Sad Story : सांवली

शहर से काफी दूर बसा सज्जनपुर गांव पुराने समय से ही 3 हिस्सों में बंटा था. इस गांव के राजामहाराजा और बड़ेबड़े जमींदार एक जगह बसे थे. उन के सारे मकान पक्के थे. पैसे की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उन के बच्चे अपना ज्यादा समय ऐशोआराम में बिताते थे. दूसरे हिस्से में ब्राह्मण और राजपूत थे. कुछ मुसलिम भी थे.

तीसरा हिस्सा पिछड़ी जाति या दलित तबके का था. उन लोगों की बस्ती अलग पहाड़ीनुमा टीले पर थी. उन के घर फूस के बने थे. वे लोग पैसे वाले जमींदारों, राजामहाराजाओं की मेहरबानी पर गुजरबसर कर रहे थे.

उस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था. 30-40 गांवों के बीच महज एक ही स्कूल था. आसपास की सारी सड़कें कच्ची और बड़ेबड़े गड्ढों वाली थीं.

उन सभी गांवों से स्कूल को जोड़ने वाली सड़कें जब पक्की हो गईं, तो स्कूल भी चल निकला और 2-3 साल में हाईस्कूल बन गया. फिर वहां इंटर तक की पढ़ाई शुरू हो गई थी. दलित झोपड़पट्टी का कोई बच्चा वहां पढ़ने नहीं आता था.

कहा जाता है कि महात्मा गांधी और भीमराव अंबेडकर भी एक बार वहां गए थे. दलितों के पक्के मकान बनवाने के वादे भी किए गए थे, पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन दलितों की सुध लेने वाला कोई नहीं था.

एक बार कलक्टर साहब का वहां दौरा हुआ. उन्होंने वहां के लोगों को सम?ाया कि आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? अपने हक की जानकारी होने पर ही आप उस की मांग कर सकते हैं. सरकार बच्चों की सुविधा का खयाल करेगी, पहले उन्हें स्कूल में तो भेजिए.

बहुत समझने के बाद एक निषाद की बेटी स्कूल जाने को तैयार हुई. फिर उस झोंपड़पट्टी के दूसरे बच्चे भी स्कूल जाने लगे.

उस स्कूल के सारे मास्टर ऊंची जाति के थे. उन्हें दलित तबके के बच्चों से नफरत होने लगी, क्योंकि उन के कपड़े अच्छे नहीं होते थे. पैरों में जूते नहीं होते थे. शिष्टाचार की कमी भी थी.

स्कूल जाने वाली पहली दलित लड़की का नाम सांवली था. उसे शुरू से ही अपने कपड़ों का खयाल था. वह शिष्टाचार का पालन भी करती थी. एक तरह से वह सभी दलित बच्चों की हैड गर्ल बन गई थी. धीरेधीरे वह पढ़ने में भी होशियार हो गई.

बड़ीबड़ी आंखें, घुंघराले घने बाल, शरीर भी गठा हुआ. न दुबली और न मोटी. स्कूल में सब की चहेती थी सांवली.

अपने महल्ले में भी सांवली का बहुत आदर होता था. लोग आपस में बात करते हुए कहते थे कि सांवली बड़ी हो कर अफसर बनेगी. कार में घूमेगी.

सांवली के पिता मंगरू मल्लाह से लोग कहते, ‘देखो मंगरू, सांवली की पढ़ाई बंद मत करना. रुपएपैसे की किल्लत होगी, तो हम लोग आपस में चंदा कर के पैसे जुटाएंगे.’

जैसेजैसे सांवली बड़ी होती गई, वैसेवैसे उस की खूबसूरती भी बढ़ती गई. 9वीं जमात में आने पर सांवली के बदन पर जवानी भी दस्तक देने लगी थी.

जब सांवली 7वीं जमात में थी, तब ऊंची जाति के एक मास्टर ने उस के अंकों को जानबू?ा कर घटा दिया था, जिस से एक राजपूत की बेटी क्लास में फर्स्ट आ गई थी.

सांवली इस बात पर उस मास्टर से लड़ बैठी थी और उस ने हैडमास्टर से शिकायत भी कर दी थी. उन्होंने सांवली के साथसाथ सभी मास्टरों को बुलवा कर कहा था कि जो बच्चे जैसा लिखते हैं, उन्हें उतने ही अंक मिलने चाहिए. इस में जाति का फर्क नहीं होना चाहिए.

उस दिन से सांवली पढ़ने में ज्यादा मन लगाने लगी थी. उस की बस्ती में बिजली नहीं थी, इसलिए वह लालटेन की रोशनी में पढ़ती थी. तेल नहीं रहने पर महल्ले के कई लोग सांवली को तेल भरी लालटेन दे जाते थे.

इधर सांवली का पिता मंगरू मल्लाह दिनभर मछली पकड़ता और शाम को नजदीक के बाजार में उन्हें बेचता था. अगर कुछ मछलियां बच जाती थीं, तो जमींदार को भी दे आता था. जमींदार मंगरू को कभी पैसे देते, कभी नहीं भी देते थे.

सांवली 9वीं जमात में स्कूलभर में फर्स्ट आई थी. हर जगह उस की चर्चा होने लगी. राज्य सरकार ने अव्वल आने वाली लड़कियों को साइकिल देने का ऐलान किया था. सांवली को भी लाल रंग की साइकिल मिल गई थी. अब वह साइकिल से ही स्कूल आनेजाने लगी थी.

क्लास में लड़कियों की तरफ ताकझांक करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी, पर लंच टाइम में सभी लड़के अपनेअपने ढंग से मनोरंजन करते थे. सभी अपनीअपनी पसंद की लड़की बताते थे.

मनोज नाम का लड़का कहता, ‘‘नाम भी सांवली और रंग भी सांवला. सांवली होने के बावजूद यह कितनी अच्छी लगती है. जी करता है कि चूम लूं इसे. लेकिन इशारा करने पर भी नहीं देखती है.’’

यह सुन कर दिनेश ने कहा, ‘‘साइकिल पर घंटी बजाती हुई जब वह हम सब लड़कों के बीच से गुजरती है, तो दिल पर छुरी चला देती है.’’

जमींदार राय साहब के बेटे मधुरेश ने कहा, ‘‘सांवली कहीं अकेले में मिल जाए, तो कसम से मैं इसे सीने से लगा कर चूम लूंगा.’’

अब सांवली 10वीं जमात में थी. बोर्ड के इम्तिहान भी नजदीक आ रहे थे. सांवली का मन पढ़ाई में ज्यादा लग रहा था. इधर लड़कों का मन पढ़ने से उचट रहा था. उस स्कूल में ही नहीं, आसपास के सभी गांवों में सांवली की चर्चा होने लगी थी.

मधुरेश के पिता राय साहब को मालूम हो गया था कि उन का बेटा पढ़ाई में जीरो है और सांवली हीरो.

एक दिन राय साहब ने मधुरेश से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे स्कूल में दलित की बेटी पढ़ाई में फर्स्ट आती है?’’

‘‘सांवली पहले से ही पढ़ाई में तेज है,’’ मधुरेश का जवाब था.

एक दिन शाम को जब मंगरू राय साहब के यहां मछली देने आया, तो वे बोल पड़े,  ‘‘मंगरू, मु?ो तु?ा से जरूरी काम है. इधर आ.’’

जब मंगरू उन के नजदीक पहुंचा, तो राय साहब ने कहा  ‘‘देखो मंगरू, तुम्हारे खानदान का मेरे खानदान से आज का नाता नहीं है.’’

‘‘हां, सो तो है,’’ मंगरू ने कहा.

‘‘क्या सांवली तुम्हारी बेटी है?’’

‘‘हां सरकार, आप लोगों की दुआ से,’’ मंगरू बोला.

‘‘वह पढ़ाई में बहुत तेज है न?’’

‘‘जी हां मालिक?’’

फिर राय साहब बोल उठे, ‘‘मेरा एक बेटा है और 2 बेटियां हैं. बड़ी बेटी की शादी की बात चल रही है. दूसरी बेटी तो बहुत छोटी है. चिंता है तो सिर्फ मधुरेश की. वह 10वीं जमात में आ गया है, पर उसे आताजाता कुछ नहीं है. अगर तुम्हारी बेटी सांवली उसे थोड़ा पढ़ा दे, तो वह जरूर 10वीं पास कर जाएगा.’’

मंगरू ने कहा, ‘‘अब हम क्या बताएं मालिक, यह तो सांवली ही जाने. वह क्या पढ़ती है, क्या लिखती है, मु?ो नहीं मालूम.’’

‘‘देखो मंगरू, सांवली बहुत अच्छी लड़की है. वह तुम्हारी बात नहीं टालेगी. साइकिल से आएगीजाएगी. तुम जितना कहोगे, हम उस को फीस दे दिया करेंगे.’’

‘‘ठीक है मालिक,’’ मंगरू ने कहा.मंगरू रात को घर पहुंचा, तो उस ने सांवली को राय साहब की बातें बता दीं.सांवली का कहना था, ‘‘हम दोनों तो 10वीं जमात में ही पढ़ते हैं, फिर मैं कैसे उसे पढ़ा सकती हूं?’’ लेकिन बहुत नानुकर के बाद सांवली राय साहब के यहां जा कर पढ़ाने को राजी हो गई.

स्कूल से छूटती, तो सांवली सीधे राय साहब के यहां अपनी साइकिल से पहुंच जाती. मधुरेश को बिन मांगी मुराद पूरी होती नजर आई.

2-3 महीनों के बाद मधुरेश सम?ा गया कि सांवली बहुत भोली है, घमंड तो उस में बिलकुल नहीं. वह सांवली के गदराए बदन को देखदेख कर मजा उठाता रहा. लेकिन जब मधुरेश की हिम्मत बढ़ती गई, तो सांवली ने पूछ लिया, ‘‘ऐसे क्यों घूरते हो मु?ो?’’

यह सुन कर मधुरेश बहुत डर गया.

‘‘मधुरेश, तुम मेरी तरफ घूरघूर कर क्यों देखते हो? बोलो न?’’ सांवली ने फिर पूछा.

‘‘जी करता है कि मैं तुम्हें चूम लूं,’’ मधुरेश धीरे से बोला.

सांवली ने कहा, ‘‘तो चूम लो मु?ो, पर दूसरी चीज मत मांगना.’’ मधुरेश चुप रहा. सांवली अपने गालों को उस की तरफ बढ़ाते हुए बोली,  ‘‘तो चूम लो न.’’ मधुरेश उस को चूमने लगा, तो सांवली उस के सीने से चिपक गई.इस तरह मधुरेश और सांवली का एकदूसरेके प्रति खिंचाव बढ़ता गया.

मैट्रिक बोर्ड का रिजल्ट आ गया था. सांवली का नंबर पूरे राज्य में पहला था और मधुरेश भी सैकंड डिविजन से पास हो गया था.रिजल्ट के बाद जब वे दोनों मिले, तो सांवली बोली, ‘‘मधुरेश, तुम मु?ो चाहते हो न? शादी करोगे न मु?ा से?’’ मधुरेश का जवाब था, ‘‘मैं वादा करता हूं.’’ ‘‘तो अपने पिताजी को सम?ाओ.’’ मधुरेश ने कहा, ‘‘पिताजी तो मु?ा से ज्यादा तुम से खुश रहते हैं.’’ रात को सांवली ने अपने मातापिता को मधुरेश की बात बता दी.

मंगरू उसे सम?ाते हुए बोला, ‘‘देखो सांवली, प्यार सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, पैसे वालों के लिए है, हम जैसे गरीब को यह सुहाता नहीं है.

‘‘क्या राय साहब अपने बेटे की शादी हम जैसे गरीब निषाद से करेंगे? नामुमकिन. वैसे, राय साहब तुम्हारी जी भर कर तारीफ करते हैं. देखता हूं कि वे क्या कहते हैं.’’

एक शाम को मंगरू मछली ले कर राय साहब के यहां पहुंचा और उन से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सरकार, मैं आप से एक भीख मागने आया हूं.’’

‘‘कैसी भीख? ’’

‘‘आप का बेटा मधुरेश मेरी बेटी से शादी करना चाहता है,’’ मंगरू ने डरतेडरते कहा.

यह सुनते ही राय साहब अपना आपा खो बैठे और मंगरू पर गरज पड़े, ‘‘तुम्हारी बेटी की हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर डोरे डालने की…’’ फिर वे एक मोटा सा डंडा ले आए और जानवरों की तरह मंगरू पर बरसाने लगे.

मंगरू बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. राय साहब के लोगों ने उसे उठा कर सड़क के किनारे पटक दिया. मंगरू के पीटे जाने की खबर चारों ओर फैल गई थी. दलित बस्ती के लोग उग्र हो चुके थे. जल्दी ही मंगरू को अस्पताल पहुंचाया गया. उस की हालत चिंताजनक थी. सांवली यह खबर सुन कर बेहोश हो गई थी. 2 दिनों के बाद दलित बस्ती के टीले पर गांव वालों की सभा बुलाई गई. तय हुआ कि कोई भी दलित किसी भी काम के लिए ऊंची जाति की बस्ती में कभी कदम नहीं रखेगा.

एक महीने बाद राय साहब की बेटी की शादी थी. घर में चहलपहल थी. सारे सामान दूसरे शहर से मंगवाए गए थे.आज राय साहब का घर जश्न में डूबा हुआ था, उधर दलित बस्ती में हाहाकार मचा था, क्योंकि मंगरू दम तोड़ चुका था. दाह संस्कार के बाद सारे गांव वाले थाने पर टूट पड़े. वहां आग लगा दी गई. थानेदार भाग कर राय साहब के घर में छिप गया था. अगले दिन से धीरेधीरे माहौल शांत हो गया, पर राय साहब का घमंड ज्यों का त्यों बना हुआ था.

बरसात का मौसम आ गया था. सज्जनपुर गांव के बगल का बांध अचानक टूट गया और ऐसी भयंकर बाढ़ आई कि पूरा गांव बह गया. दलितों की बस्ती बहुत ऊंची थी, इसलिए महफूज थी. वहां के लोगों ने अपनीअपनी नावों से बहुत से लोगों को बह जाने से बचाया था.

सांवली निषाद की बेटी थी, इसलिए वह अच्छी तैराक भी थी. वह किनारे पर नाव ले कर खड़ी थी कि एक टूटीफूटी नाव में राय साहब का पूरा परिवार खुद को बचा रहा था.

नाव में पानी भर गया था. उस में से ‘सांवली बचाओ’, ‘सांवली बचाओ’ की आवाजें आ रही थीं. सांवली का चाचा चिल्ला उठा, ‘‘उन्हें मत बचाओ सांवली.’’ इतने में राय साहब की नाव पानी से पूरी तरह भर गई थी.

सांवली का दिल पिघल कर मोम हो गया. वह ?ाट से अपनी नाव को बड़ी तेजी से उन की ओर बढ़ाने लगी. राय साहब के परिवार के सारे लोग सांवली की नाव को पकड़ने लगे.

कुछ देर बाद कोई चिल्लाया, ‘‘मधुरेश डूब गया है.’’ सांवली ?ाट से पानी में कूद गई. एक डुबकी के बाद उसे मधुरेश का कुछ पता नहीं चला, तो उस ने दूसरी बार डुबकी लगाई.

इधर किनारे पर खड़े राय साहब के परिवार के सदस्य रो रहे थे. जब सांवली ने तीसरी बार डुबकी लगाई, तो वह मधुरेश को खींचती हुई पानी से बाहर निकाल लाई. एक नाव में मधुरेश को अस्पताल ले जाया गया. राय साहब का पूरा परिवार वहां था.

