Hindi Social Story. अदिति को क्या पता था कि जिस छात्रा को वे उस की छोटी जाति होने के कारण पसंद नहीं करती थीं, एक दिन उसी की शरण में उन्हें जाना पड़ेगा. फिर क्या हुआ?
‘‘है लो, क्या मैं कमलाजी से बात कर सकती हूं?’’ उधर से जवाब मिला, ‘‘जी नहीं, वे बाहर गई हैं.’’
‘‘कब तक वापस आएंगी?’’
जवाब मिला, ‘‘एक हफ्ते बाद... वैसे आप को क्या काम है?’’
मैं ने बताया कि मेरा एक बहुत ही जरूरी काम है. तब उन की सैक्रेटरी ने कहा, ‘‘मैडम, पहले आप मिलने का वक्त तय कर लीजिएगा.’’
मैं ने हफ्तेभर बाद का समय लिया और फोन रख दिया.
मेरे माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. मुझे अपने बेटे सौरभ का कैरियर बरबाद होता नजर आ रहा था. जन कल्याण केंद्र दिल्ली की मानी हुई संस्था थी. वह अनगिनत लोगों को इंसाफ दिलाती आ रही थी. कमला देवी, यानी उस केंद्र की अध्यक्ष की पहुंच प्रधानमंत्री तक थी.
हफ्तेभर बाद जब मैं जन कल्याण केंद्र के दफ्तर में कमलाजी के सामने पहुंची, तो वे बोलीं, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’
मैं ने देखा तो देखती ही रही. नजरें मानो हटना ही नहीं चाहती थीं. मैं ने कहा, ‘‘अरे कमलाजी, आप... आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं. याद है, आप मेरी ही क्लास में थीं?’’
कुछ पल वे सोचती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘अरे हां, आप अदिति मैडम हैं न?’’
मुझे संतोष हो गया कि चलो, अपना काम तो बना. कमला बोलीं, ‘‘हां, बताइए, क्या काम है?’’
‘‘कमलाजी, मेरा बेटा सौरभ इंजीनियरिंग के आखिरी साल का छात्र है...’’
वे बोलीं, ‘‘मैडम, मैं वही कमला हूं, आप की छात्रा... मुझे ‘जी’ न कहें.’’
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