Hindi Story : रिश्ते की बुआ

Hindi Story : माधुरी के बेटे से मेरे लिए बुआजी का संबोधन सुन कर राकेश ने भारत की महिमा का जो गुणगान किया उस से मेरी आंखें छलछला उठीं, लेकिन वह इन छलछलाती आंखों के पीछे छिपे दर्द की उस कहानी से अनभिज्ञ था जिस की भुक्तभोगी मैं स्वयं भी थी.

इस बार मैं अपने बेटे राकेश के साथ 4 साल बाद भारत आई थी. वे तो नहीं आ पाए थे. बिटिया को मैं घर पर ही लंदन में छोड़ आई थी, ताकि वह कम से कम अपने पिता को खाना तो समय पर बना कर खिला देगी.

पिछली बार जब मैं दिल्ली आई थी तब पिताजी आई.आई.टी. परिसर में ही रहते थे. वे प्राध्यापक थे वहां पर 3 साल पहले वे सेवानिवृत्त हो कर आगरा चले गए थे. वहीं पर अपने पुश्तैनी घर में अम्मां और पिताजी अकेले ही रहते थे. पिताजी की तबीयत कुछ ढीली रहती थी, पर अम्मां हमेशा से ही स्वस्थ थीं. वे घर को चला रही थीं और पिताजी की देखभाल कर रही थीं.

वैसे भी उन की कौन देखरेख करता? मैं तो लंदन में बस गई थी. बेटी के ऊपर कोई जोर थोड़े ही होता है, जो उसे प्यार से, जिद कर के भारत लौट आने के लिए कहते. बेटा न होने के कारण अम्मां और पिताजी आंसू बहाने लगते और मैं उन का रोने में साथ देने के सिवा और क्या कर सकती थी.

पहले जब पिताजी दिल्ली में रहते थे तब बहुत आराम रहता था. मेरी ससुराल भी दिल्ली में है. आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी. दोपहर का खाना पिताजी के साथ और शाम को ससुराल में आनाजाना लगा ही रहता था. मेरे दोनों देवर भी बेचारे इतने अच्छे हैं कि अपनी कारों से इधरउधर घुमाफिरा देते.

अब इस बार मालूम हुआ कि कितनी परेशानी होती है भारत में सफर करने में. देवर बेचारे तो स्टेशन तक गाड़ी पर चढ़ा देते या आगरा से आते समय स्टेशन पर लेने आ जाते. बाकी तो सफर की परेशानियां खुद ही उठानी थीं. वैसे राकेश को रेलगाड़ी में सफर करना बहुत अच्छा लगता था. स्टेशन पर जब गाड़ी खड़ी होती तो प्लेटफार्म पर खाने की चीजें खरीदने की उस की बहुत इच्छा होती थी. मैं उस को बहुत मुश्किल से मना कर पाती थी.

आगरा में मुझे 3 दिन रुकना था, क्योंकि 10 दिन बाद तो हमें लंदन लौट जाना था. बहुत दिल टूट रहा था. मुझे मालूम था ये 3 दिन अच्छे नहीं कटेंगे. मैं मन ही मन रोती रहूंगी. अम्मां तो रहरह कर आंसू बहाएंगी ही और पिताजी भी बेचारे अलग दुखी होंगे.

पिताजी ने सक्रिय जिंदगी बिताई थी, परंतु अब बेचारे अधिकतर घर की चारदीवारी के अंदर ही रहते थे. कभीकभी अम्मां उन को घुमाने के लिए ले तो जाती थीं परंतु यही डर लगता था कि बेचारे लड़खड़ा कर गिर न पड़ें.

रेलवे स्टेशन पर छोटा देवर छोड़ने आया था. उस को कोई काम था, इसलिए गाड़ी में चढ़ा कर चला गया. साथ में वह कई पत्रिकाएं भी छोड़ गया था. राकेश एक पत्रिका देखने में उलझा हुआ था. मैं भी एक कहानी पढ़ने की कोशिश कर रही थी, पर अम्मां और पिताजी की बात सोच कर मन बोझिल हो रहा था.

गाड़ी चलने में अभी 10 मिनट बाकी थे तभी एक महिला और उन के साथ लगभग 7-8 साल का एक लड़का गाड़ी के डब्बे में चढ़ा. कुली ने आ कर उन का सामान हमारे सामने वाली बर्थ के नीचे ठीक तरह से रख दिया. कुली सामान रख कर नीचे उतर गया. वह महिला उस के पीछेपीछे गई. उन के साथ आया लड़का वहीं उन की बर्थ पर बैठ गया.

कुली को पैसे प्लेटफार्म पर खड़े एक नवयुवक ने दिए. वह महिला उस नवयुवक से बातें कर रही थी. तभी गाड़ी ने सीटी दी तो महिला डब्बे में चढ़ गई.

‘‘अच्छा दीदी, जीजाजी से मेरा नमस्ते कहना,’’ उस नवयुवक ने खिड़की में से झांकते हुए कहा.

वह महिला अपनी बर्थ पर आ कर बैठ गई, ‘‘अरे बंटी, तू ने मामाजी को जाते हुए नमस्ते की या नहीं?’’

उस लड़के ने पत्रिका से नजर उठा कर बस, हूंहां कहा और पढ़ने में लीन हो गया. गरमी काफी हो रही थी. पंखा अपनी पूरी शक्ति से घूम रहा था, परंतु गरमी को कम करने में वह अधिक सफल नहीं हो पा रहा था. 5-7 मिनट तक वह महिला चुप रही और मैं भी खामोश ही रही. शायद हम दोनों ही सोच रही थीं कि देखें कौन बात पहले शुरू करता है.

आखिर उस महिला से नहीं रहा गया, पूछ ही बैठी, ‘‘कहां जा रही हैं आप?’’

‘‘आगरा जा रहे हैं. और आप कहां जा रही हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हम तो आप से पहले मथुरा में उतर जाएंगे,’’ उस ने कहा, ‘‘क्या आप विदेश में रहती हैं?’’

‘‘हां, पिछले 15 वर्षों से लंदन में रहती हूं, लेकिन आप ने कैसे जाना कि मैं विदेश में रहती हूं?’’ मैं पूछ बैठी.

‘‘आप के बोलने के तौरतरीके से कुछ ऐसा ही लगा. मैं ने देखा है कि जो भारतीय विदेशों में रहते हैं उन का बातचीत करने का ढंग ही अनोखा होता है. वे कुछ ही मिनटों में बिना कहे ही बता देते हैं कि वे भारत में नहीं रहते. आप ने यहां भ्रमण करवाया है, अपने बेटे को?’’ उस ने राकेश की ओर इशारा कर के कहा.

‘‘मैं तो बस घर वालों से मिलने आई थी. अम्मां और पिताजी से मिलने आगरा जा रही हूं. पहले जब वे हौजखास में रहते थे तो कम से कम मेरा भारत भ्रमण का आधा समय रेलगाड़ी में तो नहीं बीतता था,’’ मेरे लहजे में शिकायत थी.

‘‘आप के पिताजी हौजखास में कहां रहते थे?’’ उस ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘पिताजी हौजखास में आई.आई.टी. में 20 साल से अधिक रहे,’’ मैं ने कहा, ‘‘अब सेवानिवृत्त हो कर आगरा में रह रहे हैं.’’

‘‘आप के पिताजी आई.आई.टी. में थे. क्या नाम है उन का? मेरे पिताजी भी वहीं प्रोफेसर हैं.’’

‘‘उन का नाम हरीश कुमार है,’’ मैं ने कहा.

मेरे पिताजी का नाम सुन कर वह महिला सन्न सी रह गई. उस का चेहरा फक पड़ गया. वह अपनी बर्थ से उठ कर हमारी बर्थ पर आ गई, ‘‘जीजी, आप मुझे नहीं जानतीं? मैं माधुरी हूं,’’ उस ने धीमे से कहा. उस की वाणी भावावेश से कांप रही थी.

‘माधुरी?’ मैं ने मस्तिष्क पर जोर डालने की कोशिश की तो अचानक यह नाम बिजली की तरह मेरी स्मृति में कौंध गया.

‘‘कमल की शादी मेरे से ही तय हुई थी,’’ कहते हुए माधुरी की आंखें छलछला उठीं.

‘कमल’ नाम सुन कर एकबारगी मैं कांप सी गई. 12 साल पहले का हर पल मेरे समक्ष ऐसे साकार हो उठा जैसे कल की ही बात हो. पिताजी ने कमल की मृत्यु का तार दिया था. उन का लाड़ला, मेरा अकेला चहेता छोटा भाई एक ट्रेन दुर्घटना का शिकार हो गया था. अम्मां और पिताजी की बुढ़ापे की लाठी, उन के बुढ़ापे से पहले ही टूट गई थी.

कमल ने आई.आई.टी. से ही इंजीनियरिंग की थी. पिताजी और माधुरी के पिता दोनों ही अच्छे मित्र थे. कमल और माधुरी की सगाई भी कर दी गई थी. वे दोनों एकदूसरे को चाहते भी थे. बस, हमारे कारण शादी में देरी हो रही थी. गरमी की छुट्टियों में हमारा भारत आने का पक्का कार्यक्रम था. पर इस से पहले कि हम शादी के लिए आ पाते, कमल ही सब को छोड़ कर चला गया. हम तो शहनाई के माहौल में आने वाले थे और आए तब जब मातम मनाया जा रहा था.

मैं ने माधुरी के कंधे पर हाथ रख कर उस की पीठ सहलाई. राकेश मेरी ओर देख रहा था कि मैं क्या कर रही हूं.

मैं ने राकेश को कहा, ‘‘तुम भोजन कक्ष में जा कर कुछ खापी लो और बंटी को भी ले जाओ,’’ अपने पर्स से एक 20 रुपए का नोट निकाल कर मैं ने रोकश को दे दिया. वह खुशीखुशी बंटी को ले कर चला गया.

उन के जाते ही मेरी आंखें भी छलछला उठीं, ‘‘अब पुरानी बातों को सोचने से दुखी होने का क्या फायदा, माधुरी. हमारा और उस का इतना ही साथ था,’’ मैं ने सांत्वना देने की कोशिश की, ‘‘यह शुक्र करो कि वह तुम को मंझधार में छोड़ कर नहीं गया. तुम्हारा जीवन बरबाद होने से बच गया.’’

‘‘दीदी, मैं सारा जीवन उन की याद में अम्मां और पिताजी की सेवा कर के काट देती,’’ माधुरी कमल की मृत्यु के बाद बहुत मुश्किल से शादी कराने को राजी हुई थी. यहां तक कि अम्मां और पिताजी ने भी उस को काफी समझाया था. कमल की मृत्यु के 3 वर्ष बाद माधुरी की शादी हुई थी.

‘‘तुम्हारे पति आजकल मथुरा में हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, वे वहां तेलशोधक कारखाने में नौकरी करते हैं.’’

‘‘तुम खुश हो न, माधुरी?’’ मैं पूछ ही बैठी.

‘‘हां, बहुत खुश हूं. वे मेरा बहुत खयाल रखते हैं. बड़े अच्छे स्वभाव के हैं. मैं तो खुद ही अपने दुखों का कारण हूं. जब भी कभी कमल का ध्यान आ जाता है तो मेरा मन बहुत दुखी हो जाता है. वे बेचारे सोचसोच कर परेशान होते हैं कि उन से तो कोई गलती नहीं हो गई. सच दीदी, कमल को मैं अब तक दिल से नहीं भुला सकी,’’ माधुरी फूटफूट कर रोने लगी. मेरी आंखों से भी आंसू बहने लगे. कुछ देर बाद हम दोनों ने आंसू पोंछ डाले.

‘‘मुझे पिताजी से मालूम हुआ था कि चाचाचाची आगरा में हैं. इतने पास हैं, मिलने की इच्छा भी होती है, पर इन से क्या कह कर उन को मिलवाऊंगी? यही सोच कर रह जाती हूं,’’ माधुरी बोली.

‘‘अगर मिल सको तो वे दोनों तो बहुत प्रसन्न होंगे. पिताजी के दिल को काफी चैन मिलेगा,’’ मैं ने कहा, ‘‘पर अपने पति से झूठ बोलने की गलती मत करना,’’ मैं ने सुझाव दिया.

‘‘अगर कमल की मृत्यु न होती तो दीदी, आज आप मेरी ननद होतीं,’’ माधुरी ने आहत मन से कहा.

मैं उस की इस बात का क्या उत्तर देती. बच्चों को भोजन कक्ष में गए काफी देर हो गई थी. मथुरा स्टेशन भी कुछ देर में आने वाला ही था.

‘‘तुम को लेने आएंगे क्या स्टेशन पर,’’ मैं ने बात को बदलने के विचार से कहा.

‘‘कहां आएंगे दीदी. गाड़ी 3 बजे मथुरा पहुंचेगी. तब वे फैक्टरी में होंगे. हां, कार भेज देंगे. घर पर भी शाम के 7 बजे से पहले नहीं आ पाते. इंजीनियरों के पास काम अधिक ही रहता है.’’

?तभी दोनों लड़के आ गए. माधुरी का बंटी बहुत ही बातें करने लगा. वह राकेश से लंदन के बारे में खूब पूछताछ कर रहा था. राकेश ने उसे लंदन से ‘पिक्चर पोस्टकार्ड’ भेजने का वादा किया. उस ने अपना पता राकेश को दिया और राकेश का पता भी ले लिया. गाड़ी वृंदावन स्टेशन को तेजी से पास कर रही थी. कुछ देर में मथुरा जंक्शन के आउटर सिगनल पर गाड़ी खड़ी हो गई.

‘‘यह गाड़ी हमेशा ही यहां खड़ी हो जाती है. पर आज इसी बहाने कुछ और समय आप को देखती रहूंगी,’’ माधुरी उदास स्वर में बोली.

मैं कभी बंटी को देखती तो कभी माधुरी को. कुछ मिनटों बाद गाड़ी सरकने लगी और मथुरा जंक्शन भी आ गया.

एक कुली को माधुरी ने सामान उठाने के लिए कह दिया. बंटी राकेश से ‘टाटा’ कर के डब्बे से नीचे उतर चुका था. राकेश खिड़की के पास खड़ा बंटी को देख रहा था. सामान भी नीचे जा चुका था. माधुरी के विदा होने की बारी थी. वह झुकी और मेरे पांव छूने लगी. मैं ने उसे सीने से लगा लिया. हम दोनों ही अपने आंसुओं को पी गईं. फिर माधुरी डब्बे से नीचे उतर गई.

‘‘अच्छा दीदी, चलती हूं. ड्राइवर बाहर प्रतीक्षा कर रहा होगा. बंटी बेटा, बूआजी को नमस्ते करो,’’ माधुरी ने बंटी से कहा.

बंटी भी अपनी मां का आज्ञाकारी बेटा था, उस ने हाथ जोड़ दिए. माधुरी अपनी साड़ी के पल्ले से आंखों की नमी को कम करने का प्रयास करती हुई चल दी. उस में पीछे मुड़ कर देखने का साहस नहीं था. कुछ समय बाद मथुरा जंक्शन की भीड़ में ये दोनों आंखों से ओझल हो गए.

अचानक मुझे खयाल आया कि मुझे बंटी के हाथ में कुछ रुपए दे देने चाहिए थे. अगर वक्त ही साथ देता तो बंटी मेरा भतीजा होता. पर अब क्या किया जा सकता था. पता नहीं, बंटी और माधुरी से इस जीवन में कभी मिलना होगा भी कि नहीं? अगर बंटी लड़के की जगह लड़की होता तो उसे अपने राकेश के लिए रोक कर रख लेती. यह सोच कर मेरे होंठों पर मुसकान खेल गई.

राकेश ने मुझे काफी समय बाद मुसकराते देखा था. वह मेरे हाथ से खेलने लगा, ‘‘मां, भारत में लोग अजीब ही होते हैं. मिलते बाद में हैं, पहले रिश्ता कायम कर लेते हैं. देखो, आप को उस औरत ने बंटी की बूआजी बना दिया. क्या बंटी के पिता आप के भाई लगते हैं?’’

राकेश को कमल के बारे में विशेष मालूम नहीं था. कमल की मृत्यु के बाद ही वह पैदा हुआ था. उस का प्रश्न सुन कर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.

राकेश घबराया कि उस ने ऐसा क्या कह दिया कि मैं रोने लगी, ‘‘मुझे माफ कर दो मां, आप नाराज क्यों हो गईं? आप हमेशा ही भारत छोड़ने से पहले जराजरा सी बात पर रोने लगती हैं.’’

मैं ने राकेश को अपने सीने से लगा लिया, ‘‘नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं… जब अपनों से बिछड़ते हैं तो रोना आ ही जाता है. कुछ लोग अपने न हो कर भी अपने होते हैं.’’

