भारतीय सिनेमा के फलक पर कुछ कलाकार पहली फिल्म से ही अपनी पहचान तय कर लेते हैं, लेकिन बतौर कलाकार शाहिद कपूर की कहानी एक लगातार होते ‘पुनर्जन्म’ की कहानी है.
शाहिद कपूर ने साल 2003 में फिल्म ‘इश्कविश्क’ से एक मासूम चेहरे वाले ‘चौकलेटी बौय’ के रूप में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था. फिर उन्होने ‘विवाह’ जैसी सामाजिक फिल्म की. तब किसी ने कल्पना नहीं की थी कि लोग उन्हें ‘हैदर’ जैसी फिल्म में एक पेचीदा किरदार निभाते हुए देखेंगे या फिर फिल्म ‘कबीर सिंह’ के रूप में वे एक गुस्सैल और शराबी प्रेमी के किरदार में नजर आ सकते हैं.
शाहिद कपूर को विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्मों में अलगअलग किरदार निभाने का मौका दिया है और अब उन की नई फिल्म ‘ओ रोमियो’ में वे फिर डार्क शेड वाला किरदार निभा रहे हैं. पेश हैं, शाहिद कपूर से हुई बातचीत के खास अंश :
विशाल भारद्वाज ने ‘कमीने’, ‘हैदर’ और ‘रंगून’ जैसी फिल्मों में आप को एक अलग इमेज दी. अब आप 7 साल बाद उन के साथ वापसी कर रहे हैं. इस पर आप क्या कहेंगे? यह वापसी नहीं है. बतौर कलाकार मेरी एक अलग यात्रा है और डायरैक्टर के तौर पर विशाल सर की अपनी अलग यात्रा है, लेकिन सच यह है कि विशाल सर कुछ औफर करेंगे, तो मैं उसे सुनूंगा जरूर.
इस फिल्म की स्क्रिप्ट सुनतेसुनते मु?ो अहसास हुआ कि मेरी फिल्मोग्राफी में यह फिल्म होनी चाहिए.
फिल्म ‘हैदर’ में एक पिता अपने बेटे की तलाश कर रहा है, जबकि ‘ओ रोमियो’ में आप का किरदार खुद को बहुत ही ज्यादा भयावह साबित करने की कोशिश कर रहा है. इन दोनों किरदारों के बीच जो खामोशी है, वह क्या है?
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