Films. जब से अक्षय कुमार की हिंदी फिल्म ‘वैलकम टू द जंगल’ आई है, तब से एक शब्द की बड़ी चर्चा हो रही है, ब्रेनरोट. देखा जाए तो यह कोई औफिशियल फिल्म की कैटेगरी नहीं है, बल्कि यह जेन जी की स्लैंग है. ब्रेनरोट अंगरेजी का शब्द है, जिस का मतलब है ‘दिमाग सड़ गया. जैसे सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली रील्स की वजह से जो दिमाग की हालत होती है. ध्यान 5 सैकंड का होता है. लौजिक का कोई मतलब नहीं होता है, बस हमें फनी मीम, क्रिंज, बकवास चाहिए. कहने का मतलब है कि ब्रेनरोट फिल्म ऐसी फिल्म मानी जाती है, जो तुम्हारे दिमाग को और सड़ा दे.

इस फिल्म की कुछ निशानियां होती हैं, जैसे जीरो लौजिक. फिल्म में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, इस पर दिमाग मत लगाएं. हीरो ने एक गुंडे को घूंसा मारा, और बाकी 20 उस घूंसे के तूफान से हवा में उड़ गए. आप उस सीन में फिजिक्स मत खोजिए.

फिल्म के सीन मीम जैसे होते हैं. वे सोशल मीडिया पर भी काम करते हैं. बकवास इतनी ज्यादा होती है कि एक टाइम के बाद उस बकवास पर हंसी आने लगती है, जिसे ओवर द टौप क्रिंज कहते हैं.

साल 1998 में कांति शाह ने ‘गुंडा’ नामक फिल्म बनाई थी. इस में बुल्ला नाम का एक किरदार था, जिस के डायलौग हद से ज्यादा घटिया थे और यह फिल्म बड़ी वाहियात थी, पर बाद में कल्ट फिल्म बन गई. आज इस कि आईएमडीबी रेटिंग 7.3 है.

ऐसी ही कुछ फिल्में और हैं जैसे ‘अंदाज अपनाअपना’, ‘हाउसफुल’ की सीरीज, ‘क्या कूल हैं हम’, ‘धमाल’ वगैरह.

हालिया फिल्म ‘वैलकम टू द जंगल’ तो फिर भी थोड़ाबहुत लोगों को हंसा रही है, पर साल 2010 में रिलीज हुई अक्षय कुमार की ही एक फिल्म ‘तीस मार खां’ तो बौक्स औफिस पर औंधे मुंह गिरी थी. उस में भी फिल्म के अंदर फिल्म बनने की कहानी थी, जिस में पुलिस से ले कर गांव वाले हर कोई मसखरा था.

यह फिल्म देख कर ऐसा लगा था कि निर्देशक और लेखक को यह सम?ा में ही नहीं आया कि फिल्म को कैसे आगे बढ़ाया जाए. लिहाजा, उन्होंने अपने किरदारों से ऐसी हरकतें करवाई थीं, जिन्हें देख कर हंसी तो बिलकुल नहीं आती.

सवाल उठता है कि लोग ऐसी फिल्में देखते क्यों हैं? जवाब यह है कि जरूरी नहीं हर फिल्म दिमाग लगा कर देखी जाए. बहुत बार हम सिनेमाघरों में मस्त के लिए जाते हैं, जहां, 3 सैकंड में जोक, 5 सैकंड में फाइट, फिर कोई गाना की डिमांड रहती है. मतलब, बस बेवजह हंसना और दिमाग का इस्तेमाल न के बराबर करना. ये फिल्में कहानी से भले ही दूर होती हैं, पर ठहाकों में दर्शकों को अपने नजदीक ले आती हैं. Films

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