Asian Games 2026 अभी जापान के आइची-नागोया में खत्म हुए हैं. भारत ने कुल 85 मैडल जीते, जिन में 21 गोल्ड, 27 सिल्वर, 37 ब्रॉन्ज के साथ हमारा देश चौथे नंबर पर रहा.

माना कि चौथे नंबर पर रहना एक तरह से उपलब्धि लगती है, पर 140 करोड़ की आबादी वाले देश का यह प्रदर्शन एक तरह से फीका ही कहा जाएगा. भारत से 3 देश रहे, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया. चीन पहले नंबर पर रहा. उस ने 167 गोल्ड, 89 सिल्वर और 82 ब्रॉन्ज के साथ कुल 338 मैडल जीते.

दूसरे नंबर पर मेजबान देश जापान रहा, जिस ने 82 गोल्ड, 90 सिल्वर, 90 ब्रॉन्ज के साथ 262 मैडल अपने नाम किए.

तीसरे नंबर पर दक्षिण कोरिया रहा जिस ने 37 गोल्ड, 43 सिल्वर और 67 ब्रॉन्ज मैडल के साथ कुल 147 मैडल अपने नाम किए.

इस से पहले साल 2022 (कोरोना के चलते 2023 में कराए गए) में हुए एशियाई खेलों, जिस की मेजबानी चीन ने की थी, में भारत चौथे नंबर पर ही रहा रहा था, पर तब मैडल ज्यादा जीते थे. वहां भारत ने 28 गोल्ड, 38 सिल्वर, 41 ब्रॉन्ज के साथ कुल 107 मैडल अपने नाम किए थे.

मतलब, इस बार 22 मैडल कम आए हैं. याद रहे कि इस बार 495 खिलाड़ी भारत की तरफ से जापान में खेलने गए थे, पर मैडल आए सिर्फ 85.

किया भारीभरकम खर्च

भारत ने इस बार अपने खिलाड़ियों की तैयारी पर जम कर पैसा खर्च किया. खेल मंत्रालय के मुताबिक, पिछले 3 साल में ट्रेनिंग, उपकरण, इंटरनैशनल एक्सपोजर और कोच व एक्सपर्ट की सेवाओं पर 702.86 करोड़ रुपए खर्च किए गए.

इस के अलावा टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के फंड से एशियाई खेलों की तैयारियों के लिए 97.84 करोड़ रुपए अलग से लगाए गए. पर नतीजे मनमुताबिक नहीं आ पाए. हम पिछला रिकौर्ड भी पार नहीं कर पाए.

गरीब घरों की खिलाड़ी चमकीं

इन खेलो में कई मैडल ऐसी भारतीय महिला खिलाड़ियों ने जीते हैं जो बहुत गरीब परिवार से आती हैं :

नीरू ढांडा

ये हरियाणा में जींद जिले के संगतपुरा गांव की रहने वाली हैं. इन्होंने शूटिंग में 2 गोल्ड और 1 सिल्वर मैडल जीता. घर की दीवारों पर सीलन, पुताई तक नहीं, गुजारा सरकारी राशन पर. पिता सुरेश ढांडा 3 एकड़ पर खेती करते हैं. घर में एक छोटा पंखा और उसी के बगल में भैंस बंधी हुई. नीरू के पास अपनी राइफल तक नहीं थी, दूसरे की राइफल से प्रैक्टिस सीखी.

डेंगू भी नीरू ढांडा के एशियाई खेलों के अभियान को नहीं रोक सका. खेलों से ठीक पहले उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल में भरती कराया गया, जिस से उन की रवानगी 4 दिन टल गई. आखिरकार, वे 18 सितंबर के बजाय 21 सितंबर को जापान के लिए रवाना हुईं.

सीमा कुमारी

चंबा, हिमाचल की रहने वाली सीमा कुमारी ने 10,000 मीटर दौड़ में भारत को ब्रॉन्ज मैडल दिलाया. 25 साल की सीमा 12 साल की उम्र में पिता को खो चुकी हैं, 7 भाईबहन हैं, परिवार बहुत गरीब. दौड़ने के लिए जूते तक नहीं थे. 7वीं क्लास में ही बेहतर ट्रेनिंग के लिए घर छोड़ कर धर्मशाला साईं होस्टल चली गईं.