राकेश शायद मेरी बात नहीं समझा था कि बंटी कैसे अपना हो सकता है? एक बार रेलगाड़ी में कुछ घंटों की मुलाकात में कोई अपनों जैसा कैसे हो जाता है, लेकिन इस के बाद उस ने मुझ से कोई प्रश्न नहीं किया और अपनी पत्रिका में खो गया.

Hindi Story : माटी का प्यार

Hindi Story : फोन की घंटी की आवाज सुन कर मिथिला ने हाथ का काम छोड़ कर चोगा कान से लगाया.

‘मम्मा’ शब्द सुनते ही समझ गईं कि भूमि का फोन है. वह कुछ प्यार से, कुछ खीज से बोलीं, ‘‘हां, बता, अब और क्या चाहिए?’’

‘‘मम्मा, पहले हालचाल तो पूछ लिया करो, इतनी दूर से फोन कर रही हूं. आप की आवाज सुनने की इच्छा थी. आप घंटी की आवाज सुनते ही मेरे मन की बात समझ जाती हैं. कितनी अच्छी मम्मा हैं आप.’’

‘‘अब मक्खनबाजी छोड़, मतलब की बात बता.’’

‘‘मम्मा, ललित के यहां से थोड़ी मूंगफली मंगवा लेना,’’ कह कर भूमि ने फोन काट दिया.

मिथिला ने अपने माथे पर हाथ मारा. सामने होती तो कान खींच कर एक चपत जरूर लगा देतीं. यह लड़की फ्लाइट पकड़तेपकड़ते भी फरमाइश खत्म नहीं करेगी. फरमाइश करते समय भूल जाती है कि मां की उम्र क्या है. मां तो बस, अलादीन का चिराग है, जो चाहे मांग लो. भैयाभाभी दोनों नौकरी करते हैं. कोई और बाजार दौड़ नहीं सकता. अकेली मां कहांकहां दौडे़? गोकुल की गजक चाहिए, प्यारेलाल का सोहनहलवा, सिकंदराबाद की रेवड़ी, जवे, कचरी, कूटू का आटा, मूंग की बडि़यां, पापड़, कटहल का अचार और अब मूंगफली भी. कभी कहती, ‘मम्मा, आप बाजरे की खिचड़ी बनाती हैं गुड़ वाली?’

सुन कर उन की आंखें भर आतीं, ‘तू अभी तक स्वाद नहीं भूली?’

‘मम्मा, जिस दिन स्वाद भूल जाऊंगी अपनी मम्मा को और अपने देश को भूल जाऊंगी. ये यादें ही तो मेरा जीवन हैं,’ भूमि कहती.

‘ठीक है, ज्यादा भावुक न बन. अब आऊंगी तो बाजरागुड़ भी साथ लेती आऊंगी. वहीं खिचड़ी बना कर खिला दूंगी.’

और इस बार आधा किलोग्राम बाजरा भी मिथिला ने कूटछान कर पैक कर लिया है.

कई बार रेवड़ीगजक खाते समय भूमि खयालों में सामने आ खड़ी होती.

‘मम्मी, सबकुछ अकेलेअकेले ही खाओगी, मुझे नहीं खिलाओगी?’

‘हांहां, क्यों नहीं, ले पहले तू खा ले,’ और हाथ में पकड़ी गजक हाथ में ही रह जाती. खयालों से बाहर निकलतीं तो खुद को अकेला पातीं. झट भूमि को फोन मिलातीं.

‘भूमि, तू हमेशा मेरी यादों में रहती है और तेरी याद में मैं. बहुत हो चुका बेटी, अब अपने देश लौट आ. तेरी बूढ़ी मां कब तक तेरे पास आती रहेगी,’ कहतेकहते वह सुबक उठतीं.

‘मम्मा, आप जानती हैं कि मैं वहां नहीं आ सकती, फिर क्यों याद दिला कर अपने साथ मुझे भी दुखी करती हो.’

‘अच्छा बाबा, अब नहीं कहूंगी. ले, कान पकड़ती हूं. अब अपने आंसू पोंछ ले.’

‘मम्मा, आप को मेरी आंखें दिखाई दीं?’

‘बेटी के आंसू ही तो मां की आंखों में आते हैं. तेरी आवाज सब कह देती है.’

‘मम्मा, आंसू पोंछ लिए मैं ने, लेकिन इस बार जब तुम आओगी तो जाने नहीं दूंगी. यहीं मेरे पास रहना. बहुत रह लीं वहां.’

‘ठीक है, पर तेरे देश की सौगातें तुझे कैसे मिलेंगी?’

‘हां, यह तो सोचना पडे़गा. अब आप को तंग नहीं होना पडे़गा. हम भारत से आनलाइन खरीदारी करेंगे. थोड़ा महंगा जरूर पडे़गा पर कोई बात नहीं. आप की बेटी कमा किस के लिए रही है. पता है मम्मा, यहां एक इंडियन रेस्तरां है, करीब 150 किलोमीटर दूर. जिस दिन भारतीय खाना खाने का मन होता है वहीं चली जाती हूं और वहीं एक भारतीय शाप से महीने भर का सामान भी ले आती हूं.’

बेटी की बातें सुन कर मिथिला की आंखें छलछला आईं. उन्हें लगा कि बिटिया भारतीय व्यंजनों के लिए कितना तरसती है. पिज्जाबर्गर की संस्कृति में उसे आलू और मूली का परांठा याद आता है. काश, वह उस के पास रह पातीं और रोज अपने हाथ से बनाबना कर खिला पातीं.

5 साल हो गए यहां से गए हुए, लौट कर नहीं आई. वह ही 2 बार हो आई हैं और अब फिर जा रही हैं. भूमि के विदेश जाने में वह कहीं न कहीं स्वयं को अपराधी मानती हैं. यदि भूमि के विवाह को ले कर वह इतनी जल्दबाजी न करतीं तो ये सब न होता. भूमि ने दबे स्वर में कहा भी था कि मम्मा, थोड़ा सोचने का वक्त दो.

वह तब उबल पड़ी थीं कि तू सोचती रहना, वक्त हाथ से निकल जाएगा. सोचतेसोचते तेरे पापा चले गए. मैं भी चली जाऊंगी. अब नौकरी करते भी 2 साल निकल गए. रिश्ता खुद चल कर आया है. लड़का स्वयं साफ्टवेयर इंजीनियर है. तुम दोनों पढ़ाई में समान हो और परिवार भी ठीकठाक है, अब और क्या चाहिए?

उत्तर में मां की इच्छा के आगे भूमि ने हथियार डाल दिए क्योंकि  वह हमेशा यही कहती थीं कि तू ने किसी को पसंद कर रखा हो तो बता, हम वहीं बात चलाते हैं. भूमि बारबार यही कहती कि मम्मा, ऐसा कुछ भी नहीं है. आप जहां कहोगी चुपचाप शादी कर लूंगी.

भूमि ने मां की इच्छा को सिरआंखों पर रख, जो दरवाजा दिखाया उसी में प्रवेश कर गई, लेकिन विवाह को अभी 2 महीने भी ठीक से नहीं गुजरे थे कि भूमि पर नौकरी छोड़ कर घर बैठने का दबाव बनने लगा और जब भूमि ने नौकरी छोड़ने से इनकार कर दिया तो उस का चारित्रिक हनन कर मानसिक रूप से उसे प्रताडि़त करना शुरू कर दिया गया.

6 महीने मुश्किल से निकल पाए. भूमि ने बहुत कोशिश की शादी को बचाए रखने की, पर नहीं बचा सकी. इसी बीच कंपनी की ओर से उसे 6 माह के लिए टोरंटो (कनाडा) जाने का अवसर मिला. वह टोरंटो क्या गई बस, वहीं की हो कर रह गई और उस ने तलाक के पेपर हस्ताक्षर कर के भेज दिए.

‘मम्मा, अब कोई प्रयास मत करना,’ भूमि ने कहा था,  ‘इस मृत रिश्ते को व्यर्थ ढोने से उतार कर एक तरफ रख देना ज्यादा ठीक लगा. बहुत जगहंसाई हो ली. मैं यहां आराम से हूं. सारा दिन काम में व्यस्त रह कर रात को बिस्तर पर पड़ कर होश ही नहीं रहता. मैं ने सबकुछ एक दुस्वप्न की तरह भुला दिया है. आप भी भूल जाओ.’

कुछ नहीं कह पाईं बेटी से वह क्योंकि उस की मानसिक यंत्रणा की वह स्वयं गवाह रही थीं. सोचा कि थोडे़ दिन बाद घाव भर जाएंगे, फिर सबकुछ ठीक हो जाएगा. इसी उम्मीद को ले कर वह 2 बार भूमि के पास गईं. प्यार से समझाया भी, ‘सब मर्द एक से नहीं होते बेटी. अपनी पसंद का कोई यहीं देख ले. जीवन में एक साथी तो चाहिए ही, जिस से अपना सुखदुख बांटा जा सके. यहां विदेश में तू अकेली पड़ी है. मुझे हरदम तेरी चिंता लगी रहती है.’

‘मम्मा, अब मुझे इस रिश्ते से घृणा हो गई है. आप मुझ से इस बारे में कुछ न कहें.’

विचारों को झटक कर मिथिला ने घड़ी की ओर देखा. 6 बजने वाले हैं. कल की फ्लाइट है. पैकिंग थोड़ी देर बाद कर लेगी. घर को बाहर से ताला लगा और झट रिकशा पकड़ कर ललित की दुकान से 1 किलो मूंगफली, मूंगफली की गजक, गुड़धानी और गोलगप्पे का मसाला भी पैक करा लाईं.

बहू और विनय के आने में अभी 1 घंटा बाकी है. तब तक रसोई में जा सब्जी काट कर और आटा गूंध कर रख दिया. थकान होने लगी. मन हुआ पहले 1 कप चाय बना कर पी लें, फिर ध्यान आया कि विनय और बहू ये सामान देखेंगे तो हंसेंगे. पहले उस सामान को बैग में सब से नीचे रख लें. चाय उन दोनों के साथ पी लेंगी.

बहूबेटे खा पी कर सो गए. उन की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह बेटी के लिए ले जाने वाले सामान को रखने लगीं. ज्यादातर सामान उन्होंने किलो, आधा किलो के पारदर्शी प्लास्टिक बैगों में पैक कराए हैं ताकि कस्टम में परेशानी न हो और वह आराम से सामान चैक करा सकें. भूमि के लिए कुछ ड्रेस और आर्टी- फिशियल ज्वैलरी भी खरीदी थी. उसे बड़ा शौक है.

सारा सामान 2 बैगों में आया. अपना सूटकेस अलग. मन में संकोच हुआ कि विनय और बहू क्या कहेंगे? इतना सारा सामान कैसे जाएगा. जब से आतंक- वादियों ने धमकी दी है चैकिंग भी सख्त हो गई है. भूमि ने तो कह दिया है कि मम्मा, चिंता न करना. अतिरिक्त भार का पेमेंट कर देना. और यदि खोल कर देखा तो…?

उन की इस सोच को अचानक ब्रेक लगा जब विनय ने पूछा, ‘‘मम्मा, आप की पैकिंग पूरी है, कुछ छूटा तो नहीं, वीजा, टिकट और फौरेन करेंसी सहेज कर रख ली?’’

संकोचवश नीची निगाह किए उन्होंने हां में गरदन हिलाई.

अगले दिन गाड़ी में सामान रख सब शाम 5 बजे ही एअरपोर्ट की ओर चल पड़े. रात 8 बजे की फ्लाइट है. डेढ़ घंटा एअरपोर्ट पहुंचने में ही लग जाएगा. फिर काफी समय सामान की चैकिंग और औपचारिकताएं पूरी करने में निकल जाता है. मिथिला रास्ते भर दुआ करती रहीं कि उन के सामान की गहन तलाशी न हो.

लेकिन सोचने के अनुसार सबकुछ कहां होता है. वही हुआ जिस का मिथिला को डर था. बैग खोले गए और रेवड़ी, गजक व दलिए के पैकेट देख कर कस्टम अधिकारी ने पूछा,  ‘‘मैडम, यह सब क्या है?’’

अचानक मिथिला के मुंह से निकला, ‘‘ये जो आप देख रहे हैं, इस देश का प्यार है, यादें हैं, सौगातें हैं. कोई इन के बिना विदेश में कैसे जी सकता है. मेरी बेटी 5 साल में भी इन का स्वाद नहीं भूली है. यदि मेरे सामान का वजन ज्यादा है तो आप कस्टम ड्यूटी ले सकते हैं.’’

मिथिला का उत्तर सुन कर कस्टम अधिकारी ने आंखों से इशारा किया और वह अपने बैगों को ले कर बाहर निकलने लगीं. तभी मन में विचार कौंधा कि कस्टम अधिकारी भी मेरी बेटी की तरह अपने देश को प्यार करता है, तभी मुझे यों जाने दिया.

हालांकि न तो भार अधिक था और न उन के पास ऐसा कोई आपत्तिजनक सामान था जिस पर कस्टम अधिकारी को एतराज होता. उन्होंने स्वयं सारा सामान माप के अनुसार पैक किया था. बैग खोल कर एक रेवड़ी का पैकेट निकाला और दरवाजे से ही अंदर मुड़ीं. बोलीं, ‘‘सर, एक मां का प्यार आप के लिए भी. इनकार मत करिएगा,’’ कहते हुए पैकेट कस्टम अधिकारी की ओर बढ़ाया.

‘‘थैंक्यू, मैडम,’’ कह कर अधिकारी ने पैकेट पकड़ा, आंखों से लगाया और चूम लिया. मिथिला मुसकरा पड़ीं.

Hindi Story : जमानत- क्या अदालत में सुभाष को जमानत मिली

Hindi Story : पढ़ेलिखे व भोलेभाले सुभाष चंद एक सिपाही के कहने मात्र पर उस के साथ थाने चले गए, जहां उन्हें हवालात में बंद कर दिया गया. कानून से अनभिज्ञ सुभाष की पत्नी अपने पति की जमानत लेने के लिए थाने गई, फिर वकील की शरण में पहुंची, और तब अदालत…

‘‘बाबूजी, अपना स्कूटर इधर खड़ा कर दो,’’ स्कूटर से उतरते सुभाष चंद को इशारा करते हुए एक सिपाही ने कहा.

स्कूटर खड़ा कर हकबकाया सा सुभाष चंद सदर थाने की बड़ी और आधुनिक शैली में बनी इमारत में सिपाही के साथ प्रविष्ट हुआ. सुभाष का सामना कभी पुलिस से नहीं पड़ा था. वह थाने कभी नहीं आया था. 2-3 दफा स्कूटर का चालान होने पर ट्रैफिक पुलिस से उस का वास्ता पड़ा था और कोई अनुभव नहीं था.

‘थानाध्यक्ष कक्ष’ लिखे कमरे के अंदर प्रविष्ट होते ही सुभाष का सामना विशाल मेज के पीछे बैठे लाललाल आंखों और लालभभूका चेहरे वाले भारी शरीर के एक पुलिस अधिकारी से हुआ जो देखते ही बोला, ‘‘ले आए.’’

‘‘जी, जनाब.’’

‘‘आप सुभाष चंद वल्द कलीराम, हैड क्लर्क, सांख्यिकी विभाग, निवासी बड़ा महल्ला हो?’’

‘‘जी हां,’’ सकपकाए से सुभाष ने कहा.

‘‘आप ने कल शाम शहर की सीमा पर स्थित देशी शराब के ठेके पर शराब पीने के बाद किसी सुमेर सिंह निवासी रसूलपुर से झगड़ा किया और उस को जान से मारने की धमकी दी थी?’’

इस पर सुभाष चंद ने हैरानी से थानेदार की तरफ देखा और कहा, ‘‘जनाब, मैं न तो शराब पीता हूं, न कभी किसी ठेके पर गया हूं, न ही किसी सुमेर सिंह नाम के आदमी को जानता हूं और न ही कभी रसूलपुर गांव का नाम सुना है.’’

‘‘फिर आप के खिलाफ दरख्वास्त कैसे लग गई?’’ थानेदार ने कुटिलता से मुसकराते हुए कहा.

‘‘मुझे क्या पता? शायद आप को गलत सूचना मिली हो?’’

‘‘हमें गलत सूचना नहीं मिली. आप अपने खिलाफ लगी दरख्वास्त खुद देख लो,’’ थानेदार के इशारे पर एक हवलदार ने फाइल खोल कर कुछ कागज सुभाष चंद को थमा दिए.

चश्मा साफ कर सुभाष ने तहरीर पढ़ी और वह हैरानी और रोष से भर उठा. जो कुछ थानेदार ने कहा वही लिखा था.

‘‘साहब, यह झूठा आरोप है. सरासर किसी की बदमाशी है.’’

