवानों से सामना होता. ऐसेऐसे नौजवान जिन्हें देख कर लोग दंग रह जाते. कुछ तगड़े, कुछ सींक से पतले. कुछ के लंबेलंबे बाल बिलकुल लड़कियों जैसे और कुछ के बहुत ही छोटेछोटे, बेतरतीब बिखरे हुए.

इन नौजवानों की कड़ी मेहनत और हुनर से अब यह कंपनी अपने पिछले गम भुला कर धीरेधीरे तरक्की के रास्ते पर थी. नौजवानों ने दिनरात एक कर के, सुबह

10 बजे से ले कर रात 10 बजे तक कंप्यूटर में घुसघुस कर योजनाएं बनाबना कर और हवाईजहाज से उड़ानें भरभर कर एक बार फिर कंपनी में जान डाल दी थी.

इसी बीच एक बार फिर कंपनी को दूसरी चोट लगी. कंपनी के एक नौजवान ने अपने बौस पर आरोप लगाया कि वे पिछले 2 सालों से उस का यौन शोषण करते आ रहे हैं.

उस नौजवान के बौस भी खुल कर सामने आ गए. वे कहने लगे, ‘‘हां, हम दोनों के बीच ऐसा होता रहा है… पर यह सब हमारी रजामंदी से होता रहा?है.’’

बौस ने उस नौजवान को बुला कर समझाया भी, ‘‘यह कैसी नादानी है?’’

‘‘नादानी… नादानी तो आप कर रहे हैं सर.’’

‘‘मैं?’’

‘‘हां, और कौन? आप अपना वादा भूल रहे हैं.’’

‘‘कैसा वादा?’’

‘‘मेरे साथ जीनेमरने का… मुझ से शादी करने का.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’’

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‘‘दिमाग तो आप का खराब हो गया है, जो आप मुझ से नहीं, एक लड़की से शादी करने जा रहे हैं.’’

Women’s Day- ऐसा कैसे होगा: उम्र की दहलीज पर आभा

बड़े बाबू के पूछने पर मैं ने अपनी उम्र 38 वर्ष बताई, सहज रूप में ही कह दिया था, ‘38…’ हालांकि बड़े बाबू अच्छी तरह जानते थे कि मेरी जन्मतिथि क्या है, शायद उन्होंने उस पर इतना ध्यान भी नहीं दिया. लेकिन तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी उम्र कम बता रही हूं. यह बात शायद बड़े बाबू जान गए थे और अपनी नाक पर टिके चश्मे से ऊपर आंखें चमका कर मुझे उपहासभरी दृष्टि से देख रहे थे.

वैसे मैं 39 वर्ष 7 महीने 11 दिन की हो गई हूं. सामान्यरूप से इसे 40 वर्ष की उम्र कहा जा सकता है. किंतु मैं 40 वर्ष की कैसे हो सकती हूं? 40 वर्ष तक तो व्यक्ति प्रौढ़ हो जाता है. लेकिन मैं तो अभी जवान हूं, सुंदर हूं, आकर्षक हूं.

नौजवान सहयोगी हसरतभरी निगाहों से मुझे देखते हैं. लोगों की आंखों को मैं पढ़ सकती हूं, भले ही उन में वासना के कलुषित डोरे रहते हैं, कामातुर विकारों से ग्रस्त रहती हैं उन की आंखें, फिर भी मुझे अच्छा लगता है. मुझ से बातें करने की उन की ललक, मेरी यों ही अनावश्यक तारीफ, मेरे कपड़ों के रंग, मेरा मुसकराना, बोलने का लहजा, काम करने का तरीका आदि अनेक चीजें हैं, जो काबिलेतारीफ कही जाती हैं. दूसरों की आंखों में आंखें डाल कर बात करने का मेरा सलीका लोगों को प्रभावित करता है. ये बातें मैं उन तमाम निकटस्थ सहयोगियों के क्रियाकलापों से जान जाती हूं.

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मेरा मन चाहता है कि लोग मुझे घूरें, मेरे मांसल शरीर के ईदगिर्द अपनी निगाहें डालें, मेरा सामीप्य पाने के लिए बहाने ढूंढ़ें, मुझ से बातें करें व प्रेम करने की हद तक भाव प्रदर्शित करें.

किंतु मैं 40 वर्ष की कैसे हो सकती हूं? अभी तो मैं ने कौमार्यवय की अठखेलियों में भाग ही नहीं लिया, जवानी के उफनते वेग में पागल भी नहीं हुई. किसी के प्रणय में मदांध होना तो दूर, स्वच्छंद रतिविलासों का अनुभव भी नहीं किया. किसी के लौह बंधन में बंध कर चरमरा कर बिखर जाने की कामना अभी पूरी कहां हुई है? नारीत्व के समर्पित सुख का अनुभव कहां लिया है? मैं अभी 40 वर्ष की प्रौढ़ा कैसे हो सकती हूं?

मैं ने जब से इस बढ़ती उम्र के गणित को सोचना प्रारंभ किया है, घबरा गई हूं, मन बेचैन सा हो गया है. शरीर में अचानक शिथिलता आ गई है. गालों पर कसी हुई त्वचा जैसे अपने कसाव कम कर रही है. ऐसा लग रहा है जैसे नदी उतर रही है, उस में आई बाढ़ जैसे घट रही है. आंखों के नीचे हलके निशान उभर आए हैं. हलकी सी श्यामलता चेहरे पर छा रही है.

लेकिन यह कैसे हो सकता है? बाबूजी की मृत्यु को 4 बरस हो गए. छोटू का इस बार एमबीबीएस कोर्स पूरा हो जाएगा, लेकिन उसे एमडी बनना है, 2-3 साल अभी लगेंगे. विभा इस वर्ष स्नातिका हो जाएगी. मामाजी ने उस के लिए एक रिश्ते की बात की है. अगले मार्च में उस की शादी कर देंगे. छोटू का भी कुछ प्रेमप्रसंग जोरशोर से चल रहा है, लड़की पंजाबी है, साथ पढ़ती है, इस में बुराई भी क्या है.

लेकिन, मैं अब क्या करूंगी? सोचती थी कि इन 4 सालों में विभा की पढ़ाई पूरी हो जाएगी और छोटू घर संभाल लेगा, तब मैं आजाद हो जाऊंगी. मेरे चाहने वाले बहुत हैं, ढेर सारे उम्मीदवार हैं, तब अपने विषय में सोचूंगी एकदम निश्ंिचत हो कर. लेकिन, इस अवधि में मैं 40 वर्ष की प्रौढ़ा कैसे हो सकती हूं?

घर वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं है. बाबूजी कई रिश्ते लाए थे. जातिबिरादरी के, ऊंचे खानदान वाले, बड़ीबड़ी मांगों, दहेज की आकांक्षा वाले लोग. बाबूजी मेरा विवाह कर भी सकते थे. लेकिन तब छोटू एमबीबीएस न कर पाता, विभा बीए की पढ़ाई भी न कर पाती. सारी जमा पूंजी समाप्त हो जाती. मैं बड़ी बेटी हूं न, सारी समस्याएं जानती हूं.

शादी का नाम लेते ही मैं चिढ़ जाती थी, काटने दौड़ती थी. लोग मेरे सामने शादी की बात करने से डरते थे. वे मेरी आलोचना भी करते थे. भलाबुरा भी कहते थे. कोई कहता, ‘गोल्ड मैडलिस्ट है न, इसीलिए दिमाग आसमान पर चढ़ा है.’

दूसरा कहता, ‘रूपगर्विता है, अपने सौंदर्य का बड़ा अभिमान है.’

शादी के नाम पर जैसे मुझे सचमुच चिढ़ थी. किसी की ताबेदारी में रहना मुझे स्वीकार न था.

