Story in Hindi. मम्मीपापा को चाय दे कर मैं आंगन में आई. भाभी काम कर रही थीं, क्योंकि महरी नहीं आई थी.
मैं ने कह दिया, ‘‘भाभी, कभी अपनी खुशी के बारे में भी तो सोचो.’’ ‘‘क्या बात है?’’
‘‘सुना है कि नटराज सिनेमाघर में अच्छी फिल्म लगी है.’’ ‘‘तो सीधे क्यों नहीं कहती कि फिल्म देखने चलना है.’’
‘‘मैं अकेली नहीं जाऊंगी. भैया कभी जाते नहीं. तुम चलो न.’’
‘‘तुम्हारे भैया को नेतागीरी करने से फुरसत मिले तब न. न जाने कैसे कारखाने के मजदूरों ने उन्हें यूनियन का नेता बना दिया है. वे हमेशा उन से ही घिरे रहते हैं. जब देखो तब बाहर…’’
‘‘तो तुम क्यों अंदर हो?’’ मैं बोली. ‘‘चलो, मैं चलती हूं.’’
भाभी तैयार हो गईं. मेरा दिल धड़कने लगा. मैं ने सोचा, ‘इधर से मैं भाभी को ले जाऊंगी, उधर से रमेश माताजी को ले कर पहुंचेगा. हम दोनों को मिला देंगे… इस तरह दोनों परिवारों की दूरियां कम होंगी.’
रमेश दफ्तर में मेरा बौस था, पर बाहर प्यारा साथी.
नटराज सिनेमाघर पहुंचते ही मैं ने कहा, ‘‘भाभी, चाय हो जाए.’’
रैस्टोरैंट में घुसते ही मैं ने नजर घुमाई, रमेश अभी तक नहीं आया था. मैं भाभी के साथ एक कोने में जा बैठी.
मैं मोबाइल पर नंबर मिलाने लगी, पर कामयाब नहीं हो सकी.
भाभी ने कौफी का और्डर दिया और मेरी ओर मुसकरा कर देखने लगीं. उन्होंने पूछा, ‘‘बारबार बाहर क्या देख रही हो? और किसे फोन…’’
‘‘कुछ नहीं,’’ मैं सकपका गई.
बैरा कौफी ले आया, तभी रमेश अकेला आता हुआ दिखा. पास आ कर वह हैरान होते हुए बोला, ‘‘आप यहां?’’
‘‘जी हां, आप कैसे?’’ मैं ने भी नाटक करते हुए भाभी से उसे मिलाया, ‘‘भाभी, आप हैं रमेश. मेरे दफ्तर में ही काम करते हैं.’’
रमेश ने मुसकराते हुए हाथ जोड़ दिए, तो भाभी भी मुसकरा दीं.
मैं ने बैरे को एक कप कौफी और लाने के लिए कहा और इशारे से जानना चाहा कि माताजी क्यों नहीं आईं?
रमेश ने कहा, ‘‘दफ्तर में कई बार सवि आप के बारे में बता चुकी है.’’
भाभी मेरी ओर देखने के बाद बोलीं, ‘‘पर सवि ने आज तक आप के बारे में कुछ नहीं बताया.’’
‘‘दफ्तर में तमाम लोग हैं. मैं किसकिस के बारे में आप को बताती रहूंगी,’’ मैं ने बहाना बनाना चाहा.
भाभी मुसकराईं व बोलीं, ‘‘रमेशजी को बताने की क्या जरूरत थी?’’
यह सुन कर रमेश बोला, ‘‘बात यह है भाभीजी कि खाली समय में हम दफ्तर में घर के बारे में ज्यादा बातें करते हैं.’’
‘‘पर घर में तो सवि चुप रहना पंसद करती है,’’ भाभी ने चुटकी ली.
बैरा कौफी दे गया. मैं पकड़ी न जाऊं, सो मैं ने यों ही पूछ लिया, ‘‘आप इधर कैसे निकल आए रमेश बाबू?’’
