Society. सैकड़ों साल से जाति के नाम पर प्रेमी जोड़ों की हत्याएं होती रहीं. कहीं खाप पंचायतों ने पहरे बिठाए तो कहीं जाति के मुस्टंडों ने प्रेमी जोड़ों का जीना हराम किया और आज इस में एक नया अध्याय और जुड़ गया है. वह है लव जिहाद का नैरेटिव. लेकिन प्यार पर पहरा क्यों?
पिछले कुछ सालों में लव जिहाद जैसे शब्दों ने प्यार के माहौल को और जहरीला बना दिया है. हर हिंदू लड़की और मुसलिम लड़के की दोस्ती या प्रेम कहानी को शक की नजर से देखा जाने लगा है. कई राज्यों में ऐसे मामलों को ले कर कानून भी बनाए गए. नतीजा यह हुआ कि बालिग लोगों के निजी फैसलों में राजनीति घुस आई.
दिलचस्प बात यह है कि यह सारा शोरशराबा सिर्फ आम लोगों के लिए है. अगर कोई गरीब या मिडिल क्लास हिंदू लड़की किसी मुसलिम लड़के से प्यार कर ले तो राजनीति शुरू हो जाती है. परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी, संगठन और नेता सब इस प्यार के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, लेकिन जब बड़े उद्योगपतियों, फिल्म सितारों या राजनीतिक परिवारों के बच्चे अपने धर्म से बाहर जा कर शादी करते हैं तो वहां लव जिहाद के ठेकेदार नजर नहीं आते.
मुसलिम लड़के को औफिस की हिंदू कलीग लड़की से प्यार हो जाए और दोनों आपसी सहमति से इस रिश्ते को शादी में बदलना चाहें तो आज के समय भूचाल आ जाएगा. प्राइम टाइम की खबर बन जाएगी. कोर्ट में दोनों के खिलाफ वकील खड़े हो जाएंगे और कई नेताओं को मुफ्त का मुद्दा मिल जाएगा.
यह शादी लव जिहाद में गिनी जाएगी लेकिन वहीं अगर मामला सैलिब्रिटीज, बिजनैस घराने या हाई प्रोफाइल लोगों का हो तो यह आसानी से हजम कर ली जाएगी.
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