Sociopolitical: भारत का किसान आज भी अपनी मेहनत का आधा चौथाई खा पाता है क्योंकि बाकी मंडियों के आढ़तियों, साहूकारों, रिटेलरों, फूड प्रोसैसरों के हाथों छीन लिया जाता है. जो दाम ग्राहक आखिर में देता है वह किसान को मिलने वाले पैसे का 4 गुना होता है. किसानों को दबा कर रखने की आदत सदियों पुरानी है क्योंकि हर राजा अपनी लंबीचौड़ी फौज, अपना महल, अपनी सैकड़ों रानियों, अपने दरबारियों को किसानों की मेहनत के बलबूते ही पालता था. आज भी यह बंद नहीं हुआ जबकि किसानों के पास आज वोट की ताकत है.


किसानों की वोट की ताकतों से बनी सरकारों ने इस तरह से किसानों को बेवकूफ बनाया है कि वे हमेशा यह सोचते रहे हैं कि अगर उन्हें 20 रुपए की जगह 21 रुपए मिल गए तो मानो खजाना टपक पड़ा. वे अब कई दशकों से वोट उन के फायदे की सोचने वाली पार्टी को नहीं, जाति, उपजाति, धर्म, भाषा के नाम पर दे रहे हैं. नेता इस का फायदा इसी तरह से उठा रहे हैं और लूट रहे हैं जैसे पहले राजाओं के कारिंदे राजा की जय बुलवा कर और तलवार की धमकी दे कर लगान वसूलते थे.


मोदी सरकार बड़े जोरशोर से हिंदू किसानों के बचाव की बात करतेकरते आई पर धीरेधीरे उस ने लगातार किसानों को लूटना शुरू कर दिया. डीजल पर टैक्स बढ़ा दिया. कम कीमत की बिजली बंद कर दी. टै्रक्टरों और पंपों पर मिलने वाले टैक्स की छूट कम कर दी. मंडियों के हक बड़ा दिए. सरकारी मामले को औनलाइन का हथियार दे कर तरहतरह के नएनए रजिस्ट्रेशनों के लिए मजबूरकर दिया. किसानों के हालात में सुधार हुए हैं तो सिर्फ तकनीक की वजह से. टै्रक्टर, पंप, थ्रैशर, ट्रौली, ट्रंक, डंपर, जेसीबी मिलने लगे जिन में सरकार का कोई सहयोग नहीं है. किसानों के बच्चे शहरों में भागे हैं और छोटीमोेटी नौकरियां कर के गांव में खेती के नुकसान को पूरा करते नजर रहे हैं.

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