‘स्पेशल 26’ की तर्ज पर बने फर्जी आयकर अफसर

Crime News in Hindi: मध्य प्रदेश के इंदौर (Indore) की एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र से एक युवक मिलने पहुंचा. उस ने अपना नाम शुभम साहू और पता राजनगर एक्सटेंशन (Rajnagar Extension) का बताया. युवक ने झिझकते हुए एसएसपी से कहा, ‘‘मैडम, मैं परेशान हूं. आप को एक महत्त्वपूर्ण सूचना देना चाहता हूं.’’ एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र ने युवक को सामने रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘शुभम, तुम क्या बताना चाहते हो, खुल कर बताओ. हम से जो मदद हो सकेगी, करेंगे.’ ‘‘मैडम, बात दरअसल यह है कि कुछ लोग फरजी आयकर अफसर (Income Tax Officer) बन कर लोगों को नौकरी दिलाने के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं. इस के एवज में वे मोटी रकम लेते हैं.’’ शुभम ने डरतेडरते बताया. ‘‘तुम्हें यह बात कैसे पता चली कि वे फरजी तरीके से आयकर विभाग में नौकरी लगवा रहे हैं.’’ एसएसपी ने सवाल किया.

एसएसपी के सवाल पर शुभम चुप हो गया. इस पर एसएसपी ने उसे भरोसा दिलाते हुए पूछा, ‘‘वे कौन लोग हैं और कहां रहते हैं.’’

‘‘मैडम, मैं जौब की तलाश में था. इस बीच मेरे दोस्त पवन सोलंकी ने एक दिन मेरी मुलाकात देवेंद्र डाबर से करवाई.’’ शुभम ने धीरेधीरे कहा, ‘‘देवेंद्र डाबर ने खुद को इनकम टैक्स का चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर बताया था.’’

आयकर विभाग के चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर की बात सुन कर इस मामले में एसएसपी की भी दिलचस्पी बढ़ गई. उन्होंने अर्दली से कह कर शुभम के लिए पानी मंगवाया. शुभम ने पानी पी लिया तो एसएसपी ने उस से कहा, ‘‘देवेंद्र डाबर से मुलाकात में आप की क्या बात हुई?’’

एसएसपी के प्यार भरे व्यवहार से शुभम की झिझक कम हो गई थी. उस ने कहा, ‘‘मैडम, देवेंद्र का शानदार औफिस है. उस के पास खाकी वरदीधारी चपरासी, ड्राइवर, सरकारी गाड़ी और कई लोगों का स्टाफ है.’’

‘‘अरे वाह, इतना सारा स्टाफ, सरकारी गाड़ी वगैरह सब कुछ है.’’ एससपी ने शुभम की बातों पर शंका जताते हुए कहा, ‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे तुम फरजी आयकर अफसर बता रहे हो, वह वास्तव में ही सरकारी अफसर हो?’’

‘‘नहीं मैडम, देवेंद्र डाबर पूरी तरह फरजी है.’’ शुभम ने अपनी बात मजबूती से रखते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस से जौब के बारे में कहा, तो उस ने मेरी 10वीं और 12वीं की मार्कशीट तथा 4 पासपोर्ट साइज की फोटो ले लीं. देवेंद्र ने मुझे फील्ड अफसर की नौकरी देने की बात कही थी.

‘‘मैं नौकरी करने लगा. कई महीने नौकरी करने के बाद भी मुझे वेतन नहीं मिला. मैं ने देवेंद्र से इस बारे में कई बार कहा तो उस ने भारत सरकार से बजट नहीं आने की बात कही.’’ शुभम ने बताया, ‘‘वेतन नहीं मिलने से मैं परेशान हो गया. फिर मैं ने अपने स्तर पर जानकारी जुटाई, तो पता चला कि देवेंद्र ने इसी तरह आयकर विभाग में नौकरी देने के नाम पर कई लोगों से लाखों रुपए ले रखे हैं.’’

शुभम की सारी बातें सुनने के बाद एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र कुछ देर सोचती रहीं. फिर उन्होंने शुभम से लिखित में एक शिकायत देने को कहा. इसी के साथ उन्होंने देवेंद्र के औफिस और कामकाज के बारे में सवाल कर शुभम से कई जानकारियां लीं.

एसएसपी ने ये जानकारियां अपनी डायरी में नोट कर लीं. फिर शुभम को आश्वस्त किया कि हम इस मामले की जांच कराएंगे. अगर देवेंद्र डाबर फरजी आयकर अफसर बन कर लोगों से इस तरह की धोखाधड़ी कर रहा है तो उस पर काररवाई जरूर की जाएगी. एसएसपी को लिखित शिकायत दे कर शुभम वहां से चला आया.

शुभम के जाने के बाद एसएसपी ने पूरे मामले पर गंभीरता से विचार किया. फिर एएसपी अमरेंद्र सिंह को देवेंद्र डाबर के बारे में बता कर सूचनाएं जुटाने को कहा.

एएसपी अमरेंद्र सिंह ने थाना राजेंद्र नगर के टीआई सुनील शर्मा को इस मामले की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी. टीआई ने अपने सहयोगियों के साथ कई दिनों तक जांचपड़ताल कर देवेंद्र डाबर के बारे में कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां जुटा लीं.

देवेंद्र के संबंध में जुटाई जानकारियां जब एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र तक पहुंचीं तो वे भी चौंकी. उन्होंने एएसपी अमरेंद्र सिंह को देवेंद्र डाबर के कार्यालय पर तुरंत छापा मारने को कहा.

पुलिस टीम ने 23 अप्रैल को इंदौर शहर के सिलिकौन सिटी में एक मकान पर छापा मारा. इस मकान को आयकर विभाग का कार्यालय बनाया हुआ था. मकान के बाहर सफेद रंग की एक सफारी गाड़ी खड़ी थी. गाड़ी पर भारत सरकार के लोगो सहित आयकर विभाग की प्लेट लगी हुई थी.

पुलिस अधिकारियों ने वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. लोगों ने पुलिस अधिकारियों को अपने अधिकारी देवेंद्र डाबर से मिलवा दिया. देवेंद्र डाबर अपने शानदार औफिस में बैठा था. बाहर चपरासी खड़ा था. उस के कमरे के बाहर चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर की नेमप्लेट लगी हुई थी.

अधिकारियों ने पूछताछ की तो देवेंद्र ने खुद को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी के इंटेलिजेंस ऐंड क्रिमिनल इनवैस्टीगेशन डिपार्टमेंट का चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर बताया. उस ने पुलिस टीम को अपना पहचानपत्र भी दिखाया. पुलिस ने उस से सवालजवाब किए तो उस का फरजीवाड़ा सामने आ गया. न तो वह ठीक ढंग से अंगरेजी में बात कर सका और न ही सीबीडीटी या आयकर विभाग के बारे में गहराई की बातें बता सका.

देवेंद्र डाबर से पूछताछ में उस का फरजीवाड़ा सामने आ गया. फिर भी पुलिस अधिकारियों ने सावधानी के तौर पर आयकर विभाग के कार्यालय में फोन कर यह जानना चाहा कि देवेंद्र डाबर नाम का कोई अधिकारी विभाग में कार्यरत है या नहीं. पता चला कि विभाग में न तो इस नाम का कोई अधिकारी है और न ही विभाग में इस तरह की कोई पोस्ट है.

पुलिस ने देवेंद्र डाबर के अलावा वहां काम कर रहे 4 अन्य कर्मचारियों सुनील मंडलोई, रवि सोलंकी, दुर्गेश गहलोत और सतीश गावड़े को गिरफ्तार कर लिया.

कई घंटे की जांचपड़ताल और तलाशी के बाद वहां से लैपटाप, प्रिंटर, सफारी गाड़ी, एयरगन, भारत सरकार लिखी आईडी, आयकर विभाग की फरजी सील, सिक्के, नियुक्ति पत्र, आदेश पत्र, बड़ी संख्या में गोपनीय लिखे रजिस्टर, दस्तावेज, खाकी वर्दियां, भारत सरकार लिखी नेम प्लेट आदि जब्त की गईं.

पुलिस ने गिरफ्तार पांचों आरोपियों से अलगअलग पूछताछ की. इस में पता चला कि केवल 12वीं पास देवेंद्र डाबर चर्चित फिल्म ‘स्पैशल-26’ की तर्ज पर 5 साल से आयकर विभाग का फरजी कार्यालय चला रहा था. देवेंद्र ही इस गिरोह का सरगना था. सुनील मंडलोई उस का दोस्त है. वह बीई की तैयारी कर रहा था. देवेंद्र ने सुनील को सीनियर फील्ड औफिसर बना रखा था.

लोगों को आयकर विभाग में नौकरी दिलाने के नाम पर देवेंद्र के कहने पर वह भी पैसे लेता था. रवि सोलंकी देवेंद्र का रिश्तेदार निकला. उसे देवेंद्र ने सीनियर इनवैस्टीगेशन औफिसर बना रखा था. वह कार्यालय के अन्य कर्मचारियों की ओर से व्यापारियों और आयकर चोरों से संबंधित तैयार रिपोर्ट को सत्यापित कर उन की फाइलों पर हस्ताक्षर करता था.

दुर्गेश गहलोत देवेंद्र का पीए था. उस के पास कार्यालय का अधिकांश रिकौर्ड रहता था. कर्मचारियों के हाजिरी रजिस्टर भी वही रखता था.

सतीश गावड़े देवेंद्र का वाहन चालक और पर्सनल गनमैन था. वह एयरगन रखता था और देवेंद्र डाबर को आयकर विभाग का चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर बताता था.

देवेंद्र और अन्य गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में फिल्म ‘स्पैशल-26’ की तर्ज पर आयकर विभाग की फरजी टीम बनाने की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

लरूप से कुक्षी धार और फिलहाल इंदौर में भील कालोनी मूसाखेड़ी के रहने वाले देवेंद्र डाबर के पिता माधव लाल सरकारी नौकरी से रिटायर्ड क्लर्क हैं. देवेंद्र ने 12वीं पास करने के बाद नौकरी के लिए भागदौड़ शुरू की. लेकिन अधिकांश जगह उसे निराशा मिली. इस का कारण यह था कि वह केवल 12वीं पास था. उसे कंप्यूटर का अच्छा ज्ञान जरूर था, लेकिन केवल कंप्यूटर के ज्ञान के आधार पर उसे अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी नहीं मिल सकती थी.

देवेंद्र भले ही ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन उस के सपने बड़े थे. वह अफसरों की तरह रुतबे और शानोशौकत से रहना चाहता था. यह उस के लिए किसी भी तरह से संभव नहीं था. इसी दौरान एक बार उस ने अखबारों में आयकर विभाग का एक विज्ञापन पढ़ा. इस विज्ञापन में बताया गया था कि बेनामी संपत्ति की जानकारी देने पर आयकर विभाग 10 प्रतिशत कमीशन देता है.

यह सूचना पढ़ने के बाद देवेंद्र के दिमाग में आयकर विभाग के जरिए पैसा कमाने का विचार आया. यह संयोग रहा कि उसी दौरान एक दिन देवेंद्र ने अक्षय कुमार और अनुपम खेर अभिनीत फिल्म ‘स्पैशल-26’ देखी. यह फिल्म देख कर उस ने आयकर विभाग के समानांतर अपनी टीम खड़ी करने का फैसला कर लिया.

देवेंद्र ने सब से पहले इंटरनेट के माध्यम से आयकर विभाग के सेटअप और पूरी कार्यप्रणाली को समझा. इस के बाद आयकर विभाग के अधिकारियों के पदनाम, विभाग की अलगअलग विंग और उन के काम करने के तरीकों की जानकारी जुटाई.

उस ने आयकर विभाग के पत्राचार के तरीके भी समझ लिए. अखबारों और इलैक्ट्रौनिक मीडिया पर आयकर विभाग के छापे और सर्वे से संबंधित रोजाना आने वाली खबरों को वह ध्यान से देखने लगा.
आयकर विभाग में किसकिस तरह के टैक्स वसूले जाते हैं और किन लोगों से वसूले जाते हैं, ये बातें जानने और समझाने के लिए उस ने बाजार से आयकर संबंधी किताबें खरीद कर पढ़ीं. आयकर रिटर्न के बारे में भी देवेंद्र ने जानकारी हासिल की.

इस के बाद देवेंद्र ने सब से पहले आयकर विभाग का परिचयपत्र बनाया, जिस में उस ने खुद को चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर दर्शाया. उस ने भारत सरकार के वाटर मार्क वाले लोगो के लेटरपैड भी तैयार करवा लिए.

सन 2014 में उस ने इंदौर के मूसाखेड़ी में आयकर विभाग का अपना कार्यालय बनाया. इसी के साथ उस ने अपने कुछ रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच खुद को आयकर विभाग का अफसर बता कर उन्हें नौकरी दे दी. देवेंद्र ने इन लोगों को अलगअलग पदनाम दे कर जिम्मेदारियां सौंप दीं. फिर इन्हीं रिश्तेदारों और दोस्तों के माध्यम से वह बेरोजगार युवाओं को आयकर विभाग में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगने लगा.

देवेंद्र बेरोजगार युवाओं से 50 हजार से एक लाख रुपए तक ले कर आयकर विभाग में अलगअलग पदनाम से नौकरी देने लगा. इन युवाओं को वह बाकायदा भारत सरकार का लोगो लगा नियुक्तिपत्र देता था. यह पत्र देते समय वह कहता था कि हमारा काम बेहद गोपनीय है, इसलिए अपने काम के बारे में किसी को मत बताना.

इसी के साथ वह नौकरी जौइन करने वाले को गोपनीयता की शपथ भी दिलवाता था. वह अपने कर्मचारियों से शपथपत्र भी भरवाता था. इस में यह शर्त लिखी होती थी कि अगर विभाग की गोपनीयता भंग की तो आयकर कानून के तहत 50 हजार रुपए जुरमाना और एक साल की सजा हो सकती है.
जुरमाने और सजा के डर से देवेंद्र के कर्मचारी किसी से अपनी असलियत नहीं बताते थे. किसी को यह भी नहीं बताते थे कि वे आयकर विभाग में काम करते हैं या उन का औफिस कहां है.

अपने कर्मचारियों के माध्यम से देवेंद्र आयकर चोरी के नाम पर धन्ना सेठों और काले धंधे करने वाले कारोबारियों की सूचनाएं जुटाता था. ऐसे लोगों की सूचनाएं जुटा कर वह फाइलों में उन का पूरा ब्यौरा दर्ज करवाता था. ऐसी ही सूचनाओं के आधार पर 4 साल पहले देवेंद्र ने अपने कर्मचारियों के साथ बुरहानपुर में एक व्यक्ति के घर पर आयकर विभाग की फरजी रेड मारी थी. इस रेड में देवेंद्र को क्या मिला, इस का पूरी तरह खुलासा नहीं हो सका.

देवेंद्र का आयकर विभाग के फरजीवाड़े का काम अच्छे तरीके से चल रहा था. इस बीच देवेंद्र ने बड़ा हाथ मारने के मकसद से करीब एक साल पहले इंदौर की सिलिकौन सिटी में 14 हजार रुपए महीने का एक मकान किराए पर ले लिया. इस मकान में उस ने शानदार औफिस बनाया.

इस औफिस में देवेंद्र ने अपने कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ा ली. कई युवाओं को पैसे ले कर फील्ड औफिसर की नौकरी दे दी. कई चपरासी भी रख लिए. पूरे व्यवस्थित तरीके से उस ने कार्यालय बना लिया. इस औफिस में वह खुद सब से बड़ा अफसर था. दुर्गेश गहलोत उस का पीए था.

देवेंद्र भारत सरकार लिखी सफारी गाड़ी में आताजाता था. साथ में वह गनमैन रखता था. सतीश गावड़े उस का गनमैन भी था और वाहन चालक भी. सतीश ही एयरगन रखता था. देवेंद्र फरजी नौकरी देने के बाद आयकर विभाग का कामकाज समझाने के लिए होटलों में नवनियुक्त कर्मचारियों को ट्रेनिंग भी देता था. सुनील मंडलोई और रवि सोलंकी इन कर्मचारियों को ट्रेनिंग देते थे.

अपने कर्मचारियों को आयकर विभाग की नौकरी का विश्वास दिलाने के लिए कई प्रपंच रचता था. देवेंद्र अपने एकदो कर्मचारियों को आयकर विभाग के कार्यालय ले जाता. वहां वह अपने कर्मचारियों को गनमैन सतीश गावड़े की निगरानी में बाहर ही छोड़ देता. फिर चीफ कमिश्नर साहब के पास जाने की बात कह कर बड़े अधिकारी की तरह डायरी हाथ में ले कर तेज कदमों से चलते हुए आयकर विभाग की बिल्डिंग में चला जाता. थोड़ी देर बाद बाहर आ कर वह अपने कर्मचारियों के साथ अपने दफ्तर चला जाता.

नवंबर 2018 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान देवेंद्र डाबर ने फरजी आदेश जारी कर अपने कर्मचारियों की विधानसभा चुनाव में ड्यूटी लगा दी.

यह ड्यूटी इसलिए लगाई ताकि कर्मचारियों को यह भरोसा रहे कि सरकारी कर्मचारी ही हैं, क्योंकि चुनावों में आमतौर पर सभी सरकारी विभागों के कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती है. देवेंद्र ने अपने कर्मचारियों की ड्यूटी पीथमपुर में वाहनों की जांच के लिए लगाई ताकि चुनाव में अवैध और कालेधन की आवाजाही न हो सके.

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देवेंद्र अपने कार्यालय में तिरंगा झंडा भी फहराता था. इस मौके पर वह कर्मचारियों को भी बुलाता था. उस के औफिस में स्टाफ खाकी वरदी में रहता था. ये कर्मचारी देवेंद्र को सैल्यूट करते थे. देवेंद्र इन कर्मियों के साथ सेल्फी भी लेता था.

देवेंद्र ने फील्ड अफसर और खबरी के पद पर लगाए युवाओं को रईस लोगों की चलअचल संपत्तियों की जानकारी हासिल करने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी. ये कर्मचारी बड़े व्यापारियों, बिल्डरों, प्रौपर्टी कारोबारियों, ब्याज पर पैसा देने वालों और काला धंधा करने वाले लोगों की संपत्तियों, उन की गाडि़यों और कारोबार के बारे में आसपास के लोगों से जानकारी जुटाते थे.

ये कर्मचारी अपने अधिकारी सीनियर फील्ड औफिसर सुनील मंडलोई और सीनियर इनवैस्टीगेशन औफिसर रवि सोलंकी को रिपोर्ट करते. यह रिपोर्ट रजिस्टर में दर्ज कर के अलग से फाइल बनाई जाती और उस पर लिखा जाता कि अगर इस व्यक्ति के यहां इनकम टैक्स की रेड डाली जाए तो बड़ी मात्रा में आयकर चोरी का खुलासा हो सकता है.

मास्टरमाइंड देवेंद्र ने खरगोन, कुक्षी, खंडवा, मनावर, देवास, झाबुआ, आलीराजपुर, उदय नगर, बेटम, देपालपुर, पीथमपुर, धार व बड़वानी सहित कई शहरों में रहने वाले रईसों की इस तरह की फाइलें बना रखी थीं.

उस ने कुछ नेताओं की भी इस तरह की फाइलें बना रखी थीं. सभी फाइलों और रजिस्टरों के प्रत्येक पेज पर सरकारी विभागों की तरह मोहर व दस्तखत होते थे. देवेंद्र के कर्मचारियों ने अपनी रिपोर्ट में किसी को 50 और किसी को 30 करोड़ की आसामी बता रखा था.

देवेंद्र के कार्यालय से मिले रजिस्टर और फाइलों में जिन लोगों के यहां इनकम टैक्स रेड की सिफारिश की गई थी, पुलिस उन के बयान लेने के बारे में विचार कर रही है ताकि पता चल सके कि देवेंद्र की टीम ने कहीं फरजी रेड तो नहीं डाली थी.

जांच में यह बात भी सामने आई कि आरोपी देवेंद्र का मकसद ऐसे लोगों की जानकारी जुटा कर आयकर विभाग को देना था ताकि आयकर विभाग रेड मारे और उसे 10 प्रतिशत कमीशन मिल जाए. इस के विपरीत यह भी सच है कि देवेंद्र ने आयकर विभाग को ऐसी एक भी जानकारी नहीं दी.

यह तय है कि देवेंद्र डाबर की टीम का खुलासा हो गया अन्यथा शातिर दिमाग देवेंद्र अपनी टीम के साथ धन्ना सेठों के यहां इनकम टैक्स की फरजी रेड डाल सकता था.

आयकर विभाग भी समानांतर आयकर विभाग चलाने वाले इस गिरोह का खुलासा होने पर चौंक गया. इंदौर की एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आयकर विभाग के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर ए.के. चौहान से मुलाकात कर इस पूरे मामले की जानकारी दी. पुलिस इस गिरोह के बारे में पूरी जांचपड़ताल में जुटी हुई है.

गिरोह का खुलासा होने के बाद कई युवाओं ने पुलिस को शिकायत की है कि देवेंद्र डाबर ने नौकरी के नाम पर उन से 60-60 हजार रुपए लिए. जांच में सामने आया है कि देवेंद्र ने आयकर विभाग के नाम पर करीब 80 लोगों की टीम बना रखी थी.

मोटे तौर पर माना जा रहा है कि देवेंद्र ने युवाओं को नौकरी देने के नाम पर ही 60 से 80 लाख रुपए की ठगी की थी. ठगी के पैसों से ही कभीकभी वह कर्मचारियों को वेतन दे देता था. कभी कोई वेतन की बारबार मांग करता तो कहता कि भारत सरकार से अभी बजट नहीं आया है.

वह गोपनीयता के नाम पर लोगों में सजा और जुरमाने का भय बनाए रखता था, इसलिए पीडि़त युवा अपनी समस्या किसी को बता भी नहीं पाते थे. वे सरकारी नौकरी होने का भ्रम पाल कर कभी न कभी पूरी तनख्वाह मिलने का ख्वाब संजोए थे.