‘‘ऐसा सब कहते हैं. आप ऐसा करें, साथ के कमरे में बैठ जाएं. थोड़ी देर में आप के खिलाफ शिकायत करने वाला अपने गवाहों के साथ आएगा तब आप का सामना करवा देंगे.’’

मनोरंजन कक्ष लिखे एक बड़े कमरे में 3-4 सादे कपड़ों में पुलिस वाले टीवी पर कोई फिल्म देख रहे थे और बीचबीच में ठहाके लगा रहे थे. सुभाष चंद को एक कुरसी पर बैठा कर उस को थाने लाया सिपाही बाहर चला गया.

थोड़ी देर बाद सुभाष के मोबाइल पर घंटी बजी. एक कोने में जा कर फोन सुना. उस की पत्नी का फोन था. सिपाही उस को एकदम से ‘आप को थाने में साहब ने बुलाया है’ कह कर ले आया था.

‘‘क्या बात है?’’

‘‘किसी सुमेर सिंह नाम के आदमी ने मेरे खिलाफ शिकायत की है कि मैं ने कल रात शराब पी कर उसे जान से मारने की धमकी दी थी. थानेदार कहता है कि अभी थोड़ी देर के बाद उस से मेरा सामना करवाएगा.’’

‘‘अरे, यह कौन है?’’

‘‘पता नहीं. तुम ऐसा करना अगर 1 घंटे तक मैं न आऊं तो रमेश को साथ ले कर थाने आ जाना.’’

‘‘थाने में?’’ पत्नी के स्वर में घबराहट थी.

‘‘हांहां, थाने में. थाना है कोई फांसीघर नहीं.’’

1 घंटा बीत गया. कोई नहीं आया. थोड़ी देर बाद सुभाष को थाने ले कर आया सिपाही अंदर आया और उसे ले कर ‘स्वागत कक्ष’ लिखे एक कमरे में पहुंचा जहां मौजूद एक एएसआई ने सुभाष को गौर से देखा.

‘‘आप का नाम सुभाष चंद वल्द कलीराम है?’’

‘‘जी, हां.’’

‘‘आप के खिलाफ सुमेर सिंह वल्द फतेह सिंह निवासी रसूलपुर ने शिकायत की है कि आप ने कल रात उस को शराब पी कर जान से मारने की धमकी दी थी.’’

‘‘नहीं जनाब, यह सब झूठ है.’’

‘‘अपनी सफाई में जो भी कहना है, कोर्ट में कहना. आप के खिलाफ झगड़ा करने और शांति भंग करने के आरोप में धारा 107 और 151 में मामला दर्ज किया गया है. आप अपनी जामातलाशी दे दें. आप को हवालात में बंद करना पड़ेगा.’’

‘‘हवालात,’’ सुभाष चंद के चेहरे पर मातमी छा गई.

‘470 रुपए नकद, एक घड़ी, एक अंगूठी, एक रुमाल, एक चमड़े की बैल्ट, एक पैन, एक छोटा कंघा’, इस सारे सामान की सूची बना उस पर सुभाष के हस्ताक्षर करवा सामान एक दराज में बंद कर, ‘एएसआई’ ने सिपाही को इशारा किया.

भारी कदमों से सुभाष उस के साथ बाहर आया. ‘बंदी कक्ष’ लिखे एक जंगले वाले दरवाजे के बाहर आ सिपाही ने भारीभरकम ताला खोला. फिर कुंडी खोल कर बोला, ‘‘जाओ, अंदर जाओ.’’

सुभाष दरवाजे के अंदर चला गया.

‘‘ठहरो, अपना चश्मा मुझे दे दो और जब बाहर निकलो, ले लेना,’’ कहते हुए सिपाही ने उस का चश्मा उतार कर ले लिया.

‘‘अरे, भाई बिना चश्मे के मुझे जरा भी नहीं दिखता.’’

मगर सिपाही उस की बात अनसुनी कर ताला लगा, चला गया. निसहाय सुभाष कमरे में आगे बढ़ा. एक छोटा मटमैला कमरा था जिस में कम पावर का एक बल्ब जल रहा था.

कमरे में दरी बिछी थी. दीवार के साथ टेक लगा कर कई चेहरे बैठे थे. कोई बीड़ी पी रहा था तो कोई सिगरेट. कमरे में कसैला धुआं भरा हुआ था. थोड़ी देर तक सुभाष खड़ा रहा फिर वह आगे बढ़ा तो उस की नाक में सड़ांध  घुसी. उस ने बदबू की दिशा में देखा तो उधर शौचालय था. बदबू असहनीय थी. आराम से बैठे उस ने रुमाल के लिए जेब में हाथ डाला तो रुमाल नहीं था. उसे ध्यान आया कि वह भी जामातलाशी में उस से ले लिया गया था.

तभी मोबाइल की घंटी बजी. मुंशी उस की ऊपरी जेब की तलाशी लेना भूल गया था. वह उठा, शौचालय में गया. फोन पत्नी का था, ‘‘क्या पोजीशन है?’’

‘‘मुझ पर शांति भंग करने और झगड़ा करने का केस बना दिया गया है. इस समय हवालात में बंद हूं. ऐसा कर, रमेश को ले कर यहां आ जा. घबरा मत.’’

आधे घंटे बाद बड़े लड़के के साथ पत्नी टिफिन बाक्स लिए आ गई. वही सिपाही दरवाजे पर आया. सुभाष उठ कर दरवाजे के समीप आया. सिपाही ने दरवाजा खोल टिफिन उसे थमा दिया. पत्नी कभी थाने नहीं आई थी. वह रोंआसी सी थी. एकदम से क्या हो गया था? किसी से कभी कोई झगड़ा नहीं था. फिर यह मामला कैसे बन गया.

सुभाष पत्नी की मनोस्थिति समझ रहा था.

‘‘घबराओ मत, गली में कपड़े प्रैस करने वाला रामू है, तू उस से मिल लेना. वह अनुभवी बुजुर्ग है, कोई न कोई रास्ता बता देगा.’’

स्कूटर बाहर खड़ा था. रमेश स्कूटर चलाना जानता था. सो मम्मी को पीछे बैठा कर वह स्कूटर चला कर ले गया.

रामू ने सारी बात ध्यान से सुनी.

‘‘बिटिया, यह या तो साहब के किसी दफ्तर के साथी की करतूत है या फिर मकानमालिक की शरारत. उन्होंने किसी किराए के बदमाश की मदद से यह शरारत की होगी.’’

‘‘अब हम क्या करें?’’

‘‘धीरज रखें. पहले साहब की जमानत करवाते हैं फिर आगे जो होगा साहब ही देखेंगे.’’

‘‘जमानत?’’ पत्नी को भला कानूनी मामलों की कहां समझ थी?

‘‘जी हां, पहले वकील करना पड़ेगा. पुलिस कल साहब को जब कोर्ट में पेश करेगी तो वह उन की जमानत करवाएगा.’’

‘‘मैं किसी वकील को नहीं जानती,’’ पत्नी सचमुच घबरा गई थी.

‘‘मेरी जानकारी में एक वकील है, अभी उस के पास चलते हैं,’’ पौश कालोनी में वकील साहब की कोठी काफी बड़ी और आलीशान थी.

‘‘आप के पति पढ़ेलिखे हो कर भी भोले हैं. इस तरह सिपाही के साथ थाने नहीं जाना था. सिपाही को 200 रुपए दे देने थे. उस को टाल देना था, बाद में अग्रिम जमानत करवानी थी,’’ सफेद बालोें वाले बुजुर्ग वकील की बात सुभाष की पत्नी को कुछ समझ में आई, कुछ नहीं आई थी.

‘‘आप की फीस क्या है?’’

‘‘5 हजार रुपए और अन्य खर्चे.’’

‘‘ठीक है,’’ पत्नी ने 2 हजार रुपए वकील साहब को थमा दिए.

अगली सुबह पत्नी और बड़ा बेटा नाश्ता लाए थे. सिपाही ने 50 का नोट ले दरवाजा खोल उसे बरामदे में एक स्टूल पर बैठा दिया था. सारी रात विपरीत माहौल और शौचालय की बदबू के चलते सुभाष टिफिन नहीं खोल पाया था. भूखे सुभाष ने बिना नहाए, बिना पेस्ट किए ही मजबूरी में नाश्ता किया.

दोपहर बाद एक जिप्सी में अन्य बंदियों के साथ सुभाष को उपमंडल अधिकारी के कोर्ट में ले जाया गया.

कोर्ट नए सचिवालय में था. एसडीएम साहब 3 बजे आते थे.

सुभाष को दूसरे कैदियों के हाथ के पंजे में पंजा फंसा कर अदालत लाया गया था और अब साहब का इंतजार था.

साढ़े 3 बजे साहब आए. 30-32 साल का चश्माधारी नौजवान एसडीएम था.

‘‘आप का जमानती कौन है?’’ सुभाष को पेश करते ही साहब ने पूछा.

इस पर वकील ने सुभाष की पत्नी को आगे कर दिया. एक सरसरी नजर फाइल में लगे कागजों पर डाल साहब ने सुभाष को कहा, ‘‘ठीक है, जाइए,’’ और चंद मिनटों में जमानत हो गई थी.

अगली पेशी 15 दिन बाद थी. सुभाष, उस की पत्नी, बेटा भी आए थे. साहब शाम को 4 बजे आए. चंटचालाक 100-50 रुपए का नोट थमा अपनी तारीख ले चले गए.

अगली पेशी पर सुभाष अकेला आया. थोड़ी देर इंतजार किया फिर उस ने भी 50 रुपए का नोट थमा पेशी ली और वापस हो लिया.

इस के बाद जैसे यह सिलसिला ही बन गया. 15-20 दिन बाद की पेशी पड़ती. 50 रुपए थमा सुभाष चला जाता.

‘‘ऐसा कब तक चलेगा?’’ पत्नी का सीधा सवाल था.

‘‘पता नहीं.’’

‘‘यह सुमेर सिंह आखिर है कौन?’’

‘‘पता नहीं. वकील का मुंशी बताता है कि इस तरह के आदमी या पार्टी किसी को फंसाने के लिए पुलिस पहले तैयार रखती है.’’

‘‘यह किस की शरारत हो सकती है?’’

‘‘कई जने कहते हैं कि मकान मालिक हम से यह मकान खाली करवाना चाहता है इसलिए उस की शरारत है.’’

‘‘हम मकान खाली कर देते हैं.’’

‘‘जिस ने हम पर यह झूठा मुकदमा बनवाया है क्या उस पर हम कोई मुकदमा नहीं कर सकते?’’

‘‘वकील साहब कहते हैं कि विपरीत मुकदमा करने के लिए आप के पास अपने गवाह होने चाहिए. आप को साबित करना पड़ेगा कि आप शराब नहीं पीते, झगड़ा नहीं करते. फीस और जमाखर्च अलग है.’’

‘‘अब हम क्या करें?’’ पत्नी ने हैरानी से पूछा.

‘‘कुछ नहीं. 6 महीने तक इंतजार करेेंगे. मुकदमे की मियाद पूरी हो जाने पर मुकदमा अपनेआप समाप्त हो जाएगा. विपरीत केस करना संभव है पर ठीक नहीं तो इसे ही नियति मान सब्र कर लेना होगा.’’

6 महीने बाद मुकदमा समाप्त हो गया. सुभाष चंद अपना तबादला करवा कर दूसरे शहर चला गया.

Hindi Story : कच्चे पंखों की फड़फड़ाहट

Hindi Story : उस का मन आनंद के बिना बिलकुल भी नहीं लगता था. दूसरे जिले में तबादले के बाद आनंद भी लावण्या के बगैर अधूरा सा हो गया था. ‘अब तो मेरा मन भी कर रहा है कि नौकरी छोड़ कर आ जाऊं घर वापस,’ आनंद ने भी बुझी सी आवाज में उस से अपने दिल का हाल बताया. अब दिल चाहे जो भी कहे, सरकारी नौकरी भले साधारण ही क्यों न हो, लेकिन आज के जमाने में उस को छोड़ देना मुमकिन न था. इसे आनंद भी समझता था और लावण्या भी. सो, दोनों हमेशा की तरह फोन स्क्रीन के जरीए ही एकदूसरे की आंखों में डूबने की कोशिश करते रहे.

तभी लावण्या बोली, ‘‘लीजिए, सोनू भी बाथरूम से आ गया है, बात कीजिए और डांट सुनिए इस की,’’ कह कर लावण्या ने मोबाइल फोन अपने 13 साल के एकलौते बेटे सोनू को थमा दिया. सोनू अपने पापा को देखते ही शुरू हो गया, ‘‘पापा, आप ने बोला था कि इस बार 15 दिनों के बीच में भी आएंगे… तो क्यों नहीं आए?’’ आनंद प्यार से उस को अपनी मजबूरियां बताता रहा. बात खत्म होने के बाद कमरे में नाइट बल्ब चमकने लगा और लावण्या सोनू को अपने सीने से लगा कर लेट गई. सोनू फिर से जिद करने लगा, ‘‘मम्मी, आज कोई नई कहानी सुनाओ.’’ ‘‘अच्छा बाबा, सुनो…’’ लावण्या ने नई कहानी बुननी शुरू की और उसे सुनाने लगी. नींद धीरेधीरे उन दोनों को जकड़ती चली गई. आधी रात को लावण्या की आंख खुली तो उस ने फिर अपने कपड़े बेतरतीब पाए. साड़ी सामान्य से ज्यादा ऊपर उठी थी. उस ने बैठ कर जल्दी से उसे ठीक किया और सोनू के सिर पर हाथ फेरा. वह निश्चिंत हो कर सो रहा था.

दरवाजा तो बंद था, लेकिन गरमी का मौसम होने के चलते कमरे की खिड़की खुली थी. लावण्या खिड़की के पास जा कर बाहर गलियारे में देखने लगी. नीचे वाले कमरे में 2 छात्र किराए पर रहते थे. कहीं किसी काम से इधर आए न हों… ‘‘कितनी लापरवाह होती जा रही हूं मैं… नींद में कपड़ों का भी खयाल नहीं रहता,’’ सबकुछ ठीक पा कर बुदबुदाते हुए लावण्या बिस्तर पर आ कर लेट गई. इधर कुछ हफ्तों में तकरीबन यह चौथी बार था जब उस को बीच रात में जागने पर अपने कपड़े बेतरतीब मिले. एक दिन सोनू के स्कूल की छुट्टी थी और उन किराएदार लड़कों की कोचिंग की भी. ऐसा होने पर आजकल सोनू बस खानेपीने के समय ही ऊपर लावण्या के पास आता था और फिर नीचे उन्हीं लड़कों के पास भाग जाता था कि भैया यह दिखा रहे हैं, वह दिखा रहे हैं. लावण्या जानती थी कि दोनों लड़के सोनू से खूब घुलमिल चुके हैं. वह निश्चिंत हो कर घर के काम निबटाने लगी.

तभी सोनू हंसता और शोर मचाता हुआ वहां से भागा आया. पीछेपीछे वे दोनों लड़के भी दौड़े चले आए. सोनू बिस्तर पर आ गिरा और वे दोनों उसे पकड़ने लगे. लावण्या ने टोका, ‘‘अरेअरे… यहां बदमाशी नहीं… नीचे जाओ सब…’’ ‘‘ठीक है आंटी…’’ उन में से एक लड़के ने कहा और उस के बाद वे दोनों लड़के सोनू का हाथ पकड़ कर उसे नीचे ले गए. उन तीनों के चले जाने के बाद लावण्या की नजर बिस्तर पर पड़े एक मोबाइल पर गई जो उन दोनों में से किसी का था. लावण्या ने उन्हें बुलाना चाहा, लेकिन वे दोनों जा चुके थे. लावण्या ने वह मोबाइल टेबल पर रखा ही था कि तभी उस की स्क्रीन पर ब्लिंक होती किसी नोटिफिकेशन से उस का ध्यान उस पर गया.

उस ने अनायास ही मोबाइल उठा कर देखा तो कोई वीडियो फाइल डाउनलोड हो चुकी थी. फाइल के नाम से ही उसे शक हो रहा था, सो उस ने उस को ओपन किया. वीडियो देखते ही लावण्या की आंखें फैलती चली गईं. लड़कों ने कोई बेहूदा फिल्म डाउनलोड की थी. उस ने उस मोबाइल फोन पर ब्राउजर ओपन किया तो एड्रैस बार में कर्सर रखते ही सगेसंबंधियों पर आधारित कहानियों के ढेरों सुझाव आने लगे जो उन्होंने पहले सर्च कर रखे थे. उसी समय किसी के सीढि़यों से ऊपर आने की आहट हुई. लावण्या ने जल्दी से मोबाइल बिस्तर पर रख दिया. वही किराएदार लड़का अपना मोबाइल लेने आया था.

