Social Satire. चुनाव के पहले ऐलान हुआ कि नेता गरीबी हटाएंगे. सुन कर दिल बागबाग हो गया. हम ने ऐसी ही पार्टी को वोट देना ठीक सम झा. हमारा पूरा खानदान ही भिखमंगों का है. अगर हमारी गरीबी कोई हटाएगा, इस से अच्छी बात और क्या होगी.
हम ने उसी पार्टी को वोट दिया और चमत्कार देखिए कि वह पार्टी जीत भी गई. राज्य से ले कर केंद्र तक उसी पार्टी ने सरकार बना ली. सबकुछ इतनी जल्दी हुआ था कि हमें ऊपर वाले पर पक्का यकीन हो गया था. हम ने मान लिया था कि मूर्ति चाहे पत्थर की हो या लोहे की, वह सुनती है और उस ने हमारी सुन ली थी.
हम इंतजार करते रहे कि कोई न कोई हमारी गरीबी की खोजखबर लेने आएगा, लेकिन उसे नहीं आना था, सो नहीं आया. 1-2 बरस करतेकरते पूरे 4 साल तक हम ने इंतजार किया और उम्मीद ही छोड़ दी.
तभी एक दिन हमारे फटीचर दोस्त ने बताया, ‘‘सरकार का योजना आयोग महकमा गरीबों का सर्वे कर रहा है और जल्दी ही गरीबी दूर होने वाली है.’’
‘‘आखिर वे गरीबों की पहचान कैसे करेंगे?’’ हम ने अपनी गोलगोल आंखें मटका कर पूछा.
वह थोड़ा पढ़ालिखा था. उस ने हंस कर हमारी ओर देखा और बोला, ‘‘बहुत आसान...’’
‘‘कुछ बताओ तो, ताकि हमें भी कुछ सम झ में आए,’’ हम ने उस से सवाल किया.
उस ने हमें बताया, ‘‘भैया, एक मर्द को जो मेहनत करता है, उसे 38 सौ कैलोरी और मेहनत करने वाली औरत को 2925 कैलोरी की रोजाना जरूरत होती है.’’
‘‘हमें अच्छी तरह सम झाओ यार...’’
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