Shameful. गैंगस्टरों और तस्करों ने सामाजिक संस्थाओं, मंदिरों, गौशालाओं में दान दे कर सामाजिक स्वीकार्यता हासिल कर के भामाशाहों की उपाधि ली और अब गांवों के सरपंचप्रधान तक बन रहे हैं.
यही नहीं, हर गैंगस्टर के पीछे उस के समाज का ही समर्थक गुट तैयार बैठा है, जो किसी भी घटना को ले कर उस के प्रति सहानुभूति जताते हुए प्रदर्शन करता है.
राजस्थान में आनंदपाल सिंह इस का क्लासिक व राज्यस्तरीय उदाहरण है. उस के एनकाउंटर के बाद एक हफ्ते तक मारवाड़ को बंधक बना लिया गया था.
गैंगस्टर आनंदपाल की लाश सड़क पर रख कर हंगामा किया गया था. सरकारी सख्ती के बाद उस का दाह संस्कार किया गया. उस की पुण्यतिथि मनाते हुए भोमिया (लोकदेवता) तक घोषित किया जा चुका है. हर साल उस की तसवीर के साथ भौंड़ा प्रदर्शन करते लोग मिलते हैं.
दरअसल, हर समाज में तकरीबन यही हाल है. पिछले दिनों अजमेर की जेल में चंबल के नामी डकैत जगन गुर्जर की हत्या के बाद भी सहानुभूति जताते समर्थक गुट प्रकट हुए थे.
जगन गुर्जर की हाई सिक्योरिटी जेल में हत्या पर सवाल हो सकता है लेकिन यह कहना कि उस ने अपराध का रास्ता छोड़ दिया था या बेहतर नागरिक बनने की कोशिश में था, यह बिलकुल भी नैतिक व न्यायोचित नहीं है.
एक न एक दिन बेमौत तो लौरैंस बिश्नोई का भी मरना तय है, लेकिन मरते ही देखना समाज व धर्म के नाम पर सहानुभूति जताने वाले समूह भी आगे आ जाएंगे. लौरैंस बिश्नोई भी सलमान खान को हिरन की हत्या को ले कर जान से मारने की धमकी दे कर समाज के धार्मिक सैंटीमैंट को कैश कर चुका है.
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