अच्छी कंपनी में इज्जत की नौकरी है, अच्छीखासी तनख्वाह है, प्रतिष्ठा है. औफिस में रोबदाब है, घर में भी लोग डरते हैं. छोटू और विभा भी सामने आने से कतराते हैं. मां भी जैसे खुशामद सी करती हैं. सबकुछ असहज और अस्वाभाविक लगता है. मन करता है कि विभा मेरे गले में बांहें डाल कर लिपट जाए, छोटू मेरी चोटी खींच कर भाग जाए. मां मुझे डांटें, धमकाएं, लेकिन वह सब कतई बंद है.

मां की बीमारी बढ़ गई है, उन्हें अस्पताल में भरती कराना ही पड़ेगा. डाक्टर ने साफ कह दिया है कि अब ज्यादा दिन नहीं जिएंगी. अंतिम अवस्था है.

लेकिन मेरी अंतिम अवस्था नहीं है. मैं घुलघुल कर नहीं मरूंगी, अपने वजूद को बचा कर रखूंगी. मुझे अभी प्रौढ़ा नहीं बनना है.

अपना राजपाल है न, मुझ पर जान देता है. हमउम्र और हमपेशा भी है. बेचारा विधुर है, 10 साल से एकाकी है. मेरे खयाल से उस से मिलना चाहिए. वह वासना और प्रेम का अंतर जानता है, उस में गहरी समझदारी है.

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एक बार समझदारी के साथ ही उस ने शादी का अप्रत्यक्ष प्रस्ताव भी रखा था और मैं उस के प्रस्ताव से प्रभावित भी थी.

वह बोला था, ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम दोनों इस मुद्दे पर एक लंबी वार्त्ता करें, जिस में अनेक सत्र हों, जो दिनों, महीनों, वर्षों तक चले. अब हमारेतुम्हारे पास विषय तो बहुत से हैं न, उन सभी विषयों पर सलीके से बातें करें. उन पर सोचें, व्यवहार करें, तुम मेरे विचारों की प्रयोगशाला बन जाओ और मैं तुम्हारे खयालों की ठोस जमीन. हम दोनों एकदूसरे से अपने प्रश्नों का समाधान कराएं. क्या तुम अपनी बकाया जिंदगी मेरे ऊलजलूल प्रश्नों को सुलझाने के लिए मेरे नाम कर सकती हो? क्या मैं तुम्हें समझने की कोशिश में तमाम उम्र बिता सकता हूं? सच कहता हूं, मैं तुम्हारी अनंत जिज्ञासाओं का एकमात्र समाधान हूं. मेरे अंतर्मन के पृष्ठों को पलट कर तो देखो.’

मैं कई दिनों से राजपाल के विषय में ही सोच रही हूं. वह एक परिपक्व व्यक्तित्व की गरिमा से युक्त है, संवेदनशील है. उस में कोई छिछोरापन नहीं है. प्रणय प्रस्ताव रखने में भी समझदारी से काम लेता है.

एक दिन कहने लगा, ‘आभा, तुम्हारे होंठों पर लगी लिपस्टिक और मेरे पैन की स्याही एकजैसी है, हलकी मैरून. यह रंग मन की अनुराग भावना को व्यक्त करता है, क्यों?’

मैं ने हलकी सी मुसकराहट फेंकी और आगे बढ़ गई. उस की बात बहुत दिनों तक मेरा पीछा करती रही. वह एक सभ्य और जिम्मेदार अफसर है. उस के साथ उठाबैठा जा सकता है.

कल मां को अस्पताल में भरती करा दूंगी. छोटू को स्कौलरशिप मिलती है. विभा की शादी के लिए बाबू की एफडी तो है. मामाजी सब संभाल लेंगे. मैं आज शाम को राजपाल के बंगले पर जाऊंगी, साफसाफ बात करूंगी और आजकल में ही निर्णय ले लूंगी.

मुझे अभी 40 साल की प्रौढ़ा नहीं बनना. 40 साल में अभी 5 महीने बाकी हैं. इन 5 महीनों में मैं अपना कौमार्य अनुभव करूंगी, नाचूंगी, गाऊंगी, आकाश में उड़ूंगी, सितारों से बातें करूंगी, चांद को छू कर देखूंगी.

अभी मुझे 40 साल की नहीं होना, सबकुछ व्यवस्थित हो गया है, सबकुछ ठीकठाक है.

स्नान करने के बाद मैं ने हलका सा मेकअप किया व नीली साड़ी पहनी. होंठों पर हलके मैरून रंग की लिपस्टिक लगाई. फिर विदेशी इत्र की सुगंध से सराबोर हो कर चल दी अपना अंतिम निर्णय लेने, अपने निश्चित गंतव्य के लिए.

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Women’s Day- गांव की इज्जत: हजारी ने कैसे बचाई गांव की इज्जत

शालिनी देवी जब से गांव की सरपंच चुनी गई थीं, गांव वालों को राहत क्या पहुंचातीं, उलटे गरीबों को दबाने व पहुंच वालों का पक्ष लेने लगी थीं.

शालिनी देवी का मकान गांव के अंदर था, जहां कच्ची सड़क जाती थी.

सड़क को पक्की बनाने की बात तो शालिनी देवी करती थीं, पर अपना नया मकान गांव के बाहर मेन रोड के किनारे बनाना चाहती थीं, इसलिए वे गरीब गफूर मियां पर मेन रोड वाली सड़क पर उन की जमीन सस्ते दाम पर देने का दबाव डालने लगी थीं.

गफूर मियां को यह बात अच्छी नहीं लगी. वे हजारी बढ़ई के फर्नीचर बनाने की दुकान में काम करते थे. मेहनताने में जोकुछ भी मिलता, उसी से अपना परिवार चलाते थे.

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बड़ों के सामने गफूर मियां की बोली फूटती न थी. एक बार गांव के ही एक बड़े खेतिहर ने उन का खेत दबा लिया था, पर हजारी ने ही आवाज उठा कर गफूर मियां को बचाया था.

गफूर मियां हजारी बढ़ई को सबकुछ बता देते थे. उन्होंने बताया कि शालिनी देवी अपना नया मकान बनाने के लिए उन की जमीन मांग रही हैं.

इस बात पर हजारी बढ़ई खूब बिगड़े और बोले, ‘‘यह तो शालिनी देवी का जुल्म है. यह बात मैं मुखिया राधे चौधरी के पास ले जाऊंगा.’’

हजारी बढ़ई जानते थे कि मुखिया इंसाफपसंद तो हैं, पर शालिनी देवी के मामले में वे कुछ नहीं बोलेंगे. दबी आवाज में यह बात भी उठी थी कि शालिनी देवी का मुखिया से नाजायज संबंध है.

एक दिन हजारी बढ़ई गफूर मियां का पक्ष लेते हुए सरपंच शालिनी देवी से कहने लगे, ‘‘चाचीजी, हम लोग गरीब हैं. हमें आप से इंसाफ की उम्मीद है. आप गफूर मियां को दबा कर उन की जमीन सस्ते दाम में हड़पने की मत सोचिए, नहीं तो यह बात पूरे गांव में फैलेगी. विरोधी लोग आप के खिलाफ आवाज उठाएंगे. मैं नहीं चाहता कि अगले चुनाव में आप सरपंच का पद पाने से रह जाएं.’’

यह सुन कर शालिनी देवी गुस्से से कांप उठीं और बोलीं, ‘‘तुम उस गफूर की बात कर रहे हो, जो बिरादरी में छोटा है. उस की हिम्मत है, तो मुखिया के पास जा कर शिकायत करे.’’

हजारी बढ़ई बोले, ‘‘आप की नजर में तो मैं भी छोटा हूं… छोटे भी कभीकभी बड़ा काम कर जाते हैं.’’