साल 2017 में हुए एशियन यूथ के लिए पैसे नहीं थे तो मां ने फिक्स डिपौजिट तोड़ कर थाईलैंड भेजा था. इस बार फाइनल में जूते का सोल निकल गया फिर भी रेस पूरी कर के 16 साल बाद भारत को इस इवैंट में मैडल दिलाया.

प्राची चौधरी

गांव झबीरण, जिला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की रहने वाली प्राची चौधरी ने भारत को 4x400m रिले में गोल्ड मैडल दिलाया. वे किसान की बेटी हैं. गांव की कच्ची, धूल भरी पगडंडियों पर नंगे पैर दौड़ती थीं, लोगों के ताने भी सहे.

साल 2023 में चीन के हांगझोउ में हुए एशियाई खेलों में सिल्वर मैडल जीता था, तब मां ने कहा था,’ और मेहनत करनी है.’ इस बार जापान में गोल्ड मैडल जीत कर प्राची ने वादा पूरा किया.

सुरुचि सिंह फोगाट

सासरौली झज्जर, हरियाणा की रहने वाली सुरुचि सिंह फोगाट ने 10 मीटर एयर पिस्टल मिक्स्ड टीम में भारत को गोल्ड मैडल दिलाया. पहले वे पहलवान बनना चाहती थी, पर एक हादसे में हंसली टूटने के बाद वे शूटिंग में आईं.

सुरुचि सिंह फोगाट के पिता इंद्र सिंह सेना में रहे हैं और 17 साल नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी, क्योंकि उन्हें चोट लग गई थी.

भारत में ज्यादातर खिलाड़ी उन घरों से आते हैं जिन के पास खेल से जुड़े उतने संसाधन नहीं हैं. वे बहुत ही कड़ी मेहनत से अपने दम पर कोई मुकाम हासिल करते हैं और दुख की बात तो यह है कि जब वे ओलिंपिक या एशियाई खेलों में मैडल जीत लेते हैं तो वाहवाही सरकार की होती है.

यह ठीक है कि सरकार ने खेल बजट में पैसा बढ़ाया है, पर यह उस समय दिया जाता है, जब कोई खिलाड़ी मैडल जीतने के लायक दिखता है. ग्रास रूट लैवल पर तो खिलाड़ी को अपने पैसों से ही खेलना होता है.

नीरज चोपड़ा का नाम भी तभी हुआ था, जब यह खबर आई थी कि हरियाणा का कोई एथलीट है जो भाला फेंक प्रतियोगिता में ओलिंपिक में मैडल जीत सकता है.

क्या है वजह

पिछले कुछ सालों में भारत में धार्मिक आयोजन बहुत ज्यादा बढ़े हैं. कहीं कांवड़ यात्रा हो रही है तो कहीं कलश यात्राएं निकाली जा रही हैं. इन में नौजवान तबका खूब बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता दिखाई देता है.

जिन नौजवानों को तीरंदाजी में निशाना लगाने की प्रैक्टिस करनी चाहिए, उन का टारगेट इस बात पर होता है कि डाक कांवड़ में दौड़तेभागते किसी तरह समय से गंगाजल को फलां मंदिर तक ले जाया जाए. वे वेट लिफ्टिंग के बजाय कलश उठाने को ज्यादा अहमियत देते हैं, तभी तो 140 करोड़ की आबादी वाले देश में कोई एकाध मीराबाई चानू वेट लिफ्टिंग में देश का नाम रोशन कर रही होती है.

कुलमिला कर भारत ने इन एशियाई खेलों में चौथा नंबर जरूर हासिल किया है, पर चीन और जापान के मुकाबले यह प्रदर्शन ऊंची दुकान फीका पकवान से ज्यादा कुछ नहीं है. Asian Games 2026

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