Politics. ‘नक्सल’ शब्द सुनते ही आज हमारे सामने बंदूक, जंगल और हिंसा की तसवीर आ जाती है, लेकिन ‘नक्सल’ शब्द की शुरुआत बंदूक से नहीं हुई थी. इस की शुरुआत जमीन, किसान और अधिकार के सवाल से हुई थी.

1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिग जिले के नक्सलबाड़ी इलाके में किसानों का आंदोलन खड़ा हुआ. जमीन पर अधिकार, बंटाईदार किसानों के हक और जमींदारों के शोषण के खिलाफ किसानों में गुस्सा था. इन लोगों को कम्युनिस्टों ने सही रास्ता बताया पर वह रास्ता पुराणों से हो कर मंदिरों के बीच से नहीं गुजरना था. इसी आंदोलन के नाम पर आगे चल कर ‘नक्सल’ शब्द प्रचलित हुआ.

उस समय किसान का सवाल सीधा था कि जिस जमीन पर हम मेहनत करते हैं, उस पर हमारा हक क्यों नहीं? गरीब किसान और खेत मजदूर शोषण क्यों सहें? हमारी शिकायत कौन सुनेगा?

इन सवालों को सम?ाना जरूरी है, क्योंकि किसी आंदोलन के पैदा होने की सामाजिक वजह सम?ाना और बाद में उस के नाम पर हुई हिंसा का समर्थन करना एक बात नहीं है.

नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद नक्सल आंदोलन का एक हिस्सा धीरेधीरे हथियारबंद माओवादी राजनीति की ओर चला गया.  ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मण द्रोणाचार्य ने शूद्र एकलव्य से हथियार छीना था, कांग्रेस की तब की पौराणिकवादी सरकार ने पाखंड को हथियार बनाया पर वह कामयाब नहीं हुआ.

किसान मजदूर ने बंदूक, हत्या, विस्फोट और हिंसा को संघर्ष का रास्ता बनाया. यहां से मामला बदल गया. लोकतांत्रिक समाज में किसी की हत्या करना, अपहरण करना, विस्फोट करना या बंदूक के बल पर व्यवस्था बदलने की कोशिश करना स्वीकार नहीं किया जा सकता पर तब की सरकार जमींदारों को खुश करने में लगी थी क्योंकि वही लगान वसूल करते थे और गांवों को गरीब रखते थे ताकि कलकत्ता (अब कोलकाता) की फैक्टरियों को सस्ते मजदूर मिलते रहें.

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