जैसे ही मधुरेश की आंखें खुलीं, सामने सांवली को देख कर उस ने उस के पैरों में सिर ?ाका दिया और रोने लगा.मधुरेश को बिलखता देख कर सांवली भी उसे अपनी छाती से लगा कर रोने लगी. राय साहब सिर ?ाकाए खड़े रहे… वे अपने किए पर शर्मिंदा लग रहे थे.

गरीबों का मसीहा : चापलूसों की चालबाजी

शाम होतेहोते पूरी बस्ती में काफी जोरों का हंगामा मच गया था. 2 दिनों के बाद मान्यवर नेताजी बस्ती का दौरा करने वाले थे. नेताजी के करकमलों द्वारा ही उस बस्ती को गैरकानूनी रूप से बसाया गया था. नेताजी की यह तुरुप की चाल सौलिड वोटबैंक साबित हो रही थी.

गरीबों की इस बस्ती में हर तरह का गैरकानूनी काम होता था. ‘गरीब’ बस्ती वालों को नेताजी का पूरा साथ मिला था. इस वजह से पुलिस वाले भी बस्ती के अंदर घुसने में घबराते थे.

बेरोकटोक ‘गरीब’ बस्ती वाले सत्कर्म करते रहते थे. न पानी, न सड़क, फिर भी वहां एक इंच जगह खाली नहीं थी. सांप जैसी बनी झोपड़ियां, जहां एक बार कोई बाहर का आदमी घुस जाए, तो शायद ही जिंदा वापस लौटे.

इस बस्ती में सभी कलाकार रहते थे. कोई ड्रग्स का धंधा करता, तो कोई कच्ची शराब बेचता, तो कोई चोरी की गाडि़यों के पुरजे बेचता था. बस्ती के अंदर बीसियों रद्दी वालों की दुकानें थीं. लोहे के सामान और तांबे के तार खूब बिकते थे.

बस्ती की ‘गरीब’ औरतें पास के औद्योगिक क्षेत्र में बनी कंपनियों में ?ाड़ू मारने और पैकिंग करने का काम किया करती थीं. 20-30 फीसदी कम पगार लेने के चलते उन्हें आसानी से काम मिल जाया करता था, पर कम पगार की भरपाई वे कंपनियों में से सामान चोरी कर के किया करती थीं.

चौकीदार को धमका कर या फिर मुफ्त की दारू का लालच दे कर या फिर चोरी के माल में हिस्सा दे कर मिला लिया जाता था. कुछ शातिर औरतें जासूसी भी करती थीं. उन से मिली सूचना के आधार पर ही कंपनियों में रात में चोरियां होती थीं. कई औरतें, जिन के पति दारूबाज थे, वे नौकरी के साथसाथ जिस्मफरोशी का धंधा कर के अपना घर चलाती थीं.

महीनेभर बाद ही ये लोग अपने हाथ का कमाल दिखाते थे. अगर कभी सुपरवाइजर ने पकड़ लिया तो रोधो कर, छाती पीट कर, गरीबी का गाना गा कर, औरत होने की दुहाई दे कर या फिर पहली गलती है आगे से कभी नहीं होगी कह कर बच निकलती थीं. ऐसे मौकों पर ज्यादातर सुपरवाइजर को ही नौकरी से हाथ धोना पड़ता था.

‘‘शिंदे साहब, अब आप ही बताओ कि एक दिन में 6 महीनों की गंदगी कैसे साफ करें?’’ इतना कह कर बनसोडे के माथे पर बल पड़ गए.

तभी अकबर, जो ड्रग्स का धंधा किया करता था, बोल पड़ा, ‘‘सफाई गई तेल लेने. अरे, बस्ती में जो एकमात्र सुलभ शौचालय था, उसे भी लोगों ने बंद करवा दिया.’’

शिंदे ने पूछा, ‘‘वह क्यों भला?’’

अकबर ने बताया, ‘‘लोग कहते हैं कि हम गरीब हैं और संडास का 5 रुपया भी बहुत ज्यादा है. इसे मुफ्त करो, नहीं तो पहले की तरह हम लोग डब्बा ले कर पहाड़ी पर जाएंगे.’’

शिंदे बोला, ‘‘इन को सब चीजें मुफ्त में चाहिए. हर घर में 2-2 डिश एंटीना लगे हैं, पैसे बरस रहे हैं, पर 5 रुपया भी नहीं निकालेंगे.’’

तभी शबनम, जिस का आदमी गैरकानूनी रूप से गाय के बछड़े काटता था और शबनम, जो टिफिन में मांस भर कर आसपास के होटलों में दे कर आती थी, ने बीच में ही टोका, ‘‘अरे अकबर भाई, तुम क्या रोना ले कर बैठ गए. असली मुद्दा तो नेताजी के बस्ती के दौरे को कामयाब बनाना है.’’

शिंदे ने कहा, ‘‘यह बात सही कही शबनम बहन ने. हमें इधरउधर ध्यान नहीं भटकाना है.’’

अकबर और शबनम के बीच गहरा संबंध था. दोनों मौका देख कर यूसुफ के रूम में आधी रात को मिलते थे, जबजब यूसुफ की नाइट ड्यूटी रहती थी. पड़ोसी सबकुछ जानते थे, पर पिटाई के डर से या खुद का भेद खुलने के डर से वे चुप रहना ही पसंद करते थे.

अफसाना और सुलेखा, जो कि मानवाधिकार संगठन की सदस्या थीं, ने अचूक रास्ता निकाला.

‘‘देखो, अपने नेताजी को बस्ती के अंदरूनी हिस्सों का दौरा कराओ ही मत. नेताजी गाड़ी से उतर कर 50-60 मीटर चल लेंगे. सब लोग नेताजी की जयजयकार कर देंगे. कुछ बच्चे उन के पैर छू लेंगे. लड़कियां उन पर फूलों के पंखुडि़यों की वर्षा कर देंगी. बस्ती के कर्ताधर्ता उन्हें फूलों की माला पहना देंगे,’’ अफसाना ने कहा.

‘‘वाहवाह, क्या दिमाग पाया है,’’ कह कर भालेराव ने जोर से तालियां बजाईं.

अब भालेराव ने बोलना शुरू किया, ‘‘इस के बाद नेताजी को बस्ती के एक घर में ले जाएंगे, जहां औरतें थाल में पानी भर कर तैयार रहेंगी. नेताजी को एक कुरसी पर बैठा कर उन के पैर थाल में रखे जाएंगे. 2 औरतें उन के पैर धोएंगीं.’’

शिंदे ने कहा, ‘‘फिर उन्हें ताजमहल होटल से लाई गई चाय पिलाएंगे.’’

बनसोडे ने बताया, ‘‘इसी बीच कुछ बूढ़ी औरतें उन से कुछ बेकार सी शिकायत करेंगी, जिन का हल निकालने के लिए नेताजी उन्हें अगले हफ्ते अपने ‘जनता दरबार’ में बुलाएंगे. इस बात पर हम सब जोरजोर से ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारे लगाएंगे.’’

‘‘वाह बनसोडे, लगता है कि तू आजकल हिंदी फिल्में खूब देखता है’’

‘‘ऐ माने, तू मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रहा है न कहीं?’’

माने ने कहा, ‘‘नहीं यार, तू मेरा यार है, यारों का यार है.’’

‘‘अच्छा, अब मस्काबाजी बंद कर.’’

बनसोडे बोला, ‘‘ओ शिंदे साहब…’’

शिंदे ने कहा, ‘‘बोलो बनसोडे, मैं सुन रहा हूं.’’

‘‘शिंदे साहब, चाय के साथसाथ ताजमहल होटल से ही उन के लिए नाश्ता भी मंगा लेना.’’

‘‘हां, यह अच्छा आइडिया है,’’ शिंदे ने बनसोडे की बात का समर्थन किया.

अफसाना ने कहा, ‘‘अबे बेवड़ो, बस्ती की औरतों से ढंग से नाटक नहीं हो पाएगा. क्यों न मंदा को बोल कर उस की नाटक कंपनी में से कुछ लड़कियों को बुलवा लें? तुम सब लोग क्या बोलते हो?’’

सब ने अफसाना के विचार का जोरदार समर्थन किया. बात तो पते की कही थी अफसाना ने. देर रात तक चली इस बैठक में आखिरकार सभी समस्याओं का हल निकाल लिया गया. सब ने दारू पी और मुरगा खाया.

शबनम बोली, ‘‘रात जवां है, हम भी जवां हैं. लाइट बंद करो और सब चालू हो जाओ.’’

तुरंत लाइट बंद हुई और सभी काम पर लग गए. पूरा कमरा मुगलों का हरम बन गया था. डेढ़ 2 घंटे बाद सभी इज्जतदार लोग अपनेअपने घरों की तरफ चल पड़े. इसी बीच उन के घरों में लीला रचा चुके उन के पड़ोसी भी अपनेअपने घरों की तरफ रवाना हो चुके थे. आखिर वे भी तो इज्जतदार थे. उन्होंने भी ‘इज्जत’ का मुखौटा जो लगा रखा था.

सुबह होने के बाद बस्ती की सड़क की तरफ के 10 झपड़ों को चुना गया. उन घरों में रहने वालों को नेताजी के भावी दौरे की सूचना दे दी गई. उन्हें अपनेअपने घरों की सफाई के अलावा घर के सामने की सफाई करने को कहा गया. जिस ने ढंग से सफाई नहीं की, उस के घर पर बुलडोजर चल सकता है.

बुलडोजर का नाम सुनते ही सब बेचारे गरीब लोग डर से गए. सभी ने अपनी औरतों से कहा और सफाई में जुट गए. कोई नहीं चाहता था कि बस्ती में बुलडोजर आए, वरना उन के सभी गैरकानूनी काम बंद हो जाएंगे. इन्हीं कामों में तो वन टू का फोर खुलेआम होता था.

बस्ती के कुछ डरपोक किस्म के लोग शाम के समय बस्ती के बाहर स्टौल लगा कर तरहतरह के खानेपीने के सामान मसलन पानीपूरी, आलू टिक्की, नूडल्स, आमलेट वगैरह बेचा करते थे. शाम को काम से छूट कर घर जाने वाले लोग सस्ते के चक्कर में इन चीजों को खूब खाते थे. सस्ते के नाम पर लोगों को जहर खिलाया जाता था.

बस्ती वाले मार्केट से ऐक्सपायरी डेट का सामान ले कर आते थे. इसी तरह फूटे हुए अंडे, मरी हुई मुरगियां, काला पड़ गया खाने का तेल काम में लाया जाता था. कबूतरों को हलाल कर के उन का मांस मुरगियों के मांस के साथ मिला दिया जाता था.

कांदाबटाटा मार्केट से चोरी का प्याजआलू एकचौथाई रेट पर खरीदा जाता था. भाजीपाला मार्केट से चोरी की हुई या फेंकी हुई सब्जी खरीदी जाती थी. इन सस्ती चीजों को खा कर अनगिनत लोगों बीमार पड़ चुके थे, पर सस्ते का लालच सोचने की ताकत को दबा देता है.

वैसे, अगर बनसोडे की बात मानें, तो वह यही कहा करता था, ‘‘इस बस्ती में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी विचारधारा के लोग रहते हैं. इन लोगों का एकदूसरे की बीवियों के साथ कुछ ज्यादा ही गहरा संबंध है. भंडारे में हर कोई शामिल होता है. कुछ लोग तो ऐसे भी हैं, जो गूगल पर सर्च करते हैं कि आज कहां भंडारा है.’’

मोरे, जो दलित पैंथर ग्रुप से संबंध रखता था, ने एक बहुत बड़ी बात कही थी, ‘‘बस्ती वालों की यह एकता ही उन की कामयाबी का राज है. अगर गलती से भी कोई पुलिस की टीम बस्ती के अंदर घुस गई तो क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या जवान और क्या औरतें… सभी मिलजुल कर पत्थरबाजी करते थे.

‘‘शाम को जब चैनल वाले आते तो उन्हें देख कर औरतें और लड़कियां ऐसे बिलखबिलख कर रोतीं, छाती पीटतीं और जमीन पर ऐसे लोटतीं, मानो पता नहीं क्या हो गया.

‘‘गरीबी, दलित और अल्पसंख्यक का इतना जोरदार विक्टिम कार्ड खेला जाता था कि चैनल वाले इसे मुख्य समाचार बना देते थे.’’

तभी बनसोडे, जो पास में ही खड़ा पान चबा रहा था, थूक निगल कर बोला, ‘‘मोरे, यह दुनिया अपने मतलब की है. आखिर चैनल वालों को भी तो गरमागरम खबरें चाहिए अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए. कई बार तो सम?ादार चैनल वाले पैसा दे कर भी नाटक करवाते हैं. सब पैसों का खेल है. ढंग से पैसे मिलें तो कपड़े भी फाड़ डालें.’’

वैसे, सब से बड़ी बात तो शिवबदन ने बताई. शिवबदन का गांव उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में था. कहने को तो वह बिजली मिस्त्री था, पर सुबहशाम अपनी मकान मालकिन की टपरी पर समोसे, भजिया और वडे तलता था. रात को अपनी मकान मालकिन के कमरे में ही सोता था.

‘‘साहब, इन बस्ती वालों की असली कमाई तो चुनाव के समय में होती है.’’

नेताजी के बहुचर्चित ?ांपड़पट्टी के दौरे से एक दिन पहले एक खास टीम आई. उस टीम में कुछ सिक्योरिटी अफसर, मीडिया वाले और पार्टी के कुछ खास लोग थे. इन्होंने बस्ती वालों के साथ बस्ती का मुआयना किया और नेताजी के बस्ती दौरे को कामयाब बनाने पर सोचविचार किया.

अगले दिन नेताजी धूमधड़ाके के साथ बस्ती का दौरा करने आए. उन के स्वागत में 15 मिनट तक आतिशबाजी हुई. बच्चे, बूढ़े और औरतों ने नेताजी की जयजयकार की. फिर नेताजी को सिक्कों से तोला गया. नेताजी ने उन सिक्कों को हाथों से छू कर गरीबों में बांटने का हुक्म दिया. सब बस्ती वाले तुरंत ?ाली फैला कर खड़े हो गए.

मोरे चिल्लाया, ‘‘बनसोडे, एक लट्ठ ला कर बजा इन पर. गांव बसा नहीं और भिखारी चले आए.’’

नौजवानों ने आगे बढ़ कर नेताजी के पैर छुए. नेताजी खुश हो गए. पर नेताजी को असली खुशी तब हुई, जब लड़कियों ने उन के पैर छुए. नेताजी खुश हो कर उन की पीठ पर हाथ फेरे जा रहे थे.

गहमागहमी बढ़ते ही जा रही थी. फिर फोटो सैशन हुआ. नेताजी पर जम कर फूलों की वर्षा की गई. कुछ बूढ़ी औरतें, जिन्हें डेटौल मिले पानी से रगड़रगड़ कर नहलाया गया था, ताकि उन के करीब जाने से नेताजी को कहीं इंफैक्शन न हो जाए, ने नेताजी को अपना माईबाप बताया.

तभी नेताजी के निजी सचिव ने कहा, चूंकि नेताजी बिजी होने के बावजूद बस्ती वालों की खास गुजारिश पर बस्ती में आए हैं, इसलिए आगे का कार्यक्त्रम तेजी से निबटाया जाए. जैसा कि सभी को पता है, नेताजी लोक नेता हैं, इसलिए उन्हें और काम भी हैं, समय की बेहद कमी है.’’

अब नेताजी की सवारी धीरेधीरे सरकनी शुरू हुई. 150 फुट चली होगी कि 2 भाई लोगों ने निजी सचिव की जेब में 500 रुपयों के नोटों की 4 गड्डियां डालीं. निजी सचिव ने कारवां को वहीं रुकने का इशारा किया. सामने बनी ?ांपड़ी में नेताजी ने प्रवेश किया. निजी सचिव ने धीरे से नेताजी के कान में कहा कि चायनाश्ता ताजमहल होटल का है.