उस ने पूछा, ‘‘आंटी, क्या मेरा मोबाइल है यहां?’’ ‘‘हां, पलंग पर है,’’ लावण्या ने थोड़ी झल्लाहट के साथ जवाब दिया लेकिन उस लड़के का ध्यान उस पर नहीं गया और वह मोबाइल ले कर वापस नीचे चला गया. लावण्या को कोई हैरानी नहीं हो रही थी, क्योंकि क्या लड़का और क्या लड़की, ये सब चीजें तो आज स्मार्टफोन के जमाने में आम बात हो चुकी हैं. उसे चिंता होने लगी थी तो बस सोनू के साथ उन लड़कों की बढ़ती गलबहियों की. इस के बाद लावण्या ने सोनू को उन के पास जाने से रोकना शुरू किया. जब वह उन के पास जाना चाहता, तो वह उसे किसी बहाने से उलझा लेती.

इस के बाद भी वह कभी न कभी उन के पास चला ही जाता था. एक रात बिजली नहीं थी और लावण्या के घर का इनवर्टर भी डाउन हो गया था. गरमी के चलते उस की नींद खुल गई और प्यास भी लगने लगी थी. पानी पी आती लेकिन आलस भी हो रहा था. इसी उधेड़बुन में वह चुपचाप लेटी रही. तभी लावण्या को अपनी तरफ सोनू के हाथ की हरकत महसूस हुई. लावण्या को कुछ अलग सी छुअन लगी सो वह यों ही लेटी रही कि देखे आगे क्या होगा. उन हाथों के पड़ावों के बारे में जैसेजैसे लावण्या को पता चलता गया, उस के आश्चर्य की सीमाएं टूटती गईं. उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और प्यास से सूखे मुंह में कसैले स्वाद ने भी अपनी जगह बना ली. जी तो चाहा कि सोनू को उठा कर थप्पड़ मारने शुरू कर दे, लेकिन विचारों के बवंडर ने ऐसा करने नहीं दिया. कुछ देर बाद सोनू ने धीरे से करवट बदली और शांत हो गया.

लावण्या उठ कर बिस्तर पर बैठ गई और अपनी हालत को देखने लगी. अकसर रात में अपने कपड़ों के बिखरने का राज जान कर उस की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे थे. आखिर उन लड़कों का बुरा असर उस के कलेजे के टुकड़े को भी अपनी चपेट में ले गया था. लावण्या सोच रही थी कि उस की परवरिश में आखिर कहां कमी रह गई, जो बाहरी चीजें इतनी आसानी से उस के खून में आ मिलीं? वह उसी हाल में पूरी रात पलंग पर बैठी रही. अगली सुबह नाश्ता बनाते समय लावण्या ने सोनू के सामने अनजान बने रहने की भरसक कोशिश की लेकिन रहरह कर उस के अंदर का हाल उस के शब्दों से लावा बन कर फूटने को उतावला हो जाता और सोनू हैरानी से उस का मुंह ताकने लगता. सोनू के स्कूल चले जाने के बाद लावण्या लगातार अपने मन को मथती रही. आनंद से इस बारे में बात करे या नहीं? अपनी मां को बताए कि दीदी को, वह फैसला नहीं ले पा रही थी. कई दिनों तक लावण्या इसी उधेड़बुन में रही, लेकिन किसी से कुछ कहा नहीं. सोनू से बात करते समय अब उस ने मां वाली गरिमा का ध्यान रखना शुरू कर दिया.

आखिरकार उस के दिल ने फैसला कर लिया कि सोनू उस का जिगर है, उम्र के इस मोड़ पर वह भटक सकता है मगर खो नहीं सकता. इस के अलावा सोनू बहुत कोमल मन का भी था. अपनी छोटी सी गलती के भी पकड़े जाने पर वह काफी घबरा उठता. और यहां तो इतनी बड़ी बात थी. सीधेसीधे उस से इस बारे में कुछ कहना किसी बुरी घटना को न्योता देने के बराबर था. लावण्या ने तय किया कि वह उन जरीयों को तोड़ देगी जो उस के बेटे के कच्चे मन की फड़फड़ाहट को अपने अनुसार हांकना चाह रहे हैं. लावण्या ने उन लड़कों और सोनू के बीच हो रही बातचीत को छिपछिप कर सुनना शुरू किया.

उस का सोचना बिलकुल सही निकला. वे लड़के लगातार सोनू के बचपन को अधपकी जवानी में बदलना चाह रहे थे और उन की घिनौनी चर्चाओं का केंद्र लावण्या होती थी. सोनू फटीफटी आंखों से उन की बातें सुनता रहता था. नए हार्मोंस से भरे उस के किशोर मन के लिए ये अनोखे अनुभव जो थे. लावण्या सबकुछ अपने मोबाइल फोन में रेकौर्ड करती गई. लगातार उन को मार्क करने के बाद एक दिन लावण्या ने अपने संकल्प को पूरा करने का मन बना लिया और उन लड़कों के कमरे में गई. सोनू अभीअभी वहां से निकला था. उसे देख कर दोनों चौंक उठे. एक ने बनावटी भोलेपन से पूछा, ‘‘क्या बात है आंटी? आप यहां…’’

लावण्या ने सोनू के साथ होने वाली उन की बातचीत की वीडियो रेकौर्डिंग चला कर मोबाइल फोन उन की ओर कर दिया. यह देख दोनों लड़के घबरा गए. लावण्या गुस्साई नागिन सी फुफकार उठी, ‘‘अपने बच्चे पर तुम लोगों का साया भी मैं अब नहीं देख सकती. अभी और इसी वक्त यहां से अपना सामान बांध लो वरना मैं ये रेकौर्डिंग पुलिस को दिखाने जा रही हूं.’’ वे दोनों उस के पैरों पर गिर पड़े, पर लावण्या ने उन को झटक दिया और गरजी, ‘‘मैं ने कहा कि अभी निकलो तो निकलो.’’

वे दोनों उसी पल अपना बैग उठा कर वहां से भाग निकले. लावण्या सोनू के पास आई. वह इन बातों से अनजान बैठा कोई चित्र बना रहा था. लावण्या ने उस से पूछा तो बोला कि पूरा होने पर दिखाएगा. चित्र बना कर उस ने दिखाया तो उस में लावण्या और अपना टूटफूटा मगर भावयुक्त स्कैच बनाया था उस ने और लिखा था, ‘मेरी मम्मी, सब से प्यारी.’ लावण्या ने उसे गले लगा लिया और चूमने लगी. उस की आंखों से आंसू बह निकले और दिल अपने विश्वास की जीत पर उत्सव मनाने लगा. उस के कलेजे का टुकड़ा बुरा नहीं था, बस जरा सा भटका दिया गया था जिस को वापस सही रास्ते पर आने में अब देर नहीं थी.

Hindi Story : हैवान

Hindi Story : उन्होंने घड़ी देखी तो सुबह के 4 बजे थे. पूरा कमरा सिगरेट की गंध से भरा हुआ था. उन्हें याद है कि इस से पहले उन्होंने जीवन में 2 बार सिगरेट पी थी पर इस एक रात में वह 4 पैकेट सिगरेट पी गए थे. दरअसल, शाम को अनीता का फोन आने के बाद डा. पटेल इतना आंदोलित हो गए थे कि अपने बीवीबच्चों से काम का बहाना बना कर रात को अपने नर्सिंग होम में ही रुक गए थे. हां, उसी अनीता का फोन आया था जिस के लिए मैं पिछले 5 सालों से अपना घरपरिवार, व्यवसाय, यारदोस्त, यहां तक कि अपने 2 मासूम बच्चों को भी भूले बैठा था. उसी अनीता के जहर बुझे शब्द अब भी मेरे कानों में गूंज रहे थे, ‘तुम ने जो कुछ किया वह सब एक सोचीसमझी योजना के तहत किया है. तुम इनसान नहीं, हैवान हो.

मेरे देवता समान पति को तुम ने बरबाद कर दिया.’ डा. पटेल सोच रहे थे कि बरबाद तो मैं हुआ, समाज में मेरी बदनामी हुई, शारीरिक रूप से अपंग मैं हुआ, प्रोफेशनल रूप से जमीन पर मैं आ गया, और वह सिर्फ अनीता की खातिर, फिर भी उस का पति देवता और मैं हैवान. इसी के साथ डा. पटेल के दिमाग में पिछले कुछ सालों की घटनाएं न्यूजरील की तरह उभरने लगीं. मैं डा. पटेल. इसी उदयपुर में पलाबढ़ा और यहीं से सर्जरी में एम.एस. करने के बाद सरकारी नौकरी में न जा कर अपना निजी नर्सिंग होम खोला. छोटा शहर, काम करने की लगन और कुछ मेरे मिलनसार व्यक्तित्व ने मिल कर मरीजों पर इस कदर असर छोड़ा कि 3-4 साल के भीतर ही मेरा नर्सिंग होम शहर का नंबर एक नर्सिंग होम कहलाने लगा था.

शहर और आसपास के डाक्टर भी मेरे नर्सिंग होम में सर्जरी के लिए अपने मरीजों को पूरे विश्वास के साथ भेजने लगे. मेरी पत्नी उदयपुर विश्वविद्यालय में लेक्चरर थी, हर तरह से सुखी, संतुष्ट जीवन गुजर रहा था कि अनीता से मेरी मुलाकात हो गई. अनीता मेरे ही एक नजदीकी दोस्त गजेश की बीवी थी. गजेश रामकरण अंकल का बेटा था और रामकरण अंकल के एहसानों तले मैं पूरी तरह से दबा हुआ था. यह बात तब की है जब अपने नर्सिंग होम को जमाने के लिए मुझे कुछ सर्जरी के उपकरण खरीदने के लिए एक बैंक गारंटर की जरूरत थी. ऐसे में काम आए मेरी पत्नी के दूर के एक रिश्तेदार रामकरण अंकल, जो उदयपुर में ही शिक्षा विभाग में क्लर्क थे. रामकरण अंकल ने बैंक गारंटर बन कर मेरी समस्या को हल किया था और मैं यह कभी न भूल सका कि इसी बैंक गारंटी की वजह से मेरा यह नर्सिंग होम स्थापित हो पाया जोकि बाद में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा.

रामकरण अंकल का बेटा गजेश एक तेजतर्रार, महत्त्वाकांक्षी नौजवान था जिसे पिता ने जोड़तोड़ कर के डिगरी कालिज में तकनीशियन की नौकरी दिलवा दी थी. रामकरण अंकल द्वारा बैंक गारंटी दिए जाने के बाद गजेश का मेरे नर्सिंग होम में आनाजाना बहुत बढ़ गया और अपने कालिज के बजाय वह अपना आधा दिन मेरे नर्सिंग होम में गुजारता था. वैसे इस के पीछे भी एक कारण था जो मुझे बाद में पता चला था, और वह था अनीता से उस का अफेयर. जी हां, इसी अनीता से जिस के आज के फोन के बाद मैं अपने अतीत में झांकने को मजबूर हुआ हूं. अनीता गजेश की रिश्तेदारी में ही एक खूबसूरत मृगनयनी थी जो उसी डिगरी कालिज से एम.फिल. कर रही थी, जिस में गजेश तकनीशियन था. अपने पिता के पैसे के बल पर मोटरसाइकिल पर घूमने और अकड़ कर रहने वाले गजेश पर अनीता ऐसी फिदा हुई कि वह अपने घर वालों के सख्त विरोध के बावजूद गजेश के साथ प्रेम बंधन में बंध गई. मुझे तो बाद में पता चला कि यह प्रेम की लता भी मेरे ही नर्सिंग होम में पलीबढ़ी और परवान चढ़ी थी. और प्रेम का यह खेल तब शुरू होता था जब मैं दोपहर में खाना खाने घर जाता था. गजेश तब मेरे वापस आने तक अनीता को वहीं नर्सिंग होम में ही बुला लेता था और दोनों कबूतर की तरह तब तक गुटरगूं करते रहते थे.

मुझे जब यह सब पता चला तो बुरा लगा था लेकिन गजेश की खुशी को ही उस समय मैं ने अपनी खुशी समझा और रामकरण अंकल पर दबाव बना कर मैं ने उन दोनों के प्रेम को विवाह के अंजाम तक पहुंचाया था. दरअसल, अनीता के घर वालों की जिद को देखते हुए रामकरण अंकल ने भी गजेश की शादी कहीं और करने का मन बना लिया था. और गजेश को भी अपनी इज्जत का वास्ता दे कर तैयार कर लिया था, जबकि अनीता के घर वाले अपनी एम.फिल. कर रही बेटी के भविष्य को देखते हुए मात्र एक तकनीशियन और वह भी सिर्फ एक स्नातक, को उस के लायक न मानते थे. गजेश महत्त्वाकांक्षी था और अपनी महत्त्वाकांक्षा के चलते एक बार वह शेयर बाजार में 50 हजार की रकम डुबो चुका था. इस के बाद भी गजेश ने 2-3 ऐसे बिजनेस अपने पुराने दोस्तों के साथ मिल कर किए थे जिस का ‘कखग’ भी वह नहीं जानता था. नतीजा उस घुड़सवार जैसा ही हुआ था जो पहली बार घुड़सवारी करता है.

इस तरह अपने पिता के लगभग 2 लाख रुपए गजेश डुबो चुका था. मजे की बात यह है कि मेरे साथ लगभग आधा दिन गुजारने वाले गजेश ने अपने इन कारनामों को भी मुझ से छिपा कर अंजाम दिया था. मुझे तो तब पता चला जब तकाजे वाले गजेश को ढूंढ़ते हुए मेरे नर्सिंग होम के चक्कर लगाते नजर आए. एक दिन मैं ने गजेश को अपने पास बैठा कर कहा था, ‘यह सब क्या है गजेश, अगर तुम्हें कोई काम करना ही था तो पहले मुझ से सलाह ले ली होती. बड़े होने के नाते कुछ अनुभव तो मैं भी रखता हूं, कोई अच्छी सलाह ही तुम्हें देता.’ गजेश ने उस दिन अपनी महत्त्वाकांक्षा फिर मेरे सामने दोहराई थी कि वह सारी उम्र तकनीशियन बन कर नहीं सड़ना चाहता है, बल्कि किसी व्यापार के जरिए धन कमा कर बहुत बड़ा आदमी बनना चाहता है. उस की योजना के बारे में पूछने पर गजेश ने मुझे बताया था कि यह शहर विस्तार के पथ पर अग्रसर है तो क्यों न हम इस नर्सिंग होम को ‘अस्पताल शृंखला’ के रूप में फैलाएं.

एक बार तो मैं ने गजेश की योजना को उस की कल्पना की कोरी उड़ान बता कर नजरअंदाज कर दिया लेकिन जब उस ने यह बताया कि वह शहर से 10 किलोमीटर दूर एक नई निर्माणाधीन कालोनी में सस्ते में जगह ले चुका है और अगर मैं अपना नाम दे कर अनीता को साथ ले कर इस दिशा में कदम उठाऊं तो भविष्य में उस के लिए बहुत अच्छा रहेगा. इस प्रस्ताव पर मैं ने गंभीरता से सोचा था. एक तो मैं अपनी स्थिति से पूर्णतया संतुष्ट था, दूसरे, रामकरण अंकल के एहसानों का कुछ बदला चुकाने का मौका देख कर मैं ने हामी भर दी. तुरंत युद्धस्तर पर भवननिर्माण का काम शुरू हो गया और अब से ठीक 5 साल पहले वह घड़ी भी आ गई थी जब विधिवत ‘पटेल गु्रप्स आफ हास्पिटल्स’ अस्तित्व में आया था, जिस का मैनेजिंग डायरेक्टर मैं ने अनीता को बनाया था.

बस, यहीं से शुरू होती है मेरी चाहत की कहानी, कदम दर कदम धोखे की, जो आज इस अंजाम पर पहुंची है. गजेश के साथ यह तय हुआ कि मैं अनीता को अपने साथ रख कर डेढ़ साल तक उसे अस्पताल मैनेजमेंट के गुर सिखाऊंगा जिस से कि वह सबसेंटर को पूरी तरह संभाल सके और मैं घूमघूम कर अपनी शाखाओं को संभालता रहूंगा. मैं शुरू से ही अपने इस काम में पूरे उत्साह से लग गया. अपने हर डाक्टर को अनीता से मिलवाया, किस को कैसे हैंडल करना है, इस के गुर बताए, यहां तक कि मैं खुद परदे के पीछे हो गया और सामने परदे पर अनीता की छवि पेश करने लगा.