शालिनी देवी एक दिन दूसरे सरपंचों से बोलीं, ‘‘क्या हमारा चुनाव इसलिए हुआ है कि हम दूसरे लोगों की धौंस से डर जाएं?’’

मुखिया राधे चौधरी ने शालिनी देवी को समझाया कि हजारी बढ़ई व गफूर मियां जैसे छोटे लोगों से डरने की जरूरत नहीं है.

शालिनी देवी खूबसूरत व चालाक थीं. उन की एक ही बेटी थी रेशमा, जो उन का कहना नहीं मानती थी. वह खेतखलिहानों में घूमती रहती थी.

शालिनी देवी के लिए अब एक ही रास्ता बचा था, जल्दी ही उस की शादी कर उसे ससुराल विदा कर दो.

जल्दी ही एक पड़ोसी गांव में उन्हें एक खेतिहर परिवार मिल गया. लड़का नौकरी के बजाय गांव की राजनीति में पैर पसार रहा था. भविष्य अच्छा देख कर शालिनी देवी ने रेशमा की शादी उस से तय कर दी.

शालिनी देवी ने हजारी बढ़ई को बुलाया और बोलीं, ‘‘मेरी बेटी रेशमा की शादी है. तुम उस के लिए फर्नीचर बना दो. मेहनताना व लकडि़यों के दाम मैं दे दूंगी.’’

इज्जत समझ कर हजारी बढ़ई ने गफूर मियां व मजदूरों को काम पर लगा कर अच्छा फर्नीचर बनवा दिया.

मेहनताना देते समय शालिनी देवी कतराने लगीं, ‘‘तुम मुझ से कुछ ज्यादा पैसे ले रहे हो. लकडि़यों की मुझे पहचान नहीं… सागवान है कि शीशम या शाल… कुछकुछ आमजामुन की लकड़ी भी लगती है.’’

हजारी बढ़ई बोला, ‘‘यह सागवान ही है. मेरे पेट पर लात मत मारिए. अपना समझ कर मैं ने दाम ठीक लिया है. मुझे मजदूरों को मेहनताना देना पड़ता है. फर्नीचर आप नहीं ले जाएंगी, तो दूसरे खरीदार न मिलने से मैं मारा जाऊंगा.’’

मौका देख कर शालिनी देवी बदले पर उतर आईं और बोलीं, ‘‘मैं औनेपौने दाम पर सामान नहीं लूंगी. मैं तो शहर से मंगाऊंगी.’’

तभी वहां मुखिया राधे चौधरी आ गए. वे भी शालिनी देवी का पक्ष लेते हुए बोले, ‘‘ज्यादा पैसा ले कर गफूर मियां का बदला लेना चाहते हो तुम?’’

हजारी बढ़ई तमक कर बोले, ‘‘मैं गलती कर गया. सुन लीजिए, जो मेरे दिल में कांटी ठोंकता है, उस के लिए मैं भी कांटी ठोंकता हूं… मैं बढ़ई हूं, रूखी लकडि़यों को छील कर चिकना करना मैं अच्छी तरह जानता हूं. आप का दिल भी रूखा हो गया है. मैं इसे छील कर चिकना करूंगा.

‘‘शालिनी देवी, आप की बेटी गांव के नाते मेरी बहन है. मैं बिना कुछ लिए यह फर्नीचर उसे देता हूं… आगे आप की मरजी…’’

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हजारी बढ़ई ने मजदूरों से सारा फर्नीचर उठवा कर शालिनी देवी के यहां भिजवा दिया.

शालिनी देवी को लगा कि हजारी उस के दिल में कांटी ठोंक गया है.

गांव में क्या हिंदू क्या मुसलिम, सभी हजारी को प्यार करते थे. एक गूंगी लड़की की शादी नहीं हो रही थी. हजारी ने उस लड़की से शादी कर गांव में एक मिसाल कायम की थी.

इस पर गांव के सभी लोग कहा करते थे, ‘हजारी जैसे आदमी को ही गांव का मुखिया या सरपंच होना चाहिए.’

शालिनी देवी के घर बरात आई. उसी समय मूसलाधार बारिश हो गई. कच्ची सड़क पर दोनों ओर से ढलान था. सड़क पर पानी भर गया था. कहीं से निकलने की उम्मीद नहीं थी. चारों तरफ पानी ही पानी नजर आने लगा.

‘दरवाजे पर बरात कैसे आएगी?’ सभी बराती व घराती सोचने लगे.

दूल्हा कार से आया था. ड्राइवर ने कह दिया, ‘‘कार दरवाजे तक नहीं जा सकती. कीचड़ में फंस जाएगी, तो निकालना भी मुश्किल होगा.’’

शालिनी देवी सोच में पड़ गईं.

मुखिया राधे चौधरी भी परेशान हुए, क्योंकि इतनी जल्दी पानी को भी नहीं निकाला जा सकता था.

गांव की बिजली भी चली गई थी. पंप लगाना भी मुश्किल था. पैट्रोमैक्स जलाना पड़ रहा था.

फिर कीचड़ तो हटाई नहीं जा सकती थी. उस में पैर धंसते थे, तो मुश्किल से निकलते थे… मिट्टी में गिर कर दोचार लोग धोतीपैंट भी खराब कर चुके थे.

बराती अलग बिगड़ रहे थे. एक बोला, ‘‘कार दरवाजे पर जानी चाहिए. दूल्हा घोड़ी पर नहीं चढ़ेगा. वह गोद में भी नहीं जाएगा.’’

दूल्हे के पिता बिगड़ गए और बोले, ‘‘कोई पुख्ता इंतजाम न होने से मैं बरात वापस ले जाऊंगा.’’

शालिनी देवी रोने लगीं, ‘‘इसीलिए मैं नया मकान मेन रोड पर बनाना चाहती थी. लेकिन जमीन नहीं मिलती. गफूर मियां अपनी जमीन नहीं देता. हजारी बढ़ई ने उसे चढ़ा कर रखा हुआ है.’’

शालिनी देवी ने अपनेआप को चारों ओर से हारा हुआ पाया. उन्हें मुखिया राधे चौधरी पर गुस्सा आ रहा था, जो कुछ नहीं कर पा रहे थे.

तभी हजारी बढ़ई गफूर मियां के साथ आए और बोले, ‘‘गांव की इज्जत का सवाल है. गांव की बेटी की शादी है… बरातियों की बात भी जायज है. कार दरवाजे तक जानी ही चाहिए…’’

शालिनी देवी हार मानते हुए बोल उठीं, ‘‘हजारी, कोई उपाय करो… समझो, तुम्हारी बहन की शादी है.’’

‘‘सब सुलट जाएगा. आप अपना दिल साफ रखिए.’’

शालिनी देवी को लगा कि हजारी ने एक बार फिर एक कांटी उन के दिल में ठोंक दी है.

हजारी बढ़ई गफूर मियां से बोले, ‘‘मुसीबत की घड़ी में दुश्मनी नहीं देखी जाती. दुकान में फर्नीचर के लिए जितने भी पटरे चीर कर रखे हुए हैं, सब उठवा कर मंगा लो और बिछा दो. उसी पर से बराती भी जाएंगे और कार भी जाएगी दरवाजे तक.

‘‘लकड़ी के पटरों पर से गुजरते हुए कार के कीचड़ में फंसने का सवाल ही नहीं उठता. बांस की कीलें ठोंक दो. कुछ गांव वालों को पटरियों के आसपास ले चलो…’’

सभी पटरियां लाने को तैयार हो गए, क्योंकि गांव की इज्जत का सवाल सामने था.