पुलिस को देवेंद्र के बैंक खातों की जानकारी भी मिली है. इन खातों में हुए लेनदेन की डिटेल बैंक से मांगी गई है. देवेंद्र भले ही खुद को आयकर विभाग का चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर बताता था, लेकिन उस की पत्नी एक साधारण सी आशा कार्यकर्ता है. उस से देवेंद्र ने प्रेम विवाह किया था.

यह विडंबना है कि 12वीं पास युवक 5 साल तक फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तर्ज पर ‘स्पैशल 80’ टीम बना कर फरजी तरीके से आयकर विभाग के समानांतर काम करता रहा. वह पैसे ले कर युवाओं को आयकर विभाग में फरजी नौकरी देता रहा, बड़े व्यापारियों और रईसों की चलअचल संपत्तियों की जानकारी जुटाता रहा. इनकम टैक्स की फरजी रेड भी मारता रहा, लेकिन किसी भी सरकारी एजेंसी को इस फरजीवाड़े का पता नहीं चल सका.

अंधविश्वास में मासूम की बलि : तांंत्रिक का खूनी खेल

Crime News in Hindi: ज्योंज्यों अंधेरा घिरता जा रहा था, त्योंत्यों मुकेश की परेशानी बढ़ती जा रही थी. वह कभी दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देखता तो कभी टिकटिक करती घड़ी की सुइयों को निहारने लगता. दरअसल, बात ही कुछ ऐसी थी जिस से मुकेश परेशान था. उस की 2 साल की बेटी कंचन अचानक गायब हो गई थी. शाम को वह घर के बाहर खेल रही थी. पर वह वहां से अचानक कहां गुम हो गई, किसी को पता न चला. यह बात 21 मार्च, 2019 की है. उस दिन होली(Holi) का त्यौहार था. नंदापुर गांव के लोग रंगों से सराबोर थे. फाग गाने वालों की टोली अपना जलवा अलग से बिखेर रही थी. कई लोग ऐसे भी थे, जो नशे में झूम रहे थे. कंचन का पिता मुकेश भी फाग गाता था. फाग गा कर मुकेश जब घर लौटा, तब उसे मासूम कंचन के गुम होने की जानकारी हुई थी. उस के बाद वह कंचन को ढूंढने निकल गया.

लेकिन उस का कुछ भी पता न चल पा रहा था. धीरेधीरे गांव में जब कंचन के गुम होने की खबर फैली तो लोग स्तब्ध रह गए. आज भी अनेक गांवों में ऐसी परंपरा है कि किसी के दुखतकलीफ में लोग एकदूसरे की मदद करते हैं. फाग गाने वाली टोलियों को जब मुकेश की बेटी के गायब होने की जानकारी मिली तो टोलियों ने फाग गाना बंद कर दिया. इस के बाद वे मुकेश के घर पहुंच गए.

घर पर मुकेश की पत्नी संध्या का रोरो कर बुरा हाल था. परिवार की महिलाएं उसे सांत्वना दे रही थीं. लेकिन संध्या का हाल बेहाल था. उस के मन में तमाम तरह की आशंकाएं उमड़ने लगीं.

उधर कंचन की खोज के लिए पूरा गांव एकजुट हो गया था. मुकेश के चाचा रामखेलावन ने 10-10 लोगों की टीमें बनाईं. चारों टीमों ने टौर्च व लालटेन की रोशनी में अलगअलग दिशाओं में कंचन की खोज शुरू कर दी. गांव के हर खेत, बागबगीचे, नदीनाले व झुरमुटों के बीच टीमों ने कंचन की खोज की लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला.

एक आशंका यह भी थी कि कहीं कंचन भटक कर गांव के बाहर न पहुंच गई हो और कोई जंगली जानवर उसे उठा ले गया हो. अत: इस दिशा में भी गांव के आसपास के जंगल व ऊंचीनीची जमीन के बीच कंचन की खोज की गई, लेकिन ऐसा कोई सबूत नही मिला. रात भर कंचन की खोज हुई. परंतु कंचन के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली.

जब मासूम कंचन का कुछ भी पता नहीं चला तो मुकेश अपने चाचा रामखेलावन के साथ थाना बिंदकी पहुंच गया. थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को उस ने अपनी 2 वर्षीय बेटी कंचन के लापता होने की जानकारी दे दी.

थानाप्रभारी ने कंचन की गुमशुदगी दर्ज कर जरूरी काररवाई करनी शुरू कर दी. उन्होंने फतेहपुर के समस्त थानों को वायरलैस से 2 साल की कंचन के गुम होने की खबर भेजवा दी. थानाप्रभारी को लगा कि जब कंचन तलाश करने के बाद भी कहीं नहीं मिली है तो जरूर उस का किसी ने अपहरण कर लिया होगा और अपहरण फिरौती के लिए नहीं बल्कि किसी रंजिश या दूसरे किसी इरादे से किया होगा.

इस की 2 वजह थीं. पहली यह कि मुकेश कुशवाहा की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि कोई फिरौती के लिए उस की बेटी का अपहरण करे. दूसरी वजह यह थी कि 2 दिन बीत जाने के बाद भी मुकेश के पास किसी का फिरौती के लिए फोन नहीं आया था. रंजिश का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी चंदेल, मुकेश के गांव नंदापुर पहुंचे.

वहां उन्होंने मुकेश से कुछ देर तक रंजिश के संबंध में पूछताछ की. मुकेश ने बताया कि गांव में उस की किसी से कोई रंजिश नहीं है. रुपयों के लेनदेन तथा जमीन से जुड़ा कोई विवाद भी नहीं है.

इस के बाद थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को शक हुआ कि कहीं मासूम का अपहरण किसी सिरफिरे या नशेबाज ने दुष्कर्म के इरादे से तो नहीं कर लिया. फिर दुष्कर्म के बाद उस की हत्या कर दी हो और शव को किसी नदीनाले या झाडि़यों में छिपा दिया हो. इस प्रकार का शक उन्हें इसलिए हुआ, क्योंकि होली का त्यौहार था. नशेबाजी जम कर हो रही थी. हो सकता है कि किसी नशेबाज की नजर बच्ची पर पड़ी हो और वह उसे गलत इरादे से उठा कर ले गया हो. शक के आधार पर उन्होंने पुलिस टीम के साथ नदीनालों, जंगल, झाडि़यों आदि में कंचन की खोज की. लेकिन कंचन का सुराग नहीं मिला.

इधर कंचन के लापता होने से कुशवाहा परिवार की आंखों की नींद उड़ी हुई थी. घर के सभी लोगों को इस बात की चिंता सता रही थी कि कंचन पता नहीं कहां और किस हाल में होगी. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था त्योंत्यों मुकेश व उस की पत्नी संध्या की चिंता बढ़ती जा रही थी.

धीरेधीरे 3 दिन बीत गए, लेकिन अब तक कंचन का पता न तो घर वाले लगा पाए थे और न ही पुलिस को सफलता मिली थी. तब मुकेश अपने सहयोगियों के साथ फतेहपुर के एसपी कैलाश सिंह से मिलने गया. लेकिन एसपी से उस की मुलाकात नहीं हो सकी. तब मुकेश ने एसपी कपिलदेव मिश्रा से मुलाकात की और अपनी व्यथा व्यक्त की.

एएसपी ने उसी समय थाना बिंदकी के थानाप्रभारी से बात की और कंचन को हर हाल में खोजने का आदेश दिया. इस के बाद थानाप्रभारी जीजान से कंचन को ढूंढने में जुट गए. उन्होंने अपने खास मुखबिर भी लगा दिए. पुलिस टीम ने क्षेत्र के आपराधिक प्रवृत्ति के कुछ लोगों को उन के घरों से उठा लिया और थाने  ला कर उन से सख्ती से पूछताछ की. लेकिन उन से कंचन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्हें छोड़ना पड़ा.

नाले में मिला कंचन का शव 25 मार्च, 2019 की शाम 4 बजे चरवाहे सैमसी नाले के पास बकरियां चरा रहे थे. तभी उन की निगाह नाले में उतराते हुए एक सफेद रंग के कपड़े पर पड़ी. लग रहा था उस में किसी बच्चे की लाश हो.

चरवाहे नंदापुर व सैमसी गांव के थे, अत: उन्होंने भाग कर गांव वालों को यह बात बता दी. यह खबर मिलते ही सैमसी व नंदापुर गांव के लोग नाले की ओर दौड़ पड़े. मुकेश भी बदहवास हालत में वहां पहुंचा. उसी दौरान किसी ने फोन कर के यह सूचना बिंदकी थाने में दे दी.

सूचना पा कर थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल पुलिस टीम के साथ नाले की ओर रवाना हो गए. थाना बिंदकी से सैसमी गांव करीब 5 किलोमीटर दूर है. कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंच गई. थानाप्रभारी ने नाले में तैरते हुए उस सफेद कपड़े को बाहर निकलवाया, जिस में कुछ बंधा था. पुलिस ने जैसे ही वह कपड़ा हटाया तो उस में वास्तव में एक बच्ची की लाश निकली. उस लाश को देखते ही वहां खड़ा मुकेश कुशवाहा दहाड़ मार कर रो पड़ा. वह लाश उस की मासूम बच्ची कंचन की ही थी.

2 वर्षीय मासूम कंचन की लाश जिस ने भी देखी, उसी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. क्योंकि कंचन की हत्या किसी रंजिश के चलते नहीं की गई थी. बल्कि उस की बलि दी गई थी. उस बच्ची का शृंगार किया गया था. पैरों में महावर (लाल रंग) तथा माथे पर टीका लगा था. उस का एक हाथ व एक पैर काटा गया था. उस का पेट भी फटा हुआ था.

बच्ची की बलि चढ़ाई जाने की खबर जंगल की आग की तरह पासपड़ोस के गांवों में फैली तो घटनास्थल पर भीड़ और बढ़ गई. बलि चढ़ाए जाने के विरोध में भीड़ उत्तेजित हो गई और शव रख कर हंगामा करने लगी. भीड़ तब और उग्र हो गई जब थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह ने भीड़ को यह कह कर समझाने का प्रयास किया कि कंचन की मौत नाले में डूबने से हुई है.

लोगों को उत्तेजित देख कर थानाप्रभारी के हाथपांव फूल गए. उन्होंने उपद्रव की आशंका को देखते हुए कंचन का शव ग्रामीणों से छीन लिया और थाने में ले आए. पुलिस की इस काररवाई से लोग और भड़क गए. तब लोग ट्रैक्टर ट्रौलियों में भर कर बिंदकी थाने पहुंचने लगे.

कुछ ही समय बाद सैकड़ों लोग थाने में जमा हो गए. ग्रामीणों ने थाने का घेराव कर दिया. उन्होंने ट्रैक्टर ट्रौलियों को सड़क पर आड़ेतिरछे खड़ा कर मुगल रोड जाम कर दिया. इस से कई किलोमीटर तक जाम लग गया. घटना के विरोध में लोग हंगामा कर पुलिस विरोधी नारे लगाने लगे.

थाना प्रभारी की वजह से भड़क गए लोग

थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को यकीन था कि वह हलका बल प्रयोग कर ग्रामीणों को शांत करा देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ. बल प्रयोग के बावजूद उत्तेजित भीड़ ने पुलिस के कब्जे से कंचन का शव छीन लिया और उसे सड़क पर रख कर हंगामा करने लगे. मजबूरन थानाप्रभारी को हंगामा व सड़क जाम की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को देनी पड़ी. उन्होंने अधिकारियों से अतिरिक्त पुलिस फोर्स भेजने का भी आग्रह किया.

कुछ ही समय बाद एसपी कैलाश सिंह, डीएसपी कपिलदेव मिश्रा, सीओ (सदर) रामप्रकाश तथा सीओ (बिंदकी) अभिषेक तिवारी भारी पुलिस बल के साथ बिंदकी थाने पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि जिस ने भी मासूम की बलि दी है, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने यदि कोताही बरती है तो संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. डीएसपी कपिलदेव मिश्रा ने कहा कि आप लोग सिर्फ 2 दिन का समय दें. इस बच्ची का कातिल आप लोगों के सामने होगा.

पुलिस अधिकारियों के आश्वासन पर उत्तेजित ग्रामीणों ने कंचन का शव पुलिस को सौंप दिया और जाम हटा दिया. फिर पुलिस अधिकारियों ने आननफानन में कंचन के शव को पोस्टमार्टम हाउस फतेहपुर भिजवा दिया. साथ ही बवाल की आशंका को देखते हुए नंदापुर गांव में पुलिस तैनात कर दी.

थाना बिंदकी पुलिस को आशंका थी कि कंचन की मौत नाले में डूबने से हुई है. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुलिस की आशंका को खारिज कर दिया. रिपोर्ट के अनुसार कंचन की हत्या की गई थी. उस के एक हाथ व एक पैर को किसी धारदार हथियार से काटा गया था. पेट को किसी नुकीली चीज से फाड़ा गया था. अधिक खून बहने से ही उस की मौत होने की बात कही गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल ने मुकेश के चाचा रामखेलावन की तरफ से भादंवि की धारा 364, 302 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और मासूम कंचन के हत्यारों की तलाश शुरू कर दी.

तांत्रिक ने स्वीकारी बलि देने की बात

चूंकि कंचन की बलि देने की बात कही जा रही थी और बलि किसी न किसी तांत्रिक ने ही दी होगी. अत: थानाप्रभारी ने तंत्रमंत्र करने वालों की खोज शुरू कर दी. इस के लिए उन्होंने अपने खास मुखबिर भी लगा दिए. मुखबिरों ने नंदापुर व उस के आसपास के गांवों में अपना जाल फैला दिया. जल्द ही उस का परिणाम भी सामने आ गया.

27 मार्च, 2019 की शाम 7 बजे मुखबिर ने थानाप्रभारी को बताया कि सैमसी गांव का हेमराज तंत्रमंत्र करता है. उस के यहां लोगों का आनाजाना लगा रहता है. लेकिन कंचन के गुम होने के बाद उस ने अपनी तंत्रमंत्र की दुकान बंद कर दी है. गांव के लोगों को शक है कि हेमराज ने ही मासूम की बलि चढ़ाई होगी.

मुखबिर की सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ रात 10 बजे सैमसी गांव में हेमराज के घर पहुंच गए. वह घर पर ही मिल गया तो वह उसे हिरासत में ले कर थाने आ गए.

हेमराज से कंचन की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. उस ने कहा कि वह तंत्रमंत्र करता है और होली, दिवाली जैसे बडे़ त्यौहारों पर बलि देता है. लेकिन इंसान की बलि नहीं देता. वह तो साधना के बाद मुर्गा या बकरा की बलि देता है. फिर मांस को प्रसाद के तौर पर अपने खास मित्रों में बांट देता है. कंचन की बलि देने का उस पर झूठा आरोप लगाया जा रहा है.

तांत्रिक हेमराज ने जिस तरह से अपने बचाव में दलील दी थी, उस से श्री चंदेल को एक बार ऐसा लगा कि हेमराज सच बोल रहा है. लेकिन दूसरे ही क्षण वह सोचने लगे कि अपराधी अपने बचाव में ऐसी दलीलें अकसर ही पेश करता है. अत: उन्होंने उस की बात को नकारते हुए उस से पुलिसिया अंदाज में पूछताछ शुरू की. लगभग एक घंटे की मशक्कत के बाद रात करीब 12 बजे तांत्रिक हेमराज टूट गया और उस ने कंचन की बलि देने की बात कबूल कर ली.

तांत्रिक हेमराज ने बताया कि उस ने तंत्रमंत्र सिद्ध करने तथा जमीन में गड़ा धन प्राप्त करने के लिए ही कंचन की बलि दी थी. तंत्रसाधना के इस अनुष्ठान में सेलावन गांव का रहने वाला उस का चेला शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास भी शामिल था.

लालच में चढ़ाई थी बलि

उसी की मोटरसाइकिल पर कंचन के शव को रख कर गांव के बाहर नाले में फेंक दिया था. तांत्रिक हेमराज के चेले शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास को पकड़ने के लिए रात के अंतिम पहर में पुलिस ने उस के घर दबिश दी. वह भी घर पर मिल गया और उसे बंदी बना लिया गया. उसे भी थाने ले आए.

थाने में जब उस की मुलाकात हेमराज से हुई तो वह सब समझ गया. अत: उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. हेमराज की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त गंडासा बरामद कर लिया, जिसे उस ने अपने घर में छिपा दिया था.

पुलिस ने हेमराज के कमरे से पूजन सामग्री, फूल माला, भभूत, सिंदूर, तंत्रमंत्र की किताबें आदि बरामद कीं. पुलिस ने शिवप्रकाश की वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली, जो उस ने शव ठिकाने लगाने में प्रयोग की थी.

कंचन के हत्यारों को पकड़ने तथा आलाकत्ल बरामद करने की जानकारी थानाप्रभारी ने पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही डीएसपी कपिलदेव मिश्रा, सीओ (सदर) रामप्रकाश तथा सीओ (बिंदकी) अभिषेक तिवारी थाने में पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने अभियुक्त हेमराज व शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास से घटना के संबंध में विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद डीएसपी कपिलदेव मिश्रा ने आननफानन में प्रैसवार्ता आयोजित कर कंचन की हत्या का खुलासा किया.

चूंकि अभियुक्त हेमराज व शिवप्रकाश ने कंचन की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था, अत: थानाप्रभारी ने दोनों को अपहरण और हत्या के आरोप में विधिसम्मत बंदी बना लिया. पुलिस जांच और अभियुक्तों के बयानों के आधार पर अंधविश्वास और लालच में मासूम बच्ची कंचन की हत्या की सनसनीखेज कहानी इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के थाना बिंदकी के अंतर्गत एक गांव है नंदापुर. इसी गांव में मुकेश कुशवाहा अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी संध्या के अलावा एक बेटी रमन थी. मुकेश के पास 3 बीघा खेती की जमीन थी. इसी की उपज से वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

संध्या चाहती थी बेटा

बेटी के जन्म के बाद संध्या एक बेटा भी चाहती थी. लेकिन बेटी रमन 8 साल की हो गई थी, उसे दूसरा बच्चा नहीं हो रहा था. जिस की वजह से संध्या चिंतित रहने लगी थी. अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए वह वह विभिन्न मंदिरों में जाने लगी थी. वह हर सोमवार घाटमपुर स्थित कुष्मांडा देवी मंदिर जाती. एक तरह से वह धार्मिक विचारों वाली हो गई थी.

इसी बीच वह सितंबर 2016 में गर्भवती हो गई और मई 2017 में संध्या ने एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया. इस बच्ची का नाम उस ने कंचन रखा. संध्या को हालांकि बेटे की चाह थी लेकिन दूसरी बच्ची के जन्म से उसे इस बात की खुशी हुई कि उस की कोख तो खुल गई. मुकेश भी कंचन के जन्म से बेहद खुश था. खुशी में उस ने अपने समाज के लोगों को भोज भी कराया.

नंदापुर गांव के पास ही एक किलोमीटर की दूरी पर सैमसी गांव बसा हुआ है. दोनों गांवों के बीच एक नाला बहता है, जो सैमसी नाले के नाम से जाना जाता है. सैमसी गांव में हेमराज रहता था. 3 भाइयों में वह सब से छोटा था. उस की अपने भाइयों से पटती नहीं थी. अत: वह उन से अलग रहता था.

जमीन का बंटवारा भी तीनों भाइयों के बीच हो गया था. हेमराज झगड़ालू प्रवृत्ति का था अत: गांव के लोग उस से दूरी बनाए रखते थे. उस के अन्य भाइयों की शादी हो गई थी, जबकि हेमराज की नहीं हुई थी.

हेमराज का मन न तो खेतीकिसानी में लगता था और न ही किसी कामधंधे में. उस ने अपनी जमीन भी बंटाई पर दे रखी थी. वह तंत्रमंत्र के चक्कर में पड़ा रहता था. कानपुर, उन्नाव और फतेहपुर शहर के कई तांत्रिकों के पास उस का आनाजाना रहता था.

इन तांत्रिकों से वह तंत्रमंत्र करना सीखता था. तंत्रमंत्र की किताबें भी पढ़ने का उसे शौक था. किताबों में लिखे मंत्रों को सिद्ध करने के लिए वह अकसर देर रात को पूजापाठ भी करता रहता था.

तांत्रिकों की संगत में रह कर हेमराज ने अंधविश्वासी लोगों को ठगने के सारे हथकंडे सीख लिए थे. उस के बाद वह अपने गांव सैमसी में तंत्रमंत्र की दुकान चलाने लगा. प्रचारप्रसार के लिए उस ने कुछ युवकयुवतियों को लगा दिया, जो गांवगांव जा कर उस का प्रचार करते थे. इस के एवज में वह उन्हें खानेपीने की चीजों के अलवा कुछ रुपए भी दे देता था.

अंधविश्वासी आने लगे हेमराज के पास

शुरूशुरू में तो उस की तंत्रमंत्र की दुकान ज्यादा नहीं चली लेकिन ज्योंज्यों उस का प्रचार होता गया, उस का धंधा भी चल निकला. फरियादी उस के दरबार में आने लगे और चढ़ावा भी चढ़ने लगा. हेमराज के तंत्रमंत्र के दरबार में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का आनाजाना अधिक होता था. क्योंकि महिलाएं अंधविश्वास पर जल्दी भरोसा कर लेती हैं.

उस के दरबार में ऐसी महिलाएं आतीं, जिन के संतान नहीं होती. तांत्रिक हेमराज उन्हें संतान देने के नाम पर बुलाता और उन से पैसे ऐंठता. कोई कमजोर कड़ी वाली औरत मिल जाती तो उस का शारीरिक शोषण करने से भी नहीं चूकता था. लोकलाज के डर से वह महिला अपनी जुबान नहीं खोलती थी. सौतिया डाह, बीमारी, भूतप्रेत जैसी समस्याओं से ग्रस्त महिलाएं भी उस के पास आती रहती थीं. अंधविश्वासी पुरुषों का भी उस के पास आनाजाना लगा रहता था.

