Girls Empowerment. ‘मस्तमस्त गर्ल’ के खिताब से नवाज दी गई मशहूर हीरोइन रवीना टंडन एक वीडियो में अपनी कार खुद ठीक करती हुई दिखाई दी थीं, क्योंकि अकसर फिल्मों में हीरोइन की गाड़ी सुनसान रास्ते में बंद हो जाती है, तो वह मदद के लिए हैरानपरेशान इधरउधर ताकती नजर आती है. फिर कहानी की मांग के मुताबिक कहीं से हीरो आ टपकता है और कार का बोनट खोल मिनटों में उसे ठीक कर देता है. यहीं से शुरू हो जाती है उन की लव स्टोरी.
कभीकभार कहानी की मांग के मुताबिक ही विलेन भी ऐसे मौके पर आ धमकता है और हीरोइन की इज्जत लूटने की कोशिश करने का अपना रोल निभाता है.
वीडियो से परे महंगी और लग्जरी कारों की शौकीन रवीना टंडन ने एक इंटरव्यू में बताया भी था कि उन्हें न केवल कार का टायर बदलना आता है, बल्कि दूसरे छोटेमोटे काम मसलन इंजन औयल चैक करना, लाइटें बदल लेना और फ्यूज ठीक करना भी आता है.
बकौल रवीना, वे जब भी लौन्ग ड्राइव पर जाती हैं तो टूल बौक्स अपने साथ रखती हैं. शूटिंग पर जो हीरोइनें खुद कार चला कर जाती हैं, रवीना टंडन उन में से एक हैं, इसलिए फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ‘स्टीयरिंग गर्ल’ भी कहा जाता है. उन के मुताबिक हर लड़की को अपनी गाड़ी के बारे में बेसिक जानकारी होनी चाहिए.
कोई भी लड़की रवीना टंडन जैसी हीरोइन भले ही न बन पाए, लेकिन इतनी स्मार्ट तो बन ही सकती है कि अपनी गाडी की छोटीमोटी रिपेयरिंग खुद कर सके, जिस से मेकैनिक की मोहताजी न रहे और कुछ पैसों की बचत भी हो सके. इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि खुद का आत्मविश्वास इस से बढ़ता है.
आजकल शहरों में पढ़ने वाली या नौकरीपेशा लड़कियां स्कूटी का इस्तेमाल ज्यादा करती हैं जिस में अकसर ऐसी छोटीमोटी खराबियां आती हैं जिन के बारे में लड़कियों को कोई जानकारी नहीं होती कि उन्हें कैसे ठीक करें.
भोपाल के एमपी नगर जोन 2 इलाके में छोटा सा गैराज चलाने वाले सलीम बताते हैं कि उन के पास आने वाले ग्राहकों में 10 में से 6 लड़कियां होती हैं जो स्कूटी बंद हो जाने पर उसे घसीटते और हांफते हुए लाती हैं, जबकि उन की स्कूटी में ऐसा मामूली नुक्स होता है, जिसे वे खुद भी ठीक कर सकती हैं.
सलीम के मुताबिक पंचर के अलावा स्कूटी में जो खराबियां आती हैं, वे हैं स्पार्क प्लग में कचरा जमा होना, फ्यूज का जल जाना और बल्ब फ्यूज हो जाना. ये काम लड़कियां खुद भी कर सकती हैं.
जरूरी है मैन्युल समझना
बात अकेले स्कूटी की नहीं है, बल्कि हर उस छोटीबड़ी मशीन की है जिसे लड़कियां आमतौर पर इस्तेमाल करती हैं, मसलन वाशिंग मशीन, मिक्सर ग्राइंडर, इस्तरी, लैपटौप या डैस्क टौप, बिजली से चलने वाले दूसरे उपकरण जैसे राइस कुकर, चाय बनाने वाली इलैक्ट्रिक केतली, हेयर ड्रायर सहित मोबाइल चार्जर और वाटर फिल्टर जग वगैरह.