अंदर 2 डाइटिशियन टैस्ट कर के खाना परोस रही थीं, फिर भी नेताजी ने दो घूंट चाय पी. उन के निजी सचिव ने कहा कि नेताजी ने बस्ती वालों के लिए उपवास रखा है, इसलिए नाश्ता नहीं करेंगे. सभी बस्ती वाले यह सुन कर खुश हो गए. फिर से सभी ने नेताजी की जयजयकार की.

तभी एक भाई ने मौका देख कर नेताजी को एक बैग भेंट में दिया.

नेताजी ने पूछा, ‘‘कितने हैं?’’

भाई बोला, ‘‘10 लाख हैं दादा. बाकी के 20 लाख अगले हफ्ते औफिस में पहुंचा दूंगा.’’

नेताजी ने बैग अपने निजी सचिव को पकड़ाया और हाथ जोड़ कर सभी बस्ती वालों से कहा, ‘‘आप लोगों का अपनापन देख कर बेहद खुशी हो रही है. आप सभी का कल्याण हो. अच्छा, अब इजाजत दीजिए. जय हिंद.’’

इतना कह कर नेताजी चल पड़े. साथ में बस्ती वालों का हुजूम चल पड़ा. कुछ बूढ़ी औरतें रोने लगीं. नेताजी का काफिला देखते ही देखते आंखों से ओ?ाल हो गया.

एक बुजुर्ग दूसरे बुजुर्ग से बोला, ‘‘जब यह नेतवा मार्केट में घूमघूम कर नीबू बेचता था, तब नहीं थकता था. पर, अभी तो तुरंत ही थक जाता है.’’

बनसोडे ने कहा, ‘‘चचा, यह नीबू बेचताबेचता गरीबों का मसीहा बन गया और तुम हमाल के हमाल ही रह गए.’’

बनसोडे की बातें बुजुर्ग को अच्छी नहीं लगीं, पर फिर भी उन्होंने चुप रहने में ही अपनी भलाई सम?ा.

बनसोडे ने कहा, ‘‘अरे भालेराव, नेताजी तो गए. अब चलो हम ही लोग चायनाश्ता कर लें.’’

भालेराव बोला, ‘‘नाश्ता, अरे वह तो सब प्रैस वाले ले गए. अपने घर जा कर नाश्ता करो.’’

‘‘हे देवा, अब क्या होगा. घरवाली तो ड्यूटी पर गई है.’’

‘‘अबे घोंचू, जब्बार की कैंटीन में चल कर खाते हैं फ्री में.’’

दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़े मुसकराते हुए चल पड़े.

कुहू : परिवार को संभालती एक हिम्मती लड़की

लेखक – प्रदीप कुमार रॉय 

वह अपने मातापिता का एकलौता बेटा था. 3 बहनें उस से बड़ी थीं. हम लोग उस के पड़ोस में रहते थे. उस के लालनपालन को देख कर बचपन से ही मैं उस से जलता था.

वह मुझ से 5 साल छोटा था, पर उसे वे सारी सुविधाएं मुहैया थीं, जिन की चाह अकसर हर बच्चे को होती है.

उस के पास खेलने के लिए महंगे खिलौने थे, पहनने को एक से एक मौडर्न पोशाकें थीं, पढ़ने के लिए तरहतरह की पत्रिकाएं और कहानियों की ढेरों किताबें थीं.

कम आमदनी के बावजूद भी उस के पिता उस की तमाम जायज और नाजायज जरूरतों को पूरा करने में खुशी महसूस करते थे, जिस की भरपाई बहनों से होती थी. उन की तो आम जरूरतें ही पूरी नहीं होती थीं.

वे तीनों एक जोड़ी कपड़े में साल निकाल देती थीं. पढ़नेलिखने के लिए किताबें और कौपियां भी नहीं होती थीं. लड़कियां पढ़लिख लें, इस की चिंता मांबाप को कतई नहीं थी. लड़कियां घर के कामकाज में लगी रहती थीं और मांबाप बेटे की देखभाल में.

दोनों बड़ी बहनों की पढ़ाई 5वीं-6ठी क्लास तक ही सिमट कर रह गई. उन्हें इस की कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि उन्होंने तो छोटी उम्र से ही  झाड़ूपोंछा से ले कर चौकाबरतन तक सभी कामों में अपनेआप को ढाल लिया था, घर का सारा काम संभाल लिया था, बल्कि ऐसा करने पर उन्हें मजबूर किया गया था, क्योंकि नौकरचाकर को तो खर्च में कटौती के लिए हटाया जा चुका था. तकलीफें तो बहनों को सहनी पड़ी थीं.

लेकिन, जो सब से ज्यादा अनदेखी की शिकार हुई थी, वह थी कुहू. बस, इसी के चलते उसे बचपन से ही पढ़ाईलिखाई में बेहद दिलचस्पी थी. घर के कामकाज से उसे न कोई लगाव था और न ही कोई इच्छा थी. वह दिनभर पढ़नेलिखने में ही लगी रहती थी, जिस का खमियाजा उसे मां की डांटफटकार से भुगतना पड़ता था.

मां से डांट पड़ती… वे कहतीं, ‘‘क्या कर लेगी पढ़लिख कर. लड़की जात है, कुछ भी कर ले, चूल्हाचौका में सिमट कर रह जाएगी. बेहतर है कि अभी से घरगृहस्थी के काम सम झ ले, नहीं तो बाद में पछताएगी. फिर न कहना कि मां ने यह सब सिखाया नहीं था.’’

कभीकभी उसे मार भी पड़ती थी. बड़ी दोनों बहनें काम करती थीं, इसलिए उन्हें मार नहीं पड़ती थी. ये सब बातें कुहू के दिलोदिमाग पर इस तरह से रचबस गई थीं कि बरसों बाद आज जब मैं उस से मिला, तो आगबबूला हो कर अपनी भड़ास निकालते हुए मु झे बताने लगी.

दरअसल, मैं उस की बड़ी बहन की शादी में शरीक होने आया था. इधरउधर की बातों के बाद जब मैं ने उस के भाई संतु के बारे में जानने की इच्छा जाहिर की, तो वह भड़क गई और अनापशनाप बकने लगी.

गुस्से में कुहू न जाने क्याक्या कह गई, ‘‘तीसरी बेटी के रूप में पैदा होना जैसे मेरे लिए एक कलंक था… शायद मांबाप की इच्छा के खिलाफ मैं पैदा हो गई थी. एक साल के बाद ही संतोष उर्फ संतु पैदा हुआ था. बेटे के आते ही घर में रौनक का माहौल बन गया था. मांबाप का उस के प्रति जरूरत से ज्यादा लाड़प्यार से मैं असहज महसूस करती. अपनेआप को मातापिता की नजरों में हमेशा गिरा हुआ पाती. अपने प्रति मां के भेदभाव को तब मैं अच्छी तरह सम झने लगी थी. मेरे पैदा होते ही गुस्से से पिता ने भगवान की फोटो को नदी में फेंक कर घर में पूजापाठ पर रोक लगा दी थी,’’ ऐसा बताते हुए कुहू फूटफूट कर रो पड़ी थी.

संतु के पैदा होते ही भगवान को घर में फिर से प्रतिष्ठित किया गया था और घर में पूजापाठ फिर से शुरू हो गया था. ऐसा कुहू ने सुना था और भी उस ने बताया कि किस तरह खानेपहनने में उन की मां उन के साथ भेदभाव किया करती थीं… ‘‘सुबह नाश्ते में अकसर हम बहनों के लिए बासी रोटी होती थी और वे भी रूखीसूखी, जबकि संतु के लिए परांठे और मक्खन. दूध, दही, फल वगैरह के लिए तो हम बहनें तरस ही जाती थीं.

‘‘संतु के खाने के बाद अगर कुछ बचता तो ही हमें नसीब होता था. एक जोड़ी स्कूल के कपड़ों से हफ्ता निकाल देती थीं… पसीने की बदबू आती थी, सहेलियां फब्तियां कसती थीं, जबकि संतु की पोशाक हमेशा लौंड्री से धुली हुई होती थी.

‘‘इस्तरी वाले पोशाक हम बहनें सिर्फ किसी खास मौके पर, जैसे गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस पर ही पहनती थीं, जिस के लिए हम शाम को स्कूल के बाद खुद अपने कपड़े धोतीं और पंखे के नीचे सुखाया करतीं…

‘‘बड़ी दीदी कपड़ों पर इस्तरी कर देतीं. कभीकभी कपड़े सूख नहीं पाते और गीले कपड़ों में ही स्कूल जाना पड़ता था… और वहीं संतु… जिसे मांबाप ने सिर पर बिठा रखा था, आज..’’  कहतेकहते कुहू दोबारा फफक कर रो पड़ी.

कुहू की इन बातों से कुछ पता चले या न चले, पर इतना तो साफ हो गया था कि संतु के किसी गैरजिम्मेदाराना बरताव से उसे गहरा सदमा पहुंचा है और वह दुखी है. ऐसे समय में मैं ने उसे कुरेदना ठीक नहीं सम झा. मैं ने उसे हिम्मत बंधा कर चुप कराया.

शादी में काफी लोग थे. पर न जाने क्यों चहलपहल में कमी कहीं न कहीं मु झे डरा रही थी. मैं 10 साल बाद इस परिवार से मिल रहा था.

मेरी 10वीं जमात के बाद पिताजी का तबादला हो गया और उस के बाद कभी कोई ऐसा मौका नहीं आया कि हम मिलते. कुहू से कालेज में बातचीत हो जाती थी… पर सीमित रूप से. कई पुराने दोस्तों से वहां मुलाकात हुई. उन लोगों से ही संतु के बारे में जानकारी मिली और उस के वहां न होने की वजह साफ हो गई.

दरअसल, कालेज में फर्स्ट ईयर के दौरान संतु पिंकी के प्रेमपाश में फंस गया था, जिस पर कुहू ने एतराज जताया था, क्योंकि कुहू पिंकी के चरित्र से अच्छी तरह वाकिफ थी.

पिंकी कुहू की हमउम्र थी. दोनों एक ही क्लास में पढ़ती थीं. पिंकी को डांस में दिलचस्पी थी. वह बचपन से ही कथक डांस की तालीम ले रही थी. स्कूल हो या कालोनी… सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में डांस करने के लिए उसे कहा जाता था. डांस के सिलसिले में उसे अपने ग्रुप के साथ शहर से बाहर भी जाना पड़ता था.

कुहू और पिंकी दोनों अच्छी सहेली हुआ करती थीं. दोनों का एकदूसरे के घर पर आनाजाना था. उन का एकसाथ पढ़नालिखना और घूमनाफिरना भी था. तब पिंकी के कई बौयफ्रैंड हुआ करते थे, जो शायद पिंकी के मुताबिक डांस ग्रुप से ही जुड़े थे, इसलिए कुहू उन से अनजान थी.

स्कूल जाते हुए या कभी शाम को टहलते हुए उन दोस्तों में से कोई न कोई पिंकी से मिलने आ जाता था. कई बार कुहू को उन के मिलनेजुलने का ढंग अच्छा नहीं लगता था. वह पिंकी से इस की शिकायत भी करती, पर वह किसी न किसी बहाने सबकुछ टाल जाती.

कई बार तो पिंकी रातरात भर घर से बाहर रहती, पर अपने घर पर बता कर आती कि वह कुहू के घर जाएगी गणित की प्रैक्टिस करने. कभीकभी तो किसी कार्यक्रम के लिए डांस की प्रैक्टिस करने का बहाना बना कर रातभर घर से नदारद रहती थी.

पिंकी की मां के पूछने पर कुहू वैसा ही बताती, जैसा कि उसे पिंकी के द्वारा कहने को कहा जाता था. उस के लिए कुहू को बेवजह ही  झूठ बोलना पड़ता था, जो वह नहीं चाहती थी. उन लड़कों के चालचलन पर उसे शक होने लगा था. यकीनन, ये आवारा लड़के ही थे, जिन से पिंकी का मेलजोल था.

पूछने पर पहले तो कुहू ने आनाकानी की, पर असलियत का पता चलते ही फौरन कुहू ने पिंकी से दूरी बना ली. फिर भी पिंकी कहीं न कहीं किसी रैस्टोरैंट में, पार्क में या सड़क पर किसी पेड़ की आड़ में लड़कों के साथ मटरगश्ती करती दिख ही जाती. कभी किसी के साथ तो कभी कोई और होता था. खुले आसमान में चिडि़या अपने पंख फैला कर उड़ रही थी… न कोई दिशा थी और न ही कोई मंजिल.

अब संतु की बारी थी. वह भी पिंकी के प्यार के चंगुल से बच नहीं पाया. वह पिंकी पर फिदा हो चुका था. सरेआम दोनों का मिलनाजुलना होता था.

पिंकी के साथ संतु का मेलजोल कुहू को बिलकुल बरदाश्त नहीं था, क्योंकि पिंकी की कोई भी बात उस से छिपी तो थी नहीं.

कुहू नहीं चाहती थी कि उस का भाई पिंकी के साथ रह कर बिगड़ जाए. उस की पढ़ाई में कहीं बाधा न हो.

जब कुहू ने अपना कड़ा एतराज जताया, तो संतु ने अपनी बहन को ही भलाबुरा कह डाला. तमतमाए चेहरे से अपनी बहन को ओछी सोच वाला बताया और यह भी कह डाला कि वह पिंकी से जलती है.

कुहू संतु को साफसाफ कहना चाहती थी, ‘गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड का होना हर किसी का निजी मामला है. किसी को उस में दखल देने का कोई हक नहीं है. फिर किसी के तुम्हारी गर्लफ्रैंड होने से भला मु झे कोई शिकायत या परेशानी क्यों होगी. दरअसल, परेशानी की बात यह है कि पिंकी की बुरी संगति से एतराज है.’

पर कुहू ने चुप रहना ही उचित सम झा, क्योंकि उसे यकीन था कि जल्दी ही पिंकी आदतन संतु को भी अपने हाल पर छोड़ कर किसी और को फंसा लेगी.

आखिर हुआ भी वही…  संतु को ठुकरा कर पिंकी पैसों के लिए किसी और के साथ अठखेलियां करने लगी

थी. पर एक पागल प्रेमी की तरह संतु अपनेआप को पिंकी से अलग होने की बात सोच भी नहीं सकता था.

वह पिंकी के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. उस ने दाढ़ी बढ़ा ली और पिंकी के इर्दगिर्द चक्कर काटने लगा, ताकि पिंकी उस पर तरस खा कर फिर से दोस्ती का हाथ बढ़ा ले.

पर पिंकी तो पुरानी खिलाड़ी निकली. उस ने अपना पुराना नुसखा आजमाया. नतीजतन, संतु चोटिल हालत में अस्पताल के बैड पर कराहता मिला. इन सब बातों के बावजूद अपनी बहन के साथ उस का संबंध बिगड़ा ही रहा.

संतु का पिंकी की निजी जिंदगी में दखल पिंकी और उस के बौयफ्रैंड को गवारा न हुआ. संतु से छुटकारा पाने के लिए पिंकी और उस के बौयफ्रैंड ने कोर्टमैरिज कर ली. इस में शायद उस के बौयफ्रैंड की ही पहल रही होगी.

अब तो संतु पढ़ाई वगैरह छोड़ पागलों की तरह भटकने लगा. उसे शराब की लत लग गई थी. घर पर वह कभीकभार ही आता था.

संतु की बदहाली पर घर के सभी सदस्य परेशान थे. जिस लड़के को मांबाप ने बेटियों की सामान्य जरूरतों की अनदेखी कर लाड़प्यार से पालापोसा, उस की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी.

