Hindi Story: मां  को गांव जाने वाली बस में बैठा तो दिया था, पर विजय का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. मां जब बस से उतर कर गांव में अपने घर जाएंगी... ओह... उस ने गलत किया है मां के साथ. उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. उस के माथे पर पसीने की बूंदें छलक गईं. 2 महीने पहले विजय मां को गांव से ले कर आया था अपने साथ. मां तो तब भी नहीं आना चाहती थीं, ‘‘अरे, नहीं बेटा... मेरा तो यह छोटा सा घर ही अच्छा है. यहां तेरे बचपन की यादें हैं. वह देख चबूतरा, तू इस पर बैठ कर कर पढ़ता था.

‘‘और वह साइकिल अब टूट गई रखरखाव में. तू तो इसे छोड़ता तक नहीं था. साइकिल पर बैठ कर ही खाना खाता और कई बार इस की सीट से सिर टिका कर सो भी जाता था.’’ मां पूरे जोश से घर में रखी
1-1 चीज दिखाती जा रही थीं. विजय का मन बिलकुल नहीं था इस सब कबाड़े को देखने का, पर मां का जोश तो देखते ही बनता था.

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‘‘मां, आप मेरे साथ चलो शहर,’’ विजय ने कहा.
‘‘नहीं, मैं तो यहीं अच्छी हूं,’’ मां ने साफ मना कर दिया था.
पर विजय तो कर मां को लेने आया था. उसे तो उन्हें ले कर जाना ही था. तरुणा ने साफसाफ बोला था, ‘‘किसी भी हालत में मां को गांव से ले कर आना है. खाली हाथ नहीं आना.’’
विजय बड़ी कशमकश में था. उसे पुराने दिन याद गए. जब वह शहर में पढ़ने के लिए गया था. पर उस के शहर पढ़ने जाने के ठीक 10 दिन बाद ही पिताजी गुजर गए थे. जब उस ने यह सुना तो धक रह गया कि अब उस की पढ़ाई का क्या होगा? पिताजी ही तो एकलौते कमाने वाले थे.
पिताजी की तेरहवीं के बाद जब सारे मेहमान चले गए तब विजय ने मां से पूछा था, ‘‘मां, मैं क्या करूं? शहर जाऊं या पढ़ाई छोड़ दूं?’’
मां ने भरी नजरों से विजय की ओर देखा, ‘‘तू शहर जा और पढ़ाई कर. अपने पिताजी के सपनों को पूरा कर बेटा.’’

‘‘पर मां, बहुत खर्चा होता है. आप कैसे...’’ विजय बोला था. ‘‘मैं कर लूंगी. कुछ कुछ तो कर ही लूंगी. खर्चा भेजती रहूंगी. तू पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर,’’ मां ने पूरी दबंगता के साथ कहा था. विजय के चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था. विजय शहर गया और अपनी पढ़ाई करने लगा. मां से वह जितने पैसे मांगता, वे उतने पैसे उसे भिजवा देतीं. विजय ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर मां के पास पैसे कहां से रहे हैं, जो उसे वे भेज देती हैं. एक बार विजय ने पूछा भी, पर मां ने कहा, ‘‘तू तो पढ़ाई कर... पैसा कहां से रहा है, इस की चिंता छोड़ दे.’’
‘‘जी मां, मेरी जब नौकरी लग जाएगी तो 1-1 पैसा वापस कर दूंगा मां,’’ कहते हुए विजय की आवाज भर्रा गई. उस के सामने अपनी मां की तसवीर उभर आई.

ऐसा नहीं था कि मां बूढ़ी थीं, पर उन के संघर्षों ने उन्हें बूढ़ा बना दिया था और सारा संघर्ष विजय के लिए ही तो था. 5 एकड़ की खेती की जमीन और एक मकान इतनी ही पुश्तैनी जायदाद थी. मां खेतों में काम करती थीं और सब्जी वगैरह पैदा करती थीं, पर जब विजय की पैसों की मांग बढ़ी तो मां ने जमीन को ठेके पर दे दिया और एकमुश्त रकम उसे भेज दी. इस से मां के सामने खुद के लिए दो वक्त की रोटी का सवाल खड़ा हो गया, तो उन्होंने बाहर मजदूरी शुरू कर दी. दूसरों के खेतों में जातीं और दिनभर काम करतीं, जो पैसा मिलता उस में से कुछ अपने लिए बचा कर बाकी विजय को भेज देतीं. ‘‘मां, मैं जानता हूं. आप बहुत कष्ट ?ोल रही हैं. मेरी नौकरी लगने दो, फिर आप को महारानी बना कर रखूंगा... कुछ दिनों की बात और है,’’ विजय ऐसा सच में ही बोलता था.

