Caste Discrimination. दलित मंदिर में गया. अगडे़ समाज को यह बात नागवार गुजरी. पंचायत हुई, बीचबचाव किया गया. लेकिन असली सवाल यह है कि मंदिर में जाने से समाज का भला होता है या नहीं?

तमाम कोशिशों के बावजूद राजस्थान राज्य में अभी भी पोंगापंथ और जाति के नाम पर फर्क बरकरार है. इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां आएदिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जो इनसानियत को शर्मसार करती हैं.

कभी डायन के नाम पर औरतों की हत्या कर दी जाती है, तो कभी ऊंचीनीची जाति के नाम पर समूची बस्तियां राख कर दी जाती हैं. सरकार की ओर से किए जाने वाले सारे दावे हवाई साबित हो रहे हैं.

बूंदी जिले के नैनवां थाना इलाके के जजावर गांव में दलित दूल्हे के मंदिर पर चढ़ने के मामले को ले कर हुआ बवाल इस का सुबूत है.

एक दलित दूल्हे ने मंदिर में जा कर दर्शनपूजन क्या कर लिया, उस पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. यह मामला सिर्फ मंदिर में दर्शनपूजन करने तक ही नहीं सिमटा है, बल्कि यह इस बात का सुबूत है कि अभी भी भारत में किस तरह से किसी खास जाति को एक दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है.

यह मामला इस बात की भी गवाही दे रहा है कि अभी भी जाति के नाम पर किस तरह से दलितों पर जोरजुल्म हो रहा है.

मामला कुछ यों है कि लक्ष्मीनारायण खटीक के बेटे सुरेश की शादी थी. शादी के दिन सुरेश गांव के बीच बने लक्ष्मीनाथ मंदिर जा पहुंचा. वह मंदिर में पूजा भी नहीं कर पाया था कि किसी ने उसे देख लिया.

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