इस तरह हजारी बढ़ई, गफूर मियां और गांव वालों की मेहनत से एक पुल सा बन गया. उस पर से कार पार हो गई.

बराती खुश हो कर हजारी बढ़ई की तारीफ करने लगे.

शालिनी देवी की खुशी का ठिकाना न था. वे खुशी से झूम उठीं.

मुखिया राधे चौधरी हजारी बढ़ई की पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘‘इस खुशी में मैं अपने बगीचे के 5 पेड़ तुम्हें देता हूं.’’

पता नहीं, मुखिया हजारी को खुश कर रहे थे या शालिनी देवी को.

शालिनी देवी ने देखा कि हजारी बढ़ई और गफूर मियां भोज खाने नहीं आए, तो लगा कि दिल में एक कांटी और ठुंक गई है.

बरात विदा होते ही शालिनी देवी हजारी बढ़ई के घर पहुंच गईं और आंसू छलकाते हुए बोलीं, ‘तुम ने मेरे यहां खाना भी नहीं खाया. इतना रूठ गए हो… क्यों मुझ से नाराज हो? मैं अब कुछ नहीं करूंगी, गफूर की जमीन भी नहीं लूंगी. हां, कच्ची सड़क को पक्की कराने की कोशिश जरूर करूंगी…

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‘‘सच ही तुम ने मेरे रूखे दिल को छील कर चिकना कर दिया है… तुम मेरी बात मानो…उखाड़ दो अपने दिल से कांटी… तब मुझे चैन मिलेगा.’’

हजारी बढ़ई बोला, ‘‘दरअसल, आप सरपंच होते ही हमें छोटा समझने लगी थीं. आप भूल गई थीं कि छोटी सूई भी कभी काम आती है.’’

तभी हजारी की गूंगी बीवी कटोरे में गुड़ और लोटे में पानी ले आई.

पानी पीने के बाद शालिनी देवी ने साथ आए नौकरों के सिर से टोकरा उतारा और गूंगी के हाथ में रख दिया. फिर वे हजारी से बोलीं, ‘‘शाम को अपने परिवार के साथ खाना खाने जरूर आना, साथ में अपने मजदूरों को लाना. मैं तुम सब का इंतजार करूंगी.’’

टोकरे में साड़ी, धोती, मिठाई, दही और पूरियां थीं. धोती के एक छोर में फर्नीचर के मेहनताने और लागत से भी ज्यादा रुपए बंधे हुए थे.

हजारी बढ़ई आंखें फाड़े शालिनी देवी को जाते देखते रहे, जिन का दिल चिकना हो गया था. अब कांटी भी उखड़ चुकी थी.

Women’s Day: परवाज़ की उड़ान

लेखक- शोभा रानी गोएल

बिजनैस मीटिंग मे भाग लेने के लिए वह 15 दिनों पहले न्यूयौर्क आया. मीटिंग बहुत अच्छी रही. कंपनी को नया प्रोजैक्ट मिल गया. वह बहुत खुश था. उसे अपनी कामयाबी पर बहुत फख्र हो रहा था. खुशी का एक कारण यह भी कि वह अपने वतन लौटा लौट रहा था. हिंदुस्तान जैसा दूसरा इस जहां में कहां.

हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबू ही अलग है, जिस में रिश्ते पनपते हैं. अमेरिका ने बहुत तरक्की की है, इस में शक नहीं लेकिन संस्कृति में अपने हिंदुस्तान का सानी नहीं. उसे आन्या की याद आई. आन्या उस की पत्नी, साक्षात अन्नपूर्णा है. सभ्य, सुसंस्कृत और मृदुभाषी…22 घंटे के सफर की थकान आन्या के हाथ की एक कप चाय पलभर में छूमंतर कर देगी. बेटे आदित्य के साथ फुटबौल खेलते हुए वह खुद को दुनिया का सब से खुश इंसान समझने लगता है. वह यह सब सोचसोच कर मुसकरा रहा था.

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जब वह अपने देश में आया तो यहां का नजारा बदल चुका था. कोरोना वायरस हिंदुस्तान में कहर बरपा रहा था. दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही एयरपोर्ट ऐडमिनिस्ट्रेशन ने चश्मे जैसे यंत्र से उस की स्क्रीनिंग कर जांच की. उसे बताया गया कि उसे बुखार है.‌ उस ने अधिकारियों और स्वास्थ्य कर्मचारियों से कहा कि थकावट के कारण थोड़ी सी हरारत है. पर, उसे कोरोना संदिग्ध मानते हुए उस से अस्पताल चल कर चैकअप कराने को कहा गया. उस ने कितनी बार मिन्नतें कीं, पर उस की एक न सुनी गई. उसे आश्वासन दिया गया कि उस के परिवार को सूचित कर दिया जाएगा, साथ ही, उस के परिवार का पूरा ध्यान भी रखा जाएगा.

अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में रहने व जरूरी जांच के लिए उसे भरती किया गया. वहां उसे डाक्टर और मैडिकल स्टाफ के सिवा किसी से भी मिलने की इजाजत नहीं थी. डाक्टर व नर्स आते, उस का चैकअप करते, दवाई देते. वार्डबौय पलंग की चादर बदलता, सफाईकर्मी अपना कार्य करते, साथ ही, हाल चाल पूछ लेते. कमरे में टीवी भी लगा हुआ था.

इन सब के बावजूद वह अकेलापन महसूस करता. वह‌ बारबार बाहर की दुनिया में जाना चाहता. पर यह संभव नहीं था. ‌एक बार उस ने वहां से निकलने की कोशिश की, तो पकडा गया. उसे सख्त हिदायत दी गई, यदि उस ने दोबारा ऐसा किया तो उस पर गैरइरादतन हत्या का केस दर्ज किया जाएगा. जब तक उस की रिपोर्ट नहीं आती, और वह कोरोना नैगेटिव नहीं पाया जाता, तब तक उसे यहीं रहना है. उस पर कड़ी निगरानी रखी जाती. वैसे, अस्पताल प्रशासन और कर्मचारी उस के साथ अच्छा व्यवहार करते. डाक्टर व नर्स उस से प्यार से बातें करते, उस की काउंसलिंग करते, उस की बातें धैर्य से सुनते. फिर भी, उसे कैद जैसा महसूस होता. अभी उसे यहां आए 5 दिन ही हुए थे, उस की रिपोर्ट पैंडिंग थी. वह बाहर की दुनिया में जाने के लिए छटपटाने लगा. वह रातदिन सोचता रहता.

सोचतेसोचते वह आन्या को याद करने लगा. आन्या से उस के विवाह को 10 वर्ष होने को आए. शादी से पहले आन्या नौकरी करती थी. उस ने घर की देखभाल करने के कारण नौकरी करने से मना कर दिया. उस ने जिद करनी चाही पर उसे दृढ़ देख कर मान गई. जब भी वह घर से बाहर जाना चाहती, वह हमेशा मना कर देता. घर का सौदा वगरह वह ही लाता. पानी व बिजली के बिल खुद जा कर भर देता. आन्या कभी घूमने के लिए जाना चाहती, तो वह साथ में जाता. मायके भी साथ जाता, साथ ही ले आता. उसे अकेला कभी कहीं जाने न देता. उस की फिक्र करतेकरते उस की ऐसी फितरत बन गई.

उस ने आन्या को घर से बाहर निकलने से सख्त मना कर दिया था. दूधसब्जी से ले कर घर की सभी जरूरी चीजें वह खुद ला कर देता. कभीकभी आन्या जिद करती, तो वह उसे डांट देता, बुराभला कहता. धीरेधीरे उस ने कहना ही छोड़ दिया. शादी के 2 वर्षों बाद उन की जिंदगी में आदी आया. लेकिन उस की सोच नहीं बदली. उस की मानसिकता वही रही कि बाहर की दुनिया स्त्री के लिए सुरक्षित नहीं है. महिलाएं बाहर जा कर आफत को निमंत्रण देती हैं.