मुझ पर उसे आगे बढ़ाने का जैसे जनून सा सवार हो गया था. मैं चाहने लगा था कि दुनिया अनीता को शहर की नंबर वन बिजनेस लेडी के रूप में जाने, क्योंकि उस ने मुझे अपनी यही चाहत बताई थी और उस की चाहत को पूरा करना मैं ने अपना लक्ष्य बना लिया था. अनीता की ओर से मुझे पहला धक्का तब लगा जब 6 महीने बाद उस ने यह बताया कि वह गर्भवती है. न जाने क्यों पहली बार मैं अपने को ठगा सा महसूस करने लगा. कहां तो मैं कल्पना कर रहा था कि साल भर में वह मेरे कंधे से कंधा मिला कर इस अस्पताल शृंखला को आगे बढ़ाने में मेरी मदद करेगी और कहां अभी से वह परिवार बढ़ाने में ही अपना सुख देख रही है, जबकि उस की बड़ी बच्ची अभी मात्र डेढ़ साल की ही थी.

हालांकि मुझे यह सोचने का हक नहीं था मगर उस से भावनात्मक रूप से शायद मैं इतना जुड़ गया था कि अपने सिवा किसी और से उस के रिश्ते को भी नकारने लगा था. अब तक अनीता सिर्फ दोपहर तक ही मेरे साथ रहती थी, जबकि मैं चाहता था कि वह सुबह से शाम तक मेरे साथ रहे और अस्पताल के संचालन में मेरी तरह वह भी पूरी डूब जाए. मैं ने किसी तरह से यह कड़वा घूंट हजम किया ही था कि अनीता ने एक नई योजना बना ली. उस के कहने पर मैं ने अपनी अस्पताल शृंखला को कंप्यूटरी- कृत किया और अब वह चाहती थी कि स्वयं कंप्यूटर सेंटर जा कर कंप्यूटर सीखे. मैं ने उसे समझाया कि अभी तुम अस्पताल में 5-6 घंटे ही दे पाती हो, कंप्यूटर सीखने जाओगी तो यह समय और भी कम हो जाएगा, और फिर तुम्हें कंप्यूटर सीख कर करना भी क्या है. लेकिन उस की जिद के आगे मेरी एक न चली और अब अस्पताल में उस का समय केवल 2 घंटे का ही रह गया. मैं ने दिल को यह सोच कर तसल्ली दी कि 6 महीने बाद तो अनीता मुझे पूरा समय देगी ही, लेकिन तभी उस ने एक बेटी को जन्म दिया और 3 महीने के लिए वह घर बैठ गई.

शहर में पहला फैशन डिजाइनिंग कोर्स खुला तो अनीता ने नर्सिंग होम के कामों में मुझे सहयोग करने के बजाय 2 साल का डिजाइनिंग कोर्स करने की जिद पकड़ ली और मैं ने उस की यह इच्छा भी पूरी की. धीरेधीरे मैं उस के इस नए काम में इतना डूब गया कि मेरे मिलने वाले मजाक में मुझे टेलर मास्टर कहने लगे. ड्रेस डिजाइनिंग के कोर्स में अनीता के फर्स्ट आने के जनून में मैं इतना खो गया कि अब अपने अस्पताल को एक जूनियर सर्जन के हवाले कर के अनीता के साथ घूमता, कभी उसे क्लास में ले जाता तो कभी प्रेक्टिकल के लिए कपड़ा, धागे, सलमेसितारे लेने बाजार के चक्कर काटने लग जाता. नतीजा, मेरा बिजनेस घट कर आधा रह गया, लेकिन मैं न चेता क्योंकि तब मुझ पर अनीता का नशा छाया हुआ था. मेरी एकमात्र चाहत यही थी कि अनीता जिस क्षेत्र में भी जाए, नंबर वन रहे और वह दुनिया से कहे कि देखो, यह वह इनसान है जिस के कारण आज मैं तरक्की की बुलंदी पर हूं. जब वह एकांत में मुझे यह श्रेय दे कर कहती कि मैं उस का सबकुछ हूं तो मैं फूला नहीं समाता था. और इसी तरह की एक भावनात्मक घड़ी में एकदिन वह समर्पित भी हो गई. आखिर वह दिन आया जब अनीता को डिजाइनिंग सेंटर द्वारा आयोजित एक शानदार समारोह में बेस्ट फैशन डिजाइनर की उपाधि हासिल हुई.

मुझे धक्का तो उस दिन लगा जब मुझे उस समारोह में अपने साथ ले जाने लायक उस ने न समझा. अगले दिन के अखबार भी मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे. शहर की बेस्ट फैशन डिजाइनर अनीता ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने पति को दिया, जिन के ‘मार्गदर्शन’ और ‘सहयोग’ के बिना वह यह उपलब्धि हासिल न कर पाती. उस दिन मुझे पहली बार लगा कि मैं सिर्फ एक सीढ़ी मात्र हूं जिस पर पैर रख कर अनीता सफलता के पायदान चढ़ना चाहती है और इस काम में उस के पति गजेश का उसे पूरा समर्थन हासिल है. होता भी क्यों न. मुझ जैसा एक काठ का उल्लू जो उसे मिल गया था, जिस के बारे में वह समझ चुकी थी कि मैं उस की किसी भी इच्छा के खिलाफ नहीं जा सकता था.

उस की सब इच्छाएं मैं ने पूरी कीं और जब श्रेय लेने की बारी आई तो पतिदेव सामने आ गए. अब मैं अंदर ही अंदर घुटने लगा, किसी से कुछ कह सकता नहीं था क्योंकि मैं ने अपनी बीवी तक को इस जनून के चलते पिछले 3 साल से अनदेखा कर रखा था और हमारे बीच के संबंध तनावपूर्ण नहीं तो कम से कम मधुर भी नहीं रह गए थे. वह पढ़ीलिखी समझदार औरत थी लेकिन सबकुछ देखजान कर भी चुप थी, तो वजह अनीता का रामकरण अंकल की बहू होना था, जिसे वह अपने पिता के समान ही मानती थी. अनीता की बेवफाई से टूटा मैं अपने दर्द किस के साथ बांटता, क्योंकि घरपरिवार, नातेरिश्तेदार, यारदोस्त सब तो मुझ से दूर हो गए थे. ऐसे मौके पर मैं नशे की गोलियों का सहारा लेने लगा.

डाक्टर होने की वजह से मुझे ये गोलियां सहज उपलब्ध थीं. धीरेधीरे हालत यह हो गई कि मैं अस्पताल में सुबह ही नशे में गिरतापड़ता पाया जाने लगा. घर पर भी नशे की झोंक में अनीता का गुस्सा मैं अपने बीवीबच्चों पर निकालने लगा और धीरेधीरे बच्चे मुझ से दूर होने लगे. नशे की मेरी लत अब और भी बढ़ गई थी. तभी एक दिन सुबह उठने पर मुझे लगा कि मेरे दाएं हाथ ने लकवे के कारण काम करना बंद कर दिया है, मैं अपाहिज हो गया. 2 दिन तो मैं ने शौक की स्थिति में गुजारे लेकिन फिर इसे ही अपनी नियति मान कर काम पर आना शुरू कर दिया. नए रखे कारचालक की मदद से कार में बैठ कर अस्पताल आ जाता. सर्जरी के लिए तो अब मैं पूरी तरह से अपने जूनियर सर्जन पर निर्भर हो गया, लेकिन दिल में फिर भी एक चाह थी कि शायद अब अनीता आएगी और गंभीरतापूर्वक अस्पताल को संभालेगी.

मेरी यह हसरत कभी पूरी न हो पाई. हां, मेरी बीमारी का सहारा ले कर अस्पताल में गजेश की दखलंदाजी बढ़ती गई. उस दिन तो हद ही हो गई जब एक पार्टी में मेरे सीनियर डा. हेमेंद्र ने मेरा परिचय किन्हीं मि. सिंघवी से ‘पटेल गु्रप्स आफ हास्पिटल्स’ के रूप में करवाया तो सिंघवी अविश्वास से मेरी तरफ देखते हुए कहने लगे कि उस के मालिक तो मेरे दोस्त मि. गजेश हैं, ये कौन हैं? दूसरा झटका मुझे गजेश के पड़ोसी वर्माजी ने यह पूछ कर दिया कि और आप भी गजेशजी के अस्पताल में कार्यरत हैं? मैं दंग रह गया. अपने ही अस्पताल में मैं अपरिचित हो गया. मेरी आंखें खुलीं, लेकिन अभी भी अनीता के प्यार के खुमार ने जकड़ रखा था मुझे, हालांकि वह अब मुझ से खिंची सी रहने लगी थी. इसी दौरान मेरे अस्पताल में एक मरीज की मौत को ले कर हंगामा मच गया. शहर के सभी अखबारों ने इस घटना को नमकमिर्च लगा कर छापा. इस घटना के बाद मेरे रहेसहे व्यापारिक संबंध भी कन्नी काटने लगे और व्यावसायिक दृष्टि से मैं धरातल पर आ गया. अब अनीता ने नजरें बिलकुल फेर लीं और खुलेआम मेरी बरबादी का जिम्मेदार वह मुझे ही बताने लगी.

उस वक्त तो मेरी हैरानी की सीमा न रही जब उस ने मुझे कहा कि पिछले कई सालों से उस के पति गजेश ने अस्पताल को संभाल रखा था, वरना तुम्हारी वजह से तो यह अस्पताल चलने से पहले ही बंद हो जाता. आज शाम को एक छोटी सी बात पर गजेश बदतमीजी पर उतर आया और मेरे कर्मचारियों के सामने वह चिल्ला- चिल्ला कर कहने लगा कि पिछले कई सालों से मैं तुम्हें सहन कर रहा हूं. यह सुन कर मैं सन्न रह गया, लेकिन फिर मैं ने संभल कर कहा, ‘मेरे दोस्त, तुम वाकई मुझे सहन कर रहे हो तो अब कोई मजबूरी नहीं है मुझे सहन करने की, अब तो मैं अपाहिज हो चुका हूं.’ गजेश चीख कर बोला, ‘तू मुझ से कह दे, मैं कल से तेरे अस्पताल में झांकूंगा भी नहीं.’

मैं ने कहा, ‘कल किस ने देखा है, मैं आज ही कह रहा हूं,’ वह तुरंत मुड़ा और निकल गया वहां से, जैसे कि वह यहां से जाने का बहाना ही तलाश रहा हो. उस के जाने के घ्ांटे भर बाद अनीता का फोन आया, ‘तुम ने जो कुछ किया वह सब एक सोचीसमझी स्कीम के तहत किया. तुम्हें मेरा शरीर पाना था सो वह तुम पा गए. तुम इनसान नहीं, हैवान हो. मेरे देवता समान पति को तुम ने बरबाद कर दिया.’ अनीता के कहे ये शब्दमुझे अतीत की इन कड़वी यादों में झांकने को मजबूर कर रहे थे और मैं अब भी यही सोच रहा हूं कि प्लान से मैं चला या गजेश, हैवान मैं हुआ या गजेश, उत्तर आप ही दें, न्याय आप ही करें.

लेखक-  डा. पी.के. सरीन

Hindi Story : जानलेवा चुनौती

Hindi Story : यह कहानी बंटवारे से पहले अंगरेजी राज की है. उस समय लोगों के स्वास्थ्य बहुत अच्छे हुआ करते थे. बीड़ीसिगरेट, वनस्पति घी का प्रयोग नहीं हुआ करता था. उस जमाने के लोग बहुत निडर होते थे. हत्या, डकैती की कोई घटना हो जाती थी तो पुलिस और जनता उस में रुचि लिया करती थी. गांवों में पुलिस आ जाती तो पूरे गांव में खबर फैल जाती कि थाना आया हुआ है.

एक अंगरेज डिप्टी कमिश्नर इंग्लैंड से रावलपिंडी स्थानांतरित हो कर आया था. जब भी कोई नया अंगरेज अधिकारी आता तो उसे उस इलाके की पूरी जानकारी कराई जाती थी, जिस से वह अच्छा कार्य कर के अपनी सरकार का नाम ऊंचा कर सके. उस अंगरेज डिप्टी कमिश्नर को बताया गया कि भारत में अनोखी घटनाएं होती हैं, जिन में डाके और चोरियां शामिल हैं. अपराधियों की खोज करना बहुत कठिन होता है. कई घटनाएं ऐसी होती हैं कि सुन कर हैरानी होती है.

नए अंगरेज डिप्टी कमिश्नर ने एसपी से कहा कि मेरे बंगले पर 24 घंटे पुलिस की गारद रहती है साथ ही 2 खूंखार कुत्ते भी. इस के अलावा मेरे इलाके में पुलिस भी रहती है. रात भर लाइट जलती है, क्या ऐसी हालत में भी चोर मेरे घर में चोरी कर सकता है?

एसपी ने जवाब दिया कि ऐसे में भी चोरी की संभावना हो सकती है. अंगरेज डिप्टी कमिश्नर ने कहा, ‘‘मैं इस बात को नहीं मानता, इतनी सावधानी के बावजूद कोई चोरी कैसे कर सकता है?’’

एसपी ने कहा, ‘‘अगर आप आजमाना चाहते हैं तो एक काम करें. एक इश्तहार निकलवा दें, जिस में यह लिखा जाए कि अंगरेज डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर अगर कोई चोरी कर के निकल जाए, तो उसे 500 रुपए का नकद ईनाम दिया जाएगा. अगर वह पुलिस या कुत्तों द्वारा मारा जाता है तो अपनी मौत का वह स्वयं जिम्मेदार होगा. अगर वह मौके पर पकड़ा या मारा नहीं गया तो पेश हो कर अपना ईनाम ले सकता है. उसे गिरफ्तार भी नहीं किया जाएगा और न ही कोई सजा दी जाएगी.’’

डिप्टी कमिश्नर ने एसपी की बात मान ली. इश्तहार छपा कर पूरे शहर में लगा दिए गए. इश्तहार निकलने के 2 महीने बाद यह बात उड़तेउड़ते चकवाल गांव भी पहुंची. उस जमाने में गांवों के लोग शाम को चौपालों पर एकत्र हो कर गपशप किया करते थे. चकवाल की एक ऐसी चौपाल पर अमीर नाम का आदमी बैठा हुआ था, जो 10 नंबरी था.

उस ने वहीं डिप्टी कमिश्नर के इश्तहार वाली बात सुनी. उस ने लोगों से पूछा कि 2 महीने बीतने पर भी वहां चोरी करने कोई नहीं आया क्या? एक आदमी ने उसे बताया कि पिंडी से आए एक आदमी ने बताया था कि उस बंगले में किसी की हिम्मत नहीं है जो चोरी कर सके. वहां चोरी करने का मतलब है अपनी मौत का न्यौता देना.

अमीर ने उसी समय फैसला कर लिया कि वह उस बंगले में चोरी जरूर करेगा. अंगरेज डिप्टी कमिश्नर को वह ऐसा सबक सिखाएगा कि वह पूरी जिंदगी याद रखेगा. उस ने अपनी योजना के बारे में सोचना शुरू कर दिया.

कुत्तों के लिए उस ने बैलों के 2 सींग लिए और देशी घी की रोटियों का चूरमा बना कर उन सींगों में इस तरह से भर दिया कि कुत्ते कितनी भी कोशिश करें, रोटी न निकल सकें. उस जमाने में रेल के अलावा सवारी का कोई साधन नहीं था. गांव के लोग 30-40 मील तक की यात्रा पैदल ही कर लिया करते थे.

चूंकि अमीर 10 नंबरी था इसलिए कहीं बाहर जाने से पहले इलाके के नंबरदार से मिलता था. इसलिए अमीर सुबह जा कर उस से मिला, जिस से उसे लगे कि अमीर गांव में ही है. चकवाल से रावलपिंडी का रास्ता ज्यादा लंबा नहीं था. अमीर दिन में ही पैदल चल कर डिप्टी कमिश्नर की कोठी के पास पहुंच गया.
उस ने संतरियों को कोठी के पास ड्यूटी करते हुए देखा. बंगले के बाहर की दीवार आदमी की कमर के बराबर ऊंची थी. बंगले के अंदर संतरों के पेड़ थे, और बड़ी संख्या में फूलों के पौधे भी थे.

बंगले के चारों ओर लंबेलंबे बरामदे थे, बरामदे के 4-4 फुट चौड़े पिलर थे. अमीर को अंदर जा कर कोई भी चीज चुरानी थी और यह साबित करना था कि भारत में एक ऐसी भी जाति है, जो बहुत दिलेर है और जान की चिंता किए बिना हर चैलेंज कबूल करने के लिए तैयार रहती है.

जब आधी रात हो गई तो वह बंगले की दीवार से लग कर बैठ गया और संतरियों की गतिविधि देखने लगा. जिन सींगों में घी लगी रोटियों का चूरमा भरा था, उस ने वे सींग बड़ी सावधानी से अंदर की ओर रख दिए.