आज संतु दरदर भटक रहा है. किस मांबाप से यह सब सहन होगा… घर पर पहली शादी थी और घर का एकलौता बेटा इस खुशी के मौके पर नहीं था. खुशी के माहौल में वहां मातम सा पसरा था.

संतु कुछेक साल यों ही गुमशुदा रहा. हुआ यों कि आखिरी बार जब वह घर आया था और मांबाप ने उस की शादी की बात चलाई थी, तो उस ने साफ मना कर दिया था.

संतु ने कहा था कि वह शादी नहीं करेगा और अगर करेगा भी तो किसी विधवा से करेगा. शादी और विधवा से? ऐसे बेतुके लगने वाले प्रस्ताव पर किसी की रजामंदी नहीं थी.

पहले कुहू ने ही अपना विरोध जताया था, मातापिता ने बस कुहू के फैसले पर हामी भरी थी, पर उन के अंदर की सुगबुगाहट किसी से छिपी नहीं थी. आखिर बेटा जो ठहरा.

दरअसल, उन्हें अपने बेटे के द्वारा लिए गए फैसले को किसी क्रांतिकारी कदम से कम नहीं सू झा. पर, खुल कर कुछ कहने से बचे रहे. वे कुहू के खिलाफ जा कर उसे नाराज नहीं करना चाहते थे. कुहू ही तो एकमात्र सहारा थी. वैसे भी दोनों बड़ी बहनें शादी के बाद ससुराल में थीं. संतु अपने फैसले पर अडिग रहा.

जातेजाते संतु ने इसे अपना फैसला बताते हुए कहा कि चाहे कुछ भी हो, वह ऐसा कर दिखलाएगा. संतु के मुंह से विधवा विवाह वाली बात सभी कीसम झ से परे थी.

संतु कहीं बाहर चला गया. किसी ने भी उसे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की. सुनीसुनाई खबर थी कि आजकल वह हरिद्वार के किसी आश्रम में रह रहा है और योग सिखा रहा है. इस बात से पता नहीं क्यों मु झे बड़ा सुकून मिला.

मु झे महसूस हुआ कि शायद अब संतु सुधर गया है, वरना किसी विधवा से विवाह की बात उस के मन में क्यों आई. उस में मु झे समाजसुधारक की छवि नजर आने लगी. उस से मिलने की इच्छा मेरे मन में जाग गई, पर सिर्फ मन मसोस कर रह जाना पड़ा. सिवा इस के मेरे पास कोई उपाय नहीं था.

बूढ़े मांबाप के साथ अब अकेली कुहू ही रह गई. अपने मांबाप को साथ लिए इलाहाबाद आ गई. वहां वह कालेज में टीचिंग का काम कर रही है.

कुहू को दुख इस बात का था कि मांबाप की हर खुशी का ध्यान रखते हुए भी उस के लिए उन्हें कोई फिक्र न थी, बल्कि बातबात में संतु को याद कर के वे परेशान होते.

इसी सदमे में पिताजी चल बसे. संतु का कोई ठिकाना नहीं था. उसे यह खबर नहीं दी जा सकी. मैं पहुंच गया था.

कुहू की मां को अब अपने पति के खोने का गम सताने लगा था. वे कुछ ज्यादा ही बेचैन रहने लगी थीं. उन्हें शायद यह डर था कि कुहू शादी कर लेगी, तो उन का क्या होगा? वे कहां रहेंगी? इस शक से तो वह शायद पति के रहते हुए भी चिंतित थीं, लेकिन कभी खुलासा नहीं किया था.

आजकल मां के हावभाव से कुहू सम झने लगी है. कभीकभार तो अनायास ही इशारेइशारे में कुछ कह जाती हैं. अब पहले की तरह कोसती नहीं. बचपन में बातबात पर कोसती थीं. पढ़नेलिखने में बाधा पैदा करती थीं.

कितनी छोटी सोच थी कि बेटा पढ़लिख कर मांबाप के बुढ़ापे का सहारा बनेगा. बेटी पढ़ेगी तो क्या कर लेगी, आखिर ससुराल ही तो जाएगी. अपने मांबाप के लिए तो पराई ही होगी…

तभी तो बचपन से कुहू ने अपने घर में पराई होने जैसी दुखद घडि़यों को जिया है. बचपन से ही उसे पढ़ने की जिद रही है. माहौल न होने के बावजूद भी उस ने पढ़ाई जारी रखी. बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और उन्हीं पैसों से पढ़ाई का खर्च निकालती.

एमए के बाद कुहू टीचिंग में आ गई. साथसाथ पीएचडी भी कर रही है. अपनी हैसियत पर हर टारगेट को हासिल किया है उस ने. दोनों बहनों की शादी में हाथ बंटाया, वरना उस के पिताजी की आमदनी ही कितनी थी. उस ने अपनी जिम्मेदारी से कभी मुंह नहीं मोड़ा. अब इस हालत में मां को छोड़ कर अपनी शादी की बात कैसे सोच सकती थी वह.

बचपन से ही हम एकदूसरे को चाहते थे. बड़े हुए तो बड़ी सादगी से मिलते थे. रिश्ते को निभाने में शुरू से हम ने कभी ऐसी कोई फूहड़ हरकत नहीं की, जिस से हमारे संबंध की भनक तक किसी को पड़ती.

हम दोनों के रिश्ते की बात सिर्फ हम ही जानते थे. हम एकदूसरे की तकलीफों और मजबूरियों को बखूबी सम झते थे. किसी ने भी कभी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, तभी तो हमारे संबंध मजबूत थे.

कुहू ने बताया कि एक दिन अचानक संतु मां को लेने आ गया. उस ने शादी कर ली थी. यही बताया था संतु ने मां को. मां तो जैसे बेटे के इंतजार में बिलकुल तैयार बैठी थीं. बेटे के साथ ऐसी गईं, मानो अचानक तय समय से पहले किसी कैदी की सजा माफ कर दी गई हो. ऐसा लगा जैसे वह यहां कैदी

की जिंदगी जी रही थीं और छुटकारा मिलते ही भाग खड़ी हुईं. कुछ कह कर भी नहीं गईं.

कुहू उन्हें जाते हुए देखती रह गई. मुड़ कर भी पीछे नहीं देखा था उन्होंने. यहां से चले जाने के बाद वह अकेली कैसे रहेगी, पूछा तक नहीं.

कुहू की 10 साल की तपस्या एक पल में भंग हो गई, मानो इस जमाने में लड़की के रूप में जन्म लेना ही पाप है. रोरो कर कुहू का बुरा हाल था. उसे दिलासा देने वाला कोई भी साथ नहीं था. उस के कहने पर एक परची में संतु अपना पता छोड़ गया था.

अचानक एक दिन कुहू ने मु झे आने को कहा. आननफानन में ही हम दोनों ने आर्य समाज विधि से शादी कर ली. सिर्फ मेरे घर के लोग शादी में थे.

कुहू ने किसी को भी नहीं बुलाया था. मां, बहनें और भाई किसी को भी नहीं. जब किसी को उस की फिक्र नहीं है, तो वह क्यों उन्हें बुलाए.

उन लोगों के प्रति कुहू के मन में गुस्सा होना मुझे लाजिमी लगा. मेरे घर के लोग इस शादी से बेहद खुश लगे.

कई महीने बीत गए. पता नहीं अचानक कुहू को मां की याद आने लगी. हम दोनों ने उन से मिलने का मन बनाया. हरिद्वार के किसी आश्रम का पता परची में लिखा था.

जब हम वहां आश्रम में पहुंच कर संतु के बारे में पूछताछ कर रहे थे, तो मैलीकुचैली साड़ी में लिपटी एक दुबली सी बुढि़या कुहू से लिपट कर रोने लगीं.

वे मां हो सकती हैं, हम ने कल्पना भी नहीं की थी. वे सूख कर कांटा हो चुकी थीं, पहचानना मुश्किल हो रहा था.

मां की हालत पर कुहू भी बिलख कर रोने लगी थी. उन्हें शांत कराया. मां हमें संतु के घर पर ले गईं. वहां संतु नहीं था और न ही उस की पत्नी. वे कई दिनों से शहर से बाहर किसी योग शिविर में गए हुए थे.

मां ने बताया कि महीने में 20 दिन वे लोग घर से बाहर रहते हैं. हमें मां की बदहाली की वजह सम झते देर नहीं लगी. वहां दीवार पर टंगी फोटो में संतु के साथ पिंकी थी.

पिंकी के पति की मौत में हत्या का जो शक जताया जा रहा था, उस की तसदीक तो नहीं हो पाई थी, पर संतु को जिस विधवा विवाह की बात पर जिद थी, उस के पीछे की कहानी साफ हो गई थी.

तकरीबन घंटाभर रहने के बाद जब हम निकलने लगे, तो मां एक साफ साड़ी में तैयार हो कर बड़ी बेबसी से कुहू के चेहरे पर उभरते भावों को अपनी सूनी निगाहों से टोह रही थीं. कुहू ने विनम्र आंखों से मेरी रजामंदी मांगी थी. मां को साथ ले कर हम वहां से वापस आ गए.

स्टेटस: ऑटो रिक्शा चालक का संघर्ष

आटोरिकशा चालक रामलाल ने अपने बेटे को पढ़ाने के लिए खूब मेहनत की, ताकि अमीर लोग उसे गरीब न कह सकें. बेटा बड़ा हो कर इंजीनियर बन गया और अपने बूढ़े मांबाप को छोड़ कर दूसरे शहर चला गया, ताकि उस के स्टेटस में फर्क न आए…

बेचारा रामलाल आटोरिकशा वाला… हर कोई उस से तूतड़ाक से बात करता था. उसे बहुत बुरा लगता था. वह सोचता, ‘मैं गरीब हूं, लेकिन इनसान तो इन के जैसा ही हूं, फिर ये अमीर लोग इस तरह से क्यों बात करते हैं?’ रामलाल ने मन में प्रण कर लिया कि वह अपने बेटे को बड़ा अफसर बनाएगा, ताकि उस से कोई इस तरह बात न करे. इस के लिए रामलाल दिन में आटोरिकशा चलाता, रात में चौकीदारी करता, ताकि बेटे को बड़े स्कूल में  पढ़ा सके.

बेटा पढ़लिख कर इंजीनियर बन गया. उस का बड़ेबड़े लोगों के साथ उठनाबैठना हो गया था. अब उसे पिता के आटोरिकशा चलाने पर शर्म महसूस होती थी. लिहाजा, उस ने दूसरे शहर में अपना ट्रांसफर करा कर वहीं शादी करने का फैसला किया. कुछ समय बाद बेटे ने अपनी मां को फोन किया, ‘‘मां, कल मैं शादी कर रहा हूं. किसी दिन आ कर मैं आप का आशीर्वाद ले जाऊंगा.’’

यह सुन कर मां ने कहा, ‘बेटा, या तो तू यहां आ कर शादी कर ले या फिर हम वहां आ जाते हैं.’ ‘‘मां, वहां सब मुझे जानते हैं कि मैं आटोरिकशा वाले का बेटा हूं. मुझे शर्म आती है.

यहां मुझे कोई नहीं जानता, इसलिए मैं यहीं रहूंगा. आप यहां नहीं आना, क्योंकि यहां मेरा जो स्टेटस है, उस में आप एडजस्ट नहीं कर पाओगे,’’ बेटे ने कह डाला. इसी बीच रामलाल ने फोन ले कर कहा, ‘बेटा, इसी आटोरिकशा वाले ने ही तेरा यह स्टेटस बनाया है.

क्या तुम्हारी खुशियों में हमें शामिल होने का  या तुम्हारी जिंदगी में हमारा कोई हिस्सा नहीं है?’ यह सुन कर बेटे ने कहा, ‘‘पापा, आप ने जो किया वह अपने अहम के लिए किया. जब भी मेरे अच्छे नंबर आते थे, आप सब को बताते फिरते थे. अब मैं जिस शहर और सर्कल में हूं, वह दूसरा है.

यहां सब के मांबाप पहले से ही हैसियत वाले हैं.  ‘‘आप हमारे समाज को तो जानते ही हैं न, जो धर्म, जाति, रंग के साथसाथ बैकग्राउंड से भी बंटा हुआ है. आप ने ही मुझे समझाया था कि मैं मुसलिम और दलितों से दोस्ती नहीं करूं, क्योंकि वे हम जैसे नहीं हैं. आप और मां भी अब मेरे और आप की बहू जैसे नहीं हैं.’’ रामलाल मुंह खोले सुन रहा था और उस के पास जवाब देने लायक बोल नहीं बचे थे.

गलत फैसला : सुखराम चंदा गांव पहुंचा तो क्या देखा

रौयल स्काई टावर को बनते हुए 2 साल हो गए. आज यह टावर शहर के सब से ऊंचे टावर के रूप में खड़ा है. सब से ऊंचा इसलिए कि आगरा शहर में यही एक 22 मंजिला इमारत है. जब से यह टावर बन रहा है, हजारों मजदूरों के लिए रोजीरोटी का इंतजाम हुआ है. इस टावर के पास ही मजदूरों के रहने के लिए बनी हैं झोंपड़ियां.

इन्हीं झोंपड़ियों में से एक में रहता है सुखराम अपनी पत्नी चंदा के साथ. सुखराम और चंदा का ब्याह 2 साल पहले ही हुआ था. शादी के बाद ही उन्हें मजदूरी के लिए आगरा आना पड़ा. वे इस टावर में सुबह से शाम तक साथसाथ काम करते थे और शाम से सुबह तक का समय अपनी झोंपड़ी में साथसाथ ही बिताते थे. इस तरह एक साल सब ठीकठाक चलता रहा.

एक दिन चंदा के गांव से चिट्ठी आई. चिट्ठी में लिखा था कि चंदा के एकलौते भाई पप्पू को कैंसर हो गया है और उन के पास इलाज के लिए पैसे का कोई इंतजाम नहीं है.

सुखराम को लगा कि ऐसे समय में चंदा के भाई का इलाज उस की जिम्मेदारी है, पर पैसा तो उस के पास भी नहीं था, इसलिए उस ने यह बात अपने साथी हरिया को बता कर उस से सलाह ली.

हरिया ने कहा, ‘‘देखो सुखराम, गांव में तुम्हारे पास घर तो है ही, क्यों न घर को गिरवी रख कर बैंक से लोन ले लो. बैंक से लोन इसलिए कि घर भी सुरक्षित रहेगा और बहुत ज्यादा मुश्किल का सामना भी नहीं करना पड़ेगा.’’

कहते हैं कि बुरा समय जब दस्तक देता है, इनसान भलेबुरे की पहचान नहीं कर पाता. यही सुखराम के साथ हुआ. उस ने हरिया की बात पर ध्यान न दे कर यह बात ठेकेदार लाखन को बताई.

लाखन ने उस से कहा, ‘‘क्यों चिंता करता है सुखराम, 20,000 रुपए भी चाहिए तो ले जा.’’

सुखराम ने चंदा को बिना बताए लाखन से 20,000 रुपए ले लिए और चंदा के भाई का इलाज शुरू हो गया.

चंदा समझ नहीं पा रही थी कि इतना पैसा आया कहां से, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘इतना पैसा आप कहां से लाए?’’

तब सुखराम ने लाखन का गुणगान किया. जब कुछ दिनों बाद पप्पू चल बसा, तो उस के अंतिम संस्कार का इंतजाम भी सुखराम ने ही किया.

इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद सुखराम की मां भी चल बसीं. वे गांव में अकेली रहती थीं, इसलिए पड़ोसी ही मां का सहारा थे. पड़ोसियों ने सुखराम को सूचित किया.

सुखराम चंदा के साथ गांव लौटा और मां का अंतिम संस्कार किया.  जिंदगीभर गांव में खाया जो था, इसलिए खिलाना भी जरूरी समझा.