वह आसपास के शहरों में प्रसिद्ध हो गया तो उस के कई चेले भी बन गए. लेकिन सेलावन गांव का शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास उस का सब से विश्वासपात्र चेला था. शिवप्रकाश हृष्टपुष्ट व स्मार्ट था. वह दूध का धंधा करता था. आसपास के गांवों से दूध इकट्ठा कर उसे शहर जा कर बेचता था.

शिवप्रकाश एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था. बताया जाता है कि तब तांत्रिक हेमराज ने उसे तंत्रमंत्र की शक्ति से ठीक किया था. तब से वह तांत्रिक हेमराज का खास चेला बन गया था. फुरसत के क्षणों में शिवप्रकाश हेमराज के दरबार में पहुंच जाता था.

20 मार्च को होली थी. होली के 8 दिन पहले एक रात हेमराज को सपना आया कि उस के खेत में काफी सारा धन गड़ा है. इस धन को पाने के लिए उसे तंत्रसाधना करनी होगी और मां काली के सामने बच्चे की बलि देनी होगी. सपने की बात को सच मान कर हेमराज के मन में लालच आ गया और उस ने खेत में गड़ा धन पाने के लिए किसी बच्चे की बलि देने क ा निश्चय कर लिया.

हर होलीदिवाली पर चढ़ाता था बलि

तांत्रिक हेमराज वैसे तो हर होली दिवाली की रात मुर्गे या बकरे की बलि देता था, लेकिन इस बार उस ने धन पाने के लालच में किसी मासूम की बलि देने की ठान ली. इस बाबत हेमराज ने अपने खास चेले शिवप्रकाश से बात की तो वह भी उस का साथ देने को तैयार हो गया. फिर गुरुचेला किसी मासूम की तलाश में जुट गए.

शिवप्रकाश उर्फ ननकू का नंदापुर गांव में आनाजाना था. वहां वह दूध व खोया की खरीद के लिए जाता था. होली के 2 दिन पहले ननकू, नंदापुर गांव गया तो उस की निगाह मुकेश कुशवाहा की 2 वर्षीय बेटी कंचन पर पड़ी. वह दरवाजे के पास खड़ी थी और मंदमंद मुसकरा रही थी. शिवप्रकाश ने इस मासूम के बारे में अपने गुरु हेमराज को खबर दी तो उस की बांछें खिल उठीं. फिर दोनों कंचन की रैकी करने लगे.

21 मार्च को होली का रंग खेला जा रहा था तथा फाग गाया जा रहा था. शाम 5 बजे के लगभग शिवप्रकाश अपने गुरु हेमराज को साथ ले कर अपनी मोटरसाइकिल से नंदापुर गांव पहुंचा फिर फाग की टोली में शामिल हो गया.

शाम 7 बजे के लगभग दोनों मुकेश कुशवाहा के दरवाजे पर पहुंचे. उस समय कंचन घर के बाहर खेल रही थी. तांत्रिक हेमराज ने दाएंबाएं देखा फिर लपक कर उस बच्ची को गोद में उठा लिया. इस के बाद बाइक पर बैठ कर दोनों निकल गए.

रात के अंधेरे में हेमराज कंचन को अपने घर लाया और नशीला दूध पिला कर उसे बेहोश कर दिया. इस के बाद उस ने बेहोशी की हालत में कंचन का शृंगार किया. शरीर पर भभूत और सिंदूर लगाया. पांव में महावर लगाई, माथे पर टीका तथा गले में फूलों की माला पहनाई. फिर तंत्रमंत्र वाले कमरे में ला कर उसे मां काली की मूर्ति के सामने लिटा दिया. कमरे में हेमराज के अलावा उस का चेला शिवप्रकाश भी था.

हेमराज ने कंचन की पूजाअर्चना की तथा कुछ मंत्र बुदबुदाता रहा. इस के बाद वह गंडासा लाया और मां काली के सामने हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मां, मैं बच्चे की बलि आप को भेंट कर रहा हूं. इस बलि को स्वीकार कर के आप मेरी इच्छा पूरी करना.’’

कहते हुए हेमराज ने गंडासे से कंचन का एक हाथ व एक पैर काट दिया. इस के बाद उस ने उस बच्ची का पेट भी चीर दिया. ऐसा होते ही खून कमरे में फैलने लगा. वह कुछ क्षण छटपटाई, फिर दम तोड़ दिया.

दूसरी रात उस ने कंचन के शव को सफेद कपड़े में लपेटा और शिवप्रकाश के साथ गांव के बाहर नाले में फेंक आया. इधर मुकेश फाग गा कर घर आया तो उसे कंचन नहीं दिखी, तो उस ने उस की खोज शुरू कर दी. दूसरे दिन उस के चाचा ने थाना बिंदकी में गुमशुदगी दर्ज कराई.

पुलिस ने तथाकथित तांत्रिक हेमराज और उस के चेले शिवप्रकाश से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें 28 मार्च, 2019 को रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी.

गोलियों की तड़तड़ाहट : भारी पड़ी सिरफिरे से आशिकी

Crime News in Hindi: दिल्ली (Delhi) से सटे गाजियाबाद (Gaziabad) में हिंडन नदी (Hindon River) किनारे स्थित साईं उपवन बड़ा ही रमणीक स्थल है. यहां पर साईंबाबा का प्रसिद्ध मंदिर है. 25 मार्च, 2019 सोमवार को सुबह का वक्त था. श्रद्धालुजन साईं मंदिर (Sai Temple) में आते जा रहे थे. उसी समय लाल रंग की स्कूटी से गोरे रंग की खूबसूरत युवती और एक स्मार्ट या दिखने वाला युवक वहां पहुंचे. स्कूटी को उपवन परिसर के बाहर एक ओर खड़ी कर वे दोनों मंदिर में प्रवेश कर गए. कोई 10 मिनट के बाद जब वे दोनों साईंबाबा के दर्शन कर के बाहर निकले तो उन के चेहरे खिले हुए थे. यह हसीन जोड़ा आसपास से गुजरने वाले लोगों की नजरों का आकर्षण बना हुआ था. लेकिन उन दोनों को लोगों की नजरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी. वे अपनी ही दुनिया में मशगूल थे.

जैसे ही दोनों बाहर निकले वह रमणीक इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. किसी की समझ में कुछ नहीं आया. तभी वहां मौजूद लोगों को एक आदमी युवकयुवती की लाशें बिछा कर तेजी से लिंक रोड की तरफ भागता हुआ दिखाई दिया. लोगों ने देखा कि लाशें उसी नौजवान खूबसूरत जोड़े की थीं, जो अभीअभी वहां से हंसतेमुसकराते हुए मंदिर से बाहर निकला था. इसी दौरान किसी ने इस सनसनीखेज घटना की सूचना 100 नंबर पर गाजियाबाद पुलिस को दे दी.

थोड़ी ही देर में सिंहानी गेट के थानाप्रभारी जयकरण सिंह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. मंदिर परिसर के अंदर लाल सूट पहने एक युवती और एक युवक की रक्तरंजित लाशें औंधे मुंह पड़ी थीं. जयकरण सिंह ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया.

युवकयुवती के कपड़े खून से सने थे. वहां पर काफी लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी. जयकरण सिंह ने उन की नब्ज टटोली, लेकिन उन की सांसें उन का साथ छोड़ चुकी थीं. उन्होंने जल्दी से क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला कर घटनास्थल की फोटोग्राफी करवाई और वहां उपस्थित चश्मदीदों से इस घटना के बारे में पूछताछ करनी शुरू की.

कुछ लोगों ने बताया कि मृतक युवती और युवक कुछ ही देर पहले लाल स्कूटी से एक साथ मंदिर आए थे, जब दोनों साईं बाबा के दर्शन करने के बाद बाहर निकल रहे थे, तभी पहले से घात लगाए हत्यारे ने इस वारदात को अंजाम दे दिया.

पुलिस ने जब दोनों लाशों की शिनाख्त कराने की कोशिश की तो भीड़ ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. यह देख इंसपेक्टर जयकरण सिंह ने आरटीओ औफिस से उस लाल रंग की स्कूटी का विवरण मालूम किया, जिस से वे आए थे. आरटीओ औफिस से मृतका की शिनाख्त प्रीति उर्फ गोलू, निवासी विजय विहार (गाजियाबाद) के रूप में हुई.

तय हो गई थी शादी

पुलिस द्वारा सूचना मिलने पर थोड़ी देर में युवती के घर वाले भी रोतेबिलखते हुए घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने युवती की शिनाख्त के साथसाथ युवक की भी शिनाख्त कर दी. मृतक सुरेंद्र चौहान उर्फ अन्नू था. उन्होंने यह जानकारी भी दी कि उन की बेटी प्रीति और सुरेंद्र चौहान बहुत जल्द परिणय सूत्र में बंधने वाले थे. सुरेंद्र के मातापिता भी इस रिश्ते के लिए राजी थे.

घटनास्थल की जांच के दौरान वहां पर पौइंट 9 एमएम पिस्टल के कुछ खोखे और मृतका प्रीति की लाल रंग की स्कूटी बरामद हुई, जिसे पुलिस टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मृतका के पिता प्रमोद कुमार से युवक सुरेंद्र चौहान के पिता खुशहाल सिंह के बारे में जानकारी मिल गई. पुलिस ने उन्हें भी इस दुखद घटना के बारे में बता दिया. इस के बाद खुशहाल सिंह भी अपने परिजनों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

चूंकि दोनों लाशों की शिनाख्त हो चुकी थी, लिहाजा थानाप्रभारी ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाशें पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दीं.

25 मार्च को ही मृतका प्रीति के पिता प्रमोद कुमार की शिकायत पर इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा कोतवाली सिंहानी गेट में अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

इस केस की आगे की तफ्तीश थानाप्रभारी जयकरण सिंह ने खुद संभाली. उन्होंने इस घटना के बारे में एसपी श्लोक कुमार और सीओ सिटी धर्मेंद्र चौहान को भी अवगत करा दिया.

एसएसपी उपेंद्र कुमार अग्रवाल ने इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए एसपी श्लोक कुमार के निर्देशन और सीओ धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी जयकरण सिंह के साथ इंसपेक्टर (क्राइम ब्रांच) राजेश कुमार, एसआई श्रीनिवास गौतम, हैडकांस्टेबल राजेंद्र सिंह, माइकल बंसल, कांस्टेबल अशोक कुमार, संजीव गुप्ता, सेगेंद्र कुमार, संदीप कुमार और गौरव कुमार को शामिल किया गया.

जांच टीम ने एक बार फिर साईं उपवन पहुंच कर वहां के लोगों से घटना के बारे में पूछताछ शुरू की तो पता चला कुछ लोगों ने एक लंबी कदकाठी के आदमी को वहां से भागते हुए देखा था. वह अधेड़ उम्र का आदमी था जो कुछ दूरी तक भागने के बाद वहां खड़ी एक कार में सवार हो कर फरार हो गया था.
हालांकि मंदिर परिसर में 8 सीसीटीवी कैमरे लगे थे लेकिन दुर्भाग्यवश सभी खराब थे. मृतका के पिता प्रमोद कुमार ने बताया कि प्रीति सुबह 7 बजे ड्यूटी पर जाने के लिए निकली थी. वह वसुंधरा के वनस्थली स्कूल के यूनिफार्म स्टौल पर नौकरी करती थी.

उस के काम पर चले जाने के बाद वह बुलंदशहर जाने वाली बस में सवार हो गए थे. अभी उन की बस लाल कुआं तक ही पहुंची थी कि उन्हें मोबाइल फोन पर प्रीति को गोली मारे जाने का दुखद समाचार मिला. जिसे सुनते ही वह फौरन घटनास्थल पर आ गए थे.

पिता ने बताई उधार की कहानी

प्रमोद कुमार से पूछताछ के बाद पुलिस ने मृतक सुरेंद्र चौहान के पिता खुशहाल सिंह को भी कोतवाली बुला कर उन से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि उन के बेटे की हत्या में कल्पना नाम की औरत का हाथ हो सकता है. दरअसल, सुरेंद्र का गाजियाबाद के ही प्रताप विहार में शीशे के सामान का कारोबार था, इसी कारोबार के लिए सुरेंद्र ने कुछ समय पहले कल्पना से कुछ रुपए उधार लिए थे. कल्पना रुपए वापस करने के लिए लगातार तकादा कर रही थी.

चूंकि सुरेंद्र के पास उसे देने लायक पैसे इकट्ठे नहीं हुए थे. इसलिए वह कल्पना को कुछ दिन तक और रुकने को कह रहा था. 2 दिन पहले शनिवार के दिन भी कल्पना उन के घर पर अपने रुपए लेने आई थी, इस दौरान कल्पना ने गुस्से में आ कर सुरेंद्र को बहुत बुराभला कहा था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस टीम इस हत्याकांड की गुत्थी को सुलझाने के लिए उन तमाम पहलुओं पर विचारविमर्श करने लगी, जिस पर आगे बढ़ कर हत्यारे तक पहुंचा जा सकता था. इस में पहला तथ्य घटनास्थल पर मिले पौइंट 9 एमएम पिस्टल से फायर की गई गोलियों के खोखे थे. इस प्रकार के पिस्टल का इस्तेमाल आमतौर पर पुलिस अधिकारी करते हैं. यह सुराग इस तथ्य की ओर इशारा कर रहा था कि हत्यारे का कोई न कोई संबंध पुलिस डिपार्टमेंट से है.

दूसरा तथ्य मृतक सुरेंद्र उर्फ अन्नू के पिता खुशहाल सिंह के अनुसार उन के बेटे को कर्ज देने वाली औरत कल्पना से जुड़ा था. तीसरा सिरा मृतका प्रीति और उस के मंगेतर सुरेंद्र की बेमेल उम्र से ताल्लुक रखता था.

दरअसल प्रेमी सुरेंद्र की उम्र अभी केवल 26 साल थी जबकि उस की प्रेमिका प्रीति की उम्र 32 साल थी. इसलिए यहां इस बात की संभावना थी कि उन के बीच उम्र का यह फासला उन के परिवार के लोगों में से किसी सदस्य को पसंद नहीं आ रहा हो और आवेश में आ कर उस ने इस घटना को अंजाम दे दिया हो.
इस के अलावा एक और भी महत्त्वपूर्ण बिंदु था, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. प्रीति उर्फ गोलू की उम्र अधिक थी. यह भी संभव था कि उस के प्रेम संबंध पहले से किसी और युवक के साथ रहे हों. पहले प्रेमी को पता चल गया हो कि प्रीति की शादी सुरेंद्र चौहान से हो रही है. संभव था कि उस ने प्रीति को सबक सिखाने के लिए सुरेंद्र का काम तमाम कर दिया.

चूंकि वारदात के समय उस के साथ उस का मंगेतर सुरेंद्र चौहान भी था, इसलिए गुस्से से बिफरे पहले प्रेमी ने उस को भी मार डाला हो. बहरहाल इन तमाम बिंदुओं पर विचार विमर्श कर के पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंचने के प्रयास में जुटी थी.

पुलिस टीम ने 27 मार्च को एक बार फिर दोनों के परिवार के पुरुष और महिला सदस्यों तथा वारदात के वक्त साईं उपवन में मौजूद चश्मदीदों को बुला कर पूछताछ की. साथ ही प्रीति और सुरेंद्र के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर उन की गहन जांच की.

इस जांच में चौंकाने वाली बातें सामने आईं. प्रीति के पिता प्रमोद कुमार ने बताया कि उन का एक रिश्तेदार दिनेश कुमार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस में एएसआई के पद पर तैनात है. उस का चौहान परिवार के घर पर काफी आनाजाना था. लेकिन जिस दिन यह दोहरा हत्याकांड हुआ उस दिन के बाद वह बुलाए जाने के बावजूद वारदात वाली जगह पर नहीं आया था. और तो और प्रीति के अंतिम संस्कार में भी वह शामिल नहीं हुआ था.

यह बात प्रमोद कुमार और उन के परिवार के सदस्यों को बहुत अटपटी लगी थी. जब पुलिस ने उन से डिटेल्स में बात की तो प्रमोद कुमार ने अपने मन की सब बातें विस्तार से बता दीं. जिन्हें सुनते ही पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस में ट्रैफिक विभाग में तैनात एएसआई दिनेश कुमार से पूछताछ करने का मन बना लिया. चूंकि घटनास्थल पर पौइंट 9 एमएम पिस्टल के खाली खोखे मिले थे, जिस की वजह से भी वारदात में किसी पुलिस वाले के शामिल होने का शक था, इसलिए अब एएसआई दिनेश कुमार से पूछताछ करना बेहद जरूरी हो गया था.

पुलिस वाला आया शक के घेरे में

थानाप्रभारी जयकरण सिंह ने एएसआई दिनेश कुमार से संपर्क करने की कोशिश की मगर कामयाब नहीं हुए. आखिरकार 30 मार्च की सुबह एक मुखबिर की सूचना पर उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया. जब उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ शुरू की गई तो उस ने जो कुछ बताया उस से रिश्तों में उलझी एक सनसनीखेज कहानी उभर कर सामने आई.

प्रमोद कुमार अपने परिवार के साथ गाजियाबाद के विजय विहार में रहते हैं. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां थीं. वह बड़ी बेटी के हाथ पीले कर चुके थे. दूसरी बेटी प्रीति उर्फ गोलू और उस से छोटी बेटी अभी पढ़ाई कर रही थी. 22 वर्षीय प्रीति मिलनसार स्वभाव की थी. वह जिंदगी के हर एक पल का पूरा लुत्फ उठाने में विश्वास रखती थी.

बड़ी बेटी की शादी के एक साल बाद प्रमोद कुमार ने प्रीति के भी हाथ पीले कर देने की सोची. उन्होंने उस के लिए कई जगह रिश्ते की बात चलाई, मगर आखिर अपनी हैसियत के अनुसार मौके पर प्रीति किसी न किसी बहाने से शादी करने से इनकार कर देती थी.

प्रीति का अपनी बड़ी बहन के घर काफी आनाजाना था. अपने हंसमुख स्वभाव की वजह से वह बहन की ससुराल में भी काफी घुलमिल गई थी. उस के जीजा का जीजा दिनेश कुमार दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल था. दिनेश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के पिलखुआ का रहने वाला था. उस की पत्नी और बच्चे पिलखुआ में ही रहते थे. दिनेश जब भी रमेश के घर आता वह प्रीति से खूब बातेें करता था. बला की हसीन और दिलकश प्रीति की चुलबुली मीठी बातें सुन कर वह भावविभोर हो जाता था.

प्रीति को भी दिनेश से बातें करने में खुशी मिलती थी. वह उस समय उम्र के उस पड़ाव पर भी पहुंच गई थी, जहां एक मामूली सी चूक भविष्य के लिए नासूर बन जाती है. लेकिन इस समय प्रीति या उस की बहन सीमा ने इन बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

धीरेधीरे प्रीति की जिंदगी में दिनेश का दखल बढ़ने लगा. अब वह प्रीति से उस के गाजियाबाद स्थित घर पर भी मिलने आने लगा था. इतना ही नहीं जब कभी प्रीति या उस के परिवार में अधिक रुपयों की जरूरत होती वह अपनी ओर से आगे बढ़ कर उन की मदद करता था.

प्रीति के पिता प्रमोद कुमार भी दिनेश कुमार के बढ़ते अहसानों के बोझ तले इतने दब चुके थे कि दिनेश के रुपए वापस करना उन के वश के बाहर हो गया. दिनेश कुमार ये रुपए प्रीति के घर वालों को यूं ही उधार नहीं दे रहा था.

रिश्तों में सेंध

दरअसल दिनेश कुमार अपनी उम्र से लगभग आधी उम्र की प्रीति के ऊपर न केवल पूरी तरह से फिदा था बल्कि उस के साथ उस के शारीरिक संबंध भी स्थापित हो चुके थे. वह प्रीति को किसी न किसी बहाने से अपने साथ घुमाने ले जाता था, जहां दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते थे.

समय का पहिया अपनी गति से आगे बढ़ता रहा, दिनेश कुमार सन 1994 में कांस्टेबल के पद पर दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. सन 2008 में उस का प्रमोशन हेड कांस्टेबल के पद पर हो गया. इस के 8 साल बाद एक बार फिर उस का प्रमोशन हुआ और वह एएसआई बन गया. इन दिनों वह ट्रैफिक विभाग में सीमापुरी सर्कल में तैनात था.

प्रीति के साथ जिस सुरेंद्र कुमार नाम के युवक की जान गई थी, वह मूलरूप से उत्तराखंड का रहने वाला था. उस के पिता खुशहाल सिंह सेना में रह चुके थे. रिटायरमेंट के बाद वह अपने गांव में सेटल हो गए. 2 बेटों के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. सब से बड़ा बेटा सुधीर हरिद्वार में रहता था. वह अपनी दोनों बेटियों की शादी कर चुके थे और इन दिनों एक पोल्ट्री फार्म चला रहे थे.

करीब 2 साल पहले उन का छोटा बेटा सुरेंद्र कुमार उर्फ अन्नू उत्तराखंड से गाजियाबाद आ गया था और प्रताप विहार में शीशे का बिजनैस करने लगा था. 2 साल तक अथक मेहनत करने के बाद आखिर उस का काम चल निकला. इस के बाद उस ने अपने मातापिता को भी अपने पास बुला लिया था. कुछ ही महीने पहले उस की मुलाकात प्रीति उर्फ गोलू से हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

सुरेंद्र से मुलाकात होने के बाद प्रीति फोन से सुरेंद्र से अकसर बात करती रहती थी. दिन गुजरने लगे उन के प्यार का रंग गहरा होता चला गया. कुछ दिनों के बाद सुरेंद्र और प्रीति का प्यार ऐसा परवान चढ़ा कि दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. प्रीति के घर वाले इस के लिए राजी हो गए थे. शादी की बात तय हो जाने पर दोनों प्रेमी खुश हुए. हालांकि प्रीति की उम्र सुरेंद्र से करीब 6 साल ज्यादा थी मगर दोनों में से किसी को इस पर जरा भी एतराज नहीं था.

