Debate. “अब्दुल पंचर बनाता है” मुस्लिमों को नीचा दिखाने के लिए दक्षिणपंथी इस लाइन का बखूबी इस्तेमाल करते हैं. 2015 के बाद से राइट विंग मीम पेज और व्हाट्सएप फॉरवर्ड में मुस्लिमों को अनस्किल्ड और गरीब दिखाने के लिए यह लाइन इस्तेमाल होने लगा. OpIndia ने 2020 में एक आर्टिकल में इसका जवाब देते हुए लिखा था - "इट्स नॉट द पंचर वाला बट द IIT-IIM वाला". अब सवाल यह है कि एक पूरे समाज को उसके काम को लेकर नीचा दिखाने की मानसिकता कहां से आई? और क्या सच में अब्दुल सिर्फ पंचर बनाता है?

“अब्दुल पंचर बनाता है” इस लाइन को मेनस्ट्रीम में लाने का सबसे बड़ा मोमेंट 14 अप्रैल 2025 को हरियाणा के हिसार में PM नरेंद्र मोदी का भाषण था. वक्फ संशोधन बिल का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था- "अगर वक्फ की प्रॉपर्टी का सही इस्तेमाल होता तो मुस्लिम नौजवानों को साइकिल के पंचर ठीक करने की नौबत नहीं आती"

मेहनतकश समाज के बारे में नफ़रत फैलाने का काम आरएसएस करता है. आरएसएस ने अंग्रेजों से लड़ने के बजाय मुसलमानों को यवन सांप कहा था इसलिए 1943 में ब्रिटिश इंटेलिजेंस रिपोर्ट में RSS को फासिस्ट प्रवृत्तियों वाला खतरनाक संगठन कहा गया था. महात्मा गांधी ने खुद 16 सितंबर 1947 को RSS की रैली में जाकर कहा था कि “अगर हिंदू ये सोचते हैं कि भारत में सिर्फ हिंदुओं की जगह है और मुसलमानों को गुलाम बन कर रहना है तो वो हिंदू धर्म को मार देंगे”

आज वही सोच नए पैकेट में बिक रही है. आर्थिक बहिष्कार के रूप में. 2016 में RSS के नाम से चलने वाले एक हैंडल ने, जिसे प्रधानमंत्री खुद फॉलो करते हैं, खुल कर ट्वीट किया था कि मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार करो. 2022 में दिल्ली में भाजपा के सांसद ने मंच से कहा कि मुस्लिमों का संपूर्ण बहिष्कार करो. कोरोना के वक्त तो हद ही हो गई. तबलीगी जमात को कोरोना जिहाद कहा गया और सब्जी वाले, नाई, रिक्शा वाले तक का बहिष्कार करवाया गया.

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