इन में से हरेक मशीन के साथ एक मैन्युल बुक जरूर आती है, जिस में मशीन के इस्तेमाल करने के तरीकों के साथसाथ रखरखाव की भी जानकारी होती है. कौन सा पार्ट कहां लगा हुआ है, इस की जानकारी भी मैन्युल में दी जाती है, लेकिन 90 फीसदी से भी ज्यादा लोग इसे नहीं पढ़ते, इसलिए मशीन के खराब हो जाने पर मेकैनिक या टैक्निशियन के मोहताज हो जाते हैं. अगर इसे पढ़ और समझ लिया जाए तो कई खराबियां हो ही नहीं पाती हैं और कई को लड़कियां खुद ठीक कर सकती हैं.
अगर स्कूटी इस्तेमाल करने वाली लड़की को यह मालूम हो कि ज्यादातर स्कूटी में फ्यूज सीट के नीचे बैटरी के पास लगा होता है और स्पार्क प्लग इंजन के सिलैंडर हैड में लगा होता है, जो रबड़ कैप में लिपटा उस के किनारे पर साफसाफ दिखता है तो वे इन खामियों को आसानी से सुधार सकती हैं.
इसी तरह हरेक मशीन की अपनी बनावट होती है जो मैन्युल में दी जाती है. इन्हें जानसमझ कर ठीक कर लेने के लिए बस पेंचकस और पाने के सैट की जरूरत होती है, जो गाड़ी खरीदी के साथ मिलते हैं. अगर न मिलते हों तो खुद भी खरीदे जा सकते हैं.
ऐसे बढ़ती है स्किल
जब किसी मशीन या किसी और औजार के बारे में बेसिक जानकारियां हासिल कर ली जाती हैं तो स्किल अपनेआप बढ़ने लगती है. इस के लिए शुरुआत घर से ही की जा सकती है जब बारिश में या किसी और वजह के चलते घर की बिजली का फ्यूज उड़ जाता है. तो उसे जोड़ने कोई खास टैक्निक की जरूरत नहीं पड़ती. बस फ्यूज को निकाल कर उस का जला हुआ तार बदलना पड़ता है. एहतियात के तौर पर मेन स्विच बंद कर देना चाहिए, जिस से करंट न लगे.
आमतौर पर घरों में ऐसे काम लड़के या मर्द करते हैं लड़कियां नहीं, जबकि वे हरेक फील्ड में लड़कों को टक्कर दे रही हैं. लेकिन पढ़ाई से या लड़कों की आजादी की बराबरी कर लेने न तो आत्मविश्वास आता और न ही स्किल बढ़ती. इस के लिए जरूरी है कि जानकारियां बढ़ाई जाएं, टैक्नोलौजी सीखी जाए और अपना समय व मेहनत बेकार के कामों में बरबाद न की जाए.
खेतीकिसानी के दौर में औरतें खेतों में मर्दों से ज्यादा मेहनत करती थीं. आज भी खेतखलिहानों में ज्यादा मेहनत के काम मसलन बोआई, कटाई, निराईगुड़ाई वगैरह वही करती हैं, लेकिन इस का क्रेडिट उन्हें नहीं मिलता. वजह यह है कि उन्हें हमेशा से स्किल वाले कामों से मर्दों ने दूर रखा.
आज की लड़की भी कम मेहनती नहीं जो खुद का वजन खुद ढोती है, अस्पतालों में मरीज को उठा कर स्ट्रैचर पर लिटाती है, घरगृहस्थी के सारे कामकाज करती है, मौल और शोरूम में हर तरह की नौकरी करती है, लेकिन कहीं वह स्मार्ट न बन जाए और स्किल न सीखने लगे, इसलिए उसे यहां वहां के कामों में उलझा दिया जाता है.
बड़े पैमाने पर लड़कियां धर्म की गुलाम और मोहरा बन कर रह गई हैं. घरगृहस्थी और खेतीकिसानी से कामों से बचे समय में वे कलश यात्राओं में सिर पर कलश रखे भूखीप्यासी नंगे पैर मीलों चलती नजर आती हैं. घरों में पूजापाठ की जिम्मेदारी भी उन्हीं के सिर पर लाद दी गई है जिस से उन का ध्यान स्किल बढ़ाने वाले कामों पर न जाए.
स्मार्टनैस का सीधा सा मतलब यह है कि लड़कियां स्किल वाले काम करें, अच्छी किताबें और पत्रिकाएं पढ़ें, हरदम नया कुछ सीखें और छोटेमोटे कामों के लिए लड़कों की मोहताज न रहें. Girls Empowerment