मकान सरपंच को महज 15,000 रुपए में बेच दिया. तेरहवीं कर के आगरा लौटने तक सुखराम के सभी रुपए खर्च हो चुके थे, क्योंकि गांव में मां का भी बहुत लेनदेन था.

इतिहास गवाह है कि चक्रव्यूह में घुसना तो आसान होता है, पर उस में से बाहर निकलना बहुत मुश्किल. जिंदगी के इस चक्रव्यूह में सुखराम भी बुरी तरह फंस चुका था. जैसे ही वह आगरा लौटा, शाम होते ही लाखन शराब की बोतल हाथ में लिए चला आया.

वह सुखराम से बोला, ‘‘सुखराम, मुझे अपना पैसा आज ही चाहिए और अभी…’’

सुखराम ने उसे अपनी मजबूरी बताई. वह गिड़गिड़ाया, पर लाखन पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह बोला, ‘‘तुम्हारी परेशानी तुम जानो, मुझे तो मेरा पैसा चाहिए. जब मैं ने तुम्हें पैसा दिया है, तो मु   झे वापस भी चाहिए और वह भी आज ही.’’

सुखराम और चंदा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वे उस के सामने मिन्नतें करने लगे.

लाखन ने कुटिलता के साथ चंदा की ओर देखा और बोला, ‘‘ठीक है सुखराम, मैं तु   झे कर्ज चुकाने की मोहलत तो दे सकता हूं, लेकिन मेरी भी एक शर्त है. हफ्ते में एक बार तुम मेरे साथ शराब पियोगे और घर से बाहर रहोगे… उस दिन… चंदा के साथ… मैं…’’

इतना सुनते ही सुखराम का चेहरा तमतमा उठा. उस ने लाखन का गला पकड़ लिया. वह उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देना चाहता था, लेकिन क्या करता? वह मजबूर था. चंदा चाहती थी कि उस की जान ले ले, मगर वह

खून का घूंट पी कर रह गई. उस के पास भी कोई दूसरा रास्ता नहीं था. जब लाखन नहीं माना और उस ने सुखराम के साथ मारपीट शुरू कर दी तो चंदा लाखन के आगे हाथ जोड़ कर सुखराम को छोड़ने की गुजारिश करने लगी.

लाखन ने सुखराम की कनपटी पर तमंचा रख दिया तो वह मन ही मन टूट गई. उस की आंखों से आंसू बहने लगे, इसलिए कलेजे पर पत्थर रख कर उस ने लाखन को अपने शरीर से खेलने की हामी भर दी.

लाखन बहुत खुश हुआ, क्योंकि चंदा गजब की खूबसूरत थी. उस का जोबन नदी की बाढ़ की तरह उमड़ रहा था. उस की आंखें नशीली थीं. यही वजह थी कि पिछले 2 साल से लाखन की बुरी नजर चंदा पर लगी थी.

बुरे समय में पति का साथ देने के लिए चंदा ने ठेकेदार लाखन के साथ सोना स्वीकार किया और सुखराम की जान बचाई.

सुखराम ने उस दिन से शराब को गम भुलाने करने का जरीया बना लिया. इस तरह हवस के कीचड़ में सना लाखन चंदा की देह को लूटता रहा. जब सुखराम को पता चला कि चंदा पेट से है, तो उस ने चंदा से बच्चा गिराने की बात की, पर वह नहीं मानी.

सुखराम बोला, ‘‘मैं उस बच्चे को नहीं अपना सकता, जो मेरा नहीं है.’’

चंदा ने उसे बहुत समझाया, पर वह न माना. चंदा ने भी अपना फैसला सुना दिया, ‘‘मैं एक औरत ही नहीं, एक मां भी हूं. मैं इस बच्चे को जन्म ही नहीं दूंगी, बल्कि उसे जीने का हक भी दूंगी.’’

इस बात पर दोनों में झगड़ा हुआ. सुखराम ने कहा, ‘‘ठेकेदार के साथ सोना तुम्हारी मजबूरी थी, पर उस के बच्चे को जन्म देना तो तुम्हारी मजबूरी नहीं है.’’

चंदा ने जवाब दिया, ‘‘तुम्हारा साथ देने के लिए मैं ने ऐसा घोर अपराध किया था, लेकिन अब मैं कोई गलती नहीं करूंगी… जो हमारे साथ हुआ, उस में इस नन्हीं सी जान का भला क्या कुसूर? जो भी कुसूर है, तुम्हारा है.’’

इस के बाद चंदा सुखराम को छोड़ कर चली गई. वह कहां गई, किसी को नहीं मालूम, पर आज सुखराम को हरिया की कही बात याद आई. वह सिसक रहा था और सोच रहा था कि काश, उस ने गलत फैसला न लिया होता.

एक बार फिर : लिवइन का लफड़ा

आरोही ने रात 8 बजे औफिस सेनिकलते ही जयको फोन किया, ‘‘मैं अभी निकली हूं, तुम घर पहुंच गए?’’‘‘हां, जल्दी फ्री हो गया था, सीधे घर ही आ गया. औफिस नहीं आया फिर.’’

‘‘डिनर का क्या करना है? कुछ बना लोगे या और्डर करना है? मु  झे भी घर आतेआते 1 घंटा तो लग ही जाएगा.’’‘‘और्डर कर दो यार, कुछ बनाने का मन नहीं… और हां आइसक्रीम भी खत्म हो गई है, वह भी और्डर कर दो.’’आरोही ने फोन रख दिया, दिन काफी व्यस्त रहा था, शारीरिक और मानसिक रूप से काफी थक गई थी. अभी भी दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था…

जय और आरोही एक ही कंपनी में अलगअलग डिवीजन में काम करते हैं. आरोही पुणे की है और मुंबई में 2 साल से एक बड़ी कंपनी में जय से बड़ी पोस्ट पर है और बहुत अच्छी तरह अपनी लाइफ जी रही है. जय के साथ 1 साल से लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है.

दोनों एक मीटिंग में मिले थे, एक ही बिल्डिंग में दोनों के औफिस हैं, बस अलगअलग हैं, जय दिल्ली का है. दोनों एकदूसरे के साथ खुशीखुशी फ्लैट शेयर कर रहे हैं और काम भी मिलबांट कर करते हैं.दोनों के परिवार वालों को नहीं पता कि दोनों लिव इन में रहते हैं.

आरोही का जय का मस्त स्वभाव बहुत अच्छा लगता है. जय को आरोही का जिम्मेदार स्वभाव भाता है. दोनों एकदूसरे से बिलकुल अलग हैं पर एकदूसरे को बहुत पसंद करते हैं. मगर आजकल जय के बारे में जितनी गहराई से सोचती जा रही थी, कहीं कुछ खल रहा था, जिस पर पहले कभी ध्यान नहीं गया था…

तभी उस की मम्मी रेखा का फोन आ गया, दिन में एक बार आरोही की अपनी फैमिली से बात हो ही जाती. बात कर के आरोही ने डिनर और्डर कर दिया. वह जब घर पहुंची, जय कोई मूवी देख रहा था. फ्रैश हो कर आरोही भी लेट गई. इतने में खाना भी आ गया.आरोही ने कहा, ‘‘चलो जय, खाना लगा लें?’’

‘‘प्लीज, तुम ही लगा लो, मूवी छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा है,’’ जय ने कहतेकहते आरोही को फ्लाइंग किस दे दिया. आरोही मुसकरा दी. दोनों ने डिनर साथ किया.

मूवी खत्म होने पर जब जय सोने आया, आरोही लेटीलेटी फोन पर ही कुछ देख रही थी. जय ने आरोही के पास लेट कर अपनी बांहों में भर लिया.आरोही भी उस के सीने से लगती हुई बोली, ‘‘कैसा था

दिन?’’‘‘बोर.’’आरोही चौंकी, ‘‘क्यों?’’‘‘बहुत काम करना पड़ा.’’

‘‘तो इस में बुराई क्या है?’’‘‘अरे यार, मेरा मन ही नहीं करता कोई काम करने का,

मन होता है कि बस आराम करूं. घर में भी सब मु  झे कामचोर कहते हैं,’’

जय ने हंसते हुए बताया और आगे शरारत से कहा, ‘‘असल में बस मन यही होता है कि या आराम करूं या तुम्हें प्यार.’’‘‘पर डियर, खाली आराम या मु  झे प्यार करने से तो लाइफ नहीं चलेगी न?’’

‘‘चल जाएगी बड़े आराम से… देखो, तुम्हारी सैलरी मु  झ से बहुत ज्यादा है, इस में हमारा घर आसानी से चल सकता है और तुम हो भी अपने पेरैंट्स की इकलौती संतान, वहां का भी सब तुम्हारा है. चलो, शादी कर लेते हैं. मजा आ जाएगा,’’

कहतेकहते जय उस के थोड़ा और नजदीक आ गया.2 युवा दिलों की धड़कनें जब तेज होने लगीं तो बाकी बातों की फिर जगह न रही. सब भूल दोनों एकदूसरे में खोते चले गए. अगले कुछ दिन तो रोज की तरह ही बीते, दोनों पतिपत्नी तो नहीं थे पर लिव इन में रहने वाले रहते तो पतिपत्नी की ही तरह हैं.

रिश्ते पर मुहर नहीं लगी होती है पर रिश्ता तो होता ही है.कभी नोक  झोंक भी होती, फिर रूठनामनाना भी होता, पर कुछ बातें आरोही को आजकल सचमुच खल रही थीं, बातें तो छोटी थीं पर उन पर ध्यान तो जा ही रहा था. हर तरह के खर्च आरोही के ही जिम्मे आते जा रहे थे,

सारे बिल्स, खानेपीने के सामान की जिम्मेदारी, फ्लैट का किराया भी काफी दिन से जय ने नहीं दिया था. यह विषय आने पर कहता कि यार, तुम तो मु  झ से ज्यादा कमाती हो,

मेरे पास तो प्यार है, बस. ऐसा नहीं कि जय की सैलरी बहुत कम थी, हां, आरोही जितनी नहीं थी. इस पर आरोही कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर जय को इतना प्यार करने लगी थी कि उस से पैसों की बात करना उसे बहुत छोटी बात लगती थी.

वह यही सोचती कि एक दिन तो दोनों शादी कर ही लेंगे, क्या फर्क पड़ता है, पर जितना जय को दिन ब दिन जान रही थी, वह मन ही मन थोड़ा अलर्ट हो रही थी. 6 महीने और बीते, आरोही ने नोट किया, जय जब भी अपने घर दिल्ली जाता, वहां से उसे न कोई फोन करता, न किसी तरह का कोई मतलब रखता. एक दिन उस के कलीग रवि ने आरोही को हिंट दिया कि जय अपने पेरैंट्स की पसंद की लड़की से शादी करने के लिए तैयार है,

इसलिए उस के दिल्ली के चक्कर बढ़ गए हैं.आरोही के लिए यह एक बड़ा   झटका था. वह अकेले में खूब रोई, सचमुच जय को अपना जीवनसाथी मानने लगी थी. बहुत दुखी भी रही पर वह आजकल की हिम्मती, आत्मनिर्भर और इंटैलीजैंट लड़की थी. जीभर कर रोने के बाद वह सोचने लगी कि अच्छा हुआ,जय की सचाई पता चल गई. वही तो सारे खर्च, सारे काम करती आ रही थी. ठीक है, अब ब्रेकअप होगा, ठीक है, कोई बात नहीं, दुनिया में न जाने कितनी लड़कियों के साथ ऐसा होता है. मैं एक चालाक लड़के के लिए अब और नहीं रोऊंगी, एक बार फिर अपनी लाइफ शुरू करूंगी.

जय जब वापस आया तो आरोही ने उसे लंच टाइम में औफिस की कैंटीन में आने के लिए कहा और सीधेसीधे बात करना शुरू किया, ‘‘देखो जय, मु  झे साफसाफ बात करना पसंद है… अब हम साथ नहीं रह सकते.’’जय चौंका, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मैं और बेवकूफ नहीं बन सकती, तुम आराम से अपने पेरैंट्स की मरजी से शादी करो, मु  झे कोई प्रौब्लम नहीं है. मैं तुम्हारे साथ रह कर काफी आर्थिक रूप से नुकसान उठा चुकी हूं.

अब इतनी भी बेवकूफ नहीं कि तुम्हें पालती रहूं और जब तक तुम्हारी शादी न हो, तुम्हारे शरीर की जरूरतों के लिए एक सुविधा बनी नहीं… अब यह बताओ मैं दूसरा फ्लैट ढूंढ़ू या तुम जाओगे?’’ जय का चेहरा शर्म और अपमान से काला हो गया.

झेंपते हुए बोला, ‘‘मैं ही चला जाता हूं.’’‘‘ठीक है, अगर हो सके तो कल शनिवार है, कल कहीं भी शिफ्ट हो जाना, मैं पुणे जारही वीकैंड में… मेरे आने से पहले अपना सामान ले जाना.’’आरोही ने औफिस से जल्दी उठ कर रात की ही बस पकड़ ली और पुणे चली गई.

शिवनेरी बस पुणे और मुंबई के बीच चलने वाली आरामदायक बसें हैं, सोफे जैसी सीट पर बैठ कर आरोही बीते दिनों को याद कर उदास तो हो रही थी पर वह लाइफ में आगे बढ़ने के लिए भी खुद को संभालती जा रही थी.कई बार आंखें नम हुईं, कई बार दिल बैठने को हुआ पर जय की चालाकियां बहुत दिनों से देख रही थी, बहुत कुछ खलने लगा था. दिमाग कहता रहा जो हुआ, अच्छा हुआ.

पुणे आने तक दिल भी दिमाग का साथ देने लगा कि अच्छा हुआ, एक लालची, स्वार्थी और कामचोर इंसान का साथ छूटा. मजबूत कदमों से चलते हुए उस ने घर पहुंच कर खुद को मां की नर्म, स्नेही बांहों में सौंप दिया. मां मां थीं, उदास चेहरा देख कर सम  झ गईं बेटी रात को यों ही तो नहीं आई. हमेशा सुबह की बस पकड़ कर आती थी, पर उस समय किसी ने कुछ नहीं पूछा.

उस के पापा संजय ने उसे खूब दुलारा. खाना खा कर थकी हूं मां, सुबह बात करते हैं, कह कर आरोही सोने लेट गई.शनिवार और रविवार आरोही ने हमेशा की तरह अपने मम्मीपापा के साथ बिताए, तीनों थोड़ा घूम कर आए, बाहर खायापीया. रेखा आरोही की पसंद की चीजें बनाती रहीं, आरोही का बु  झा चेहरा देख 1-2 बार पूछा, ‘‘आरोही, सब ठीक तो है न?

औफिस के काम का स्ट्रेस है क्या?’’‘‘नहीं मम्मी,

सब ठीक है.’’

रेखा सम  झदार मां थीं. सम  झ गईं, बेटी अभी अपने मन की कोई बात शेयर करने के मूड में नहीं है, जब ठीक सम  झेगी, खुद ही शेयर कर लेगी. मांबेटी की बौंडिंग अच्छी है, जब ठीक लगेगा, बताएगी. संडे की रात आरोही वापस मुंबई आने के लिए पैकिंग कर रही थी.

संजय ने कहा, ‘‘बेटा, एक परिचित हैं, उन्होंने अपने बेटे सुमित के लिए तुम्हारे लिएबात की है.

तुम जब ठीक सम  झो, उन से मिल लो, कहो तो अगली बार तुम्हारे आने पर उन्हें बुला लूं?’’बैग बंद करते हुए आरोही के हाथ पल भर को रुके, फिर रेखा की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘मम्मी, मु  झे थोड़ा समय दो.’’संजय ने कहा, ‘‘अरे बेटा, अब तुम 30 की हो गई, वैलसैटल्ड हो…

यह परिवार अच्छा है. एक बार मिल तो लो. सबकुछ तुम्हारी हां कहने के बाद ही होगा.’’आरोही ने कहा, ‘‘इस समय मु  झे जाने दें, मैं बहुत जल्दी आप से इस बारे में बात कर लूंगी.’’संजय और रेखा आज के जमाने के पेरैंट्स थे… उन्होंने बेटी पर अपनी मरजी कभी नहीं थोपी.