उस के औफिस में महिलाएं काम करती थीं. अकसर सहकर्मी उन के कपड़े और उन के कार्यों पर छींटाकशी करते. वह यह सब देखता था. महिला बौस का तो सहकर्मी पीछे मजाक बनाते, उन की मिमक्री करते. आतेजाते राह में असामाजिक तत्त्वों द्वारा लड़कियों को छेड़ते उस ने कई बार देखा था. अखवार मे आएदिन वह रेप की‌ खबरें पढ़ता. तो मन दहल जाता. इसीलिए वह आन्या के बाहर जाने पर रोक लगाने लगा. आन्या ने अब उस से कुछ कहना ही छोड़ दिया. वह आदी के साथ ज्यादा समय गुजारती, उस के साथ खेलती व बातें करती.

ऐसे मना उसे धीरेधीरे यह एहसास होने लगा था कि आन्या उस से दूर जा रही है. अब वह उस से जरूरतभर बात ही करती. जब कभी आत्मिक क्षणों में उस के पास आता. वह स्थिर बनी रहती. वह अब न शिक़ायत करती और न ही अपनी इच्छा व्यक्त करती.

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एक दिन औफिस से लौटते समय रैडलाइट होने पर कार रोकी. एक बहेलिया इक प्यारी सी चिड़िया को पिंजरे में कैद कर उसे पिंजड़ासहित बेच रहा था. वह आदी के लिए उसे खरीद लाया. पिंजरे में दानापानी रखते हुए आन्या उस चिड़िया से कह रही थी, ‘तेरीमेरी एक ही नियती, जिंदगी बनी कैद मुसाफिर.’

वह नहीं समझ पाया था कि आन्या किस यंत्रणा से गुजर रही है. उस ने समझना ही नहीं चाहा. वह अपने अहं में चूर रहा. चिड़िया से वह उसे अकसर बातें करते देखता, तो हंसने लगता, कहता, ‘यह मूक प्राणी तुम्हारी बातें क्या समझेगा, और क्या जबाव देगा?’ ‘कुछ बातों के लिए जवाब नहीं, जज़्बातों की जरूरत होती है, वह तुम नहीं समझोगे,’ आन्या ने कहा था.

एक मीटिंग के सिलसिले में जब अमेरिका के प्रसिद्ध शहर न्यूयौर्क आने का मौका मिला तो वह खुशीखुशी पैकिंग करने लगा. तब दबी जबान में आन्या ने उसे साथ ले जाने का आग्रह किया. तो, वह बिफर पड़ा था. ‘मैं घूमने के लिए नहीं, काम करने के लिए जा रहा हूं. तुम्हारी मोटी बुद्धि तो हमेशा ही मौजमस्ती की ही बातें जानती है. घर का जरूरी सामान ला कर रख दिया है, बाहर निकलने की जरूरत नहीं है. जब भी फुरसत मिलेगी, वीडियो कौल करूंगा. आन्या का मन बुझ गया.

आज जब उसे अस्पताल में रखा गया तब उसे आन्या की तकलीफ़ समझ आई, उस का दर्द दिखाई दिया. वह कितना बेदर्द था और आन्या कितनी बेबस. कितना निष्ढुर हो गया था वह. अब समझ गया कि हजार सुविधाएं भी आजादी के अभाव में कांटें बन जाती हैं. किसी को कैद कर उसे सुखी समझना जीवन की सब से बड़ी भूल होती है, अन्याय है यह.

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जब कांटों से डर कर गुलाब खिलना नहीं छोडते, तो फिर हम उन पर क्यों बंदिशें लगाएं. यहां से ठीक होने के बाद अब वह सब से पहले आन्यारुपी अपनी चिड़िया को आजाद करेगा खुले आसमां में, उस की ऊंची उड़ान देखेगा. फिर, आन्या से माफी मांग कर उसे खुद के जीवन जीने के लिए लगी बंदिशें हटा देगा. अब कोई कैद नहीं, जीवन फिर से खिलखिलाएगा.

शैतान भाग 1 : अरलान ने रानिया के साथ कौन सा खेल खेला

8 महीने पहले रानिया जब उस शानदार कोठी में नौकरी के लिए आई थी, तब उस ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि वह उस कोठी की मालकिन भी बन सकती है. दरअसल अखबार में 3 साल की एक बच्ची की देखभाल के लिए आया के लिए एक विज्ञापन छपा था. रानिया को काम की जरूरत थी, इसलिए वह आया की नौकरी के लिए उस कोठी पर पहुंच गई थी, जिस का पता अखबार में छपे विज्ञापन में दिया था. कोठी के गेट के पास बने केबिन में बैठे गार्ड ने रानिया को रोक कर कहा, ‘‘तुम्हारे आने की खबर मेमसाहब को दे आता हूं, जब वह बुलाएंगी, तब तुम अंदर चली जाना.’’

रानिया केबिन में पड़े स्टूल पर बैठ गई थी. गार्ड खबर देने कोठी के अंदर चला गया था. रानिया को बच्चों की देखभाल करने का कोई तजुर्बा नहीं था. और तो और, घर में भाई का जो बच्चा था, उसे भी वह कम ही लेती थी.

कुछ देर बाद कोठी से एक दूसरा गार्ड आया और उस ने रानिया को अपने साथ मेमसाहब के कमरे तक पहुंचा दिया. रानिया कमरे में दाखिल हुई तो वहां बैठी महिला ने उस का मुसकरा कर स्वागत किया. वह देखने में बीमार लग रही थी.

दुबलीपतली उस महिला के चेहरे की पीली रंगत, अंदर धंसी बेनूर आंखें और पास की टेबल पर रखी दवाएं इस बात का सबूत थीं.

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उस महिला ने रानिया से सर्टिफिकेट मांगे. सर्टिफिकेट देखने के बाद उस ने कहा, ‘‘मिस रानिया फारुखी, आप को बच्ची की देखरेख करने का तो कोई तुजर्बा है नहीं, इस समय आप जहां काम कर रही हैं, वह कंपनी बहुत अच्छी है. नौकरी भी आप की योग्यता के मुताबिक है. इस के बावजूद आप आया की नौकरी क्यों करना चाहती हैं?’’

रानिया कुछ देर उसे खामोशी से देखती रही. उस के बाद सकुचाते हुए बोली, ‘‘दरअसल मैडम, रिहाइश का मसला है. मेरे भाई मुल्क से बाहर हैं, भाभी भी उन के पास जाना चाहती हैं, पर वह मुझे अकेली छोड़ना नहीं चाहतीं. मेरी वजह से वह भाई के पास नहीं जा पा रही हैं. मैं उन के रास्ते की रुकावट बन रही हूं. अगर मुझे रहने की यहां मुनासिब जगह मिल गई तो भाभी भाई के पास चली जाएंगी. अगर मैं आप के पास रहूंगी तो उन दोनों को मेरी तरफ से कोई चिंता नहीं रहेगी.’’

महिला कुछ सोच कर बोली, ‘‘मेरा नाम सोनिया है, मेरे शौहर का नाम अरसलान है. हमारी 3 साल की बच्ची फिजा है. तुम कितने भाईबहन हो?’’

‘‘हम 3 भाईबहन हैं. सब से बड़ी बहन की शादी अम्मा अपनी मौत से पहले कर गई थीं. उन से 2 साल छोटे अजहर भाई हैं, जो बाहर हैं. उन से 5 साल छोटी मैं हूं.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी मजबूरी को देखते हुए तुम्हें नौकरी दे सकती हूं, पर मेरी एक शर्त है…’’

‘‘कैसी शर्त मैडम?’’ रानिया जल्दी से बोली.