प्रीति सुरेंद्र के साथ शादी के लिए तो दिलोजान से रजामंद थी किंतु उस के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि दिनेश के साथ उस के विगत कई सालों से जो प्रेमिल संबंध थे उन से निकलना आसान नहीं था.

वजह यह कि दिनेश कुमार किसी भी हालत में उस की शादी किसी और से नहीं होने देना चाहता था.
प्रीति को अपने काबू में रखने के लिए उस ने उस की हर जायजनाजायज मांगें पूरी की थीं. हाल ही में उस ने प्रीति के पिता को 3 लाख रुपए उधार भी दिए थे. एएसआई दिनेश कुमार के बयान कितने सच और कितना झूठ है यह तो पुलिस की जांच के बाद पता चलेगा. परंतु इतना तय है कि प्रीति के घर में उस का इतना दखल था कि वह बेधड़क जब चाहे तब उस के घर आ जा सकता था.

प्रीति और सुरेंद्र के बीच जब से प्यार का सिलसिला शुरू हुआ था तब से प्रीति ने एएसआई दिनेश से मिलनाजुलना कम कर दिया था. पहले तो दिनेश कुमार प्रीति और सुरेंद्र के प्यार से अनजान था, लेकिन 4-5 दिन पहले जब प्रीति ने उस का फोन रिसीव करना बंद कर दिया तो वह सोच में पड़ गया.

दिल्ली पुलिस में 25 सालों से नौकरी कर रहे एएसआई दिनेश कुमार को यह समझने में देर नहीं लगी कि मामला बेहद गंभीर है. फिर भी उस ने किसी तरह प्रीति को फोन कर के उस से बातें करने की कोशिश जारी रखी. लेकिन 2 दिन पहले प्रीति ने दिनेश कुमार के लगातार आने वाले फोन से परेशान हो कर अपने मोबाइल फोन का सिम बदल लिया.

मामला बिगड़ता देख एएसआई दिनेश कुमार समझ गया कि प्रीति किसी कारण उस से संबंध तोड़ने पर आमादा है. जिस के फलस्वरूप उस ने प्रीति को सबक सिखाने की ठान ली. 24 मार्च, 2019 को दिनेश की रात की ड्यूटी थी.

25 मार्च की सुबह अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद वह शाहदरा निवासी अपने दोस्त पिंटू शर्मा के पास गया. उस की मारुति स्विफ्ट कार पर सवार हो कर वह प्रीति के घर जा पहुंचा. कार पिंटू शर्मा चला रहा था. प्रीति के घर पहुंच कर जब उसे पता चला कि प्रीति साईं उपवन मंदिर गई है तो वह उस का पीछा करता हुआ वहां भी पहुंच गया.

अचानक की गईं दोनों की हत्याएं

उधर साईं मंदिर में दर्शन करने के बाद जैसे ही प्रीति और सुरेंद्र अपने जूतों की ओर बढ़े, तभी एएसआई दिनेश कुमार प्रीति से बातें करने के लिए आगे बढ़ा. उस ने प्रीति को अपनी ओर बुलाया मगर प्रीति ने उस की ओर देख कर अपनी नजरें फेर लीं.

यह देख दिनेश कुमार की त्यौरियां चढ़ गईं. वह आगे बढ़ा और प्रीति का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगा, मगर प्रीति ने उस का हाथ झटक दिया. प्रीति की यह बात एएसआई दिनेश कुमार को बहुत बुरी लगी. तभी उस ने अपना सर्विस पिस्टल निकाला और प्रीति के ऊपर फायर कर दिए.

प्रीति को खतरे में देख कर सुरेंद्र उसे बचाने के लिए दौड़ा तो दिनेश ने उस के भी सीने में 3 गोलियां उतार दीं. इस के बाद वह बाहर स्विफ्ट कार में इंतजार कर रहे पिंटू शर्मा के साथ वहां से फरार हो गया.
गाजियाबाद पुलिस की नजरों से बचने के लिए 5 दिनों तक दिनेश कुमार अपने रिश्तेदारों के घर छिपा रहा. दिनेश की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने शाहदरा से इस हत्याकांड में शामिल रहे उस के दोस्त पिंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.

वारदात में प्रयोग की गई एएसआई दिनेश कुमार की सर्विस पिस्टल, 3 जीवित कारतूस तथा स्विफ्ट कार भी गाजियाबाद पुलिस ने बरामद कर ली. 2 अप्रैल, 2019 को दिल्ली पुलिस ने भी एएसआई दिनेश कुमार को उस के पद से बर्खास्त कर दिया.

खाकी वरदी वाले डकैत

ट्रेडिंग व्यापारी अंकित अग्रहरि लखनऊ की ओमेक्स रेजीडेंसी स्थित अपने फ्लैट नंबर 104 में बैठे चाय पी रहे थे. उन के साथ उन के सहयोगी सचिन कटारे, अश्वनि पांडेय, कुलदीप यादव, अभिषेक वर्मा, जितेंद्र तोमर, अभिषेक सिंह व शुभम गुप्ता भी थे. चाय के साथसाथ इन लोगों के बीच अपने बिजनैस के संबंध में बातचीत हो रही थी.

दरवाजे पर दस्तक हुई तो अंकित ने पूछा कौन? इस पर अपार्टमेंट के चौकीदार योगेश ने कहा, ‘‘साहब मैं चौकीदार हूं.’’

अंकित ने यह सोच कर दरवाजा खोल दिया कि चौकीदार किसी काम से आया होगा. दरवाजा खुलते ही 7 लोग चौकीदार को पीछे धकेलते हुए धड़ाधड़ फ्लैट में घुस आए. इन में से 2 लोग पुलिस की वरदी में थे. फ्लैट के अंदर आते ही उन लोगों ने अंकित व उन के साथियों पर पिस्तौल तान कर गोली मारने की धमकी देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे यहां ब्लैकमनी रखी है.’’

अंकित अग्रहरि ने इनकार किया तो वे लोग धमकाते हुए मारपीट पर उतारू हो गए. फिर उन लोगों ने खुद ही कमरे के डबलबैड और दीवान से बिस्तर हटा कर नीचे डाल दिए और बैड बौक्स व दीवान में रखे रुपए निकाल कर साथ लाए थैले और बैग में भरने लगे. अंकित और उस के साथियों ने रोकने की कोशिश की तो उन्होंने सभी की लातघूसों से जम कर पिटाई कर दी. इस से घबरा कर सारे लोग डर कर चुपचाप खड़े हो गए.

अंकित और उस के साथी समझ गए थे कि पुलिस वरदी में आए लोग बदमाश हैं और लूटपाट के इरादे से चौकीदार को मोहरा बना कर फ्लैट में घुसे हैं. इस काररवाई के दौरान उन्होंने किसी को भी मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करने दिया.

वरदी वालों के साथ आया एक व्यक्ति, जिसे वे लोग मधुकर के नाम से बुला रहे थे,रुपए से भरा थैला व बैग ले कर फ्लैट से निकल गया. इस के बाद खुद को दरोगा बताने वाले आशीष ने अहिमामऊ चौकी प्रभारी प्रेमशंकर पांडेय को फ्लैट में पिस्टल व 4 कारतूस मिलने की जानकारी दे कर वहां आने को कहा. लेकिन चौकीप्रभारी ने आरोपियों को थाने ले जाने को कहा.

यह सुन कर अंकित और उन के साथियों की जान में जान आई. वे लोग समझ गए कि उन के यहां रेड के नाम पर पुलिस ने डकैती डाली है. दरोगा पवन और आशीष सभी को बाकी रकम, पिस्टल व 4 कारतूसों के साथ थाने ले आए.

बिजनैसमैन अंकित व उस के सहयोगियों को पुलिस द्वारा पकड़ कर ले जाने की जानकारी मिलते ही ओमेक्स अपार्टमेंट में हड़कंप सा मच गया. जितने मुंह उतनी बातें. लोग कह रहे थे,‘‘अंकित छुपा रूस्तम निकला. वह व्यापार की आड़ में हथियारों की तस्करी करता था. उस के फ्लैट पर कुछ लोग हथियार लेने आए थे. सूचना मिलने पर पुलिस ने रेड डाल कर ब्लैकमनी, हथियार और हथियार खरीदने आए लोगों को पकड़ लिया.’’

बाद में पता चला कि छापा मारने वाली पुलिस टीम में लखनऊ के थाना गोसाईगंज के सब-इंस्पेक्टर पवन मिश्रा, सबइंस्पेक्टर आशीष तिवारी, मुखबिर मधुकर मिश्रा, सिपाही प्रदीप भदौरिया, ड्राइवर आनंद यादव  के अलावा 2 अन्य लोग शामिल थे. ये लोग 2 गाडिय़ां ले कर आए थे.

बिजनैसमैन अंकित अग्रहरि मूलरूप से धनपतगंज,सुल्तानपुर का रहने वाला है. उस का कोयला और मौरंग का बिजनैस है. लखनऊ में वह अपने सहयोगी के पास रह कर कारोबार करता है. लखनऊ की ओमेक्स रेजीडेंसी में उस ने किराए का फ्लैट ले रखा था. घटना के समय उस के फ्लैट में 3.38 करोड़ रुपए रखे थे. अंकित को यह रकम बांदा में अपनी खदान पर पहुंचानी थी.

पुलिसकर्मियों ने इस मामले में डकैती के साथ-साथ गुडवर्क दिखाने की भी साजिश की. उन्होंने मुखबिर मधुकर मिश्रा को लूटे गए एक करोड़ 85 लाख रुपयों सहित पहले ही भगा दिया था. जबकि लूट के बाद बाकी बची रकम एक करोड़ 53 लाख के साथ कारोबारी अंकित व उस के साथियों को पुलिस वाले थाना गोसाईगंज ले गए. वहां पकड़े गए लोगों और कालेधन पर काररवाई को ले कर विचारविमर्श होता रहा.

लुटेरे पुलिसकर्मियों ने सोशल मीडिया पर फ्लैट से 1.53 करोड़ रुपए का काला धन मिलने और पिस्टल सहित कारोबारियों के पकड़े जाने का मैसेज वायरल कर वाहवाही लूटने की कोशिश की. दोनों दरोगा पवन व आशीष अपनी करतूत में सफल हो चुके थे, लेकिन उन का झूठ ज्यादा देर नहीं टिक सका. मैसेज वायरल होने से खाकी वरदी अपने ही जाल में फंस गई.

ऐसी खुली पोल….

सूचना पा कर सीओ मोहनलालगंज राजकुमार शुक्ला भी थाना गोसाईगंज पहुंच गए. उन की व थानाप्रभारी गोसाईगंज अजय प्रकाश त्रिपाठी की मौजूदगी में रकम गिनी गई. पूरी रकम 500 और 2000 के नोटों की शक्ल में थी. बड़ी रकम देख कर उन्होंने आयकर विभाग के अफसरों को सूचना दे दी.

आयकर अधिकारी थाने पहुंचे तो अंकित ने बताया कि उन के फ्लैट में 3.38 करोड़ रुपए रखे थे, यह रकम उन्हें बांदा में अपनी खदान पर पहुंचानी थी. अंकित ने बताया,‘‘पुलिस ने रेड के दौरान एक करोड़ 85 लाख रुपए निकाल लिए थे, जिन्हें ले कर उन के साथी पहले ही वहां से चले गए.’’

फ्लैट में मौजूद अंकित के सहयोगियों में से एक व्यक्ति कैबिनेट मंत्री का करीबी था. उस व्यक्ति को थाने लाने व रुपए बरामद होने की जानकारी मिलते ही मंत्री ने पुलिस अधिकारियों को फोन किया. करीब 2 घंटे से थाने में पूछताछ कर रही पुलिस मंत्री का फोन आते ही सकते में आ गई.

दूसरी ओर आयकर अफसरों ने तत्काल बरामद रकम कब्जे में ले ली और कारोबारियों से पूछताछ में जुट गए. कालेधन का कोई साक्ष्य न मिलने से पुलिस का खेल बिगड़ गया. कारोबारी अंकित द्वारा सच्चाई बताने से पुलिस वालों द्वारा अंकित के फ्लैट में घुस कर 1.85 करोड़ रुपए लूटने के मामले में पुलिस की गरदन फंस गई.

मंत्री ने एसएसपी कलानिधि नैथानी को फोन पर नाराजगी जताई. एसएसपी को पूरी घटना का पता चला तो उन्होंने एसपी (ग्रामीण) विक्रांतवीर और सीओ (मोहनलालगंज) राजकुमार शुक्ला को जांच के लिए मौके पर भेजा. जांच में आरोप सही पाए जाने के बाद पुलिसकर्मियों की साजिश की पोल खुल गई.

एसएसपी कलानिधि नैथानी के अनुसार,फ्लैट में करोड़ों रुपए बरामद होने की सूचना पर जब उन्हें घटना के समय एसआई पवन मिश्रा के वहां होने की बात पता चली तो वह चौंके. पवन मिश्रा लंबे समय से गोसाईगंज थाने से गैरहाजिर चल रहा था. उस ने अपनी आमद पुलिस लाइन में कराई थी. उस का वहां होना चौंकाने वाली बात थी. उन्हें तभी लग गया था कि कुछ गड़बड़ी है.

एसपी (ग्रामीण) विक्रांतवीर ने जांच के दौरान 9 मार्च की सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी. सीसीटीवी की फुटेज ने सारे राज खोल दिए. आरोपियों ने 10 मिनट में ही 2 बैगों में 1.85 करोड़ रुपए भर लिए थे. मुखबिर मधुकर अपार्टमेंट के नीचे गाड़ी लिए खड़ा था. फुटेज में दरोगा पवन मिश्रा उस की गाड़ी में रुपए रखवाते दिखाई दे रहा था. रुपए ले कर मधुकर वहां से चला गया था.

इस बारे में जब दरोगा पवन मिश्रा से पूछा गया कि बैग बाहर भेजने के बाद सूचना क्यों दी, पहले क्यों नहीं? तो वह कोई जवाब नहीं दे सका. उस के चेहरे का रंग उड़ गया और वह बगलें झांकने लगा.

आरोपी सिपाही प्रदीप फ्लैट में सरकारी एके47 राइफल ले कर दाखिल हुआ था, जिस से वह अंदर मौजूद लोगों पर दबाव बना सके. पुलिस ने उस से ले कर सरकारी असलहा जब्त कर लिया. एसपी (देहात) विक्रांतवीर के अनुसार,सीसीटीवी फुटेज के आधार पर 2 अन्य आरोपियों की पहचान राधाकृष्ण उपाध्याय और यशराज तिवारी के रूप में हुई.

बंदूक के दम पर हुई यह वारदात वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी. अंकित अग्रहरि की तहरीर पर गोसाईगंज थाने में इसी थाने में तैनात एसआई पवन मिश्रा, एसआई आशीष तिवारी,मुखबिर मधुकर मिश्रा व 4 अन्य के खिलाफ बंधक बना कर डकैती व अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया.

एसएसपी ने दोनों दरोगाओं को निलंबित कर पूछताछ की. इस के साथ ही पुलिस फ्लैट से रुपयों का बैग ले कर निकले मुखबिर मधुकर और उस के अज्ञात सहयोगियों की सरगर्मी से तलाश में जुट गई.

फ्लैट से मिले कुल 1.53 करोड़ रुपए बक्से में रखवा कर सील करने के बाद आयकर विभाग को सौंप दिए गए. सीओ के मुताबिक नोटों की गड्डियां बैड व दीवान में छिपा कर रखी गई थीं. इतनी बड़ी मात्रा में नकदी कहां से आई,इस की जांच रेवेन्यू व इनकम टैक्स अधिकारी कर रहे हैं.

लूटपाट की पुष्टि होने के बाद एसएसपी के आदेश पर गोसाईगंज पुलिस ने एसआई पवन मिश्रा, आशीष तिवारी, सिपाही प्रदीप भदौरिया व ड्राइवर आनंद यादव को गिरफ्तार कर लिया.

एसपी (ग्रामीण) के निर्देश पर पवन व आशीष के घर पर पुलिस टीम भेजी गई. दोनों के यहां से करीब 36 लाख रुपए बरामद हुए. हालांकि इस बारे में पुलिस कुछ बोलने को तैयार नहीं थी.

अलबत्ता एसएसपी ने प्रैसवार्ता में बताया,‘‘आनंद के पास से 40 हजार व प्रदीप के घर से 2 लाख रुपए के साथ पुलिस ने घटना में इस्तेमाल इनोवा और एक अन्य कार बरामद कर ली. आनंद प्रदीप का निजी चालक है. पुलिस द्वारा लूटे गए शेष रुपए कहां गए, पता अभी तक नहीं लग सका है.’’

पुलिस की जांचपड़ताल के दौरान यह बात सामने आई कि मुखबिर मधुकर मिश्रा ने दोनों दरोगाओं पवन व आशीष को बताया था कि अंकित अग्रहरि के फ्लैट में करोड़ों रुपए की ब्लैकमनी और असलहों की खेप रखी है. इसी को आधार बना कर दोनों दरोगा, सिपाही, मुखबिर और अन्य साथियों के साथ अंकित के फ्लैट पर पहुंचे थे.

मुखबिर मधुकर गोसाईगंज थाने गया था, जहां उस ने दोनों दरोगाओं के साथ मिल कर योजना बनाई थी. थाने में ही उन्होंने यह तय किया था कि कितना रुपया दिखाया जाएगा और कितना हड़पना है. थाने में बनी योजना के बावजूद थानाप्रभारी अजय त्रिपाठी सहित अन्य पुलिस वालों को इस योजना की भनक तक नहीं लगी थी.

बिजनैसमैन अंकित के फ्लैट से .32 बोर की पिस्टल व 4 कारतूस बरामद हुए थे. ये पिस्टल किस की है, इस की जांच की जा रही है. कहीं ये पिस्टल लूटने आए दरोगा की तो नहीं है, इस संबंध में भी पुलिस जांचपड़ताल कर रही है. पिस्टल व कारतूस सील कर के मालखाने में जमा करा दिए गए.

दरोगा पवन मिश्रा और आशीष तिवारी घूसखोरी के लिए थे बदनाम…………. 

दरोगा पवन मिश्रा व आशीष तिवारी के खिलाफ घूसखोरी की पहले भी कई शिकायतें थीं. कुछ महीने पहले सीओ मोहनलालगंज के कार्यालय से दोनों की बाकायदा लिखित शिकायत उच्चाधिकारियों से की गई थी. शिकायत में कहा गया था कि पवन जमीन संबंधी मामलों में सांठगांठ कर के घूसखोरी कर रहा है.

 अपने साथ दरोगा आशीष व अन्य पुलिसकर्मियों को भी साथ मिला रखा है. अगर इस शिकायत पर संबंधित अधिकारियों ने संज्ञान ले लिया होता तो आरोपित दरोगा डकैती के बारे में सोचते भी नहीं. पूरे प्रकरण में अधिकारियों की लापरवाही उजागर हुई है.

कोयला कारोबारी के घर डकैती की घटना से चर्चा में आए मधुकर शुक्ला के खिलाफ वजीरगंज के अलावा ट्रांस गोमती, गाजीपुर आदि के थानों में पहले से ही एफआईआर दर्ज हैं. वहीं एएसपी (क्राइम) का गनर रह चुका लालपुरवा, खैरीघाट, बहराइच निवासी सिपाही प्रदीप झांसी परिक्षेत्र में मारपीट के एक मामले में जेल भी जा चुका है.

प्रदीप ट्रक चलवाता है. निलंबित दरोगा पवन और आशीष दोनों ही प्रेमनगर,झांसी के रहने वाले हैं. वहीं पकड़ा गया चालक आनंद यादव महिपाल खेड़ा,अर्जुनगंज का रहने वाला है. गिरफ्तार दरोगा पवन, आशीष और सिपाही प्रदीप व उस के चालक आनंद को पुलिस ने 10 मार्च को रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया. न्यायालय ने चारों आरोपियों को न्यायायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

राजधानी के चर्चित गोसाईगंज डकैती कांड में आरोपी मधुकर मिश्रा ने 11 मार्च को कोर्ट में सरेंडर कर दिया. पुलिस को सूचना मिली थी कि मधुकर 11 मार्च को कोर्ट में सरेंडर कर सकता है. पुलिस को सादे कपड़ों में लगाया गया था. इस के बावजूद आरोपी ने स्पैशल सीजेएम-6 के न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पुलिस ने डकैती की वारदात को अंजाम दे कर खाकी वरदी को दागदार कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सस्ते मोबाइल फोन की खातिर ली महंगी जान

उत्तर प्रदेश में बस्ती जिले के गौर थाना इलाके का केसरई गांव. वहां के एक बाशिंदे रमेश यादव ने 30 अक्तूबर, 2016 की सुबह के तकरीबन 11 बजे थानाध्यक्ष अरविंद प्रताप सिंह को यह सूचना दी कि उस का भाई राजेश कुमार यादव हंसवर गांव में सफाई मुलाजिम था. किसी ने आज सुबह ड्यूटी जाते समय हर्दिया के प्राइमरी स्कूल के पास खड़ंजे पर उस की हत्या कर लाश वहीं फेक दी है.

हत्या की सूचना पा कर इंस्पैक्टर अरविंद प्रताप सिंह ने इस वारदात की सूचना अपने से बड़े अफसरों को दी और खुद अपने दलबल के साथ मौका ए वारदात की ओर चल दिए. वहां एक नौजवान की लाश पड़ी हुई थी और उस के सिर से काफी खून बह कर जमीन पर पड़ा हुआ था. लाश को देखने से ही लग रहा था कि मारे गए उस नौजवान के सिर पर किसी भारी चीज से वार कर उस की हत्या की है.

पुलिस ने लोगों और परिवार वालों से किसी पर हत्या का शक होने की बात पूछी, लेकिन सभी ने इनकार कर दिया. पुलिस को वहां ऐसा कोई सुबूत भी नहीं मिला, जिस से हत्या करने वाले या हत्या की वजह का पता किया जा सके.

