Social Story: सरकारी स्कूल की छुट्टी की घंटी बज चुकी है. गांव के उस छोटे से स्कूल के बरामदे में खड़ा सुनील आज भी अपनी मैट्रिक की मार्कशीट हाथ में लिए खामोश है. वही सरकारी स्कूल, जहां टूटी बैंचों, कम टीचरों और पुरानी किताबों के बीच उस ने पढ़नालिखना सीखा था, आज उस पर गर्व कर रहा है.
सुनील पढ़ने में शुरू से तेज था. सीमित संसाधनों, बिना कोचिंग और बिना महंगी गाइड किताबों के बावजूद उस ने मैट्रिक में 95 फीसदी अंक हासिल कर स्कूल में टौप किया था. टीचर कहते थे कि यह लड़का आगे पढ़ेगा तो कुछ बड़ा करेगा. लेकिन घर की हालत उस के अंकों से नहीं बदल सकी.
सुनील के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, मां घरों में काम करती हैं. मैट्रिक के बाद आगे पढ़ने के लिए कालेज की फीस, किताबें, किराया और आनेजाने का खर्च परिवार की पहुंच से बाहर था. इंटर में नाम लिखाने के लिए 2,000 रुपए चाहिए. पिता के लिए इतने रुपए की बचत करना मुश्किल है. पैसे का इंतजाम नहीं होने की वजह से उस का दाखिला नहीं हो पाया.


सुनील ने किताबें समेट दीं. शहर जा कर कपड़ा फैक्टरी में नौकरी करना उस की मजबूरी बन गई. जिस लड़के के हाथ में कल तक किताबें थीं, आज उन्हीं हाथों से वह बो उठाता है. पढ़ाई छोड़ने की वजह उस की पढ़ने की ललक नहीं थी, बल्कि सिर्फ पैसे की कमी थी. सुनील की कहानी किसी एक बच्चे की नहीं है. देश में ऐसे हजारोंलाखों मेधावी छात्र हैं, जो सरकारी स्कूलों से किसी तरह मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं, लेकिन उस के बाद महंगी पढ़ाईलिखाई, फीस और संसाधनों की कमी उन्हें आगे बढ़ने नहीं देती. इस तरह हुनर रास्ते में ही दम तोड़ देता है और समाज एक भविष्य के डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या टीचर को खो देता है.

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