‘‘रानिया, तुम्हें एक बांड भरना होगा, जिस के अनुसार एक साल से पहले तुम नौकरी नहीं छोड़ सकोगी. अगर उस से पहले नौकरी छोड़ोगी तो तुम्हें 5 लाख रुपए भरने होंगे. तुम इस बारे में अच्छे से सोच कर कल मुझे जवाब देना.’’

इस बीच चायनाश्ता आ गया. सोनिया ने उसे चायनाश्ता करने को कहा. चायनाश्ता कर के रानिया खड़ी हो कर बोली, ‘‘मैडम, कल मैं अपने सामान के साथ हाजिर हो जाऊंगी. अब मैं चलती हूं, वरना देर होने पर भाभी शक करेंगी.’’

रानिया खड़ी ही हुई थी कि एक बेहद खूबसूरत मर्द एक बच्ची के साथ उस कमरे में दाखिल हुआ. रानिया ने एक नजर प्यारी सी बच्ची पर डाली, उस के बाद उस की आंखें उस खूबसूरत मर्द पर जम गईं. सोनिया ने उस आदमी का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘रानिया, यह मेरे शौहर अरसलान हैं, और यह मेरी बच्ची फिजा. अरसलान, मैं ने रानिया को अपनी बेटी की देखभाल के लिए रख लिया है.’’

अरसलान ने उचटती सी नजर रानिया पर डाली. उस के बाद सोनिया से बोला, ‘‘जैसा आप का दिल चाहे.’’

सोनिया ने बच्ची से कहा, ‘‘बेटा, यह आप की आंटी हैं. अब यह आप के साथ रहेंगी.’’ खुश हो कर बच्ची ने रानिया का हाथ पकड़ लिया, ‘‘आंटी, आप मेरे साथ रहेंगी न?’’

‘‘हां बेटा, अब मैं आप के ही साथ रहूंगी.’’ कह कर रानिया ने उसे गोद में उठा लिया.

सोनिया ने पति से कहा, ‘‘अगर तुम गुलशन इकबाल की तरफ जा रहे हो तो रानिया को चौरंगी पर छोड़ देना.’’

‘‘कोई बात नहीं. 2 मिनट लगेंगे, बस.’’ अरसलान ने अनमने ढंग से कहा.

रानिया ने जल्दी से कहा, ‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी.’’

सोनिया ने कहा, ‘‘नहीं, देर हो गई है. तुम्हें अरसलान छोड़ देंगे. फिर कल सवेरे तुम्हें आना भी तो है.’’

अरसलान ने फटाफट गैरेज से गाड़ी निकाली और रानिया को बैठाया. जैसे ही कार गेट से बाहर निकली, अरसलान का मूड ठीक हो गया. वह रानिया को देखते हुए बोला, ‘‘पता नहीं सोनिया ने तुम्हें काम पर कैसे रख लिया? वह तो खूबसूरत लड़कियों से चिढ़ती है. उसे तो बूढ़ी औरतें ही पसंद आती हैं. पता नहीं तुम पर वह  मेहरबान है, बहुत शक्की है वह.’’

रानिया के दिमाग में एक सवाल आया. उस ने पूछा, ‘‘वैसे मेमसाहब को हुआ क्या है. वह बीमार सी लगती हैं?’’

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अरसलान ने रानिया को गौर से देखते हुए कहा, ‘‘शादी के बाद डाक्टरों ने मना किया था कि वह मां न बने, लेकिन उस ने किसी की बात नहीं मानी. नतीजा यह निकला कि उस की यह हालत हो गई. अब उस की बीमारियों से लड़ने की ताकत खत्म हो गई है.’’

‘‘आखिर, ऐसा क्या हुआ है?’’ रानिया ने पूछा.

‘‘देखा जाए तो सोनिया अपने किए का फल भोग रही है. उस ने रूही के साथ जो किया, वही उस के साथ हो रहा है.’’

‘‘यह रूही कौन है, उस के साथ क्या किया था उन्होंने?’’ रानिया ने जिज्ञासावश पूछा.

‘‘रूही मेरी मंगेतर थी. हम एकदूसरे को बहुत चाहते थे, पर बीच में सोनिया आ टपकी. एक दिन रूही और उस के भाई का किडनैप हो गया. फिरौती की रकम 50 लाख मांगी गई. हम इतने पैसे नहीं दे सकते थे. हम ने सोनिया से मदद मांगी. उस ने हमारी मदद तो की, पर रूही लुटपिट कर घर वापस आई. उस ने उसी रात खुदकुशी कर ली.’’ अरसलान ने दुखी मन से कहा.

‘‘यह किडनैप किस ने किया था?’’ रानिया ने पूछा.

‘‘सोनिया के पिता ने और किस ने.’’ उस ने कहा, ‘‘बाप ने अगवा करवाया और बेटी पैसे ले कर मदद को आ गई. देखो रानिया, इंसान की करनी का फल यहीं मिल जाता है. सोनिया की बीमारी की खबर जब उस के पिता को मिली तो वह हार्टअटैक से मर गया.’’

‘‘क्या सोनिया मैम की बीमारी का कोई इलाज नहीं है?’’

‘‘डाक्टर उम्मीद तो दिलाते हैं, पर सब बेकार है. मैं सोनिया को यकीन तो दिलाता हूं कि उस के सिवा मेरी जिंदगी में कोई नहीं है, पर वह पूरे वक्त शक करती है, अपने मुखबिर मेरे पीछे लगाए रखती है.’’ अरसलान इतना ही कह पाया था कि उस का मोबाइल बज उठा. उस ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से सोनिया की आवाज आई. वह पूछ रही थी, ‘‘रानिया को छोड़ दिया क्या?’’

‘‘हां, मैं ने उसे चौरंगी पर उतार दिया.’’ फोन बंद कर के उस ने कहा, ‘‘देखो, उसे तुम पर भी यकीन नहीं है. मैं ने कह दिया, उसे चौरंगी उतार दिया है. उसे पता नहीं है कि मैं तुम्हें तुम्हारे घर के पास ही उतारूंगा.’’

‘‘अरे नहीं, आप मेरी वजह से परेशान न हों. मैं चौरंगी से चली जाऊंगी.’’ रानिया ने कहा.

‘‘इस में परेशानी वाली कोई बात नहीं है. अब यहां से तुम्हारा घर रह ही कितनी दूर गया है.’’ अरसलान ने कहा.

कुछ देर में कार रानिया के घर के पास पहुंच गई तो वह उस का शुक्रिया अदा कर के कार से उतर कर अपने घर चली गई. रानिया ने उस से भी अपने घर चलने को कहा था, पर वह फिर कभी आने की बात कह कर चला गया था.

रानिया चहकती हुई अपने घर पहुंची तो भाभी का मूड ठीक नहीं था. वह तीखे स्वर में बोली, ‘‘इतनी देर क्यों हुई?’’

रानिया जल्दी से बोली, ‘‘भाभी, मैं एक नई नौकरी के इंटरव्यू के लिए गई थी. बहुत अच्छी जौब है. सैलरी भी अच्छी है. मेरे वहां नौकरी करने से आप की एक बड़ी समस्या हल हो जाएगी.’’

भाभी ने उसे हैरानी से देखा तो वह जल्दी से बोली, ‘‘हां भाभी, मुझे मिसेज सोनिया ने अपनी 3 साल की बच्ची की देखरेख के लिए रख लिया है. अच्छी सैलरी के साथ रिहाइश, खानापीना सब फ्री है. वह 30-35 साल की बहुत अच्छी महिला हैं, बच्ची की देखरेख के लिए मुझे रखा है.’’