जब विजय की नौकरी लगी तो उस ने सब से पहले मां को ही फोन किया था, ‘‘मां, मेरी नौकरी लग गई है.’’
यह खुशखबरी सुन कर मां को लगा था कि अब उन के बुरे दिन खत्म हो गए हैं. विजय का मन गांव जा कर मां से मिलने का था, पर वह नहीं जा पाया. इसी बीच विजय की तरुणा से मुलाकात हुई और उन दोनों ने शादी करने का फैसला लिया. तब भी वह मां का आशीर्वाद लेना चाहता था, पर उस ने केवल फोन पर
ही मां को बताया था, ‘‘मां, मैं शादी कर रहा हूं.’’ यह सुन कर मां चौंक गई थीं, ‘‘शादी...’’
‘‘हां मां, तरुणा मेरे साहब की बेटी है... बहुत अच्छी है... आप को भी पसंद आएगी...’’
‘‘पर मां के होते हुए तू कैसे अपनी ही शादी की बात करेगा... अभी मैं जिंदा हूं.’’
‘‘अरे मां, अब समय बदल चुका है. अब तो ऐसे ही शादीब्याह होते हैं.’’
‘‘मां से बगैर पूछे... वाह...’’
‘‘पूछ ही तो रहा हूं...’’ विजय को अपनी गलती का अहसास हुआ.
‘‘पूछ कहां रहा है, तू तो बता रहा है,’’ मां ने कहा.

विजय  कि मां को बुरा लगा है, पर लगने दो, शादी तो उसे ही करनी है और उसे ही अपनी पत्नी के साथ जिंदगीभर रहना है... मां के समय की बात और थी, अब तो सब बदल चुका है. विजय ने शादी कर ली थी. मां को नहीं बुलाया था. पर शादी के बाद वह तरुणा को ले कर गांव गया था. उस के ससुर ने ही बोला था कि घर में कुलदेवता की पूजन करना जरूरी है. विजय कार से गांव पहुंचा. मां गुस्सा तो थीं, पर उन्होने अपना गुस्सा जाहिर नहीं होने दिया. तरुणा का वैसे ही स्वागत किया, जैसे नईनवेली दुलहन का किया जाता है. कुलदेवता की पूजा कराई और गांव की औरतों को बुला कर बधाई गीत भी गाए गए. पर जब गांव वालों ने विजय को ताने मारे कि उस ने अपनी मां के बिना ही शादी कर ली, तो उसे गांव में रहना भारी हो गया. वे दोनों अगले दिन ही गांव से चले गए.

फिर विजय गांव नहीं जा पाया था. उस का ट्रांसफर अब पास के ही शहर में हो गया था. अब उसे यहां लंबे समय रहना था. तरुणा ने ही सु?ाव दिया था कि जब हम को यहां रहना ही है, तो हम अपना घर बना ही लेते हैं. पर विजय की नौकरी तो नई है, तो उस के पास इतने पेसे कहां हें कि वह मकान बना सके.
‘‘क्यों हम गांव का घर और जमीन बेच दें...’’ विजय के ही मन में खयाल आया. तरुणा कुछ नहीं बोली.
‘‘पर मां नहीं बेचने देंगीं,’’ जवाब भी विजय ने ही दिया था.
‘‘देखिए, मां की जायदाद पर तो बेटे का ही हक होता है तो आप जमीन और मकान ले लें,’’ तरुणा ने कहा.
‘‘हां, है तो सही. पर अभी मां जिंदा हैं. वे नहीं रहेंगी, तब ही मेरा हक होगा ...’’
‘‘तो हम अपना हिस्सा तो ले ही सकते हो...’’
‘‘अभी मां कुछ नहीं देंगी. शादी के समय से ही वे नाराज हैं.’’
‘‘तो एक काम क्यों नहीं करते...’’ फिर उन दोनों में खुसुरफुसुर होती रही. विजय अगले ही दिन गांव की ओर निकल पड़ा.

मां ने जब विजय को देखा तो वे हैरत में पड़ गईं. मां के चेहरे पर गुस्सा अभी भी दिखाई दे रहा था, ‘‘कैसे याद गई मेरी?’’
‘‘अरे, कुछ नहीं मां. बहुत दिनों से आप से मिला नहीं था, तो सोचा मिल आऊं...’’ कहते हुए विजय ने अपनी नजरों को ?ाका लिया था. दरअसल, विजय मां को लेने आया था, पर उन्हें ले जाने के पीछे एक योजना थी, जिस के चलते वह मां से नजरें नहीं मिला पा रहा था. मां विजय को हक भरी नजरों से देख रही थीं, ‘‘घर पर सब ठीक है ...’’ वे उसे घूर कर देख रही थीं.
‘‘हां... सब ठीक है...’’ विजय धीरे से बोला.
‘‘बहू कैसी है?’’
‘‘एकदम बढि़या है.’’
विजय मां के हर सवाल पर परेशान हो रहा था. कुछ देर तक शांति बनी रही.
‘‘मैं आप को लेने आया हूं.’’
‘‘क्यों?’’ मां का शक गहराता जा रहा था.
‘‘ऐसे ही, आप कहती थीं कि मु? यहां अकेले नहीं रहना.’’
‘‘मैं ने कब कहा?’’