इसी बीच परिवार के लोगों ने पुलिस को बताया कि राजेश के पास एक मोबाइल फोन भी था, जो लाश के पास बरामद नहीं हुआ. पुलिस ने परिवार वालों की सूचना के आधार पर राजेश कुमार की हत्या का मुकदमा दर्ज कर व लाश का पंचनामा कर 1 नवंबर, 2016 को ही पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

पुलिस को राजेश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट दूसरे दिन ही मिल गई थी, जिस में मौत की वजह सिर पर चोट लगना ही बताया गया था.

अभी तक पुलिस को राजेश की हत्या करने का कोई भी मकसद नजर नहीं आ रहा था, फिर भी पुलिस गायब मोबाइल फोन को आधार बना कर छानबीन करती रही.

इस दौरान गायब मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा दिया गया था. पुलिसिया छानबीन में शक की सूई एक शख्स पर जा कर टिक गई, क्योंकि किसी ने पुलिस को यह सूचना दी थी कि राजेश का मोबाइल फोन कप्तानगंज थाना क्षेत्र के हर्दिया गांव के रवीश कुमार मिश्र के पास है.

पुलिस सतर्क हो गई. रवीश कुमार मिश्र को पकड़ने के लिए उस के गांव में दबिश दी गई और उसे मोबाइल समेत गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस की पूछताछ में रवीश पहले तो इधरउधर की बातों में उलझाता रहा, पर बाद में जब कड़ाई की गई, तो उस ने राजेश कुमार की हत्या करने की जो मामूली वजह बताई, वह उस की सनक का ही नतीजा निकला.

रवीश कुमार मिश्र ने राजेश कुमार की हत्या की जो वजह बताई, वह उस की सनक के चलते हुई थी. उस ने पुलिस को बताया कि उस का कप्तानगंज थाना क्षेत्र में दुधौरा तिलकपुर में ननिहाल है और वह अपने मामा के पास एक पालूत पिल्ले को एक हफ्ते के लिए छोड़ कर आया था.

एक हफ्ते बाद जब वह मामा के पास पिल्ला लेने पहुंचा, तो पिल्ले को न देख उस ने अपने मामा से पूछा.

मामा ने बताया कि उस के पिल्ले ने बहुत परेशान कर रखा था, इसलिए गांव में ही एक आदमी को उस की देखभाल के लिए छोड़ दिया.

इस बात से रवीश आगबबूला हो गया और वह मामा के पास न रुक कर सीधे उस आदमी के पास पहुंच गया और बिना गलती के ही उस के साथ हाथापाई करने लगा. इसी हाथापाई के दौरान उस का मोबाइल फोन कहीं गुम हो गया.

जब रवीश पिल्ले को ले कर अपने गांव हर्दिया आया, तो उस की बहन ने उस से अपना मोबाइल फोन मांगा.

रवीश ने मोबाइल खोजा, पर नहीं मिला. उस ने अपनी बहन से बहाना किया कि उस का मोबाइल किसी को फोन करने के लिए दिया है.  इस के बाद उस ने मोबाइल बहुत खोजा, लेकिन वह नहीं मिला.

रवीश ने घर आ कर बताया कि मोबाइल गायब हो गया है, तो उस की बहन रोने लगी. घर वाले रवीश को ताना मारने लगे.

रवीश परेशान हो कर घर से बाहर निकल गया. इसी उधेड़बुन में वह गांव से बाहर जाने वाले खड़ंजे की सड़क पर जा ही रहा था कि उसे एक आदमी मोबाइल पर बात करते हुए आता दिखाई दिया. उस को लगा कि उस आदमी का मोबाइल छीन कर वह अपनी बहन को दे सकता है. इस के बाद उस ने राजेश कुमार के पास जा कर उस का मोबाइल छीनने की कोशिश की.

अचानक हुई इस छीनाझपटी से राजेश कुछ नहीं समझ पाया और दोनों में हाथापाई होने लगी. तभी रवीश कुमार के हाथ में एक डंडा आ गया और उस ने डंडे से राजेश के सिर पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया.

राजेश वहीं गिर कर तड़पने लगा और जल्द ही उस की मौत हो गई. रवीश ने मोबाइल उठाया और जिस डंडे से राजेश की हत्या की थी, उसे पास के ही एक गन्ने के खेत के बीच में जा कर गाड़ दिया.

रवीश जब घर आया और उस ने वह मोबाइल फोन अपनी बहन को देने की कोशिश की, तो उस की बहन ने लेने से इनकार कर दिया. लिहाजा, उस ने वह मोबाइल अपने पास ही रख लिया.

रवीश कुमार की सनक का एक मामला 30 जुलाई, 2015 को भी सामने आया था, जब उस ने अपने घर में पड़े एक झोले पर पंजाब के भटिंडा के एक दुकानदार का मोबाइल नंबर देखा, तो उस ने उस दुकानदार को फोन कर भटिंडा रेलवे स्टेशन को बम से उड़ाने की धमकी दे डाली.

यह धमकी सुन कर उस दुकानदार ने पंजाब पुलिस को सूचना दी, तो पंजाब पुलिस सक्रिय हो गई.

जिस मोबाइल नंबर से उस दुकानदार को रेलवे स्टेशन उड़ाने की धमकी दी थी, उस का सर्विलांस के जरीए रवीश की लोकेशन ढूंढ़ ली.

इस के बाद पंजाब पुलिस ने इस की सूचना बस्ती पुलिस को दी, जिस के बाद वहां की पुलिस भी सक्रिय हो गई और आननफानन रवीश कुमार मिश्र को गिरफ्तार कर धारा 505 के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया.

मंगेतर बना मौत का हरकारा

एक दिन पहले बारिश हो कर हटी थी, जिस से ठिठुरन में खासा इजाफा हो गया था. बादलों की वजह से सूरज सुबह से ही ओझल था. लिहाजा पूरा शहर धुंधलके की गिरफ्त में था. चंबल नदी के करीब होने के कारण शहर के स्टेशन का इलाका कुछ ज्यादा ही सर्द था. लगभग आधा दरजन छोटीमोटी बस्तियों में बंटे इस इलाके में तकरीबन 20 हजार की आबादी वाला क्षेत्र नेहरू नगर कहलाता है.

मिलीजुली बिरादरी वालों की इस बस्ती में ज्यादातर निम्नमध्य वर्ग के दिहाड़ी कामकाजी लोग रहते हैं. बस्ती के करीब से अच्छीखासी चौड़ाई में फैला एक नाला गुजरता है. इसलिए इस की तरफ से गुजरने वाला करीब एक फर्लांग का फासला कुछ संकरा हो जाता है.

इसी बस्ती की रहने वाली शाहेनूर अपनी छोटी बहन इशिका के साथ कोचिंग के लिए जा रही थी. हाथों में किताबें थामे दोनों बहनें चलतेचलते आपस में बातचीत करती जा रही थीं. जैसे ही वे नेहरू नगर बस्ती से निकलने वाले रास्ते की तरफ कदम बढ़ाने को हुईं, शाहेनूर एकाएक ठिठककर रह गई.

किसी अनचाहे शख्स के अंदेशे में उस ने पलट कर पीछे देखा. पीछे एक बाइक सवार को देख कर उस की आंखों में खौफ की छाया तैर गई. क्योंकि वह उस युवक को जानती थी. शाहेनूर ने तुरंत अपनी छोटी बहन का हाथ जोर से पकड़ा और घसीटते हुए कहा, ‘‘जरा तेज कदम बढ़ाओ.’’

इशिका ने बहन को खौफजदा पाया तो फौरन पलट कर पीछे देखा. वह भी पूरा माजरा समझ गई. इस के बाद दोनों बहनें फुरती से तेजतेज चलने लगीं.

दाढ़ीमूंछ और सख्त चेहरे वाला वह युवक साबिर था, जो शाहेनूर का मंगेतर था. पर किसी वजह से उस से सगाई टूट गई थी. उस युवक को देख कर दोनों बहनों की चाल में लड़खड़ाहट आ गई थी. आशंका को भांप कर शाहेनूर ने मोबाइल निकाल कर किसी का नंबर मिलाया.

वह मोबाइल पर बात कर पाती, उस के पहले ही साबिर उस के पास पहुंच गया. उस ने मोबाइल वाला हाथ झटकते हुए शाहेनूर का गला दबोच लिया. गले पर कसती सख्त हाथों की गिरफ्त से छूटने के लिए शाहेनूर ने जैसे ही हाथ चलाने की कोशिश की, साबिर ने जेब में रखा मिर्च पाउडर उस के ऊपर फेंक दिया.

चीखते हुए शाहेनूर ने एक हाथ से आंखें मलने लगी और दूसरे हाथ से छोटी बहन इशिका का हाथ पकड़ने की कोशिश की. इशिका भी बहन के लिए चीखने लगी. तभी साबिर ने चाकू निकाल कर शाहेनूर पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए.

बदहवास इशिका ने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन उस के गले से आवाज निकलने के बजाय वह जड़ हो कर रह गई. तब तक दरिंदगी पर उतारू साबिर शाहेनूर पर ताबड़तोड़ वार करता हुआ उसे छलनी कर चुका था. उस की दर्दनाक चीखों से आसपास का इलाका गूंज रहा था और उस के शरीर से फव्वारे की मानिंद छूटता खून जमीन को सुर्ख कर रहा था.

उधर से गुजरते लोगों ने यह खौफनाक नजारा देखा भी, लेकिन बीचबचाव करने की हिम्मत कोई नहीं कर सका. सभी मुंह फेर कर चलते बने. इशिका ने राहगीरों को मदद के लिए पुकार भी लगाई, लेकिन उस की कोशिश नाकाम रही. नतीजतन उस ने वापस अपने घर की तरफ गली में दौड़ लगा दी. घर पहुंच कर उस ने बहन पर हमले वाली बात घर वालों को बता दी.यह खबर सुन कर घर वालों की चीख निकल गई.

वे रोतेबिलखते इशिका के साथ चल दिए. करीब 5 मिनट बाद वे घटनास्थल पर पहुंच गए. शाहेनूर की खून से लथपथ लाश वहां पड़ी थी. घर वाले दहाड़ें मार कर रोने लगे. कुछ लोग वहां जमा हो चुके थे. खबर आग की तरह इलाके में फैली तो भीड़ का सैलाब उमड़ पड़ा.

किसी ने इस वारदात की खबर फोन द्वारा भीममंडी थाने को दी तो कुछ ही देर में थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतका की छोटी बहन इशिका ने सारी बात पुलिस को बता दी. इस से पुलिस को पता चल गया कि इस का हत्यारा साबिर है. घटनास्थल पर उस की मोटरसाइकिल भी खड़ी थी.

पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो गली में दूर तक खून सने पावों के निशान मिले, जो निश्चित रूप से भागते हुए साबिर के थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी और खुद वहां मौजूद लोगों से बातें करने लगे. अभी यह सब काररवाई चल ही रही थी कि एसपी अंशुमान भोमिया, एडिशनल एसपी अनंत कुमार और सीओ शिवभगवान गोदारा समेत अन्य पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल की जरूरी काररवाई कर के पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया. दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद लोगों में डर बैठ गया. एसपी अंशुमान भोमिया ने सीओ शिवभगवान गोदारा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी रामखिलाड़ी मीणा सहित अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल किया.

टीम ने आरोपी साबिर की संभावित जगहों पर तलाश की, पर कोई जानकारी नहीं मिली. उस के बाद मुखबिर की सूचना पर साबिर को मुरगीफार्म के पास जंगल से दबोच लिया गया. वह चंबल नदी क्षेत्र के घने जंगल में छिपने की कोशिश कर रहा था. अगर एक बार वह बीहड़ में पहुंच जाता तो उस का गिरफ्त में आना मुश्किल था.

छाबड़ा में तैनात शाहेनूर के पिता असलम खान को हादसे की खबर कर दी गई, लेकिन तब तक वह कोटा नहीं पहुंचे थे. शव इस कदर क्षतविक्षत था कि एक पल के लिए तो डाक्टर भी स्तब्ध रह गए. उन के मुंह से निकले बिना नहीं रहा कि लगता है हमलावर साइकोपेथी का शिकार था और वह अपना दिमागी संतुलन पूरी तरह खो चुका था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शाहेनूर के शरीर पर 2 दरजन से ज्यादा घाव मिले थे. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक मौत की वजह वे घातक वार बने, जिन्होंने दाएं फेफड़े और लीवर को पंक्चर कर दिया था. चाकू के गहरे वार पीठ, सीना, हाथ सिर, मुंह और आंखों सहित हर जगह पाए गए. चाकू का हर वार 2 से 3 सेंटीमीटर चौड़ा था. डाक्टरों के मुताबिक हर वार पूरी ताकत से किया गया था.

शुरुआती पूछताछ में शाहेनूर के मामा फिरोज अहमद और मां शमीम बानो ने पुलिस को बताया कि पिछले साल अगस्त में शाहेनूर उर्फ शीनू की मंगनी साबिर हुसैन से की गई थी. साबिर फेब्रिकेशन का काम करता था. इस के बाद साबिर का उन के घर आनाजाना शुरू हो गया.

इसी दौरान उन्हें साबिर के चालचलन के बारे में कई जानकारियां मिलीं. पता चला कि साबिर न सिर्फ अव्वल दरजे का नशेड़ी है, बल्कि उस की सोहबत जरायमपेशा किस्म के लोगों से भी है. शमीम बानो ने कहा, ‘तब हम ने घर बैठ कर आपस में मशविरा कर के इस नतीजे पर पहुंचे कि साबिर से बेटी का रिश्ता कायम रखने का मतलब शाहेनूर सरीखी संजीदा लड़की का भविष्य दांव पर लगाना होगा. नतीजतन रिश्ता तोड़ना ही बेहतर समझा गया. काफी सोचनेसमझने के बाद करीब 6 महीने पहले हम ने साबिर से रिश्ता तोड़ दिया.’

साबिर असलम खान के घर आनेजाने का आदी हो चुका था और शाहेनूर से प्यार भी करने लगा था. वह शाहेनूर से शादी करना चाहता था. शमीम बानो का कहना था कि मंगनी तोड़ने से साबिर इस हद तक बौखला गया कि एक दिन वह तूफान मचाता हुआ घर पहुंच गया. उन की मौजूदगी में शाहेनूर के साथ मारपीट कर बैठा.

शाहेनूर के पिता असलम उन दिनों घर पर नहीं थे. वह छाबड़ा में अपनी नौकरी पर थे. असलम छोटीछोटी बातों पर बहुत गुस्सा करने वाले इंसान थे. बेटी की पिटाई वाली बात उन्हें इसलिए नहीं बताई गई कि वह गुस्से में आगबबूला हो कर कोई अनर्थ न कर बैठें या कहीं कोई बवाल ना मच जाए.

इस के बाद यह बात आईगई हो गई. साबिर का भी असलम के यहां आनाजाना एक तरह से बंद हो गया. पर वह अकसर शाहेनूर के घर के आसपास की गलियों में घूमता दिखाई देता था.

बाद में जब असलम को बात पता चली तो उन्होंने पुलिस में जाना इसलिए जरूरी नहीं समझा, क्योंकि खामखाह बिरादरी में बदनामी होती. शाहेनूर से दूरी बनाने के बजाय साबिर उसे फोन पर परेशान करने लगा. शाहेनृर ने यह बात घर वालों को बताई तो घर वालों ने उस से यह कह दिया कि वह साबिर से बात न करे.

साबिर की हिम्मत दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. शाहेनूर 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. उस ने ऐच्छिक विषय उर्दू ले रखा था, इस की वजह से वह 3 बजे के करीब एक इंस्ट्टीयूट में उर्दू की पढ़ाई करने जाती थी. साबिर जब शाहेनूर को रास्ते में परेशान करने लगा तो घर का कोई न कोई सदस्य उसे कोचिंग तक छोड़ने जाने लगा.

4 बेटियों के पिता असलम खान कोटा से तकरीबन 100 किलोमीटर दूर बारां जिले के छाबड़ा कस्बे में नौकरी करते थे. वह थर्मल में बतौर तकनीशियन तैनात थे. शाहेनूर और इशिका के अलावा उन की 2 बेटियां और थीं, जो काफी छोटी थीं. नौकरी के लिहाज से असलम छाबड़ा में ही रहते थे. लेकिन हफ्तापंद्रह दिन में कोटा में अपने घर आते रहते थे.

पुलिस ने जिस वक्त चंबल के बीहड़ों से साबिर को गिरफ्तार किया था. उस की कलाइयां लहूलुहान थीं और वो नशे में धुत था. तलाशी में पुलिस ने उसकी जेब से पाउडर सरीखा जहरीला पदार्थ बरामद किया था. पूछताछ में उस ने कबूल किया कि आत्महत्या करने की कोशिश में उस ने अपनी कलाई की नसें काटने की कोशिश की थी. जहर की पुडि़या भी उस ने खुदकुशी की खातिर ही अपने पास रखी थी. लेकिन वह उसे इस्तेमाल करता, इस से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

साबिर ने पुलिस को बताया कि वह पहले अपने परिवार के साथ बोरखेड़ा में रहता था. लेकिन पिछले कुछ दिनों से खेडली इलाके में कमरा किराएपर ले कर अकेला रह रहा था. पूछताछ के दौरान वह हर सवाल पर ठहाके मार कर हंस रहा था.

सुबह होने पर जब उस का नशा उतरा तो उस ने रोना शुरू कर दिया. शायद उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था. पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर सोमवार 12 दिसंबर को कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया.

13 दिसंबर को पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिस ने शाहेनूर की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का दिल तो उसी दिन टूट गया था, जिस दिन शाहेनूर से उस का रिश्ता टूटा था. वह उसे दिलोजान से चाहता था, पर उस ने मेरी मोहब्बत को तरजीह नहीं दी.

साबिर ने बताया कि उसे मारने के बाद वह खुद भी मर जाना चाहता था. इसलिए उस ने अपनी कलाई की नसें काटीं. वह जंगल में जहर खा कर मर जाता, लेकिन पुलिस ने उस की मंशा पूरी नहीं होने दी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक बेरहम हत्या : सपनों के पीछे भागने का नतीजा

29 दिसंबर, 2018. समय सुबह के 4 बजे. स्थान थाणे. मुंबई से सटे जनपद थाणे के सिविल अस्पताल से कासारवाडवली पुलिस को एक महत्त्वपूर्ण सूचना मिली, जिसे थाने में मौजूद इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने गंभीरता से लिया. उन्होंने चार्जरूम की ड्यूटी पर तैनात एसआई संतोष धाडवे को बुला कर अस्पताल से मिली सूचना के बारे में बताया और केस डायरी तैयार करने का निर्देश दिया. साथ ही उन्होंने इस की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी.

थाने में सूचना दर्ज करवाने के बाद इंसपेक्टर वैभव धुमाल अपने सहायक इंसपेक्टर कैलाश टोकले, एसआई विनायक निबांलकर, संतोष धाडवे, कांस्टेबल राहुल दडवे, दिलीप भोसले, राजकुमार महापुरे और महिला कांस्टेबल मीना धुगे को साथ ले कर थाणे सिविल अस्पताल के लिए रवाना हो गए.

जिस समय पुलिस टीम अस्पताल परिसर में दाखिल हुई, तब तक डाक्टरों ने उस व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया था, जिसे संदिग्ध अवस्था में अस्पताल लाया गया था और लाने वाले उसे अस्पताल में छोड़ कर गायब हो गए थे. पूछताछ करने पर पुलिस को पता चला कि मृतक को अस्पताल में उपचार के लिए रात के साढे़ 3 बजे लाया गया था.

उसे लाने वालों में एक सुंदर महिला और एक हट्टाकट्टा युवक था. उन का कहना था कि वह व्यक्ति घायल अवस्था में उन्हें कलवा बांध विलगांव की सुरंग के पास सड़क किनारे तड़पता हुआ मिला था. शायद वह किसी भारी वाहन की चपेट में आ गया होगा. इंसानियत के नाते वे उसे अस्पताल ले आए थे.

घायल की स्थित देख कर डाक्टर उस के उपचार में जुट गए. डाक्टर घायल के बारे में कुछ बताते उस से पहले ही उसे लाने वाली महिला और युवक दोनों अस्पताल से गायब हो गए. मृतक की उम्र 30 साल के आसपास थी. उस के सिर पर घाव और गले पर खरोचों के अलावा काले रंग का एक गहरा निशान भी था.

रहस्यमय लाश और अंजान महिला व युवक

अस्पताल के डाक्टरों और अस्पताल में तैनात पुलिस कांस्टेबल के बयानों के हिसाब से मामला काफी जटिल था. इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने मृतक की लाश का बारीकी से निरीक्षण किया तो उन्हें ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया जो महिला और उस के साथी युवक ने अस्पताल के डाक्टरों और कांस्टेबल को बताया था. बहरहाल प्राथमिक काररवाई के बाद इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने लाश का पंचनामा बना कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने लौट आए.

थाने लौट कर इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने अपने सहायकों के साथ विचारविमर्श कर तफ्तीश की रूप रेखा तैयार की. इस के साथ ही उन्होंने इस बारे में डीसीपी अभिनाश आंमोरे, एसीपी महादेव भोर और थानाप्रभारी दत्तात्रेय ढोले को बता कर तफ्तीश शुरू कर दी.

जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतक की शिनाख्त जरूरी थी. वह कौन था, कहां रहता था. उसे अस्पताल लाने वाली महिला और युवक कौन थे. जैसे कई सवाल थे, जिन का जवाब मिले बिना तफ्तीश आगे नहीं बढ़ सकती थी.

अस्पताल के सीसीटीवी के जो फुटेज मिले उन में मृतक और उसे लाने वालों की तसवीरें अस्पष्ट थीं. सारी कडि़यों को जोड़ना आसान तो नहीं था, लेकिन नामुमकिन भी नहीं था. सोचविचार कर इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने अपने स्टाफ के अनुभवी कर्मचारियों की एक टीम तैयार की और उसे 2 भागों में बांट कर अलगअलग जिम्मेदारी सौंप दी.