वह खुद दीवार से 10-12 गज दूर सरक कर बैठ गया. कुत्तों को घी की सुगंध आई तो वे सींगों में से चूरमा निकालने में लग गए. फिर दोनों कुत्ते सींगों को घसीटते हुए काफी दूर अंदर ले गए.

अब अमीर ने संतरियों को देखा, वे 4 थे. बरामदे में इधर से उधर घूमते हुए थोड़ीथोड़ी देर के बाद एकदूसरे को क्रौस करते थे. संतरी रायफल लिए हुए थे और उन्हें ऐसा लग रहा था कि 2 महीने से भी ज्यादा बीत चुके हैं. अब किसी में यहां आने की हिम्मत नहीं है. वैसे भी वह थके हुए लग रहे थे.

अमीर दीवार फांद कर पौधों की आड़ में बैठ गया. वह ऐसे मौके की तलाश में था जब संतरियों का ध्यान हटे और वह बरामदे से हो कर अंदर चला जाए. उसे यह मौका जल्दी ही मिल गया. क्रौस करने के बाद जब संतरियों की पीठ एकदूसरे के विपरीत थी, अमीर जल्दी से कूद कर बरामदे के पिलर की आड़ में खड़ा हो गया.

अमीर फुर्तीला था. दौड़ता हुआ ऐसा लगता था, मानो जहाज उड़ा रहा हो. उसे यकीन था कि काम हो जाने के बाद अगर वह बंगले के बाहर निकल गया तो संतरियों का बाप भी उसे पकड़ नहीं पाएगा.

दूसरा अवसर मिलते ही वह कमरे का जाली वाला दरवाजा खोल कर कमरे में पहुंच गया. लकड़ी का दरवाजा खुला हुआ था. चारों ओर देख कर वह बंगले के बीचों बीच वाले कमरे के अंदर पहुंचा. उस ने देखा कमरे के बीच में बहुत बड़ा पलंग था. उस पर एक ओर साहब सोया हुआ था और दूसरी ओर उस की मेम सो रही थी. मध्यम लाइट जल रही थी.

कमरे में लकड़ी की 2-3 अलमारियां थीं, चमड़े के सूटकेस भी थे. उस ने एक सूटकेस खोला, उस में चांदी के सिक्के थे. उस ने एकएक कर के सिक्के अपनी अंटी में भरने शुरू कर दिए. जब अंटी भर गई तो उस ने मजबूती से गांठ बांध ली. वह निकलने का इरादा कर ही रहा था कि उस की नजर सोई हुई मेम के गले की ओर गई, जिस में मोतियों की माला पड़ी थी.

मध्यम रोशनी में भी मोती चमक रहे थे. उस ने सोचा अगर यह माला उतारने में सफल हो गया तो चैलेंज का जवाब हो जाएगा. मेम और साहब गहरी नींद में सोए हुए थे. उस ने देखा कि माला का हुक मेम की गरदन के दाईं ओर था. उस ने चुपके से हुक खोलने की कोशिश की. हुक तो खुल गया, लेकिन मेम ने सोती हुई हालत में अपना हाथ गरदन पर फेरा और साथ ही करवट बदल कर दूसरी ओर हो गई.

अब माला खुल कर उस की गरदन और कंधे के बीच बिस्तर पर पड़ी थी, अमीर तुरंत पलंग के नीचे हो गया. 5 मिनट बाद उसे लगा कि अब मेम फिर गहरी नींद में सो गई. उस ने पलंग के नीचे से निकल कर धीरेधीरे माला को खींचना शुरू कर दिया. माला निकल गई. उस ने माला अपनी लुंगी की दूसरी ओर अंटी में बांध ली.

अमीर जाली वाले दरवाजे की ओट में देखता रहा कि संतरी कब इधरउधर होते हैं. उसे जल्दी ही मौका मिल गया. वह जल्दी से खंभे की ओट में खड़ा हो कर बाहर निकलने का मौका देखने लगा. कुत्ते अभी तक सींग में से रोटी निकालने में लगे हुए थे.

उसे जैसे ही मौका मिला, वह दीवार फांद कर बाहर की ओर कूद कर भागा. संतरी होशियार हो गए और जल्दबाजी में अंटशंट गोलियां चलाने लगे. लेकिन उन की गोली अमीर का कुछ नहीं बिगाड़ सकीं. वह छोटे रास्ते से पगडंडियों पर दौड़ता हुआ रात भर चल कर अपने घर पहुंच गया.

बाद में अमिर को पता लगा कि गोलियों की आवाज सुन कर मेम और साहब जाग गए थे. जागते ही उन्होंने कमरे में चारों ओर देखा. सिक्कों की चोरी को उन्होंने मामूली घटना समझा. लेकिन जब मेम साहब ने अपनी माला देखी तो उस ने शोर मचा दिया. वह कोई साधारण माला नहीं थी, बल्कि अमूल्य थी.

एसपी साहब और नगर के सभी अधिकारी एकत्र हो गए. उन्होंने नगर का चप्पाचप्पा छान मारा, लेकिन चोर का पता नहीं लगा. अंगरेज डिप्टी कमिश्नर हैरान था कि इतनी सिक्योरिटी के होते हुए चोरी कैसे हो गई. उस ने कहा कि चोर हमारी माला वापस कर दे और अपनी 5 सौ रुपए के इनाम की रकम ले जाए. साथ में उसे एक प्रमाणपत्र भी मिलेगा.

इश्तहार लगाए गए, अखबारों में खबर छपाई गई लेकिन 6 माह गुजरने के बाद भी चोर सामने नहीं आया. दूसरी तरफ मेमसाहब तंग कर रही थी कि उसे हर हालत में अपनी माला चाहिए. माला की फोटो हर थाने में भिजवा दी गई. साथ ही कह दिया गया कि चोर को पकड़ने वाले को ईनाम दिया जाएगा.

उधर अमीर चोरी के पैसों से अपने घर का खर्च चलाता रहा, उस समय चांदी का एक रुपया आज के 2-3 सौ से ज्यादा कीमत का था. अमीर के घर में पत्नी और एक बेटी थी, बिना काम किए अमीर को घर बैठे आराम से खाना मिल रहा था. उस ने सोचा, पेश हो कर अपने लिए क्यों झंझट पैदा करे, हो सकता है उसे जेल में डाल दिया जाए.

उस की पत्नी ने माला को साधारण समझ कर एक मिट्टी की डोली में डाल रखा था. एक दिन उस ने उस माला के 2 मोती निकाले और पास के एक सुनार के पास गई. उस ने सुनार से कहा कि उस की बेटी के लिए 2 बालियां बना दे और उन में एक मोती डाल दे. सुनार ने उन मोतियों को देख कर अमीर की पत्नी से कहा, ‘‘यह मोती तो बहुत कीमती हैं. तुम्हें ये कहां से मिले?’’

उस ने झूठ बोलते हुए कहा, ‘‘मेरा पति गांव के तालाब की मिटटी खोद रहा था, ये मोती मिट्टी में निकले हैं. मैं ने सोचा बेटी के लिए बालियां बनवा कर उस में ये मोती डाल दूं, इसलिए तुम्हारे पास आई हूं.’’ सुनार ने उस की बातों पर यकीन कर के बालियां बना दीं. उस ने अपनी बेटी के कानों में बालियां पहना दीं.

दुर्भाग्य से एक दिन अमीर की बेटी अपने घर के पास बैठी रो रही थी. तभी एक सिपाही जो किसी केस की तफ्तीश के लिए नंबरदार के पास जा रहा था, उस ने रास्ते में अमीर के घर के सामने लड़की को रोते हुए देखा. देख कर ही वह समझ गया कि किसी गरीब की बच्ची है, मां इधरउधर गई होगी. इसलिए रो रही होगी.

लेकिन जब उस की नजर बच्ची के कानों पर पड़ी तो चौंका. उस की बालियों में मोती चमक रहे थे. उसे लगा कि वे साधारण मोती नहीं हैं. उस ने नंबरदार से पूछा कि यह किस की लड़की है. उस ने बता दिया कि वह अमीर की लड़की है, जो दस नंबरी है.

हवलदार को कुछ शक हुआ. उस ने पास जा कर मोतियों को देखा तो वे मोती फोटो वाली उस माला से मिल रहे थे. जो थाने में आया था.

उस ने अमीर को बुलवा कर कहा कि वह बच्ची की बालियां थाने ले जा रहा है, जल्दी ही वापस कर लौटा देगा. थाने ले जा कर उस ने चैक किया तो वे मोती मेम साहब की माला के निकले. अमीर पहले से ही संदिग्ध था, नंबरी भी. उसे थाने बुलवा कर पूछा गया कि ऊपर से 10 मोती उसे कहां से मिले. सब सचसच बता दे, नहीं तो मारमार कर हड्डी पसली एक कर दी जाएगी.

पहले तो अमीर थानेदार को इधरउधर की बातों से उलझाता रहा, लेकिन जब उसे लगा कि बिना बताए छुटकारा नहीं मिलेगा तो उस ने पूरी सचाई उगल दी. उस के घर से माला भी बरामद कर ली गई.

थानेदार बहुत खुश था कि उस ने बहुत बड़ा केस सुलझा लिया है, अब उस की पदोन्नति भी होगी और ईनाम भी मिलेगा. अमीर को एसपी रावलपिंडी के सामने पेश किया गया. साथ ही डिप्टी कमिश्नर को सूचना दी गई कि मेम साहब की माला मिल गई है.

डीसी और मेम साहब ने उन्हें तलब कर लिया. मेम साहब ने माला को देख कर कहा कि माला उन्हीं की है. डिप्टी कमिश्नर ने अमीर के हुलिए को देख कर कहा कि यह चोर वह नहीं हो सकता, जिस ने उन के बंगले पर चोरी की है. क्योंकि उस जैसे आदमी की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि माला गले से उतार कर ले जाए.

एसपी ने अमीर से कहा कि अपने मुंह से साहब को पूरी कहानी सुनाए. अमीर ने पूरी कहानी सुनाई और बीचबीच में सवालों के जवाब भी देता रहा. उस ने यह भी बताया कि सोते में मेम साहब ने अपनी गरदन पर हाथ भी फेरा था. डिप्टी कमिश्नर ने उस की कहानी सुन कर यकीन कर लिया, साथ ही हैरत भी हुई.

उन्होंने कहा, ‘‘तुम ने हमें बहुत परेशान किया है, अगर तुम उसी समय हमारे पास आ जाते तो हमें बहुत खुशी होती, लेकिन हम चूंकि वादा कर चुके हैं, इसलिए तुम्हें तंग नहीं किया जाएगा. हम तुम्हें सलाह देते हैं कि बाकी की जिंदगी शरीफों की तरह गुजारो.’’

अमीर ने वादा किया कि अब वह कभी चोरी नहीं करेगा. वह एक साधू का चेला बन गया और उस की बात पर अमल करने लगा. लेकिन कहते हैं कि चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से नहीं जाता. वह छोटीमोटी चोरी फिर भी करता रहा. धीरेधीरे उस में शराफत आती गई.

Hindi Story : पुल

Hindi Story : ‘‘शुक्रिया जनाब, लेकिन मैं शराब नहीं पीता,’’ मुस्ताक ने अपनी जगह से थोड़ा पीछे हटते हुए जवाब दिया. ‘‘कमाल की बात करते हो मुस्ताक भाई, आजकल तो हर कारीगर और मजदूर शराब पीता है. शराब पिए बिना उस की थकान ही नहीं मिटती है और न ही खाना पचता है. ‘‘कभीकभार मन की खुशी के लिए तुम्हें भी थोड़ा सा नशा तो कर ही लेना चाहिए,’’ ऐसा कहते हुए ठेकेदार ने वह पैग अपने गले में उड़ेल लिया. ‘‘गरीब आदमी के लिए तो पेटभर दालरोटी ही सब से बड़ा नशा और सब से बड़ी खुशी होती है. शराब का नशा करूंगा तो मैं अपना और अपने बच्चों का पेट कैसे भरूंगा?’’ ‘‘खैर, जैसी तुम्हारी मरजी. मैं ने तो तुम्हें एक जरूरी काम के लिए बुलाया था. तुम्हें तो मालूम ही है कि इस पुल के बनने में सीमेंट के हजारों बैग लगेंगे.

ऐसा करना, 2 बैग बढि़या सीमेंट के साथ 2 बैग नकली सीमेंट के भी खपा देना. नकली सीमेंट बढि़या सीमेंट के साथ मिल कर बढि़या वाला ही काम करेगी. ‘‘इसी तरह 6 सूत के सरिए के साथ 5 सूत के सरिए भी बीचबीच में खपा देना. पास खड़े लोगों को भी पता नहीं चलेगा कि हम ऐसा कर रहे हैं,’’ ठेकेदार ने उसे अपने मन की बात खोल कर बताई. रात का समय था. पुल बनने वाली जगह के पास खुद के लिए लगाए गए एक साफसुथरे तंबू में ठेकेदार अपने बिस्तर पर बैठा था.

नजदीक के एक ट्यूबवैल से बिजली मांग कर रोशनी का इंतजाम किया गया था. ठेकेदार के सामने एक छोटी सी मेज रखी हुई थी. मेज पर रम की खुली बोतल सजी हुई थी. पास में ही एक बड़ी प्लेट में शहर के होटल से मंगाया गया लजीज चिकन परोसा हुआ था. ‘‘ठेकेदार साहब, यह काम मुझ से तो नहीं हो सकेगा,’’ मुस्ताक ने दोटूक जवाब दिया. ‘‘क्या…?’’ हैरत से ठेकेदार का मुंह खुला का खुला रह गया. हाथ की उंगलियां, जो चिकन के टुकड़े को नजाकत के साथ होंठों के भीतर पहुंचाने ही वाली थीं, एक झटके के साथ वापस प्लेट के ऊपर जा टिकीं. ठेकेदार को मुस्ताक से ऐसे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी. एक लंबे अरसे से वह ठेकेदारी का काम करता आ रहा था, पर इस तरह का जवाब तो उसे कभी भी नहीं मिला था. ‘‘क्यों नहीं हो सकेगा तुम से यह काम?’’ गुस्से से ठेकेदार की आंखें उबल कर बाहर आने को हो गई थीं. ‘‘साहब, आप को भी मालूम है और मुझे भी कि इस पुल से रेलगाडि़यां गुजरा करेंगी.

अगर कभी पुल टूट गया तो हजारों लोग बेमौत मारे जाएंगे. मैं तो उन के दुख से डरता हूं. मुझे माफ कर दें,’’ मुस्ताक ने हाथ जोड़ कर अपनी लाचारी जाहिर कर दी. खुद का मनोबल बनाए रखने के लिए ठेकेदार ने रम का एक और पैग डकारते हुए कहा, ‘‘अरे भले आदमी, तुम खुद मेरे पास यह काम मांगने के लिए आए थे… मैं तो तुम्हें इस के लिए बुलाने नहीं गया था. तब तुम ने खुद ही कहा था कि तुम अपने काम से मुझे खुश कर दोगे. ‘‘पहले जो कारीगर मेरे साथ काम करता था, उसे जब यह पता चला कि मैं ने तुम्हें इस काम के लिए रख लिया है, तो वह दौड़ता हुआ मेरे पास आया और मुझे सावधान करते हुए कहने लगा कि यह विधर्मी तुम्हें धोखा देगा… ‘‘पर, मैं ने उस की एक न सुनी… वह नाराज हो कर चला गया… तुम्हारे लिए अपने धर्मभाइयों को मैं ने नाराज किया और तुम हो कि ईमानदारी का ठेकेदार बनने का नाटक कर रहे हो.’’

‘‘मैं कोई नाटक नहीं कर रहा साहब. यह ठीक है कि मैं आप के पास खुद काम मांगने के लिए आया था… आप ने मेहरबानी कर के मुझे यह काम दिया… मैं इस का बदला चुकाऊंगा, पर दूसरी तरह से… ‘‘मैं वादा करता हूं कि मैं और मेरे साथी कारीगर हर रोज एक घंटा ज्यादा काम करेंगे. इस के लिए हम आप से फालतू पैसा नहीं लेंगे… इस तरह आप को फायदा ही फायदा होगा,’’ मुस्ताक ने यह कह कर ठेकेदार को यकीन दिलाना चाहा. ‘‘अच्छा, इस का मतलब यह कि तू चाहता है कि मैं लुट जाऊं… बरबाद हो जाऊं और तू तमाशा देखे… क्यों?’’ ठेकेदार खा जाने वाली नजरों से मुस्ताक को घूर रहा था. कारीगर मुस्ताक यह देख कर डर गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘नहीं… मेरा मतलब यह नहीं था कि…’’ ‘‘और क्या मतलब है तुम्हारा? क्या तुम्हें मालूम नहीं कि ईमानदारी के रास्ते पर चल कर पेट तो भरा जा सकता है, पर दौलत नहीं कमाई जा सकती. जिस तरह तू काम करने की बात कर रहा है, वह तो सचाई और ईमानदारी का रास्ता है. उस से हमें क्या मिलेगा? ‘‘तुम्हें मालूम होना चाहिए कि इंजीनियर साहब पहले ही मुझ से रिश्वत के हजारों रुपए ले चुके हैं. ‘वर्क कंप्लीशन सर्टिफिकेट’ देने से पहले न जाने कितने और रुपए लेंगे.