विजय कुछ देर चुप रहा. उसे मां से इतने सवालों की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह सकपका गया था.
‘‘आप की बहू आप को याद कर रही थी. उस ने ही बोला था कि मां को कुछ दिनों के लिए यहां ले आओ.’’
मां कुछ नहीं बोलीं, पर उन के चेहरे से लग रहा था कि वे अभी भी नहीं आना चाहती हैं. पर दूसरे दिन मां तैयार हो गई थीं चलने को, ‘‘कब निकलना है?’’
‘‘दोपहर को,’’ विजय ने कहा.
‘‘ठीक है,’’ मां बोलीं.
‘‘मां, आप जमीन के और मकान के कागजात निकाल लेना.’’
‘‘क्यों?’’ मां को थोड़ा शक हुआ.
‘‘कुछ नहीं... ऐसे सूने घर में किसी ने चुरा लिए तो...’’ विजय कहते हुए अचकचा रहा था.
‘‘अरे, कहां सूना घर... मैं पड़ोसी को बोलूंगी. वह सोएगा यहां रात को.’’
‘‘फिर भी... कागजात बारबार नहीं बनते मां... उन्हें संभाल कर रखना चाहिए.’’
‘‘अच्छे से ही रखे हैं. तू फिक्र कर.’’

विजय कुछ नहीं बोला. दोपहर को मां तैयार हो कर बैठ गई थीं. ‘‘ये ले जमीन और मकान के कागज चाहिए ... रख ले... मेरे बाद तो सारा कुछ तेरा ही है.’’ विजय की आंखों में चमक गई थी. मां उसे बड़े ध्यान से देख रहीं थीं, पर थीं चुप... ‘‘देख बेटा, जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक यह सारा कुछ मेरा ही है. मैं तेरे साथ कुछ ही दिनों के लिए चल रही हूं, बाकी तो अपनी बाकी जिंदगी यहीं काटनी है,’’ मां की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें गिरीं. विजय चुप रहा.
इधर, तरुणा मां के आने की राह देख रही थी. उस ने मां के लिए अलग कमरा तैयार कर दिया था. और कोई समय होता तो उसे अपनी सास का आना बुरा लगता, पर इस बार तो उस ने योजना बना कर ही उन्हें बुलाया था, तो उन के लिए खास तैयारी कर रही थी. वह जानती थी कि कम से कम 2 महीने तक तो उन को यहां रखना ही है, वे रहना चाहें तो भी.

मां को सामने पा देख कर तरुणा उन के पैरों  गई थी. उस ने दरवाजे पर ही मां की आरती उतारी और उन का हाथ पकड़ कर उन के कमरे तक ले गई.
मां हैरान सी थीं... वे अपनी बहू से दूसरी बार ही मिल रही थीं... शादी के बाद वे कुल देवता के पूजन के लिए आए थे, तब बहू का रुख तो अकड़ भरा ही लग रहा था... इसी वजह से ही उन्होंने कभी विजय को साथ में रखने के लिए नहीं बोला था... पर आज तरुणा का रुख एकदम बदला हुआ था.
विजय का काम तो एक महीने में ही पूरा हो गया था. उस ने मां को बगैर बताए गांव की अपनी जमीन का सौदा कर लिया था और मकान का भी. अच्छे मोटे दाम उसे मिल गए थे. उस ने कुछ बहाने से मां के हाथ का अंगूठा लगवा लिया था.

अब की बार मां ने कोई शक जाहिर नहीं किया था. वे बेटे और बहू की सेवा से संतुष्ट थीं. जमीन और मकान की रजिस्ट्री होते ही विजय ने मां को गांव वापस लौटने का बोल दिया था.
अब तक मां का मन यहां पूरी तरह लग चुका था, पर अचानक जब विजय ने उन्हें गांव चले जाने को कहा, तो उन्हें बुरा लगा. बहू का रुख भी बदल गया था. उन की  में कुछ नहीं आया था कि अचानक बेटे और बहू का बरताव बदल कैसे गया. अनमने मन से मां ने गांव जाने की बात मान ली थी,
‘‘
तू चल छोड़ने.’’

‘‘मैं नहीं जा पाऊंगा. यहां बहुत काम है.’’
‘‘फिर मैं अकेले कैसे जाऊंगी? मैं तो कुछ जानती ही नहीं हूं...’’ मां के चेहरे पर निराशा छा गई थी.
‘‘मैं आप को बस में बैठा दूंगा.
बस तो सीधे गांव ही जाती है. मैं कंडक्टर को भी बोल दूंगा. वह ध्यान से आप को गांव में उतार देगा,’’ कहते हुए विजय ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था.
मां कुछ नहीं बोलीं. आज मां को गांव जाने वाली बस में बैठा दिया गया था.
पहली बार विजय के मन में दुख जागा. गांव में मां कहां रहेंगी... वह घर तो उस ने बेच दिया है...
अपनी आंखों से निकले आंसुओं को विजय ने जमीन पर नहीं गिरने दिया. वह केवल बस को जाते हुए देख रहा था

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