पहली टीम को उन्होंने कलवा बांध विलगांव सुरंग के पास की सच्चाई का पता लगाने भेज दिया. जिस का जिक्र डाक्टर और कांस्टेबल के बयानों में आया था. दूसरी टीम को उन्होंने अस्पताल से मिले सीसीटीवी के उन फुटेज के आधार पर आसपास के गांवों में जा कर मृतक और उसे अस्पताल लाने वालों के बारे में जानकारी हासिल करने को कहा.कहावत है कि विश्वास का वृक्ष कभी नहीं सूखता. इस मामले में भी यही हुआ.

पहली टीम बांध विलगांव से खाली हाथ लौट आई. बांध विलगांव के पास ऐसा कुछ नहीं हुआ था, जैसा उस महिला और युवक ने डाक्टरों को बताया था. इंसपेक्टर वैभव धुमाल को जो संदेह था सही निकला. इंसपेक्टर वैभव धुमाल को विश्वास था कि कोई न कोई राह जरूर निकलेगी.

शक की सूई सीधे हत्या की तरफ इशारा कर रह थी. यह बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गई थी. पता चला, उस के सिर पर घातक वार तो किया गया था, लेकिन उस की मौत गला घोंटने से हुई थी. साफ पता चल रहा था कि उस की बेरहमी से हत्या कर के पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की गई थी. इसी वजह से वह महिला और युवक शक के दायरे में आ गए.

पहली टीम को भले ही कोई सुराग नहीं मिला था, लेकिन दूसरी टीम खाली हाथ नहीं लौटी.

इस टीम ने उस औटो वाले को खोज निकाला, जिस के औटो से मृतक को अस्पताल लाया गया था. औटो वाले की निशानदेही पर पुलिस टीम मृतक के परिवार तक पहुंच गई.

उस के परिवार ने मृतक की शिनाख्त गोपी नाइक के रूप में की. गोपी नाइक पत्नी अैर बेटी के सथ घोड़बंदर रोड गायमुख इलाके की टीएमसी कालोनी में रहता था. वह थाणे म्युनिसिपल कारपोरेशन में नौकरी करता था.

इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने तत्काल मृतक गोपी नाइक के भाई दिलीप नाइक और परिवार वालों से पूछताछ की. जब दिलीप नाइक को अस्पताल ले जा कर लाश दिखाई गई तो वह गोपी नाइक का शव देख कर फूटफूट कर रोने लगा.

दिलीप नाइक को अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज दिखाई गई तो उस ने गोपी नाइक को अस्पताल लाने वाली महिला और उस के साथ के युवक को पहचान लिया. वह महिला मृतक की पत्नी प्रिया नाइक थी और उस के साथ वाला युवक उस का बौयफ्रैंड महेश कराले था.

पुलिस ने गोपी नाइक के भाई दिलीप नाइक की तहरीर पर केस दर्ज कर के शव गोपी नाइक को सौंप दिया. इंसपेक्टर वैभव धुमाल अपनी टीम के साथ जब गोपी नाइक के घर पहुंचे तो प्रिया घर में नहीं थी. पूछताछ में आसपड़ोस वालों ने बताया कि उन का घर पिछले 2-3 दिनों से बंद है. जब उन लोगों को यह जानकारी मिली कि गोपी नाइक की हत्या हो गई है, तो वे सन्न रह गए. उन का कहना था कि एक न एक दिन यह तो होना ही था. उन्होंने भी अंगुली प्रिया और महेश कराले की ओर उठाई.

खुलता गया रहस्य

पुलिस टीम को हत्या की सारी कडि़यों को जोड़ने के लिए साक्ष्यों की जरूरत थी. उन्होंने कालोनी के 2 व्यक्तियों को पंच बना कर घर की तलाशी ली तो घर की साफसफाई के बाद भी वहां गुनाह के निशान मिल ही गए, जिन्हें देख कर पुलिस टीम को यह समझने में देर नहीं लगी कि हत्या की साजिश घर के अंदर ही रची गई थी. घर के बैडरूम और बाथरूम के फर्श पर पडे़ खून के धब्बे हत्या की पूरी कहानी बयान कर रहे थे.

पुलिस टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर के तेजी से तफ्तीश शुरू कर दी. पुलिस टीम ने प्रिया और महेश के सभी उन ठिकानों पर दबिश दी, जहांजहां उन के मिलने की संभावना थी. घटना को 36 घंटे से अधिक बीत गए थे. ऐसे में इस बात की पूरी संभावना थी कि प्रिया और महेश शहर छोड़ कर कहीं चले गए हों या शहर छोड़ने की कोशिश में हों.

यही सोच कर पुलिस टीमों ने शहर और जनपद की नाकेबंदी करा दी. साथ ही मुखबिरों को भी सचेत कर दिया गया. नतीजा यह निकला कि घटना के एक सप्ताह बाद पुलिस ने मुखबिरों की सूचना पर 5 जनवरी, 2019 की रात प्रिया नाइक और महेश कराले को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वे अपने गांव से पैसों का जुगाड़ कर के महाराष्ट्र से बाहर भागने की तैयारी में थे.

मैट्रिक पास 28 वर्षीय प्रिया नाइक जितनी खूबसूरत और स्मार्ट थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी थी. उस के सपने बहुत ऊंचे थे. शादी से पहले उस ने एक सुंदर स्वस्थ जीवनसाथी की कामना की थी. लेकिन उस के सपने उस समय धराशायी हो गए जब उस का विवाह उस के मनमुताबिक न हो कर दिव्यांग गोपी नाइक से हो गया.

गोपी और प्रिया का कोई मेल नहीं था. लेकिन परिवार की गरीबी और सामाजिक दबाव की वजह से उस ने समझौता कर लिया. गोपी को पति के रूप में स्वीकार कर वह अपनी गृहस्थी में रम गई.

गोपी नाइक थाणे म्युनिसिपल कारपोरेशन में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था. वह अपने परिवार के साथ कलवा के अंकलेश्वर नगर में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के मध्यम वर्गीय परिवार में पिता किसान नाइक, मां, बहन और एक भाई दिलीप नाइक था. भाईबहन सभी की शादी हो चुकी थी और सब सेटल थे.

किशन नाइक सीधेसादे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. समाज में उन का मानसम्मान था. प्रिया उन के दूर के एक रिश्तेदार की बेटी थी. जिसे किशन नाइक ने स्वयं अपने बेटे गोपी नाइक के लिए चुना था. प्रिया जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर गोपी नाइक और उस का पूरा परिवार बहुत खुश था.

गोपी नाइक प्रिया को बहुत प्यार करता था और उस की हर खुशी का ध्यान रखता था. पूरे परिवार के दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. शादी के कुछ साल बाद गोपी नाइक को परिवार से अलग रहने के लिए जाना पड़ा.

उसे टीएमसी की तरफ से डा. भीमराव अंबेडकर कालोनी में मकान मिल गया था. यहां आने के कुछ दिनों बाद प्रिया ने एक बेटी को जन्म दिया. इस से गोपी और प्रिया का जीवन और भी हंसीखुशी से बीतने लगा. देखतेदेखते प्रिया की बेटी 7 साल की हो गई. वह सीनियर केजी में पढ़ रही थी. गोपी नाइक नौकरी कर रहा था और प्रिया कुशल गृहिणी की तरह घर संभाल रही थी.

मोबाइल ने बदल दी सोच और दुनिया

सामान्य रूप से चलते उन के दांपत्य जीवन के 8-10 साल कैसे निकल गए पता ही नहीं चला. इस की वजह गोपी का प्रिया के प्रति प्यार और विश्वास था. प्रिया भी गोपी के प्यार और अपनी गृहस्थी में डूबी थी. हालांकि कभीकभी गोपी की दिव्यांगत की सूई प्रिया के दिल में चुभ जाती थी. उस ने जवानी के चौखट पर खड़े हो कर जो सपना देखा था, वह पूरा नहीं हुआ था.

2016 में प्रिया नाइक का यह सपना उस समय अस्तित्व में आने लगा, जब उस के सामने 22 वर्षीय महेश कराले की तसवीर आई. महेश कराले ठीक वैसा ही था, जिस की प्रिया ने कभी कल्पना की थी. सुंदर आंखें, बलिष्ठ बाहें, गठीला बदन, चौड़ी छाती. प्रिया उस की दीवानी हो गई. धीरेधीरे प्रिया की इस दीवानगी ने गोपी और उस के बीच दरार पैदा कर दी. 2018 के मध्य में आ कर दरार इतनी बढ़ गई कि साल पूरा होतेहोते यह दरार गोपी नाइक के पूरे अस्तित्व को ही निगल गई.

22 वर्षीय महेश कराले और प्रिया नाइक की जानपहचान फेसबुक पर हुई थी. प्रिया नाइक जब से टीएमसी कालोनी में रहने आई थी, तब से उस के पास घर का ज्यादा काम नहीं था. बेटी को स्कूल और पति को काम पर भेजने के बाद वह घर में अकेली बोर हो जाती थी. थोड़ाबहुत समय टीवी के साथ जरूर गुजार लेती थी. लेकिन इस से मन को सुकून नहीं मिलता था. ऐसे में गोपी नाइक ने प्रिया को एक महंगा मोबाइल ला कर दे दिया. उस वक्त उस ने सोचा भी नहीं होगा कि वही मोबाइल उस के दांपत्य जीवन के मायने ही बदल देगा.

मोबाइल हाथ में आया तो प्रिया नाइक का दैनिक जीवन ही बदल गया. उस का मन घर के कामों में कम और मोबाइल में ज्यादा लगने लगा. वह फेसबुक पर अपना प्रोफाइल बना कर नएनए दोस्त बनाती और उन से चैटिंग करती. इसी के चलते वह महेश कराले की ओर आकर्षित हो गई. वह भूल गई कि वह 7 साल की बच्ची की मां और उस पर अटूट विश्वास करने वाले पति की पत्नी है.

महेश कराले का परिवार महाराष्ट्र के जनपद रायगढ़ के नेरल गांव का रहने वाला था. उस के पिता गोविंद कराले गांव के सम्मानित किसान थे. महेश कराले उन का सब से छोटा और लाडला बेटा था.

ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद जब उसे मुंबई रेलवे बोर्ड में सर्विस मिली तो उस ने गांव से थाणे आ कर उपनगर कर्जत में किराए का एक कमरा ले लिया. प्रिया की तरह महेश भी फुरसत के समय फेसबुक में डूब जाता था. प्रिया का प्रोफाइल और फोटो देख कर वह इतना प्रभावित हुआ कि उस की दोस्ती की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली.

फेसबुक के माध्यम से दोनों की 2 सालों तक दोस्ती चलती रही. दोनों फोन पर भी बातें करने लगे थे. मिलनेमिलाने की बात भी होने लगी. घटना से 6 महीने पहले दोनों एक तयशुदा जगह पर मिले और एकदूसरे के आगोश में सुकून खोज लिया. एक बार जब मर्यादा टूटी तो फिर यह एक आम सी बात हो गई. जब भी मौका मिलता दोनों अपनी जरूरतों को पूरा कर लेते थे.

शुरुआती कुछ दिनों तक प्रिया नाइक और महेश कराले का मिलनाजुलना पार्कों और रेस्टोरेंटों तक सी सीमित था. फिर धीरेधीरे यह सिलसिला प्रिया के घर तक पहुंच गया. चूंकि ऐसी बातें छिपती नहीं हैं, इसलिए इस की भनक आसपड़ोस के लोगों तक पहुंची तो उन में कानाफूसी होने लगी. यह भनक गोपी नाइक के कानों तक भी पहुंच गई.

उस ने जब प्रिया से सच्चाई जानने की कोशिश की तो उस ने बड़ी सफाई से इस बात को ऐसा घुमाया कि गोपी चुप रह गया. महेश कराले को उस ने अपना दूर का भाई बताया, जिस से बात वहीं खत्म हो गई.

प्रिया ने महेश कराले को अपना भाई बता कर अपने पापों को छिपाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन इस में वह पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई. उस के कारनामों का सच एक दिन सामने आ ही गया. प्रिया मोबाइल में सेव्ड उस के और महेश कराले के नंबर मैसेज और सेल्फी वगैरह ने हर राज से परदा उठा दिया.

सब कुछ देख कर गोपी नाइक का दिमाग घूम गया. प्रिया से उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह प्रिया को बहुत ही प्यार करता था. उस की सारी जरूरतें पूरी करता था. उस ने किसी तरह अपने आप को संभाला और इस मुद्दे पर प्रिया को आडे़ हाथों लिया. यही नहीं उस ने प्रिया का मोबाइल फोन भी ले लिया. इस के साथ ही वह प्रिया को मानसिक और शारीरिक रूप से टौर्चर भी करने लगा.

यह सब प्रिया और महेश की सहनशक्ति से बाहर हो गया था. तंग आ कर उन दोनों ने गोपी नाइक को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. इसीलिए वह धीरेधीरे पति से दूरियां बढ़ाती गई. लेकिन सीधासादा गोपी इसे समझ नहीं पाया. जब तक यह सब उस की समझ में आया तब तक काफी देर हो चुकी थी.

हत्या की योजना के बाद

अपनी योजना के अनुसार घटना के एक सप्ताह पहले महेश कराले ने गोपी को अपने रास्ते से हटाने के लिए अपने एक परिचित कैमिस्ट की मदद से ढेर सारी नींद की गोलियां खरीदीं और ला कर प्रिया को दे दीं. साथ ही उसे समझा भी दिया कि मौका मिलते ही गोपी को कैसे देगी.

घटना के दिन प्रिया ने वैसा ही किया भी, जैसा महेश कराले ने कहा था. उस ने गोपी नाइक की बीयर में करीब 30 गोलियां डाल दीं. लेकिन पता नहीं क्यों गोपी नाइक पर नींद की गोलियों का उतना असर नहीं हुआ. जितना होना चाहिए था. वह अर्द्धनिद्रा में बैड पर पड़ा करवटें बदलता रहा. प्रिया ने जब यह बात महेश कराले को बताई तो वह गोपी के घर आ गया. उस ने साथ लाए फिनायल का इंजेक्शन गोपी के शरीर में लगा दिया.

जैसेजैसे समय बीत रहा था वैसेवैसे प्रिया और महेश कराले के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. उन की धड़कनें तब और बढ़ गईं जब गोपी पर फिनाइल के इंजेक्शन का भी कोई खास असर नहीं हुआ. वह बाथरूम में जा कर उल्टियां करने लगा. प्रिया और महेश से यह सब सहन नहीं हुआ तो दोनों ने गोपी को खुद मौत की नींद सुला दिया.

महेश कराले ने गोपी नाइक का गला पकड़ा और प्रिया ने घर के अंदर रखे लोहे की रौड से उस के सिर पर वार किया. इस के बावजूद गोपी अपने आप को बचाने के लिए बाथरूम से भाग कर बैडरूम में आया, लेकिन वह गिर कर बेहोश हो गया. उस के बेहोश होने के बाद भी महेश कराले और प्रिया ने अपनी तसल्ली के लिए एक बार फिर पूरी ताकत से उस का गला दबाया.

गोपी नाइक की बेरहमी से हत्या करने के बाद दोनों ने संतोष की सांस ली. इस के बाद दोनों गोपी के शव को ठिकाने लगाने के बारे में विचारविमर्श करने लगे. काफी सोचविचार के बाद दोनों इस नतीजे पर पहुंचे कि पुलिस को गुमराह करने के लिए गोपी को घायल बता कर थाणे सिविल अस्पताल ले जाएं और उसे डाक्टरों के हवाले कर के वहां से निकल लें.

इसी योजना के तहत रात 2 बजे दोनों मृत गोपी के लहूलुहान शव को स्कूटर पर लाद कर थाणे बांध विलगांव की सड़क पर ले गए. वहां गोपी के शव को लेटा कर महेश ने अपना स्कूटर पास की झाडि़यों में छिपा दिया.

वहां से आटो पकड़ कर दोनों गोपी नाइक के शव को अस्पताल ले गए और डाक्टरों के हवाले कर के वहां से निकल गए. दोनों अस्पताल और पुलिस कांस्टेबल की नजरों से तो बच कर निकल गए. लेकिन अस्पताल की तीसरी आंख से नहीं बच पाए.

अस्पताल से निकल कर प्रिया और महेश कराले गोपी के घर आए. उन्होंने घर के अंदर बैडरूम और बाथरूम के फर्श पर बिखरे खून की साफसफाई कर दी. साढ़े 5 बजे प्रिया ने अपनी बेटी को उठाया और घर में ताला लगा कर महेश कराले के साथ निकल गई. वहां से दोनों सीधे माथेरान हिल चले गए.

लेकिन पैसों की कमी की वजह से महेश प्रिया को ले कर अपने गांव आ गया. ताकि पैसों का जुगाड़ कर के प्रिया को कहीं दूर ले जा सके. दोनों कहीं जा पाते इस से पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गए. दोनों ने योजना तो अच्छी बनाई थी, लेकिन उन का गुनाह छिप नहीं सका.

जांचअधिकारी इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने प्रिया नाइक और महेश कराले से पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 228, 201 और 120बी के तहत मुकदमा दर्ज किया और उन्हें थाणे के मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नरेश वर्मा हत्याकांड : नशे और ग्लैमर का चक्रव्यूह

घटना मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा थाने की है. 12 नवंबर, 2018 को आष्टा के टीआई कुलदीप खत्री थाने में बैठे थे. तभी क्षेत्र के कोठारी गांव का हेमराज अपने गांव के कन्हैयालाल को साथ ले कर टीआई के पास पहुंचा. उस ने उन्हें अपने 29 वर्षीय बेटे नरेश वर्मा के लापता होने की खबर दी.

हेमराज ने बताया कि नरेश कराटे में ब्लैक बेल्ट होने के अलावा पौवर लिफ्टिंग का राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी रह चुका है. वह सीहोर में अपना जिम खोलना चाहता था. जिम का सामान खरीदने के लिए वह सुबह 10 बजे के आसपास घर से 4 लाख रुपए ले कर निकला था.

उस ने रात 8-9 बजे तक घर लौटने को कहा था. लेकिन जब वह रात 12 बजे तक भी नहीं आया तो हम ने उस के मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की,पर उसका मोबाइल फोन बंद मिला. उस के दोस्तों से पता किया तो उन से भी नरेश के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

नरेश के पास 4 लाख रुपए होने की बात सुन कर टीआई कुलवंत खत्री को मामला गंभीर लगा, इसलिए उन्होंने नरेश की गुमशुदगी दर्ज कर मामले की जानकारी एसपी राजेश चंदेल और एडीशनल एसपी समीर यादव को दे दी.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर टीआई खत्री ने जब हेमराज सिंह से किसी पर शक के बाबत पूछा तो उस ने बादशाही रोड पर रहने वाले सुहैल खान का नाम लिया. उस ने बताया कि सुहैल व उस के बेटे नरेश का वैसे तो कोई मेल नहीं था, इस के बावजूद काफी लंबे समय से नरेश का सुहैल के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था.

सुहैल और नरेश की दोस्ती किस तरह बनी और बढ़ी थी, इस बात की जानकारी हेमराज को भी नहीं थी. परंतु लोगों में इस तरह की चर्चा थी कि सुहैल की खूबसूरत बेटी इस का कारण थी और घटना वाले दिन भी नरेश के मोबाइल पर सुहैल का कई बार फोन आया था.

हेमराज ने आगे बताया कि जब देर रात तक नरेश घर नहीं लौटा था तो हम ने सुहैल से ही संपर्क किया. उस ने बताया कि नरेश के बारे में उसे कुछ पता नहीं है. इतना ही नहीं नरेश का अच्छा दोस्त होने के बावजूद सुहैल ने उसे ढूंढने में भी रुचि नहीं दिखाई.

यह जानकारी मिलने के बाद एडीशनल एसपी समीर यादव ने सीहोर कोतवाली की टीआई संध्या मिश्रा को सुहैल की कुंडली खंगालने के निर्देश दिए. टीआई संध्या मिश्रा ने जब सुहैल के बारे में जांच की तो पता चला कि सुहैल कई बार नशीले पदार्थ बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है.

इस के बाद अगले ही दिन पुलिस ने सुहैल के घर दबिश डाली,लेकिन सुहैल घर पर नहीं मिला. घर में केवल उस की बीवी इशरत और बेटा अमन मिले. सुहैल के बारे में पत्नी इशरत ने बताया कि उन की तबीयत खराब हो गई थी और वह भोपाल के एलबीएस अस्पताल में भरती हैं.

‘‘उन की तबीयत को क्या हुआ?’’पूछने पर परिवार वालों ने बताया,‘‘कभीकभी अधिक नशा करने पर उन की ऐसी ही हालत हो जाती है. इस बार हालत ज्यादा खराब हो गई,जिस से वह कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे.’’

यह बात एडीशनल एसपी समीर यादव के दिमाग में बैठ गई. क्योंकि सुहैल की तबीयत उसी रोज खराब हुई, जिस रोज नरेश गायब हुआ था. दूसरे अब तक तो वह तबीयत खराब होने पर बातचीत करता था,लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि वह बोल भी नहीं पा रहा था.

यादव समझ गए कि वह न बोल पाने का नाटक पुलिस पूछताछ से बचने के लिए कर रहा है, इसलिए उन्होंने आष्टा थाने के टीआई को जरूरी निर्देश दे कर सुहैल से पूछताछ के लिए भोपाल के एलबीएस अस्पताल भेज दिया.

सुहैल से पूछताछ के लिए टीआई कुलदीप खत्री एलबीएस अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने वार्ड में भरती सुहैल से पूछताछ की तो उस ने पुलिस की किसी बात का जवाब नहीं दिया. तब टीआई अस्पताल से लौट आए, लेकिन उन्होंने उस पर नजर रखने के लिए सादे कपड़ों में एकस कांस्टेबल को वहां छोड़ दिया.

पुलिस के जाने के कुछ देर बाद सुहैल जेब से मोबाइल निकाल कर किसी से बात करने लगा. यह देख कर कांस्टेबल चौंका और समझ गया कि सुहैल वास्तव में न बोलने का ढोंग कर रहा है. यह बात उस ने टीआई कुलदीप खत्री को बता दी.