‘‘लेकिन तुम्हें यह काम करने का कोई अनुभव नहीं है.’’

‘‘भाभी, बच्चे प्यार व खिदमत के भूखे होते हैं. मैं यह कर लूंगी. मुझे कल 10 बजे अपना सामान ले कर जाना है. मैं आप को वहां का पता वगैरह दे दूंगी.’’

भाभी के रजामंद होने पर रानिया बेहद खुश हुई.

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अरसलान के साथ रहने के बारे में सोच कर ही रानिया का दिल धड़कने लगा. अरसलान की बातों से उसे लगा था कि अब सोनिया ज्यादा नहीं जिएगी. उस ने बीमार सोनिया की तो देखभाल की ही, साथ ही उस की बेटी फिजा को भी बहुत प्यार दिया. करीब 8 महीने बाद सोनिया की मौत हो गई. इन 8 महीनों में सोनिया ने अरसलान की हर बात उसे बता दी थी.

उस की मौत से 3 दिन पहले की बात थी. उस दिन सोनिया की तबीयत ज्यादा खराब थी. रानिया सोनिया के पास ही थी. तभी एक नौकरानी ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘रानिया बीबी, आप को साहब ड्राइंगरूम में बुला रहे हैं.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Valentine’s Special- मिलने का वादा: क्या राज को मिल पाई नीलू

नीलू ससुराल से मायके महीनाभर रहने को आई थी. नीलू यानी नीलोफर की शादी को 2 साल गुजर गए थे. ऐसा लगता था कि कल ही की बात हो. राज के जेहन में जो यादें धुंधली पड़ गई थीं, वे एकएक कर सामने आने लगीं. नीलू की शादी में दर्द देने वाले डरावने मंजर धीरेधीरे जिंदा होने लगे थे.

यह राज नीलू की अधूरी मुहब्बत का अंजाम था. निगाहों में हर पल बसने वाली नीलोफर को वह आज तक नहीं भुला पाया था. राज अपनी अधूरी मुहब्बत का इलजाम पूरी तरह नीलू पर नहीं लगा सकता था. अपनी नाकाम मुहब्बत का वह खुद भी जिम्मेदार था. आने वाले तूफान से वह घबरा गया था.

चांद सी सूरत वाली नीलोफर राज पर अपनी जान लुटाती थी, पर नीलोफर का बाप अकरम गांव का दबंग, शातिर, झगड़ालू किस्म का आदमी था. गांव में कहीं भी झगड़ाफसाद, राहजनी, आगजनी… यहां तक कि कई हत्याओं में उस का नाम जुड़ा होता था. आधे गांव ने तो अकरम का हुक्कापानी बंद कर रखा था.

अकरम और राज के घरों की दीवारें आपस में मिली हुई थीं. बचपन के दिनों में मासूम राज गांव के स्कूल में पढ़ता था. नीलू भी वहीं पढ़ती थी.

राज और नीलू घर से साथसाथ ही स्कूल जाते थे और घर आ कर अपने घरों के सामने एकसाथ खेलते थे. उन दिनों राज शाम के समय अपनी छत पर पतंग भी उड़ाया करता था. उस समय नीलू भी अपने घर की छत पर चढ़ जाया करती थी और राज को पेंच लड़ाने को उकसाया करती थी.

जब राज नीलू के कहने पर किसी की पतंग काट देता था, तो नीलू उछलउछल कर अपनी खुशी जाहिर किया करती थी. अगर पेंच लड़ाने के मुकाबले में राज की पतंग कट जाती, तो वह उदास हो जाती थी.

एक दिन राज बड़ी सी पतंग खरीद कर लाया. उस ने स्कैच पैन से पतंग पर कार्टून बना कर नीचे शरारत से नीलू का नाम लिख दिया. कार्टून के नीचे अपना नाम लिखा देख कर नीलू गुस्से से भर उठी थी. राज बारबार उड़ती पतंग को नीलू पर झुका कर उस के गुस्से को बढ़ा रहा था.

अचानक राज की पतंग जरा ज्यादा झुक गई और नीलू के हाथ में आ गई. उस ने राज की पतंग दबोच कर धागा खींचा और अपने घर के अंदर भाग गई. नीलू की इस शरारत पर राज को बहुत गुस्सा आया. वह चीखताचिल्लाता हुआ सीधा नीलू के घर पहुंच गया. वह नीलू को उस के घर में ही दबोच कर पीटने लगा.

उस समय नीलू का बाप अकरम घर पर ही मौजूद था. छोटे से राज की इतनी हिम्मत देख उस ने उसे 2 तमाचे मारे और अपने घर से भगा दिया.

उस समय राज की उम्र 12 साल की रही होगी. वह रोताबिलखता अपने घर चला गया और पापा को बताया. राज के पापा रामदयाल शांत स्वभाव के थे. वे एक स्कूल में टीचर थे. उन्होंने अपराधी अकरम के मुंह लगना ठीक नहीं समझा और राज को ही डांटडपट कर खामोश कर दिया.

अब रामदयाल ने राज को जेबखर्च देना बंद कर दिया. इस तरह राज की पतंगबाजी पर रोक लग गई.

राज नीलू से बेहद नाराज था. वह नीलू को अकेला देख कर उसे पीटने की फिराक में था. एक दिन स्कूल में खेलकूद का पीरियड चल रहा था. उस समय क्लास के तमाम सहपाठी अपनेअपने मनपसंद खेल खेलने में मसरूफ थे, तभी राज ने देखा कि नीलू नलके से पानी पी कर अकेली आ रही है.

उसी समय राज ने नीलू को लपक कर उस का एक बाजू पकड़ा और गुर्राया, ‘‘परसों शाम को मेरी पतंग पकड़ कर क्यों खींची थी? वह पतंग मैं 2 रुपए की खरीद कर लाया था, जिस की तू ने ऐसी की तैसी कर के रख दी.’’

‘‘उस पर तो मेरा नाम लिखा था, इसलिए मैं ने अपनी पतंग ले ली. तुम दूसरी पतंग उड़ा लेते,’’ नीलू बोली.

‘‘मैं तेरे दोनों हाथ और मुंह तोड़ दूंगा. तुझे बचाने इस समय कोई नहीं आएगा,’’ राज चिल्लाया.

‘‘लो मारो मुझे. मेरे दोनों हाथ तोड़ दो. सामने पड़ी ईंट उठा कर मेरे मुंह पर दे मारो. अगर मुझे मारने से तुम्हारी पतंग जुड़ जाए, तो अपने मन की इच्छा पूरी कर लो,’’ नीलू ने कहा. मगर राज का हाथ नीलू पर उठा नहीं.

राज ने चेतावनी देते हुए नीलू को छोड़ दिया. 4-5 दिनों तक नीलू से उस की कोई बात नहीं हुई. अब उस ने घर जाना बंद कर दिया. उसे अपने पापा का डर भी था. सालाना इम्तिहान सिर पर आ गएथे. वह मन लगा कर अपनी पढ़ाई में जुट गया. एक दिन शाम के समय नीलू अपनी मां के साथ राज के घर आई. उन दिनों नीलू के बड़े भाई की शादी होने वाली थी. नीलू की मां उस के परिवार को शादी में शामिल होने का न्योता देने आई थीं.

नीलू सब की नजरें बचा कर राज के कमरे में आ गई और उस से पूछने लगी कि वह अब पतंग क्यों नहीं उड़ाता है?