उसे भरपूर सहयोग दिया हमेशा. यह भी एक कारण था कि आरोही बहुत स्ट्रौंग, बोल्ड और इंटैलीजैंट थी, वह अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की थी, फिर भी अपने पेरैंट्स की बहुत रिस्पैक्ट करती.रेखा ने मन ही मन कुछ अंदाजा लगाया कि कोई बात है जरूर, हमेशा खिला रहने वालाचेहरा यों ही नहीं बु  झा, फिर कहा, ‘‘ठीक है,तुम आराम से जाओ… ये बातें तो फोन पर भीहो जाएंगी.’’मुंबई अपने फ्लैट पर आ कर आरोही ने देखा कि जय अपना सारा सामान ले जा चुका है…

खालीखाली तो लगा पर उस ने अपनेआप को इतने समय में संभाल लिया था. उस ने यह बात स्वाभाविक तौर पर ली. खुद से ही कहाकि इतने दिन का साथ था, कोई बात नहीं.आदत थी उस की, छूट जाएगी. ऐसे   झूठे रिश्तों के लिए अफसोस करने में वह अपनी लाइफ नहीं बिता सकती. अभी बहुत कुछ करना है, खुश रहना है, जीना है, लाइफ जय जैसों के साथ खत्म नहीं हो जाती.

बस यह विचार आते ही आरोही रोज की तरह औफिस पहुंची. रवि ने बताया कि जय किसी दोस्त के साथ रहने चला गया है… तुम ने जो किया, ठीक किया.जय के औफिस की बिल्डिंग से आतेजाते जब भी कभी उस का आमनासामना हुआ, आरोही के निर्विकार चेहरे को देख जय की कभी हिम्मत ही नहीं हुई उस से बात करने की. कुछ महीनों बाद आरोही ने पेरैंट्स के कहने पर सुमित से मिलना स्वीकार कर लिया.सुमित मुंबई में ही काम करता था.

वह अपने 2 दोस्तों के साथ फ्लैट शेयर करता था. पुणे में सुमित अपने मम्मीपापा, विकास और आरती और छोटी बहन सीमा के साथ उन के घर आया. पहली मीटिंग में तो सब एकदूसरे से मिल कर खुश हुए.मुंबई में ही होने के कारण सुमित चाहता था कि वह मुंबई में ही जौब करने वाली लड़की के साथ शादी करे.

सब को यह सोच कर अच्छा लग रहा था कि दोनों पुणे आतेजाते रहेंगे. दोनों के ही घर एक जगह थे, सबकुछ ही देखते तय होता गया. आरोही ने पेरैंट्स की पसंद का मान रखा, सुमित से जितना मिली, वह ठीक ही लगा. आरोही चाहती थी कि नया रिश्ता वह ईमानदारी के साथ शुरू करे, वह सुमित को जय के साथ लिव इन में रहने के बारे में बताना चाहती थी. इस बारे में जब उस ने अपने पक्के दोस्त रवि से बात की, तो रवि ने कहा, ‘‘क्या जरूरत है? मत बताओ, कोई भी लड़का कितनी भी मौडर्न हो, यह बरदाश्त नहीं करेगा.’’‘‘क्यों?

अगर वह मु  झे बताए कि वह भी किसी गर्लफ्रैंड के साथ लिव इन में रहा है, तो मैं तो कुछ नहीं कहूंगी, उलटा इस बात पर खुश होऊंगी कि मेरे होने वाले पति ने ईमानदारी के साथ मु  झ से अपना सच शेयर किया.’’‘‘यार, तुम आरोही हो. सब से अलग, सब से प्यारी लड़की,’’

फिर आरोही को हंसाने के लिए शरारत से कहा, ‘‘मेरी बीवी आज तक मेरे कालेज की गर्लफ्रैंड को ले कर ताने मारती है… अब बोलो.’’आरोही हंस पड़ी, ‘‘बकवास मत करो, जानती हूं मैं तुम्हारी बीवी को, वह बहुत अच्छी हैं.’’‘‘हां, यही तो… सम  झो, लड़के जल्दी हजम नहीं करते ऐसी बातों को…

वह तो तुम बहुत बड़े दिल की हो.’’रवि ने काफी सम  झाया पर आरोही जब सुमित के कहने पर उस के साथ डिनर पर गई, तो आरोही ने जय के बारे में सब बता दिया.सुन कर सुमित मुसकराया, ‘‘तुम बहुत सच्ची हो. आरोही, मु  झे इन बातों का फर्क नहीं पड़ता, मेरे भी 2 ब्रेकअप हुए हैं, क्या हो गया. यह तो लाइफ है. होता ही रहता है. अब तुम मिली हो, बस मैं खुश हूं.’’

आरोही के दिल से जैसे बो  झ हट गया.1-2 बार और सुमित से मिलने के बाद उस ने अपने पेरैंट्स को इस शादी के लिए हां कर दी. उन की खुशी का ठिकाना न था. 4 महीने बाद की शादी की डेट भी फिक्स हो गई.दोनों पक्ष शादी की तैयारियों में व्यस्त हो गए.

बहुत तो नहीं पर सुमित और आरोही बीचबीच में मिलते रहते, दोनों औफिस के काम में व्यस्त रहते पर चैटिंग, फोन कौल्स चलते रहते. शादी पुणे में ही धूमधाम से हुई. दोनों के काफी कलीग्स आए. मुंबई आ कर आरोही के ही फ्लैट में सुमित अपने सामान के साथ शिफ्ट कर गया. दोनों खुश थे, आरोही ने जय का खयाल पूरी तरह से दिलोदिमाग से निकाल दिया था.

1 साल बहुत खुशी से बीता.आरोही अपनी लाइफ से अब पूरी तरह संतुष्ट व सुखी थी. दोनों छुट्टी होने पर कभी साथ पुणे निकल जाते, कभी किसी के पेरैंट्स मिलने आ जाते. सब ठीक था, आरोही की अगली 2 प्रोमोशंस तेजी से हुई, वह अब काफी अच्छे पैकेज पर थी, उस ने बहुत जल्दी अब एक अपना फ्लैट लेने की इच्छा जाहिर की.सुमित ने कहा, ‘‘देखो आरोही,

तुम्हारी सैलरी मु  झ से अब काफी ज्यादा है, तुम चाहो तो ले लो.’’आरोही चौंकी, ‘‘अरे, मेरा पैसा तुम्हारा पैसा अलगअलग है क्या? हमारा भी प्यारा सा अपना घर होगा,

कब तक इतना किराया देते रहेंगे?’’‘‘देख लो, तुम ही सोच लो, मैं तो अपनी सैलरी से ईएमआई दे नहीं पाऊंगा, घर भी पैसा भोजना होता है मु  झे.’’आरोही ने सुमित के गले में बांहें डाल दीं.

कहा, ‘‘ठीक है, तुम बस मेरे साथ फ्लैट पसंद करते चलो, सब हो जाएगा.’’

यह सच था कि सुमित की सैलरी आरोही से बहुत कम थी और जब से आरोही की प्रोमोशंस हुई थीं, सुमित की मेल ईगो बहुत हर्ट होने लगी थी. वह अकसर उखड़ा रहता. आरोही यह सम  झ रही थी, उसे खूब प्यार करती, उस की हर जरूरत का ध्यान रखती और जब आरोही ने कहा कि सुमित, मैं सोच रही हूं, मैं औफिस जानेआने के लिए एक कार ले लूं. बस में ट्रैफिक में बहुत ज्यादा टाइम लग रहा है. मजा आएगा, फिर पुणे भी कार से जायाआया करेंगे, अभी तो बस और औटो में बैठने का मन नहीं करता.’’

सुमित ने कुछ तलख लहजे में कहा, ‘‘तुम्हारे पैसे हैं, चाहे उड़ाओ चाहे बचाओ, मु  झे क्या,’’ कह कर सुमित वहां से चला गया.आरोही इस बदले रूप पर सिर पकड़ कर बैठी रह गई. 2 महीने में ही आरोही ने फ्लैट और कार ले ही ली. सुमित मशीन की तरह पसंद करने में साथ देता रहा.थोड़ा समय और बीता तो आरोही कोसुमित के व्यवहार में कुछ और बदलाव दिखे, अब वह कहता, ‘‘तुम ही पुणे जा कर सब से मिल आओ, तो कभी कहता टूर पर जा रहा हूं,

2 दिनों में आ जाऊंगा.’’आरोही ने कहा, ‘‘मैं भी चलूं? कार से चलते हैं, मैं घूम लूंगी…

तुम अपना काम करते रहना. आनेजाने में दोनों का कुछ चेंज हो जाएगा.सुमित ने साफ मना कर दिया. वह चला गया. अब वह पहले की तरह बाहर जा कर आरोही से उस की खबर बिलकुल न लेता.

आरोही फोन करती तो बहुत बिजी हूं, घर आकर ही बात करूंगी, कह कर फोन रख देता. सुमित बहुत बदल रहा था और इस का कारणभी आरोही के सामने जब आया, तो वह ठगी सी रह गई.एक सुबह सुमित सो रहा था, उस का मोबाइल साइलैंट था,

पर जब कविता नाम उस की स्क्रीन पर बारबार चमकता रहा, आरोही ने धीरे से फोन उठाया और दूसरे कमरे में जा कर जैसे ही हैलो कहा, फोन कट गया. आरोही ने यों ही व्हाट्सऐप चैट खोल ली और जैसेतैसे फिर कविता और सुमित की चैट पढ़ती गई, साफ हो गया कि दोनों का जबरदस्त अफेयर चल रहा है, गुस्से के मारे आरोही का खून खौल उठा.साफसाफ सम झ आ गया कि सुमित की बेरुखी का क्या कारण है.

वह चुपचाप सोफे पर बैठी कभी रोती, कभी खुद को सम झाती, सुमित के जागने का इंतजार कर रही थी, सुमित जब सो कर उठा, आरोही के हाथ में अपना फोन देख चौंका. आरोही का चेहरा देख उसे सब सम  झ आ गया.

बेशर्मी से बोला, ‘‘क्या हुआ?’’‘‘तुम बताओ, यह सब क्या चल रहा है?‘‘तो तुम भी तो शादी से पहले लिव इन रिलेशनशिप में रही थी?’’आरोही हैरान रह गई. बोली, ‘‘ये सब तो शादी से पहले की बात है और तुम्हें सब पता था. मैं ने तुम्हें शादी के बाद तो कभी धोखा नहीं दिया? तुम तो मु  झे अब धोखा दे रहे हो…’’‘‘असल में मैं तुम से अलग होना चाहता हूं…

मैं अब कविता से शादी करना चाहता हूं.’’आरोही ने गुस्से से कहा, ‘‘तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आ रही है?’’‘‘तुम्हें आई थी लिव इन में रहते हुए?’’

‘‘पहले की बात अब इतने दिनों बाद करने का मतलब? अब अपनी ऐय्याशी छिपाने के लिए मु  झ पर ऊंगली उठा रहे हो?’’‘‘मैं ने अपना ट्र्रांसफर दिल्ली करवा लिया है.

आज मैं पुणे जा रहा हूं,’’ कह कर सुमित आरोही की तरफ कुटिलता से देखते हुए मुसकराया और वाशरूम चला गया.आरोही को कुछ नहीं सू  झ रहा था. यह क्या हो गया, अपना अफेयर चल रहा है, तो गड़े मुरदे उखाड़ कर मु  झ पर ही इलजाम डाल रहा है.

मेड आ गई तो वह भी औफिस के लिए तैयार होने लगी और चुपचाप सुमित को एक शब्द कहे बिना औफिस चली गई.रवि ने उस की उड़ी शकल देखी तो उसे कैंटीन ले गया और परेशानी का कारण पूछा. देर से रुके आंसू दोस्ती की आवाज सुन कर ही बह निकले.

वह सब बताती चली गई. इतने में दोनों की एक और कलीग दोस्त सान्या भी आ गई. सब जान कर वह भी हैरान रह गई. थोड़ी देर बाद तीनों उठ कर काम में लग गए.आरोही के दिल को चैन नहीं आ रहा था. फिर एक और धोखा. क्या करे. क्या यह रिश्ता किसी तरह बचाना चाहिए? नहीं, जबरदस्तीकैसे किसी को अपने से बांध कर रखा जा सकता है? यह तो प्यार, विश्वास का रिश्ता है. अब तो कुछ भी नहीं बचा. वह अपना आत्मसम्मान खो कर तो जबरदस्ती इस रिश्ते को नहीं ढो सकती..

जो होगा देखा जाएगा. ऐसे रिश्ते का टूटना ही अच्छा है. जब रात को आरोही घर लौटी, सुमित जा चुका था. वह अपनी पैकिंग अच्छी तरह कर के गया था, लगभग सारा सामान ले गया. कुछ दिन बाद ही आरोही को तलाक के पेपर मिले तो वह रो पड़ी. यह क्या हो गया, सब बिखर गया. उस की कहां क्या गलती है.सुमित ने उसे फोन किया और कहा, ‘‘साइन जल्दी कर देना,

मैं कोर्ट में यही कहने वाला हूं कि तुम चरित्रहीन हो, तुम पहले भी लिव इन में बहुत समय रह चुकी हो और मु  झे ये सब बताया नहीं गया था.’’‘‘पर मैं ने तुम्हें सारा सच बता दिया था और तुम्हें कोई परेशानी नहीं थी.’’‘‘पर तुम्हारे पास कोई सुबूत नहीं है न कि तुम ने मु  झे सब बता दिया था.’’

आरोही चुप रह गई. अगले दिन रवि और सान्या ने सब जान कर अपना सिर पकड़ लिया. फिर सान्या ने पूछा, ‘‘आरोही, तुम ने कैसे बताया था सुमित को जय के बारे में?’’‘‘मिल कर, फिर बहुत कुछ चैटिंग में भी इस बारे में बात होती रही थी.’’‘‘चैट कहां है?’’‘‘उन्हें तो मैं डिलीट करती रहती हूं. सुमित भी जानता है कि मु  झे चैट डिलीट करते रहने की आदत है.’’

‘‘अभी राजनीति में, ड्रग केसेज में जो इतनी चैट खंगाल दी गईं, वह भी नामी लोगों की, तो इस का मतलब यह मुश्किल भी नहीं.’’‘‘और मेरे पास कविता और उस के अफेयर का सुबूत है…

मैं ने जब उन दोनों की चैट पढ़ी, खूब सारी पिक्स ले ली थीं.’’‘‘यह अच्छा किया तुम ने, गुस्से में होश नहीं खोया, दिमाग लगाया. भांडुप में मेरा कजिन सुनील पुलिस इंस्पैक्टर है, उस से बात करूंगी, वह तुम्हारी पुरानी चैट निकलवा पाएगा, इसे तो तलाक हम देंगे.

बच्चू याद रखेगा.’’सान्या ने उसी दिन सुनील से बात की. उस ने कहा सब हेल्प मिल जाएगी. रवि और सान्या आरोही के साथ खड़े थे. वीकैंड आरोही ने पुणे जा कर अपने पेरैंट्स से बात करने का, उन्हें पूरी बात बताने का मन बनाया.अभी तक आरोही ने अपने पेरैंट्स से कुछ भी शेयर नहीं किया था. सुमित आरोही से अब बिलकुल टच में नहीं था.