अब टीआई समझ गए कि जरूर नरेश के लापता होने का राज सुहैल के पेट में छिपा है. लेकिन सुहैल इलाज के लिए अस्पताल में भरती था. डाक्टर की सहमति के बिना उस से अस्पताल में पूछताछ नहीं हो सकती थी. तब पुलिस ने सुहैल के बेटे और पत्नी को पूछताछ के लिए उठा लिया.

सांप की पूंछ पर पैर रखो तो वह पलट कर काटता है,लेकिन पैर अगर उस के फन पर रखा जाए तो वह बचने के लिए छटपटाता है. यही इस मामले में हुआ.

जैसे ही सुहैल को पता चला कि पुलिस उस के बीवीबच्चों को थाने ले गई है तो वह खुदबखुद स्वस्थ हो गया. इतना ही नहीं, अगले दिन ही वह अस्पताल से छुट्टी करवा कर पहले घर पहुंचा और वहां से सीधे आष्टा थाने जाने के लिए रवाना हुआ. सुहैल भी कम शातिर नहीं था. वह किसी तरह पुलिस पर दबाव बनाना चाहता था. इसलिए आष्टा बस स्टैंड से थाने की तरफ जाने से पहले उस ने सल्फास की कुछ गोलियां मुंह में डाल लीं.

सल्फास जितना तेज जहर होता है, उतनी ही तेज उस की दुर्गंध भी होती है. सुहैल का इरादा कुछ देर मुंह में सल्फास की गोली रखने के बाद बाहर थूक देने का था, ताकि जहर अंदर न जाए और उस की दुर्गंध मुंह से आती रहे, जिस से डर कर पुलिस उस से ज्यादा पूछताछ किए बिना ही छोड़ दे. हुआ इस का उलटा. मुंह में रखी एक गोली हलक में अटकने के बाद सीधे पेट में चली गई. इस से वह घबरा गया. उस ने तुरंत थाने पहुंचने की सोची, लेकिन थाने से बाहर कुछ दूरी पर गिर कर तड़पने लगा.

पुलिस को इस बात की खबर लगी तो उसे पहले आष्टा, फिर सीहोर अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उपचार के दौरान सुहैल की मौत हो गई. सुहैल की मौत हो जाने से पुलिस को सुहैल की बीवी और बेटे को छोड़ना पड़ा. अब तक पुलिस पूरी कहानी समझ चुकी थी. नरेश के साथ जो कुछ भी हुआ है, उस में सुहैल और उस के परिवार का ही हाथ है.

हकीकत यह जानते हुए भी एडीशनल एसपी समीर यादव को कुछ दिनों के लिए जांच का काम रोक देना पड़ा. कुछ दिन बाद फिर जांच आगे बढ़ी तो सुहैल की बीवी और बेटे से पूछताछ की गई. लेकिन वे कुछ भी जानने से इनकार करते रहे.

इस बीच पुलिस ने नरेश के फोन की काल डिटेल निकलवा ली थी, जिस में पता चला कि नरेश की दिन में कई-कई बार सुहैल से बात होती थी. इतना ही नहीं, सुहैल की पत्नी के अलावा सुहैल की जवान बेटी रुकैया से भी नरेश की अकसर बात होने के सबूत मिले.

घटना वाले दिन भी नरेश और सुहैल के बीच कई बार बात हुई थी. जिस समय नरेश का मोबाइल बंद हुआ था, तब वह उसी टावर के क्षेत्र में था, जिस में सुहैल का घर है. अब तक पुलिस के सामने यह साफ हो चुका था कि जिस रोज नरेश गायब हुआ था,वह सुहैल के घर आया था यानी उस के साथ अच्छाबुरा जो भी हुआ इसी इलाके में हुआ था.

इस इलाके में सुहैल का मकान ही एक ऐसा ठिकाना था, जहां नरेश का लगभग रोज आनाजाना था. लेकिन पुलिस पूछताछ से पहले ही उस की मौत हो चुकी थी, इसलिए यह मामला पुलिस के सामने बड़ी चुनौती बन कर खड़ा हो गया था. पुलिस अभी और सबूत हासिल करना चाहती थी ताकि सुहैल की बीवी से पूछताछ की जा सके.

एएसआई आर.एस. शर्मा ने सुहैल के घर के आसपास के रास्तों पर लगे सीसीटीवी की फुटेज चैक की. जल्द ही इस के अच्छे परिणाम सामने आए. पता चला कि 12 नवंबर की सुबह कोई 4 बजे सुहैल 4 बार अपनी एक्टिवा से निकला और एक निश्चित दिशा में जा कर वापस आता हुआ दिखा. जाते समय हर बार उस की एक्टिवा पर प्लास्टिक का एक बोरा रखा था, जो सफेद रंग का था.

इतनी रात में किसी काम से आदमी का एक ही दिशा में 4-4 बार जाना संदेह पैदा कर रहा था. पता नहीं उन बोरों में वह क्या ले कर गया था.

इस बारे में पुलिस ने सुहैल की पत्नी इशरत और बेटे अमन से पूछताछ की. इस पर उन का कहना था कि नशा कर के वह आधी रात में कहां आतेजाते थे,इस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता. पूछने पर वह झगड़ा करने लगते थे, इसलिए उन से कोई बात नहीं करता था.

मुख्य संदिग्ध सुहैल की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए ये दोनों मांबेटे सारी बात उस के ऊपर टाल कर बच निकलना चाहते थे. लेकिन पुलिस उन की मंशा जान चुकी थी. उन के साथ वह सख्ती भी नहीं करना चाहती थी. लिहाजा पुलिस टीम ने उन रास्तों की जांच की जो सुहैल के घर से निकल कर आगे जाते थे. उन रास्तों से पुलिस कर्बला तक पहुंच गई. वहीं पर पुलिस को सीवन नदी में सफेद रंग के बोरे तैरते दिखे.

प्लास्टिक के उन बोरों के ऊपर मक्खियां भिनभिना रही थीं. अब शक करने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. क्योंकि सुहैल भी हर बार अपनी एक्टिवा पर घर से सफेद रंग की प्लास्टिक के बोरे ले कर निकला था. पुलिस ने उन बोरों को बाहर निकाल कर खोला तो उन में से एक युवक का 8 टुकड़ों में कटा सड़ागला शव मिला. पुलिस को 3 बोरे मिल चुके थे. चौथा बोरा वहां नहीं था. यानी मृतक के पैर अभी नहीं मिले थे. पुलिस चौथे बोरे को भी तलाशती रही.

दूसरे दिन सुबह कुछ दूरी पर चौथी बोरी भी मिल गई, जिस में शव के पैर व खून सने कपड़े और जूते थे. इन अंगों को जब नरेश के भाई को दिखाया तो उस ने शव की पहचान नरेश के रूप में कर दी. मामला अब सीहोर कोतवाली के हाथ आ चुका था, इसलिए एडीशनल एसपी समीर यादव के निर्देश पर टीआई संध्या मिश्रा की टीम ने सुहैल के घर की तलाश ली तो टीम को एक कमरे की दीवारों पर लगे खून के दाग मिल गए, जिन के नमूने जांच के लिए सुरक्षित रख लिए गए.

घर की दीवारों पर खून के धब्बे मिलने के अलावा नरेश वर्मा की लाश भी बरामद हो चुकी थी, इसलिए अब सुहैल की पत्नी और बेटे के सामने बचने का कोई रास्ता नहीं था. पुलिस ने इशरत और उस के बेटे से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि 11 नवंबर को किसी बात पर नरेश से विवाद हो जाने पर सुहैल ने नरेश की हत्या कर दी थी.

मांबेटे द्वारा अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उन के घर से हत्या में प्रयुक्त चाकू और बांका के अलावा खून सने कपड़े भी बरामद कर लिए. दोनों से पूछताछ के बाद नरेश वर्मा की हत्या की कहानी कुछ इस प्रकार सामने आई—

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के कोठारी गांव के रहने वाले नरेश को बचपन से ही खेलों में रुचि थी. उम्र बढ़ने के साथ उस की खेलों में रुचि और भी बढ़ती गई. नतीजतन उस ने कराटे में ब्लैक बेल्ट हासिल कर ली.

इस के अलावा वह पौवर लिफ्टिंग जैसे खेल में भी बढ़चढ़ कर भाग लेने लगा. पौवर लिफ्टिंग की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग ले कर मैडल भी हासिल किए. खेलों से उसे बेहद लगाव था, इसलिए वह इसी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहता था. जब उसे मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उस ने सीहोर में अपना खुद का जिम खोलने की कवायद शुरू कर दी. वैसे भी उस के पिता कोठारी गांव के संपन्न किसान थे, उस के पास पैसों की कमी नहीं थी.

सीहोर में ही दूल्हा बादशाह रोड पर सुहैल अपने परिवार के साथ रहता था. सुहैल कोकीन और ब्राउन शुगर बेचता था. वह कई सालों से नए युवकों को अपने जाल में फांस कर नशे का लती बना देता था. कोकीन और ब्राउन शुगर की तस्करी के आरोप में वह कई बार गिरफ्तार हो चुका था. लेकिन जमानत पर बाहर आने के बाद फिर अपने इसी धंधे से जुड़ जाता था. केवल सुहैल ही नहीं,इस काम में उस का पूरा परिवार संलिप्त था.

सुहैल पैसे वाले युवकों से दोस्ती कर उन्हें अपने घर बुलाता, जहां उस की पत्नी इशरत और खूबसूरत बेटी रुकैया पिता के इशारे पर उस युवक पर ऐसा जादू चलातीं कि वह बारबार उस के घर के चक्कर लगाने लगता था. जब सुहैल देखता कि शिकार उस के फैलाए जाल में फंस चुका है तो पहले वह उसे कोकीन या ब्राउन शुगर का फ्री में नशा करवाता था, फिर बाद में धीरेधीरे नशे की पुड़िया के बदले पैसे वसूलने लगता.

जब युवक को नशे की लत लग जाती तो उस की पत्नी और बेटी शिकार से दूरी बना लेती थीं. लेकिन तब तक उस युवक की चाह दूसरे सुख से अधिक नशे के सुख की बन जाती थी. इसलिए वह सुहैल का गुलाम बन कर रहने के लिए भी तैयार हो जाता था, जिस के बाद सुहैल उस से तो पैसा लूटता ही, साथ ही उस की मदद से दूसरे युवकों को भी अपने नशे का आदी बना देता था.

कोई डेढ़ दो साल पहले एक युवक के माध्यम से सुहैल को पता चला कि कोठारी के रईस किसान का जवान बेटा जिम खोलने के लिए सीहोर के चक्कर लगा रहा है. नरेश देखने में था भी हैंडसम,इसलिए मोटी मुर्गी देख कर सुहैल किसी तरह नरेश से जानपहचान करने के बाद एक रोज उसे अपने घर ले गया.

वास्तव में सुहैल शिकार को फांसने के लिए हर किस्म के हथियार का इस्तेमाल करता था. इसलिए नरेश को फांसने के लिए सुहैल की पत्नी और बेटी रुकैया खुल कर अपना जादू दिखाने लगीं.

नरेश भी रुकैया की खूबसूरती पर फिदा हो गया,जिस से वह अकसर सुहैल से मिलने के बहाने उस के घर आनेजाने लगा. आखिर रुकैया उसे फांसने में सफल हो ही गई. फिर सुहैल ने धीरेधीरे नरेश को मुफ्त में कोकीन और ब्राउन शुगर का नशा करवाना शुरू कर दिया. जब वह नशे का आदी हो गया तो सुहैल ने नशे की कीमत वसूलनी शुरू कर दी.

नरेश के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए वह रुकैया के चक्कर में पैसा लुटाने लगा. योजना के अनुसार नरेश के नशे की गिरफ्त में आ जाने के बाद रुकैया को पीछे हट जाना था, लेकिन नरेश के मामले में रुकैया खुद शिकार हो चुकी थी. इसलिए वह नरेश से नजदीकी बनाए रही, जिस के चलते सुहैल को नरेश से परेशानी होने लगी. लेकिन वह खूब पैसे लुटा रहा था, इसलिए सुहैल अपनी आंखें बंद किए रहा.

धीरेधीरे नरेश के हाथ की वह रकम खत्म होने लगी, जो उस ने जिम खोलने के लिए घर से ली थी. पैसा खत्म हो गया तो सुहैल उसे उधारी में नशे की पुड़िया देने लगा. इस में सुहैल को कोई परेशानी नहीं थी. उसे डर केवल इस बात का था कि रुकैया और नरेश को ले कर समाज में कोई बवाल खड़ा न हो जाए. इसलिए वह नहीं चाहता था कि अब नरेश उस के घर आए.

लेकिन नरेश के ऊपर प्यार और कोकीन का ऐसा नशा सवार था कि गांव से निकल कर सीधे सुहैल के घर पहुंच जाता. बाद में धीरेधीरे नरेश को अपनी गलती का अहसास होने लगा था. उस का स्वास्थ्य भी गिरने लगा था इसलिए उस ने सुहैल के घर जाना कुछ कम कर दिया. सुहैल को अब अपने पैसों की चिंता होने लगी, जो नरेश के ऊपर उधार थे.

11 नवंबर को नरेश ने जिम के उपकरण खरीदने के लिए घर से 4 लाख रुपए लिए,लेकिन पैसा जेब में आया तो उसे नशे की सुध आ गई.

वह सीधे सुहैल के घर जा पहुंचा,जहां सुहैल ने नशे की पुड़िया देने से पहले अपने उधार के 2 लाख रुपए मांगे. इस पर नरेश ने कहा कि पैसा तो उस के पास इस समय भी है, लेकिन वह इस से जिम का सामान खरीदने जा रहा है. बाद में जिम से पैसे कमा कर उस का सारा हिसाब चुकता कर देगा.

उस दौरान नरेश की नजरें घर में रुकैया की तलाश कर रही थीं. यह देख कर सुहैल का दिमाग खराब हो गया. उसे लगा कि अगर आज नरेश का फाइनल हिसाब कर दिया जाए तो उस का पैसा वसूल हो जाएगा. यह सोच कर उस ने कमरे में पड़ा चाकू उठा कर सीधे नरेश के सीने पर वार कर दिया.

नरेश काफी ताकतवर था. चाकू से घायल होने के बावजूद भी वह सुहैल से भिड़ गया. इधर कमरे में हल्ला सुन कर सुहैल की पत्नी इशरत और बेटा अमन अंदर पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर चौंक गए. चूंकि नरेश सुहैल पर भारी पड़ रहा था, इसलिए सुहैल ने पत्नी और बेटे से मदद करने को कहा.

इशरत और अमन नरेश पर पिल पड़े,जिस के चलते सुहैल ने जल्द ही उस पर चाकू से कई वार कर खेल खत्म कर दिया. अब जरूरत नरेश की लाश को ठिकाने लगाने की थी. इतनी भारी लाश एक बार में चोरीछिपे नहीं ले जाई जा सकती थी. इसलिए तीनों ने मिल कर बांके की मदद से रात में ही नरेश की लाश के 8 टुकड़े कर दिए.

इस के बाद एक प्लास्टिक के बोरे में धड़ और दूसरे में सिर तथा तीसरे में हाथ व चौथे बोरे में उस के पैर एवं कपड़े और जूते भर दिए. फिर रात में 4 बजे के करीब सुहैल अपनी स्कूटी पर एकएक बोरा ले जा कर कर्बला के पास सीवन नदी में फेंक आया.

इस दौरान रात में ही नरेश के घर वाले बेटे के बारे में सुहैल से पूछ चुके थे, इसलिए वह समझ गया कि अगर वह घर पर रहा तो फंस जाएगा.

योजनानुसार सुबह होते ही वह बीमारी के नाम पर भोपाल के एलबीएस अस्पताल में भरती हो गया. लेकिन एडीशनल एसपी समीर यादव के सामने उस की एक नहीं चली, जिस के चलते खुद सुहैल के हिस्से में मौत आई, जबकि आरोपी मांबेटे को मिलीं सलाखें.

इशरत और अमन से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा में रुकैया परिवर्तित नाम है…

डांसर हिना और हैवानियत के शिकार 2 मासूम

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह कक्षा 9 तक ही पढ़ सकी थी. सन 2012 में उस का निकाह बड़ौत निवासी आरिफ से हो गया था. आरिफ से हिना को 2 बच्चे महक व अर्श हुए. आरिफ दकियानूसी विचारों वाला था. जबकि हिना खुले विचारों की थी. फलस्वरूप दोनों में अकसर मनमुटाव होने लगा. इसी के चलते सन 2015 में उन का तलाक हो गया था. तलाक के बाद हिना अपने बच्चों के साथ हरिद्वार के कस्बा मंगलौर के मोहल्ला पठानपुरा में मुशर्रत के मकान में किराए पर रहने लगी थी.

पति से अलग होने के बाद हिना के सामने अपना और बच्चों का खर्च चलाने की समस्या खड़ी हो गई. इस के लिए वह शादीविवाह में डांस करने लगी. डांस के लिए उसे बच्चों को अकेला छोड़ कर जाना होता था, इसलिए उस ने अपनी छोटी बहन आरजू को अपने पास बुला लिया, ताकि वह बच्चों का ध्यान रख सके.
पहली जनवरी, 2019 को हिना मुजफ्फरनगर गई थी. घर पर उस के दोनों बच्चों के अलावा छोटी बहन आरजू थी. उसी रात हिना जब वहां से घर लौटी तो दोनों बच्चे घर पर नहीं थे. उस ने आरजू से बच्चों के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि शाम के समय अर्श और महक पास की दुकान से चौकलेट लेने गए थे, तब से वापस नहीं लौटे.

यह सुन कर हिना के होश उड़ गए. वह बोली, ‘‘वहां से कहां गए? तूने उन्हें ढूंढा नहीं?’’

‘‘मैं ने उन्हें बहुत ढूंढा, लेकिन उन का पता नहीं चला.’’ आरजू बोली.

तब तक रात के 10 बज चुके थे. इतनी रात को वह बच्चों को कहां ढूंढे, यह हिना की समझ में नहीं आ रहा था. जिस दुकान पर वे गए थे वह भी बंद हो चुकी थी. 4 साल के बेटे अर्श और 6 साल की बेटी महक की चिंता में हिना रात भर लिहाफ ओढ़े बैठी रही. बच्चों की चिंता में भूखप्यास तो दूर, उसे नींद तक नहीं आई. उस ने सारी रात जागते हुए गुजारी.

सुबह होते ही वह बच्चों की खोज में जुट गई. परचून की दुकान खुलने पर वह दुकान वाले के पास गई. दुकानदार ने बताया कि दोनों बच्चे उस की दुकान पर आए तो थे, लेकिन जब वह चौकलेट ले कर अपने घर लौट रहे थे तो उसी वक्त वहां 2 युवक आए थे. उन दोनों ने बच्चों को गोद में उठा लिया था. इस के बाद वे उन्हें एक सफेद रंग की कार में बैठा कर उन्हें ले गए. बच्चे उन के साथ इस तरह चले गए थे, मानो वे दोनों युवक उन के परिचित हों.

यह सुन कर हिना घबरा गई. उस ने सोचा कि ऐसा कौन परिचित हो सकता है, जो बच्चों को कार में बैठा कर ले गया. हिना को अपने तलाकशुदा पति आरिफ पर शक हुआ. फिर भी उस ने अपनी सभी रिश्तेदारियों में बच्चों को ढूंढा. पूरे दिन बच्चों को यहांवहां तलाशने के बाद भी जब उन का कहीं पता न चला तो हिना 2 जनवरी को ही शाम के समय हरिद्वार की कोतवाली मंगलौर पहुंच गई.

वहां मौजूद इंसपेक्टर गिरीश चंद्र शर्मा को उस ने बच्चों के गायब होने की बात बता दी.

‘‘कल शाम बच्चों का अपरहण हुआ था, वारदात को 24 घंटे होने वाले हैं. तुम ने और तुम्हारी बहन ने घटना की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने नाराजगी भी जाहिर की.

‘‘सर, हम पहले तो बच्चों को आसपास ढूंढते रहे, इस के बाद सुबह से हम बच्चों को अपने रिश्तेदारों के घर जा कर ढूंढते रहे. जब वे वहां भी नहीं मिले तब हम यहां आए हैं.’’ हिना बोली.

‘‘ठीक है, तुम बच्चों के फोटो दे दो ताकि उन्हें तलाश करने में आसानी हो.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा तो हिना ने अपने पर्स से दोनों बच्चों के फोटो निकाल कर दे दिए.

हिना की तहरीर पर इंसपेक्टर गिरीश चंद्र शर्मा ने 4 वर्षीय अर्श उर्फ चांद और 6 वर्षीय महक के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस की जानकारी उन्होंने सीओ (मंगलौर) मनोज कत्याल, एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा व एसएसपी जन्मेजय खंडूरी को भी दे दी.

एक ही परिवार के 2 बच्चों के अपहरण की सूचना पा कर सीओ मनोज कत्याल और एसपी देहात मणिकांत मिश्रा कुछ देर में ही मंगलौर कोतवाली पहुंच गए. एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने इंसपेक्टर शर्मा को बच्चों के अपहरण के मामले में तेजी से काररवाई करने के निर्देश दिए.

इस के बाद कोतवाल शर्मा ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू कर दीं. उस वक्त शाम के 6 बज चुके थे. उसी समय हिना 2 युवकों के साथ कोतवाली पहुंची. हिना ने अपने साथ आए एक युवक का परिचय कराते हुए बताया कि इन का नाम ताबीज है. यह पास के ही गांव बुक्कनपुर में रहते हैं और मेरे पारिवारिक मित्र हैं.

दूसरे युवक का नाम हिना ने आजम बताया. वह भी गांव बुक्कनपुर में रहता था. हिना ने बताया कि वे दोनों अकसर उस के घर पर आते रहते हैं. यदाकदा उस की मदद भी करते हैं. इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा हिना, ताबीज व आजम को ले कर एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा व सीओ मनोज कत्याल के पास पहुंचे.

