Hindi Story: पिता का साया उठते ही मुन्नी का बचपना अचानक बालिग हो गया. परिवार पालने के लिए वह आर्केस्ट्रा में डांसर बनी जहां साहिल ने उस की देह भोगी. भाई भी उसे पसंद नहीं करता था. क्या मुन्नी के बलिदान का हिसाब हुआ?
मुन्नी को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बड़ी हो गई. उस के जीवन में उम्र का बढ़ना किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह आया, बिना पूछे, बिना रुके. मुन्नी घर की बड़ी बेटी थी. छोटे भाई की बड़ी बहन और मां के लिए एक ऐसा सहारा जो बचपन में ही बालिग बना दिया गया. जब मुन्नी 12 साल की थी, तभी पिता का साया उठ गया. प्राइवेट नौकरी थी उन की, कोई पैंशन नहीं, कोई जमीनजायदाद नहीं.
पिता की मौत के बाद सरकार की अनुकंपा पर मां को नौकरी तो मिली, पर इतनी मामूली कि उस से घर का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से हो पाता था. घर में शोक था, पर उस से भी बड़ा बोझ जिम्मेदारी का था. पिता के जाने के कुछ महीनों बाद ही मुन्नी की किताबें धीरेधीरे बंद होने लगीं. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छूट गया. मां ने कहा नहीं था कि पढ़ाई छोड़ दो, पर हालात ने कह दिया था. किसी ने जोर नहीं डाला, किसी ने रोका भी नहीं. समाज में यह तय था कि लड़की की पढ़ाई रुके तो चलेगा, पर लड़कों की नहीं. मुन्नी ने चुपचाप यह नियम स्वीकार कर लिया.
किशोरावस्था मुन्नी के जीवन में आई ही नहीं. जब उस की सहेलियां सपने बुन रही थीं, तब वह सुबह चूल्हा जलाती, भाई को स्कूल भेजती और मां की थकी आंखों में झांक कर समझ जाती कि शिकायत का कोई मतलब नहीं. वह खुद को भूले चली गई. 18 की उम्र, वही उम्र जब लड़कियां खुद को खोजती हैं, सजती संवरती हैं और भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन मुन्नी के लिए यह उम्र एक डर बन कर आई. समाज की बेरहम नजरें, महल्ले की फुसफुसाहट और हर दिन बढ़ता बोझ.
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