कभीकभी एक मैसेज तलाक के बारे में कर देता.संजय और रेखा पूरी बात सुन कर सिर पकड़ कर बैठ गए. कुछ सम  झ न आया, दोनों को जय के बारे में भी अब ही पता चला था, क्या कहते, बच्चे जब आत्मनिर्भर  हो कर हर फैसला खुद लेने लगें तो सम  झदार पेरैंट्स, कुछ कहने का फायदा नहीं है, यह भी जानते हैं. जय के साथ, सुमित के साथ बेटी का अनुभव अच्छा नहीं रहा, प्यारी, सम  झदार बेटी दुखी है, यह समय उसे कुछ भी ज्ञान देने का नहीं है.इस समय उसे अपने पेरैंट्स की सपोर्ट चाहिए. कोई ज्ञान नहीं… और सुमित तो गलत कर ही रहा था…

जय की बात जरूर अजीब लगी थी, पर अब वे बेटी के साथ थे.संजय ने कहा, ‘‘मैं आज ही वकील से बात करता हूं.’’रेखा ने सुमित के पेरैंट्स अनिल और रमेश से बात की. मिलने के लिए कहा, उन्होंने आरोही को चरित्रहीन कहते हुए रेखा के साथ काफी अपमानजनक तरीके से बात की तो सब को सम  झ आ गया, यह रिश्ता नहीं बचेगा.रवि और सान्या आरोही के टच में थे. सुनील ने काफी हिम्मत बंधा दी थी, बहुत कुछ सोच कर सुमित को आरोही ने फोन किया, ‘‘सुमित, मैं पुणे आई हुई हूं, कल सुबह चली जाऊंगी. आज तुम से मिलना चाहती हूं… कैफे कौफी डे में आज शाम को 5 बजे आओगे?’’

‘‘ठीक है,’’ पता नहीं क्या सोच कर सुमित मिलने के लिए तैयार हो गया.आरोही बिना पेरैंट्स को बताए सुमित से मिलने के लिए पहुंची. दिल में अपमान और क्रोध का एक तूफान सा था.

आज भड़ास निकालने का एक मौका मिल ही गया था. एक टेबल पर बैठा सुमित उसे देख कर जीत और बेशर्मी के भाव के साथ मुसकराया. उस के बैठते ही कहा, ‘‘देखो, गिड़गिड़ाना मत, मु  झे दीनहीन लड़कियां अच्छी नहीं लगतीं.’’

यह सुनते ही आरोही के दिल में कुछ बचा भी एक पल में खत्म हो गया. मजबूत स्वर में बोली, ‘‘मु  झे भी धोखेबाज लोग अच्छे नहीं लगते. आज तुम्हें बस इतना बताने आई हूं कि मैं जा कर तलाक के पेपर साइन कर दूंगी… अभी तक पूरी तैयारी भी तो करनी थी.’’सुमित उस की आवाज की मजबूती पर चौंका, ‘‘कैसी तैयारी?’’‘‘तुम मु  झे चरित्रहीन बताने वाले हो न?

मैं ने भी तुम्हारी और कविता की सारी चैट के फोटो ले लिए थे और इंस्पैक्टर सुनील हमारी वे चैट निकाल रहे हैं, जिन में मैं ने तुम्हें साफसाफ जय के बारे में पहले ही बता दिया था और तुम्हेंउस में कोई आपत्ति नहीं थी. तुम्हारे ऊपर तो ऐसीऐसी बात उठेगी कि किसी लड़की को आगे धोखा देना भूल जाओगे, सारी ऐयाशियां न भूल जाओ तो कहना.‘‘मैं कभी कमजोर लड़की नहीं रही…

तुम्हारे जाने का अफसोस हो ही नहीं सकतामु  झे, मैं खुश हूं कि जल्द ही तुम से पीछा छूट गया. मैं तो एक बार फिर जीवन में आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार हूं. अब कोर्ट में अपने वकील के साथ मिलेंगे,’’ कह कर मुसकराते हुए आरोही खड़ी हो गई. फिर कुछ याद करते हुए बैठ गई. वेटर को इशारा करते हुए बिल मांगा और कहा, ‘‘कौफी भले ही ठंडी हो गई थी,

भले ही पी भी नहीं, पर आज एक बार फिर मेरे आत्मविश्वास को देख कर तुम जैसे, जय जैसे पुरुष की यह उड़ी शकल देखने में बहुत मजा आया,’’ कहतेकहते उस ने पेमैंट की और वहां से निकल गई.सुमित आने वाले तूफान से अभी से घबरा गया था.

मैडमजी : इलैक्शन में किसका टिकट कटा

‘‘प्रमोदजी, मैं यह क्या सुन रही हूं…’’ गीता मैडम पार्टी के इलाकाई प्रभारी प्रमोदजी के दफ्तर में कदम रखते हुए बोलीं.

‘‘क्या हुआ मैडमजी… इतना गुस्सा क्यों हो?’’ प्रमोदजी के चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वे मैडमजी के गुस्से की वजह जानते हैं.

‘‘प्रमोदजी, बताएं कि पार्टी ने आने वाले इलैक्शन में मेरी जगह उस कल की आई लड़की सारिका को टिकट देने का फैसला किया है. कल की आई वह लड़की आज आप के लिए इतनी खास हो गई है कि उस को मेरी जगह दी जा रही है?’’

‘‘अरे मैडमजी, आप कहां सब की बातों में आ रही हैं. आप तो पार्टी की पुरानी कार्यकर्ता हैं. आप ने तो पार्टी के लिए बहुतकुछ किया है. हम भी आप के बारे में सोचते, पर नेताजी के निर्वाचन समिति को आदेश हैं कि इस बार सब नए लोगों को ही आगे करना है…

‘‘दूसरी पार्टियां रोज नएनए चेहरों के साथ अखबारों में बने रहना चाहती हैं. बस, जनता को दिखाने के लिए हमारी पार्टी भी खूबसूरत चेहरों को आगे लाना चाहती है. ये कल के आए बच्चे हमारी और आप की जगह थोड़े ही ले सकते हैं,’’ बात करतेकरते प्रमोदजी ने अपना हाथ मैडमजी के हाथ पर रख दिया, ‘‘मैडमजी, हमारी नजर से देखो, तो उस सारिका से लाख गुना खूबसूरत हैं आप. पर नेताजी को कौन सम?ाए.’’

प्रमोदजी के चेहरे की मुसकान उन के इरादे साफ बता रही थी, पर छोटू की चाय ने उन को अपना हाथ मैडमजी के हाथ से हटाने पर मजबूर कर दिया.

छोटू चाय रख कर चला गया, तो मैडमजी ने फिर अपनी नाराजगी जताई, ‘‘प्रमोदजी, आप इन बातों से मुझे बहलाने की कोशिश मत कीजिए. आप के कहने पर मैं ने पिछली बार भी परचा नहीं भरा, क्योंकि आप चाहते थे कि आप की भाभी इलैक्शन लड़े. तब मैं भी नई थी और आप की बात मान गई थी.

‘‘पर अब क्या? सारिका 2 साल पहले पार्टी से जुड़ी है और उस को टिकट मिल रहा है. यह गलत है.

‘‘आप एक बार मेरी मुलाकात नेताजी से तो कराइए.

‘‘प्रमोदजी, मैं ने हमेशा वही किया है, जो आप ने कहा. कितनी बार आप के कहने पर ?ाठ भी बोला…यहां तक कि आप के कहने पर उस मनोहर पर गलत आरोप भी लगाए, ताकि आप इस कुरसी पर बने रहें. पर मुझे क्या मिला?

‘‘प्रमोदजी, आप जो कहेंगे, मैं करूंगी. बस, एक बार टिकट दिलवा दीजिए, फिर देखिए जीत तो मेरी पक्की है. आप समझा रहे हैं न,’’ इस बार मैडमजी ने प्रमोदजी का हाथ पकड़ लिया.

जब मैडमजी ने खुद प्रमोदजी का हाथ पकड़ लिया, तो उन की तो मानो मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. उन्होंने मैडमजी को भरोसा दिया कि वे आज ही नेताजी से उन के लिए बात करेंगे.

मैडमजी अपना धूप का चश्मा सिर से वापस आंखों पर लगा कर दफ्तर से घर चली आईं.

‘‘क्या बात है गीता, आज जल्दी घर आ गईं? कोई पार्टी या मीटिंगविटिंग नहीं थी आज?’’

घर में आते ही मैडमजी सिर्फ गीता बन जाती थीं, जो मैडमजी को बिलकुल पसंद नहीं था.

अपने पति की यह बात सुन कर वे एकदम चिढ़ गईं और बिना जवाब दिए अपने कमरे में चली गईं.

मैडमजी को पैसों की कोई कमी नहीं थी. उन को कमी थी तो एक पहचान की. मैडमजी सुनने की आदत हो गई थी उन को. उन का यही सपना था कि लोग सलाम करें, हाथ जोड़ कर आगेपीछे घूमें. वे सत्ता का नशा चखना चाहती थीं और इस के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थीं.

‘‘क्या बात है गीता, बहुत परेशान दिख रही हो?’’ कहते हुए समीर ने कमरे की बत्ती जलाई, तो मैडमजी को एहसास हुआ कि रात हो गई है.

‘‘नहीं, कुछ नहीं. बस, सिरदर्द कर रहा है. दवा ली है. ठीक हो जाऊंगी. आप कहीं जा रहे हैं क्या?’’

‘‘हां… तुम को कल रात को बताया तो था कि मैं आज रात को 3 दिन के लिए बाहर जा रहा हूं. अगर ज्यादा तबीयत खराब हो, तो डाक्टर बुला लेना,’’ समीर इतना कह कर कमरे से बाहर चले गए.

समीर के जाते ही गीता ने फोन उठा कर प्रमोदजी को मिला दिया, ‘‘हैलो प्रमोदजी, मैं बोल रही हूं. क्या आप ने नेताजी से बात की?’’

‘‘अरे मैडमजी, मैं आप के बारे में ही सोच रहा था. आज आप गजब की लग रही थीं. क्या मदहोश खुशबू आती है… अभी तो घर पर हूं, कल दफ्तर जा कर आप से बात करता हूं,’’ प्रमोदजी के पास से शायद उन की पत्नी की आवाज आ रही थी, इसलिए उन्होंने फोन जल्दी रख दिया.

मैडमजी भी कच्ची खिलाड़ी नहीं थीं. सारी रात जाग कर उन्होंने सोच लिया था कि आगे क्या करना है, जिस से सारिका को टिकट न मिले और प्रमोदजी को भी सबक मिल जाए.

अगले दिन अपनी अलमारी से नोटों की 3 गड्डियां पर्स में डाल कर मैडमजी जल्दी ही घर से निकल गईं. सीधे कौफी हाउस पहुुंच कर वे पत्रकारों से मिलीं. उन्हें कुछ सम?ाया और एक नोट की गड्डी उन्हें दी.

फिर वे एक सुनसान जगह पर 6-7 लड़कों से मिलीं. नोटों की बाकी गड्डी और एक फोटो उन को दी. थोड़ी देर बात की और तेजी से निकल गईं. वहां से वे सीधे प्रमोदजी के दफ्तर पहुंच गईं.

वहां अभी कोई नहीं आया था. बस, छोटू सफाई कर रहा था. वे चुपचाप छोटू के पास गईं, उसे कुछ सम?ाया. उस के हाथ में सौ रुपए का एक नोट रख दिया.

अब इंतजार था प्रमोदजी के आने का. बाथरूम में जा कर मैडमजी ने पर्स से लिपस्टिक निकाल कर दोबारा लगाई और प्रमोदजी का इंतजार करने लगीं.

दफ्तर में मैडमजी को देख कर प्रमोदजी पहले थोड़ा हैरान हुए, पर वे मुसकराते हुए बोले, ‘‘मैडमजी, आप इतनी सुबहसुबह?’’

‘‘बस, क्या बताऊं प्रमोदजी, सारी रात सो नहीं पाई,’’ इतना कह कर मैडमजी ने साड़ी का पल्लू सरका दिया और बोलीं, ‘‘अरे, यह पल्लू भी न… माफ कीजिए,’’ फिर उन्होंने अदा से अपना पल्लू ठीक कर लिया.

‘‘मैडमजी, आज तो आप कहर बरपा रही हैं. यह रंग बहुत जंचता है आप पर,’’ प्रमोदजी मैडमजी के पास आ कर बोले.

‘‘आप भी न प्रमोदजी, बस कुछ भी…’’ मैडमजी ने अपना सिर प्रमोदजी के कंधे पर रख दिया.

उन्होंने मैडमजी की कमर पर हाथ रखना चाहा, पर उसी वक्त छोटू चाय ले कर आ गया और वे सकपका कर मैडमजी से दूर हो गए और बोले,

‘‘मैं ने तो चाय नहीं मंगवाई. चल, भाग यहां से.’’

‘‘प्रमोदजी, चाय मैं ने मंगवाई थी. रख दे यहां. चल, तू जा,’’ मैडमजी ने फिर अदा से प्रमोदजी की ओर देखा, पर प्रमोदजी को एहसास हो गया था कि वे पार्टी दफ्तर में हैं, इसलिए अपनी कुरसी पर जा कर बैठ गए.

मैडमजी खुश थीं कि छोटू एकदम सही वक्त पर आ गया.

‘‘प्रमोदजी, बातें तो होती ही रहेंगी. आप यह बताओ कि नेताजी से बात कब करोगे?’’

‘‘मैडमजी, बस आज ही… रैली के बारे में बात करने मैं आज ही पार्टी दफ्तर जा रहा हूं. आप के बारे में भी बात कर लूंगा.’’

‘‘पर आप को लगता है कि वे मानेंगे?’’ मैडमजी ने चिंता जताई.

‘‘अरे, वह सब आप मुझ पर छोड़ दो,’’ प्रमोदजी ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘नहीं, आप ही कह रहे थे न कल कि नए चहरे… बस, इसलिए पूछा… और नेताजी अपना फैसला बदलेंगे,’’ मैडमजी फिर अदा से बोलीं.

‘‘इतने सालों में आप हमें ठीक से जान नहीं पाई हैं. पार्टी में अच्छी पकड़ है हमारी. हाईकमान के फैसले को बदलना मेरे लिए कोई मुश्किल बात नहीं,’’ प्रमोदजी अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे थे और मैडमजी कुरसी पर टेक लगा कर उन की बातें अपने फोन पर रिकौर्ड कर रही थीं.

प्रमोदजी आगे बोले, ‘‘मैडमजी, इतने साल तक पार्टी में झाक नहीं मारी है मैं ने. हर किसी की कमजोरी जानता हूं. हर किसी को बोतल में उतार कर ही यहां तक पहुंचा हूं. आप ने तो देखा ही है कि जो मेरी बात नहीं मानता, उस का हाल उस मनोहर जैसा होता है.

‘‘बेचारा कुछ किए बिना ही जेल की हवा खा रहा है. और नेताजी के भी कई किस्से इस दिल में कैद हैं,’’ मैडमजी के सामने अपनी शान दिखाने के चक्कर में प्रमोदजी न जाने क्याक्या बोल गए.

मैडमजी का काम हो चुका था. वे किसी काम का बहाना कर के वहां से निकल गईं. अब उन्हें अगले काम के पूरा होने का इंतजार था. घर जाने का उन का मन नहीं था, इसलिए वे पास की कौफी शौप में जा कर बैठ गईं. समय देखा… अब तक तो खबर आ जानी चाहिए थी.

मैडमजी कौफी पी कर पैसे देने ही वाली थीं कि उन की नजर टैलीविजन पर गई. चेहरे पर हलकी मुसकान आ गई. पर्स उठा कर वापस प्रमोदजी के दफ्तर आ गईं.