उन के हावभाव से एसपी (देहात) को उन पर शक हुआ तो उन्होंने दोनों युवकों से बच्चों के अपहरण की बाबत पूछताछ की. दोनों ने बताया कि जब बच्चे गायब हुए थे तो वे अपने घरों पर थे. उन्हें बच्चों के गायब होने की जानकारी हिना से मिली थी.

काफी पूछताछ के बाद भी उन से बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर मणिकांत मिश्रा ने तत्काल उस दुकानदार को थाने बुलवाया, जिस के सामने 2 युवकों द्वारा दोनों बच्चों को गोद में उठा कर कार में ले जाया गया था.

जब दुकानदार वहां आया तो उस ने थाने में आए ताबीज व आजम को देख कर कहा कि ये दोनों ही अर्श व महक को अपने साथ ले गए थे. दुकानदार के यह बताते ही ताबीज व आजम की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. ताबीज ने पुलिस को बताया कि वे दोनों बच्चों को अपने साथ ले तो गए थे, लेकिन बच्चों को चौकलेट दिलवा कर उन्हें उन के घर के पास छोड़ दिया था.

हिना ने भी दोनों अधिकारियों को बताया कि वे दोनों उस के परिवार के हितैषी हैं. ये उस के बच्चों का अपहरण नहीं कर सकते. इस के बाद जब एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने हिना की बहन आरजू से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि बच्चे चौकलेट ले कर एक बार घर आए थे. उस के बाद ही वे लापता हुए थे.

इस से पुलिस को आरजू की बातों पर भी शक होने लगा, क्योंकि उस ने पहले बताया था कि बच्चे दुकान से चौकलेट ले कर घर लौटे ही नहीं थे. इस तरह ताबीज और आजम के साथ आरजू भी संदेह के दायरे में आ गई. अधिकारियों ने उस समय उन से और पूछताछ नहीं की, बल्कि उन सभी को घर भेज दिया. इस मामले की जांच एसआई चंद्रमोहन सिंह को सौंप दी गई.

एसआई चंद्रमोहन सिंह ने एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा को बताया कि जहां से हिना के बच्चों का अपहरण होना बताया जा रहा है, वह स्थान सीसीटीवी कैमरे की रेंज में नहीं है. चूंकि ताबीज व आजम शक के घेरे में थे, इसलिए उन्होंने एसआई चंद्रमोहन सिंह को निर्देश दिए कि उन दोनों से अलगअलग वीडियो रिकौर्डिंग के साथ पूछताछ करें.

3 जनवरी, 2019 को पुलिस ताबीज व आजम को थाने ले आई. दोनों ने पुलिस को बताया कि वे पहली जनवरी को अपनी कार से हिना के घर आए थे. हिना उस वक्त घर पर नहीं थी. घर पर हिना की बहन आरजू थी. अर्श व महक को चौकलेट दिलाने के बाद वे वापस अपने घर चले गए थे.

जिस तरह से दोनों युवकों ने बताया उस से पुलिस को ऐसा लगा वे दोनों रटीरटाई बात बोल रहे हों. इसलिए कोतवाल शर्मा ने एसआई चंद्रमोहन को निर्देश दिए कि वह ताबीज को अलग कमरे में ले जा कर पूछताछ करें. खुद कोतवाल आजम से पूछताछ करने लगे.

दूसरे कमरे में जाते ही ताबीज ने स्वीकार कर लिया कि उस ने आजम के साथ हिना के दोनों बच्चों का अपहरण कर उन्हें गंगनहर में फेंक दिया था. आजम ने भी यह अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों से पूछताछ के बाद बच्चों के अपरहण की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

मंगलौर में रहते हुए घर का खर्च चलाने के लिए हिना शादियों में डांस करने लगी थी. एक दिन हिना पिरान कलियर में एक निकाह में डांस कर रही थी. इस निकाह में गांव बुक्कनपुर निवासी ताबीज भी शामिल था. हिना को डांस करते देख ताबीज उस की अदाओं पर फिदा हो गया.

डांस समाप्त होने के बाद ताबीज ने हिना के डांस की तारीफ की. इस के बाद उस ने हिना से उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया. इस के बाद वह जबतब हिना से बात करने लगा. कुछ दिनों बाद ताबीज ने हिना के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. वह जब भी जाता, हिना व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता था.

हिना से दोस्ती के बाद ताबीज ने उस के साथ निकाह करने के सपने भी देखने शुरू कर दिए. ताबीज के परिजन भी उस से हिना का निकाह कराने को तैयार थे लेकिन वह हिना के पहले शौहर के बच्चों को नहीं अपनाना चाहते थे.

ताबीज अच्छी तरह जानता था कि अगर उसे हिना से निकाह करना है तो हिना के बच्चों को रास्ते से हटाना होगा. इस बारे में उस ने हिना की छोटी बहन आरजू से बात की. आरजू भी दूसरी बार बहन का घर बसाने के लालच में ताबीज की इस दरिंदगी में शामिल हो गई.

घटना वाले दिन ताबीज अपनी वैगनआर कार से अपने दोस्त आजम के साथ हिना के घर के बाहर पहुंचा. वहां पर आरजू ने अर्श व महक को चौकलेट लेने के बहाने बाहर भेज दिया. बच्चे चूंकि ताबीज को पहचानते थे, इसलिए वे खुश हो कर उस के साथ कार में बैठ गए. उन मासूमों को क्या पता था कि वे दोनों उन्हें कार में बैठा कर घुमाने नहीं बल्कि मौत के घाट उतारने ले जा रहे हैं.

थोड़ी देर बाद आजम ने अर्श व महक को नशीली गोलियां मिली हुई चौकलेट खाने के लिए दीं. उस वक्त उन की कार मुजफ्फरनगर की ओर जा रही थी. कुछ ही देर में दोनों बच्चे नशे में बेसुध हो गए. जैसे ही कार गांव कुम्हेड़ा के पास गंगनहर पुल पर पहुंची तो ताबीज ने कार से दोनों बेसुध बच्चों को गंगनहर में फेंक दिया.

पुलिस ने आरजू को भी गिरफ्तार कर लिया और बच्चों के शवों की तलाश के लिए गोताखोरों की मदद ली. कई दिनों तक की खोजबीन के बाद भी दोनों बच्चों में से किसी का शव गोताखोरों को नहीं मिला. पुलिस ने ताबीज की निशानदेही पर उस के घर से अपहरण में इस्तेमाल की गई वैगनआर कार भी बरामद कर ली.

10 जनवरी, 2019 को मुजफ्फरनगर के थाना जानसठ के अंतर्गत पड़ने वाली गंगनहर की चित्तौड़ झाल पर तैनात कर्मचारी ने एक बच्ची का शव झाल में फंसा हुआ देखा, जिस की उम्र 5-6 साल थी.
उसे अखबारों की खबरों से यह पहले ही पता था कि हरिद्वार के मंगलौर थाने से 2 बच्चों का अपहरण कर उन्हें गंगनहर में फेंक दिया गया था, जिन की लाशें गोताखोर भी नहीं ढूंढ पाए थे. इसलिए उस ने फोन कर के बच्ची की लाश मिलने की सूचना फोन द्वारा मंगलौर कोतवाली को दे दी.

यह खबर मिलते ही एसआई चंद्रमोहन चित्तौड़ झाल पर पहुंचे. शव को उन्होंने पहचान लिया. वह शव महक का ही था. जरूरी काररवाई कर के उन्होंने उसे पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल मुजफ्फरनगर भेज दिया. बाद में पुलिस को महक की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, उस में उस की मौत का कारण पानी में डूबना बताया गया.

पुलिस ने ताबीज, आजम और आरजू से पूछताछ के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

परफैक्ट क्राइम : पीबी65-3372 नंबर कार का अंतिम संस्कार

इस केस की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं थी. यह अलग बात है कि ऐसे विषयों पर अब तक कई फिल्में और धारावाहिक बन चुके हैं, जो काफी लोकप्रिय भी रहे. इस केस की स्क्रिप्ट चालाक अपराधियों ने इतनी सफाई से लिखी थी कि किसी को उन पर तनिक भी शक न हो. कहानी में दुर्घटना से ले कर मौत और मौत के बाद अंतिम संस्कार से ले कर भोग तक के हर दृश्य को बड़ी होशियारी और सफाई से लिखा गया था.

हिमाचल प्रदेश स्थित सिरमौर के काला अंब-पांवटा साहब हाइवे पर एक गांव है जुड्दा का जोहड़. वहां से 5 किलोमीटर दूर नवोदय स्कूल है. घटना 19-20 नवंबर, 2018 की रात की है. नवोदय स्कूल के पास एक कार, जिस का नंबर था पीबी65-3372, संतुलन खो कर पहले साइनबोर्ड से टकराई, फिर एक चट्टान से टकराने के बाद धूधू कर जलने लगी.

हादसे के वक्त कार की ड्राइविंग सीट पर एक व्यक्ति बैठा था. किसी ने फोन कर के इस की सूचना सिरमौर नाहन पुलिस को दी. फोन करने वाले ने एंबुलैंस को भी इस घटना की जानकारी दे कर तुरंत घटनास्थल पर पहुंचने का अनुरोध किया था.

जिस समय एंबुलैंस घटनास्थल पर पहुंची, तभी उन के फोन के वाट्सऐप पर किसी ने घटना से संबंधित एक वीडियो क्लिप भेजा, जिस में कार धूधू कर जलती नजर आ रही थी. सिरमौर पुलिस को भी ऐसा ही वीडियो भेजा गया था. इस के बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था.

बहरहाल, सूचना मिलते ही एसएचओ नाहन इंसपेक्टर विजय कुमार, एडीशनल एसएचओ योगिंदर सिंह और हवलदार जीरक व अमरिंदर के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. कार में सवार व्यक्ति पूरी तरह जल चुका था. आग इतनी भयानक लगी थी कि ड्राइवर को बाहर निकलने का मौका नहीं मिल पाया था. हालत देख कर ऐसा लग रहा था जैसे आग लगते ही कार का औटोमैटिक लौक लग गया हो.

कार में सवार व्यक्ति ऐसी स्थिति में नहीं था कि उसे उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया जाता. संभवत: जिंदा जलने से उस की मौत हो गई थी. कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए मृत व्यक्ति के कंकाल का पंचनामा बना कर पोस्टमार्टम के लिए नाहन मैडिकल कालेज अस्पताल भेजा गया.

घटना की जानकारी मिलते ही एसपी रोहित मालपानी, एडीशनल एसपी वीरेंदर ठाकुर, डीएसपी नाहन बबीता राणा सहित क्राइम टीम भी घटनास्थल पर पहुंच गई. कार को फोरैंसिक और मकैनिकल जांच के लिए पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया.

कार लगभग पूरी तरह से जल कर राख हो चुकी थी. तलाशी लेने पर कार के डैशबोर्ड की दराज से कार की जो आरसी मिली वो खरड़ निवासी नरिंदर कुमार पुत्र प्रताप सिंह के नाम थी. पुलिस ने कार दुर्घटना का मामला धारा 304, 279 के तहत दर्ज कर इस की सूचना पंजाब पुलिस को दे दी.

पंजाब पुलिस ने खरड़ जा कर जांच की, तो पता चला कार नरिंदर की ही थी, जो उस ने कुछ समय पहले डेराबस्सी निवासी आकाश को बेच दी थी. उस ने कार के पेपर अभी ट्रांसफर नहीं करवाए थे. आकाश डेराबस्सी का नामी बिल्डर था. दुर्घटना की सूचना जब उस के घर वालों को दी गई, तो उन्होंने मृतक की शिनाख्त आकाश के रूप में कर दी.

रहस्य बनी रही बर्निंग कार

पोस्टमार्टम के बाद मृतक की कंकालनुमा लाश उस के परिजनों के हवाले कर दी गई, जिस का उन्होंने अंतिम संस्कार भी कर दिया. पुलिस ने इसे दुर्घटना मान कर फाइल बंद कर दी. देखने को तो दुर्घटना के इस मामले का पटाक्षेप यहीं हो गया था, पर पिक्चर अभी बाकी थी.

इस कहानी का एक पहलू यह भी था कि दुर्घटना के 2 दिन बाद 22 नवंबर को ढोलपुर राजस्थान निवासी बबलू नामक एक युवक और उसकी मां ने थाना डेराबस्सी में अपने भाई राजू के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. बबलू के अनुसार उस का भाई आकाश नामक बिल्डर के पास काम करता था और हर समय उस के साथ ही रहता था.

बबलू ने अपने बयान में यह भी बताया कि आकाश के घर वालों के अनुसार आकाश की मृत्यु हो चुकी है. राजू को आखिरी बार आकाश के साथ ही देखा गया था. डेराबसी पुलिस ने राजू की गुमशुदगी दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी. इसी सिलसिले में डेराबस्सी पुलिस ने सिरमौर पुलिस से भी संपर्क किया.

सिरमौर पुलिस ने पंजाब पुलिस को बताया कि कार एक्सीडेंट के समय कार में केवल एक ही व्यक्ति था.
इस जानकारी के बाद पुलिस को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि कार में जब अकेला आकाश था तो फिर हर वक्त उस के साथ रहने वाला राजू कहां गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि कार में आकाश नहीं बल्कि राजू रहा हो. लेकिन राजू के भाई बबलू के अनुसार, राजू को कार चलाना नहीं आता था.

इस जानकारी के बाद सिरमौर और पंजाब पुलिस को यह मामला संदिग्ध लगने लगा. सिरमौर पुलिस ने मामले की तह तक जाने के लिए गुपचुप तरीके से जांच शुरू कर दी. मामले के संदिग्ध होने की एक वजह यह भी थी कि जलती कार का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर भेजा गया था. उस वीडियो को भेजने वाला व्यक्ति कौन था?

साधारण मामला नहीं था

पुलिस अधिकारियों ने जब उस वीडियो को ध्यान से देखा तो पता चला कि एक कार चट्टान से टकराती है और फिर उस में आग लग जाती है. इस के बावजूद कार में सवार व्यक्ति बिना हिलेडुले चुपचाप बैठा रहता है. आग लगने पर ना तो वह तड़पता है और न ही कार से बाहर निकलने की कोशिश करता है. भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी अपना बचाव किए बिना खामोशी से जल कर मौत को गले लगा ले. यह बात पुलिस के गले से नहीं उतरी.

इस बीच मृतक आकाश के घर वालों ने थाने आ कर आकाश के मृत्यु प्रमाण पत्र की मांग करनी शुरू कर दी. मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त करने के मामले में उन्होंने इतनी जल्दी मचाई कि पुलिस को सोचना पड़ा. आखिर ऐसा क्या कारण है कि आकाश के घर वाले इतनी जल्दी कर रहे हैं. इस मामले में किसी षडयंत्र की बू आती दिखाई दे रही थी.

सिरमौर पुलिस ने इस केस में डेराबस्सी पुलिस से सहयोग मांगा और केस को महज दुर्घटना का साधारण मामला न समझ इस की तह तक जाने का निश्चय किया. एडीशनल एसपी वीरेंदर ठाकुर की देखरेख में एसएचओ इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस केस की पुन: तफ्तीश शुरू करते हुए शहर में लगे उन तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई जो दुर्घटना वाली रात काम कर रहे थे. उस रात की फुटेज देखी गईं, तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं.

दुर्घटना वाली रात सैंट्रो एचआर03-3504 और मारुति पीबी65-डब्ल्यू 3372 नंबर की 2 कारें शहर में आगेपीछे चलती नजर आईं. ये कारें शहर में 2 बार देखी गईं. इन दोनों कारों ने पहले शहर का एक चक्कर काटा और फिर दूसरा चक्कर काटते हुए मौकाएवारदात की ओर निकल गईं. दोनों कारों में एकदो मिनट का अंतर था.

शक यकीन में तब बदला जब मारुति कार के पीछे सैंट्रो कार भी घटनास्थल पर गई. अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रही थी. जलते वक्त आदमी छटपपटाता है, जान बचाने की लाख कोशिश करता है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था. आकाश के घर वालों द्वारा मृत्यु प्रमाण पत्र मांगने की जल्दी करना, स्वयं घटनास्थल का वीडियो बना कर वायरल करना, एक सोचीसमझी साजिश का हिस्सा लग रहा था.
इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस मामले के तमाम पुख्ता सबूत इकट्ठा कर के 3 दिसंबर को डेराबस्सी से आकाश के भतीजे रवि को हिरासत में ले लिया. रवि की गिरफ्तारी के बाद इस मामले की परतें खुदबखुद खुलती चली गईं.

इस षडयंत्र का मुख्य आरोपी विदेश भागने की फिराक में था, इसलिए उस की गिरफ्तारी से पहले रवि की गिरफ्तारी को भी परदे में रखा गया. पूछताछ के दौरान रवि ने पुलिस को बताया कि कार में जलने वाला आकाश नहीं था. आकाश नेपाल के रास्ते विदेश जाने वाला था.

50 लाख का बीमा लेने के लिए रचा षडयंत्र 

खास मुखबिरों से इंसपेक्टर विजय को खबर मिली कि आकाश रेल मार्ग से नेपाल जाने वाला है. इस मामले में नाहन पुलिस ने रेलवे पुलिस की मदद से अपना जाल बिछा दिया और आकाश को ट्रेन में सफर करते हुए हरियाणा के पलवल से गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने आकाश और रवि को अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. पूछताछ के दौरान इस बर्निंग कार मामले की पूरी कहानी सामने आ गई. आकाश अपने भतीजे के साथ मिल कर खुद को मरा हुआ साबित करना चाहता था ताकि 50 लाख की बीमा राशि उस के घर वालों को मिल जाए.

योजना को कार दुर्घटना का जामा पहना कर आकाश ने अपने नौकर राजू को जिंदा जला दिया था. जबकि उस की मां और भाई राजू की तलाश में दरदर की ठोकरें खाते भटक रहे थे.

पैसों के लालच में मानवीय संवेदनाएं भुला कर पेशे से ठेकेदार आकाश इतने वहशीपन पर उतर आया था कि उस ने अपने ही मजदूर राजू को जिंदा जला कर ऐसी दर्दनाक मौत दी, जिसे देखना तो दूर सुनने वाले की भी रूह कांप जाए.

बड़ेबड़े ठेकेदारों के साथ ठेकेदारी करने वाले आकाश ने अपनी मौत की ही नहीं, बल्कि अपने क्रियाकर्म तक की स्क्रिप्ट खुद लिखी थी. इस स्क्रिप्ट के अनुसार उस के घर वालों ने बाकायदा उस के अंतिम संस्कार से ले कर उस की तेरहवीं पर क्रियाकर्म का खाना खिलाने तक बखूबी भूमिका निभाई थी. पुलिस अब इस बात की भी जांच करेगी कि इस मामले में उस के घर वालों का भी हाथ था या नहीं?

बीमा राशि डकारने के लिए आकाश ने पहले अपने नौकर राजू को जम कर शराब पिलाई थी. इस के बाद जब वह नशे में बेसुध हो गया तो रवि और आकाश ने मिल कर आकाश के कपड़े राजू को पहना दिए. साथ ही अपनी अंगूठी और ब्रैसलेट भी राजू के हाथ में पहना दिया, ताकि पुलिस उसे आकाश समझे.

इस के बाद आकाश कार में काला अंब-पांवटा सड़क पर जुड्दा का जोहड़ के पास पहुंचा और तारपीन का तेल छिड़क कर कार को आग लगा दी. शातिरों ने हत्या की वारदात को दुर्घटना का रूप देने के लिए बाकायदा जलती कार का वीडियो बना कर खुद ही वायरल कर दिया था.

बेचारा गरीब मजदूर मारा गया

राजस्थान का राजू आकाश के पास बतौर मजदूर काम करता था. लेकिन मेहनतमजदूरी कर अपना और अपने परिवार का भरणपोषण करने आए राजू को शायद इस बात का तनिक भी इल्म नहीं था कि जिस के पास वह काम करता है वही उसे ऐसी दर्दनाक मौत देगा.

उधर रोरो कर बुरा हाल करती राजू की मां का कहना था कि उस ने जिगर के टुकड़े को पालपोस कर बड़ा किया. पढ़ायालिखाया. वह पैसा कमाने के लिए पंजाब चला आया था. लेकिन बुढ़ापे में सहारा बनने वाला बेटा मिलना तो दूर मां को उस के अंतिम दर्शन भी नहीं हो सके. अपने दिल के टुकड़े के खोने से वह भीतर तक टूट चुकी थी.

सिरमौर पुलिस की सूचना के बाद मृतक राजू की मां और भाई बबलू नाहन पुलिस के बुलावे पर नाहन गए. पुलिस ने दोनों से राजू के बारे में जानकारी ली और जली हुई कार से बरामद मृतक राजू के शरीर के कुछ अंशों का डीएनए करवाने के लिए उस की मां और भाई के ब्लड सैंपल लिए. डीएनए मैच होने के बाद वैज्ञानिक तौर पर यह पुष्टि हो पाएगी कि मृतक राजू ही था.

इस मामले में हैरान करने वाली बात यह भी थी कि बर्निंग कार हत्याकांड की स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी. पर सवाल यह था कि वारदात को अंजाम देने के लिए सिरमौर ही क्यों चुना गया था.

दरअसल स्क्रिप्ट के लेखकों को ऐसा स्थान चाहिए था, जहां कार को न्यूट्रल करने के बाद आग लगाई जा सके. यह सुनसान स्थान नाहन से 5 किलोमीटर की दूरी पर था.

इस बर्निंग कार हत्याकांड के मामले से लगभग एक दशक पूर्व हुए सूटकेस कांड की भी यादें जुड़ी हुई है. 10 वर्ष पहले इसी इलाके में सूटकेस कांड हुआ था. पुलिस को यहीं पर एक महिला और एक बच्ची की लाशें 2 अलगअलग सूटकेसों में बंद मिली थीं. यह मामला अभी तक अनसुलझा है.

इस मामले में पुलिस काररवाई पूरी करने के बाद 12 दिसंबर को दोनों दोषियों को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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