‘‘अगले रविवार को मां का जन्मदिन है. उन के लिए साड़ी खरीदनी है. एक जानपहचान वाले घर आ गए थे, इसलिए वे साथ नहीं आ सकीं. वैसे, पार्टी में आप को भी आना होगा.’’
‘‘मैं अपने भैयाभाभी की इजाजत के बगैर कहीं नहीं जाती.’’
‘‘माफ करना. मैं अभी भाभीजी से इजाजत ले लेता हूं.’’
‘‘यह फैसला सवि के भैया लेंगे. वे जरा कड़क हैं,’’ कहते हुए भाभी गंभीर हो गईं.
थोड़ी देर के बाद घर आते ही भाभी ने भैया से सारी बातें बता दीं.
भैया एक नेता की तरह बोले, ‘‘कल सवि को देखने एक औरत आएंगी. उन्होंने पसंद कर लिया, तो सवि को किसी पार्टी में जाना शोभा नहीं देगा.’’
मैं दफ्तर से घर आई, तो भाभी ने कहा, ‘‘तैयार हो जाओ, कोई तुम्हें देखने आने वाला है.’’
मैं झल्ला उठी, ‘‘मैं नुमाइश की चीज नहीं हूं.’’
अगले दिन मम्मीपापा व भैयाभाभी मुझे साधारण कपड़ों में देख कर चौंक गए. उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी.
मैं ने देखा, एक बूढ़ी औरत आंखों पर चश्मा चढ़ाए सफेद साड़ी में लिपटी बैठी थीं.
भैया ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी इच्छा को समझ रहा हूं सवि. फिर भी आओ. मैं तुम्हें माताजी से मिलाता हूं, जिन्हें तुम्हारी जैसी पढ़ीलिखी बहू चाहिए.’’
मैं ने सोचा था कि साधारण कपड़ों में देख कर वह औरत मुझे पसंद नहीं करेगी, पर उसे तो साधारण बहू ही चाहिए थी.
भाभी ने मुझे अपने पास बैठाया. उस बूढ़ी औरत ने चश्मे की ओट से मुझे घूरते हुए पूछा, ‘‘बेटी, मैं जानना चाहती हूं कि पारिवारिक संबंधों में कड़वाहट न आए, इस के लिए क्या करना चाहिए?’’
‘‘मुझे किसी परिवार में नौकरी नहीं करनी है कि इंटरव्यू देती फिरूं.’’
मेरा यह जवाब सुन कर मम्मीपापा और भैया गंभीर हो उठे.
वह बूढ़ी औरत बोली, ‘‘मुझे अपने परिवार में ले जाने के लिए तुम्हारे विचार जानने होंगे बेटी.’’
‘‘मेरे ही विचार क्यों मांजी?’’ ‘‘तो और किस के?’’ कहते हुए वह बूढ़ी औरत ?ां?ाला उठी.
‘‘अपने बेटे के.’’ ‘‘उसे मैं जानती हूं.’’
‘‘मैं तो नहीं जानती. आप को उन्हें भी साथ लाना चाहिए था. मान लीजिए, आप का बेटा किसी और को बीवी बनाना चाहता है और आप अपनी इच्छा उस पर थोपना चाहती हों, तो सोचिए, मेरा भविष्य कैसा होगा?’’
‘‘न जाने क्या हो गया है इस नौजवान पीढ़ी को, जो सीधे सवाल का सीधा जवाब नहीं देती.’’
‘‘जी हां…’’ भैया ने उस औरत का समर्थन किया, ‘‘कल आप का बेटा भी मेरे किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था.’’
‘‘मेरी समझ से यह संबंध जोड़ने की बात यहीं छोड़ देनी चाहिए.’’