राज ने उदास मन से बताया कि अब उसे जेबखर्च नहीं मिलता. इतना सुनते ही नीलू ने छिपा कर साथ लाई एक छोटी सी पोटली राज की तरफ उछाल दी और पतंग उड़ाने को कह कर चली गई. राज ने पोटली खोली, तो उस के चेहरे पर बेशुमार खुशियों के भाव चमक उठे. उस के सामने सिक्कों का अंबार सा लग गया. शायद नीलू ने अपनी गुल्लक खाली कर के दी थी. धीरेधीरे समय गुजरता चला गया. प्यार भरी शरारतें कब चाहत में बदल गईं, उन दोनों को पता ही नहीं चला. वे दोनों पलभर भी एकदूसरे से दूर होने पर बुरी तरह तड़प उठते थे.

अकरम को इस इश्क की भनक लग गई. वह दोनों प्रेमियों के बीच दीवार बन कर खड़ा हो गया. वह किसी भी सूरत में अपनी बेटी को गैरजात में ब्याहना नहीं चाहता था. उस ने आननफानन बेटी नीलोफर यानी नीलू का रिश्ता दूसरे गांव के गुलेमान, जो जुआघरों, शराब की दुकानों का मालिक था, के साथ पक्का कर दिया. अकरम अपनी बेटी को जल्दी ब्याह कर ससुराल भेजना चाहता था, पर उसे डर भी था कि कहीं नीलोफर बगावत न कर दे.

नीलोफर के लिए अकरम ने जो शौहर पसंद किया था, वह उम्र में नीलू से दोगुना बड़ा था. जल्दबाजी में शादी की तारीख भी तय कर दी गई. 2-4 दिन बाद अकरम 4-5 बदमाश ले कर रामदयाल मास्टर के घर जा पहुंचा और धमकी दे आया कि वे अपने बेटे को समझा कर रखे, वरना पूरे परिवार को इसी घर में बंद कर के आग लगा देगा.

राज के पापा लड़ाईझगड़े से दूर रहना पसंद करते थे. उन्होंने प्यार से अपने बेटे पर दबाव डाला कि वह नीलू को भूल जाए. राज ने मन ही मन अपने पापा का कहना मानने का मन बना लिया, मगर कामयाब नहीं हो पा रहा था.

एक दिन राज दोपहर के समय गांव के बाहर नीलू से मिला. नीलू ने उलाहना देते हुए न मिलने की वजह पूछी, तो राज खामोश रहा. नीलू ने अपनी बात पर जोर देते हुए दोबारा पूछा, पर राज को कुछ भी बताना मुनासिब नहीं लग रहा था. राज की खामोशी देख नीलू ने राज का कौलर पकड़ते हुए सारा माजरा पूछा.

राज ने आखिरकार दुखी मन से सारी बातें नीलू को बता दीं. नीलू गरजते हुए बोली कि उसे अपने निजी मामलों में बाप की दखलअंदाजी बिलकुल मंजूर नहीं है. वह जिस से प्यार करती है, उसी से शादी करेगी.

राज ने नीलू को जिद न करने की सलाह दी. यह भी समझाया कि अगर उन दोनों ने गलत कदम उठाया, तो उस का अपराधी बाप उस के परिवार की हत्या कर देगा. मगर नीलू सारी बात सुन कर भी अपनी जिद पर अड़ी थी. कुछ देर सोचने के बाद नीलू ने एक सलाह दी, तो राज सोच में पड़ गया.

नीलू बोली, ‘‘हम दोनों इस जालिम जमाने से बहुत दूर भाग चलते हैं, जहां हमारे प्यार का कोई दुश्मन न हो. जब हमारे 4-5 बच्चे हो जाएंगे, तब पापा का गुस्सा अपनेआप ठंडा हो जाएगा.’’

यह सुन कर राज डर गया और बोला, ‘‘नहींनहीं, मेरी प्यारी नीलू, यह रास्ता बदनामी और तबाही की तरफ जाता है. ऐसा करने से हमारे परिवारों की बदनामी तो होगी ही, तुम्हारा बाप मेरे परिवार पर कहर बन कर टूट पड़ेगा. इस का अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

राज ने खतरे का सुलगता हुआ आईना दिखाया, तो नीलू थोड़ा सहम गई. नीलू बोली, ‘‘सोच लो राज, आया समय एक बार हाथ से निकल गया, तो दोबारा हमारे हाथ कभी नहीं आएगा. हिम्मत और कोशिश करने से हमारी समस्या का हल हो सकता है.’’

मगर राज को अकरम का डर था. वह जल्लाद से कम न था. राज अपने मांबाप और बहन से बहुत प्यार करता था, इसलिए उस ने अपनी मुहब्बत को कुरबान करने का मन बना लिया. उस दिन के बाद से वह नीलू से नहीं मिला. मगर नीलू को दिल से भुलाना इतना आसान कहां था?

अकरम ने हफ्तेभर में ही नीलू की शादी कर के उसे ससुराल भेज दिया. आज जब राज को पता चला कि नीलू अपने मायके आई है, उस का दिल मिलने को मचल उठा. मिलने की चाहत लिए राज धीरेधीरे कदमों से चलता हुआ नीलू के घर पहुंच गया. घर का मेन गेट अंदर से बंद था. उस ने नीलू के घर का गेट खटखटाया, तो वह खुल गया. सामने उस की प्यारी नीलू ही खड़ी थी. शायद नहा कर निकली थी, पानी के मोती उस के काले लंबे बालों से गिर रहे थे.

‘‘अरे राज, कैसे हो? अंदर आओ न…’’ राज को देखते ही नीलू खुशी से चहक उठी, ‘‘अपनी क्या हालत बना ली है तुम ने? अपनेआप को संभालो राज?’’

‘‘नीलू, जो मुसाफिर अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचते, उन का यही अंजाम होता है. लेकिन, तुम मेरी हालत पर मत जाओ, अपनी सुनाओ?’’ राज ने कांपती आवाज में पूछा.

नीलू को लगा कि हालात से घबरा कर राज उस से दूर तो हो गया, मगर अपनी महबूबा को भूल नहीं पाया.

‘‘मैं खुश हूं या नहीं, इस का कोई माने नहीं है. जब तुम ने ही हालात से घबरा कर मेरा कहा मानने से इनकार कर दिया, तो मुझे तो हालात से समझौता करना ही था. मगर आज तुम्हारी हालत देख कर ऐसा लग रहा है कि तुम अधूरी मुहब्बत की आग में बुरी तरह झुलस रहे हो. बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूं?’’ कहते हुए नीलू ने राज के दोनों हाथ थाम लिए.

‘‘नीलू, मैं जो देखना और महसूस करना चाहता था, वह सब देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि मेरी कुरबानी कामयाब हो गई है. मैं जिंदगीभर तुम्हारी यादों को अपने दिल में सहेज कर रखूंगा. तुम खुशहाल रहोगी, तो मैं समझूंगा कि मुझे सबकुछ मिल गया,’’ राज ने कहा.

‘‘नहीं राज, तुम मुझे कभी अपने से अलग मत समझना. मैं आज भी तुम्हारे साथ हूं. जहां चाहे ले चलो, मैं तुम्हारी बन कर रहूंगी,’’ कहते हुए नीलू ने राज को अपनी बांहों में कस कर चूमना चाहा.

‘‘मेरी वजह से जमाना तुम्हें बदचलन कहे, मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा,’’ राज ने कहा.

नीलू बोली, ‘‘अब पता नहीं कब आ सकूंगी. थोड़ी देर अंदर आओ. अपने मन की बात मैं तुम्हारे सामने रखना चाहती हूं,’’ इतना कह कर नीलू ने राज का हाथ पकड़ कर कमरे में ले जाना चाहा.

‘‘नहीं नीलू, मुझ से यह नहीं हो पाएगा. मुझे माफ कर देना,’’ इतना कह कर राज उलटे कदमों से गेट से बाहर आ गया. नीलू राज को रोकना तो चाहती थी, मगर उसे रोक नहीं सकी.

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