कहां से आएंगे वे रुपए? क्या तुम दोगे? नहीं न? तब क्या मैं तुम्हारी ईमानदारी को चाटूंगा? बोलो, क्या काम आएगी ऐसी वह ईमानदारी? ‘‘मुस्ताक मियां, मुझे ईमानदारी बन कर बरबाद नहीं होना है. मुझे तो हर हाल में पैसा कमाना है. याद रखना, ऐसा करने से तुम्हें भी कोई फायदा नहीं होने वाला है.’’ मुस्ताक ने जवाब देने के बजाय चुप रहना ही बेहतर समझा. ठेकेदार ने मन ही मन सोचा कि मुस्ताक को उस के तर्कों के सामने हार माननी ही पड़ेगी. आखिर कब तक नहीं मानेगा? उसे भूखा थोड़े ही मरना है. अपने लिए एक पैग और तैयार करते हुए ठेकेदार ने मुस्ताक से कहा, ‘‘तुम ने जवाब नहीं दिया.’’ ‘‘मैं मजबूर हूं साहब,’’ मुस्ताक ने धीरे से कहा. ‘‘मुस्ताक मियां, मजबूरी की बात कर के मुझे बेवकूफ मत बनाओ.

मैं जानता हूं कि तुम जैसे गरीब तबके के लोगों की नीयत बहुत गंदी होती है. तुम्हें हर चीज में अपना हिस्सा चाहिए. ठीक है, वह भी तुम्हें दूंगा और पूरा दूंगा. ‘‘इसीलिए तो तुम लोग सच्चे और ईमानदार बनने का नाटक करते हो. घबराओ मत, मैं भी जबान का पक्का हूं, जो कह दिया, सो कह दिया.’’ ठेकेदार अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. उस ने अपना दायां हाथ मुस्ताक के कंधे पर रख दिया. इस तरह वह उस का यकीन जीतना चाहता था. मुस्ताक को चुप देख कर ठेकेदार ने कहा, ‘‘पुल के गिरने वाली बात को अपने मन से निकाल दो. अगर यह पुल गिर भी गया, तब भी न तो मेरा कुछ बिगड़ेगा और न ही तुम्हारा. ‘‘मेरे पास तो अपनी 2 कारें हैं, इसलिए मैं कभी भी रेलगाड़ी में नहीं बैठूंगा. रही बात तुम्हारी, तो तुम्हारे पास इतना पैसा ही नहीं होता कि तुम रेल में बैठ कर सफर करो.’’

ठेकेदार को अचानक महसूस हुआ कि वह मुस्ताक के सामने कुछ ज्यादा ही झुक गया है. मुस्ताक इस बात को उस की कमजोरी मान कर उस पर हावी होने की कोशिश जरूर करेगा, इसलिए उस ने अपना हाथ मुस्ताक के कंधे से दूर किया. फिर अपने लहजे को कुछ कठोर बनाते हुए ठेकेदार ने कहा, ‘‘और अगर अब भी तुम यह काम नहीं करना चाहते, तो कल से तुम्हारी छुट्टी. और कोई आ जाएगा यह काम करने के लिए. कोई कमी नहीं है यहां कारीगरों की. अब जाओ, मेरा सिर मत खाओ.’’ ऐसा कहते हुए ठेकेदार बेफिक्र हो कर फिर से अपने बिस्तर पर जा बैठा और प्लेट से चिकन का टुकड़ा उठा कर आंखें बंद कर के चबाने लगा. ‘‘तो ठीक है साहब, कल से आप किसी और कारीगर को बुला लें.’’ अचानक मुस्ताक मियां के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर ठेकेदार को ऐसा लगा, मानो उस के गालों पर कोई तड़ातड़ तमाचे जड़ रहा हो. उस की आंखें अपनेआप खुल गईं. उस ने देखा कि मुस्ताक वहां नहीं था. उस के लौटते कदमों की दूर होती आवाज साफ सुनाई पड़ रही थी.

 लेखक- रामकुमार आत्रेय

Hindi story : डर – क्यों मंजू के मन में नफरत जाग गई

Hindi Story : मंजू और श्याम की शादी को 4 साल हो गए थे. जैसा नाम, वैसा रूप. लंबीचौड़ी कदकाठी, पक्के रंग का श्याम पुलिस महकमे की रोबदार नौकरी के चलते मंजू के मातापिता व परिवार को एक नजर में पसंद आ गया. इस तरह वह सुंदर, सुशील व शालीन मंजू का पति बन गया. आम भारतीय पत्नियों की तरह मंजू भी दिल की गहराई से श्याम से प्यार करती थी.

शादी के शुरुआती दिन कपूर की तरह उड़ गए. तकरीबन 2 साल गुजर गए, लेकिन मंजू की गोद हरी न हुई. अब तो घरपरिवार के लोग इशारोंइशारों में पूछने भी लगे. मंजू खुद भी चिंतित रहने लगी, पर श्याम बेफिक्र था.

मंजू ने जब कभी बात छेड़ी भी तो श्याम हंसी में टाल गया. एक दिन तो हद हो गई. उस ने बड़ी बेरहमी से कहा, ‘‘कहां बच्चे के झमेले में डालना चाहती हो? जिंदगी में ऐश करने दो.’’

मंजू को बुरा तो बहुत लगा, पर श्याम के कड़े तेवर देख वह डर गई और चुप हो गई.

शुरू से ही मंजू ने देखा कि श्याम के दफ्तर आनेजाने का कोई तय समय नहीं था. कभीकभी तो वह दूसरे दिन ही घर आता था. खैर, पुलिस की नौकरी में तो यह सब लगा रहता है. पर इधर कुछ अजीब बात हुई. एक दिन श्याम के बैग से ढेर सारी चौकलेट गिरीं. यह देख मंजू हैरान रह गई.

जब मंजू ने श्याम से पूछा तो पहले तो वह गुस्सा हो गया, फिर थोड़ा शांत होते ही बात बदल दी, ‘‘तुम्हारे लिए ही तो लाया हूं.’’

‘लेकिन मुझे तो चौकलेट पसंद ही नहीं हैं और फिर इतनी सारी…’ मन ही मन मंजू ने सोचा. कहीं श्याम गुस्सा न हो जाए, इस डर से वह कुछ नहीं बोली.

डोरबैल बजने से मंजू की नींद टूटी. रात के ढाई बज रहे थे. नशे में धुत्त श्याम घर आया था. आते ही वह बिस्तर पर लुढ़क गया. शराब की बदबू पूरे घर में फैल गई. मंजू की नींद उचट गई. श्याम के मोबाइल फोन पर लगातार मैसेज आ रहे थे.

‘चलो, मैसेज की टोन औफ कर दूं,’ यह सोचते हुए मंजू ने हाथ में मोबाइल फोन लिया ही था कि उस की नजर एक मैसेज पर पड़ी. कोई तसवीर लग रही थी. उस ने मैसेज खोल लिया. किसी गरीब जवान होती लड़की की तसवीर थी. तसवीर के नीचे ‘40,000’ लिखा था.

मंजू का सिर भन्ना गया. वह खुद को रोक नहीं पाई, उस ने सारे मैसेज पढ़ डाले. जिस पति और उस की नौकरी को ले कर वह इतनी समर्पित थी, वह इतना गिरा हुआ निकला. वह अनाथालय की बच्चियों की दलाली करता था.

मंजू खुद को लुटा सा महसूस कर रही थी. उस का पति बड़ेबड़े नेताओं और अनाथालय संचालकों के साथ मिल कर गांवदेहात की गरीब बच्चियों को टौफीचौकलेट दे कर या फिर डराधमका कर शहर के अनाथालय में भरती कराता था और सैक्स रैकेट चलाता था.

प्रेम में अंधी मंजू पति के ऐब को नजरअंदाज करती रही. काश, उसी दिन चौकलेट वाली बात की तह में जाती, शराब पीने पर सवाल उठाती, उस के देरसवेर घर आने पर पूछताछ करती. नहीं, अब नहीं. अब वह अपनी गलती सुधारेगी.

रोजमर्रा की तरह जब श्याम नाश्ता कर के दफ्तर के लिए तैयार होने लगा, तो मंजू ने बात छेड़ी. पहले तो श्याम हैरान रह गया, फिर दरिंदे की तरह मंजू पर उबल पड़ा, ‘‘तुम ने मेरे मैसेज को पढ़ा क्यों? अब तुम सब जान चुकी हो तो अपना मुंह बंद रखना. जैसा चल रहा है चलने दो, वरना तेरी छोटी बहन के साथ भी कुछ गंदा हो सकता है.’’

मंजू को पीटने के बाद धमकी दे कर श्याम घर से निकल गया.

डर, दर्द और बेइज्जती से मंजू बुरी तरह कांप रही थी. सिर से खून बह रहा था. चेहरा बुरी तरह सूजा हुआ था.

श्याम का भयावह चेहरा अभी भी मंजू के दिलोदिमाग पर छाया हुआ था. बारबार उसे अपनी छोटी बहन अंजू का खयाल आ रहा था जो दूसरे शहर के होस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही थी.

गरमी और उमस से भरी वह रात भारी थी. बिजली भी कब से गायब थी. इनवर्टर की बैटरी भी जवाब देने लगी थी. इन बाहरी समस्याओं से ज्यादा मंजू अपने भीतर की उथलपुथल से बेचैन थी. क्या करे? औरतों की पहली प्राथमिकता घर की शांति होती है. घर की सुखशांति के लिए चुप रहना ही बेहतर होगा. जैसा चल रहा है, चलने दो… नहीं, दिल इस बात के लिए राजी नहीं था. जिंदगी में ऐसा बुरा दिन आएगा, सोचा न था. कहां तो औलाद की तड़प थी और अब पति से ही नफरत हो रही थी. अभी तक जालिम घर भी नहीं आया, फोन तक नहीं किया. जरूरत भी क्या है?

‘केयरिंग हसबैंड’ का मुलम्मा उतर चुका था. उस की कलई खुल चुकी थी. नहीं आए, वही अच्छा. कहीं फिर पीटा तो? एक बार फिर डर व दर्द से वह बिलबिला उठी. तभी बिजली आ गई. पंखाकूलर चलने लगे तो मंजू को थोड़ी राहत मिली. वह निढाल सी पड़ी सो गई.

सुबह जब नींद खुली तो मंजू का मन एकदम शांत था. एक बार फिर पिछले 24 घंटे के घटनाक्रम पर ध्यान गया. लगा कि अब तक वह जिस श्याम को जानती थी, जिस के प्यार को खो देने से डरती थी, वह तो कभी जिंदगी में था ही नहीं. वह एक शातिर अपराधी निकला, जो उसे और सारे समाज को वरदी की आड़ में धोखा दे रहा था.

एक नई हिम्मत के साथ मंजू ने अपना मोबाइल फोन उठाया. सामने ही श्याम का मैसेज था, ‘घर आने में मुझे 2-3 दिन लग जाएंगे.’

मंजू का मन नफरत से भर गया. वह मोबाइल फोन पर गूगल सर्च करने लगी. थोड़ी ही देर के बाद मंजू फोन पर कह रही थी, ‘‘हैलो, महिला आयोग…’’

Hindi Story: लौकडाउन स्पेशल – मालती

लेखक- हीरा लाल मिश्र

Hindi Story: तेजा के शराब पीने की लत से मालती परेशान थी. लाख कोशिशों के बाद भी तेजा शराब पी कर घर आता तो कलह मचा देता था. एक दिन मालती को कुछ नहीं सूझा तो उस ने एक कड़ा फैसला ले लिया. क्या करना चाहती थी मालती?

कदमों के लड़खड़ाने और कुंडी खटखटाने की आवाज सुन कर मालती चौकन्नी हो उठी और बड़बड़ाई, ‘‘आज फिर…?’’

आंखों में नींद तो थी ही नहीं. झटपट दरवाजा खोला. तेजा को दुख और नफरत से ताकते हुए वह बुदबुदाई, ‘‘क्या करूं? इन का इस शराब से पिंड छूटे तो कैसे?’’

‘‘ऐसे क्या ताक रही है? मैं… कोई तमाशा हूं क्या…? क्या… मैं… कोई भूत हूं?’’ तेजा बहकती आवाज में बड़बड़ाया.

‘‘नहीं, कुछ नहीं…’’ कुछ कदम पीछे हट कर मालती बोली.

‘‘तो फिर… एं… तमाशा ही हूं… न? बोलती… क्यों नहीं…? ’’ कहता हुआ तेजा धड़ाम से सामने रखी चौकी पर पसर गया.

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मालती झटपट रसोईघर से एक गिलास पानी ले आई.

तेजा की ओर पानी का गिलास बढ़ा कर मालती बोली, ‘‘लो, पानी पी लो.’’

‘‘पी… लो? पी कर तो आया हूं… कितना… पी लूं? अपने पैसे से पीया… अकबर ने भी पिला दी… अब तुम भी पिलाने… चली हो…’’

मालती कुछ बोलती कि तेजा ने उस के हाथ से गिलास झपट कर दीवार पर पटकते हुए चिल्लाया, ‘‘मजाक करती है…एं… मजाक करती है मुझ से… पति के साथ… मजाक करती है. …पानी… पानी… देती है,’’ तेजा उठ कर मालती की ओर बढ़ा.

मालती सहम कर पीछे हटी ही थी कि तेजा डगमगाता हुआ सामने की मेज से जा टकराया. मेज एक तरफ उलट गई. मेज पर रखा सारा सामान जोर की आवाज के साथ नीचे बिखर गया. खुद उस का सिर दीवार से जा टकराया और गुस्से में बड़बड़ाता हुआ वह मालती की ओर झपट पड़ा.

मालती को सामने न पा कर तेजा फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.

तेजा के सामने से हट कर मालती एक कोने में दुबकी खड़ी थी. उसे काटो तो खून नहीं. वह एकटक नशे में धुत्त अपने पति को देख रही थी. उस का कलेजा फटा जा रहा था.

तेजा के रोने की आवाज सुन कर बगल के कमरे में सोए दोनों बच्चों की नींद टूट गई. आंखें मलती 10 साल की मुन्नी और उस के पीछे 8 साल का बेटा रमेश पिता की ऐसी हालत देख कर हैरानपरेशान थे.

पिता के इस तरह के बरताव के वे दोनों आदी थे. आज पिता के रोने से उन्हें बड़ी तकलीफ हो रही थी, पर मां के गालों से लुढ़कते आंसुओं को देख कर वे और भी दुखी हो गए.

बेटी मुन्नी मां का हाथ पकड़

कर रोने लगी. रमेश डरासहमा कभी बाप को देखता, तो कभी मां के आंसुओं को.

तेजा को लड़खड़ा कर खड़ा होता देख तीनों का कलेजा पसीज गया.

तभी तेजा मालती पर झपट पड़ा, ‘‘मुझे भूख नहीं लगती क्या?… तुझे मार डालूंगा… तुम ने मुझे नीचे… गिरा दिया और… आंसू बहा रही है… झूठमूठ

के आंसू… तुम ने मुझे मारा… मैं ने

तेरा क्या बिगाड़ा?… एं… क्या बिगाड़ा… बता…?’’

मालती के बाल उस के हाथों

की गिरफ्त में आ गए. वह उन्हें छुड़ाने की नाकाम कोशिश करने लगी. बेटी मुन्नी जोरों से रोने लगी. रमेश अपने पिता का हाथ अपने नन्हे हाथों से पकड़ कर हटाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

मालती ने चिल्ला कर रमेश को मना किया, पर वह नहीं माना. इस बीच तेजा ने रमेश को धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. उस का सिर फर्श से टकराया और देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा.

खून देख कर मालती बदहवास हो कर चिल्ला पड़ी, ‘‘खून… रमेश… मेरे बेटे के सिर से खून…’’

खून देख कर तेजा का हाथ ढीला पड़ा.

मालती और मुन्नी दहाड़ें मार कर रोने लगीं. पड़ोसियों ने आ कर सारा माजरा देखा और रमेश को अस्पताल ले जा कर मरहमपट्टी करवाई. खाना रसोईघर में यों ही पड़ा रहा. मालती रातभर रमेश को सीने से लगाए रोती रही. नींद आंखों से गायब थी.