‘‘जी हां, क्योंकि मैं ने आप को और आप के बेटे ने भैया को उलटा जवाब दे दिया है,’’ मैं ने और चिढ़ाया.
भैया अपनी हार होते देख गंभीर हो गए और बोले, ‘‘अच्छाबुरा मैं समझाता हूं. मैं ने मजदूरों और मालिक के बीच कई समस्याएं सुलझाई हैं. मांजी का परिवार सवि के लिए ठीक है, इसलिए मैं ने इन्हें यहां बुलाया है.’’
‘‘गलत फैसले पर मजदूरों ने आप के खिलाफ नारा भी तो लगाया होगा.’’
भैया मेरी ओर देख कर मुसकराए और बोले, ‘‘तुम्हें सुनयना के यहां जाना है न? इन को भी उधर ही जाना है. रिकशे पर साथ चली जाओ.’’
मैं खुश थी. सुनयना के बहाने रमेश से पार्क में मिलने जो जाना था.
रास्ते में मैं ने उस बुजुर्ग औरत से पूछ लिया, ‘‘क्या आप मुझ से अभी भी नाराज हैं?’’
‘‘तुम्हें इस से क्या? वैसे, मैं परेशान जरूर हूं. मैं नहीं समझा पा रही हूं कि तुम्हारी तरह मेरा बेटा भी क्यों ऐसा हो गया है? वह हर किसी के सवालों के जवाब टेढ़े ही देता है.’’
‘‘वे आदमी ही टेढ़े होंगे.’’ ‘‘नहीं, एक फैक्टरी में वह अफसर है. उस का नाम रमेश वर्मा है.’’
यह सुन कर मेरी आंखें हैरानी से फैल गईं.
‘‘क्या सोचने लगी बेटी?’’ ‘‘जी, मैं रमेशजी को जानती हूं.’’
‘‘अच्छा, तब तो तुम उस के स्वभाव से भी परिचित होगी? पर अब क्या फायदा?’’ यह कह कर जैसे उन्होंने मुझे हराना चाहा.
मैं बोल उठी, ‘‘सुना है, रमेशजी दफ्तर में काम करने वाली एक पागल लड़की से शादी करना चाहते हैं.’’
मांजी का चेहरा देखने लायक था.
‘‘यहीं रोको, सामने ही मेरा घर है…’’ उन मांजी ने रिकशे वाले से कहा.
तभी उस घर से रमेश को स्कूटर पर बाहर निकलते देख मैं चौंक उठी. वह मुझ से मिलने पार्क जा रहा था.
‘‘अरे, तुम… मेरी मां के साथ?’’ रमेश को मुझे वहां देख कर हैरानी हुई.
‘‘मुझे माफ कर दो रमेश… मैं अनजाने में ही मांजी के सवालों के जवाब टेढ़े दे गई.’’
‘‘तो माफी भी मां से ही मांगो…’’ रमेश ने मुझे चिढ़ाया, ‘‘मां, तुम ठीक तो हो न?’’
‘‘नहीं, नाराज हूं. तू दफ्तर की किस पागल लड़की को अपनी बीवी बनाना चाहता है?’’
रमेश बोला, ‘‘तुम उसे अपने साथ ले आई हो मां.’’
यह सुन कर मांजी हैरान रह गईं और बोलीं, ‘‘तो यह बात है? इसीलिए अकुलजी परेशान दिख रहे थे.’’
‘‘वही, जो कल आए थे?’’
‘‘वे इस पागल लड़की के बड़े भैया हैं,’’ मांजी बोलीं.
‘‘मुझे माफ करना सवि… मैं ने भी उन के सवालों के टेढ़े जवाब दिए थे.’’
‘‘मुझ से नहीं, आप भैया से माफी मांगना,’’ मैं ने कहा.
यह सुन कर मांजी हंसते हुए बोलीं, ‘‘मैं समझ नहीं पा रही हूं कि कौन जीता और कौन हारा.’’ Story in Hindi




