Hindi Story: चाय की दुकान, जो आम आदमी के लिए थकान मिटाने, गपशप करने और जिंदगी की हलचल से कुछ पल सुकून पाने की जगह होती है, जब उसी दुकान की आड़ में जहर का कारोबार चलने लगे, तो यह केवल एक अपराध नहीं रह जाता. पिछले 5 साल में चाय की दुकान की आड़ ले कर नशे का ऐसा नैटवर्क खड़ा किया गया कि 20 करोड़ रुपए की जायदाद खड़ी हो गई.
बिहार के मनेर क्षेत्र में रहने वाला एक शख्स, जो बाहर से एक साधारण दुकानदार दिखता था, असल में नशा तस्करी के जाल का अहम किरदार निकला. पुलिस की कार्रवाई में उस के साथ उस की बहन समेत 6 सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई. जांच में जो बातें सामने आईं, वे चौंकाने वाली थीं. घर से 35 लाख रुपए की चरस, 25 लाख रुपए की स्मैक, 12 लाख, 20,000 रुपए नकद, हथियार, वाहन और कीमती सामान बरामद हुआ.
इस पूरे नैटवर्क की बनावट पर नजर डालें, तो यह साफ होता है कि अपराध अब अकेले शख्स का नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित तंत्र है, जिस में परिवार तक शामिल हो जाता है. आरोपी की बहन का रोल इस धंधे में काफी अहम बताया जा रहा है. ड्रग्स की सप्लाई नेपाल से कराई जाती थी, ताकि पुलिस की निगाहों से बचा जा सके. नेपाल भेजे गए लोग ड्रग्स ले कर लौटते थे और फिर बिहार के अलगअलग इलाकों जैसे आरा, सारण, गया वगैरह में इस की सप्लाई होती थी.
यह भी सामने आया कि आरोपी पहले भी ड्रग्स के साथ पकड़ा जा चुका था. 2 साल पहले भी उस के पास से भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद हुई थीं, लेकिन इस के बावजूद वह फिर उसी धंधे से जुड़ गया.
नशे का यह कारोबार नौजवानों को ध्यान में रख कर फैलाया जा रहा था. चाय की दुकान, जहां नौजवान अकसर इकट्ठा होते हैं, उसे ही सप्लाई का अड्डा बनाया गया. बताया जाता है कि आरोपी ने इसी काले धंधे से करोड़ों की जमीन, मकान और वाहन खड़े कर लिए थे.
साल 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू हुई थी. इस का मकसद साफ था, अपराध रोकना, घरेलू हिंसा कम करना और समाज को सुधारना. शुरुआती महीनों में शराबबंदी ने असर भी दिखाया था, लेकिन धीरेधीरे तस्करों ने नई राह निकाल ली. नतीजतन, देशीविदेशी शराब की जगह अब ड्रग्स और नशे के दूसरे साधनों ने बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है.
शराबबंदी के बाद ड्रग्स का नैटवर्क कई गुना बढ़ गया है. पहले जो नशा केवल शहरों तक सीमित था, अब गांवगांव तक पहुंच गया है. गरीब तबका महुआ, स्प्रिट, खैनी, गुटका तक सीमित रहा, तो मिडिल क्लास गांजा, देशी शराब और अमीर तबका ब्राउन शुगर, चरस, प्रीमियम शराब तक अपनी पैठ बना चुका है.
पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर नशे के हब बन चुके हैं, वहीं गया, नालंदा, सीतामढ़ी, मधुबनी, भभुआ, रोहतास जैसे जिले भी पीछे नहीं हैं.
16 साल के आकाश ने बताया, ‘‘मैं ने पहली बार ब्राउन शुगर स्कूल के दोस्तों के साथ ली थी. शुरू में लगा कि मजा आएगा. 500 रुपए में दोस्तों के साथ लाते थे. धीरेधीरे आदत बढ़ी. अब दिनभर बेचैनी रहती है. न मिले तो शरीर में खुजली मचना और दर्द बनना शुरू हो जाता है.’’ आकाश के पिता मजदूरी करते हैं. इस ने घर के गहने और मोबाइल तक बेच दिए थे. कुछ समय पहले ही आकाश को नशा मुक्ति केंद्र ले जाया गया था, लेकिन एक एक महीने बाद फिर वह वापस उसी ढर्रे पर लौट आया.
इन पर सब से ज्यादा असर12 से किशोरों से ले कर 25 साल के नौजवान सब से ज्यादा ब्राउन शुगर का सेवन कर रहे हैं. ब्राउन शुगर भी लोग 4-5 के समूह में सेवन करते हैं. यह नशा शहर से चल कर गांव तक पहुंच गया है.औरंगाबाद जिले के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया, ‘‘हमारे स्कूल के तकरीबन 50 बच्चे ब्राउन शुगर का सेवन करते हैं. हम लोग सम?ा कर थक गए हैं, पर इन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता है. कई बच्चों ने तो स्कूल आना भी छोड़ दिया है.’’
नशा मुक्ति केंद्र, पटना के डाक्टर अजय कुमार बताते हैं, ‘‘ब्राउन शुगर और ड्रग्स का असर इतना खतरनाक है कि 3-4 महीने में ही नौजवान इस की गिरफ्त में आ जाते हैं. 70 फीसदी से ज्यादा मरीज इलाज के बाद भी दोबारा नशे की ओर लौट जाते हैं.’’ शराबबंदी के बाद गांवदेहात में देशी शराब बनाने का प्रचलन काफी बढ़ गया है. जहरीली शराब पीने की वजह से साल 2016 से अभी तक सरकारी रिकौर्ड के मुताबिक 190 मौतें हुई हैं. साल 2022 में सारण मशरक में सब से बड़ी घटना हुई थी, जिस में 73 लोगों की मौत हो गई थी.
जहरीली शराब की वजह से जब मौतें होने लगती हैं, तो प्रशासन और सरकार इसे छिपाने के लिए दूसरी वजह से मौत को दिखाने लगते हैं. सरकार द्वारा शराबबंदी को कामयाब बनाने के लिए बहुत कोशिश की गई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. शराब हर जगह मिल रही है. गैरकानूनी तौर पर शराब बेचने वाले होम डिलीवरी की सहूलियत भी दे रहे हैं. अपराध और नशे का रिश्ता पुलिस रिकौर्ड बताते हैं कि शराबबंदी के बाद चोरी, डकैती और हत्या जैसे अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. नशे की लत पूरी करने के लिए नौजवान चोरी और अपराध का रास्ता अपना रहे हैं.
सरकार ने 50 से ज्यादा नशा मुक्ति केंद्र चलाए हैं. विशेष अभियान में हजारों गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन तस्करों का नैटवर्क इतना मजबूत है कि पकड़ में आते ही नए लोग उन की जगह ले लेते हैं.
नशा अब केवल निजी आदत नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुका है. सरकार, समाज और परिवार को मिल कर काम करना होगा, वरना आने वाली पीढ़ी नशे के अंधेरे में खो जाएगी. Hindi Story