अपनी औलाद के लिए घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर थी मालती. मन ही मन उस ने तेजा से हार मान ली थी. हालात से समझौता कर मालती ने मान लिया था कि यही उस की किस्मत में लिखा है.

पर, तेजा ने शराब से हार नहीं मानी. रात के अंधेरे में तेजा राक्षस बन कर घर में कुहराम मचाता, तो दिन की रोशनी में भले आदमी की तरह मुसकान बिखेरता मालती और बेटीबेटे को लाड़प्यार करता. ऐसा लगता कि जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं. पर अंदर ही अंदर मालती की घुटन एक चिनगारी का रूप लेने लगी थी.

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एक दिन तो मालती की खिलाफत ने अजीब रंग दिखाया. उस दिन मालती ने दोनों बच्चों को स्कूल जाने से रोक दिया.

तेजा ने पूछा, ‘‘क्या आज स्कूल बंद है? ये तैयार क्यों नहीं हो रहे हैं?’’

‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. इसी वजह से इन्हें रोक लिया,’’ मालती गंभीर हो कर बोली.

‘‘तो मैं आज काम पर नहीं जाता. तुम्हारे पास रहूंगा. इन्हें जाने दो,’’ तेजा बोला.

‘‘नहीं, ये आज नहीं जाएंगे. मेरे पास ही रहेंगे,’’ मालती बोली.

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. ज्यादा तबीयत खराब हो, तो मुझे बुलवा लेना. डाक्टर के  पास ले जाऊंगा,’’ तेजा बड़े प्यार से बोला.

मालती और बच्चों को छोड़ तेजा काम पर चला गया.

एक घंटे बाद मालती ने मुन्नी के हाथों शराब की भट्ठी से 4 बोतल शराब मंगवाई. दरवाजा बंद कर धीरेधीरे एक बोतल वह खुद पी गई. फिर मुन्नी व रमेश को पिलाने लगी. मुन्नी ज्यादा पीने की वजह से रोने लगी.

रमेश भी रोता हुआ बड़बड़ाने लगा, ‘‘मम्मी, अच्छी नहीं लग रही है. अब मत पिलाओ मम्मी.’’

‘‘पी लो, थोड़ी और पी लो… देखो, मैं भी तो पी रही हूं…’’ रुकरुक कर मालती बोली और दोनों के मुंह में पूरा गिलास उडे़ल दिया. दोनों ही फर्श पर निढाल हो कर गिर पड़े. मालती ने दूसरी बोतल भी पी डाली और वह भी फर्श पर लुढ़क गई.

थोड़ी देर बाद बच्चे उलटी करने लगे और चिल्लाने लगे.

बच्चों की दर्दभरी कराह और चिल्लाहट सुन कर पड़ोसी दरवाजा तोड़ कर घर में घुसे. वहां की हालत देख कर सभी हैरान रह गए. कमरे में शराब की बदबू पा कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि तेजा की हरकतों से तंग आ कर ही मालती ने ऐसा किया है.

पड़ोसियों ने तीनों को अस्पताल पहुंचाया.

खबर पा कर तेजा अस्पताल की ओर भागा. मालती और बच्चों का हाल देख कर वह पछाड़ खा कर गिर पड़ा और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘बचा लो भैया… इन्हें बचा लो… मेरी मालती को बचा लो… मेरे बच्चों को बचा लो…’’ कहता हुआ तेजा अपनी छाती पीट रहा था.

‘‘और शराब पियो तेजा… और पियो… और जुल्म करो अपने बीवीबच्चों पर… देख लिया…’’ एक पड़ोसी ने गुस्साते हुए कहा.

‘‘नहीं, नहीं… मैं कुसूरवार हूं… मेरी वजह से ही यह सब हुआ… उस ने कई बार मुझे समझाने की कोशिश की, पर मैं ही अपनी शराब की बुरी आदत की वजह से मामले को समझ नहीं पाया,’’ रोतेरोते तेजा बोला.

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करीब एक घंटे बाद डाक्टर ने आ कर बताया कि दोनों बच्चे तो ठीक हैं, पर मालती ने दम तोड़ दिया है. उसे बचाया नहीं जा सका. उस पर शराब के  असर के अलावा दिमागी दबाव बहुत ज्यादा था.

तेजा फूटफूट कर रोने लगा. उसे अक्ल तो आ गई थी, पर इतनी अच्छी बीवी को खोने के बाद. Hindi Story

Romantic Story: ठोकर – क्या इश्क में अंधी लाली खुद को संभाल पाई

Romantic Story: सतपाल गहरी नींद में सोया हुआ था. उस की पत्नी उर्मिला ने उसे जगाने की कोशिश की. वह इतनी ऊंची आवाज में बोली थी कि साथ में सोया उस का 5 साला बेटा जंबू भी जाग गया था. वह डरी निगाहों से मां को देखने लगा था. ‘‘क्या हो गया? रात को तो चैन से सोने दिया करो. क्यों जगाया मुझे?’’ सतपाल उखड़ी आवाज में उर्मिला पर बरस पड़ा.

‘‘बाहर गेट पर कोई खड़ा है. जोरजोर से डोर बैल बजा रहा है. पता नहीं, इतनी रात को कौन आ गया है? मुझे तो डर लग रहा है,’’ उर्मिला ने घबराई आवाज में बताया. ‘‘अरे, इस में डरने की क्या बात है? गेट खोल कर देख लो. तुम सतपाल की घरवाली हो. हमारे नाम से तो बड़ेबड़े भूतप्रेत भाग जाते हैं.’’

‘‘तुम ही जा कर देखो. मुझे तो डर लग रहा है. पता नहीं, कोई चोरडाकू न आ गया हो. तुम भी हाथ में तलवार ले कर जाना,’’ उर्मिला ने सहमी आवाज में सलाह दी. सतपाल ने चारपाई छोड़ दी. उस ने एक डंडा उठाया. गेट के करीब पहुंच कर उस ने गेट के ऊपर से झांक कर देखा, तो कांप उठा. बाहर उस की छोटी बहन खड़ी सिसक रही थी.

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सतपाल ने हैरानी भरे लहजे में पूछा, ‘‘अरे लाली, तू? घर में तो सब ठीक है न?’’

लाली कुछ नहीं बोल पाई. बस, गहरीगहरी हिचकियां ले कर रोने लगी. सतपाल ने देखा कि लाली के चेहरे पर मारपीट के निशान थे. सिर के बाल बिखरे हुए थे.

सतपाल लाली को बैडरूम में ले आया. वह बारबार लाली से पूछने की कोशिश कर रहा था कि ऐसा क्या हुआ कि उसे आधी रात को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा? उर्मिला ने बुरा सा मुंह बनाया और पैर पटकते हुए दूसरे कमरे में चली गई. उसे लाली के प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी.

लाली की शादी आज से 10 साल पहले इसी शहर में हुई थी. तब उस के मम्मीपापा जिंदा थे. लाली का पति दुकानदार था. काम अच्छा चल रहा था. घर में लाली की सास थी, 2 ननदें भी थीं. उन की शादी हो चुकी थी. लाली के पति अजय ने उसे पहली रात को साफसाफ शब्दों में समझा दिया था कि उस की मां बीमार रहती हैं. उन के प्रति बरती गई लापरवाही को वह सहन नहीं करेगा.

लाली ने पति के सामने तो हामी भर दी थी, मगर अमल में नहीं लाई. कुछ दिनों बाद अजय ने सतपाल के सामने शिकायत की.

जब सतपाल ने लाली से बात की, तो वह बुरी तरह भड़क उठी. उस ने तो अजय की शिकायत को पूरी तरह नकार दिया. उलटे अजय पर ही नामर्दी का आरोप लगा दिया.

अजय ने अपने ऊपर नामर्द होने का आरोप सुना, तो वह सतपाल के साथ डाक्टर के पास पहुंचा. अपनी डाक्टरी जांच करा कर रिपोर्ट उस के सामने रखी, तो सतपाल को लाली पर बेहद गुस्सा आया. उस ने डांटडपट कर लाली को ससुराल भेज दिया. लाली ससुराल तो आ गई, मगर उस ने पति और सास की अनदेखी जारी रखी. उस ने अपनी जिम्मेदारियों को महसूस नहीं किया. अपने दोस्तों के साथ मोबाइल पर बातें करना जारी रखा.

आखिरकार जब अजय को दुकान बंद कर के अपनी मां की देखभाल के लिए घर पर रहने को मजबूर होना पड़ा, तब उस ने अपनी आंखों से देखा कि लाली कितनी देर तक मोबाइल फोन पर न जाने किसकिस से बातें करती थी. एक दिन अजय ने लाली से पूछ ही लिया कि वह इतनी देर से किस से बातें कर रही थी?

पहले तो लाली कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई, पर जब अजय गुस्से से भर उठा, तो लाली ने अपने भाई सतपाल का नाम ले लिया. उस समय तो अजय खामोश हो गया, क्योंकि उसे मां को अस्पताल ले जाना था. जब वह टैक्सी से अस्पताल की तरफ जा रहा था, तब उस ने सतपाल से पूछा, तो उस ने इनकार कर दिया कि उस के पास लाली का कोई फोन नहीं आया था.

अजय 2 घंटे बाद वापस घर में आया, तो लाली को मोबाइल फोन पर खिलखिला कर बातें करते देख बुरी तरह सुलग उठा था. उस ने तेजी से लपक कर लाली के हाथ से मोबाइल छीन कर 4-5 घूंसे जमा दिए. लाली चीखतीचिल्लाती पासपड़ोस की औरतों को अपनी मदद के लिए बुलाने को घर से बाहर निकल आई.

अजय ने उसी नंबर पर फोन मिलाया, जिस पर लाली बात कर रही थी. दूसरी तरफ से किसी अनजान मर्द की आवाज उभरी. अजय की आवाज सुनते ही दूसरी तरफ से कनैक्शन कट गया.

अजय ने दोबारा नंबर मिला कर पूछने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ से मोबाइल स्विच औफ हो गया. अजय ने लाली से पूछा, तो उस ने भी सही जवाब नहीं दिया.

अजय का गुस्से से भरा चेहरा भयानक होने लगा. उस के जबड़े भिंचने लगे. वह ऐसी आशिकमिजाजी कतई सहन नहीं करेगा. लाली घबरा उठी. उसे लगा कि अगर वह अजय के सामने रही और किसी दोस्त का फोन आ गया, तो यकीनन उस की खैरियत नहीं. उस ने उसी समय जरूरी सामान से अपना बैग भरा और अपने मायके आ गई.

लाली ने घर आ कर अजय और उस की मां पर तरहतरह के आरोप लगा कर ससुराल जाने से मना कर दिया. कई महीनों तक वह अपने मायके में ही रही. अजय भी उसे लेने नहीं आया. इसी तनातनी में एक साल गुजर गया. आखिरकार अजय ही लाली को लेने आया. उस ने शर्त रखी कि लाली को मन लगा कर घर का काम करना होगा. वह पराए मर्दों से मोबाइल फोन पर बेवजह बातें नहीं करेगी.

सतपाल ने बहुत समझाया, मगर लाली नहीं मानी. लाली का तलाक हो गया. सतपाल ने उस के लिए 2 लड़के देखे, मगर वे उसे पसंद नहीं आए.

दरअसल, लाली ने शराब का एक ठेकेदार पसंद कर रखा था. उस का शहर की 4-5 दुकानों में हिस्सा था. वह शहर का बदनाम अपराधी था, मगर लाली को पसंद था. काफी अरसे से लाली का उस ठेकेदार जोरावर से इश्क चल रहा था. जोरावर सतपाल को भी पसंद नहीं था, मगर इश्क में अंधी लाली की जिद के सामने वह मजबूर था. उस की शादी जोरावर से करा दी गई.

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जोरावर शराब के कारोबार में केवल 10 पैसे का हिस्सेदार था, बाकी 90 पैसे दूसरे हिस्सेदारों के थे. उस की कमाई लाखों में नहीं हजारों रुपए में थी. वह जुआ खेलने और शराब पीने का शौकीन था. वह लाली को खुला खर्चा नहीं दे पाता था. अब तो लाली को पेट भरने के भी लाले पड़ गए. उस ने जोरावर से अपने खर्च की मांग रखी, तो उस ने जिस्म

बेच कर पैसा कमाने का रास्ता दिखाया. लाली ने मना किया, तो जोरावर ने घर में ही शराब बेचने का रास्ता सुझा दिया. अब लाली करती भी क्या. अपना मायका भी उस ने गंवा लिया था. जाती भी कहां? उस ने शराब बेचने का धंधा शुरू कर दिया. उस का जवान गदराया बदन देख कर मनचले शराब खरीदने लाली के पास आने लगे. उस का कारोबार अच्छा चल निकला.

जोरावर को लगा कि लाली खूब माल कमा रही है, तो उस ने अपना हिस्सा मांगना शुरू कर दिया. लाली ने पैसा देने से इनकार कर दिया. उस रात दोनों में झगड़ा हुआ. लाली जमा किए तमाम रुपए एक पुराने बैग में भर कर घर से भाग निकली. जोरावर ने देख लिया था. वह भी पीछेपीछे तलवार हाथ में लिए भागा. वह किसी भी सूरत में लाली से रुपए लेना चाहता था.

जोरावर नशे में था. उस के हाथों में तलवार चमक रही थी. वह उस की हत्या कर के भी सारा रुपया हासिल करना चाहता था. लाली बदहवास सी भागती हुई सड़क पर आ गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो जोरावर तलवार लिए उस की तरफ भाग रहा था. उस ने बचतेबचाते सड़क पार कर ली.

लेकिन जब जोरावर सड़क पार करने लगा, तो वह किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आ गया और मारा गया. रात के 3 बज रहे थे. किसी ने भी जोरावर की लाश की तरफ ध्यान तक नहीं दिया.

सतपाल के यहां आ कर लाली ने रोतेसिसकते अपनी दुखभरी दास्तान सुनाई, तो सतपाल की भी आंखें भर आईं. मगर उसी पल उस ने अपनी बहन की गलतियां गिनाईं, जिन की वजह से उस की यह हालत हुई थी. ‘‘हां भैया, अजय का कोई कुसूर नहीं है. मैं ने ही अपनी गलतियों की सजा पाई है. अजय ने तो हर बार मुझे समझाने, सही रास्ते पर लाने की कोशिश की थी, इसलिए अब भी मैं अजय के पास ही जाना चाहती हूं,’’ लाली ने इच्छा जाहिर की.

‘‘अब तुझे वह किसी भी हालत में नहीं अपनाएगा. उस ने तो दूसरी शादी भी कर ली होगी,’’ सतपाल ने अंदाजा लगाया. ‘‘बेशक, उस ने शादी कर ली हो. उस के घर में नौकरानी बन कर रह लूंगी. मुझे अजय के घर जाना है, वरना मैं खुदकुशी कर लूंगी,’’ लाली ने अपना फैसला सुना दिया.

सतपाल बोला, ‘‘ठीक है लाली, पहले तू 4-5 दिन यहीं आराम कर.’’ एक हफ्ते बाद सतपाल ने लाली

को मोटरसाइकिल पर बैठाया और दोनों अजय के घर की तरफ चल दिए. अजय घर पर अकेला ही सुबह का नाश्ता तैयार कर रहा था. सुबहसवेरे लाली को अपने भाई सतपाल के साथ आया देख वह बुरी तरह भड़क उठा.

दोनों को धक्के मार कर घर से बाहर निकालते हुए अजय ने कहा, ‘‘अब तुम लोग मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने आए हो. चले जाओ यहां से. अब तो मेरी मां भी मर चुकी है. मेरी पत्नी तो बहुत पहले मर चुकी थी. अब मेरा कोई नहीं है.’’

सतपाल ने लाली को घर चलने को कहा, तो वह वहीं पर रहने के लिए अड़ गई. सतपाल अकेला ही घर चला गया. लाली सारा दिन भूखीप्यासी वहीं पर खड़ी रही. रात को अजय वापस आया. लाली को खड़ा देख वह बेरुखी से बोला, ‘‘अब यहां खड़े रहने का कोई फायदा नहीं है.’’

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‘‘अजय, मैं ने तो अपनी गलतियों को पहचाना है और मैं तुम्हारी सेवा करने का मौका एक और चाहती हूं.’’ मगर अजय ने उस की तरफ ध्यान नहीं दिया और घर का दरवाजा बंद कर लिया. अगली सुबह अजय ने दरवाजा खोला, तो लाली को बाहर बीमार हालत में देख चौंक उठा. वह बुरी तरह कांप रही थी. वह उसे तुरंत डाक्टर के पास ले गया. बीमार लाली को देख कर अजय को लगा कि ठोकर खा कर लाली सुधर गई है, इसलिए उस ने उसे माफ कर दिया.

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