प्रमोदजी फोन पर थे. वे काफी परेशान थे, ‘‘नहीं नेताजी, मुझे तो कुछ भी नहीं पता. यह खबर सच्ची है या नहीं… आप यकीन कीजिए, मुझे नहीं पता था कि सारिका कालेज में दाखिले के नाम पर छात्रों से पैसे लेती है…

‘‘पर नेताजी, आप मेरी बात तो सुनो. आप मुझे… ठीक है, जैसा आप कहो,’’ प्रमोदजी ने पलट कर के देखा, ‘‘अरे मैडमजी, अच्छा हुआ आप आ गईं.’’

‘‘क्या हुआ प्रमोदजी?’’ मैडमजी ने झूठी चिंता जताई.

‘‘हां मैडमजी, पार्टी दफ्तर से फोन था. कुछ लड़कों ने किसी टैलीविजन रिपोर्टर को इंटरव्यू दिया है कि कालेज में दाखिला करवाने के नाम पर सारिका ने उन से मोटी रकम ली है. अब देखो, इतना बड़ा कांड कर दिया और हमें कानोंकान खबर तक नहीं…’’

प्रमोदजी कुरसी पर बैठते हुए बोले, ‘‘नेताजी ने फिर हमें जिम्मेदारी दे दी है. उन का मानना है कि इस बार किसी भी बदनाम आदमी को टिकट तो क्या, पार्टी में भी जगह न दी जाए,’’ कहते हुए प्रमोदजी के चेहरे से एकदम चिंता के भाव गायब हो गए, जैसे उन के शैतानी दिमाग में कुछ आया हो.

‘‘मैडमजी, इस से पहले कि फिर कोई नया चेहरा सामने आए, मैं आप का नाम आगे कर देता हूं… कल नेताजी से मिलने जा रहा हूं, तो आज शाम को पहले आप से एक छोटी सी मुलाकात

हो जाए… दफ्तर के पीछे वाले मेरे फ्लैट पर.’’

प्रमोदजी की बात सुन कर मैडमजी फिर मुसकारा दीं और बोलीं, ‘‘प्रमोदजी, नाम तो आप को मेरा ही लेना होगा और कान खोल कर सुन लो, अगर मेरे बारे में कोई गलत खयाल मन में भी लाए, तो आप भी इस पार्टी में नजर नहीं आएंगे.

‘‘…अब ध्यान से मेरी बात सुनो. जिन लड़कों ने सारिका पर इलजाम लगाया है, वे सारिका के साथसाथ आप का नाम भी ले सकते थे, पर मु?ो इस पार्टी में लाने वाले आप थे, मैं ने हमेशा आप को अपने पिता जैसा माना, इसलिए अपनी परेशानी ले कर मैं आप के पास आई और आप मु?ा पर ही गंदी नजर रखे हुए हैं. शर्म नहीं आई आप को…’’

इतना कह कर मैडमजी ने अपने मोबाइल फोन से अपनी और प्रमोदजी के बीच हुई सारी बातों की रिकौर्डिंग उन्हें सुना दी. प्रमोदजी को पसीने आ गए.

‘‘अब आप के लिए बेहतर होगा कि नेताजी को अभी फोन कर के मेरे नाम पर मुहर लगवा दीजिए, वरना कल आप की यह आवाज हर टैलीविजन चैनल पर सुनने को मिलेगी,’’ मैडमजी पर्स संभालते हुए तेज कदमों से कमरे से बाहर निकल गईं.

शाम होतेहोते मैडमजी के खास कार्यकर्ताओं के उन्हें टिकट मिलने की बधाई देने के फोन आने भी शुरू हो गए थे.

बदलाव : क्या था छपरा ढाणी का राज

‘‘मारकर आइए या मर कर आइए. मेरे दूध की लाज रखना. टीचरजी, मैं तो एक ही सीख दे कर भेजूं छोरे को,’’ छाती ठोंक कर मेजर जसवंत सिंह राठौड़ की मां सुनंदा देवी उसे बता रही थीं.

राजस्थान के सुदूर इलाके में बसा एक छोटा सा गांव ‘छपरा ढाणी’. अर्पिता की बहाली वहां के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में हुई थी.

कुल जमा 20 बच्चे और वह एकलौती टीचर. ऐसा ठेठ गांव उस ने कभी नहीं देखा था. आगे होने वाली असुविधाओं के बारे में सोच कर एक बार तो उस ने भी इस्तीफा देने की ठान ली थी, पर जल्दी ट्रांसफर का भरोसा पा कर वह मन मसोस कर आ गई थी.

स्कूल क्या था जी, एक टपरा था बस. कच्ची मिट्टी का, खपरैल वाला. एक ही कमरे में 5वीं तक की जमात चलती थी. पहलीदूसरी जमात में

5-5, तीसरीचौथी जमात में कुल 8 और 5वीं जमात में सिर्फ 2 बच्चे थे. आगे की पढ़ाई के लिए पास के ही किसी दूसरे गांव में जाना पड़ता था.

पहला दिन अर्पिता को बहुत नागवार गुजरा. अगले दिन सुबह ही एक बच्चा लोटा भर दूध रख गया. शाम को वह खाना ले कर फिर आया. दौड़ कर वह जाने ही वाला था कि अर्पिता ने उसे पकड़ लिया, ‘‘बच्चे, अपना नाम तो बता कर जाओ.’’

‘‘माधव सिंह.’’

‘‘अच्छा माधव, मुझे अपने गांव की सैर कराओगे?’’

वह पलभर के लिए ठिठका और फिर सिर हिला कर हामी भर दी.

माधव कूदताफांदता आगे बढ़ रहा था. पर, अर्पिता को उस बलुई रेत में चलने का अभ्यास नहीं था. बारबार उस के पैर रेत में धंस जाते थे.

‘‘टीचरजी, वह देखिए. वह रामसा पीर का मंदिर है और ये रहे ऊंचेऊंचे टीबे. यहां हम सब बच्चे राजामंत्री का खेल खेलते हैं.’’

‘‘टीबे…?’’ अर्पिता ने सवालिया नजरों से पूछा.

‘‘जी टीचरजी, जब रेत के ढेर ऊंचे से हो कर जम जाते हैं, उसे टीबा कहते हैं. वह हमारे गांव के राजा साहब की गढ़ी. चलिए, आप को उन का महल दिखाता हूं.’’

गढ़ी के द्वार पर ही राजा साहब मिल गए. इतिहास और फिल्में, टीवी सीरियल वगैरह देख कर अर्पिता के मन में राजा की एक अलग ही इमेज बन गई थी. रेशमी शेरवानी, सिर पर ताज और बगल में तलवार खोंसी हुई. पर ये राजाजी तो बिलकुल साधारण कपड़ों में थे.

‘‘आइए टीचरजी, कोई परेशानी तो नहीं हुई हमारे गांव में? कोई भी दिक्कत हो, तो हमें सेवा का मौका जरूर दें,’’ अधेड़ उम्र पार करते राजाजी की भाषा बड़ी अच्छी थी.

बातोंबातों में उन्होंने बताया कि उन की पढ़ाईलिखाई अमेरिका में ही हुई.

वे खुद अपने महल का कोनाकोना दिखा रहे थे, ‘‘यह अस्तबल कभी घोड़ों से भरा रहता था. अब तो बस एक अंबर घोड़ा बचा है, वह भी बूढ़ा और बीमार रहता है.’’

‘‘अरे भुवन सिंह, कुछ खाया या नहीं इस ने?’’

‘‘जी सरकार, अभीअभी वैद्यजी देख कर गए हैं,’’ हाथ जोड़े भुवन सिंह ने जवाब दिया.

‘‘और इधर की तरफ है पुस्तकालय यानी हमारी लाइब्रेरी.’’

देशविदेश के हर विषय से संबंधित करीने से सजी किताबें. अर्पिता के लिए बहुत अस्वाभाविक सा था. रंगीन  कांच के टुकड़ों की कारीगरी से पूरा महल सजा हुआ था. महीन नक्काशी का काम आज भी उस समय की शानोशौकत का परिचय देता था.

‘‘माधव बेटा, अब तुम टीचरजी को रनिवासे में ले जाओ.’’

परदा प्रथा थी. राजाजी वहीं रुक गए और उसे बच्चे के साथ भीतर भेज दिया.

‘‘रानी मां धोक,’’ बच्चा बोला. साथ ही, अर्पिता ने भी हाथ जोड़ दिए.

रानी साहिबा बेटी के सिर में तेल मलती उठ खड़ी हुईं. इस उम्र में भी उन की खूबसूरती और ओज बरकरार था. हंस कर पास बैठाया और अर्पिता के चेहरे पर हैरानी देख कर बोलीं, ‘‘अब सेवकसेविकाएं तो रहे नहीं,’’ और वे मुसकरा दीं.

‘‘बाई सा, टीचरजी के लिए चाय तो बना लाओ और कुंअर सा से भी कह दो कि टीचरजी के दर्शन कर जाएं.’’

‘‘जी मां सा, अभी कहती हूं.’’

अर्पिता को बड़ी हैरानी हुई. मांबेटी के बीच भी बोली में आज भी वही राजसीपन. रात को वह लेटी तो नींद कोसों दूर थी. गांव के बारे में और

ज्यादा जानने की इच्छा बलवती होती जा रही थी.

अगले दिन माधव फिर आया, तो अर्पिता पूछ बैठी, ‘‘एक बात तो बता कि तेरे पिताजी क्या करते हैं? और यह गांव कितना खालीखाली सा क्यों है? रास्ते में कोई दिखता ही नहीं.’’

‘‘बापू फौज में हैं और बाकी मैं नहीं जानता हूं. आप मेरी दादी सा से पूछ लेना,’’ रात के खाने का न्योता देते हुए माधव बोला और शाम को वह तय समय पर उन्हें लेने आ गया.

मौसम बड़ा सुहावना सा था. मोर ‘पीहूपीहू’ की मधुर आवाज करते पेड़ों पर उड़ रहे थे.

‘‘नमस्ते टीचरजी,’’ माधव की दादी सामने ही इंतजार कर रही थीं. गजभर का घूंघट निकाले माधो की मां ने दूर से ही अपनी ओढ़नी का पल्लू जमीन से छुआया और माथे से लगा कर बोलीं, ‘‘नमस्ते टीचरजी.’’

अर्पिता ने बाहर बनी बैठक की ओर रुख किया, तो दादी बोलीं, ‘‘आप भीतर चलिए टीचरजी. यह बैठक मर्दों के लिए है. बाहर का कोई आदमी भीतर घर में नहीं जाता.’’

अर्पिता को हैरानी हुई, पर वह कुछ न बोली. भीतर पीढ़ा लगा कर उसे बैठाया गया. रसोई में माधव की मां उसी घूंघट के साथ मिट्टी के चूल्हे पर बाजरे की गोलगोल फूलीफूली रोटियां बना रही थीं.

दादी ने थाल परोसा. काचरे की सब्जी, खीचड़ा, देशी घी में डूबी हुई रोटियां और लहसुन की चटनी.

‘‘शुरू करो टीचरजी,’’ उन्होंने खाने के लिए कहा और पास ही बैठ कर पंखा ?ालने लगीं.

‘‘इस गांव में बिजली आधी बार ही रहती है. वैसे, बेटा पिछली बार जब आया था, तब इनवर्टर लगा कर गया था, पर उस की भी बैटरी खत्म हो गई है.’’

आखिर अर्पिता के सब्र का बांध टूट ही गया. उस से रहा न गया, तो पूछ ही लिया, ‘‘कितने बेटे हैं आप के?’’

‘‘टीचरजी, एक तो लड़ाई में खेत रहा. दूसरा अभी बौर्डर पर है.’’

‘‘और आप के पति…?’’

‘‘जी, वे तो कब के शहीद हो गए,’’ दादी ने तसवीर की ओर इशारा किया,  ‘‘घबराओ नहीं, यह तो जवानों की शान है,’’ अर्पिता को दुखी देख कर वे बड़ी सधी आवाज में बोलीं.

‘‘एक बात तो बताइए कि पति और एक बेटा जाने के बावजूद भी आप ने दूसरे बेटे को फौज में भेज दिया… डर नहीं लगता?’’

अर्पिता की यह बात सुन कर दादी उस की नासम?ा पर हंसीं और बोलीं, ‘‘देखो टीचरजी, इस गांव में आप को बूढ़े, बच्चे और औरतों के सिवा कोई न मिलेगा. फौज तो राजपूतों की शान है. हमारे तो खून में ही देश की सेवा लिखी है. या तो दुश्मन की छाती चीर देनी है या खुद मर जाना है. अगर औरतें डरती रह गईं, तो देश की सेवा कौन करेगा…’’

‘‘वह देख रहे हो, मेरे बेटे जसवंत सिंह की पत्नी है. बकरियों के लिए चारापानी से ले कर घर का सारा काम करती है, पर उफ तक नहीं करती. मैं खेत संभालती हूं और साथ ही बाहर का काम. बहूबेटियां हमारे यहां परदे में ही रहती हैं.’’

अर्पिता ने देखा कि माधव की मां घूंघट निकाले अब भी दूधदही के बरतनों में लगी हुई थीं.

‘‘क्या मैं आप की बहू से कुछ देर बात कर सकती हूं?’’ अर्पिता ने पूछा.

‘‘अरे, आप तो हमारे गांव की मेहमान हो टीचरजी. हमारे बच्चों को पढ़ाने के लिए आई हो, शिक्षा देने आई हो. आराम से बात करो,’’ कह कर वे बैठकखाने को ठीक करने चल दीं.

माधव की मां का घूंघट अर्पिता को बेहद खटक रहा था. वह उन का चेहरा देखना चाहती थी.

‘‘मैं खुद एक औरत हूं बहन, मुझ से क्या परदा… आप घूंघट हटा दो.’’

थोड़ा सकुचाते हुए माधव की मां ने घूंघट हटा दिया. भीतर सचमुच की रूपकंवर थीं. अर्पिता उन से बड़े ही नपेतुले अंदाज में बात कर रही थी. लग रहा था कि इंगलिश का अगर कोई शब्द निकल गया, तो शायद वे सम?ा न पाएं.

बातोंबातों में अर्पिता ने पूछा, ‘‘आप थकती नहीं हैं, दिनभर यह चारापानी और घर के काम करतेकरते? पति कितने दिनों बाद घर आ पाते हैं?’’

‘‘टीचरजी, ये तो घर के काम हैं, इन से क्या थकना. हालांकि, सरकार सुविधाएं बहुत देती है, पर नौकरों को देने वाले पैसे अगर हम गरीबों को दे तो कुछ सेवा कर पाएंगे.’’

यह सुन कर अर्पिता को बड़ी हैरानी हुई. इतनी बड़ी सोच और वह भी एक अनपढ़ सी दिखने वाली औरत के मुंह से.

फिर माहौल को हलका करने के अंदाज से अर्पिता ने पूछा, ‘‘क्या आप पूरी जिंदगी ऐसे ही बिता दोगी?’’

और इस बार वाकई में हैरान करने वाला जवाब था, ‘‘मैं ने बीए पास किया है और अब बीऐड कर रही हूं. टीचरजी, सासू मां ने कहा है कि सरकारी नौकरी लगते ही वे मु?ो बाहर भेज देंगी.’’

अर्पिता फिर दादी की ओर मुखातिब हुई, ‘‘और यह परदा प्रथा?’’

‘‘जी, यह तो बस इसी गांव तक है. पुराने समय से चलती आई प्रथा है. बहू को पूरी जिंदगी ऐसे ही थोड़े बैठा कर रखेंगे. उस की अपनी जिंदगी है. आगे बढ़े और खूब तरक्की करे.’’

‘‘टीचरजी, आप को छोड़ आऊं?’’ माधव पूछ रहा था.

अर्पिता ने आदर से दादी को प्रणाम किया और रूपकंवर की ओर एक स्नेह भरी नजर डाल कर अपने घर को चल दी.

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