Editorial. भारत जैसे देश में ईकौमर्स छलांगें मार रहा है और अरबों रुपए का बिजनैस कर रहा है. उबर, फ्लिपकार्ट, अमेजन, ब्लिंकिट, जैप्टो, स्विगी जैसे दूसरों की चीजें ही सप्लाई करने वाले मार्केट पर कब्जा करने लगे हैं. घरेलू कामों के लिए बीसियों बड़ी कंपनियां, सिक्योरिटी कंपनियां, रिक्रूटमैंट कंपनियां जम कर मुनाफा कमा रही हैं.
यहां वर्कर्स की कमी नहीं है और इन सब सर्विसेज को करने वालों को तो 18वीं सदी में गोरों ने सेना में भरती किए सैनिकों से भी कम वेतन दिया है पर फिर भी लाखों युवा इसे ही अपना आज और कल मानने लगे हैं.
इस की बड़ी वजह है कि हमारे यहांका वर्कर आज भी बेहद अनपढ़, निकम्मा और निखट्टू बना हुआ है. उसे पीढ़ी दर पीढ़ी यह सिखाया गया है कि अगर दो वक्त का पेट भर जाए तो न घर की फिक्र करो, न साफ कपड़ों की, न बीमारी की, न बीवीबच्चों की. सैक्स के लिए कोई भी मिल जाए तो पटा लो या जबरन कर लो वरना नशा कर के चुपचाप सो जाओ.
इन ईकौमर्स कंपनियों ने छोटे दुकानदारों, छोटे कारीगरों, मजदूरों की कमजोरी को सम?ा और पता किया कि उन्हें कैसे रिक्रूटमैंट एजेंटों की तरह बहुत कम पैसे में रखा जा सकता है और थोड़ी सी ट्रेनिंग दे कर काम सिखाया जा सकता है. विदेशी कंपनियां जब भारत आईं तभी उन्होंने समझ लिया था कि यहां का कारीगर समाज के सब से निचले पायदान पर दबाकुचला है और उसे जरा सा समझा कर उस से भरपूर काम लिया जा सकता है. ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तानी सैनिकों के बल पर भारत पर राज किया जिन्हें अपने ही लोगों पर बंदूक चलाना सिखा दिया. उन्होंने भारत में थोड़ेबहुत कारखाने लगाए पर ज्यादा नहीं क्योंकि वे कूढ़मगज लोगों से निबटना नहीं चाहते थे. पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होंने लाखों में हिंदुस्तानी सैनिकों की भरती की और उन्हें यूरोप में या एशिया में जापान से लड़ने भेज दिया.
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